Subscribe:

Ads 468x60px

कुल पेज दृश्य

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

प्रतिभाओं की कमी नहीं - एक अवलोकन 2015 (८)


शब्द लहराकर हर तरफ जाते हैं
कोई रख देता है उसे रोटी में
कोई मटकी में
कोई बुहारकर निकाली गई धूल में
कोई टांग देता है कंदील संग
रात के अँधेरे में !
शब्द छुप जाते हैं
झांकते हैं दरवाज़े की ओट से
बिस्तर के नीचे से
खिड़कियों से
जागी आँखों सोयी आँखों से
उनींदे ख्यालों से ...
जब नहीं दिल करता उनके संग खेलने का
तो हठी की तरह
पालथी मार बिस्तर पर बैठ जाते हैं
सुबह की चाय के लिए ...
हर घूंट में भाव भरते हैं
फिर गीतों संग बहकते हैं ...
ये शब्द नाम बन जाते हैं
चेहरे में ढल
मुझसे बातें करते हैं
मेज पर पड़ी मेरी कलम
मेरी उँगलियों के बीच आती है
या मुझे अपने बीच करती है
इससे अनजान मैं
उन्हें पिरोती हूँ , पिरोती जाती हूँ
वे मुझे आवाज़ देते हैं
कभी किसी की मटकी से
कभी रोटी से
कभी धूल से
कभी कंदील की रौशनी से .....
इस गहरे रिश्ते को
मैं गंवाना नहीं चाहती  ..... तो करती हूँ कभी अवलोकन, कभी मील के पत्थरों में ढूँढती हूँ, और ले आती हूँ आप सबके बीच :) 

मुकेश पाण्डेय
[283013_253257488017833_100000007514202_1090934_7578753_n.jpg]


"एक रात के तवे पर चाँद पकाते हुए"


मुझे मत पढ़ाओ कविता,
संवेदनाओं से क्षीण बाँझ ज़मीन पर शब्दों की बुआई छोड़ दो।
छोड़ दो ज़िद
कि पिंजरे में छटपटाते पंछी को निहारते रहो देर तक, 
कि आज़ादी दिवस पर कम-अज़-कम
"एक उम्मीद का पौंधा" रोप सको।
देर तक आकाश ताकना छोड़ो,
कि समझने लगो बादलों की बनावट को खुला खेत
कि कबूतरों की नाक में ज्यौड़ा डाल के जुता सको।
रतजगे न करो,
कि उदास गुलाब के मुरझाने पर
बीत गए को याद करो।
लोगों से इतना मत भागो के अकेले हो जाओ
कि सिगरेटों को चूस कर धुएँ के गरारे करो
और खांस-खांस के भीतर का खालीपन भर सको।
ठहरो!
उस शहर में ना बसो,
जहाँ न कोई ठोर हो,
लैंप-पोस्टों से वेदना बरसे व समय पे "छाता" भारी हो।
और सुनो मुझे मत पढ़ाओ कविता,
कुछ हाथ का काम करो-
"हो सके तो ठण्ड से ठिठुरी दुर्गा की पीठ मलो,
शम्भू महतो के हिस्से का रिक्शा खींचो,
या फिर विलिंगटन वुड्स की दवात में ओक से स्याही भरो।"
और न हो सके कुछ भी अगर
तो अपनी उड़ान पर नज़र रखो,
जब परों को चस्पा कर छतों से कूदो
इतना ख़्याल करो कि यह
किसी विफल किसान की आत्महत्या का काव्यात्मक प्रयास न हो !

7 टिप्पणियाँ:

कविता रावत ने कहा…

बहुत सुन्दर भूमिका के साथ मुकेश जी की सार्थक चिंतनशील रचना प्रस्तुति हेतु आभार!

skashliwal ने कहा…

~ aabhar ~

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर !

Asha Joglekar ने कहा…

लोगों से इतना मत भागो कि अकेले हो जाओ। यह अकेला हो जाना बहुतों की जिंदगी है पर काम में शारिरिक काम में अपने को उलझाये रखना, लोगों से मिलना चाहे एक उपचार ही क्यूं न हो इसका कारगर इलाज है। इस सुंदर प्रस्तुति का आभार रश्मि जी।

Asha Joglekar ने कहा…

लोगों से इतना मत भागो कि अकेले हो जाओ। यह अकेला हो जाना बहुतों की जिंदगी है पर काम में शारिरिक काम में अपने को उलझाये रखना, लोगों से मिलना चाहे एक उपचार ही क्यूं न हो इसका कारगर इलाज है। इस सुंदर प्रस्तुति का आभार रश्मि जी।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

आप के कारण न जाने कितने अंजान ब्लोगों का पता मिलता है ... जय हो दीदी |

kuldeep thakur ने कहा…

क्या बात है...

टिप्पणी पोस्ट करें

बुलेटिन में हम ब्लॉग जगत की तमाम गतिविधियों ,लिखा पढी , कहा सुनी , कही अनकही , बहस -विमर्श , सब लेकर आए हैं , ये एक सूत्र भर है उन पोस्टों तक आपको पहुंचाने का जो बुलेटिन लगाने वाले की नज़र में आए , यदि ये आपको कमाल की पोस्टों तक ले जाता है तो हमारा श्रम सफ़ल हुआ । आने का शुक्रिया ... एक और बात आजकल गूगल पर कुछ समस्या के चलते आप की टिप्पणीयां कभी कभी तुरंत न छप कर स्पैम मे जा रही है ... तो चिंतित न हो थोड़ी देर से सही पर आप की टिप्पणी छपेगी जरूर!

लेखागार