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शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

प्रतिभाओं की कमी नहीं - एक अवलोकन 2015 (४)




समय से बड़ा कोई स्लेट नहीं - लिखो मिटाओ, फिर भी रह जाते हैं जीए गए ख्याल, कभी न कभी 
कोई न कोई पढता है, मन की स्लेट पर उतार लेता है 

2015 की स्लेट पर लिखा किशोर चौधरी के ख्याल पढ़िए - kishorechoudhary.blogspot.in



गुलजान, देखो परिंदे!


हवेली के बंद दरवाज़े से चर्र की आवाज़ आई। बरसों से बंदी होने से दरवाज़ों के कब्ज़े ये भूल गए थे कि उनका काम बंदी होकर बैठे रहना नहीं वरन् खुलना और बंद होना आसान करना है। दरवाज़े से पहले हल्की रोशनी की पतली फाँक झाँकी और उसके बाद एक कमसिन चेहरा दिखाई दिया। दो मासूम आँखें। बायाँ कंधा आहिस्ता से चौखट और दरवाज़े के पल्ले को छुए बिना तिरछा होकर बाहर की ओर आ गया। इसी बाहर आने के दौरान आँखों ने पहले क़रीब और फिर दूर तक का फेरा दिया।

दोपहर के दो बजना चाहते थे।

ऊपर के कमरे में लगी पेंडुलम वाली घड़ी नियमित अंतराल से घंटे बजाती थी। जब वह घड़ी आई थी तो अचानक बजने वाला घंटा सबका ध्यान खींचता था। कुछ महीनों बाद घड़ी, समय और उस घर में रहने वाले लोग घुल-मिल गए। 

गुलजान ने क़दमों को फूलों का पाठ पढ़ाया। बदन को बिल्ली का लचीलापन दिया। हौसले को चील के पंखों पर रखा। उसकी हवेली के पास एक टेकरी थी। टेकरी पर एक टूटी हुई अकेली मीनार थी। गुलजान ने हवेली और टेकरी पर खड़ी मीनार के बीच की ज़मीन को काटकर दूरी को छोटा कर लिया। ज़मीन का वह लंबा-सा टुकड़ा प्रेम की छोटी-सी कतरन में समा गया। 

नहीं खुलना, ओ मालिक नहीं खुलना। सबकी दोपहर की नींदें सलामत रखना।

टेकरी पर हवा ने अपना दुपट्टा दूर तक फैला रखा था। हवा आहिस्ता चलती हुई अपने दुपट्टे में कुछ नयी सलवटें भर रही थी। हवा जब एक नयी सलवट बनाती तो एक पुरानी सलवट मिट जाती। हवा के दुपट्टे के भीतर खड़ी हुई गुलजान आँख मूँदकर हवा की कोई किनारी पकड़ती। उसे तह करती। हवा रुकने लगती।

गुलजान की आँखों ने फिर से खोज की। रास्ते को दूर तक देखा। हल्की ढलान थी, मैदान में जाकर खो जाती थी। कुछ पत्थरों के बीच से दिखती हुई ज़मीन ही रास्ता थी।

उधर कुछ न था। नज़र गिरती तो लुढ़कती हुई कहीं धूसर सलेटी रंग के बीच जाकर खो जाती। जैसे कंचे खो जाते थे। वहीं आस-पास ही पड़े होते मगर रंगों के छलावे में ख़ुद को ऐसे छिपा लेते कि दिखाई नहीं देते।

उसकी निगाहें इंतज़ार में इस तरह तेज़ी से से घूम रही थीं जैसे बचपन की कोई ताज़ा और छोटी याद।

जिसमें रेत किसी जलपरी की शक्ल ओढ़कर अपनी एक टाँग पर नाचती थी। धूप के बीच नाचता हुआ रेत का साया, आस-पास की हल्की चीज़ों को हवा में उठाए हुए, भारी चीज़ों के कान में फूँक मारता हुआ; उड़ा करो, तन से न सही, मन से उड़ा करो। 

