कल अचानक ही भाई
शिवम मिश्रा जी ने एक पोस्ट सरकाई ,
हम आपस में पोस्ट ठेलाई और पढम पढाई करते रहते हैं , जी ठीक उसी तरह जैसे बचपन में पकडम पकडाई होता था न , अब क्या करें दोनों ही ठहरे खबरीलाल , पोस्टों पर टहलते रहना हमारा प्रिय काम होता है । अब चूंकि बुलेटिन के रपोटर भी हैं दोनों इसलिए ये स्वाभाविक भी लगता है । और हम दोनों ही क्यों , बल्कि हम सब बहुत से साथी ब्लॉगर्स एक दूसरे को पोस्टों का संदर्भ , लिंक यदाकदा देते ही रहते हैं , मैं तो खूब सरकाता हूं एक से दो दो से चार तक यूं पहुंचने वाली पोस्टें । तो बात बुलेटिन की चल रही थी , हमें बडा आनंद आता है पोस्टों को पढने में । और अगर इस आनंद प्राप्ति का दूसरा लाभ ये हो कि अपने दोस्तों /मित्रों के लिए एक ही मंच पर कुछ खूबसूरत पोस्टों को एक साथ माला में पिरो कर दे दिया जाए तो हुआ डबल मुनाफ़ा । और अगर कोई दोस्त फ़िर उस कोशिश की हौसलाअफ़ज़ाई कुछ यूं करे तो , समझिए कि कसम से पुरनकी सिलेमा की शरमाती सकुचाती नायिका समान लजा से जाने वाले फ़ोटो को चस्पा कर भावानों को व्यक्त करने का मन हो जाता है । देखिए कि योगेंद्र पाल जी क्या कहते हैं ,
इसमें वो एक जगह पर लिखते हैं ,ब्लॉग
बुलेटिन की दूसरी विशेषता हैं, मेहमान रिपोर्टर जिनकी पोस्ट एक ठंडी हवा के
झोंके की तरह होती है, जिसमें एक अलग ही खुशबू होती है तथा पाठकों को एक
ताजगी दे कर जाती है| एक बार यह सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हो चुका है|
समय समय पर ब्लॉग बुलेटिन टीम ब्लॉग जगत की हस्तियों से उनके पसंद के
ब्लॉग तथा किसी खास विषय पर उनके विचार के बारे में अपने ब्लॉग पर लिखती
रहती है| जिससे पोस्टों में स्फूर्ति बनी रहती है, मेरे विचार में
यह एक अच्छा तरीका है बिना लेखक संख्या बढाए अपने पाठकों को कई प्रकार के
लेख देने की|
ब्लॉग बुलेटिन पर लेखों की श्रंखला उसका एक बेहतर प्रयोग है, जिसमे से यह प्रमुख हैं
- इस क्रम में सबसे पहली श्रंखला है "ब्लॉग की सैर"
जो कि रश्मि जी के द्वारा निकाली गयी| अब तक इस श्रंखला में 8 लेख
प्रकाशित हो चुके हैं, इस श्रंखला में रश्मि जी ने सिर्फ कविताओं को स्थान
दिया, यदि आप कविताओं के शौक़ीन हैं तो आपको ब्लॉग बुलेटिन की इस श्रंखला
को जरूर पढ़ना चाहिए|
- "यादों की खुरचनें" यह
दूसरी श्रंखला का नाम है और यह भी रश्मि प्रभा जी के द्वारा ही निकाली गयी
है, इसमें सिर्फ उन कड़ियों को शामिल किया जाता है जिसमें लेखक अथवा कवि
अपने बीते दिनों को याद करते हुए कुछ लिखता है| अभी तक इस श्रंखला में कुल 9
लेख लिखे जा चुके हैं, यदि आप भी अतीत में जाना चाहते हैं तो इस श्रंखला
की सभी कड़ियों को जरूर पढ़ें|
