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शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

प्रतिभाओं की कमी नहीं 2013 (14)

ब्लॉग बुलेटिन का ख़ास संस्करण -



अवलोकन २०१३ ...

कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०१३ का १४ वाँ भाग ...


साहस के घने बादल छाते हैं 
तो हो जाती है बड़ी बड़ी बातों की बूंदाबांदी 
पर जब मन मन से परे जीता है 
तो अपनी शक्ल भी पहचानी नहीं जाती 
मिसाल बनने की इच्छा 
कभी थकने नहीं देती 
और कभी अजनबी से हालात नाम पूछते हैं 
................... चलता है खेल हार-जीत का 
एहसास रेखांकित होते हैं - कुछ यूँ  .......... 

(सुमित तोमर)

आज जब कुछ लोगो के बीच बैठ कर उनकी बातें सुन रहा था, वहाँ वो सब किसी शख्स की बुराई कर रहे थे.. 
सभी के अपने-अपने मत थे वहाँ.. आखिर सब एक से बढ़ कर एक ज्ञानी जो थे.… कोई कह रहा था की वो शख्स ऐसा है, कोई कह रहा था की वो शख्स वैसा है.. सभी के अपने अपने विचार थे जो उन्होंने अलग अलग पहलुओ को देख कर बनाये थे। 
 में उन लोगो की बातें सुन कर बस यही सोच रहा थे की हम किसी के बारे में कुछ कहने, सोचने या निर्णय लेने वाले होते कौन है। किसने दिया हमें इतना हक़…। और सब से ज़रूरी बात तो ये की हमें इस से मिल क्या रहा है?
सत्‍य के संबंध में विवाद सुनता हूं, तो आश्चर्य होता है। निश्चय ही जो विवाद में हैं, वे अज्ञान में होंगे। क्योंकि, ज्ञान तो निर्विवाद है। ज्ञान का कोई पक्ष नहीं है। सभी पक्ष अज्ञान के हैं। ज्ञान तो निष्पक्ष है। फिर, जो विवादग्रस्त विचारधाराओं और पक्षपातों में पड़ जाते हैं, वे स्वयं अपने ही हाथों सत्य के और स्वयं के बीच दीवारें खड़ी कर लेते हैं। मेरा यही मानना है की: विचारों को छोड़ों निर्विचार हो रहो। पक्षों को छोड़ो और निष्पक्ष हो जाओ। क्योंकि, इसी भांति वह प्रकाश उपलब्ध होता है, जो कि सत्य को उद्घाटित करता है।
एक पुराना लेख याद आता है जब एक अंधकार पूर्ण गृह में एक बिलकुल नए और अपरिचित जानवर को लाया गया। उसे देखने को बहुत से लोग उस अंधेरे में जा रहे थे। चूंकि घने अंधकार के कारण आंखों से देखना संभव न था, इसलिए प्रत्येक उसे हाथों से स्पर्श करके ही देख रहा था। एक व्यक्ति ने कहा- राजमहल के खंभों की भांति है, यह जानवर। दूसरे ने कहा- नहीं, एक बड़े पंखे की भांति हैं। तीसरे ने कुछ कहा और चौथे ने कुछ और। वहां जितने व्यक्ति थे, उतने ही मत भी हो गये। उनमें तीव्र विवाद और विरोध हो गया। सत्य तो एक था। लेकिन, मत अनेक थे। उस अंधकार में एक हाथी बंधा हुआ था। प्रत्येक ने उसके जिस अंग को स्पर्श किया, उसे ही वह सत्य मान रहा था। काश! उनमें से प्रत्येक के हाथ में एक-एक दिया रहा होता, तो न कोई विवाद पैदा होता, न कोई विरोध ही! उनकी कठिनाई क्या थी? प्रकाश का अभाव ही उनकी कठिनाई थी। वही कठिनाई हम सबकी भी है। जीवन सत्य को आतंरिक प्रकाश में ही जाना जा सकता है। जो विचार से उसका स्पर्श करते हें, वे निर्विवाद सत्य को नहीं, मात्र विवादग्रस्त मतों को ही उपलब्ध हो पाते है।
सत्य को जानना है, तो सिद्धांतों को नहीं, प्रकाश को खोजना आवश्यक है। प्रश्न विचारों का नहीं, प्रकाश का ही है। और, प्रकाश प्रत्येक के भीतर है। जो व्यक्ति विचारों की आंधियों से स्वयं को मुक्त कर लेता है, वह उस चिन्मय-ज्योति को पा लेता है, जो कि सदा-सदा से उसके भीतर ही जल रही है।  


