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सोमवार, 28 नवंबर 2011

मेरे देश में सब बिकता है ... खरीदोगे ??? - ब्लॉग बुलेटिन

सभी मित्रों को देव बाबा की राम राम..... लीजिये आज के बुलेटिन की शुरुआत एक मुद्दे के साथ करते हैं....

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आज सुबह के अखबार की एक खबर थी "समाचार पत्र 'मिड डे' के वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या के सिलसिले में पुलिस ने शुक्रवार को एक अंग्रेजी समाचार पत्र एशियन एज की महिला पत्रकार को गिरफ्तार किया। उन्हें अदालत में पेश किया गया।"  मन सोच में पड़ गया की आखिर एक पत्रकार कैसे एक पत्रकार की हत्या की साजिश रच सकता है, क्या यह कोई नयी साज़िश है? जो भी हो, हमें अपने देश की न्याय-पालिका में विश्वास रखना चाहिए.. जो भी होगा सामने आएगा.... लेकिन एक लोक-तांत्रिक देश में पत्रकारिता एक मजबूत स्तम्भ है..... पत्रकार सामान्य जनता का सचेतक है, हितैषी है..... सोती हुई सरकारों को जगाने के लिए और हर सामाजिक मुद्दे पर पत्रकारिता ही जनता की नुमाइंदगी है....

लेकिन......     आज बात इसी लेकिन पर आकर रुक गयी है..... आखिर आज की पत्रकारिता वास्तव में निष्पक्ष है ? देख कर लगता तो कतई नहीं..... आज कल के तथाकथित क्राइम पत्रकार खबर के नाम पर अंदर-वर्ल्ड के साथ मिलकर ऐसी भी साज़िश रच सकते हैं ? क्या कहियेगा.... आज कल हर किसी पर बाज़ार हावी है.... यह बाज़ार हर किसी को चका-चौंध कर सकता है.... खबर को तोडा मरोड़ा जाता है..... हर बात के नफे और नुकसान का बखूबी आंकलन होता है.... सावधानी के साथ उसकी सैटिंग होती है..... और फिर सौदा हो जाता है..... यही है आज कल की सच्चाई.... क्या कहें... ?

हंगामे खड़े होंगे....
सियासी बवाल खड़े होंगे....
मेरे इस लोक-तंत्र पर ..
फिर से सवाल खड़े होंगे...

शायद कभी तो हिंदुस्तान के पत्रकारों को अपने सरोकार और कर्तव्य-परायणता की याद आएगी..... हमारा लोक तंत्र आज कल एक अजीब से दौर से गुज़र रहा है..... महंगाई अपने चरम सीमा पर है, सरकार की आँखे बंद हैं, क्योंकि सत्ता पर कोई आंच नहीं है..... और उनकी सत्ता निर्बाध चलती रहेगी...  जनता का रोष अपने चरम पर है..... लेकिन क्या कहियेगा..... पहली बार ऐसा लग रहा है जैसे इस लोक-तंत्र में ना पक्ष है और ना ही विपक्ष... पत्र-कारिता में हो चुके इस बदलाव की बात कहनी ही क्या ?
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अब इन लिंक्स पर गौर फरमाइए..... 
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चलिए आज का बुलेटिन यहीं समाप्त करते हैं..... फिर मिलेंगे..... 
जय हिंद 
देव कुमार झा

8 टिप्पणियाँ:

Pallavi ने कहा…

इस विषय पर एक बहुत ही बढ़िया फिल्म बनी थी नाम तो याद नहीं अरहा है मुझे मगर उसमें मेरे सबसे ज्यादा पसंदीदा कलाकार श्री अमिताभ बच्चन जी ने अभिनय किया था .... और उस फिल्म को देख कर लगा था कि कि वास्तव में यही सच्चाई है हमम्रे मीडिया,न्यूज़ चेन्नल्स और अखबारों कि भी...बढ़िया पोस्ट समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है ....

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

Pallavi ने आपकी पोस्ट " मेरे देश में सब बिकता है ... खरीदोगे ??? - ब्लॉग ब... " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

इस विषय पर एक बहुत ही बढ़िया फिल्म बनी थी नाम तो याद नहीं अरहा है मुझे मगर उसमें मेरे सबसे ज्यादा पसंदीदा कलाकार श्री अमिताभ बच्चन जी ने अभिनय किया था .... और उस फिल्म को देख कर लगा था कि कि वास्तव में यही सच्चाई है हमम्रे मीडिया,न्यूज़ चेन्नल्स और अखबारों कि भी...बढ़िया पोस्ट समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है ....

शिवम् मिश्रा ने कहा…

माफ़ करना पहले आना नहीं हो पाया ...
बेहद जरुरी मुद्दा उठाया है ... और यह भी आजका एक बेहद कडवा सत्य है कि आज की पत्रकारिता में अब वो बात नहीं रह गई ... मैनपुरी जैसे छोटे शहर में ही आये दिन मुझे इसके उदहारण देखने को मिलते रहते है ... पर बात वही है कि जहाँ कोई भी ना बोलता हो वहाँ हम ही बोल कर सब से बैर क्यों लें ... वैसे भी अपना कौन सा रोज़ रोज़ पाला पड़ना है इन लोगो से !

बढ़िया लिंक्स मिले ... आभार !

shikha varshney ने कहा…

जी हाँ सब बिकता है..और जो नहीं बिकता उसे खतम कर दिया जाता है.
बढ़िया बुलेटिन है.

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

shikha varshney ने आपकी पोस्ट " मेरे देश में सब बिकता है ... खरीदोगे ??? - ब्लॉग ब... " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

जी हाँ सब बिकता है..और जो नहीं बिकता उसे खतम कर दिया जाता है.
बढ़िया बुलेटिन है

अजय कुमार झा ने कहा…

प्रस्तावना हर बार एक सवाल उठाती है और इस बुलेटि्न को सार्थक बनाते है । लिंक्स सब चकाचक हैं अभी बांचते हैं पोस्टवा सब को भी

बी एस पाबला BS Pabla ने कहा…

बढ़िया

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

एक चिट्ठा खरीदना है
बोलो बेचोगे

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