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मंगलवार, 19 नवंबर 2013

प्रतिभाओं की कमी नहीं 2013 (11)

ब्लॉग बुलेटिन का ख़ास संस्करण -



अवलोकन २०१३ ...

कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०१३ का ११ वाँ भाग ...



आत्महत्या न कायरता है 
न बदले की भावना 
यह उस क्षण का शोध विषय है 
कि किस बात की अति ने सारे रास्ते अवरुद्ध किये !
कारण - बाह्य है या आंतरिक !
आवेश,गहन अवसाद, सट्टा,ब्लैकमेलिंग ....... कई कारण हैं 
कहीं संवेदना,कहीं परिवर्तन,कहीं साथ की ज़रूरत होती है 
समझदारी भरे लफ़्ज़ों से बेहतर है 
संवेदनशील खामोशी !!!


अभिव्यक्ति – जो महसूस किया अपने आस पास उसे अपने शब्दों में व्यक्त करने का एक प्रयास एक ऐसा प्रयास जो सहज हो, ईमानदार हो…… बिना किसी बनावट के व्यक्त हो… मानों कोई नदी …. जो उद्दाम अविरल अबाध गति से उमड़ती चली जाती है. ज़िन्दगी की राह में, सुख-दुःख जो भी मिला साथ साथ बह चला, और रचता गया हर पल एक नयी अभिव्यक्ति !!
(मंजु मिश्रा)

…..

रिश्ते जो
फ्रेम में जड़े
टंगे रहते हैं  दीवारों पर
यूँ तो
बहुत खूबसूरत लगते हैं
देखने वालों को
लेकिन अक्सर
टंगे हुए रिश्ते
बस टंगे ही रह जाते हैं
न जीते हैं न मरते हैं
बस….
अन्दर-ही-अन्दर घुटते हैं
कभी कभार उनको
बाहर निकाल कर
धूप  और हवा भी लगानी चाहिए
वर्ना कीड़े लग जाते हैं
और अन्दर ही अन्दर छीज कर
कब ख़त्म हो जाते हैं पता ही नहीं चलता……!


(अमृता तन्मय)

आँधियाँ तो चल रही है
चुपचाप ही सही
बोझिल-सी , डगमगाती-सी
बिना सन सन सन के
तुम्हारे ही बंद दिशाओं में...

प्राणों में पुंजित पीर है
नयन में नेही नीर है
हिम-दंश सहता ये ह्रदय-हवि
अभी तक जमा नहीं है
साँसों का गीत भी थमा नहीं है...
जो तुम्हारे सागर पर
उत्पीड़ित धूप-सा जलता रहेगा
अपने काँधे पर तुम जाल फैलाए रहो
तो भी तुम्हारे सतह पर पिघलता रहेगा....

आँधियाँ कल जो इधर आ रही थी
अब भी उड़ती है , फड़फड़ाती है
तुम्हारे ही बंद आकाश में
कबतक रोके रहोगे उसे प्रस्तर-पाश में ?

चाहो तो मना कर दो
उन पत्तियों को कि चुटकियाँ न बजाये
उन डालियों को कि चुटकियाँ न ले
और उन तरु-वृंदों को कि चुटकियों में न उड़ाये
आँधियों के इंगित को
इंगित के उन अंत:स्वर को
जो मन्त्र-भेद करता है ...

आँधियाँ है बहती रहेंगी
चुपचाप ही सही
तुम्हारा दिया पीर भी सहती रहेंगी
चुपचाप ही सही
जिसकी पड़पड़ाहट सुन कर
चिड़ियों से चुक-चुक , चिक-चिक चहकेंगी ही
उन मुरझाई कलियों से
किलक कर कुसुमावलि फूटेंगी ही....

तुम लाख उन्हें रोकने की ठानो
या उनके इंगित को मानो न मानो
पर चुपचाप ही सही
आँधियों का धर्म ही है बहना
जो जानती नहीं है कभी थमना...

यदि थम गयी तो स्वयं ही हाँफने लगेंगी
और उस अंतगति की उपकल्पना मात्र से ही
ये पूरी सृष्टि कलप कर काँपने लगेगी .

मन में उठने वाले हर भाव हर अह्सास को शब्दों में बाँध, उन्हें सार्थक अर्थों में पिरोकर एक नया आयाम देना चाह्ती हूँ । भावनाओ के इस सफर में मुझे कदम-कदम पर सहयोगी मित्रों की आवश्यकता होगी.. आपके हर सुझाव मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...
(माहेश्वरी कनेरी)

तुम्हें याद है न..
कभी तुम्हारे अंदर एक गाँव बसा करता था
लहलहाते खेतों की ताज़गी लिए
भोला भाला,सीधा साधा सा गाँव
और उसी गाँव में मेरा भी घर हुआ करता था
मिट्टी से लिपा हुआ भीनी भीनी खुशबू लिए
सुखद अहसासों से भरा,चन्द सपने बटोरे
एक छोटा सा प्यारा घर
पर तुम ने ये क्या किया
प्यार के इस लहलहाते खेत को
पकने से पहले ही उजाड़ दिया
और वहाँ एक शहर बसा लिया
अब तो मेरा घर भी घर न रहा
पत्थर का मकान बन गया
मुट्ठी भर सपने और वो सुखद अहसास
उसी पत्थर के नीचे कही दब कर सो गए
और मैं बेघर हो ,भटक रही हूँ
तुम्हारे इस पत्थर के शहर में..