(तुषार राज रस्तोगी)

बहुत दिनों से सोच रहा था इस कहानी आगाज़ कैसे करूँ, कैसे शब्दों में बयां करूँ, अब जाकर कुछ सोच विचार कर मन बन पाया है | कहानी शुरू होती है हिंदुस्तान के दिल से यानी मेरी अपनी दिल्ली से | जी हाँ!  भारत की राजधानी दिल्ली | कहानी की नायिका है ‘आराधना’ | एक माध्यम वर्गीय परिवार में जन्मी, सुन्दर और सुशील कन्या | गोरा रंग, छरहरा बदन, तीखे नयन नक्श, स्वाभाव से बेहद चंचल और नटखट लेकिन बहुत ही अड़ियल है | गुस्सा तो जैसे हमेशा नाक पर धरा रहता है | जीवन में सवाल इतने के तौबा | अगर कोई साथ बैठ जाए तो ये मोहतरमा उनके जीवन का समस्त निचोड़, व्यक्तित्त्व का सारा नाप तौल और जीवन परीक्षण अपने सवालों से ही ले डालें और यदि कोई भूख से तड़पता हो तो इनके सवालों से ही उसका पेट भर जाये | इस लड़की के व्यक्तित्त्व में अनेकों खूबियों के साथ ख़ामियों की शिरकत भी बराबर दुरुस्त थी | जहाँ ये किसी से भी हुई बड़ी से बड़ी लड़ाई, तू तू मैं मैं, बहस, झगड़े इत्यादि को पल में बच्चों की तरह ऐसे भूल जाती जैसे कुछ हुआ ही न हो | वहीँ ना जाने क्यों ये कभी भी किसी पर भरोसा नहीं करती थी | यदि करती भी थी तो समय इतना निकाल देती भरोसा जताने में के गाड़ी प्लेटफार्म से निकल जाती | खैर इधर उधर की बात करने की बनिस्बत कहानी पर आते हैं | यह कहानी है उसके दिल और भरोसे के आपसी तालमेल, मतभेद, वार्तालाप और एक दूसरे के साथ हुए अनुबंध की जिसमें देखना यह है के जीत किसकी होती है | दिल की या भरोसे की |

अचानक यूँ ही एक दिन बात करते आराधना को ख्याल आया के उसका दिल और भरोसा दोनों अपनी जगह से नदारत है | तो लगा इन्हें ढूँढा जाये और लगीं इधर उधर अपने आप पास ढूँढने | ढूँढ मचाते यकायक अपने व्यक्तित्त्व की एक सूनी सी गली में जा पहुंची | माज़ी के कुछ अवशेष उस गली में बिखरे पाए और वहीँ गली के नुक्कड़ पर पड़ी एक पुरानी यादों की अलमारी की सबसे आख़िरी दराज़ में से कुछ आवाजें आती सुनाई पड़ीं | धीरे से आगे बढ़कर दराज़ को खोल कर देखा में उसने अपनी दिल और भरोसे को आपस में बात करते पाया | दोनों आपस में ख़ुसुर-फ़ुसुर करने में लगे थे | धीरे से कान लगाकर सुनने पर पता चला के बात दोनों के बीच मूल्यों और अपने महत्त्व को लेकर बातचीत हो रही थी |

भरोसा दिल से पूछता है, “ऐ दिल! क्या तू मुझपर भरोसा करता है ?”

