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मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

धनतेरस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ - ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को मेरा सादर नमस्कार।
धनतेरस के लिए चित्र परिणाम
सभी देशवासियों को धनतेरस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ। सादर ... अभिनन्दन।। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर .... अभिनन्दन।।

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

बेचारा भाग्य !!!



वक़्त और बड़ों के द्वारा
बच्चों की मासूम भाषा में
जहाँ जाने की 
जो करने की
जो बोलने की 
हमें मनाही होती है
वहाँ 
हम खुद को अति विनम्र
अति कुशल मानकर जाते हैं 
और जब फँस जाते हैं 
तो भाग्य की दुहाई देते हैं 
बेचारा भाग्य !!!


दिवाली में पटाखों की निरर्थकता - काव्य सुधा - blogger


जो चीज़ें
भीतर बाहर मर गयी हों
उनसे
बड़ी सहजता के साथ
मुक्त होने का नाम है 
पतझड़ !
कि
जीवन हर मौसम है बस
कल-कल बहता
निर्झर !!


खाली कमरा

त्यौहारों का मौसम है
घर के दरो दीवार
साफ़ करके चमकाने का वक्त है !
कहीं कोई निशान बाकी न रह जाये
कहीं कोई धब्बा नज़र न आये
कुछ भी पुराना धुराना
बदसूरत दिखाई न दे !
सोचती हूँ बिलकुल इसी तरह
आज मैं अपने अंतर्मन की
दीवारों को भी खरोंच-खरोंच कर
एकदम से नये रंग में रंग दूँ !
उतार फेंकूँ उन सारी तस्वीरों को
जिनके अब कोई भी अर्थ
बाकी नहीं रह गए हैं
मेरे जीवन में
धो डालूँ उन सारी यादों को
जो जीवन की चूनर पर
पहले कभी सतरंगी फूलों सी
जगमगाया करती थीं
लेकिन अब बदनुमाँ दाग़ सी
उस चूनर पर सारे में चिपकी
आँखों में चुभती हैं !
शायद इसलिए भी कि
कोई रिश्ता तभी तक
फलता फूलता और महकता है
जब तक ताज़ी हवा के
आने जाने के लिए
रास्ता बना रहता है !
अपने अंतर्मन के कक्ष से
इन अवांछित रिश्तों की
निर्जीव यादों को हटा कर
मैं मुक्ति का लोबान
जला कर चिर शान्ति के लिए
यज्ञ करना चाहती हूँ !
मैं आज नये सिरे से
दीवाली का पर्व
मनाना चाहती हूँ !


रविवार, 15 अक्तूबर 2017

८६ वीं जयंती पर डॉ॰ कलाम साहब को ब्लॉग बुलेटिन का सलाम

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |
"मेरा संदेश, विशेष रूप से युवाओं के लिए, है कि वे अलग सोचने का साहस रखें, आविष्कार करने का साहस रखें, अनदेखे रास्तों पर चलने का साहस रखें, असंभव को खोजने और समस्याओं पर जीत हासिल करके सफल होने का साहस रखें। ये महान गुण हैं जिनके लिए उन्हें ज़रूर काम करना चाहिए। युवाओं के लिए ये मेरा सन्देश है।"
- डॉ॰ ए॰ पी॰ जे॰ अब्दुल कलाम
 ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से आज पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम साहब को उनकी ८६ वीं जयंती पर हम सब शत शत नमन करते हैं|
सादर आपका
 
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झटपट खजूर - नट बम.

शिकारी माता देवी मन्दिर यात्रा

अपना घर

बारात में चलाये जाने वाले पटाखे क्यूँ नहीं नुकसान पहुँचाते?

अधिरचना की प्रणाली में राज्य - १

दर-ब-दर

कंचनगढ़ की गुफा

लाहुल स्पीती यात्रा वृत्तांत -- 6 (रोहतांग पास, मनाली )

रघुपति भगति सजीवनि मूरी

बादलों की ओट धरकर सूर्य ने ले ली जल-समाधि...

पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम साहब की ८६ वीं जयंती

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

दुर्गा भाभी की १८ वीं पुण्यतिथि

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों..। इन पंक्तियों को याद कर देश की आजादी के परवाने याद आते हैं। भले ही आजादी को छह दशक से अधिक हो चुके हैं, किंतु इस आजादी के पीछे अनेकों कुर्बानियां बलिदान और त्याग की कहानियां छिपी हैं, उन्हीं में से एक दुर्गा भाभी भी हैं। जिनका योगदान भारत की आजादी में क्रांतिकारियों के साथ शान से याद किया जाता है। 
 
सरदार भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु व चंद्रशेखर आजाद के साथ जंगे आजादी में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाली भाभी को सभी लोग दुर्गा भाभी के नाम से जानते हैं। 
 
दुर्गा भाभी का जन्म सात अक्टूबर 1902 को शहजादपुर ग्राम में पंडित बांके बिहारी के यहां हुआ। इनके पिता इलाहाबाद कलेक्ट्रेट में नाजिर थे और इनके बाबा महेश प्रसाद भट्ट जालौन जिला में थानेदार के पद पर तैनात थे। इनके दादा पं. शिवशंकर शहजादपुर में जमींदार थे जिन्होंने बचपन से ही दुर्गा भाभी के सभी बातों को पूर्ण करते थे।
दस वर्ष की अल्प आयु में ही इनका विवाह लाहौर के भगवती चरण बोहरा के साथ हो गया। इनके ससुर शिवचरण जी रेलवे में ऊंचे पद पर तैनात थे। अंग्रेज सरकार ने उन्हें राय साहब का खिताब दिया था। भगवती चरण बोहरा राय साहब का पुत्र होने के बावजूद अंग्रेजों की दासता से देश को मुक्त कराना चाहते थे। वे क्रांतिकारी संगठन के प्रचार सचिव थे। वर्ष 1920 में पिता जी की मृत्यु के पश्चात भगवती चरण वोहरा खुलकर क्रांति में आ गए और उनकी पत्‍‌नी दुर्गा भाभी ने भी पूर्ण रूप से सहयोग किया। सन् 1923 में भगवती चरण वोहरा ने नेशनल कालेज बीए की परीक्षा उत्तीर्ण की और दुर्गा भाभी ने प्रभाकर की डिग्री हासिल की। दुर्गा भाभी का मायका व ससुराल दोनों पक्ष संपन्न था। ससुर शिवचरण जी ने दुर्गा भाभी को 40 हजार व पिता बांके बिहारी ने पांच हजार रुपये संकट के दिनों में काम आने के लिए दिए थे लेकिन इस दंपती ने इन पैसों का उपयोग क्रांतिकारियों के साथ मिलकर देश को आजाद कराने में उपयोग किया। मार्च 1926 में भगवती चरण वोहरा व भगत सिंह ने संयुक्त रूप से नौजवान भारत सभा का प्रारूप तैयार किया और रामचंद्र कपूर के साथ मिलकर इसकी स्थापना की। सैकड़ों नौजवानों ने देश को आजाद कराने के लिए अपने प्राणों का बलिदान वेदी पर चढ़ाने की शपथ ली। भगत सिंह व भगवती चरण वोहरा सहित सदस्यों ने अपने रक्त से प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर किए। 28 मई 1930 को रावी नदी के तट पर साथियों के साथ बम बनाने के बाद परीक्षण करते समय वोहरा जी शहीद हो गए। उनके शहीद होने के बावजूद दुर्गा भाभी साथी क्रांतिकारियों के साथ सक्रिय रहीं।
 
9 अक्टूबर 1930 को दुर्गा भाभी ने गवर्नर हैली पर गोली चला दी थी जिसमें गवर्नर हैली तो बच गया लेकिन सैनिक अधिकारी टेलर घायल हो गया। मुंबई के पुलिस कमिश्नर को भी दुर्गा भाभी ने गोली मारी थी जिसके परिणाम स्वरूप अंग्रेज पुलिस इनके पीछे पड़ गई। मुंबई के एक फ्लैट से दुर्गा भाभी व साथी यशपाल को गिरफ्तार कर लिया गया। दुर्गा भाभी का काम साथी क्रांतिकारियों के लिए राजस्थान से पिस्तौल लाना व ले जाना था। चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों से लड़ते वक्त जिस पिस्तौल से खुद को गोली मारी थी उसे दुर्गा भाभी ने ही लाकर उनको दी थी। उस समय भी दुर्गा भाभी उनके साथ ही थीं। उन्होंने पिस्तौल चलाने की ट्रेनिंग लाहौर व कानपुर में ली थी।
 
भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त जब केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने जाने लगे तो दुर्गा भाभी व सुशीला मोहन ने अपनी बांहें काट कर अपने रक्त से दोनों लोगों को तिलक लगाकर विदा किया था। असेंबली में बम फेंकने के बाद इन लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया तथा फांसी दे दी गई।
 
साथी क्रांतिकारियों के शहीद हो जाने के बाद दुर्गा भाभी एकदम अकेली पड़ गई। वह अपने पांच वर्षीय पुत्र शचींद्र को शिक्षा दिलाने की व्यवस्था करने के उद्देश्य से वह साहस कर दिल्ली चली गई। जहां पर पुलिस उन्हें बराबर परेशान करती रहीं। दुर्गा भाभी उसके बाद दिल्ली से लाहौर चली गई, जहां पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और तीन वर्ष तक नजरबंद रखा। फरारी, गिरफ्तारी व रिहाई का यह सिलसिला 1931 से 1935 तक चलता रहा। अंत में लाहौर से जिलाबदर किए जाने के बाद 1935 में गाजियाबाद में प्यारेलाल कन्या विद्यालय में अध्यापिका की नौकरी करने लगी और कुछ समय बाद पुन: दिल्ली चली गई और कांग्रेस में काम करने लगीं। कांग्रेस का जीवन रास न आने के कारण उन्होंने 1937 में छोड़ दिया। 1939 में इन्होंने मद्रास जाकर मारिया मांटेसरी से मांटेसरी पद्धति का प्रशिक्षण लिया तथा 1940 में लखनऊ में कैंट रोड के (नजीराबाद) एक निजी मकान में सिर्फ पांच बच्चों के साथ मांटेसरी विद्यालय खोला। आज भी यह विद्यालय लखनऊ में मांटेसरी इंटर कालेज के नाम से जाना जाता है। 14 अक्टूबर 1999 को गाजियाबाद में उन्होंने सबसे नाता तोड़ते हुए इस दुनिया से अलविदा कर लिया।
 
मृत्यु के बाद भी नहीं मिल सका राजकीय सम्मान
 
देश का दुर्भाग्य है कि उनकी मृत्यु के समय चंद लोग ही एकत्रित हो पाए, जिसमें सिर्फ चंद समाज सेवी और साहित्यकार और पत्रकार ही थे। अंतिम यात्रा में शामिल लोगों के प्रयास के बावजूद भी उनको राष्ट्रीय सम्मान नहीं मिल पाया।
अंतिम छह वर्षो में उनसे बार-बार चर्चा करने वाले लोगों के अनुसार वह आज की राजनीति से दूर रहना चाहती थीं। और देश की वर्तमान स्थिति पर चिंतन कर दुखी भी होती थीं। उनका मानना था कि देश की आजादी में जिन लोगों ने जो सपने देखे थे, वह शायद अभी धुंधले हैं। 
 
 
आज दुर्गा भाभी की १८ वीं पुण्यतिथि पर उनको शत शत नमन !!
 
इंकलाब ज़िंदाबाद !!!
सादर आपका  
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एक ग़ज़ल : मिलेगा जब वो हम से

सहेजना रिश्तों का....

२८१. दहशत में जीभ

श्रीधर दूबे की कविताएँ

खूँटा

मिट्टी के घरोंदे है, लहरों को भी आना है......मनोज सिंह”मन”

अक्टूबर की हथेली पर...

