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शनिवार, 18 नवंबर 2017

2017 का अवलोकन 4




चलते चलते ठिठकी हूँ कई बार 
ओस सी भीगी दूब 
जैसे एक अनोखा एहसास देती है 
ठीक उसी तरह 
शब्दों के गलीचे मुझे एक नई सोच देते हैं 
कई उलझे तारों को झंकृत कर देते हैं 

राहुल सिंह का ब्लॉग सिंहावलोकन आपको भी कुछ सोचने को मजबूर करेगा -



शहर में शहर रहता है
शहर में सिर्फ शहर होता है
हर शहर का अपना वजूद है
उसका अपना वजूद, अपने होने से 

चिरई-चुरगुन, तालाब-बांधा, मर-मैदान
गुड़ी-गउठान, पारा-मुहल्ला
बाबू-नोनी, रिश्ते-नाते
शाम-ओ-सहर सब
या समाहित या शहर बदर
अब शहर में बस शहर ही शहर

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

2017 का अवलोकन 3


मेरा फोटो


अवलोकन की यात्रा मैं कछुए की तरह करती हूँ, ताकि अधिक से अधिक तराशी हुई कलम से साक्षात्कार हो, नज़रों से शब्दों का एहसासों का कोई महारथी न छूट जाए  ... और यह आप तय करेंगे मेरे द्वारा किये गए अवलोकन से कि मैं इन्साफ कर पाई हूँ या नहीं 