दिल ने जवाब दिया, “यार! वैसे दिल तो नहीं कर रहा मेरा तुझपर ऐतबार करने को पर क्या करूँ कुछ समझ नहीं आ रहा “

भरोसा बोला, “यार हम दोनों तो हमेशा एक दुसरे के साथ रहते हैं | इतने समय से दोनों साथ हैं | फिर भी तू ऐसी बातें कर रहा है | मेरे भरोसे का खून कर रहा है | मेरा भरोसा तोड़ रहा है | ये कहाँ का इंसाफ़ हुआ मेरे भाई ?

दिल कुछ सोच के बोला, “यार! सच बतलाऊं दिल तो मेरा भी बहुत चाहता है के तेरे भरोसे पर ऐतबार कर लूं पर क्या करूँ मेरा दिल भी कितना पागल है ये कुछ भी करने से डरता है और सामने जब तुम आते हो ये ज़ोरों से धड़कता है | ऐसा कितनी बार हुआ है ज़िन्दगी के गलियारों में, दिल मेरा टूटा है भरोसे पर किये बीते वादों से |

भरोसे ने यह सुना तो उसकी आँखें नम हो कर झुक गईं | वो बोला, ‘सुन यार दिल हम दोनों एक ही ईमारत के आमने सामने वाले फ्लैट में रहते हैं | बिना दिल की मदद के भरोसे की गाड़ी नहीं चलती और ना बिना भरोसे दिल ही धड़कता है | मैं ये बात मान सकता हूँ कि किसी झूठे भरोसे पर तेरा दिल तार तार हुआ होगा पर क्या यह सही होगा कि किसी एक के कुचले भरोसे की सज़ा दुसरे के ईमानदार भरोसे को दी जाये ?”

दिल खामोश था, सोच रहा था क्या जवाब दे | कुछ देर सोचने के बाद दिन ने कहा, “ऐ दोस्त यकीन मुझको तेरी ईमानदारी पर पूरा है | तेरे भरोसे पर ऐतबार मेरा पूरा है पर ये दिल के जो घाव हर पल टीस देते हैं, कुछ ज़ख्म ऐसे होते हैं जो जीवन भर हरे ही रहते हैं |“

भरोसा समझदार था, पीड़ा दिल की समझ गया, धीरे से दिल के पास गया और अपने हाथ को दिल पर रखकर बोला, “दर्द तेरा जो है मैं समझ गया पर बस इतना करना एक आख़िरी दफ़ा मुझसे मिलकर तू मुझे अपनाने की कोशिश करना | बस यह छोटा सा वादा है तुझसे मैं तुझको दुःख न पहुंचाऊँगा | तेरे टूटने से पहले मैं खुद ही फ़नाह हो जाऊँगा | बस इतना एहसान तू मुझपर करना एक ज़रा हाथ अपना बढ़ा देना | थाम के आँचल मेरा तुम जीने की दुआ करना | फिर जीना क्या है वो मैं बतलाऊंगा | खुशियों से दामन तेरा मैं हर पल भरता जाऊंगा |”

दिल ने सुनकर, नज़रें उठा कर देखा, खुशियाँ भर कर आँखों में भरोसे की बातों पर सोचा, धीरे से मुस्कराया और थाम हाथ भरोसे का आँखों आँखों में विश्वास दर्शाया | सोचा एक मौका तो देना बनता है | पकड़ हाथ भरोसे का दिल जीवन की सीढ़ी चढ़ता है |

आराधना अचंभित खड़ी यह सब सुन और देख रही थी और अपने चेतन मस्तिष्क में कुछ नई खुशियाँ बुन रही थी | सोच रही थी क्या दिल और भरोसे की इस भागीदारी से वो जीवन नया बनाएगी | इस अनोखी भागीदारी को वो क्या कह के बुलाएगी | साथ किसका वो देगी अब ? वो दिल को जीत दिलाएगी या भरोसे को अपनाएगी ? 