न जयप्रकाश आंदोलन कुछ कर पाया न ही अन्ना आंदोलन

दोहे

मिस्र के चतुरंगी मंदिर से लेकर बाहुबली के साम्राज्य तक : दुर्गापुर के शानदार पूजा पंडाल

दूर तलक जा सकती है बाल किलकारी की आवाज़

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अब आज्ञा दीजिये ... 

जय हिन्द !!!

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

याद दिलाने का मेरा फ़र्ज़ बनता है ...

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आप सब से अनुरोध है कि घर में 500/2000 के जितने भी नोट हों तो धीरे-धीरे निकालते रहिएगा ...
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वो क्या है न कि 8 नवंबर नज़दीक आ रहा है ... और याद दिलाने का मेरा फ़र्ज़ बनता है।


सादर आपका
शिवम् मिश्रा
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तुम मेरा न्यू यॉर्क हो

अयोध्याजी में राजा दशरथजी के यहाँ पुत्र रूप में प्रगट होने से पहले रामजी और कहाँ प्रगट हुए थे

जिंदगी को खिलखिलाना आ गया

शाश्वत कटु सत्य ... !!!

पुदीने के परांठे

मॉस वॉल और ''स्मॉग फ्री टॉवर''की दरकार

लेह से नुब्रा , विश्व के सबसे ऊंचे खरदुंगला पास से होकर , एक रोमांचक सफ़र ---

पहले जुड़िये फिर बात कहिये

प्यार की अजीब होती है दास्ताँ

कार्टून:- हाय कार चुर गई रे

लफ्ज़ जो ज़िंदा तस्वीर हैं

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अब आज्ञा दीजिये ... 

जय हिन्द !!! 

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

सादगी और त्याग की प्रतिमूर्ति राजमाता : ब्लॉग बुलेटिन

राजमाता के नाम से जन-जन के दिलों में राज करने वाली विजयाराजे सिंधिया का आज, 12 अक्टूबर को जन्मदिन है. उनका जन्म 1919 को सागर, मध्य प्रदेश के राणा परिवार में हुआ था. उनके पिता श्री महेन्द्रसिंह ठाकुर जनपद जालौन के डिप्टी कलैक्टर थे. उनका विवाहपूर्व लेखा दिव्येश्वरी था. 21 फ़रवरी 1941 को उनका विवाह ग्वालियर के महाराजा जीवाजीराव सिंधिया से हुआ. माधवराव सिंधिया उनके पुत्र तथा वसुंधरा राजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया उनकी पुत्रियाँ हैं.


अपने पति जीवाजीराव सिंधिया की मृत्यु के बाद सन 1957 में वे कांग्रेस के टिकट पर पहली बार सांसद निर्वाचित हुईं. बाद में अपने सैद्धांतिक मूल्यों के कारण राजमाता कांग्रेस छोड़कर जनसंघ में शामिल हो गईं. राजपरिवार से होने के बाद भी वे अपनी ईमानदारी, सादगी और प्रतिबद्धता के कारण पार्टी में सर्वप्रिय बन गईं. वे पाँच बार 1957, 1962, 1971, 1989, 1991 में लोकसभा के लिए तथा 1967 में मध्य प्रदेश विधान सभा के लिए निर्वाचित हुईं. वर्ष 1978 में उनको राज्यसभा के लिए निर्वाचित किया गया. राजमाता सदैव त्याग एवं समर्पण की प्रतिमूर्ति रहीं. उन्होंने राजसी ठाठ-वाट का मोह त्यागकर जनसेवा को अपनाया. सत्ता के शीर्ष पर पहुँचने के बाद भी उन्होंने जनसेवा से कभी नाता नहीं तोडा. अपनी सादगी और कार्यशैली के चलते जन-जन के ह्रदय में बसी राजमाता 25 जनवरी 2001 को सबको पीछे छोड़कर अनंत यात्रा पर निकल गईं.

