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रविवार, 2 जून 2013

शो-मैन तू अमर रहे... ब्लॉग बुलेटिन

भारतीय सिनेमा को एक से बढ़कर नायाब फिल्में देने वाले पहले शोमैन बचपन के दिनों से अभिनेता बनना चाहते थे, उनके पिता पॄथ्वी राज कपूर को विश्वास ही नहीं था कि राज कपूर कोई अच्छा काम कर पाएंगे इसके लिए उन्होंने सहायक या क्लैपर ब्वाय जैसे छोटे काम में लगवा दिया था। लेकिन अपनी लगन और अपने जुझारुपन के कारण हिन्दुस्तान की फ़िल्म इंडस्ट्री नें अपना पहला शो-मैन देखा। पृथ्वीराज कपूर ने अपने पुत्र राज को केदार शर्मा की यूनिट में क्लैपर बॉय केरूप में काम करने की सलाह दी। फिल्म की शूटिंग के समय वह अकसर आइने के पास चले जाते थे और अपने बालो में कंघी करने लगते थे। कलैप देते समय इस कोशिश में रहते कि किसी तरह उनका भी चेहरा कैमरे के सामने आ जाये। एक बार फिल्म 'विष कन्या' की शूटिंग के दौरान राज कपूर का चेहरा कैमरे के सामने आ गया और हड़बडाहट में चरित्र अभिनेता की दाढी कलैप बोर्ड में उलझकर निकल गयी। बताया जाता है केदार शर्मा ने राज कपूर को अपने पास बुलाकर ज़ोर का थप्पड़ लगाया। हालांकि केदार शर्मा को इसका अफसोस रात भर रहा। अगले दिन उन्होंने अपनी नई फिल्म 'नील कमल' के लिए राज कपूर को साइन कर लिया। यह केदार शर्मा ही थे जिन्होनें राज कपूर मे छिपे कलाकार को ठीक समय पर पहचाना और उन्हे अपनी फ़िल्म में प्रमुख भूमिका के लिए लिया। राजकपूर फिल्मों मे अभिनय के साथ ही कुछ और भी करना चाहते थे। वर्ष 1948 में महज़ २४ वर्ष की अवस्था में आर.के.फिल्म्स की स्थापना कर 'आग' का निर्माण किया। राजकपूर सबसे कम उम्र के निर्माता और निर्देशक बनें और वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म 'आवारा', 'राज कपूर' के सिने करियर की अहम फिल्म साबित हुई। फिल्म की सफलता ने राज कपूर को अंतराष्ट्रीय ख्याति दिलाई। फिल्म का शीर्षक गीत 'आवारा हूं या गर्दिश में आसमान का तारा हूं' देश-विदेश में बहुत लोकप्रिय हुआ। 

(शो-मैन राज कपूर)

राजकपूर के सिने करियर में उनकी जोड़ी अभिनेत्री नरगिस के साथ काफी पसंद की गई। राज कपूर ने अपनी बनाई फिल्मों के जरिए कई छुपी हुई प्रतिभा को आगे बढ़ने का मौका दिया इनमें संगीतकार शंकर जयकिशन गीतकार हसरत जयपुरी, शैलेन्द्र और पाश्र्वगायक मुकेश जैसे बड़े नाम शामिल है। मुकेश की आवाज़ तो मानों राज साहब की अपनी आवाज़ बन गई। हर फ़िल्म के लिए मुकेश की आवाज़ और शंकर जयकिशन का संगीत। उन दिनों एक अजीब सी प्रतिस्पर्धा बन चली थी। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल राज साहब के साथ काम करना चाहते थे लेकिन शंकर जयकिशन के रहते उनका यह सपना सम्भव भी न था। बाद में उन्हे मौका मिला  और उन्होनें राज साहब के लिए कई फ़िल्मों को संगीतबद्ध किया। वर्ष 1971 में राजकपूर ने फिल्म 'मेरा नाम जोकर' का निर्माण किया, आज इस फ़िल्म को हम क्लासिक का दर्ज़ा देते हैं लेकिन यह फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह नकार दी गई थी। अपनी फिल्म 'मेरा नाम जोकर' की असफलता से राज कपूर को गहरा सदमा पहुंचा। उन्हें काफी आर्थिक क्षति भी हुई। उन्होंने निश्चय किया कि भविष्य में यदि वह फिल्म का निर्माण करेंगे तो मुख्य अभिनेता के रूप में काम नहीं करेंगे।  आरके के इस बैनर को बाबी के रूप में एक हिट मिली और ॠषि कपूर के रूप में एक नया नायक। राज कपूर को अपने सिने करियर में मान सम्मान खूब मिला। वर्ष 1971 में राज कपूर पदमभूषण पुरस्कार और वर्ष 1987 में हिंदी फिल्म जगत के सवोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किए गए। वर्ष 1985 में राज कपूर निर्देशित अंतिम फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली' प्रदर्शित हुई। 

