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रविवार, 8 अप्रैल 2012

एक औरत के दिल से निकले कुछ शब्द



आराधना चतुर्वेदी यानि feminist poems एक औरत के दिल से निकले कुछ शब्द , जिसमें मातृत्व यानि देवत्व होता है , एथेंस के सत्यार्थी सी चाह होती है , अनवरत ज़िन्दगी को कहने समझने का हौसला होता है ........ टुकड़ों को जोड़कर सपने सहेजने की ताकत होती है .
आराधना जी भले ही आपके और मेरे लिए नई न हों , पहचान पुरानी है - पर उनके ख्याल आज भी कुछ ख्याल दे जाते हैं जो नए होते हैं और नए ब्लॉगर
सहयात्रियों के लिए एक नया परिचय !

मेरे बारे में इसमें इन्होंने खुद अपना परिचय दिया है ताकि शब्दों की यात्रा अनजानी सी न लगे .

"मैं क्या हूँ?? पता नहीं... अपनी खोज में लगी हुयी हूँ...शायद हम सभी खुद को ढूँढ़ने में लगे हुये हैं. ज़िन्दगी के किसी मोड़ पर, किसी से मिलकर या किसी घटना के समय, हमें खुद अपना ही अन्जाना चेहरा दिख जाता है और तब हम सोचते हैं कि क्या ये हम ही हैं?...तो कोई भी नहीं कह सकता कि वह है कौन? मैं नहीं जानती कि मेरी जीवन-यात्रा का गन्तव्य कहाँ है? पर, मैं ये जानती हूँ कि मुझे क्या करना है...और क्या नहीं करना है? तो कर्म कर रही हूँ...निरन्तर...
मैं बहुत सीधी हूँ. मतलब स्ट्रेट फ़ारवर्ड. मैं दुनिया के उन नमूनों में से एक हूँ, जो आजकल की दुनिया में भी सच्चाई, ईमानदारी, निष्ठा, प्रेम और विश्वास पर विश्वास करते हैं. मैं बहुत ईमानदार हूँ और भरसक झूठ बोलने से बचती हूँ. मुझे बनावटी और दोहरे चरित्र वाले लोग बिल्कुल नहीं पसंद हैं.
मैं समाज के लिये कुछ करना चाहती हूँ, मुख्यतः उन लोगों के लिये, जो अपने लिये नहीं कर सकते. मैं गाँव की औरतों के लिये कुछ करना चाहती हूँ क्योंकि मैंने देखा है कि आरक्षण, अनेक सामाजिक योजनाओं आदि की पहुँच अब भी वहाँ तक नहीं है. "
2009 के जनवरी में नए वर्ष ने इनका स्वागत किया - कुछ इस तरह -
"तुमने मेरी ठोडी को हौले से उठाकर कहा
अनछुई कली हो तुम
मैं चौंकी
पर क्यों?
ये झूठ तो नहीं
तन और मन से पवित्र
मैं कली हूँ अनछुई
और तुम भंवरे
मैं स्थिर, तुम चंचल
प्रेम की राह में दोनों बराबर
तो मैं ही अनछुई क्यों रहूँ ?
भला बताओ
तुम्हें अनछुआ भंवरा क्यों न कहूँ ? " (अनछुई कली)