सत्यार्थमित्र: झाड़-फ़ूंक की अदृश्य शक्ति से सामना



कई दिनों के व्यतिक्रम के बाद आज साइकिल से सैर करने निकला। हालाँकि सोकर उठने में थोड़ी देर हो गयी थी लेकिन मैंने मन को बहानेबाज़ी का कोई मौका देना उचित नहीं समझा। बाहर का मौसम बहुत ख़ुशगवार नहीं था। सूरज निकल चुका था और सुबह की हवा में अपनी किरणों की आंच मिलाने लगा था। आसमान में कुछ फुटकर बादल इधर-उधर तैर रहे थे। इन विरल बादलों से धूप की तेजी पर यदा-कदा विराम लगने का झूठा संतोष हो रहा था। जमीन से धूल उठने लगी थी और 'इंदिरा-उद्यान' में टहलने वाले आखिरी लोग घरों की ओर लौटने लगे थे।
घर से बाहर निकलते ही एडीएम साहब मिल गये। रुककर कुशल-क्षेम पूछने के लिए ब्रेक लगाया। बायें पैर से जमीन पर टेक लेकर मैं साइकिल की सीट पर ही खुद को अटकाये रहा। वे एक-दो महीने में ही सेवानिवृत्त होने वाले हैं इसलिए उनका हाल-चाल लेता रहता हूँ। मैंने देखा कि उनकी तर्जनी अंगुली में पट्टी बंधी थी। वह लाल दवा से सनी हुई थी। पूछने पर उन्होंने बताया कि सीलिंग फैन की ब्लेड लग गयी थी। टाइप-4 के सरकारी आवास के बरामदे की छत में लगा पंखा इतना नीचे होता है कि सामान्य ऊंचाई के व्यक्ति का हाथ भी छू ले। ये साहब तो छः फुट वाले हैं। मैंने अफसोस व्यक्त करते हुए चलने की इज़ाजत मांगी और बताया कि आज भुएमऊ गेस्ट-हाउस तक जाऊँगा। उन्होंने अनुमान लगाया- मतलब आठ किलोमीटर जाएंगे।
परसदेपुर रोड पर इंदिरानहर पुल की ढलान से उतरते हुए पैडल नहीं मारना पड़ता। ढलान खत्म होने के सौ मीटर बाद भुएमऊ गाँव शुरू हो जाता है जिसकी शुरुआत कांग्रेस पार्टी के गेस्ट-हाउस से होती है। आज जब मैं ढलान से नीचे उतरते हुए अपनी साँसे स्थिर कर रहा था तो सड़क की दाहिनी ओर घने पेडों के बीच एक स्थान पर कुछ हलचल दिखी। झाड़ियों के पीछे एक लंबे पेड़ के नीचे कुछ महिलाएँ थीं। वहीं सड़क किनारे एक रिक्शा, एक बाइक और कुछ साइकिलें खड़ी थीं।
मैंने अपनी गति धीमी कर दी और अभी-अभी रिक्शे से उतरकर खड़ी हुई युवती से पूछा - यहाँ क्या हो रहा है? उसने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि कंधे पर सो रहे बच्चे का सिर अपने पल्लू से ढंकने लगी। उसके चेहरे पर एक असुरक्षा व संकोच का भाव तैर गया था। रिक्शे वाले ने तबतक अपने मुँह का मसाला थूक दिया था। उसने बताया - कुछ नहीं, वहाँ बाबा बैठते हैं। उन्हीं को दिखाने आयी हैं। मैंने पूछा- क्या, झाड़-फूँक? उसने सहमति में सिर हिलाया। मुझे तत्काल वहाँ से आगे बढ़ जाना ठीक लगा।
आगे गेस्ट-हाउस के गेट तक जाते-जाते मेरा खोजी मन कुलबुलाने लगा। आखिर इस निर्जन स्थान पर घनी झाड़ियों के बीच, ऊँचे जंगली पेड़ों की ओट में ऐसा क्या हो रहा है जो इन गरीबों को यहाँ खींचे ले जा रहा है? मैंने साइकिल वापस मोड़ दी और उसी स्थान पर लौट आया। एक किशोर अपनी बाइक खड़ीकर उसकी सीट पर बैठा हुआ था। वह अपनी भाभी को लेकर आया था जो अपने नवजात शिशु को दिखाने आयीं थीं। मैंने सड़क पर से ही वहाँ की तस्वीर ली। लेकिन इससे कुछ खास स्पष्ट नहीं हो सका। मैंने साइकिल को सड़क से उतारकर नीचे खड़ा किया और ताला लगाकर उस पगडंडी पर उतर गया जो सड़क किनारे के गढ्ढे को पारकर मुझे उस पेड़ के पास ले गयी।
वहाँ का नजारा बड़ा रोचक था। करीब दर्जन भर माताएँ अपने-अपने बीमार बच्चों को गोद में लिए मौजूद थीं। एक दुग्ध-धवल लंबे बालों और दाढ़ी वाले बाबा जी पेड़ की जड़ के पास बैठे थे। बगल में एक बड़ी सी पोटली रखी थी जो धीरे-धीरे भर रही थी। उनके हाथ में करीब दस इंच का एक लोहे का चाकू था। उसकी मूठ भी लोहे की थी। बच्चों का इलाज़ प्रत्यक्षतः इसी यंत्र से किया जा रहा था। इसके अतिरिक्त कदाचित कुछ अनसुने मन्त्र भी थे जो चमत्कारी बाबाजी बुदबुदाए जा रहे थे। जिस बच्चे का 'इलाज' होते हुए मैंने देखा उसकी उम्र एक माह से कम ही रही होगी। बाबाजी चाकू की धार को जमीन की मिट्टी में धँसाकर खींचे जा रहे थे। बार-बार चाकू की धार से कटकर वहाँ की सूखी मिट्टी बारीक धूल जैसी हो गयी थी। मंत्र पूरा होने के बाद बाबाजी ने वह धूल मुठ्ठी में भर ली और उसे मसलने लगे और कुछ ध्यान करने लगे। इस प्रकार 'अभिमंत्रित' की जा चुकी धूल को उन्होंने बच्चे की माँ को देकर कुछ अस्फुट निर्देश दिया। उसने उसे लेकर बच्चे की नाभि व तलवों में लगा दिया। फिर अगले बच्चे की बारी आ गयी। बाबाजी इस इलाज़ के लिए कोई फीस नहीं मांग रहे थे। लेकिन सभी माताएँ उन्हें दस-बीस रुपये या/ और आटा-चावल इत्यादि देती जा रही थीं। यह सब उनकी पोटली के पेट में समाता जा रहा था।
एक कम उम्र की औरत के बुखार से तप रहे बच्चे को देखते हुए बाबा जी ने पूछा - कितने बच्चे हैं? उसने सिर झुकाकर बताया - तीन। उफ्फ, बीस-इक्कीस साल की इस दुबली-पतली कृषकाय लड़कीनुमा औरत को तीन बच्चे? मैं सोच में पड़ गया। बाबा जी ने फिर पूछा - इसे अपना दूध पिलाती हो? उसने जिस प्रकार अपना सिर हिलाया उससे मैं नहीं समझ पाया कि उत्तर हाँ है या ना। उसने कहा- बच्चे की टट्टी भी सूख गयी है। बाबा जी बोले - अभी इसका बुखार उतार रहा हूँ। जब बुखार उतर जाय तब आना। तब वह भी देख लेंगे। उसने पॉलीथिन का आटा और दो-तीन सिक्के बाबा जी को थमाये और उठ खड़ी हुई।
मैंने अगले बच्चे से पहले बाबाजी को टोका- आप किन-किन तकलीफों का इलाज करते हैं बाबा जी?
वे बोले- कोई भी तकलीफ हो जो लोग आते हैं उनकी मदद कर देता हूँ। वैसे छोटे बच्चे जिन्हें 'सूखा' हो गया हो, बुखार हो, खाते-पीते न हों उनके लिए कुछ कर देता हूँ।
मैंने पूछा- क्या कुछ? मतलब झाड़-फूँक? क्या सही में फायदा होता है? 
बाबाजी थोड़े अनमने हो गये। लेकिन मेरा यह प्रश्न सबके लिए खुला था। एक लड़के ने स्थानीय बोली (अवधी) में जो कहा उसका अर्थ यह था कि यदि फायदा नहीं होता तो प्रत्येक मंगलवार और रविवार को इतनी भीड़ कैसे लगती? उसकी बात से बाबाजी के चेहरे पर संतुष्टि लौट आयी और नये उत्साह से काम में लग गये। मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही थी।