आज उनके जन्मदिवस पर ब्लॉग बुलेटिन परिवार की तरफ से सादर श्रद्धांजलि

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बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

लोकनायक जयप्रकाश नारायण और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को मेरा सादर नमस्कार।
Jayaprakash-Narayan.jpg

जयप्रकाश नारायण (अंग्रेज़ी: Jayaprakash Narayan, जन्म: 11 अक्तूबर, 1902; मृत्यु: 8 अक्तूबर, 1979) राजनीतिज्ञ और सिद्धांतवादी नेता थे। मातृभूमि के वरदपुत्र जयप्रकाश नारायण ने हमारे देश की सराहनीय सेवा की है। लोकनायक जयप्रकाश नारायण त्याग एवं बलिदान की प्रतिमूर्ति थे। जयप्रकाश विचार के पक्के और बुद्धि के सुलझे हुए व्यक्ति थे। जयप्रकाश जी देश के सच्चे सपूत थे। जयप्रकाश ने देश को अन्धकार से प्रकाश की ओर लाने का सच्चा प्रयास किया, जिसमें वह पूरी तरह से सफल रहे हैं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भारतीय जनमानस पर अपना अमिट छाप छोड़ी है। जयप्रकाश जी का समाजवाद का नारा आज भी गूँज रहा है। समाजवाद का सम्बन्ध न केवल उनके राजनीतिक जीवन से था, अपितु यह उनके सम्पूर्ण जीवन में समाया हुआ था।



आज भारत के इस महान सपूत को हम सब उनके 115वें जन्मदिवस पर शत शत नमन करते हैं। सादर।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ...  अभिनन्दन।।

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

अप्रिय सत्य छुपाने से कोई हल नहीं निकलता !




अपने रिश्ते यानि खून के रिश्ते हों
या पानी से बनाए गए रिश्ते हों 
पूरी ज़िंदगी का एक टुकड़ा 
कहानी नहीं होता
कोई एक दिन की घटना 
परिणाम नहीं होती
!!!!
अच्छी,प्यारी,मीठी बातों को साझा न किया जाए
अपना पक्ष हटा दिया जाए
और ... जीतने के लिए
कुछ भी सुना दिया जाए 
तो ... 
अप्रिय सत्य की मौत कितनी बार होती है
कितनी बार वह एक बूंद पानी के लिए
संघर्ष करता है 
और 
प्रिय झूठ से बने वाणों की शय्या से
मुक्ति चाहता है
....
क्या यह ज़रूरी नहीं
कि जिसने उस अप्रिय सत्य को जन्म दिया
उसका हिसाब 
सिर्फ वक़्त नहीं 
तुम भी करो
???
 कैकेई को उजागर करना
क्या कोई मीठा सत्य था ?
भरत के कदमों ने 
उस अप्रिय सत्य को धिक्कारा
सबके सामने मौन भाव से 
उनसे दूर हुए
माँ थी कैकेई
तब भी पक्षपात करते हुए
मनगढ़ंत प्रिय सत्य की रचना नहीं की !
यूँ प्रिय सत्य सर्वविदित था
कि माँ कैकेई राम से अधिक स्नेह रखती थीं
..... 
एक विशेष घड़ी में 
जो हुआ
जिस ढंग से हुआ 
वह सब बहुत ही भयानक था
जिसके केंद्र में उनका हर स्नेह 
जलकर राख हो गया 
अपनों ने
पूरी दुनिया ने धिक्कारा
 तभी
कैकेई ने स्वीकारा 

.... सारांश इतना है
कि जिस अप्रिय सत्य से 
मन खण्डहर होने लगे
उसे धूल की तरह झाड़ो
समेटो
कचरे में फेंक दो
छुपाने से कोई हल नहीं निकलता
!!!


मेरा मन": मरने से पहले - blogger

सोमवार, 9 अक्तूबर 2017

विश्व डाक दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को मेरा सादर नमस्कार।
विश्व डाक दिवस प्रतीक चिह्न
विश्व डाक दिवस (अंग्रेज़ी: World Post Day) प्रत्येक वर्ष 9 अक्टूबर को मनाया जाता है। डाक सेवाओं की उपयोगिता और इसकी संभावनाओं को देखते हुए ही हर वर्ष 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन की ओर से मनाया जाता है। विश्व डाक दिवस का उद्देश्य ग्राहकों के बीच डाक विभाग के उत्पाद के बारे में जानकारी देना, उन्हें जागरूक करना और डाकघरों के बीच सामंजस्य स्थापित करना है।