राज साहब की फ़िल्में

1982 गोपीचन्द जासूस
1982 वकील बाबू
1981 नसीब
1980 अब्दुल्ला
1978 सत्यम शिवम सुन्दरम
1978 नौकरी
1977 चाँदी सोना
1976 ख़ान दोस्त
1975 धरम करम
1975 दो जासूस
1973 मेरा दोस्त मेरा धर्म
1971 कल आज और कल
1970 मेरा नाम जोकर
1968 सपनों का सौदागर
1967 एराउन्ड द वर्ल्ड
1967 दीवाना
1966 तीसरी कसम
1964 संगम
1964 दूल्हा दुल्हन
1963 दिल ही तो है
1963 एक दिल सौ अफ़साने
1962 आशिक
1961 नज़राना
1960 जिस देश में गंगा बहती है
1960 छलिया
1960 श्रीमान सत्यवादी
1959 अनाड़ी
1959 कन्हैया
1959 दो उस्ताद
1959 मैं नशे में हूँ
1959 चार दिल चार राहें
1958 परवरिश
1958 फिर सुबह होगी
1957 शारदा
1956 जागते रहो
1956 चोरी चोरी
1955 श्री ४२०
1954 बूट पॉलिश
1953 धुन
1953 आह
1953 पापी
1952 अनहोनी
1952 अंबर
1952 आशियाना
1952 बेवफ़ा
1951 आवारा
1950 सरगम
1950 भँवरा
1950 बावरे नैन
1950 प्यार
1950 दास्तान
1950 जान पहचान
1949 परिवर्तन
1949 बरसात
1949 सुनहरे दिन
1949 अंदाज़
1948 अमर प्रेम
1948 गोपीनाथ
1948 आग
1947 नीलकमल
1947 चित्तौड़ विजय
1947 दिल की रानी
1947 जेल यात्रा
1946 वाल्मीकि
1943 गौरी
1943 हमारी बात
1935 इन्कलाब

राज साहब का ज़िक्र हो और उनके संगीत की बात न हो तो फ़िर बात कैसे बनें... लीजिए यू-ट्यूब के सौजन्य से आनन्द लीजिए.. किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार... वाकई जीना इसी का नाम है।


पूरे ब्लाग जगत की ओर से राज साहब को उनकी पच्चीसवी पुण्यतिथि पर नमन। 

चलिए अब बुलेटिन को आगे बढाया जाए
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मित्रों आशा है आपको आज का बुलेटिन पसन्द आया होगा, आज के लिए इतना ही... कल तक के लिए देव बाबा को इज़ाजत दीजिए...

