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सोमवार, 2 जनवरी 2012

कलम का साथ बड़ा अनोखा होता है - ब्लॉग बुलेटिन



प्रकृति धूप छाँव के खेल खेलती है , राजनीति दावपेंच के , समाज सक्रियता निष्क्रियता के .... ऐसे में कलम का साथ बड़ा अनोखा होता है , जैसे एक बच्चे के लिए माँ की गोद ! कैसे ? अब जो मैं समझाने में वक़्त लगाऊँ , फिर आप सोचो - उससे पहले ही सोचना शुरू कीजिये न ....
तब तक मैं कुछ ब्लॉग के चक्कर लगाती हूँ , कुछ ख़ास लिंक्स अपने नज़रिए से लाती हूँ - सोच जब उत्तर पा जाए तो बताइए कि मेरे नज़रिए ने सही दरवाज़े खोले हैं या नहीं ...

चलिए मैं मिलाऊँ हरीश जयपाल माली से .... देश समाज के परिवर्तन से क्षुब्द्ध http://harishjaipalmali.blogspot.com/2012/01/blog-post.html
... वाकई अब कोलाहल में ज़िन्दगी नहीं परखचे मिलते हैं - शरीर और दिल दिमाग के , संस्कारों के ...

धर्मेन्द्र कुमार सिंह ने धरती की आह को देखा , और कर्तव्य के प्रति निष्ठा ... http://www.dkspoet.in/2012/01/blog-post.html
माँ बच्चों से परे नहीं सोचती ...

जीवन में निरंतरता ज़रूरी है ... अनीता जी http://amrita-anita.blogspot.com/2012/01/blog-post.html के गहन विचार हैं यहाँ . सच भी है , जो थम गए तो कुछ नहीं ...

हर किसी का प्रयास होता है , मुट्ठी में समय को कैद करने का .... पर समय रुक जाए तो सबकुछ असह्य हो उठेगा .... श्वेता सिंह को पढ़िए http://meremanterikaundisha.blogspot.com/2011/12/blog-post_31.html में और जानिए कि गर श्वेत रंग पाना है तो चलना है ... चलते जाना है ...

धरती से आकाश तक सभी द्वार खुले और 2012 घुटनों के बल चलता हमारे पास खड़ा हो गया , खुशियों के शब्द नहीं होते - पर कहना होता है बहुत कुछ . यशवंत माथुर ने हाथ जोड़े अपने सपनों का एक सिरा दे दिया है 2012 को http://jomeramankahe.blogspot.com/2012/01/2012.html

काजल कुमार ने कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया है - http://kathakahaani.blogspot.com/2012/01/blog-post.html ... कौन जाने कल की !

मन की स्थिति एक सी नहीं होती .... किसी के लिए नया वर्ष जश्न , किसी के लिए ख़ामोशी, किसी के लिए दहशत , किसी के लिए हतप्रभ प्रश्न ...
महेंद्र वर्मा अंजुरी भर सुख के लिए नए वर्ष से एक आहत प्रश्न कर रहे हैं http://shashwat-shilp.blogspot.com/2012/01/blog-post.html

अब मैं होती हूँ चुप .... पढ़ना नहीं है क्या ?

रश्मि प्रभा

रविवार, 1 जनवरी 2012

वसुधैव कुटुम्बकम् - ब्लॉग बुलेटिन


“आलस्य हि मनुष्याणाम् शरीरस्थो महारिपुः”.. और इसी शत्रु ने बहुत दिनों से जकड रखा था मुझे. ब्लॉग बुलेटिन से जुड़े रहने के बावजूद भी, इतने दिनों तक कुछ लिखने का समय न निकाल पाया. शिवम बाबू ने कितनी बार प्यार और मनुहार से उलाहना भी दिया, लेकिन कभी कार्यालयीन व्यस्तता और कभी पारिवारिक झंझटों ने ऐसा उलझाए रखा कि बस सब छूट सा गया.