आखिर में फैसला इंसान खुद ही करता है वो जीवन में भरोसे को चुनता है या अपने दिल की सुनता है | क्योंकि दिल और भरोसा एक दुसरे के पूरख है | जीवन दोनों से ही आगे बढ़ता है | किसी एक का हाथ भी छूट जाये तो इन्सान सालों साल दुःख के आताह दलदल में तड़पता है | 

आराधना का फैसला क्या होगा ये मैं अपने सभी पढ़ने वाले दोस्तों पर छोड़ता हूँ | आप ही बताएं आप ही सुझाएँ इस कहानी की शुरुवात अब आगे क्या होगी | 

फैसला अपना और सबसे अधिक वक़्त का होता है,  … और यही सही भी है,गलत हो तब भी, क्योंकि सीखने की प्रक्रिया ऐसे ही चलती रहती है :)

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

प्रतिभाओं की कमी नहीं 2013 (13)

ब्लॉग बुलेटिन का ख़ास संस्करण -



अवलोकन २०१३ ...

कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०१३ का १३ वाँ भाग ...



एक कहानी 
एक कविता 
एक नज़्म 
एक ग़ज़ल सी होती है ज़िन्दगी  … सुनते रहो,पढ़ते रहो,लिखते रहो  … अचानक खत्म हो जाती है ज़िन्दगी !
ज़िन्दगी का दीया जब तक रौशन है 
अपनी प्रतिभा के पदचिन्ह बनाते जाएँ 
………। 


(युगदीप शर्मा)

याद है? जब पहले पहल मिली थी तुम,
बगल से एक मुस्कान के साथ गुजर गयी थी.
एक परफ्यूम की गंध के साथ
साँस में बस गयी थी तुम
तब ना कोई हवा चली थी,
ना कोई वोइलिन बजी थी.

देखा था मैंने तुझे, पलट कर जरूर,
जैसा कि मैं हर बंदी को देखता था.
क्या पता था कि वही तुम,
एक दिन आ मिलोगी मुझे,
सपने के जैसे, पलकों पे बैठ जाओगी.

दोबारा कब मिले थे, अब ये तो याद नहीं,

पर हाँ, वो एहसास
अभी भी गुदगुदा जाता है अक्सर,
शायद तुमने कुछ कहा था और मैं,
आँखें फाड़ फाड़ के देख रहा था तेरे चहरे को.

फिर जब तुमने फिर से कहा था तो,
हडबडाकर कुछ तो बोला था मैं भी..
और तुम फिर से मुस्कुरा के,
चली गयी थी...फिर से मिलने को..
वो दिन-
उसे तारीख कहूँ तो तौहीन होगी उन लम्हों की ..
-गुजरा नहीं है आज तक...
अटक गया है कहीं...कलेंडरों से परे.

फिर
ना जाने कब.. सब कुछ बदल गया...
आहिस्ते आहिस्ते...
बिना कुछ बोले भी..
जो आज तक कायम है..

बहुत सी बातें...जो तुमने कभी बोलीं ही नहीं..
बरबस ही सुन लिया करता हूँ मैं.
और तुम भी तो समझ लेती हो हर बात को..
अनकहे ही..

भाषा के मायने बदल गए हैं.. शायद...
पंख फैला लिए हैं उसने...
एहसासों को सुनने लगी है वो अब...
आँखों से बतियाती है...
शब्दों/ ध्वनियों की मोहताज नहीं है वो..

तुम्हारे साथ...हर एक पल...
एक जमीनी एहसास है...
बादलों के पार नहीं पहुँचता कभी भी ..
बहुत मजबूत हैं पांव उसके...या कि शायद जड़ें हैं.
जो कहीं गहरे तक, समेटे हुए हैं मुझे..

तेरे साथ होने पर...हर गम, हर ख़ुशी...
अपने मायने बदल देती है...
सब कुछ नया नया सा लगता है..
सारी सृष्टी झूमने लगती है इर्द-गिर्द...
इच्छा/आशा/अभिलाषा/महत्वाकांक्षाओं से परे...
शायद...बुद्ध बन जाता हूँ मैं!!