सभी देशों के बीच पत्रों का आवागमन सहज रूप से हो सके, इसे ध्यान में रखते हुए 9 अक्टूबर, 1874 को जनरल पोस्टल यूनियन के गठन हेतु बर्न, स्विटजरलैंड में 22 देशों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किया था। इसी वजह से बाद में 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस के रूप में मनाना शुरू किया गया। यह संधि 1 जुलाई, 1875 को अस्तित्व में आई। 1 अप्रैल, 1879 को जनरल पोस्टल यूनियन का नाम बदलकर यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन (Universal Postal Union, सार्वभौमिक डाक संघ या यूपीयू) कर दिया गया। यूपीयू की स्थापना वैश्विक संचार क्रांति की शुरुआत थी। डाकघर ने दुनिया के एक जगह के लोगों को दूसरे जगह रहने वाले लोगों से संप्रेषण का माध्यम उपलब्ध कराया। वर्ष 1969 में जापान के टोकियो में 9 अक्टूबर को विश्व डाकघर दिवस घोषित किया गया। तब दुनिया भर में डाक सेवाओं के योगदान को रेखांकित करने के लिए हर वर्ष इस दिन विश्व डाकघर दिवस मनाया जाता है। यह दिन अंतर्राष्ट्रीय पत्रों के पूरे विश्व में मुक्त प्रवाह के लिए मार्ग प्रशस्त करने का एक प्रयास है।




~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

भारतीय वायुसेना दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को मेरा सादर नमस्कार।
भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान
भारतीय वायु सेना (अंग्रेज़ी: Indian Air Force) की स्‍थापना 8 अक्टूबर, 1932 को की गई और 1 अप्रैल 1954 को एयर मार्शल सुब्रोतो मुखर्जी, भारतीय नौसेना के एक संस्‍थापक सदस्‍य ने प्रथम भारतीय वायु सेना प्रमुख का कार्यभार संभाला। समय गुज़रने के साथ भारतीय वायु सेना ने अपने हवाई जहाज़ों और उपकरणों में अत्‍यधिक उन्‍नयन किए हैं और इस प्रक्रिया के भाग के रूप में इसमें 20 नए प्रकार के हवाई जहाज़ शामिल किए हैं। 20वीं शताब्‍दी के अंतिम दशक में भारतीय वायु सेना में महिलाओं को शामिल करने की पहल के लिए संरचना में असाधारण बदलाव किए गए, जिन्‍हें अल्‍प सेवा कालीन कमीशन हेतु लिया गया यह ऐसा समय था जब वायु सेना ने अब तक के कुछ अधिक जोख़िम पूर्ण कार्य हाथ में लिए हुए थे।



~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ...  अभिनन्दन।। 

शनिवार, 7 अक्तूबर 2017

जाने भी दो यारो ...

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

लेखक और निर्देशक कुंदन शाह का शनिवार की सुबह मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया । सिर्फ 12 दिनों बाद उनका 70वां जन्मदिन होना था। 19 अक्टूबर 1947 को जन्में कुंदन शाह की आखिरी फिल्म 'पी से पीएम तक' थी जो 2014 में रिलीज़ हुई थी। कुंदन शाह ने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट अॉफ इंडिया, पुणे से पढ़ाई की थी। उन्होंने हिंदी सिनेमा में व्यंग्यात्मक कॉमेडी की शुरुआत की थी। बतौर डायरेक्टर जाने भी दो यारों उनकी पहली फिल्म थी जो कि आज भी हिंदी सिनेमा की कल्ट फिल्मों की लिस्ट में सबसे ऊपर है। फिल्में जाने भी दो यारों (1983) के अलावा उन्होंने कभी हां कभी ना (1993) का निर्देशन किया और टीवी शो नुक्कड़ (1986) और वागले की दुनिया (1988) का बनाया ।

