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सोमवार, 2 सितंबर 2013

चंद पोस्ट कतरे , कुछ सिमटे , कुछ बिखरे

 

आप अगर खुद ब्लॉगिंग करने लगें मेरा मतलब है कि पूरी रवानी में आ जाएं , लिखें पढें और खूब टिप्पणियां भी करें तो यकीनन आपको ये लगेगा कि , सच में तो ब्लॉगिंग की धार और रफ़्तार पहले से अब बहुत ही ज्यादा है । न सिर्फ़ पोस्टों का प्रवाह बल्कि उनका स्तर, विविधता और मारक क्षमता भी अब बहुत ज्यादा बढ गई है । बहुत जल्दी इसी पन्ने पर होंगी ब्लॉगिंग से जुडी और भी बातें , फ़िलहाल तो आप आज की खूबसूरत पोस्टों के कतरों को देखकर पहुंचियों इन बेहतरीन पोस्टों पर :

कार्टून :- सो रहे थे क्‍या ?

 

Juvenile Act बदलने के लिए आन्दोलन की आवश्यकता

 

दामिनी कांड के तथाकथित नाबालिग अभियुक्त को जो सज़ा हुई है, वोह कानून के मुताबिक तो एकदम ठीक हई है, मगर न्याय के एतबार से इस सज़ा को नहीं के बराबर ही कहा जाएगा। मुझे लगता है ध्यान और कोशिश इस सज़ा से भी अधिक ऐसे कानून को बदलने पर होनी चाहिए जिसके तहत रेप विक्टिम को पूर्ण न्याय नहीं मिल पाया। Juvenile Act को बदलने के लिए एक  बड़े सामाजिक आन्दोलन की आवश्यकता है।

 

यह धर्म के नाम पे नफरत और महिलाओं के शोषण का दौर है |

विश्व विजय के शौक़ में अमरीका ने जिस तरह से धर्म के कट्टरवादी समूह के सहारे अपनी मंजिल तय  करनी शुरू की उस से विश्व में धर्म के नाम पे नफरत फैलाने का दौर शुरू हुआ | कल तक जिसे अमरीका आतंकवादी कहता था आज उसे ही सीरिया में सहयोग दे रहा है क्यूँ की इराक के बाद उसका निशाना सीरिया है | यह और बात है की अमरीका में भी इसका विरोध हो रहा है क्यूँ की अमरीका के नागरिकों की जान और माल दोनों का नुक़सान किसी भी युद्ध के बाद होता है | आज समाज के हर इंसान को इन अनावश्यक युद्ध का विरोध करना चाहिए |

 

 

मत चींखो मत लड़ो दामिनी

मत चींखो मत लड़ो दामिनी यहाँ ओरत होना सस्ता है

अन्धो कि चोपट नगरी में कैसे इन्साफ हो सकता है

कौन देखे धब्बे अस्मिता के कानून जहाँ का अंधा है

जुर्म से कैसे लड़ पायेगा वो तो लाचार निहत्ता है

 

छज्जे जितनी जगह

घर पर
अपने छज्जे पर
आती थोड़ी सी
गुनगुनी धूप,
बादल की छांव,
बारिस की फुहार
बचाए रखना
चाहती हूँ
उन धूधली, विसूरती
खाली शामों
के लिए
रूखे पलों मे जब
मेरी आँखों में
नमी नहीं
बची रह सकेगी

 

 

 

नेकलाइन- दो

मेट्रो की चौकोर खिड़की से बाहर शाम और रात का मिलना देखा जा सकता था। कभी कभी अंधेरे के बीच खड़े पेड़ और अंधेरा होने की मुहर लगा जाते। गाड़ी तेज़ी से फिसलती जाती और बाहर ट्रैफिक पर एथलीट की तरह रूकी गाडि़यां हरी बत्ती की हवाई फायरिंग का इंतज़ार कर रहे होते।

