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शनिवार, 9 दिसंबर 2017

2017 का अवलोकन 25




बुलेटिन के कदम हैं फेसबुक के पन्नों पर, सोच रही हूँ, इनका कोई ब्लॉग क्यूँ नहीं है !
शैलजा पाठक, रोजमर्रा के ख्यालों पर शब्दों का दोहर डालते हुए शयद खुद नहीं जानती कि उन्होंने कितने घरों में चिंगारी रखी है !
......... 




जब डर मरने लगे हमें मर जाना चाहिए

सही समय है यही
जब आ जाना चाहिए प्रलय
ढह जाने चाहिए 
मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारे
पूरी दुनियाँ एक नदी में तब्दील हो जानी चाहिए
देश धर्म समाज के सभी झंडे
डूब जाने चाहिए
स्कुली बच्चों की आँखों में रेत का बवंडर उठे
वो कुछ न देख पाएं
उनके सवाल के जबाब नही होंगे हमारे पास
हम पूरी तरह तैयार है
जानवर बनने के लिये
हमने इंसान बनने की नाकाम कोशिश की
पर हम हार गए
बहुत सुंदर दुनियाँ को देखने के लिए बाकि बची उमर में
अगर हम अपने बेटे को आग में जलता
अपनी बेटी को गैंग रेप का शिकार होता देखते हैं
हम एक बुजुर्ग की इज्जत तार तार होता देखते हैं
रोज किसान को पेड़ पर झूल जाना देखते है
ये और इससे बहुत ज्यादा
देख सकते हैं
हम ऐसी फिल्मो को रोक कर देख रहे
रिवाइंड किये जा रहे बलात्कार के वीडियो
ठीक गर्दन काटते हाथ का क्लोसप देख सकते हैं
खून के एक एक छीटें गिन सकते हैं
आत्मा को हिला देने वाली चीखो को ईयर फोन लगा कर सुन सकते हैं
हम जानवर से बदतर जानवर हैं
कविता में नही बची कविता
प्रेम मे नही बचा प्रेम
यकीन में बचा है जानलेवा धोखा
धोखे में खून कतल दरिंदगी
इस समय को इतिहास किस नाम से जानेगा
डूब मरने को कम है पानी
ये झंडे और दंगे का देश है
यहाँ सबके तलवार में धार है
अब इंसान बीमार है
आग लगे ऐसे समाज को
बज्जर पड़े ऐसी धरती पर
जन्म न ले कोई अब
जो बचे हैं वो सब गर्दन झुका लें
उनके पास आरी है तलवार है कुल्हाड़ी है
वो आग के कारोबारी है
कल किसी और की बारी थी
आज हमारी बारी है...

2 टिप्पणियाँ:

Kavita Rawat ने कहा…

अवलोकन में शैलजा पाठक जी की चिंतनशील रचना प्रस्तुति हेतु धन्यवाद

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

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