ऐसे साये कभी अचानक आते थे, जैसे कोई रूह आसमान से उतरी हो। रूह ने किया हो रेत का स्नान। कई बार कुछ छोटे साये, जैसे नयी जन्मी हुई नन्ही रूहों की अठखेली। ऐसे छोटे वर्तुलों के बीच दफ़अतन गुलजान की साँस थम जाती थी। साइकिल पर सवार लड़का नीचे ढलान में गुज़र रहा होता। गुलजान ऊपर टेकरी पर सूनी पड़ी मीनार के भग्नावशेष की एक दीवार पर बैठी हुई सोचती, रूह बन जाये। चील के पंख ओढ़े और लड़के की साइकिल पर छाया कर दे। अपने पंखों की परछाईं से छाँव बुनकर साइकिल के साथ-साथ चले। लड़के को सोचते हुए, वह अपने हाथों को देखती। उसके हाथों के नाज़ुक भूरे रोयें खड़े हो रहे होते। जैसे ज़मीन से कच्ची कोंपलें फूट रही हों। वह फिर नीचे देखती तब तक साइकिल पर सवार नादान लड़का खो चुका होता। गुलजान के भूरे रोयें फिर से गुलाबी रंग के होकर उसके हाथों के भीतर दुबक जाते।

हवा ने जो दुपट्टा बनाया है, उसका रंग कैसा है?

उस लड़के का नाम दिबांग था। वह ढलान का पूरा चक्कर लगाकर ऊपर की ओर आता।

दिबांग थक जाता। उससे चढ़ाई नहीं चढ़ी जाती। वह आहिस्ता से आँख मूँदकर देखती। हाँ, वह आ रहा है। थका हुआ। झुका हुआ। कई बार रुककर उसी को देखता हुआ। वह एक ही तरफ से आता। उस तरफ जिधर गुलजान होती। धूप दिबांग में रंग भरती। पसीना उगाती। हवा धूप के उगाए इस नए रंग पर नाज़ुक अंगुली घुमाती। उसका पसीना सुखाती।

गुलजान साँस रोके बैठ जाती। जैसे आख़िरी घड़ी आई। जीना मुकम्मल हुआ। दिबांग उसके पास बैठा हुआ। उसके माथे पर किसी ने गुलाब जल छिड़का हो। अनेक बूँदें ललाट पर चमकती हुईं। बूँदें, दूसरी बूँदों से मिलकर भौहों के पास से गालों पर लुढ़कती हुई।

गुलजान दुनिया की सबसे छोटी मछली बन जाती। वह तुरंत एक नन्ही बूँद में समा जाती। वहाँ से वह फिसलती हुई बहती। भौहों के श्याम रंग को चूमती, गाल पर गुदगुदी करती। आखिर दिबांग अपना पसीना पोंछता। नन्ही मछली बनी हुई गुलजान उसकी हथेली में आ जाती। वह अपनी अँगुलियों से छिटक देता नन्ही बूँदें।

गुलजान घास पर से उठती और नन्ही मछली से फिर लड़की बन जाती। वह हँसने लगती। दिबांग देखता। किसलिए हँस रही है। वह फिर हँसती। उसे अच्छा लगता कि दिबांग को मालूम न चल सका कि वह थोड़ी देर पहले क्या थी।

वे धूप और हवा के हवाले रहते। सूख रहे दरख़्तों के तले छाँव नहीं होती।

गुलजान कहती- “आज तुम यहीं रहना मेरे पास, हिलना नहीं। आज मैं पता लगाऊँगी कि वह साइकिल सवार लड़का तुम ही हो या कोई और है। क्या घाटी में से होकर और भी कोई लड़का इधर आता है?”

दिबांग कहता- “और कोई नहीं आता। और किसी को तुम दिखती हो?”

“अच्छा, मैं नहीं दिखती मगर तुम ढलान के नीचे बड़े काले पत्थर की ओट से आकर आगे बूढ़े दरख़्त वाले मोड़ पर कहाँ खो जाते हो?”

