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गुरुवार, 16 मार्च 2017

फागुनी बहार होली में - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
सभी को होली की भंगाभंग अरररे, मेरा मतलब है कि होली की रंगारंग शुभकामनायें. जुबान तो बिना भांग के ही फिसल गई. असल में होली का हुडदंग और उस पर चुनावी चक्कर तो जुबान भी चक्कर खा गई. अरे भाई, इसमें हंसने वाली बात नहीं है. एक अच्छा भला आदमी गीली जगह पर जरा सी लापरवाही पर फिसल जाता है, ये बेचारी जुबान तो चौबीसों घंटे गीली रहती है, अब फिसल गई तो फिसल गई. हाँ तो जी, होली तो हो ली, अब? अब क्या, अब चुनावी चकल्लस खेली जा रही है. कहीं बहुमत है तो नेता नहीं, कहीं नेता है तो बहुमत नहीं. कहीं सीट ही नहीं है तो कहीं सीट पर बैठने वाले लोग नहीं हैं. कुछ इधर से भागकर उधर आये हैं, कुछ उधर से भागकर इधर आये हैं. कोई किसी व्यक्ति को दोष दे रहा है तो कोई मशीन को. जीतने वाले भी, हारने वाले भी सबके सब ऐसी हरकतें कर रहे हैं जैसे बौरा गए हों. और ऐसा सही भी हो सकता है क्योंकि होली का ये पर्व, फागुन का ये मौसम ऐसा मतवाला होता ही है कि अच्छे-अच्छों को बौरा देता है. कहते हैं न कि इस मौसम में बहुएँ भी भौजाई दिखाई देती हैं, बूढ़े भी जवान हो जाते हैं. इसी बौराएपन में सभी की होली मस्ती से गुजरी होगी, जिनकी चुनावी परिणामों के चक्कर में नहीं गुजर पाई उनकी भी मस्ती बनी रहे, ऐसी अपेक्षा है. 


ऐसे ही हुल्लड़ भरे माहौल में एक मजाकिया स्वरचित अनुभव आप सबके साथ शेयर करते हुए आज की बुलेटिन आपके समक्ष प्रस्तुत है, लीजिये.
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प्रकृति में छाई रही फागुनी बहार होली में।
हम निठल्लों से पड़े रहे बेकार होली में।।
     संग के हमारे साथी रंगीन हो गये।
     हम तो बस ढूँड़ते रहे अपना यार होली में।।
करने को गाल लाल नया चेहरा मिले कोई।
एक भाभी को रंगेंगे कितनी-कितनी बार होली में।।
     निकल पड़े साइकिल से गलियों की खाक छानने।
     हो गया एक हसीन मुखड़े का दीदार होली में।।
नई थी मंजिल साथी भी नया-नया था।
रंगने को उसे कई तरीके बनाये जोरदार होली में।।
     कहीं गुलाल था उड़ता कहीं अबीर था घुला।
     हो रही थी हर ओर रंगों की बौछार होली में।।
बड़े धड़कते दिल से हाथों में रंग लिए हम।
पहुँचे नये साथी को रंगने उसके द्वार होली में।।
     दिल में डर का पुलिंदा बाँधे जोश में आगे बढ़े।
     हो गया उसकी अम्मा से सामना जारदार होली में।।
बँध गई घिग्घी डर से गुड़गोबर सब हो गया।
बनने लगे उसी बेरुखे चेहरे पर चित्रकार होली में।।
     होली के रंग में सराबोर तब तारे नजर आने लगे।
     पड़ी जब उसके बाप से जूतों की मार होली में।।
चमड़ा पदक प्राप्त करते देख मुस्कराकर निहारा उसने।
कहा हो मानो न बुरा किसी बात का यार होली में।।
     रोते, पड़ते, फटेहाल घर को वापस हो लिए।
     सोचा पकड़ कान भाभी है अपनी सदाबहार होली में।।

++++++++++













4 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति।

Yusuf Kirmani ने कहा…

मेरे ब्लॉग और लेख का लिंक यहां देने के लिए बहुत आभार।...निश्चित रूप से यह एक सराहनीय कार्य है।...उम्मीद है कि हम लोगों का आना-जाना लगा रहेगा।...

Jyoti Dehliwal ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति।'फागुनी बहार होली में - ब्लॉग बुलेटिन’" में मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद, राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी।

Jyoti Dehliwal ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति।'फागुनी बहार होली में - ब्लॉग बुलेटिन’" में मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद, राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी।

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