- सबसे बेहतरीन श्रंखला मुझे लगी और जिसका अब मैं बेसब्री से इंतज़ार भी कर रहा हूँ वह है "101 लिंक एक्सप्रेस"|
यह ब्लॉग जगत में ब्लॉग बुलेटिन के द्वारा किया गया एक अनूठा प्रयोग है
इसमें आपको मिलती है 101 अच्छे लिंकों की एक लंबी लिस्ट इस पोस्ट को पढ़ कर
ऐसा लगता है कि मन तृप्त हो गया अब और कुछ नहीं चाहिए| इस श्रंखला में अभी
तक 3 पोस्ट आयीं हैं और यह अजय कुमार झा जी के द्वारा निकाली गयी है|
क्या कहें , योगेंद्र भाई , आपकी सराहना , आपकी आलोचना सर माथे , उम्मीद करेंगे कि आपके सुझावों पर जल्दी ही काम किया जा सके । आपका आभार । और हां ,
भाई योगेंद्र पाल जी को हमारी टीम सहित पूरे ब्लॉग जगत की तरफ़ से हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं , आप गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने जा रहे हैं ,
चलिए बहुत हो लिए अपने मुंह मियां मिट्ठू , वर्न असलियत तो ये है कि अभी तो कायदे से पोस्ट पढनी भी नहीं आई है , लगे हैं चर्चाने । पोस्टों में प्रवीण पांडे जी की कोई पोस्ट जैसे ही हमारे मेल में आती है हम उस पर पहुंच जरूर जाते हैं , पढ भी जाते हैं सरसरी फ़रफ़री तौर पे , बातों को आ हमारे जैसे भुसकोल विद्यार्थियों के लिए तो जरूर ही कठिन बातों को कमाल की सरलता से कह जाते हैं , एकदम सिंपल सोबर ब्लॉग और वो पुराने जमाने की आर्ट सिनेमाई क्रेज़ लिए हुए पोस्टें ,
आज की पोस्ट में जनाब बचपन के सुभाषितों के बहाने जीवन में सहजता को सुंदर रूप में परिभाषित कर गए
"बस ऐसे ही विचार तब आये जब कबीर का यह दोहा पढ़ा,
सहज मिले सो दूध सम, मांगा मिले सो पानि
कह कबीर वह रक्त सम, जामें एंचातानि।
 |
| कोउ समझाये मन की भाषा |
आशय स्पष्टतम है, जो सहजता से प्राप्त हो वह दूध जैसा है, जिसके लिये किसी
से झुककर माँगना पड़े वह पानी के समान है और जिसके लिये इधर उधर की बुद्धि
लगानी पड़े और दन्द-फन्द करना पड़े वह रक्त के समान है। किसी घर में
संपत्ति संबंधी छोटी छोटी बातों पर जब झगड़ा होते देखता हूँ तो बस यही दोहा
मन ही मन बुदबुदाने की इच्छा होती है। भाईयों का रक्त बहते तक देखा है,
यदि न भी बहे तो भी संबंधों का रक्त तो निश्चय ही बह जाता है, संबंध सदा के
लिये दुर्बल और रोगग्रस्त हो जाता है।
बहुत लोग ऐसे हैं, जिन्हें छोटी छोटी बातों के लिये झगड़ा करना तो दूर,
किसी से कुछ माँगना भी नहीं सुहाता है। ऐसे दुग्धधवल व्यक्तित्वों से ही
विश्व की सज्जनता अनुप्राणित है। ईश्वर करे उन्हें उनके कर्मों से सब सहज
ही मिलता रहे। ईश्वर करे कि जो ऐसी आदर्श स्थिति में नहीं भी है, उन्हें भी
कम से कम वह रक्त तो दिखायी पड़े जो हमारे छलकर्मों से छलक आता है।
मनन कीजिये, मन स्वीकार करे तो भजन कीजिये, कबीर के साथ, 'सहज मिले तो....'"