“तुम्हारे पास आने को खो जाता हूँ।”

मीनार के भग्नावशेष सूने होते। कई दिनों से परिंदे गायब। उन दोनों ने जाने कितने दिनों से परिंदों को देखा ही नहीं।

दिबांग के आते ही हवा चुप हो जाती। गुलजान हवा के रंग पढ़ना और किनारी पकड़कर तह करना भूल जाती। हवा उन दोनों से रूठकर टूटी मीनार के आँगन में दुबक जाती। हवा चुप बैठी हुई, हल्की छाँव में ज़मीन पर लिखती। एक मिलता है तो दूजा खो जाता है।

साँवरे क्या मैं करूँ इनका
जो ये बाजे में तार हज़ार
नाम एक तेरा याद मुझको

गुलजान गा रही होती। दिबांग खोया हुआ सुन रहा होता। मन के कागज़ पर गीले रंगों से तस्वीर बनने लगती। हवा इस गीत से मुग्ध हो जाती। वह रूठना छोड़कर मंदिर के बाहर बैठे हुए दिबांग और गुलजान तक आती। वह देखती कि लड़के के मन पर रंगों ने आकार लिया है। हवा उन रंगों को आहिस्ता से पंखा झलती। सूखें रंग जल्दी से। जल्दी-जल्दी ये लड़का रंगों से भर जाए। रंग इसमें अटखेलियाँ करें। रंग इससे छलक-छलक जाएँ। रंग उड़ें मेरे साथ। मैं चूनर बन जाऊँ गुलजान की। इन दोनों को ढँक लूँ।

हवा एक गहरी साँस भरती। ओ लड़कियो, तुम जब भी पसंद करती हो, कैसे इतना पसंद करती हो!

हवा इस ठहरे दृश्य को तोड़ देना चाहती। वह गा रही लड़की की कमर से कुर्ते को ज़रा-सा उड़ाती और घास बनकर गुदगुदी करती। गुलजान की आवाज़ की गिरह में एक हँसी का छींटा पड़ता। दिबांग मुस्कुरा उठता।

वह गुलजान की अंगुलियाँ अपनी हथेली में रखता। भूरी चिकनी हथेली में कुछ पंखुडियाँ गुलाब की। लज्जा से भीगी हुई। लरज़ से भरी हुई। इस कंपन में गाना कुछ टुकड़ों में बँटकर हवा में खो जाता। हवा उस गाने को बुगची में रखकर स्थिर हो जाती। लड़के के कंधे के पास कोई साया आता। उस साये की गंध, हवा के बिना फैलने लगती। लड़का आँखें मूँद लेता।

एक गहरी तपिश गर्दन के पास उतरती। पाँवों की पिंडलियों में कसमसाहट जागने लगती। भीगे होंठों में दबे हुए होंठ। तड़प और तड़प। बाँहों की कसमसाहट में बेक़ाबू साँस के बीच अचानक वे दोनों एक-दूजे के चेहरे को देखते। विस्मय से भरी हुई आँखें।

वे दोनों एक-दूजे के चेहरे को थामे हुए फिर से आँखें बंद कर लेते।

दो बुत बियाबान में। टूटी मीनार के अवशेषों की छाँव तले। टेकरी के ऊपर। हवेली से दूर। आग, पानी, मिट्टी, कुछ भी नहीं।

दिबांग से बिछड़ने के बाद लड़की घर आकर छत पर टहलती। गली में कोई पदचाप सुनाई पड़ती। मोहब्बत, मोहब्बत, मोहब्बत। एक अनछुई नई पाकीजा गंध। किताबों से झाँकते हुए अक्षरों से। अतीत की स्याही से। कपड़ों में भरे हुए बियाबान से। टूटी दीवार के पास पड़े बड़े पत्थर से। बदन की छुअन, सिहरन, डर,और साँसों के आलोड़न से।

खिड़की का पल्ला चुप बैठा हुआ। मन की असंख्य खिड़कियाँ प्रतीक्षा से भरी हुईं। दिबांग, दिबांग, ओ दिबांग। आओ, इन खिड़कियों से नहीं; सचमुच की खिड़की से आओ। इस पल्ले के झूले पर सवार होकर आओ। देखो, मन एक समंदर हुआ। भारीपन बढ़ता जा रहा है। ये ठहर एक दबिश है। इस दबिश में साँस गायब हुई जा रही है। इसे तोड़ डालो दिबांग।

