आज़ादी के पैसठ सालों के बाद भी यह सब समस्याएं? आज भी हमारे देश में यह अलगाववादी क्यों हैं? सरकार की आंतरिक आतंकवाद से लडनें की कोई नीति क्यों नहीं है...
| (तस्वीर गूगल से साभार) |
आईए जानते हैं आखिर नक्सलवाद है क्या?
नक्सलवाद भारतीय कम्युनिस्टों के सशस्त्र आंदोलन का अनौपचारिक नाम है। नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुई है जहाँ भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने १९६७ मे सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की। मजूमदार चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसकों में से थे और उनका मानना था कि भारतीय मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिये सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं जिसकी वजह से उच्च वर्गों का शासन तंत्र और फलस्वरुप कृषितंत्र पर वर्चस्व स्थापित हो गया है। इस न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है। १९६७ में "नक्सलवादियों" ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। इन विद्रोहियों ने औपचारिक तौर पर स्वयं को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया और सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी। १९७१ के आंतरिक विद्रोह (जिसके अगुआ सत्यनारायण सिंह थे) और मजूमदार की मृत्यु के बाद यह आंदोलन एकाधिक शाखाओं में विभक्त होकर कदाचित अपने लक्ष्य और विचारधारा से विचलित हो गया।
वैचारिक भटकाव
आरम्भ में नक्सली केवल सरकारी विचारधारा के खिलाफ़ मज़दूरों की आवाज़ बननें और उन्हे उनका अधिकार दिलानें की मानसिकता से बनें थे लेकिन उनकी यह विचारधारा मूलरूप से केवल विरोधजन्य थी। उनकी विचारधारा कभी भी किसी समाधान की ओर नहीं गई, और न ही उन्होनें किसी समस्या के समाधान को तलाशनें का प्रयत्न किया। इसी मज़दूर आन्दोलन और मजदूरों को अपनें साथ इसमें जोडे जानें के कारण उन्होनें कलकत्ते पर कई वर्ष राज किया और कांग्रेस की सरकार को बंगाल के बाहर खदेड दिया।
कालान्तर में वामपंथी नक्सलवाद का केन्द्र की सरकार नें दुरुपयोग शुरु किया, इस समस्या से जनित विरोध का अन्त करनें की जगह उन्होनें हमेशा इस पर राजनीति खेली और इसका राजनीतिक फ़ायदा भी उठाया। नतीज़तन आंतरिक नक्सलवाद केन्द्र सरकार की कठपुतली बनकर रह गया और इसका वामपंथ से कोई वास्ता न रह गया। यह जो आप आज कल की नक्सलवादी हिंसा देखते हैं यह उन्ही का परिणाम है। आज कल का नक्सलवाद केवल सरकार विरोधी ही नहीं वरन देशद्रोही भी है। यह विदेशी दुश्मनों से सांठगाठ करते हैं और हिन्दुस्तान को अस्थिर करनें के लिए बाहरी दुश्मनों का साथ देते हैं।
ढुलमुल सरकारी कार्यवाही
यकीनी तौर पर अब तक जो भी कार्यवाही हुई है वह नाकाफ़ी है और आज तक भी हमारी कोई नीति नहीं है। सेना और सीआरपीएफ़ के जवानों को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जिस प्रकार के हथियारों और सुविधाओं की जरूरत चाहिए वह नदारद है। वह आज भी नक्सल क्षेत्रों में मैपिंग और ट्रैकिंग के लिए प्रयोग में आनें वाले उपकरणों की कमी से परेशान है।
यदि नक्सल समस्या को जड से खत्म करना है तो फ़िर उनके खिलाफ़ आतंकवाद और देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए। उन्हे देश के खिलाफ़ युद्ध छेडनें के समान ही अपराधी मानते हुए कार्यवाही होनी चाहिए। राज्य सरकारों और केन्द्र सरकारों को मिलकर इस समस्या को जड से समाप्त करनें के लिए प्रयत्न करना चाहिए। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जनता की सुरक्षा और जनता का सरकारी तंत्र में विश्वास वापस लानें की दिशा में ठोस कार्यवाही होनी चाहिए...
सोच कर देखिए, यह समस्या जितना हम सोच सकते हैं उससे भी कहीं अधिक गम्भीर है।
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चलिए आज के बुलेटिन की ओर चलें
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तो मित्रों आज का बुलेटिन यहीं तक... कल फ़िर मिलते हैं एक नये रुप में.. तब तक के लिए देव बाबा को अनुमति दीजिए...
जय हिन्द
देव