एक औरत के दिल से निकले शब्द धरती को बंजर नहीं रहने देते , आराधना जी ने भी एहसासों के पुष्ट बीज डाले , सत्य से सिंचन किया और बेज़ुबान
धरती लहराने लगी ...." पेड़ ,चाहे बबूल का ही क्यों न हो /पत्थर पर नहीं उगता /उसके लिए चाहिए ज़मीं ,रेतीली ही सही /और चाहिए थोड़ा सा पानी /कवितायें ,चाहे स्वप्नलोक की सैर कराने वाली हों /
या कठोर यथार्थ पर लिखीं /नरम दिल से ही निकलती हैं /कविताओं के उगने के लिए /चाहिए थोड़ी मिट्टी/और थोड़ा पानी / चिलचिलाती धूप सही , गर्म हवा के थपेड़े भी /धूल भरे
झंझावात /सूखा मौसम /औरत होने के ताने भी /दुनिया के इस रेगिस्तान में ख़त्म होती रिश्तों के बीच गरमी /पर इसके बाद भी /नहीं गई दिल की नरमी /मेरा मन अब भी है गीली
मिट्टी /कविताओं के उगने के लिए तैयार ... ... ... ..."
कविताओं के मंजर की खुशबू दूर दूर तक फैलती गई . परशुराम को गोद में सुला कीड़े की दंश को झेलते हुए जिस तरह कर्ण ने अपना साहस क्षीण नहीं होने दिया , परिणाम के भय से कर्तव्य से विमुख नहीं हुए - ठीक उसी प्रकार कवयित्री ने सत्य की प्रत्यंचा पर शब्दों के अदभुत वाण रखे हैं -
" अपने ही घर में वह डरती है /और अंधेरे में नहीं जाती /हर पल उसकी आँखों में /रहता है खौफ का साया /जाने किस खतरे को सोचकर /अपने में सिमटी
रहती है /रास्ते में चलते -चलते /पीछे मुड़कर देखती है /बार -बार /और किसी को आता देख /थोड़ा किनारे होकर /दुपट्टे को सीने पर /ठीक से फैला लेती है
/गौर से देखो /पहचानते हो इसे /ये मेरे ,तुम्हारे /हर किसी के /घर या पड़ोस में रहती है /ये हर घर -परिवार में /बड़ी होती हुयी लड़की है /... ... आओ
हम इसमें /आत्मविश्वास जगा दें /अपने हक के लिए /लड़ना सिखा दें /हम चाहे चलें हों /झुक -झुककर सिमटकर /पर अपनी बेटियों को /तनकर चलना
सिखा दें ."

2009 की चौखट पर करीने से ख्यालों के एहसासों के उम्मीदों के कई दीप जले हैं .... चतुर्दिक फैला गहन गरिमामय प्रकाश है . कुछ किरणें बटोर लायी हूँ -

औरत होने का सुख

चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं

लड़कियाँ और कुकुरमुत्ते

स्त्रियाँ सो रहीं हैं

2010 के आँगन में इन्होंने तुलसी के आगे अपनी सारी कामनाएं उड़ेल दीं , अर्घ्य के हर बोल कुछ यूँ प्रस्फुटित

हुए -

बेटी

अम्मा के सपने " मेरी अम्मा

बुनती थी सपने
काश और बल्ले से,
कुरुई, सिकहुली
और पिटारी के रूप में,
रंग-बिरंगे सपने...
अपनी बेटियों की शादी के,

कभी चादरों और मेजपोशों पर
काढ़ती थी, गुड़हल के फूल,
और क्रोशिया से
बनाती थी झालरें
हमारे दहेज के लिये,
खुद काट देती थी
लंबी सर्दियाँ
एक शाल के सहारे,

आज...उसके जाने के
अठारह साल बाद,
कुछ नहीं बचा
सिवाय उस शाल के,
मेरे पास उसकी आखिरी निशानी,
उस जर्जर शाल में
महसूस करती हूँ
उसके प्यार की गर्मी..."

अब जो कविता यूँ कहिये जो सत्य के गर्भ से निकली अग्नि आपके समक्ष है , उससे आप हम , ये वो क्या इन्कार कर सकेंगे . करने की कोशिश में झूठ की बेसुरी डफली ही बजायेंगे -

गंदी बातें

"

हमारे समाज मे

कुछ काम ऐसे होते हैं

जिन्हें करते सभी हैं

या करना चाहते हैं

पर उनके बारे में

बातें करना गंदी बात है,

कुछ काम ऐसे हैं

जिन्हें कोई नहीं करना चाहता है,

उनके बारे में...

सिर्फ बातें होती हैं

योजनाएं बनती हैं,

...

गंदी बातों की अजब ही फिलासफ़ी है

प्रैक्टिकल की बात करते हैं लोग

चटखारे ले-लेकर,

पर, थियरी की बातें करना गंदी बात है,

सावधानी की बात करना बुरा है

पर भूल हो जाने पर...

खबर बन जाती है

फतवे जारी होते हैं

नियम बनाए जाते हैं

उन पर गर्मागर्म बहसें होती हैं,

...

गंदी बातों की एक और खास बात है

कि उनमें औरतें ज़रूर होती हैं,

बिना औरतों के

कोई बात गन्दी नहीं हो सकती,

क्योंकि समाज में फैली हर गंदगी

औरतों से जुड़ी होती है,

फिर उसे फैलाया किसी ने भी हो...

...

आज़ाद औरत सबसे बड़ी गंदगी है,

वो हंसकर बोले तो बदचलन

न बोले तो खूसट कहलाती है,

पर वो...