हर वक़्त, दिल बेताब, धड़कनें बेक़ाबू।

तुम कम हो। हर जगह कम हो। हर मिलन में कम हो। तुम हो ही नहीं, इतने कम हो। 

चैन के दरख़्तों की शाखों से उड़े हुए सुकून के परिंदों का कोई निशाँ नहीं। दूर आसमान में एक हूक फैली हुई। कहीं किसी ख़ालीपन में गुम होती हुई। कहीं नहीं टकराती। ख़ाली आसमान और बे-आवाज़ हूक।

रात गुज़र जाती। सुबह के बाद ऊपर के कमरे की घड़ी का घंटा बजता। ठीक वही घंटा जिसका लड़की को इंतज़ार होता। लड़की उसी टेकरी की तरफ चल देती।

टेकरी पर पहुँचने के बाद कुछ ही देर में दिबांग उसे आता हुआ दिखाई देता। वैसे ही हाँफता मगर मुस्कुराता हुआ। दिबांग उसके पास आकर बैठता। हवा का करिश्मा शुरू होने से पहले गुलजान पूछती- “कल रात तुमने क्या किया?”

“मैंने तुमको याद किया। तुमने क्या किया।”
“मैं, कुछ नहीं किया बस सो गई।” ऐसा कहकर गुलजान उससे पूछती- “एक बात सुनोगे।?”
वह कहता- “हाँ सुनूँगा।”
“मगर उसे सुनने के बाद तुमको एक सवाल का जवाब देना होगा। ये जवाब मेरे लिए ज़रूरी होगा।

वह हामी भरता।

“अगर जवाब नहीं दिया तो तुमको पाप लगेगा।”
“मैं जवाब दूँगा।”
“मैं ये बात जीवन में किसी से एक ही बार कहूँगी। तुम्हें पक्का जवाब देना होगा वर्ना मेरी बात को मेरे साथ ही दफ़न होना पड़ेगा।”
दिबांग प्यार से उसके हाथ को थाम लेता। दो बार सिर हिलाकर हामी भरता।

गुलजान उसे बात बताती।

दूर पुरानी बस्ती का एक लड़का था। वह रोज़ घर से भाग जाता था। एक दिन जब वह घर पहुँचा उसके बड़े भाई ने पूछा- “क्यों रे, क्यों इतना उदास हाल। बोल तो। कहाँ लुट गया। किधर चोट लगी?”

लड़का कहता- “मैं इसलिए उदास हूँ कि वह तकिये पर आँसुओं से इबारतें क्यों लिखती है। उसके आँसू बे-आवाज़ क्यों बहते हैं?”

लड़के का गला पकड़े हुए उसका बड़ा भाई दोनों हाथों से कॉलर खींचता है- “कहाँ जाता है तू आजकल। क्या कुम्हारों के श्मशान गया था?” लड़का मुस्कुराता। उसकी हँसी में केसरिया रंग घुलता जाता। लड़के के कॉलर फंदा बनकर उसका गला कसते जाते। भाई पूछता- “बोल किसी से वादा किया है वहाँ? कोई आवाज़ सुनी और हाँ भरी तूने?” कॉलर की गाँठ से घुटन बढ़ी और लड़के की आँखें फैलने लगीं। एक बड़ी हाँफ हुई। उसने पूरा जोर लगाया और वे दोनों अलग होकर गिर पड़े।

“वह कुछ रोज़ पहले दिखी थी। बूढ़े दरख़्त वाले मोड़ से ऊपर टेकरी पर देखो तो सबको दिखती है। मैंने उसे देखा तो उसने ऊपर बुला लिया। उसने हाथ से इशारा किया, उधर से आओ। जिस तरफ इशारा किया उसी तरफ आसान चढ़ाई थी। मैं उधर गया तो हवा मुझे धकेल कर ऊपर ले गई।”

