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बुधवार, 27 जून 2012

जब से हम तबाह हो गए , तुम जहांपनाह हो गए.......ब्लॉग बुलेटिन





कल अचानक ही भाई शिवम मिश्रा जी ने एक पोस्ट सरकाई , हम आपस में पोस्ट ठेलाई और पढम पढाई करते रहते हैं , जी ठीक उसी तरह जैसे बचपन में पकडम पकडाई होता था  न , अब क्या करें  दोनों ही ठहरे खबरीलाल , पोस्टों पर  टहलते रहना हमारा प्रिय काम होता है । अब चूंकि बुलेटिन के रपोटर भी हैं दोनों इसलिए ये स्वाभाविक भी लगता है । और हम दोनों ही क्यों , बल्कि हम सब बहुत से साथी ब्लॉगर्स एक दूसरे को पोस्टों का संदर्भ , लिंक यदाकदा देते ही रहते हैं , मैं तो खूब सरकाता हूं एक से दो दो से चार तक यूं पहुंचने वाली पोस्टें । तो बात बुलेटिन की चल रही थी , हमें बडा आनंद आता है पोस्टों को पढने में । और अगर इस आनंद प्राप्ति का दूसरा लाभ ये हो कि अपने दोस्तों /मित्रों के लिए एक ही मंच पर कुछ खूबसूरत पोस्टों को एक साथ माला में पिरो कर दे दिया जाए तो हुआ  डबल मुनाफ़ा । और अगर कोई दोस्त फ़िर उस कोशिश की हौसलाअफ़ज़ाई कुछ यूं करे तो , समझिए कि कसम से पुरनकी सिलेमा की शरमाती सकुचाती नायिका समान लजा से जाने वाले फ़ोटो को चस्पा कर भावानों को व्यक्त करने का मन हो जाता है । देखिए कि योगेंद्र पाल जी क्या कहते हैं ,


yogendra's picture

ब्लॉग बुलेटिन - ब्लॉग जगत की बगिया के रोज के चुनिन्दा फूल


इसमें वो एक जगह पर  लिखते हैं ,ब्लॉग बुलेटिन की दूसरी विशेषता हैं, मेहमान रिपोर्टर जिनकी पोस्ट एक ठंडी हवा के झोंके की तरह होती है, जिसमें एक अलग ही खुशबू होती है तथा पाठकों को एक ताजगी दे कर जाती है| एक बार यह सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हो चुका है| समय समय पर ब्लॉग बुलेटिन टीम ब्लॉग जगत की हस्तियों से उनके पसंद के ब्लॉग तथा किसी खास विषय पर उनके विचार के बारे में अपने ब्लॉग पर लिखती रहती है| जिससे पोस्टों में स्फूर्ति बनी रहती है, मेरे विचार में यह एक अच्छा तरीका है बिना लेखक संख्या बढाए अपने पाठकों को कई प्रकार के लेख देने की|
    ब्लॉग बुलेटिन पर लेखों की श्रंखला उसका एक बेहतर प्रयोग है, जिसमे से यह प्रमुख हैं
    • इस क्रम में सबसे पहली श्रंखला है "ब्लॉग की सैर" जो कि रश्मि जी के द्वारा निकाली गयी| अब तक इस श्रंखला में 8 लेख प्रकाशित हो चुके हैं, इस श्रंखला में रश्मि जी ने सिर्फ कविताओं को स्थान दिया, यदि आप कविताओं के शौक़ीन हैं तो आपको ब्लॉग बुलेटिन की इस श्रंखला को जरूर पढ़ना चाहिए|
    • "यादों की खुरचनें" यह दूसरी श्रंखला का नाम है और यह भी रश्मि प्रभा जी के द्वारा ही निकाली गयी है, इसमें सिर्फ उन कड़ियों को शामिल किया जाता है जिसमें लेखक अथवा कवि अपने बीते दिनों को याद करते हुए कुछ लिखता है| अभी तक इस श्रंखला में कुल 9 लेख लिखे जा चुके हैं, यदि आप भी अतीत में जाना चाहते हैं तो इस श्रंखला की सभी कड़ियों को जरूर पढ़ें|
    • सबसे बेहतरीन श्रंखला मुझे लगी और जिसका अब मैं बेसब्री से इंतज़ार भी कर रहा हूँ वह है "101 लिंक एक्सप्रेस"| यह ब्लॉग जगत में ब्लॉग बुलेटिन के द्वारा किया गया एक अनूठा प्रयोग है इसमें आपको मिलती है 101 अच्छे लिंकों की एक लंबी लिस्ट इस पोस्ट को पढ़ कर ऐसा लगता है कि मन तृप्त हो गया अब और कुछ नहीं चाहिए| इस श्रंखला में अभी तक 3 पोस्ट आयीं हैं और यह अजय कुमार झा जी के द्वारा निकाली गयी है|