सामान्य व्यक्ति कभी नहीं हो सकती है,

अकेले रहने वाली हर औरत

एक गंदी औरत है

और उसके बारे में

सबसे ज्यादा गंदी बातें होती हैं..."


बड़की भौजी उनके विरुद्ध मचलते शब्द जैसे और भी कई सुलगते अंगारे हैं ....


2011 तक इन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज की है ..... जनवरी से अक्टूबर तक . आराधना जी की आहटों में गूंजते हैं कुछ अनकहे पल -

मेरे दोस्त

"मैं खुद को आज़ाद तब समझूँगी

जब सबके सामने यूँ ही

लगा सकूँगी तुम्हें गले से

इस बात से बेपरवाह कि तुम एक लड़के हो,

फ़िक्र नहीं होगी

कि क्या कहेगी दुनिया?

या कि बिगड़ जायेगी मेरी 'भली लड़की' की छवि,

चूम सकूँगी तुम्हारा माथा

या कि होंठ,

बिना इस बात से डरे

कि जोड़ दिया जाएगा तुम्हारा नाम मेरे नाम के साथ

और उन्हें लेते समय

लोगों के चेहरों पर तैर उठेगी कुटिल मुस्कान


जब मेरे-तुम्हारे रिश्ते पर

नहीं पड़ेगा फर्क

तुम्हारी या मेरी शादी के बाद,

तुम वैसे ही मिलोगे मुझसे

जैसे मिलते हो अभी,

हम रात भर गप्पें लड़ाएँगे

या करेंगे बहस

इतिहास-समाज-राजनीति और संबंधों पर,

और इसे

तुम्हारे या मेरे जीवनसाथी के प्रति

हमारी बेवफाई नहीं माना जाएगा


वादा करो मेरे दोस्त!

साथ दोगे मेरा,

भले ही ऐसा समय आते-आते

हम बूढ़े हो जाएँ,

या खत्म हो जाएँ कुछ उम्मीदें लिए

उस दुनिया में

जहाँ रिवाज़ है चीज़ों को साँचों में ढाल देने का,

दोस्ती और प्यार को

परिभाषाओं से आज़ादी मिले....."


इन आहटों के मध्य मेरी सदा है - कहाँ हो तुम ... हर सत्यार्थी की आँखें प्रतीक्षित हैं ! जो सच कहने का साहस रखता है , वह कह
जाने का मूलमंत्र भी दे जाता है ............ है न आराधना ?

21 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आराधनाजी का दूसरा ब्लॉग नियमित पढ़ना होता है।

Deepak Shukla ने कहा…

Wah...har kavita hruday ko chho gayi... Har kavita samaj ka aaina...ek ladki ke ankahe se ahsaas... Kitna kuchh chalta hoga uske hruday main... Bachpan se le kar bade hone tak....

Aradhna ji ko bahut dinon se jaante hain..shodh chhatra hone ke sath stri ke haq ke liye apna swar mukhar karna unke swabhav main hai... Vyaktigat taur par main unse bahut prabhavit hun... Meri bhi ek beti hai...main chahunga ki meri beti bhi aisi hi nirbheek, ..jagrook aur sahruday bane....

Eshwar se prarthna hai ki wo Aradhna ji ko safal aur swavlambi banaye...aur unke sab sapne saakar hon...

Rashmi ji ka hardik abhaar jinhone etne sukhad shabdon main kavitaon ke jariye Aradhna ji ke manobhavon ka sankalan kiya hai... Bahut sundar...aapki kavita sareeekha....

Saadar...

Deepak...

Vibha Rani Shrivastava ने कहा…

आराधना चतुर्वेदी जी को आपके कलम के जादू से जानना और भी अच्छा लगा...

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

वादा करो मेरे दोस्त!साथ दोगे मेरा,भले ही ऐसा समय आते-आतेहम बूढ़े हो जाएँ,या खत्म हो जाएँ कुछ उम्मीदें लिएwaah bahut accha laga aaradhana jee ko padhna...