लड़के का भाई तेज़ी से भागा। उसने कमरे का दरवाज़ा बंद किया। सीढ़ियों पर बदहवास उतरते हुए सीधा मंदिर वाले आले तक पहुँचा, घुटनों के बल बैठ गया। उसके हाथ काँप रहे थे। माँ और बाबा दौड़े हुए आए। लड़के की भाभी भी आई। मंदिर वाले आले के आगे लड़के का भाई उसके पीछे तीन लोग। अचानक लड़के के बड़े भाई के बदन में भयानक मरोड़ उठी और वह आँगन पर गिर पड़ा। उसके पाँव से लेकर सिर तक तड़प भरी लहरें दौड़ने लगीं। उसने हाथ से ऊपर की ओर इशारा किया। माँ तुरंत ऊपर की ओर भागी। बंद दरवाज़े की कुंडी पर हाथ रखा तो वह बर्फ-सी ठंडी थी। माँ ने दरवाज़ा खोला। लड़का एक कोने में बैठा था। उसके चेहरे पर हल्की हँसी आई। माँ ने मुड़कर नीचे आँगन में देखा। लड़के का भाई शांत हो गया था। वह ठहरी हुई आँखों से माँ को देख रहा था। माँ ने अपने मुँह को पल्लू से ढँका।

दरवाज़ा खुला छोड़कर माँ नीचे चली आई। लड़के का भाई सहमकर घुटनों के बल बैठ गया। उसने अपने हाथ घुटनों के मोड़ों पर रख लिए। वह दीवार का पूरा सहारा लिए हुए था।

लड़के के गले पर हल्की खरोंच थी। उसने तर्जनी से आँगन पर कुछ लिखा। सो गया।

अगली दोपहर लड़का हवा की तरह घर से गायब। उसे घर से निकलते हुए कोई न देख पाया। वह अदृश्य था। उसका पीछा करना बेकार था। मील भर रफ़्तार से चलने के बाद उस घाटी के शुरू होते ही उसकी चाल मद्धम हो गई। वह सड़क पर तैर रहा था, जैसे मौज में कोई तिनका बहता हो। उसने घाटी से ऊपर टेकरी की तरफ नहीं देखा। वह बूढ़े दरख़्त तक पहुँचा और फिर पहाड़ी की छाया वाले हिस्से में मुड़ गया। उसने गहरी साँस ली।

साँस जो कल रात से गायब थी।

कोई आवाज़ उसके क़रीब से गुज़री। जैसे कोई सरसराहट थी। उसे गहरा सुकून आने लगा। एक हवा का झोंका छूकर लिपट गया। वह बोझ से आज़ाद होने लगा। उसके चारों तरफ हल्कापन था। उसकी आँखों की पलकों पर रखे भारी फाहे उड़ने लगे। उसके चहरे पर पुता हुआ चूना झड़ने लगा।

टेकरी पर टूटी सूनी मीनार के पास वाले बड़े पत्थर पर लड़की चुपचाप बैठी रही। हवा उसे इसी तरह बैठे देखकर सिहर उठी। ख़ामोशी के घने जंगल में स्याह साए।

लड़के, ओ लड़के।

वह लौटकर घर आया। भाई दरवाज़े पर ही मिल गया।

“कहाँ गए थे?” लड़के की हँसी झड़ने लगी, जैसे लोहे के फूल गिर रहे हों। लोहे के गिरने की आवाज़ घर भर में फैल गई। भाई चुप खड़ा रहा और लड़का घर में चला गया।

एक बड़ा पंछी कर्कश आवाज़ में चीखता हुआ घर के ऊपर से निकला।

शाम आलू के खेतों से होती हुई घर के दरवाज़े आई। हल्की मादक शाम। माँ और भाभी रसोई के आगे मुस्कुराए। बाबा थोड़े दूर बैठे थे। लड़के का भाई वहाँ न था। लड़का एक बेंच पर लेटा हुआ था। उसके पास किताबें रखी थीं। सब किताबों पर लाल रंग के कागज़ के खोल थे।

उधर उस लड़की ने बासी दोपहर को बदन से रगड़कर उतारा। दोपहर के वे छिलके रात की नमी से भीगे हुए थे। वे वहीं पड़े रहे। बिस्तर से नीचे हाथ लटकाए हुए लड़की सोचती रही कि उसे लड़के से क्या चाहिए।

एक हवा बजती। एक पत्थर गुनगुनाता। टूटी दीवारों से कोई झाँक आती। मन के ख़ाली बरतन में हवा का बाजा। गुनगुनाहट की चमक। झाँक का विस्मय। लड़के की सोच के साथ ये सब चीजें ज़िंदा हो जातीं। जैसे खोयी हुई ज़िंदगी लौट आई हो। जब ऐसा नहीं होता तब वह लड़की छत पर फैली रात की स्याह चादर पर चोर कदमों से चलती। उसे लगता जैसे काले फूल बिछे हैं।