क्या कहें , योगेंद्र भाई , आपकी सराहना , आपकी आलोचना सर माथे , उम्मीद करेंगे कि आपके सुझावों पर जल्दी ही काम किया जा सके । आपका आभार । और हां , भाई योगेंद्र पाल जी को हमारी टीम सहित पूरे ब्लॉग जगत की तरफ़ से हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं , आप गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने जा रहे हैं ,


चलिए बहुत हो लिए अपने मुंह मियां मिट्ठू , वर्न असलियत तो ये है कि अभी तो कायदे से पोस्ट पढनी भी नहीं आई है , लगे हैं चर्चाने । पोस्टों में प्रवीण पांडे जी की कोई पोस्ट जैसे ही हमारे मेल में आती है हम उस पर पहुंच जरूर जाते हैं , पढ भी जाते हैं सरसरी फ़रफ़री तौर पे , बातों को आ हमारे जैसे भुसकोल विद्यार्थियों के लिए तो जरूर ही कठिन बातों को कमाल की सरलता से कह जाते हैं , एकदम सिंपल सोबर ब्लॉग और वो पुराने जमाने की आर्ट सिनेमाई क्रेज़ लिए हुए पोस्टें , आज की पोस्ट में जनाब बचपन के सुभाषितों के बहाने जीवन में सहजता को सुंदर रूप में परिभाषित कर गए


"बस ऐसे ही विचार तब आये जब कबीर का यह दोहा पढ़ा,

सहज मिले सो दूध सम, मांगा मिले सो पानि

कह कबीर वह रक्त सम, जामें एंचातानि।


कोउ समझाये मन की भाषा
आशय स्पष्टतम है, जो सहजता से प्राप्त हो वह दूध जैसा है, जिसके लिये किसी से झुककर माँगना पड़े वह पानी के समान है और जिसके लिये इधर उधर की बुद्धि लगानी पड़े और दन्द-फन्द करना पड़े वह रक्त के समान है। किसी घर में संपत्ति संबंधी छोटी छोटी बातों पर जब झगड़ा होते देखता हूँ तो बस यही दोहा मन ही मन बुदबुदाने की इच्छा होती है। भाईयों का रक्त बहते तक देखा है, यदि न भी बहे तो भी संबंधों का रक्त तो निश्चय ही बह जाता है, संबंध सदा के लिये दुर्बल और रोगग्रस्त हो जाता है।

बहुत लोग ऐसे हैं, जिन्हें छोटी छोटी बातों के लिये झगड़ा करना तो दूर, किसी से कुछ माँगना भी नहीं सुहाता है। ऐसे दुग्धधवल व्यक्तित्वों से ही विश्व की सज्जनता अनुप्राणित है। ईश्वर करे उन्हें उनके कर्मों से सब सहज ही मिलता रहे। ईश्वर करे कि जो ऐसी आदर्श स्थिति में नहीं भी है, उन्हें भी कम से कम वह रक्त तो दिखायी पड़े जो हमारे छलकर्मों से छलक आता है।


मनन कीजिये, मन स्वीकार करे तो भजन कीजिये, कबीर के साथ, 'सहज मिले तो....'"




पोस्ट अच्छी हो तो टिप्पणियां भी अपने आप अच्छी और बहुत अच्छी करते हैं पाठक , इस पोस्ट पर कमाल की टिप्पणियां हैं , मेरे टिप्पणी चर्चा वाले ब्लॉग के लिए लेकिन एक टिप्पणी तो आप अभी पढिए , गोदियाल जी कहते हैं ,


"ऐसे दुग्धधवल व्यक्तित्वों से ही विश्व की सज्जनता अनुप्राणित है।"
और यह प्राणी अब लुप्तप्राय है, इस धरा से ! जो इक्के-दुक्के सज्जन वृन्द वाकई निष्काम भाव से अपने ज्ञान का खजाना लुटा भी रहे है उन्हें आज इन हरामखोर बाबा/स्वामियों ने ओवरटेक कर दिया !