पोस्ट अच्छी हो तो टिप्पणियां भी अपने आप अच्छी और बहुत अच्छी करते हैं पाठक , इस पोस्ट पर कमाल की टिप्पणियां हैं , मेरे टिप्पणी चर्चा वाले ब्लॉग के लिए लेकिन एक टिप्पणी तो आप अभी पढिए , गोदियाल जी कहते हैं ,
आज जहां हम अपनी साइट पर , खुद को बडा फ़न्ने खां एग्रीगेटर घोषित करके चुपचाप निकल लिए हैं , चुपचाप इसलिए कि किसी के भी वहां पहुंच कर टीपने का खतरा नहीं है , कम से कम पिछली पोस्टों के हिसाब से तो जरूर ही , वहीं ,
डॉ दिव्या श्रीवास्तव उर्फ़ ज़ील जी ने ब्लॉगर्स की दो कटेगरियों का निर्धारण करने हेतु एक सूचना जारी की है,
जहां पहुंच कर अपनी अपनी कैटगरी पर चिन्हासी मार देने में ही भलाई लग रही है मुझे तो । उधर दूसरी तरफ़ अनुराग जी ने
आभासी सम्बन्धऔर ब्लॉगिंग , को समझाते हुए कहा ,
"
 |
| मेरी नन्ही ट्विटर मित्र |
आपके तथाकथित मित्र फेसबुक या गूगल प्लस पर आपकी ‘फ्रैंड रिक्वैस्ट’ ठुकरा
कर, या अपने ब्लॉग पर आपकी टिप्पणियों को मॉडरेट करके या फिर इससे आगे जाकर
आपके विरुद्ध पोस्ट पर पोस्ट लिखते हुए आपकी टिप्पणियाँ प्रकाशित न करके
या फिर टिप्पणी का विकल्प ही पूर्णतया बन्द करके आपको चोट पहुँचाते जा रहे
हैं तो आपको खराब लगना स्वाभाविक ही है। आपकी फेसबुक वाल या गूगल प्लस पर
कोई आभासी साथी आकर अपना लिंक चिपका जाता है। आप क्लिक करते हैं तो पता
लगता है कि पोस्ट तो केवल आमंत्रित पाठकों के लिये थी, लिंक तो आपको चिढाने
के लिये भेजे जा रहे थे। किसी हास्यकवि ने विवाह के आमंत्रण पत्र पर अक्सर
लिखे जाने वाले दोहे की पैरोडी करते हुए कहा था:
भेज रहे हैं येह निमंत्रण, प्रियवर तुम्हें दिखाने को
हे मानस के राजकंस तुम आ मत जाना खाने को
ताज़े अध्ययन का लब्बो-लुआब यह है कि आभासी जगत में होने वाला अपमान भी
उतना ही दर्दनाक होता है जितना वास्तविक जीवन में होने वाला अपमान। "
और टिप्पणियों के तो कहने ही क्या , देखिए ,
कल
वंदना जी की एक पोस्ट आई , नहीं कहना चाहिए कि एक कविता आई , जिसमें उन्होंने स्तन कैंसर को विषय बना कर अपनी बात कही थी , इस विचार पर प्रतिक्रिया स्वरूप
रचना जी ने नारी ब्लॉग पर ये पोस्ट लगाई । कमाल की बात ये है कि दोनों ही पोस्टों पर दिग्गज ब्लॉगर्स के बीच विचार विमर्श और बहस का वो दौर चल रहा है जो विरले ही नसीब हो रहा है अब ब्लॉग पोस्टों को । प्रश्न बहुत ही गंभीर है इसलिए जाइए और दोनों पोस्टों पर अपनी राय रखिए । जरा टिप्पणियों की बानगी देखिए ,
वंदना जी की पोस्ट पर : -
इस बहस से आगे निकले तो देखा कि डॉ, अरविंद मिश्र एक ठो अपील दागे हैं आज अपना पोस्ट में