कुछ झगड़े कभी खत्म नहीं होते। हमारा आपस में झगड़ा कभी शुरू ही नहीं हुआ। वे झगड़े जो कभी लड़े नहीं गए, अंदर बहुत झगड़ता है। मैं अंदर ही अंदर उससे अब भी झगड़ लेता हूं। कभी वहां से शुरू करता हूं जहां से सब असहमति भर हुई थी। कभी वहां से जहां विवाद की गुंजाइश थी। कभी उसकी आंखों के ऐतराज़ से ही। कभी उसके बायीं भवहों के तिरछे होकर ऊपर उठने भर से ही तो कभी फोन पर किसी से बात करते हुए थर्ड पर्सन के रेफरेंस के मार्फत ही। मेट्रो जब प्रगति मैदान से मंडी हाऊस के लिए अंडर ग्राउंड हुई तो लगा तो हम भी अपने अतीत के सुरंग में जाने लगे। सफर हमेशा किसी के याद में ही ज्यादा बीतती है। और ऐसे में उसके ठीक सामने पकड़ा गया मैं हम दोनों को भीड़ के बीच अकेला कर गई थी।

 

 

 

मंज़र तेरी कब्र पर

दो दिन जुटेंगे मज़ार पर

तेरे चाहने वाले

दिन चार चक्कर लगायेंगे

दुआ मांगने वाले

सूखे फूल और सूखे अश्क

फकत बाकी रहेंगे

 

 

शायद आपमें से कोई सुझा पाये ...

जानती हूं कि मुझे class में बच्चों के सामने इस तरह नहीं रो देना था... यूं कमज़ोर हो कर टूट नहीं जाना चाहिये था. पता नहीं मेरा उन पर स्नेह था या उनकी सज़ा की वज़ह होने की ग्लानि कि मैं आंसुओं को रोक ही नहीं पायी.
उस orphanage cum school की दीवारें ज्ञान से र्ंगी हुई हैं... ये आश्रम बाल गोपालों का निवास है... बच्चों की सेवा, प्रभु की सेवा .. वगैरह वगैरह.
नहीं... बुरी जगह नहीं है, बुरी होती तो कब की छोड दी होती मैंने. बच्चों की ज़रूरतों का ख़याल रखते देखा है मैंने वहां. लेकिन आज लगा कि जैसे सब मशीनीकृत है... जैसे सब महान बनने की कोशिश के चलते किया जा रहा हो. अन्यथा आप उन बच्चों को इस तरह कैसे मार सकते हो जिनके साथ आप रात-दिन कई वर्षों से रह रहे हो.

 

 

इत्ती सी हंसी, इत्ती सी खुशी....

इत्ती सी हंसी, इत्ती सी खुशी, इत्ता सा टुकड़ा चाँद का....काश हर एक की बस यही जरूरत होती इस दुनिया में तो कितना अच्छा होता। यूं तो यह ख़बर अब पुरानी है मगर फिर भी, कुछ दिन पहले मैंने बर्फ़ी देखी जो मैं उस समय नहीं देख पायी थी जब यह फिल्म रिलीज़ हुई थी इस फिल्म को थिएटर में देखना का बड़ा मन था मेरा, लेकिन उन दिनों ऐसा हो न सका। खैर आजकल इस बात से कोई खास फर्क नहीं पड़ता है क्यूंकि अब सभी नयी फिल्में बहुत ही जल्दी छोटे परदे पर आजाती है तो बस रिकॉर्ड करो और बिना ब्रेक के मज़े से देख लो हम तो ऐसा ही करते हैं और ऐसा ही इस बार भी किया जब यह फिल्म पहली बार छोटे पर्दे पर आई तब हमने इसे रिकॉर्ड कर लिया था और फिर आराम से सबकी सहूलियत के अनुसार एक दिन तय कर के देख लिया ऐसा इसलिए किया क्यूंकि मुझे अकेले फिल्म देखना बहुत ही बोरिंग काम लगता है मैं चुप चाप बैठकर फिल्म देखने वालों में से नहीं हूँ। फिल्म देखने के दौरान मुझे अपनी विशेष टिप्पणी देते रहने की आदत सी है :) इसलिए मैं अकेले कभी कोई फिल्म नहीं देखती हूँ।