आपने कहा " कई प्रश्न होते हैं जो उत्तरित होने में समय लेते हैं। धन के प्रति अधिक मोह न पिताजी में देखा और न ही कभी स्वयं को ही मोहिल पाया। ऐसा भी नहीं था कि धन के प्रति कोई वितृष्णा रही हो। अधिक धन के प्रति न कभी जीवन को खपा देने का विचार आया और न ही कभी वैराग्य ले हिमालय प्रस्थान की सोच। जितना है, जो है, सहज है। जहाँ धन की सर्वोच्चता स्वीकार नहीं रही है, वहीं कभी धन के महत्व को नकारा भी नहीं है।"

इस बाबत शायद मेरा कथन कुछ दकियानूसी सा लगेगा किन्तु चूंकि मुझे जान्ने के बाद रोचक लगा था इसलिए यहाँ कहना पसंद करूंगा कि यदि आप ब्राह्मण है ( ब्राह्मण से मेरा यह कतई तात्पर्य नहीं है कि किसी ने सिर्फ किसी ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया हो, ब्रह्मण से तात्पर्य है विद्वान, विवेकशील और आचरणशील इंसान) तो शायद यह आप भी जानते होगे कि आप भले ही इच्छा भी रखते हों और लाख कोशिश भी कर ले तब भी आपको अपार दौलत नहीं मिलेगी, और न ही आपके समक्ष कभी भूखा रहने की समस्या खडी होगी बस यों समझिये कि ठीकठाक गाडी चलती रहेगी ! उसकी वजह मेरे एक कश्मीरी सीए मित्र यह बताते हैं कि चूँकि ब्राह्मण सरस्वती का उपाषक होता है ! और धन लक्ष्मी के हाथों का कमल ! जिसे लक्ष्मी अपने हाथों में उठाये रखती है उसे सरस्वती पैरों तले रखती है ! किम्वदंती है कि शायद यही इगो एक सरस्वती उपासक को धनवान नहीं बनने देता ! :)



आज जहां हम अपनी साइट पर , खुद को बडा फ़न्ने खां एग्रीगेटर घोषित करके चुपचाप निकल लिए हैं , चुपचाप इसलिए कि किसी के भी वहां पहुंच कर टीपने का खतरा नहीं है , कम से कम पिछली पोस्टों के हिसाब से तो जरूर ही , वहीं , डॉ दिव्या श्रीवास्तव उर्फ़ ज़ील जी ने ब्लॉगर्स की दो कटेगरियों का निर्धारण करने हेतु एक सूचना जारी की है, 

जहां पहुंच कर अपनी अपनी कैटगरी पर चिन्हासी मार देने में ही भलाई लग रही है मुझे तो । उधर दूसरी तरफ़ अनुराग जी ने आभासी सम्बन्धऔर ब्लॉगिंग       , को समझाते हुए कहा ,


"

मेरी नन्ही ट्विटर मित्र
आपके तथाकथित मित्र फेसबुक या गूगल प्लस पर आपकी ‘फ्रैंड रिक्वैस्ट’ ठुकरा कर, या अपने ब्लॉग पर आपकी टिप्पणियों को मॉडरेट करके या फिर इससे आगे जाकर आपके विरुद्ध पोस्ट पर पोस्ट लिखते हुए आपकी टिप्पणियाँ प्रकाशित न करके या फिर टिप्पणी का विकल्प ही पूर्णतया बन्द करके आपको चोट पहुँचाते जा रहे हैं तो आपको खराब लगना स्वाभाविक ही है। आपकी फेसबुक वाल या गूगल प्लस पर कोई आभासी साथी आकर अपना लिंक चिपका जाता है। आप क्लिक करते हैं तो पता लगता है कि पोस्ट तो केवल आमंत्रित पाठकों के लिये थी, लिंक तो आपको चिढाने के लिये भेजे जा रहे थे। किसी हास्यकवि ने विवाह के आमंत्रण पत्र पर अक्सर लिखे जाने वाले दोहे की पैरोडी करते हुए कहा था:

भेज रहे हैं येह निमंत्रण, प्रियवर तुम्हें दिखाने को
हे मानस के राजकंस तुम आ मत जाना खाने को
ताज़े अध्ययन का लब्बो-लुआब यह है कि आभासी जगत में होने वाला अपमान भी उतना ही दर्दनाक होता है जितना वास्तविक जीवन में होने वाला अपमान। "
और टिप्पणियों के तो कहने ही क्या , देखिए ,



Reply
वाह! खरी खरी खूब कही।

कमेंट का विकल्प कभी-कभी मैं भी बंद कर देता हूँ। इसके पीछे दो कारण हैं एक तो जब कभी दूसरे ब्लॉग को प्रमोट करना हो, वहां के कुछ अंश कट पेस्ट कर लगा देता हूँ। उस ब्लॉग का लिंक दे देता हूँ चाहता हूँ कि जिन्हें कमेंट करना है वहीं करें।

दूसरे तब जब समय का अत्यधिक अभाव रहता है। कमेंट का उत्तर देने की स्थिति में नहीं रहता। कोई एकाध चित्र लगाने का मूड किया, जानता हूँ लोग पसंद करना चाहेंगे तो टिक लगाकर अपनी पसंद जाहिर कर ही देंगे।

