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बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

कई पन्नों की दास्तान



एक नहीं , दो नहीं ... कई पन्नों के कमरे हैं एहसासों से भरे . कहीं से दबी दबी सिसकियाँ उभरती हैं , कहीं से कल की चिंता , कहीं से अनबुझ पहेली से ख्याल , कहीं से घुटी चीखें , कहीं से खिलखिलाहट , कहीं से रुनझुन पायल की चपलता , कहीं पुरवा सी लड़की का चेहरा उभरता है , कहीं से अनुभवों का चश्मा दिखाई देता है ....... पन्नों की इस भीड़ में मैं कभी सहयात्री कभी बेबाक लहर कभी हीर कभी बासंती हवा कभी खामोश हलचल कभी प्रश्न कभी उत्तर कभी कृष्ण की बांसुरी बनती रहती हूँ . उठाती रहती हूँ कुछ पन्ने अपनी पसंद के और ले आती हूँ इस बुलेटिन पर ताकि आप जीने लगें एहसासों में . अच्छा करती हूँ न , तो लीजिये ज़िन्दगी - कुछ नम , कुछ बोझिल , कुछ लहराती , कुछ सहमती ..... कुछ कुछ , कुछ कुछ - एक कप गर्म कॉफ़ी के साथ ...


!!मुक्ति!!


मेरे पास चिट्ठियों का अम्बार था,
आदतन,जिन्हें संभाल कर रखती थी
गाहे-बगाहे उलटते-पुलटते,
समय पाकर लगा-
अधिकाँश इसमें निरर्थक हैं-रद्दी कागजों की ढेर!
फिर.....मैंने उन्हें नदी में डलवा दिया !
मेरे पास कुछेक सालों की लिखी डायरियों का संग्रह था,
फुर्सत में-
पलटते हुए पाया,
उनके पृष्ठों पर आँसुओं के कतरे थे-
बाद में ये कतरे किसी को भिंगो सकते हैं,
ये सोच-मैंने मन को मजबूत किया,
फिर उन्हें भी नदी के हवाले कर दिया!
अब,....मेरे पास कुछ नहीं,
सिर्फ़ एक पोटली बची है-जिंदगी के लंबे सफर की!
यादें, जिसमें भोर की चहचहाती चिडियों का कलरव है!
यादें,जिसमें नदी के मोहक चाल की गुनगुनाहट है!
दिल जीतनेवाली अटपटी बातों की मधुर रागिनी है!
बोझिल क्षणों को छू मंतर करनेवाले कहकहों की गूंज है
जीत-हार और रूठने-मनाने का अनुपम खेल है!
खट्टी-मीठी बातों की फुलझडी है
दिन का मनोरम उजास है,
रात की जादुई निस्तब्धता है,
छोटी-छोटी खुशियों की फुहार में भीगने का उपक्रम है
और कभी न भुलाए जानेवाले दर्द का आख्यान भी है!
ख्याल आता है,
पोटली को बहा देती तो मुक्ति मिल जाती!........
पर अगले ही क्षण हँसी आती है
- मुक्ति शब्द -प्रश्न-चिन्ह बनकर खड़ा हो जाता है,
जिसका जवाब नहीं!!!
तो, जतन से सहेज रखा है -
यादों की इस पोटली को
जिस दिन विदा लूंगी -
यह भी साथ चली जायेगी!


सरस्वती प्रसाद



तितलियों का ज़िक्र हो

प्यार का, अहसास का, ख़ामोशियों का ज़िक्र हो,
महफिलों में अब जरा तन्हाइयों का ज़िक्र हो।

मीर, ग़ालिब की ग़ज़ल या, जिगर के कुछ शे‘र हों,
जो कबीरा ने कही, उन साखियों का ज़िक्र हो।

रास्ते तो और भी हैं, वक़्त भी, उम्मीद भी,
क्या जरूरत है भला, मायूसियों का ज़िक्र हो।

फिर बहारें आ रही हैं, चाहिए अब हर तरफ़,
मौसमों का गुलशनों का, तितलियों का ज़िक्र हो।