एक आर्त अपील-लिव एंड लेट लिव , की , और कुछ यूं कहा कि ,
"
भ्रष्टाचार
पर मैंने कभी नहीं लिखा .बेमन टिप्पणियाँ जरुर की हैं इस विषय पर ब्लॉग
पोस्टों पर . जल में रहकर मगर से बैर या आ बैल मुझे मार सरीखी बात ही नहीं
है यह एक सरकारी मुलाजिम के लिए बल्कि उससे भी बढ़कर कि उसे इस लाईलाज
महारोग का कोई हल नहीं दीखता ..यह मनुष्य के आचरण,उसके संस्कार अर्थात लालन
पालन, घर परिवार और दृष्टि-विवेक से जुड़ा मसला है. केवल सरकारी मुलाजिम
ही नहीं भारत में भ्रष्टाचार घर घर तक पहुँच कर हमारे समाज और राष्ट्र के
लिए एक बड़ी समस्या बन चुका है. कभी कभी तो लगता है यह जैसे कोई आनुवंशिक
बीमारी सा है जो पीढी दर पीढी चलता जा रहा है मगर इसके दीगर भी उदाहरण
अक्सर मिलते रहते हैं .दो सगे भाईयों में एक बड़ा ईमानदार और दूसरा
महाभ्रष्ट .एक ही मां बाप परिवार, संस्कार मगर फिर भी बड़ा अंतर . यहाँ
कुदरत के विभिन्नता का सिद्धांत समझ आता है :) .कई
ज्ञानी इस महारोग का औचित्य तक सिद्ध करते दिखाई देते हैं .दाल में नमक भर
तो चलता है भाई? पता नहीं नैतिकता की किस तराजू से भ्रष्टाचार का माशा
तोला ऐसे लोग तौलते हैं .फिर एक जुमला यह भी अक्सर सुनाने को मिल जाता है
कि अरे मन से और मूलतः तो भ्रष्ट सभी हैं -जिसे मौके नहीं मिलते वे खुद को
हरिश्चन्द्र दिखाने पर तुल जाते हैं -जाहिर है यह एक भ्रष्टाचारी का उद्धत
वक्तव्य है . "
टीप भी देखते ही चलिए न ,
और ,
प्
रशांत प्रियदर्शी यानी हमारा पीडी , हमारे उन बारात के निमंत्रण पत्रों की सूची में लंबर वन पर है , जिनके बियाह के बहाने , पटना जाने घूमने का मौका मिल सकेगा । पिछले दिनों गैंग्स ऑफ़ वासेपुरमय हो गया था , दीवार से चित्रहार तक सिर्फ़ वासेपुर ही वासेपुर ।
देख के आने के बाद फ़िल्म समीक्षा लिख मारा है , बकिए ऊ जो कहे , हम लोग तो समीक्षा ही कहेंगे , देखिए ,
"
हाथ के बुने हुए
हाफ स्वेटर पहन कर पहलवान दोनों हाथो में मुर्गा टांग कर गली से जाते हुए
दिखाना, या फिर मीट की नली वाली हड्डी सूंss कि आवाज के साथ चूसना, या फिर
गोल गले के लोटे से स्नान करते हुए दिखाना, या फिर आइसक्रीम के लिए बच्चों
कि शैतानी, या फिर सरदार खान का गिरिडीह के बदले
गिरडी..गिरडी..गिरडी..गिरडी की आवाज लगा कर सवारी बटोरना. रात का खाना चीनी
मिट्टी के प्लेट में परोसना क्योंकि मुसलमान घर आया है.. जाने कितनी ही
हत्या सरदार खान कर चुका हो मगर जवान बेटे को लगी छर्रे से लगभग पागल सा हो
उठना. फ्रिज के आने के बाद सब बच्चों का उचक-उचक कर उसे देखना और गृहणी का
यह देखना की उसमें कोई खाली बर्तन तो नहीं रखा हुआ है!