जहाँ तक ब्लॉग सुरक्षित करने की चिंता है तो वह नहीं है। एक विजेट के चक्कर में ब्लॉग सुरक्षित हो गया। विजेट तो दोस्तों की आपत्ति पर हटा दिया मगर ब्लॉग की सुरक्षा हटाना ही नहीं आया।:)

आपकी आपत्ति जायज है सो अपनी सफाई दे दी ताकि भ्रम हो तो टूट जाय। शेष तो कभी कभार मौज ले लेता हूँ, जो मुझे जानते हैं बुरा नहीं मानते। मेरा विश्वास है कि 4,5 वर्षों के आभाषी संबंध छोटी-मोटी बातों से टूटा नहीं करते।

विषय बढ़िया है, विमर्श का स्वागत है।




  1. बढ़िया कैटेगराईजेशन रहा।

    आमंत्रण आधारित जमात तो कुछ यूँ होती है कि जो घूम घूम कर दूसरों के यहां का जायजा लेती है और जायजे अनुसार पोस्टें लिखती है और जब उसके शीर्षक आदि पढ़कर ब्लॉग पर जाओ तो पता चले कि आमंत्रण वाला ब्लॉग है।

    इसी प्रवृत्ति को मराठी में कहा जाता है कि "स्वत:चा ठेवायचा झाकून आणि दुसर्यांचा बघायचा वाकून" ( खुद का तो ढक कर रखते हैं लेकिन दूसरों का झुक कर देखते हैं )

    ब्लॉगिंग के संदर्भ में मैं इस प्रवृत्ति को "शामियाना ब्लॉगिंग" कहूँगा। ऐसे घरघुमनी प्राणी यही सोचकर मगन रहते हैं कि हमने तो खूब ललचाया, हमने तो खूब छकाया। तीसरी कसम फिल्म का वो सीन याद आता है जिसमें नौटंकी का पास पाकर हीरामन दूसरों को चिहा चिहा कर दिखाता है कि मेरे पास तो पास है पास...वरना वो लाईन देखी :)

    बहुत संभव है आमंत्रितगण भी शायद खुद को हीरामन समझ रहे होंगे :)

    इस सारी कवायद का प्रारूप कुछ उस तरह का भी है जिसमें बच्चे अंगूठा दिखाकर लुलुआते हुए चिढ़ाते हैं .... तो कुछ वैसा ही सुख मिलता होगा आमंत्रणबाजी से। उपर से गर्व भी करते हैं कि ट्रेण्ड सेटर हैं। लेकिन ऐसे लोगों को यह नहीं मालूम कि लोग ब्लॉगिंग के शुरूवाती काल में ही प्राईवेट ब्लॉग अपने लिये बनाकर रखते थे, यार दोस्तों से कम्यूनिकेट करते थे। चार साल पहले जब मैं अपने ब्लॉग के लिये डोमेन ढ़ँढ रहा था तब कई आमंत्रित ब्लॉग दिखे थे। ऐसे ब्लॉगों का उद्देश्य यदि सब्जेक्ट वाईस हो या किसी समुदाय आधारित हो तो समझा जा सकता है कि खास समुदाय या वर्ग के लोग ही शरीक हो सकते हैं लेकिन जहां ब्लॉगिंग के मजमें में खुद तो शामिल होकर तमाशा देखा जाय और उन बातों को संदर्भित कर आमंत्रित ब्लॉग पर पोस्ट लिखी जाय तो इस प्रकार की "शामियाना ब्लॉगिंग" उन्हें ही मुबारक।

    बाकि पोस्ट तो चकाचक है :)
  1. पढ़ लिया
    समझ लिया की आप परेशान हैं
    और हिंदी ब्लॉग लेखन को सुधारना चाहते हैं , हम भी चाहते थे गलत थे , अपने को अलग कर लिया , गूगल की दियी हुई सुविधा से अब खुश हैं , क्युकी पाठक वो हैं जिनको मेरे लिखे में रूचि हैं , नाकि वो हैं जो केवल इस लिये मुझे पढते हैं की आगे जाकर मुझे नकारात्मक कह सके .
    गूगल प्लस पर लिंक देना , ये सुविधा गूगल से हैं . वही एक दूसरी सुविधा भी हैं की जिन से आप को परेशानी हो उनको आप ब्लाक कर दे , मत जुड़े उनसे . उसका उपयोग करे क़ोई लिंक आप को गूगल प्लस पर परेशां नहीं करेगा .
    ब्लॉगर कौन होता हैं इस विषय में भी कुछ पढना हो तो मुझ से संपर्क कर के लिंक ले ले . यहाँ नहीं दे रही वरना आप क़ोई नयी पोस्ट का मसला मिल सकता हैं :)
    सबसे जरुरी बात जब ब्लॉग पर क़ोई किसी के विरुद्ध लिखता हैं तो उसका पूरा नेट वर्क दूसरे से पूछे बिना उस के साथ खडा हो जाता हैं और अपशब्द , गाली , व्यक्तिगत कमेन्ट सब कुछ अप्रोवे हो जाता हैं मोदेराशन होते हुए भी ?
    ईमानदारी से कहे क्या आप के साथ कभी ऐसा हुआ की आप को कहीं कमेन्ट देने के बाद ऐसा लगा की नहीं ये ठीक नहीं था और अगर लगा तो क्या आप ने उस कमेन्ट को डिलीट करना उचित समझा .
    अगर क़ोई कमेन्ट मोडरेट करता हैं , डिलीट करता हैं , कहीं और सहेजता हैं , ये सब उसको मिले अधिकारों के तहत हैं .
    ब्लॉग की दुनिया में सम्बन्ध शब्दों से शब्दों के हो तो बेहतर होता हैं
     