 

 

तुम सा फ़रिश्ता

जब जिंदगी रूठ जाया करती हैं हमसे

बिछड़ जाती हैं राहें और मुँह फेर लेते हैं लोग

अंधेरों में जब मेरे ही अपने दो साए होते हैं

उस बेरहम वक़्त में अपने भी पराये होते हैं

अपनों  से लगने वाले बेगानों की भीड़ में

कभी एक बेगाना अपना बन हाँथ थाम लेता है 

 

 

वह दूसरों के जैसा नहीं है!

सौ में से निन्यानवें बार ऐसा होता है। वे सब उसके खि़लाफ़ एक हो जाते हैं। जब कभी वह घर से निकलता है, गांडू-गांडू कहकर चिल्लाते हैं, पीछे आते हैं।
कस्बा जिसमें उसका जन्म हुआ, अखाड़ेबाज़ी और लौंडेबाज़ी के लिए मशहूर है। अखाड़ेबाज़ी के शौक़ीन लोगों में से कईयों को लौंडेबाज़ी की आदत हो जाती है, ऐसा माना और बताया जाता है। जो इस आदत का शिकार बनते हैं, उन्हें गांडू कहा जाता है। और डरपोक आदमी को भी यहां गांडू कहा जाता है।
मगर ये सब तो उसके दोस्त ही हैं जो उसे गांडू कहते हैं। हमेशा नहीं कहते। उसके साथ खेलते हैं, हंसते हैं, आते-जाते हैं, मिलते-जुलते हैं। मगर कभी-कभी एकाएक न जाने क्या होता है कि वे सब एक तरफ़ और वह एक तरफ़।

 

 

तेरा ज़िक्र है या इत्र है...

तुम्हारा वजूद मेरे चारों ओर बिखरा हुआ है… कुछ भी करती हूँ तो जाने कहाँ से तुम चले आते हो… पेड़ों को पानी दे रही होती हूँ तो तुम पानी का पाइप छीन कर मुझे भिगो देते हो… खाना बना रही होती हूँ तो आ कर पीछे से जकड़ लेते हो बाहों में... कोई गाना सुन रही होती हूँ तो उसमें भी किरदार की जगह तुम ले लेते हो… कोई इमेज सर्च करती हूँ गूगल पे तो तुम्हारी यादें घेर लेती हैं आ के… तुमसे मिलने के बाद आज तक कभी अकेले चाय-कॉफ़ी नहीं पी पायी हूँ… कप से पहला सिप हमेशा तुम लेते हो…

पीले गुलाब की ख़ुशबू... पूरनमासी का चाँद... झील... पहाड़... झरने... जंगल... बर्फ़... पानी... रेत... सागर… क्या क्या भूलूँ मैं और कैसे भूलूँ... साँस लेना भूल सकता है क्या कोई ?

 

जो फाइलें सोचती ही नहीं

इष्ट देव सांकृत्यायन

भारत एक प्रबुद्ध राष्ट्र है, इस पर यदि कोई संदेह करे तो उसे बुद्धू ही कहा जाएगा. हमारे प्रबुद्ध होने के जीवंत साक्ष्य सामान्य घरों से लेकर सड़कों, रेल लाइनों, निजी अस्पतालों और यहां तक कि सरकारी कार्यालयों तक में बिखरे पड़े मिलते हैं. घर कैसे बनना है, यह आर्किटेक्ट के तय कर देने के बावजूद हम अंततः बनाते अपने हिसाब से ही हैं. आर्किटेक्ट को हम दक्षिणा देते हैं, यह अलग बात है. इसका यह अर्थ थोड़े ही है कि घर बनाने के संबंध में सारा ज्ञान उसे ही है. ऐसे ही सड़कों पर डिवाइडर, रेडलाइट, फुटपाथ आदि के सारे संकेत लगे होने के बावजूद हम उसका इस्तेमाल अपने विवेकानुसार करते हैं. बत्ती लाल होने के बावजूद हम चौराहा पार करने की कोशिश करते हैं, क्योंकि बत्ती का क्या भरोसा! पर अपने आकलन पर हम भरोसा कर सकते हैं. सरकारी दफ्तरों में नियम-क़ानून किताबों में लिखे रहते हैं, लेकिन काम अपने ढंग से होते हैं.

