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सोमवार, 12 दिसंबर 2016

2016 अवलोकन माह नए वर्ष के स्वागत में - 28




हिन्दी हमारी मातृभाषा है, शुद्धिकरण मन्त्र की तरह हमसब इसका जाप करते हैं, विशेषकर उस

 दिन जब विश्व हिन्दी दिवस होता है !

विशेष दिन इसलिए बना, ताकि उस दिन तो आप व्यस्तता से (पता नहीं क्यूँ इतना व्यस्त) समय निकालकर - इस बात को महत्वपूर्ण बनायें,इस रिश्ते को अपना वक़्त दें !
अन्यथा प्रेम हो, स्त्री हो, माँ हो, दोस्त हो  .... अपनी मातृभाषा हिन्दी हो, उसके साथ तो हम हैं, हमें रहना ही चाहिए !
खैर, अन्य दिनों की बात अभी रहने दें, हिन्दी पर आएँ और  जी के पिताजी  --प्रफुलचन्द्र ओझा 'मुक्त' जी की इस रचना को समय दीजिये - 


मुक्ताकाश....: हिन्दी पर सवार अँगरेज़ी...




[पिताजी की एक अप्रकाशित पुस्तक है--'सिर धुनि गिरा लागि पछितानी'। यह पुस्तक 'साहित्य और समय' विषयक मुक्त-चिन्तनों का संग्रह है। इन दिनों मैं उसका प्रूफ पढ़ रहा हूँ। एक लेख पर ठहर गया हूँ। आनन्ददायी आलेख है, पुराना है-- ११.५.१९७९ का, लेकिन आज की दशा पर करारी चोट करता है। लेख में उठाया गया प्रश्न तब भी प्रासंगिक था, आज कुछ ज्यादा ही हो गया है। नयी दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले दैनिक पत्र 'नवभारत टाइम्स' में छपा था। पठनीय है, इसीलिए आपके सामने भी रखने का मन हो आया है। --आनन्द]