     








कल वंदना जी की एक पोस्ट आई , नहीं कहना चाहिए कि एक कविता आई , जिसमें उन्होंने स्तन कैंसर को विषय बना कर अपनी बात कही थी , इस विचार पर प्रतिक्रिया स्वरूप रचना जी ने नारी ब्लॉग पर ये पोस्ट लगाई । कमाल की बात ये है कि दोनों ही पोस्टों पर दिग्गज ब्लॉगर्स के बीच विचार विमर्श और बहस का वो दौर चल रहा है जो विरले ही नसीब हो रहा है अब ब्लॉग पोस्टों को । प्रश्न बहुत ही गंभीर है इसलिए जाइए और दोनों पोस्टों पर अपनी राय रखिए । जरा टिप्पणियों की बानगी देखिए ,

वंदना जी की पोस्ट पर : -



ब्लॉगर आर. अनुराधा ने कहा…
वंदना, मैं नहीं जानती, आपने स्तन कैंसर को कितने करीब से देखा है। लेकिन निश्चित रूप से मैं रचना से सहमत हूं और आपनी कविता (स्त्री पक्ष से) महिलाओं के लिए डीमॉरलाइजिंग है, जबकि पुरुषो को महान बताती है। वास्तविकता निश्चय ही इसके उलट है (अपवाद होंगे शायद)। किसी स्त्री का एक स्तन चला जाए तो वह वात्सल्य, मातृत्व इत्यादि 'सुखों' से वंचित नहीं हो जाती। वह कीमो आदि के बाद भी मां बन सकती है और स्तनपान के लिए दूसरा स्तन होता ही है। वैसे भी कितनी ही स्त्रियां एक बार भी अपनी संतानों को स्तनपान नहीं करवा पातीं, तो क्या वे मां नहीं रहती।

दरअसल मुझे लगता है कि यह सारी समस्या महिमामंडन की, अतिरेक की है। मां का महिमामंडन, फिर इस बीमारी का और उससे होने वाले 'नुकसान' का। क्यों नहीं इसे भी एक बीमारी की तरह देखा जा सकता? इसका भी इलाज है, समस्याएं हैं और इसके साथ भी जीवन है। क्या दूसरी सैकड़ों बीमारियां इसी तरह अनिश्चित भविष्य वाली नहीं होती? क्या सिर्फ इसलिए कि पुरुषों को अपने खेल के 'खिलौने' में कुछ कमी हो गई लगती है, यह बीमारी इतनी बड़ी समस्या बन जाती है?

दरअसल समस्या है, तब, जबकि इस बीमारी की पहचान, जांच, निदान, इलाज से लोग एकदम नावाकिफ हैं, सुविधाएं एकदम कम हैं और इसका खर्च इतना ज्यादा है कि आम आदमी इसके बारे में नहीं सोचना चाहता। क्यों नहीं इन मुद्दों पर भी कोई रचनाकार सोचता और अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति से लोगों को इसके बारे में सचेत, जागरूक बनाता?