एक आलसी का चिठ्ठा: पाँच उदासियाँ


( गिरिजेश राव )

(1)
हाथों में झुर्री भरे हाथ लेते 
झुरझुरी होती है 
और माँ कहती है – 
छोड़ो, जाने दो 
कितनी देर से रखी है आँच पर तरकारी 
जल जायेगी। 
मेरी आँखों में भरता है 
मणिकर्णिका का धुँआ - 
एक दिन 
जल जायेगी।
(2)
बहुत शांति रहती है घर में
बेटे के वितान तले 
पिता घुटता है 
माँ सहमती है 
बच्चे बढ़ कर ऊँचे तो होते हैं, 
पसरते नहीं!
(3)
बच्चे की ज़िद पर 
मोल ले आई है गृहिणी
पिजरे में चिड़ियों का जोड़ा। 
गृही उन्हें उड़ा नहीं पाता 
उसे रह रह कोंचता है 
पिता का उसके घर को 
‘गोल्डेन केज’ कहना।  
छाँव की चाह स्वार्थी 
समय का क्या 
रीत जायेगा 
पिजरा रह जायेगा
सुगना उड़ जायेगा।

(4)
नहीं जाना चाहते वे 
घूमने पोते के साथ, 
बूढ़े पाँव 
छोटे पाँवों के साथ चल नहीं पाते। 
 जो साथ दे सकता है 
वह तो कुर्सी तोड़ता है।

(5) 
कमरे के तेज प्रकाश से अलग 
बिरवे का संझा दिया
टिमटिमाता है। 
गमले की तुलसी तले 
माँ सावन सजायी है
मन्नतें गायी है। 
हाड़ हाड़ समाये हैं 
गठिया के कजरी बोल 
जब चलती है 
चटकते हैं।


(अशोक सलूजा)

अपने ज़माने का .....वो बचपन !!!

आज भी भूले-भुलाये न भूले  
वो बचपन
माँ का दुलारा था 
वो बचपन 
आँखों का तारा था
वो बचपन
नानी की गोदी में  गुज़ारा 
वो बचपन
शरारतों से भरपूर था 
वो बचपन
कितना मासूम था 
वो बचपन
कितना निर्दोष था 
वो बचपन
अपनों का प्यारा था 
वो बचपन 
बूढों का सहारा था 
वो बचपन 
कितना सुहाना था 
वो बचपन 
सब से न्यारा था 
वो बचपन ......
काश! कि लौटा लाऊं 
वो बचपन 
अपनी यादों का सहारा  
वो बचपन
मासूम सी मुस्कानों का 
वो बचपन
रोने से पहले की शक्ले बनाना का  
वो बचपन 
किस्से-कहानियाँ सुनाता 
वो बचपन   
सब कुछ भुला के याद आये
वो बचपन 
मेरे ज़माने का था अपना 
वो बचपन 
इस लिए इतना सुनहरा था
वो बचपन..... 

आज का ....आपका ये बचपन !!!

कैसा न्यारा है आज का
ये बचपन 
कहाँ से प्यारा है आज का 
ये बचपन 
कितनी सी देर का बेचारा है आज का 
ये बचपन
सिर्फ दो साल का है आज का 
ये बचपन 
इन्टरनेट का मारा आज का
ये बचपन 
रियाल्टी-शो का सहारा आज का
ये बचपन 
मोबाइल पर गेम का प्यारा आज का
ये बचपन 
फेसबुक पर चैट का मारा आज का 
ये बचपन 
अंधे सपनों को ढोता आज का
ये बचपन  
माँ-बाप की ईगो का सहारा आज का 

ये बचपन........

खो गया है मासूम बचपन,खो गई हैं दादा-दादी,नाना-नानी की मासूम कहानियाँ  .... पाने के क्रम में हमने बचपन का टिमटिमाता घर खो दिया  . उसे वापस लाना है, है न ?:)

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