कोई है ? जो निकाले उन सपनों को और एक सपना दे जाये - अब सबकुछ अच्छा होगा :)

12 टिप्पणियाँ:

रंजू भाटिया ने कहा…

अभी बैठ के सभी बुलेटिन पढ़े अद्भुत संग्रह बन गया है यह तो एक एक रचना बहुत बढ़िया ली है आपने इस में बहुत मेहनत का कार्य है यह रश्मि जी सलाम आपकी इस मेहनत को :)

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

सभी रचनाएं बेहतरीन

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

सुंदर मनके की माला के तरह, सुंदर खूबसूरत मोतियाँ :) इनको पिरोने के लिए दीदी और शिवम को धन्यवाद .......... !!

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

सभी को पढ़ता रहा हूं।
बहुत बढिया संकलन

नीलिमा शर्मा ने कहा…

क्या कहू .लफ्ज़ ही रिक्त हो गये हैं इनती खूबसूरत पोस्ट रोजाना शेयर हो रही हैं .... एक से बढ़कर एक

Amrita Tanmay ने कहा…

सच! बड़ा मनभावन है इस खास बुलेटिन की खास प्रस्तुति और प्रस्तुतिकर्ता के लिए तो बस ...शुभकामनाएं..

shikha varshney ने कहा…

सब मनभावन .

शिवम् मिश्रा ने कहा…

@मुकेश कुमार सिन्हा साहब ...

यह आपका स्नेह है मेरे प्रति ... :)

अवलोकन का आइडिया रश्मि दीदी का है ... और पिछले दो सालों के अनुभव और इस साल के अब तक के अनुभव के आधार पर हम सब यह कहते नहीं थक रहे है कि "व्हाट एन आइडिया ... रश्मि दीदी जी!"

अवलोकन २०१३ का सफर जारी है ... आइये हम सब एक साथ इस का आनंद लें |

Kailash Sharma ने कहा…

आत्महत्या न कायरता है
न बदले की भावना
यह उस क्षण का शोध विषय है
कि किस बात की अति ने सारे रास्ते अवरुद्ध किये !
....लाज़वाब...सभी रचनाएँ बहुत सुन्दर...

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाकई लाजवाब !

सदा ने कहा…

कहीं संवेदना,कहीं परिवर्तन,कहीं साथ की ज़रूरत होती है
समझदारी भरे लफ़्ज़ों से बेहतर है
संवेदनशील खामोशी !!!
................. जो अक्‍़सर बहुत कुछ कह जाती है खामोशी से
सभी रचनाएँ एक से बढ़कर एक, सभी रचनाकारों को बधाई सहित शुभकामनाएँ

अनाम ने कहा…

रश्मि जी ,

आपका बहुत बहुत आभार एवं हार्दिक धन्यवाद् ! ……. आपका ब्लॉग बुलेटिन एक बार पढ़ना शुरू किया तो बस पढ़ती ही चली गयी …एकदम सही शीर्षक दिया है आपने "प्रतिभाओं की कमी नहीं…" आपने तो बस एक ऐतहासिक दस्तावेज तैयार कर दिया है। आपने इस दोहे को बिलकुल सार्थक कर दिया "साधू ऐसा चाहिए जैसे सूप सुभाय…सार सार को गहि रहे थोथा देय उड़ाय" हमारे लिए तो आपने बस यही किया है, अच्छे से छान पछोर कर सुन्दर सुन्दर स्तरीय रचनाओं और रचनाकारों एक साथ एक जगह प्रस्तुत किया है ...…आपके इस अथक प्रयास के लिए एक बार पुनः हृदय से धन्यवाद

मेरी अभिव्यक्ति को फ्रेम में जड़े रिश्ते….. के माध्यम से इस संग्रह में स्थान देने के लिए आभार !!!

सादर
मंजु

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बुलेटिन में हम ब्लॉग जगत की तमाम गतिविधियों ,लिखा पढी , कहा सुनी , कही अनकही , बहस -विमर्श , सब लेकर आए हैं , ये एक सूत्र भर है उन पोस्टों तक आपको पहुंचाने का जो बुलेटिन लगाने वाले की नज़र में आए , यदि ये आपको कमाल की पोस्टों तक ले जाता है तो हमारा श्रम सफ़ल हुआ । आने का शुक्रिया ... एक और बात आजकल गूगल पर कुछ समस्या के चलते आप की टिप्पणीयां कभी कभी तुरंत न छप कर स्पैम मे जा रही है ... तो चिंतित न हो थोड़ी देर से सही पर आप की टिप्पणी छपेगी जरूर!

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