अँगरेज़ी बड़ी अच्छी भाषा है। वह बड़ी समृद्ध है। उसमें बड़ा ऊँचा साहित्य है। वह हमारे पुराने मालिकों की भाषा है। हम कृतघ्न नहीं हैं। अपने गए-गुज़रे मालिकों की भाषा से इसीलिए हम पिछले सत्ताइस वर्षों से चिपके हुए हैं। अँगरेज़ी भले ही हमसे अपना दामन छुड़ाना चाहती हो, हम उसे किसी तरह नहीं छोड़ना चाहते। आखिर दुनिया को पता कैसे चलेगा कि हम दो सौ वर्षों तक अँगरेजों के गुलाम रह चुके हैं? अतीत को भुला देना, अतीत से अपने को काट लेना, क्या अपनी नींव को कमज़ोर बनाना नहीं है ?
अँगरेजों ने हमें सिर्फ गुलामी नहीं दी। उन्होंने वह सारी तड़क-भड़क भी दी, जिसे हम आज अपनी आँखों के सामने देखते हैं। आराम-आसाइश के ये तमाम साधन, यह दोगली सभ्यता, यह नयी संस्कृति--यह सब तो हमें अँगरेजों ने ही दिया है और फिर उन्होंने हमें वह भाषा भी दी है, जो आज दुनिया के कई देशों में बोली-पढ़ी-लिखी जाती है। अगर हमने उस भाषा को तरजीह दी है तो ज़ाहिर है, हम अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की बराबरी में आ खड़े हुए हैं।
मुश्किल यह है कि इसके बावजूद हम अपनी भाषा को भुला नहीं पाते। अगर किसी तरह ऐसा हो सकता कि रातों-रात हिन्दुस्तान की तमाम भाषाएँ ख़त्म हो जातीं और सारा देश अँगरेज़ी में ही हँसता, रोता, गाता, सोचता और लिखता-बोलता तो कितनी अच्छी बात होती ! लेकिन ऐसा शायद होना नहीं है। सत्ताइस वर्षों में नहीं हुआ तो अब क्या उम्मीद की जा सकती है ?
लेकिन कोई बात नहीं। हिन्दी है तो हुआ करे, हमने उसके सीने पर अँगरेज़ी को सवार कर रख है। हम हिन्दी या संस्कृत शब्दों को रोमन अक्षरों में लिखकर पढ़ते हैं। इससे उसका उच्चारण अँगरेज़ी ढंग का बन जाता है। फिलहाल हमें इतने से ही संतोष करना पड़ रहा है।
आजकल 'आर्यभट्ट' की बड़ी शोहरत है। पुराने ज़माने में इस नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ और खगोलशास्त्री हमारे यहां हो गए हैं। भारत ने जब अपना पहला उपग्रह तैयार किया तो स्वभावतः उसका नाम 'आर्यभट्ट' रखा। अब चूँकि सरकारी कामकाज की भाषा अँगरेज़ी है, इसलिए उसे लिखा गया रोमन अक्षरों में 'ARYABHATA' । आज के ज्यादातर लोगों ने तो शायद रोमन लिपि में लिखे इस नाम को पहली बार ही पढ़ा-सुना होगा, इसलिए अखबारों यह नाम 'आर्यभट' या 'आर्यभटा' के रूप में चल निकला। जो लोग अँगरेज़ी अखबार ही पढ़ते हैं, उन्होंने अगर इसे 'अर्यभट' या 'आर्यभाटा' भी पढ़ा हो तो क्या अचरज ?
अभी उस दिन बच्चे कोई रेडियो प्रोग्राम सुन रहे थे। अचानक मेरे कान में एक शब्द पड़ा--'जटाका कथाएं'। मैं चौकन्ना हो गया। लिखते-पढ़ते पचास साल का अरसा गुज़र गया, 'जटाका' शब्द मेरे लिए अनजाना था। वक्ता रेडियो के ही कोई कारीगर थे। जब उन्होंने बार-बार 'जटाका कथाओं' का उल्लेख किया तो मुझे लगा कि हो-न-हो, ये जातक कथाओं की बात कर रहे हैं। बेचारे ने अँगरेज़ी में कहीं 'JATAKA' पढ़ लिया होगा और वे 'जटाका' उच्चारण ले उड़े। उन्हें दोष भी कैसे दिया जा सकता है ? आप खुद चाहें तो रोमन में लिखे इस शब्द को 'जटक', 'जटाका', या 'जाटाका' पढ़ लें, कोई आपका क्या करेगा ?
मुझे एक पुरानी बात याद आ रही है। पटना रेडियो के ग्रामीण प्रोग्राम में एक स्थायी कार्यक्रम का शीर्षक था--'धान से धन'। ज़ाहिर है कि प्रोग्राम रोमन में टाइप होता था; क्योंकि उसे मीटिंग में पढ़कर सुनानेवाले कभी बंगाली होते, कभी दक्षिण भारतीय और कभी पंजाबी। अब वे बेचारे 'DHAN SE DHAN' को 'धन से धन', 'धान से धान', 'धन से धान' और 'धान से धन' पढ़ते थे, तो इसमें उनका क्या कसूर था?

लेकिन 'आर्यभट' या 'जटाका' कोई एकलौते उदाहरण नहीं हैं। हिंदी के बहुसंख्यक पत्रों, पोथियों और बोलचाल में हिन्दी के सीने पर सवार अँगरेज़ी का यह अपरूप आप देख सकते हैं। सारी दुनिया जानती है कि विश्व-कवि रवींद्रनाथ ठाकुर 'टैगोर' हो गए। रोमन लिपि ने जब 'ठाकुर' को चबाकर 'टैगोर' उगला, तो विश्व-कवि स्वयं अपने को 'टैगोर' लिखने लगे थे।
लेकिन यह सब चाहे जो भी हो, अँगरेज़ी बड़ी अच्छी भाषा है, बड़ी समृद्ध है, उसमें ऊँचे दर्ज़े का साहित्य है, उसमें अभिव्यक्ति की जो ताकत है, उसका जवाब नहीं है। अपनी गुलामी की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए हमें अँगरेज़ी को हिन्दी के सीने पर सवार रखना ही पड़ेगा। हमारे देश में बड़े-बड़े दिमागवालों का यही ख़याल है। यह ख़याल ग़लत कैसे हो सकता है।

2 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुन्दर ।

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत सुन्दर बुलेटिन प्रस्तुति ..

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