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मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

2016 अवलोकन माह नए वर्ष के स्वागत में - 22




घूमते घूमते, ढूँढते ढूँढते एक जगह ठहरी

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2016 के पन्ने खड़खड़ाने लगे, बहुत कुछ पढ़ती गई और उसी क्रम में सत्य गले में अटका, मन में चुभा,आँखों में नम हुआ  ... 
सभी पढ़नेवालों को याद करने लगी, बुलेटिन ने कहा - "सोच क्या रही हो ? मैं हूँ न माध्यम"  ... 

2016 का एक ख़ास पन्ना 

“अरे सब सामान ले लिया क्या?

बस में किसी का कुछ पीछे रह तो नहीं गया?

“जी सर, सब ले लिया।” स्कूल ट्रिप से वापिस आये सब बच्चे एक साथ चिल्लाये। और बस से उतरकर घर की तरफ दौड़ गए।

“सर, फिर भी बस में देख लेना।”

हेडमास्टर का हुकुम होते ही सर वापिस बस में गए। बस में नजर घुमाते ही पता चला बहुत कुछ रह गया है पीछे। वेफर्स, चॉकलेट के रैपर्स और कोल्ड ड्रिंक पानी की खाली बोतले पड़ी थी । जब तक ये भरे थे, तब तक ये अपने थे। खाली होते ही ये अपने नहीं रहे। जितना हो सके, सर ने कैरी बैग में भर दिया और बस से उतर ने लगे।

“कुछ रह तो नहीं गया पीछे?” हेडमास्टर के फिर से सवाल पूछने पर सर ने हँसके नहीं का इशारा किया।

पर अब सर का मन “कुछ पीछे तो नहीं रह गया?” इस सवाल के इर्द गिर्द घूमने लगा। जिंदगी के हर मोड़पर अलग अलग रूप में यही सवाल परेशान करता है। इस सवाल की व्याप्ती इतनी बड़ी होगी ये सर को अभी पता चला…

बचपन गुजरते गुजरते कुछ खेल खेलना पीछे तो नहीं रह गया?
जवानी में किसी को चाहा पर जताने की हिम्मत नहीं हुई…कुछ पीछे तो नहीं रह गया?
जिंदगी के सफ़र में चलते चलते हर मुकाम पर यही सवाल परेशान करता रहा….कुछ पीछे तो नहीं रह गया?

3 महीने के बच्चे को आया के पास रखकर जॉब पर जाने वाली माँ को आया ने पूछा…कुछ पीछे तो नहीं रह गया? पर्स, चाबी सब ले लिया ना? अब वो कैसे हाँ कहे? पैसे के पीछे भागते भागते…सब कुछ पाने की ख्वाईश में वो सब कुछ तो पीछे छोड़कर जा रही है…
शादी में दुल्हन को बिदा करते ही

शादी का हॉल खाली करते हुए दुल्हन की बुआ ने पूछा…”भैया, कुछ पीछे तो नहीं रह गया ना? चेक करो ठीक से।.. पिता चेक करने गया तो दुल्हन के रूम में कुछ फूल सूखे पड़े थे। सब कुछ तो पीछे रह गया…25 साल जो नाम लेकर जिसको आवाज देता था लाड से…वो नाम पीछे रह गया और उस नाम के आगे गर्व से जो नाम लगाता था वो नाम भी पीछे रह गया अब…
“भैया, देखा? कुछ पीछे तो नहीं रह गया?” बुआ के इस सवाल पर आँखों में आये आंसू छुपाते पिता जुबाँ से तो नहीं बोला….पर दिल में एक ही आवाज थी…सब कुछ तो पीछे रह गया…
“कुछ पीछे तो नहीं रह गया?” शमशान से लौटते वक्त पुजारी ने पूछा।

नहीं कहते हुए वो आगे बढ़ा…पर नजर फेर ली एक बार पीछे देखने के लिए….माँ की चिता की सुलगती आग देखकर मन भर आया । भागते हुए गया और थोडी सी राख चिमटी में लेकर लौटा ।
दोस्त ने पूछा…कुछ रह गया था क्या?

भरी आँखों से बोला…नहीं कुछ भी नहीं रहा अब…और जो रह गया वो अब कभी वापिस नहीं आ सकता

2 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुन्दर।

Kavita Rawat ने कहा…

बढ़िया चयन ..

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