ब्लॉगर वन्दना ने कहा…
@ आर. अनुराधा जी ये एक आम बीमारी होती जा रही है आजकल महिलाओं के बीच और जहाँ तक इसकी भयावहता की बात है वो भी हम सब देखते हैं अपने आस पास ही और देखी भी है …………मैने वात्सल्य और नारीत्व दोनो को साथ लेकर लिखी है ना कि अकेले वात्सल्य पर ………मानती हूँ काम चल जाता है मगर एक अधूरापन जब नारी महसूसती है तो कैसा लगता है उसे मैने उस दृष्टिकोण से लिखा है ना की पुरुष को बडा दिखाने या नारी को नीचा दिखाने के लिये क्योंकि कोई भी नारी हो वो कम से कम अपनी निगाह मे पूर्ण रहना चाहती है इसिलिये नारी के दृष्टिकोण पर कहा भी है कि उसे नही होती परवाह ना समाज की ना पति की भावनाओं की अगर होती है तो अपनी अपूर्णता की जो उसे अन्दर ही अन्दर खोखला करती है फिर चाहे वक्ष हों या दूसरे अंग ………और किसी का भी कोई अंगभंग हो तो वो ऐसा ही महसूसेगा उस भावना को कहने की कोशिश की है ना कि किसी को भी महिमामंडित करने की ……………जहाँ तक आपकी आखिरी बात का सवाल है वो बीमारी के बारे मे है जबकि मैने एक बीमारी से उपजे साइड इफ़ेक्ट के बारे मे लिखा है बस यही फ़र्क है आपके और हमारे दृष्टिकोण मे ।उम्मीद है आप अन्यथा नही लेंगी आपने दूसरे नज़रिये से देखा और मैने दूसरे और दोनो ने अपने अपने पक्ष रख दिये जो कि जरूरी है ताकि कोई कन्फ़्यूज़न ना रहे ।

ब्लॉगर अदा ने कहा…
आपकी कविता से बिल्कुल सहमत नहीं हूँ, मातृत्व वक्ष पर टिका हुआ कोई भाव नहीं होता, वह तो हृदय में होता है, और वक्ष का मोहताज़ नहीं होता....वक्ष होते हुए हुए आज कितनी हैं जो वक्षपान करातीं हैं, और अपने मातृत्व को दुलरातीं हैं, कोई उनसे जाकर पूछे जो इस दौर से गुजरतीं हैं, उन्हें अपना वक्ष प्रिय था या प्राण..
एक से एक सुन्दर इन्सान उम्र के साथ बन्दर हो जाता है, वो वक्ष जो प्राण लेने पर उतारू हो उसका नहीं होना ही ठीक है, और अगर इस कमी की वजह से कोई किसी को असुंदर दिखती है, तो देखने वाले के दिमाग का ईलाज होना चाहिए, ख़ूबसूरती ३४-३२-३४ के इतर भी होती है...देखने वाली नज़र चाहिए...

इस विषय पर अगर किसी को कविता ही लिखनी है तो उस विजय पर कविता लिखे, उस साहस पर कविता लिखे, उस ख़ूबसूरती पर लिखे तो मौत हो हरा कर उन महिलाओं के चेहरे पर नज़र आती है, इसे बिद्रूप, अधूरा बना कर, पेश करने वाले अपने दिमाग़ी दिवालियेपन, और छिछलेपन के सिवा और कुछ नहीं दिखा रहे है...उन महिलाओं से खूबसूरत कोई नहीं, कोई विश्वसुन्दरी भी उनके सामने खड़ी नहीं हो सकती ...और मैं और आप तो उनके क़रीब भी जाने की नहीं सोच सकते..


इस बहस से आगे निकले तो देखा कि डॉ, अरविंद मिश्र एक ठो अपील दागे हैं आज अपना पोस्ट में

एक आर्त अपील-लिव एंड लेट लिव  ,   की , और कुछ यूं कहा कि ,

"
भ्रष्टाचार पर मैंने कभी नहीं लिखा .बेमन टिप्पणियाँ जरुर की हैं इस विषय पर ब्लॉग पोस्टों पर . जल में रहकर मगर से बैर या आ बैल मुझे मार सरीखी बात ही नहीं है यह एक सरकारी मुलाजिम के लिए बल्कि उससे भी बढ़कर कि उसे  इस लाईलाज महारोग का कोई हल नहीं दीखता ..यह मनुष्य के आचरण,उसके संस्कार अर्थात लालन पालन, घर परिवार और दृष्टि-विवेक से जुड़ा मसला है. केवल सरकारी मुलाजिम ही नहीं भारत में भ्रष्टाचार घर घर तक पहुँच कर हमारे समाज और राष्ट्र के लिए एक बड़ी समस्या बन चुका है. कभी कभी तो  लगता है यह जैसे कोई आनुवंशिक बीमारी सा है जो पीढी दर पीढी चलता जा रहा है मगर इसके दीगर भी उदाहरण अक्सर मिलते रहते हैं .दो सगे भाईयों में एक बड़ा ईमानदार और दूसरा महाभ्रष्ट .एक ही मां बाप परिवार, संस्कार मगर फिर भी बड़ा  अंतर . यहाँ कुदरत के विभिन्नता का सिद्धांत समझ आता है :)  .कई ज्ञानी इस महारोग का औचित्य तक सिद्ध करते दिखाई देते हैं .दाल में नमक भर तो चलता है भाई? पता नहीं नैतिकता की किस तराजू से भ्रष्टाचार का माशा तोला ऐसे लोग तौलते हैं .फिर एक जुमला  यह भी अक्सर सुनाने को मिल जाता है कि अरे मन से और मूलतः तो भ्रष्ट  सभी हैं -जिसे मौके नहीं मिलते वे खुद को हरिश्चन्द्र दिखाने पर तुल जाते हैं -जाहिर है यह एक भ्रष्टाचारी का उद्धत वक्तव्य है . "