इसे देखने से पहले मैं कोई भी रिव्यू नहीं पढ़ रहा था. किसी तरह का
पूर्वाग्रह लेकर नहीं देखना चाहता था. और मुझे सबसे अधिक अचंभित "जियs हे
बिहार के लाला" गीत ने किया. जिस गीत को मैं फ़िल्म के शुरुवात में देखने
कि उम्मीद कर रहा था उसे जिंदगी कि खुशी में नहीं, मृत्यु के जश्न के तौर
पर लाया गया!
हो सकता है कि अनुराग जी ने कई लोगों को निराश किया होगा इस सिनेमा में
गाली-गोली दिखा कर, मगर हर चीज को इतनी बारीकी से उन्होंने फिल्माया है
जिसको कोई भी सिने छात्र देखना-सीखना चाहेगा. थैंक्स अनुराग जी को, हमें
ऐसी सिनेमा देने के लिए!! "
आप जर इन मनुहारी चित्रों को देखिए और देख कर बताइए कि
क्या इन्हें देख कर कोई आत्मा बेचैन रह सकती है भला ,
चलिए अब देखते हैं कि अजित वडनेकर भाई के डिक्शनरी में कोन सा लबका वर्ड आया है , अरिस्स ये कहा वे तो आज
गुण्डे की नेता से रिशेतादारी के बारे में पूछ बता रहे हैं ,हमें लगता है कि ये इत्तेफ़ाक ही होगा कि इसी भी अबू हमजा नामका एक ठो खूनी गुंडा का किसी मंतरी जी के गेस्ट हाउस में रुकने की खबर आई ,
"
शब्दों का सफ़र में ऐसे अनेक उदारहरण मिल
जाएँगे जैसे ऐहदी, नौकर, चाकर, पाखण्डी, गुरु आदि। तथाकथित नेता इस बात से
नाराज़ रहते हैं कि उन्हें गुण्डा कहा जाने लगा है । अब
उन्हें कौन समझाए कि नेता वह है जो किसी समूह को राह दिखाए, अगुवाई करे ।
नेता शब्द की अभिव्यक्ति वाले न जाने कितने शब्द हैं जैसे-नायक, प्रमुख,
प्रधान, सरदार, आक़ा, साहिब, गुरु वगैरह वगैरह । अब गुण्डों का सरदार भी
नायक ही होता है । अब अगर गुण्डा शब्द के मूल में ही प्रधान और नेता जैसे भाव हों तो उसमें बुरा मानने की क्या बात है ! और बुरा ही मानना है तो खुद को नेता कहलवाना भी बंद कर दें क्योंकि नेता की अर्थवत्ता ने भी नकारात्मक रूप अपना लिया है । जब कोई व्यक्ति ज्यादा दंद-फद दिखाता है उसे नेता कहते हैं । नेतागीरी शब्द पूरी तरह से नकारात्मक है जिसका अर्थ है निजी स्वार्थ के लिए लोगों को बरगलाना । "
ई नय मानेंगे जब तक कि इनको संसद से विशेषाधिकार समिति का नोटिस न आ जाए , ओइसे गुंडा महासभा का भी नोटिस मिलने की पूरी संभावना है ।
जिन्हें कविताई में हाथ आजमाने का पूरा मन है उनके लिए एक खुशखबरी है , यहां संजीव सारथि जी ,
शब्दों की चाक पर -04
लेकर आए हैं , और बता रहे हैं कि ,
"
1. कार्यक्रम की क्रिएटिव हेड रश्मि प्रभा के संचालन में शब्दों का एक
दिलचस्प खेल खेला जायेगा. इसमें कवियों को कोई एक थीम शब्द या चित्र दिया
जायेगा जिस पर उन्हें कविता रचनी होगी...ये सिलसिला सोमवार सुबह से शुरू
होगा और गुरूवार शाम तक चलेगा, जो भी कवि इसमें हिस्सा लेना चाहें वो रश्मि
जी से संपर्क कर उनके फेसबुक ग्रुप में जुड सकते हैं, रश्मि जी का
प्रोफाईल यहाँ है.
