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शुक्रवार, 6 मई 2016

तुम भी तो आ सकते थे ...






तुम्हें क्या पता !!!
जीवन की आपाधापी में 
मैंने कहाँ कहाँ तुम्हारा नाम लिया !
जिस तिस से 
वक़्त-बेवक़्त 
तुम्हारी बातें की  ... 
तुम बस यही सोचते रहे 
कि शून्य में तुमने मुझे पुकारा 
और मैं नहीं आई !
सोचा ही नहीं 
कि तुम भी तो आ सकते थे  ... 


शब्द जब गूंगे हो जाए
सांस कुछ कहने लगे
चाँद की ओटक से निकल
काली रात सरकने लगे
गुनगुनाती हवा नए साज़ छेड़े
जाने पहचाने हों कुछ रास्ते टेढ़े-मेढ़े
तू चली आना पहलू में मेरे
रात रानी की खुशबू का आँचल ओढ़े
तेरी नर्म हथेली अपने हाथों में लेकर
मैं अपना मुंह छुपा लूँगा
तेरे हाथ की रेखाओं में तेरा भविष्य बन के
हमेशा के लिए बस जाऊँगा ...

मछलियों के लिए महाभारत
*********************
वे एकमत नहीं थे
सम्भावित तूफान को लेकर 
उनकी नावें और जाल
पड़े थे किनारे पर
पेट में भूख तड़प रही थी
किसी मछली की मानिंद
वे निराश थे
पाँच पाण्डवों की तरह
धर्मराज युधिष्ठिर को लगता था
बादलों से भरता जा रहा है आसमान
चुप है विस्मित समुद्र
और बंद-सी हो गई है हवा
आने ही वाला है तूफान
कौरव डटे थे समुद्र में
ताल ठोक कर
अपनी पुरानी नावों में
मछलियाँ बटोरते हुए;
उनका अनुभव था
मौसम की भविष्यवाणियाँ
अक्सर निकलती हैं गलत
हमारे देश में
युद्ध अभी नहीं हुआ था धर्म युद्ध
आस पास नहीं थे कृष्ण
और द्रौपदी तो दूर दूर तक नहीं थी
मछुआरे आश्वस्त थे
बिना बताए ही आएगा तूफान
सही नहीं निकलेंगी
मौसम विभाग की भविष्यवाणियाँ
वे यह भी जानते हैं
हर जगह की तरह ही
यहाँ समुद्र के मुहाने पर भी
हो कर रहेगा महाभारत
मछलियों के लिए;
जिन्हें कब से रिझा रहे हैं दुर्योधन!

मैं' का पलाशी अरण्य
इसके अहम आकर्षण में पैर उठे
तो रक्तिम आभा स्वर्ण अर्गला बन जाती है
पर विहार की कामना हो
तो रंगरेजी वन के माया रंगों से 
काया तो काया
रूह तक रंग जाती है
लेकिन मन का राजहठ !
वह विचरता ही नहीं
बस उलझना चाहता है
अपने मन को बैसाखी बना
चलता रहता है मेरा 'मैं'
कभी स्तब्ध- कभी निःशब्द मुखर
कभी चीत्कार करता,कभी शून्य में विलीन होता
हर दिन एक नया 'मैं'
'मैं' से लड़कर
मेरे आगे खड़ा रहता है
और मेरे साथ समूह की यात्रा करता है
'मैं' के नए विम्ब-प्रतिविम्ब के लिए …….
हम के हुजूम में सब 'मैं' होते हैं
हम कोई आविष्कार नहीं करता
हाँ वह 'मैं' को अन्धकार दे सकता है
'मैं' के कंधे पर हाथ रख सकता है
'मैं' की आलोचना कर सकता है ..............
मकसद 'मैं' का होता है
'मैं' न चाहे तो उसे चलाया नहीं जा सकता
विवशता 'मैं' की
विरोध 'मैं' का
व्यूह 'मैं' का
चीत्कार 'मैं' का
'मैं' की हार-जीत 'मैं' से है
हर कारण 'मैं' है
न चाहते हुए भी 'मैं' हँसता है
तो वह उस 'मैं' के अपने निजी कारण हैं
यदि शिकायत है तो 'मैं' से करो
क्योंकि 'मैं' ही 'मैं' को विवश करता है
कारण 'मैं' ही पैदा करता है
पलायन 'मैं' करता है
निवारण भी 'मैं' का होता है
..................................................आत्मा 'मैं', परमात्मा 'मैं' - बाकी सब झूठ !

मेरी संवेदना : सपाट प्रेम कविताएँ











5 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

शून्य अगर नहीं
होता तो क्या होता
झूठ अगर शून्य
होता तो क्या होता ?
सुन्दर और कुछ
अलग सा बुलेटिन ।

Puja Upadhyay ने कहा…

ये तस्वीर इस ब्लॉग में कहाँ से लगायी गयी है? ये मेरी खींची हुयी फ़ोटो है।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

ओह ... कहो तो हटा दूँ ? दरअसल गूगल पर मिला और मुझे बहुत अच्छा लगा, फिर भी यदि तुम्हें ऐतराज़ है तो हटा दूँगी :)
अच्छी खींची हुई तस्वीर की क़द्र है ये पूजा

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत अच्छी बुलेटिन प्रस्तुति
आभार!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

इस आने जाने की कश्मकश मे अनमोल समय निकल जाता है ... पीछे रह जाता है पछतावा |

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