टीप भी देखते ही चलिए न ,


संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…
आपकी आजकी पोस्ट से हद दर्जे तक सहमत| कुछ बातें कहना चाहूँगा -
- भ्रष्टाचार को प्रायः लोग सरकारी विभागों तक सीमित मान लेते हैं, ये अपने आप में एक बहुत बड़ा मिथ है|
- सरकारी व्यवस्था में ईमानदार आदमी कांटे की तरह ही होता है|
- भ्रष्टाचार का प्रभाव इतना व्यापक है कि आप अपने स्तर पर ईमानदार बने भी हैं तो बहुत संभावना है कि आपके नाम पर दुसरे खा कमा रहे हैं|
- whistle blower concept पर ज्यादा नहीं कहूँगा लेकिन अपने देश में जिस बंदे के हाथ में थोड़ी ताकत आ जाती है, वही बहती गंगा में हाथ धोने लगता है| और स्पष्ट कर देता हूँ, अपने आस पास देखियेगा तो RTI का दुरूपयोग ज्यादा होता दिखेगा बजाय सदुपयोग के|
इन सब बातों का ये मतलब न निकाला जाए कि इस रौ में बहना स्वाभाविक है, मतलब ये है कि ईमानदार होने के लिए ज्यादा काम, ज्यादा गलती, ज्यादा सजा के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना बहुत जरूरी है| आप तो बड़े अधिकारी हैं, आप का तरीका सोच अलग हो सकती है लेकिन मैं एक साधारण सा मुलाजिम हूँ और मैंने यह पहले दिन से तय कर रखा है कि मुझे घूस नहीं लेनी है, किसी से undue benefit नहीं लेना है और जब और जहां मौक़ा मिलता है अपने डीस्क्रीशन का अपनी समझ में जेनुईन जगह पर प्रयोग करता हूँ, उसके लिए नियमों को गीता-कुरआन नहीं मान लेता|ये वो बातें हैं जिन्हें मैं खुद पर लागू कर सकता हूँ और इस सबके लिए किसी अन्ना, केजरीवाल या किसी और मसीहा का इंतज़ार नहीं करता| सौ प्रतिशत ईमानदारी की गारंटी नहीं देता, सौ प्रतिशत प्रयास की गारंटी देता हूँ| घूस लेता नहीं हूँ लेकिन कई बार देनी जरूर पड जाती है:(
'सम्वेदना के स्वर' पर डा.पी.सी.चरक वाली कड़ियाँ आपने पढ़ी हैं? न पढ़ी हों तो पढ़ देखियेगा, जिस व्यवस्था के हम पुर्जे हैं उसका एक अलग ही नजरिये से अवलोकन है|
आपकी 'नारी देह नारी मन' विषय विशेषज्ञता से इतर यह पोस्ट पसंद आई|

और ,

musafir ने कहा…
मेरा विश्वास है, अभी भ्रष्टाचार खून में है सॉफ हो सकता है. आनुवांशिक होने पर हमे सॉफ कर देगा.
मूल कारण हमारे समाज मे देश और अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठा का न होना.
आज़ादी के बाद एक ऐसी स्वतंत्रता मिली जिसने स्वतंत्रता के मायने ख़त्म कर दिये.

यहाँ माँ, बाप अपने बच्चे को इंजिनियर, डॉक्टर या आइ. ए. एस. बनाना चाहते हैं, इस लिए कि वो पैसा कमा सके, कहते भी हैं कि मेरा बेटा बड़ा होकर बहुत अमीर बनेगा. अच्छा इंसान, अच्छा नागरिक बने न बने. तो बच्चा पैसा खूब कमाता है, नं. एक का कमाये या दो का क्या फ़र्क पड़ता है.

मुझे इसका एक उपाय तो समझ आता है पर उसके लिए बहुत अड़चने हैं, पहली अड़चन है हमारे नेता जो इसे लागू नही होने देंगे.
अगर इस देश में प्राथमिक शिक्षा के बाद सभी ह को ४-५ साल के लिए, एक कठिन परिश्रम के साथ काम करते हुए शिक्षा प्राप्त करने को निर्देशित किया जाए, जहाँ देश के प्रति ज़िम्मेदारी, अच्छे इंसान बनाने की ज़िम्मेदारी जैसे मूल्य रोपित किए
जाए,और सरकार प्रतिबध हो की इस शिक्षा के दौरान रहने और खाने की अच्छी व्यवस्था हो और बाद में उन्हें रूचि अनुसार इंजिनियरिंग मेडिकल विज्ञान कला खेल के क्षेत्र में पढ़ाई करने का पूरा मौका दिया जाए.