2. सोमवार से गुरूवार तक आई कविताओं को संकलित कर हमारे पोडकास्ट टीम के
हेड पिट्सबर्ग से अनुराग शर्मा जी अपने साथी पोडकास्टरों के साथ इन
कविताओं में अपनी आवाज़ भरेंगें. और अपने दिलचस्प अंदाज़ में इसे पेश
करेगें.
3. हर मंगलवार सुबह ९ से १० के बीच हम इसे अपलोड करेंगें आपके इस प्रिय
जाल स्थल पर. अब शुरू होता है कार्यक्रम का दूसरा चरण. मंगलवार को इस
पोडकास्ट के प्रसारण के तुरंत बाद से हमारे प्रिय श्रोता सुनी हुई कविताओं
में से अपनी पसंद की कविता को वोट दे सकेंगें. सिर्फ कवियों का नाम न लिखें
बल्कि ये भी बताएं कि अमुख कविता आपको क्यों सबसे बेहतर लगी. आपके वोट और
हमारी टीम का निर्णय मिलकर फैसला करेंगें इस बात का कि कौन है हमारे सप्ताह
का सरताज कवि. "
चिट्ठाचर्चा हमेशा से ही पाठकों को आकर्षित करती रही है , इसका एक अपन अलग अंदाज़ रहा है । आज इसमें अनूप जी ने , भाई अजित वडनेकर जी की एक लाइव वीडियो दिखा कर बता दिया कि
"हुनर यहां और भी हैं दिखाने को , वो तो वो छुपाए बैठे हैं ,
यहां सुनने को बेताब हैं गीत उनके , वहां वो शर्माए बैठे हैं "इस महफ़िल में जो आखिरी शेर उन्होंने खुद का लिखा हुआ गाया है ,
"
मुद्दतों से नींद न मिली, ख्वाब बेपनाह हो गए ,
जब से हम तबाह हो गए , तुम जहांपनाह हो गए ....."
चलिए अब कुछ पोस्टों का रैपिड फ़ायर राउंड हो जाए
शराबी खरगोश: उफ़्फ़ , तो खरगोश भी बेवडे हो गए
आओ बारिश ...आओ न : अब इत्ता तो तडपाओ न
मुझे क्षमा करना : आपकी भलमनसाहत है जी
धरती तो पूरी लूट खाई हरामखोरों , जाकर गगन देखो : कोई टिरिंग भिरिंग नहीं , जाकर अभी फ़ौरन देखो
घर-बाहर :आते जाते रहना चाहिए
आंखों से नींद बहे रहे : क्या उम्दा बात कहे रे
हाल सेरोविट्ज़ : किताबें देना : हमें भी देना , जब पढ लेना
श्रीनगर के बाग बगीचे -चश्मे शाही : पोस्ट लूट रही वाहवाही
नोट कोई नहीं जला सकता : अजी , जला , हम कहते हैं कोई नहीं दिला सकता
चन्द्रमा की हेयरपिन : आयं , मिस चन्द्रमा भी सीरीयल देखने लगीं शायद , हेयरपिन ...उन्हें भी
जिंदा होने का प्रमाण : बर्थ सर्टिफ़िकेट लाइए श्रीमान
हर युग के प्रारब्ध में : दम है हर शब्द में
इन दिनों रहता है डिहाड्रेशन का खतरा : हमरी बॉडी में हाय कितना रे लफ़डा
बेडनी नाचती है सारी रात : वाह वात बात में क्या खूब कह दी बात
परायों के घर : अपनों सा कहां लगता है
कविता में आज आपके लिए हम अपने फ़ेसबुक मित्र
नवीन कुमार चौरसिया जी की एक कविता को सहेज़ कर लाए हैं देखिए ,
उम्र का एक ऐसा पड़ाव जहाँ पहुंचकर इंसान एक बार पीछे मुड़कर
देखता है और सारी ज़िन्दगी के जद्दोजहद पर नज़र दौड़ता है और पाता है की सब
कुछ करने के बाद भी मै अपने आखरी पड़ाव में आज असुरक्षित हूँ...तब सोंचता
है....