मैंने बाबाजी से फोटो खींचने की औपचारिक अनुमति मांग ली। उन्होंने मना नहीं किया बल्कि सहर्ष पोज देने लगे।हालाँकि इसके पहले ही अनेक फोटो मेरे मोबाइल कैमरे में कैद हो चुके थे।
मैंने जब उनका नाम पूछा तो थोड़े असहज हो गये। फिर बोले- मेरा नाम कोई नहीं जानता, लेकिन मुझे जानते सब हैं। यहाँ यह काम और कोई तो करता नहीं है। बस यह जान लीजिए कि हम पंडित हैं। इसी गाँव (भुएमऊ) के। इतवार-मंगल को यहीं मिलते हैं।
मैंने कहा- फिर भी कोई नाम तो होगा आपका। मान लीजिए बाहर किसी को बताना हो तो कैसे बताया जाएगा? आप इतनी भलाई का काम कर रहे हैं। लोगों को पता कैसे चलेगा?
वहाँ उपस्थित ग्रामीणों ने मेरे समर्थन में सिर हिलाया। एक लड़के ने कहा-इसे ले जाकर व्हाट्सअप पे डाल दीजिए। (उसे शायद फेसबुक की कल्पना नहीं थी।) अब बाबा जी पसीजकर बोले- नाम तो मेरा शिवदास है। 
मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और उन सबको अपने पीछे दिखाते हुए सेल्फी ली और चल पड़ा।

मेरे दिमाग में अभी यह चल ही रहा था कि क्या यहाँ वाकई कोई अदृश्य, अलौकिक शक्ति है जो इस बाबा के हाथों की धूल के माध्यम से इन नवजात शिशुओं की बीमारी ठीक कर देती है। क्या वास्तव में इन बच्चों पर किसी भूत-प्रेत की छाया है जिसे बाबा शिवदास नियंत्रित कर रहे हैं? तभी मैंने देखा कि मेरी साइकिल की चेन उतर गयी है। अच्छी-भली खड़ी करके गया था। फिर यह उतर कैसे गयी और अंदर की ओर स्पॉकिट में बुरी तरह फँस कैसे गयी? मन मे उठी भूत की क्षणिक आशंका को मैंने सिर झटक कर नकारा और चेन चढ़ाने में पसीना बहाने लगा। बड़ी मुश्किल से बात बनी। मेरे दोनो हाथ ग्रीस की कालिख से काले हो गये। अब हैंडल कैसे पकड़ूँ? मैंने जमीन से सूखी मिट्टी उठाकर दोनो हाथों में रगड़ा तो कालिख का गीलापन खत्म हो गया। इसके बाद वहीं झाड़ी से कुछ हरी पत्तियां तोड़कर उन्हें हाथ मे मसलने लगा।
हाथ की कालिख कुछ कम हुई तो मैं चलने को उद्यत हुआ। तभी पैर उछालकर साइकिल की सीट पर बैठते हुए 'चर्र...' की आवाज हुई। धत तेरे की...। बिल्कुल नयी पैंट थी। 'कलर-प्लस' के स्पेशल डिस्काउंट ऑफर में पिछले हफ्ते ही लिया था। अब इसकी मजबूत सिलाई करानी पड़ेगी। यह सोचते हुए मैं सीट पर आसीन हो चुका था। अब घर पहुंचने से पहले कहीं रुकने की कोई गुंजाइश नहीं थी। बाबाजी से पिटी हुई कोई आत्मा मुझे तंग तो नहीं कर रही थी?

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