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

rashmi jee,


aradhana jee ko padhana bahut achchha laga. sabhi rachanon ka samakalan prashansaneey hai. Abhar !

mukti ने कहा…

रश्मि जी, आपको कोटिशः धन्यवाद कि आपने इतनी गंभीरता से मेरी रचनाओं को पढ़ा और इतने विस्तार से उनके बारे में लिखा. मैं खुद को साहित्यकार नहीं मानती, कविता का शिल्प मुझे नहीं आता, लेकिन फिर भी लिखना अच्छा लगता है और ब्लॉगजगत से मुझे बहुत प्यार है. इसलिए फिर से लिखना ज़रूर शुरू करूँगी, अभी थोड़ी अधिक व्यस्त हूँ या कहूँ कि अस्त-व्यस्त हूँ.
@दीपक जी, आप जैसे मित्रों के कारण मेरा उत्साह बढ़ता है, पर आपने मुझे आज ये कहकर बहुत सम्मानित किया है कि आप अपनी बेटी को मेरे जैसी निर्भीक और जागरूक बनाना चाहते हैं. धन्यवाद !

Maheshwari kaneri ने कहा…

आराधना चतुर्वेदी जी को आप की लेखनी से पहचाना अच्छा लगा..आभार..

veerubhai ने कहा…

कलम का जादू और जोर से चढ़ता है जब वह कलम की जादूगरनी की बात करता है ,समीक्षक का स्वांग भरता है .समीक्षा और कृतिकारा दोनों मय कृति के मुखर हुईं हैं इस पोस्ट में .

ऋता शेखर मधु ने कहा…

बेहतरीन रचनाकारा से परिचय कराने के लिए आभार...सत्य कहती कविताएँ मर्मस्पर्शी हैं.

वन्दना ने कहा…

अराधना जी की रचनायें एक से बढकर एक होती हैं और सत्य के करीब ………आपकी कलम द्वारा मिलकर और अच्छा लगा।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

आराधना जी की कविताएं प्रभावित करती ही हैं उससे अधिक प्रभावित करते हैं दूसरों के ब्लॉग पर उनके बेबाक कमेंट। खूब सोच समझकर कविता या कहानी लिखने से भी बड़ा काम है पढ़कर तत्काल सही प्रतिक्रिया देना। उनके कमेंट पढ़कर भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहा जा सकता। आपने यहां जिन कविताओं का उल्लेख किया है उनमे गंदी बातें..मुझे, बेहतरीन कटाक्ष होने के कारण सबसे अधिक अच्छी लगती है।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

सच कहूँ तो मैंने आराधना जी को ज्यादा पढ़ा नहीं है ... पर अब सिलसिला जरूर कायम होगा ... इस परिचय के लिए आपका आभार !

रविकर फैजाबादी ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति ।
आभार ।।

दीपिका रानी ने कहा…

बहुत अच्छा लगा आराधना जी के बारे में जानकर और उनकी कविताओं से परिचय पाकर.. शुक्रिया

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

एक और मुलाकात
यहां इस मुलाकात को पढने के बाद लगा कि जैसे मैं आराधना जी को कब से जानता हूं।
पर मेरा दुर्भाग्य की पहले मैं नहीं जानता था, आज पहचान हुई तो लगा कि बहुत पुरानी मुलाकात है।
बहुत सुंदर रश्मि दी

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

रश्मि दी,
एक संवेदनशील कवयित्री से परिचय का आभार!! सचमुच इनकी भावनात्मक क्षमता का लोहा मानना पडेगा!!

dheerendra ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति,
आराधना जी के पोस्ट को आज पहली बार पढ़ रहा हूँ

RECENT POST...फुहार....: रूप तुम्हारा...

सदा ने कहा…

आपकी कलम से आराधना जी को पढ़ना अच्‍छा लगा ... अभी उनके ब्‍लॉग पर जाना शेष है ...

Sonal Rastogi ने कहा…

हर लड़की वो महसूस करती है जो आराधना ने किया पर कहने का सलीका हर किसी के पास नहीं होता ....आराधना की कवितायें किसी मझे निर्देशक की फिल्म की तरह होती है ...चित्रात्मक ,भावात्मक और बेहद मारक.... पर उनकी डिम्पल वाली मुस्कान देख कर यकीन थोड़ा कम होता है ...इतनी क्यूट सी लड़की इतना गहरा उतर कर सृजन करती है

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

aradhana jee ke baare me jaan kar achchha laga:)

Saras ने कहा…

रश्मिजी ...आराधना जी से मेरा परिचय कराके आप नहीं जानतीं...कितने सवाब का काम किया है आपने ....इतना सुन्दर भी कोई लिख सकता है ......आपकी बदौलत कई लोगों से मिलना हुआ ...रश्मि रविराजा से और अब आराधना जी से ....बहुत बहुत धन्यवाद रश्मिजी !

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