 

 

किसी फाईल या फोल्डर को Hide कैसे करें।

     किसी भी फाईल को या किसी भी फोल्डर को कमान्ड प्राम्प्ट के माध्यम से Hidden किया जा सकता है। इस विधि से किसी भी फाईल्स या फोल्डर को Hidden करने के पश्चात उसे सर्च के माध्यम से भी ढूढा नही जा सकता है, जबतक कि हम शो "हिडेन फाइल्स एण्ड फोल्डर" आँप्सन का प्रयोग न करें।

कमान्ड प्राम्प्ट के माध्यम से किसी भी फाईल्स या फोल्डर को कैसे हाईड करना है, यह विधि नीचे दी गई हैः-

 

कविता ने कहा था...!

एक पुराना टुकड़ा मिला, हृदय के बहुत करीब है यह… इसे यहाँ लिख कर रख लेना चाहिए.  जाने फिर कलम यह लिख पाए या नहीं, जाने कविता फिर हमसे कभी यूँ कुछ कह पाए या नहीं…!

कविता ने जिस क्षण यह कहा था, उसे स्मरण करते हुए…  उस पल को जीते हुए, सहेज लेते हैं यहाँ भी, वह क्षण और कविता का कथ्य, दोनों ही : :

एक और दिवस गुज़रा

और शाम हो गयी,

प्रार्थनारत भावनाएं

सहर्ष ही श्याम हो गयी!

अंतिम बेला में

खुल जाते हैं सारे फंदे,

पथरीली मन की राहें

वृन्दावन धाम हो गयी!

 

एक दूसरे की साँस में घुलते हुए

 

कभी-कभी सोचता हूँ तुम्हारे बारे में लिखूँ। तुम्हें बिन बिताए। सूरज अभी ढला नहीं है। ढल रहा है। जैसे-जैसे अँधेरा होगा मैं तुम्हारे पास आता जाऊंगा। इस उजाले में आँखें इधर-उधर चली जाती हैं पर अँधेरा बना ही इसलिए है। के तुम्हें देख पाऊँ। चुपके से नहीं, सबके सामने से। कि वहाँ मैं हूँ। तुम हो। हमारी बातें हैं। मुलाकातें हैं। पर अगले ही किसी पल लगता है हम कैसे-कैसे होते जा रहे हैं। इस तरह दिनों का शामों में और शामों का रातों में तब्दील होते जाना बिलकुल भी जँचता नहीं। पर क्या करूँ। बस सोचता रहता हूँ।

सोचता रहता हूँ ऐसा क्या लिख दूँ के तुम मेरे सामने आ जाओ। कोई ऐसा जादू भी होता होगा। धीरे-धीरे सीख रहा हूँ। जिस दिन नींद नहीं आती उस दिन लगता है कहीं तुम मुझमे कुछ कम रह गयी होगी। इस तरह एक शाम होगी। ढबरी के उजाले में तुम्हारा झिलमिलाता चेहरा देख भर लेने को यहाँ से चल पडूँगा। फ़िर कोई नहीं रोक पायेगा। मैं भी नहीं। तुम भी नहीं।

 

 