गंध मिट्टी की नहीं ,महसूस होती सड़क पर,
चंद लम्हे गांव की, पगडंडियों का ज़िक्र हो।

इस शहर की हर गली में, ढेर हैं बारूद के,
बुझा देना ग़र कहीं, चिन्गारियों का ज़िक्र हो।

दोष सूरज का नहीं है, ज़िक्र उसका न करो,
धूप से लड़ती हुई परछाइयों का ज़िक्र हो।

-महेन्द्र वर्मा


एक ख्वाइश

एक ख्वाइश
कि समेट लूँ
अपने
अँधेरे के
सब हिस्से
और गठरी में
बांध छोड आऊं
क्षितिज के पार
और ले आऊं
वहां से
एक लौ
रोशनी की
और तब तक रखूं उसको
मुस्कराहट की ओट में
जब तक वह
खिलखिलाती
हँसी में
तब्दील न हो जाए


रंजना [रंजू भाटिया]



अपने-अपने सच हैं सबके

झूठ पकड़ कोई आगे बढ़ता
कोई है सच का दमन थामे
सही गलत कोई क्या आंके
आखिर सबके अपने सच हैं

दीन-धरम दुनिया की बातें
करते कोई नहीं अघाते
पर जब करने की बारी आती
अपने सच हावी हो जाते

पाप-पुण्य सब परिभाषाएं हैं
झूठ-कपट अब मूल-मंत्र है
लम्पटता सिद्धांत बन गई
इस युग का तो यही तंत्र है

संग समय के जो नहीं चलते
समय उन्हें धूसर कर देता
गुनी जनों ने देखा तौला
और सदाचार से कर ली तौबा

- वाणभट्ट



एक कप काफ़ी


जब तुम साथ थे तब वक्त साथ नही था,
अब वक्त साथ है तो तुम साथ नहीं हो,
तुम पर एक कप काफ़ी अभी भी उधार है |

साकेत शर्मा


यादें सिमटती गईं ....

सूनी अंधेरी रात में
यादों की गठरी
गिर गई
सारी यादें
धरती पर थीं पड़ी,
मैने उन्‍हें समेट कर
वापस गठरी में
रखना चाहा
पर वे आपस में
मिलकर परिहास करने लगीं
कोई खुद को अच्‍छी कहती
तो कोई खुद को,
सब मेरी हाथों से
दूर होती जा रही थीं
मैं किसी भी एक याद को
छोड़ना नहीं चाहती थी
थक गई जब मैं तो
इन्‍हे समेटने के लिए
मैने आंसुओं का सहारा लिया
हर याद पर एक-एक बूंद
गिरती गई और यादें सिमटती गईं ।


सदा


~:वक्त:~

छिछोरापन, आवारागर्दी, उद्दंडता...
यही तो करने लगे हैं,
आज के कुछ युवा
साथियों! इन्हें समझाने को वक्त आ चूका है...........

दे रहा, आम आदमी को मूक दर्द
जब आवाज दर दर
अब भी, अगर हम सब चुप रहे
तो आने वाला वक्त क्या कहेगा.......

खुशियों, उल्लासो को बेरहमी से
बदहवासी व शोक मैं बदला जा रहा है
फिर भी हम नहीं बदल पाए तो
बदलते वक्त को आशियाना क्या कहेगा.........
समय की तकदीर
सिर्फ कलम से लिखी जा नहीं सकती
साथियों! बदलते वक्त को
सँवारने का वक्त आ चुका है.........


मुकेश कुमार सिन्हा



27 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

उत्कृष्ट काव्य संकलन..

dheerendra ने कहा…

अच्छा संकलन ,बढ़िया प्रस्तुति

सदा ने कहा…

एहसासों का अनुपम संयोजन जिनके बीच खुद को पाना अच्‍छा लगा .. आपका बहुत-बहुत आभार ...