शेष समय की सीमा पर घबराता - पछताता।
शेष समय की सीमा पर घबराता - पछताता।
चाह है अब भी उड़ जाने की,
साँस नहीं पर भर पाता,
है जान नहीं अब पंखों में,
अभिमान नहीं क्यों मर पाता,
रुका नहीं कभी जीवन में,
झुका नहीं कभी जीवन में,
हाथ नहीं कभी फैलाया,
जब चाहा जिस मंजिल को ,
खुद ही मैंने जय लाया,
इस स्वाभिमान को कैसे समझाता।
शेष समय की सीमा पर घबराता - पछताता ।।
जीवन तो है चक्र समय का,
चलता चक्र बदलता जीवन,
कई रंगों में ढलता जीवन,
खुद को ढालूँ चक्र समय -संग,
या बन वक्र विरोधी राग विरह के,
मन ही मन में गाऊं ;
कोई ये दुविधा सुलझाता ।
शेष समय की सीमा पर घबराता - पछताता ।।
बचपन और जवानी घिस गई,
तिल-तिल जोड़ ख्वाईशें पिस गई,
सब को खुश कर खुशियाँ पाया,
हाथ थाम कर राह दिखाया,
न उम्मीद की कोई, न सपना देखा,
बस अपनों को अपना देखा,
आज हुआ है रूप ये कैसा ,
सारी उम्र न देखा ऐसा ,
राही मंजिल को छूते ही,
भूल गए उस अंगुली को,
थामकर जिसको पहुंचे मंजिल,
बोझ कहते हैं उस साहिल को ।
गिद्धों की सी आँख पड़ी है,
मरने के पहले ही सर पे,
क्यों इंसानों- सा दीखते हैं ये,
जो पाल लिया मैंने इसे घर पे।
कैसी बुद्धि की भ्रष्ट, व्यथा है,
इस उम्र की मेरी करुण कथा है,
क्यों रोऊँ , चिल्लाऊं मै,
कैसे हंसू और गाऊं मैं,
हर पल , छल कर
छिल दिया है छाती,
क्यों विषाद ये मौन दबाऊं मैं।
गर मशाल न हो मेरे हांथों में,
कैसे होगी रक्षा हमारी,
जीवन की शाम ढलने को आयी,
इस जंगल में हम दो नर-नारी;
अब सोंचा था जीवन जीने को,
कर्तव्य मुक्त निःश्वासे पिने को,
ये आश भी रह गई अधूरी,
ले पलकों पे मोती की ढेरी,
ये दर्द किसे मै दिखलाता, कहो कहाँ इसे दफनाता ।
शेष समय की सीमा पर घबराता - पछताता ।।
ये शान संपत्ति विरासत तो ,
गर्व, गुमान और गद्दी - सा -
चल , चंचल और निष्ठुर है,
आज किसी की सेवा में ,
कल किसी और की हस्ती है,
क्या मै मोह से कट जाता,
छोड़ लगाम सारथि से हट जाता,
बैठ किनारे देके इशारे -
क्या कृष्ण-सा,कर्म -फल का जीवन सत्य बताता,
या रुपये की जगह इंसान कमाता,
जो रुपयों से कोसों ऊपर आता,
और गाँधी की तरह "हे राम " बोलकर,
हजारों हृदयों में छा (बस) जाता ।
शेष समय की सीमा पर घबराता - पछताता ।।
और एक कार्टून देखिए
अच्छा जी , तो अब मुझे आज्ञा दीजीए । मैं चलता हूं , अपना ख्याल रखिए और पढते लिखते रहिए ।