जय हिन्द
-देव

शनिवार, 1 जून 2013

वंडरफ़ुल दुध... पियो ग्लास फ़ुल दुध..:- ब्लॉग बुलेटिन

अंतराष्ट्रीय दुग्ध दिवस के दिन मित्रों आईए हिन्दुस्तान की श्वेत क्रांति की बात की जाए।  कैसे एक छोटा सा विचार को-ओपरेटिव डेरी आन्दोलन के रूप में आया और भारत दूध की कमी वाले देश से दुनिया के सबसे बडे दूध उत्पादक देश बन गया। इसमें दो लोगों को याद करना बहुत ज़रूरी होगा, एक वरगीस कुरियन और दूसरा शास्त्री जी। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री शास्त्रीजी नें हिन्दुस्तान को हरितक्रांति के रूप में एक बहुत बडा मंत्र दिया था । इसी क्रम में उन्होनें भारतीय डेरी विकास निगम को एक आन्दोलन बनाने के लिए वरगीस कुरियन को उसका अध्यक्ष बनाया। उसके बाद दुनियां नें विकासशील देशों के इतिहास के सबसे बडे को-ओपरेटिव आन्दोलन को देखा और यह जाना की यदि सार्थक रूप से कोई सम्मिलित प्रयास किया जाए तो चमत्कारिक परिणाम सम्भव है। 

अमुल, जिसे आप आज एक बडे ब्रांड के नाम से जानते हैं वह इन्ही की देन है। अमूल भारत का एक दुग्ध सहकारी आन्दोलन है यह गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन संघ लिमिटेड नाम की सहकारी संस्था के प्रबन्धन में चलता है। गुजरात के लगभग २६ लाख दुग्ध उत्पादक सहकारी दुग्ध विपणन संघ लिमिटेड के अंशधारी (मालिक) हैं। गुजरात के आणंद में स्थित यह किसी सहकारी आन्दोलन की दीर्घ अवधि में सफलता का एक श्रेष्ठ उदाहरण है। अमूल ने ही भारत में श्वेत क्रान्ति की नींव रखी जिससे भारत संसार का सर्वाधिक दुग्ध उत्पादक देश बन गया है। अमूल ने ग्रामीण विकास का एक सम्यक मॉडल प्रस्तुत किया है। अमूल (आणंद सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ), की स्थापना १४ दिसंबर, १९४६ मे एक डेयरी यानि दुग्ध उत्पाद के सहकारी आंदोलन के रूप में हुई थी। जो जल्द ही घर घर मे स्थापित एक ब्रांड बन गया जिसे गुजरात सहकारी दुग्ध वितरण संघ के द्वारा प्रचारित और प्रसारित किया गया। अमूल के प्रमुख उत्पाद हैं: दूध, दूध के पाउडर, मक्खन (बटर), घी, चीज, दही, चॉकलेट, श्रीखण्ड, आइस क्रीम, पनीर, गुलाब जामुन, न्यूट्रामूल आदि ।

आनन्द के इस माडल को देश भर में दोहराने के लिए शास्त्री जी नें वरगीस कुरियन को राष्ट्रीय डेयरी उत्पादन बोर्ड का संस्थापक अध्यक्ष बनाया। उसके बाद अपनें असमान्य विचारों के कारण कुरियन मिल्क मैन कहलाए।

(अमूल प्लांट)

(मिल्क मैन, वरघीस कुरियन)
आज हमारे देश में जितनें भी दूध उत्पादक हैं, लगभग सभी को-ओपरेटिव मूवमैंट का एक सफ़ल माडल चला रहे है। यदि इसी प्रकार का माडल अन्य क्षेत्रों में लगाया जाए तो फ़िर देश एक अलग ही राह पर बढ चलेगा। केवल इच्छा शक्ति चाहिए बस... 

पूरे ब्लाग जगत की ओर से इन सभी महापुरुषों को सलाम और सभी को विश्व दुग्ध दिवस की बधाई। चलते चलते मंथन फ़िल्म का यह गीत यू-ट्यूब के सौजन्य से... 



चलिए अब आज के बुलेटिन की ओर चलें

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तो मित्रों आज के लिए इतना ही, मिलते हैं कल एक नये अंक के साथ। तब तक के लिए देव बाबा को इज़ाजत दीजिए

जय हिन्द
देव

लेखागार