रुपया मरा बाजार में

मित्रों,भारतीय अर्थव्यवस्था के गहरे संकट में फंसने की आशंका सच साबित हो रही है। सरकार में छाये भ्रष्टाचार,नीतिगत जड़ता और फैसले लेने में देरी के चलते चालू वित्त वर्ष 2013-14 की पहली तिमाही में आर्थिक विकास दर ने भी रुपये की तरह गोता लगा दिया है। इस अवधि में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर घटकर मात्र 4.4 फीसद पर सिमट गई है। बीते चार साल में किसी एक तिमाही में अर्थव्यवस्था की यह सबसे कम रफ्तार है। बीते एक साल में आर्थिक हालात तेजी से खराब हुए हैं। वित्त वर्ष 2012-13 की पहली तिमाही में आर्थिक विकास दर 5.4 फीसद रही थी। महंगे कर्ज और रुपये के गोता लगाने से न सिर्फ औद्योगिक उत्पादन व खनन क्षेत्र की रफ्तार घटाई, बल्कि सरकार के फैसलों की सुस्ती का असर देश में होने वाले निवेश पर भी पड़ा है। बीते वित्त वर्ष के मुकाबले चालू साल की पहली तिमाही में कुल निवेश 1.4 फीसद घट गया है। पहली तिमाही में कारखानों की सुस्ती से विनिर्माण क्षेत्र की विकास दर 1.2 फीसद नीचे आ गई है। यही हाल खनन क्षेत्र का भी रहा है। इसकी विकास दर 2.8 फीसदी गिर गई।

 

 

" आश्रमों के पीछे का सच ....."

इतना अच्छा बोलता था टी वी पर , कितना चमकदार और रोबदार चेहरा ,कितनी ज्ञान की बातें और अब ऐसे आरोपों से घिरा हुआ। सच क्या है , ऐसा क्यों होता है ,क्या हैं ये 'आसाराम' सरीखे बाबा !! आम आदमी के मन का बड़ा सरल सा प्रश्न ।
ईश्वर में आस्था और भक्ति होने के साथ अनजाने में ही लोग चमत्कार की कल्पना और उसमें सहज विश्वास करने लगते हैं । बचपन से ही बड़ों का आदर, गुरुओं और सन्यासियों का सम्मान और उनसे आशीर्वाद लेने का उपक्रम करते करते कब मन में इन चमत्कारी बाबाओं के प्रति अगाध श्रद्धा की बात घर कर जाती है ,भान ही नहीं रहता । ऐसे में साथ में रहने वाले हमारे बड़े लोग अगर सतर्क न हो और स्वयं भी ऐसे लोगों में अगाध आस्था और विश्वास करते हो तब उनके आस पास के लोगों में ऐसी ही धारणा पनपना निश्चित है ।

 

 

एक गांव का चिंतित ग्राम प्रधान....

मुझे अच्छी तरह याद है तीन-चार साल पहले वे अख़बार के पन्ने में आंख गड़ाए कहा करते थे, लूट थे, रिश्ते में हमारे भईया लगते थे और हमारे पडोस में उनका घर था।

हमारे घर आकर घण्टों कुर्सी तोड़ते औऱ घर के सारे पढ़ने लिखने वाले बच्चों को ऊबाउ ज्ञान देते जिसे सुनना हम सबकी मजबूरी होती थी।

गांव के प्रधानी के चुनाव में में दो बार हाथ-पैर मारे थे औऱ शिकस्त खाकर गिरे भी थे, लेकिन ये हौसला कैसे रुके की तर्ज पर अगला चुनाव लड़ने की तैयारी पर थे। प्रधानी के चुनाव मे जिस आदमी से इनका मुकाबला होता था उसने पच्चीस सालों से प्रधानी की कमान किसी औऱ के हाथों में न आने दी थी। उसके पिताजी दो बार प्रधान रहे, माता जी एक बार, पत्नी जी एक बार औऱ वो खुद एक बार।

लेकिन उस साल किस्मत ने भईया जी का साथ दिया औऱ पच्चीस सालों से जीतते आए उश परिवार औंधे मुंह गिराते हुए वो प्रधानी का चुनाव जीत गए ( जिनका कि अब प्रधानी का अंतिम साल चल रहा है)। प्रधानी का चुनाव जीतते ही जाति बिरादरी में या हो सकता है पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ गयी। एक ऐसी खुशी कि जिनमें गांव के सातवीं-आठवी के बच्चे भी बैड बाजा पर दारु पीकर बनियान फाड़ू नाच नाचे थे और बच्चों के पिताजी ने इस पर चूं तक न की थी।