लड़की ने अपने हाथ को आँगन से छत की तरफ किया। उसने दोनों हाथ ऊपर किए कहा- “आओ, मेरे क़रीब आओ। मुझे उठा लो यहाँ से। ये ज़िंदगी नहीं है। ये एक शाप है। ये रूह का पहना हुआ तकलीफ़ का पैरहन है। आओ लड़के। ओ लड़के। ओ मेरे प्रिय लड़के।”

घर में सोये हुए लड़के को कुछ हुआ। उसे लगा कि कोई मुसीबत बढ़ रही है। वह कुछ ही दूर है। वह बिस्तर से उठा। उसने दरवाज़ा खोला। नीचे आंगन में देखा। सब कुछ स्थिर। रात के सम्मोहन में क़ैद चीज़ें। पहाड़ी टेकरी का रास्ता याद किया। उसने मीनार की टूटी हुई दीवार को सोचा। उसने हवा की आवाज़ को सुना। उसने लड़की को याद किया।

सुबह लड़का दो घंटे तक आँगन की उसी बेंच पर बैठा किताब पढ़ता रहा। इसके बाद उसने खाना खाया और अपने कमरे में आ गया। दोपहर होने से पहले जब वह अपने कमरे से बाहर जाने के लिए दरवाज़े तक आया तो पाया कि दरवाज़ा बाहर से बंद है। उसने हत्थी को पकड़कर खींचा मगर वह न खुला। लड़के ने आवाज़ दी। माँ को पुकारा। कोई जवाब न आया। बाबा को पुकारा, कोई जवाब न आया। भाई को आवाज़ दी, उसका भी जवाब न आया।

लड़के के पाँवों पर अंसख्य मकोड़े चढ़ने लगे। वह दोनों हाथों से अंदर लगी हत्थियाँ खींचने लगा। दरवाज़ा मजबूती से बंद था। उसने पुकारा। बेहिसाब पुकारा। घर से दूर-दूर तक लड़के की आवाज़ बिखरती रही। दरवाज़े की कुंडी हिलती थी मगर टूटती नहीं। लड़का कमरे के अंदर दौड़ने लगा। उसने खिड़की के पास जाकर आवाज़ लगाई।

दो घंटे तक दरवाज़ा हिलता रहा। आख़िर घर ख़ामोश हो गया। दोपहर ढल चुकी थी।

भाई ने आहिस्ता से दरवाज़ा खोला। अंदर से कोई हलचल न हुई। भाई के पीछे बाबा खड़े थे। माँ भी थी। भाई ने अपने हाथ में लिए हुए सरसों के बीज दरवाज़े के आगे फैलाए। हाथ में लिए लोटे से दरवाज़े के दोनों तरफ जल छिड़का। काँपते क़दमों से भीतर गया। लड़का बिस्तर पर सो रहा था। भाई ने आवाज़ दी- “उठो।”

वह अचरज से उठा।
उसने कहा- “हाँ भैया।”
“कब से सो रहे हो?”
“पता नहीं। शायद अभी सोया।”
“आओ, नीचे चलो।”

वे सब नीचे चले आये। वहाँ एक तीसरा आदमी था। उस आदमी ने पूछा- “पहाड़ी की टेकरी पर गए थे?”

लड़के को याद आने लगा कि आज वह कमरे में बंद हो गया था। वह उदास होने लगा। उस आदमी ने कहा- “क्या तुम टूटी मीनार के पास बड़े पत्थर पर बैठे थे। क्या तुमने हवा में कोई गीत सुना। किसी सोलह साल की लड़की जैसी आवाज़ में। क्या तुमने देखा कि वहाँ घास के तिनके हवा के साथ गोल-गोल उड़ते रहते हैं?”