आज नए साल के शुभारंभ पर, जब सबेरे से फोन पर ब्लॉग मित्रों की बधाई का तांता लगा रहा तब लगा कि अपने आलस्य के कवच से बाहर निकालने का समय आ ही गया है. और रही सही कसर शिवम बाबू के फोन ने पूरी कर दी. अपने चिर-परिचित स्टाइल में बोल ही पड़े वो, “दादा! अब आप इसे मेरी गुस्ताखी कहें या जो भी, मगर बुलेटिन पर आपका ही आगमन नहीं हुआ है!” अब एक बार मौत का बुलावा हो तो टाल भी जाऊं, मगर छोटे भाई का आह्वान तो टालना असंभव है. सो लीजिए हाज़िर हैं हम इस साल का पहला बुलेटिन लेकर!!

गया साल तो गया गया... गया यानि फल्गु नदी के किनारे मोक्ष को प्राप्त हो गया. लेकिन जाते-जाते हम लोगों को कितना कुछ दे गया. आप कहेंगे बहुत कुछ ले भी तो गया. जैसे डॉ. अमर कुमार, हिमांशु मोहन जी और संध्या गुप्ता जी. पर जो ले गया उसका अफ़सोस तो देव साहब ने भी मनाने को मना किया है
बर्बादियों का सोग मनाना फ़िज़ूल था,
आबादियों का जश्न मनाता चला गया!

आइये, शुक्रिया अदा करें गुज़रे हुए साल का, जिसने हमें एक परिवार दिया, अपने परिवार से इतर एक परिवार. और दिल्ली से पीट्सबर्ग तक, बेंगलुरु से वेलिंग्टन तक, कोलकाता से बर्लिन तक “वसुधैव कुटुम्बकम” को स्थापित करते हुए एक सूत्र में पिरोया. इसे ब्लॉग-सूत्र के साथ-साथ, अपने देश की भाषा हिन्दी का सूत्र तो कह ही सकते है.

साल २०१२ में हमारे प्यार की यह खुशबू फैले और सारी फिजां में इस तरह बिखर जाए कि सारी कायनात झूम उठे. आप सभी के लिए सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य की मंगलकामनाओं सहित, बस यही कहना है कि हमारा प्यार यूँ ही बना रहे
इक लफ्जे-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है,
सिमटे तो दिले आशिक, फैले तो ज़माना है!

मौसम की बुलेटिन कहती है कि आज कई शहरों में बारिश और ठण्ड ने भी जमकर और जमाकर सेलेब्रेट करना शुरू कर दिया है. कई लोगों के सेलेब्रेशन पर ओले पड़ गए हैं. कुछ लोग कंप्यूटर के दामन से निकलकर अपने फेमिली के आँचल तले जा छुपे हैं. आइये देखें आज की ब्लॉग-बुलेटिन क्या कहती है:

१. शहरों का मल्टी-कल्चर - त्यागी सर का व्यंग्य!!
२. बस इतना सा ख्वाब है – अंजुरी भर सुख - महेंद्र वर्मा जी का शास्वत शिल्प!
३. इक्कीस का बारह – उलटा जुआ - उत्साही जी की गुल्लक 
४. सलाम इस समर्पण को - अनुराग शर्मा जी ने बताया एक महिला का समर्पण 
५. बैलेंस – शीट साल भर की -  अर्चना चावजी जी ने दे डाली साल भर की लिंक
६. नए साल की एक नयी धारणा - संवेदना के स्वर का एक पहलू यह भी
७. नए शायर का जन्म – मनोज मसरूफ - मनोज कुमार जी के विचार पर एक नए शायर का जन्म
८. ऐसा होता कहाँ है - गिरिजेश राव जी ने जो कहा उसपर भी गौर फरमाएं 
९. बारिश, ब्लॉग्गिंग, नया साल और पत्नी - बेचैन आत्मा पत्नी के आँचल तले 
१०.विदाई बीतते साल की - अविनाश चंद्र जी की प्यारी सी कविता 

आप आनंद लें और मुझे विदा दें! इस वादे के साथ कि फिर मिलेंगे अगर खुदा लाया!!

- सलिल वर्मा


लेखागार