 

 

दिल्ली के वोट में जात-पात नहीं चलता, क्या बात करते हैं

क्या इस देश में ऐसा भी कोई राज्य है जहां लोग जात के आधार पर वोट नहीं करते हैं? हम सब पिछले कई चुनावों के तमाम विश्लेषणों से इस सत्य को बिना किसी चुनौती के ही स्वीकार करते रहे हैं कि सिर्फ जाति ही एक कारण है। क्षेत्रीय दलों के राजनीतिक आधार का मूल्यांकन जाति और धर्म की सीमा से कभी आगे जाता नहीं। ख़ैर ये विवाद का विषय है। संजय कुमार की दलील है कि दिल्ली एक राज्य है जहां लोग वर्ग के आधार पर वोट करते हैं। दिल्ली में ज्यादतर मतदाता तीन वर्गों में बंटे हैं और क्लास के आधार पर ही वोट करते हैं क्योंकि इनकी गोलबंदी जाति या इलाके के आधार पर नहीं होती है। संजय कुमार ने अपने शोध और सर्वे से दिल्ली की एक दूसरी ही तस्वीर खींची है। दिल्ली मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और ओबीसी के प्रभुत्व वाली राजनैतिक भौगोलिक स्पेस है। तब भी यहां मतदान वर्ग के आधार पर होता है। वर्ग के लिहाज़ से इसके वोटर का बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से गरीब है। लोअर क्लास का है।

 

 

तो आज के लिए इतना ही , मिलेंगे कल फ़िर कुछ चुनिंदा पोस्टों के लिंक्स , मुखडे  , कतरों के साथ , किसी नए अंदाज़ और नई शैली में , तब तक हैप्पी ब्लॉगिंग

13 टिप्पणियाँ:

Pallavi saxena ने कहा…

वाह बढ़िया लिंक से सजा शानदार बुलेटिन मेरी पोस्ट को स्थान देने के लिए आभार...

Atulesh Pandey ने कहा…

विस्तार वाली बुलेटिन है। बहुत बढ़िया।

प्रतिभा कुशवाहा ने कहा…

पहले तो इस जर्रा नवाजी के लिए शुक्रिया अजय जी, दूसरा ब्लॉग को लेकर जो ठंडापन मैं इन दिनों देख रही हूँ उस समय आप जैसे कुछ लोग इसे लेकर उत्साहित है, संतोष हुआ

Kaushal Lal ने कहा…

शानदार , बढ़िया...बुलेटिन

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

अच्छे सूत्र !!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बड़े ही रोचक सूत्र

Shah Nawaz ने कहा…

आपके यह पोस्ट वालें कतरें गर्मी में भी ठंडक का अहसास करा रहे हैं, शुक्रिया अजय भाई!

सतीश सक्सेना ने कहा…

जय हो अज्जू बाबा की , आश्रम की और भंडारे की !
बहुत दिन हो गया एक भंडारा हो जाए प्रभु !
:)

Maheshwari kaneri ने कहा…

बहुत बढ़िया लिंक से सजा शानदार बुलेटिन.. पोस्ट की सुन्दर कतरे ्लाजवाब कर गए..अजय जी

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

वाह ।

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

वाह ।

Archana ने कहा…

दुख भरे दिन बीते रे भैया अज्जू लौट आयो रे ....
खूबसूरती से कई लिंक को सजायो रे ....

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बिलकुल सही कह रहे है अजय भाई आप ... ब्लोगिंग से रोज़ नए नए लोग जुड़ रहे है ... बस हम लोग फिलहाल सब तक पहुँच नहीं पाये ... :(

बढ़िया बुलेटिन !

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