सन 2000 में आई 'क्या कहना 'का कुंदन शाह ने ही निर्देशन किया था। इस फिल्म में मुख्य अदाकार प्रीति जिंटा थीं। यह फिल्म उस समय की लीग से हटकर फिल्म थी। चूंकि इसमें एक सिंगल टीनएज मां को दिखाया गया था। आपको बता दें कि, इस साल 19 मई को फिल्म क्या कहना को 17 साल पूरे हो गए हैं। यह फिल्म सोशल कंट्रोवर्शियल इशू सिंगल पैरेंटहुड पर बेस्ड थी। इस फिल्म ने प्रीति ने बॉलीवुड में एंट्री की थी। इसके बाद 2002 में उन्होंने फिल्म दिल है तुम्हारा का निर्देशन किया।

बिगड़े सिस्टम पर चोट करने का उनका अपना ही तरीका था। समाज के परंपरागत स्थापित विचारों को अपने नजरिये से बदलने का उनमें हुनर था। और इसी कारण कुंदन शाह ने एंटरटेनमेंट की दुनिया में नाम कमाया। फिल्में हो या टीवी सीरियल कुंदन शाह के काम पर हमेशा उनकी छाप रही। वो अब हमारे बीच नहीं हैं।

उनका निधन फिल्म और कला जगत के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है ... ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से हम सब उनको शत शत नमन करते हैं |

सादर आपका 

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मेरे रश्क-ए-क़मर तुने पहली नज़र - फ़ना बुलंद शहरी

560. महाशाप...

यादों की जुंबिश

पारिजात के फूल

मौत भी ज़िन्दगी (ग़ज़ल) // अमन

सिक्के मुस्कराहटों के !!!!

सड़क पर हादसे आपका इंतज़ार करते है .....

मैंने इक किताब लिखी है... सज्जाद अली

वीर सिंह ने दोस्ती निभाने के लिए किया अबुल फज़ल का क़त्ल (ओरछा गाथा -5 )

गांधी चबूतरा

क्रांतिकारियों की शक्ति स्रोत - दुर्गा भाभी की ११५ वीं जयंती

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

सूचना जनहित मे जारी ...

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |


"मैंने भी तुम्हारे लिए व्रत रखा है।"
पत्नी को ऐसा बता कर ऑफिस में समोसे ठूसने वाले पतियों...
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इस बार करवाचौथ रविवार को है।



सूचना जनहित मे जारी ...

सादर आपका
शिवम् मिश्रा

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भारतीय खगोल वैज्ञानिक मेघनाद साहा (6 अक्टूबर: जन्मदिवस पर विशेष)

प्रेम पथ

आपको लोग नाम से जानते हैं कि घर के नंबर से ?

हो सके तो आना

प्रभु पद्मनाभस्वामी के द्वार पहुँचा...

शरणार्थियों को झेलने की स्थिति में नहीं है भारत

फिर तेरी कहानी याद आई

मेहंंदी डिज़ाइन- भाग 5

ऊँचे साहित्यकार

शरद का चांद

डाकिया डाकखाना छोड़ कर चिट्ठियाँ खुले आम खुले में खोल कर दिखा रहा है

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

बेटा बेटी को जीने दो


बंद करो बोलना
"बेटी बचाओ"
दिलोदिमाग की नसें 
ऐंठने लगती हैं  .... 
पहले तो यह नारा नहीं था 
.... 
यह क्या तमाशा है !!!
इतनी जलन उसके आगे आने से ?
हमने तो कहा था 
कहते हैं 
बुद्धम शरणम गच्छामि 
फिर यह कहने में कौन सी कुंठा ?
यशोधरा शरणम गच्छामि !