लड़के ने कहा- “नहीं।”

उस आदमी ने लंबी राहत की साँस ली। सबके चेहरों पर चिंता की रेखाएँ मिटने लगीं। उस तीसरे आदमी ने तेज़ी से कहा- “अपने हाथ दिखाओ।” लड़के ने अपने हाथ आगे किए। वह आदमी हथेलियों को देखकर आराम की मुद्रा में आ गया। उसने लड़के के हाथ छोड़ दिए उन हाथों में कुछ न था। एक भी लाल रेशा नहीं।

तीसरा आदमी उठा, कुछ बुदबुदाया और सुख भरे क़दमों से चला गया।

उसके जाते ही घर में हवा की साँय-साँय शुरू हो गई। हवा हर तरफ से आ रही थी। बस्ती में ज़रा ऊँचाई पर बसे हुए इस मकान के अलावा सब मकानों को हवा भेद रही थी। सिर्फ हवा बज रही थी बाकी ख़ामोशी थी।

उस रात लड़के का भाई उसके कमरे में आया। उसने कहा कि तुमको कुछ बताना है।

भाई उसके पास बैठ गया- “असल में हम डर गए थे। हमें लगा तुमको कुछ हो गया है। वह जो मीनार की टेकरी है, वहाँ कोई साया है। वहाँ पर जाने वालों को कुछ हो जाता है। अब तक जो भी गया, उसे हवा ने छुआ। हवा में गीत सुने। उसने हवा का नाच देखा। हवा ख़ुद वहाँ लोगों को ऊपर खींच लेती है।”

अपने भाई की बात सुनते हुए लड़का दीवार का सहारा लिए चुप बैठा रहा।

वह जो लड़की थी, उसे भी दोपहर को हवेली में क़ैद कर दिया गया। उसने दरवाज़ों को आवाज़ नहीं दी। उसने हत्थियाँ पकड़कर नहीं खींचीं। वह चुप रही। जिस तरह लड़का एक दिन के लिए बंद किया गया था उसके उलट लड़की को अनेक दिनों तक बंद रखा गया।

इसके बाद एक दोपहर उस लड़के और लड़की को किसी ने घाटी से देखा। वे दोनों एक साथ इसी टेकरी पर थे। जब लोग उनको खोजने आए तब वे यहाँ नहीं मिले। वे दोनों गायब हो गए थे। फिर कभी किसी को नहीं मिले।

गुलजान ने अपनी बात पूरी कर दी। दिबांग सोच में गुम था।


गुलजान ने उसे याद दिलाया कि अब तुमको जवाब देना होगा। दिबांग ने कहा- “पूछो, क्या सवाल है?”

गुलजान ने पूछा- “बताओ वे दोनों कहाँ गए।”

दिबांग ने महसूस किया कि इस सवाल के बाद हवा अचानक रुक गई है। ख़ामोशी गहरी होती जा रही है। मीनार की टूटी दीवार के पास से कोई झाँक हुई। वहाँ कोई सरसराया। सब चीज़ें गहरे मौन में किंतु लगता है, सब बोल रही हों। पत्थर, घास, रेत, हवा, सूखे दरख़्त, हर कोई उसको कुछ कहना चाह रहे हों।

दिबांग ने कहा- “वह लड़का ये मीनार हो गया और लड़की हवा हो गई।”

गुलजान ने फुर्ती से दिबांग को बाँहों में भर लिया। वह रोने लगी। “तुम कैसे मेरे मन को पढ़ लेते हो। बताओ कहाँ से सीखा मन को पढ़ना?” वे दोनों एक-दूजे की बाँहों में टूटी मीनार के पास वाले बड़े पत्थर पर पड़े हुए थे। उनके मन भीगे हुए थे। वे एक-दूजे को चूम चुके थे। अचानक बहुत से परिंदे टूटी मीनार के पास हवा में तैरने लगे। दिबांग ने गुलजान से कहा- “अपनी आँखें खोलो और देखो।” गुलजान ने कहा- “ऊँ हूँ।”

“गुलजान, देखो परिंदे”!
* * * 

4 टिप्पणियाँ:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

हर बार एक नया ब्लॉग ... एक नई कहानी ... पर पारखी नज़र वही ... आपकी ... प्रणाम दीदी |

पुरानी बस्ती ने कहा…

Guljaan, umda

एक बार हमारे ब्लॉग पुरानीबस्ती पर भी आकर हमें कृतार्थ करें _/\_

http://puraneebastee.blogspot.in/2015/03/pedo-ki-jaat.html

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह बढ़िया !

kuldeep thakur ने कहा…

अति सुंदर

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