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गुरुवार, 24 मई 2018

एवरेस्ट को नापने वाली पहली भारतीय महिला को शुभकामनायें : ब्लॉग बुलेटिन


आप सभी को नमस्कार,
आज, 24 मई को माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा लहराने वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल का जन्मदिन है. उनका जन्म उत्तराखंड के उत्तरकाशी में सन 1954 को हुआ था. एक खेतिहर परिवार में जन्म लेने के बाद भी उनमें पढ़ने के प्रति ललक थी और उन्होंने बी०एड० कर लिया. पर्वतों की सुरम्य वादियों में जन्मी बछेंद्री पाल का मन कुछ और ही करना चाहता था सो वे स्कूल में शिक्षिका बनने के बजाय पेशेवर पर्वतारोही का पेशा अपनाने निकल पड़ीं. उनके इस निर्णय का परिवार और रिश्तेदारों ने बहुत विरोध किया किन्तु अपने निर्णय पर वे टिकी रहीं. उनको पर्वतारोहण का पहला अवसर 12 साल की उम्र में ही मिल चुका था जबकि उन्होंने अपने स्कूल के सहपाठियों संग पिकनिक जाने पर 400 मीटर की चढ़ाई की थी. चूँकि यह चढ़ाई किसी योजनाबद्ध तरीके से नहीं की गई थी, वे लगातार चढ़ती चली गईं और शाम होने पर उन्हें आभास हुआ कि अब उतरना सम्भव नहीं है. ऐसे में बिना भोजन और टैंट के उन्होंने खुले आसमान में रात गुजारी. 


पर्वतारोही के रूप में उन्होंने भारतीय अभियान दल के सदस्य के रूप में माउंट एवरेस्ट पर आरोहण किया. इसके कुछ ही समय बाद उन्होंने इसी शिखर पर महिलाओं की एक टीम का सफल नेतृत्व किया.
प्रतिभाशाली होने के बाद भी जब उन्हें कोई रोज़गार न मिला तो उन्होंने नौकरी करने के बजाय नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग से कोर्स के लिये आवेदन किया. इसके बाद उन्होंने 1982 में एडवांस कैम्प के तौर पर गंगोत्री (6,672 मीटर) और रूदुगैरा (5,819) की चढ़ाई पूरी की. इसी कैम्प में बछेंद्री को इंस्ट्रक्टर के रूप में पहली नौकरी मिली. सन 1984 में जब भारत का चौथा एवरेस्ट अभियान शुरू हुआ उस समय तक दुनिया में सिर्फ चार महिलाऐं ही एवरेस्ट चढ़ने में सफल हो सकी थीं. सन 1984 के अभियान की टीम में बछेंद्री पाल समेत सात महिलायें और ग्यारह पुरुष शामिल हुए. इस टीम ने 8,848 मीटर की ऊंचाई के सागरमाथा (एवरेस्ट) पर भारत का झंडा लहरा दिया. इसके साथ ही वे एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक क़दम रखने वाली दुनिया की पाँचवीं महिला बनीं. इसके अलावा सन 1997 में बछेन्द्री पाल ने केवल महिला दल का नेतृत्व करते हुए हिमालय पर्वतारोहण किया.

बछेन्द्री पाल का नाम सन 1990 में गिनीज बुक ऑफ़ रिकार्ड में और सन 1997 में लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में शामिल किया गया. केंद्र सरकार द्वारा उन्हें सन 1985 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. सन 1986 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार तथा सन 1995 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यश भारती पुरस्कार प्रदान किया गया.

बुलेटिन परिवार बछेंद्री पाल के स्वस्थ, खुशहाल जीवन की कामना करते हुए उन्हें जन्मदिन की शुभकामनायें प्रदान करता है.....

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बुधवार, 23 मई 2018

23 मई - विश्व कछुआ दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
23 मई को संपूर्ण विश्व में विश्व कछुआ दिवस (World Turtle Day) मनाया जाता है। यह दिवस कछुओं की दुर्लभ प्रजातियों को लुप्त होने से बचाने के लिए लोगों में जागरूकता हेतु मनाया जाता है। कछुओं की प्रजाति विश्व की सबसे पुरानी जीवित प्रजातियों में से एक मानी जाती है। ये प्राचीन प्रजातियों स्तनधारियों, चिड़ियों सांपों और छिपकलियों से भी पहले धरती पर अस्तित्व में आ चुके थे। जीव-वैज्ञानिकों के अनुसार कछुए इतने लंबे समय तक सिर्फ इस लिए खुद को बचा सके क्योंकि उनका कवच उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है। अंटार्कटिका को छोड़कर ये लगभग सभी महाद्वीपों में पाए जाते हैं। बोग कछुए जो कि लंबाई में 4 इंच के होते हैं, सबसे छोटे कछुए होते हैं। भारत में असम राज्य के जिला दीमा हसाओं में स्थित हेजोंग झील (जिसे कछुआ झील के नाम से पुकारा जाता है) में लगभग 400-500 कछुए निवास करते हैं।

कछुआ धीरे –धीरे विलुप्त होने की कगार पर है, यदि इनके प्रति लोगों में जागरूकता नही फैलायी गयी तो यह प्रजाति पूरी तरह से ख़त्म हो सकती है।  कछुओं की प्रजाति विश्व की सबसे पुरानी जीवित प्रजातियों (लगभग 200 मिलियन वर्ष) में से एक मानी जाती है और ये प्राचीन प्रजातियां स्तनधारियों, चिड़ियों ,सांपों और छिपकलियों से भी पहले धरती पर अस्तित्व में आ चुके थे। जीववैज्ञानिकों के मुताबिक, कछुए इतने लंबे समय तक सिर्फ इसलिए खुद को बचा सके क्योंकि उनका कवच उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है। आईये एक संकल्प लें दुनिया की प्राचीन प्रजाति को बिलुप्त होने से बचाने का, इनके संरक्षण का। अपने आसपास के तालाबों, नदियों, जंगलों में इन्हें सुरक्षित रहने दें। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

लेखागार