बेटा बेटी को जीने दो 
सड़े गले लोगों का संहार करो 
वह बेटा हो या बेटी हो 
उसका बहिष्कार करो


सुनो ऐ नरम दिल लड़कियों
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रुई के फाहों सी नरम दिल लड़कियों
जरा सा सख्त भी हो जाओ --वरना
खतम हो जाएगा तुम्हारा वज़ूद 
इसी तरह दोयम दर्जे का जीवन जीती रहोगी
याद करो कभी अपने ही घर में सुना होगा न
किसी को बार बार यह कहते
अपनी इज्जत करना सीखो --
जो अपनी इज्जत नहीं करता
दुनिया उसकी परवाह नहीं करती
सुनो ऐ नरम दिल बेवकूफ लड़कियों
कितनी भोली हो तुम नहीं समझी न ?
यह शब्द यह नसीहत यह सीख कुछ भी
तुम्हारे लिए नहीं थी अरे यह सब
तुम्हारे भाइयों के लिए कहा था
भले ही कहने वाली तुम्हारी माँ ही होगी
तुम्हारी नियति तो तय ही कर दी गई थी
सदियों पहले -- वो ही दोयम दर्जे वाली
सब जानते थे आज भी उन्हें पता है
रुई हल्की सी नमी से भीग जाती है
भारी बोझिल हो जाती है ---आंसुओं से
पर वो यह कैसे भूल गए ---कभी कभी
हल्की सी चिंगारी से रुई में आग भड़क जाती है
और भस्म हो जाता है पूरा का पूरा साम्राज्य
उसी रुई से तो बना है तुम्हारा नरम दिल
पर सुनो क्यों नहीं समझती तुम
जब तक तुम खुद नहीं समझोगी
कैसे समझाओगी सबको ----
अब तो समझो ---मत बहो अंधी नदी की धार में
जिसके कगार ढह रहे हों न जाने किस खाड़ी में
ले जाकर पटक देगी तुम्हे और फिर होगा वही
अथाह सागर में विलीन हो जाओगी --
तुम्हे खुद बनाना है अपना बाँध एकजुट हो कर
तभी तो तुम्हारी उर्जा से दिपदिपायेगा --
जगमगायेगा पूरा समाज --और
फिर ऐ रुई के फाहों सी नरम दिल लड़कियों
बस तनिक सा कठोर हो जाओ ---
अपना सम्मान करना सीख लो
--------दिव्या शुक्ला ---
पेंटिग गूगल से

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Shailja pathak 
कंगन लुटाने वाले सोहर भाई के लिए गाये गए
जब भाई घर की छत से कागज के हवाई जहाज बनाता
हम आंगन के परात भर पानी में कागज की नांव बहाते
जो हर कोने से टकरा कर भी सधी हुई सी चलती 
जब भाई नई मिली सायकिल पर कैची मारता हुआ रास्ते पर आगे बढ़ जाता हम मुस्कराते
अक्सर खड़ी हुई सायकिल के पीछे बैठ हम गीतों के देश की सैर करते फिर उतर जाते
वो पतंग उडाता हम मंझा सुलझाते
फटी पतंग को दुरुस्त करते
भाई फिर उड़ जाता
















भाई पिता का जूता पहन कमाने जाता
हम अम्मा की साड़ी में घर सँभालते
हमारे पास रसोई वाला खेल उसके पास डॉक्टर सेट
हमारी कपड़े की गुडिया उसकी बैटरी वाली मोटर
कमोबेश जिन्दगी का सबक सीखती सिखाती उम्र
एक लडकी थी बुआ
जिनसे परात भर पानी और सायकिल वाली यात्रा भी छीन ली गई
अब बस बड़ी सी साड़ी लपेट बुआ मंझे सुलझाती हैं......


जब
खो जाते हैं शब्द
तब भी
चलता ही है जीवन
जो कभी
टूट भी जाए
संवादों का पुल
तब भी
जुड़े ही रहते हैं
जो जुड़े हुए थे मन
कि
यही जुड़ाव
बनाये रखता है
सांसों का तारतम्य
और
उठते-गिरते
चलते रहते हैं हम
चलता रहता है जीवन !

सुनो बेटियों,
मत बढ़ाना अपने पाँव किसी पूजन-वूजन के लिए
इनकार कर देना बनने से देवी
और किसी को देवता बनाने से भी 
कि इन्सान होने से ज्यादा जरूरी कुछ भी नहीं
माथे पर रोली लगाने को बढ़ते हाथों से कहना
हमें अपने सपनों को जीने की आज़ादी चाहिये
यह पूजा अर्चन नहीं...

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