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

ek khwaish apni bhi..:)
sab mujhe padhen.. beshak mere likhne ke andaaj me wo painapan na aa paye to bhi..:)
thanx Rashmi di... for sharing my one of the old post:)

vidya ने कहा…

बहुत बहुत सुन्दर रश्मि दी...

आप तो पारखी हैं...आज के नायाब हीरे वाकई अनमोल हैं..
सुन्दर प्रस्तुति और सभी रचनाएँ सुन्दर..

वन्दना ने कहा…

बेहद खूबसूरत दिलफ़रेब कवितायें संजोयी हैं।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

खूबसूरत काव्य संकलन!!!

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

अच्छा संकलन,बहुत सुन्दर प्रस्तुति !

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

आज बुलेटिन लाजवाब रहा।

सादर

Pallavi ने कहा…

बहुत ही उम्दा संकलन....

Anupama Tripathi ने कहा…

बहुत बढ़िया संकलन ....

Archana ने कहा…

कई पन्ने अब एक ही पन्ने पर ...आसानी से ...शुक्रिया!

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

shukriya rashmi ji ....kai ehasaas ek saath ek panne par accha laga padh kar ..

shikha varshney ने कहा…

अच्छा संग्रह.

mahendra verma ने कहा…

महफिल में अपने-आप से मुलाकात की अनुभूति.......!
बहुत अच्छा लगा !!

mahendra verma ने कहा…

महफिल में अपने-आप से मुलाकात की अनुभूति.......!
बहुत अच्छा लगा !!

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुंदर काव्य संकलन...

anju(anu) choudhary ने कहा…

वाह...बहुत बढिया काव्यों का संग्रह

Gunjan ने कहा…

क्या बात बहुत खूब .. कभी बन जाती हूँ कृष्णा की बांसुरी .. तो कभी राधा की हंसी
रंजू जी की .. ख्वाइश
महेंद्र जी का ज़िक्र .. कभी तितलियों का, कभी सखियों का
साकेतजी के साथ .. गरमा गरम काफ्फी
सदा जी की .. यादें जो आंसुओं में सिमट गयीं
मुकेशजी की .. पुकार वक़्त को संवारने की
वाणभट्टजी के .. अनुसार सबके सच अपने अपने होते हैं
सभी को पढ़ कर बहुत बढ़िया लगा
बेहतरीन रचनायें ये सिलसिला यूँ ही चलता रहे
मेरी शुभकामनायें सभी गुनी जनों को .. सादर

Vibha Rani Shrivastava ने कहा…

मुक्ति शब्द -प्रश्न-चिन्ह बनकर खड़ा हो जाता है,

जिसका जवाब नहीं!!!
तो, जतन से सहेज रखा है -
यादों की इस पोटली को
जिस दिन विदा लूंगी -
यह भी साथ चली जायेगी!

अम्माँ को चरण-वन्दना.... ! नहीं ,अभी विदाई की बात नहीं अम्माँ.... !!जानती हूँ , स्वार्थ है ,फिर भी अभी नहीं.... !
*******************************************@विद्या जी से सहमत हूँ..... !आप तो पारखी हैं...आज के नायाब हीरे वाकई अनमोल हैं..
सुन्दर प्रस्तुति और सभी रचनाएँ सुन्दर..... :):)

साकेत शर्मा ने कहा…

इस मंच पर मेरे शब्द लाने का बहुत बहुत धन्यवाद...

kanu..... ने कहा…

pahli baar rashmi aunty ne ye link bheji aur main yaha tak aa gai.accha laga lagbhag sare lekhkon ke blog padhe hain pahle par sabko eksath dekhkar maza aa gaya

वाणी गीत ने कहा…

शानदार संकलन !

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति ...

KAVITA ने कहा…

बहुत बढ़िया काव्य संकलन प्रस्तुति....धन्यवाद!

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

sabhi rachnaayen behatareen. sabhi ko badhai aur shubhkaamnaayen.

Neelam ने कहा…

haar ek rachnaa behtreen hai bahut sunder, Aap sabhi ko dher sari shubhkaamnaayen.

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