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शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

उतना ही लो थाली में जो व्यर्थ न जाये नाली में

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

कचरे में फेंकी हुई रोटी
रोज़ ये बयां करती है...

कि पेट भरने के बाद
इन्सान अपनी औकात भूल जाता है।

सादर आपका

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आस अभी ज़िंदा है

दोहे

सखा

झारखण्ड एक्सप्रेस 5

गुलमर्ग - विश्वप्रसिद्ध पर्वतीय स्थल की सैर 

चीजलिंग का नाश्ता

लाशों को गिनने का सिलसिला बंद होना चाहिए

वीर कथाएँ और प्रणय प्रस्ताव

कब साकार होगा नशा मुक्त देवभूमि का सपना

गेंहू के संग घुन पिसता हो तो पिसे

कुनू अमू

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

8 टिप्पणियाँ:

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

अभी तो दोहे बांच कर आनन्दित हूँ...वाह!

Kavita Rawat ने कहा…

प्रेरक सन्देश के साथ सुन्दर बुलेटिन प्रस्तुति में मेरी पोस्ट शामिल करने हेतु आभार!

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बढ़िया बुलेटिन काफी दिनों के बाद आये शिवम जी ।

ऋता शेखर 'मधु' ने कहा…

सुन्दर सन्देश देती बुलेटिन...जितना खा सको उटना ही लो थाली में...मेरी रचना को स्थान देने के लिए शुक्रिया...और उनका भी आभार जो दोहे पढ़कर टिप्पणी किए|

रश्मि प्रभा... ने कहा…

रोटी कब नाच नचा दे, कोई नहीं जानता

RD PRAJAPATI ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति!
www.travelwithrd.com

शिवम् मिश्रा ने कहा…

आप सब का बहुत बहुत आभार |

Alaknanda Singh ने कहा…

ब्‍लॉग बुलेटिन से शिवम मिश्रा जी, मेरे ब्‍लॉग '' अब छोड़ो भी''को जगह देने के लिए धन्‍यवाद

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