देश की नागरिकता सिर्फ़ उन्हें दी जाए जो इस शिक्षा से गुजरें तो अगले २० सालों मे स्थिति मे सुधार हो सकता है. फिर चाहे वो नेता का लड़का हो या अंबानी बिरला का सबको इस देश की नागरिकता के लिए इस शिक्षा पद्धति से होकर जाना होगा.
इसके लिए मजबूत इरादों और प्रतिबद्धता की ज़रूरत होगी.
ऐसा मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं. 


और ,

डॉ टी एस दराल ने कहा…
आर्थिक भ्रष्टाचारियों की किस्में :
* एक वो जो जन्म से भ्रष्ट हैं . ऐसे लोग रिटायर होने से पहले जेल नहीं जाते .
* दूसरे वो जो लालायित रहते हैं और अवसर मिलते ही पैसे में खेलने लगते हैं .
* तीसरे प्रलोभन को ठुकरा नहीं पाते . लेकिन हमेशा डरते भी रहते हैं .
* चौथे इतने डरपोक होते हैं --कभी ले नहीं पाते . सारी जिंदगी डरते ही रहते हैं .
* पांचवें जन्म से बेबाक और निडर होते हैं . वे कभी लेते नहीं .

अब देखा जाए तो यह तो जींस में ही घुला है --आप किस केटेगरी में आते हैं . हालाँकि कभी कभी परिस्थितयां और संगत भी मनुष्य को प्रभावित कर सकती हैं .
इस विषय पर साहसी लेख .



प्रशांत प्रियदर्शी यानी हमारा पीडी , हमारे उन बारात के निमंत्रण पत्रों की सूची में लंबर वन  पर है , जिनके बियाह के बहाने , पटना जाने घूमने का मौका मिल सकेगा । पिछले दिनों गैंग्स ऑफ़ वासेपुरमय हो गया था , दीवार से चित्रहार तक सिर्फ़ वासेपुर ही वासेपुर । देख के आने के बाद फ़िल्म समीक्षा लिख मारा है , बकिए ऊ जो कहे , हम लोग तो समीक्षा ही कहेंगे , देखिए ,




"हाथ के बुने हुए हाफ स्वेटर पहन कर पहलवान दोनों हाथो में मुर्गा टांग कर गली से जाते हुए दिखाना, या फिर मीट की नली वाली हड्डी सूंss कि आवाज के साथ चूसना, या फिर गोल गले के लोटे से स्नान करते हुए दिखाना, या फिर आइसक्रीम के लिए बच्चों कि शैतानी, या फिर सरदार खान का गिरिडीह के बदले गिरडी..गिरडी..गिरडी..गिरडी की आवाज लगा कर सवारी बटोरना. रात का खाना चीनी मिट्टी के प्लेट में परोसना क्योंकि मुसलमान घर आया है.. जाने कितनी ही हत्या सरदार खान कर चुका हो मगर जवान बेटे को लगी छर्रे से लगभग पागल सा हो उठना. फ्रिज के आने के बाद सब बच्चों का उचक-उचक कर उसे देखना और गृहणी का यह देखना की उसमें कोई खाली बर्तन तो नहीं रखा हुआ है! 
इसे देखने से पहले मैं कोई भी रिव्यू नहीं पढ़ रहा था. किसी तरह का पूर्वाग्रह लेकर नहीं देखना चाहता था. और मुझे सबसे अधिक अचंभित "जियs हे बिहार के लाला" गीत ने किया. जिस गीत को मैं फ़िल्म के शुरुवात में देखने कि उम्मीद कर रहा था उसे जिंदगी कि खुशी में नहीं, मृत्यु के जश्न के तौर पर लाया गया!

हो सकता है कि अनुराग जी ने कई लोगों को निराश किया होगा इस सिनेमा में गाली-गोली दिखा कर, मगर हर चीज को इतनी बारीकी से उन्होंने फिल्माया है जिसको कोई भी सिने छात्र देखना-सीखना चाहेगा. थैंक्स अनुराग जी को, हमें ऐसी सिनेमा देने के लिए!! "


आप जर इन मनुहारी चित्रों को देखिए और देख कर बताइए कि क्या इन्हें देख कर कोई आत्मा बेचैन रह सकती है  भला ,









चलिए अब देखते हैं कि अजित वडनेकर भाई के डिक्शनरी में कोन सा लबका वर्ड आया है , अरिस्स ये कहा वे तो आज गुण्डे की नेता से रिशेतादारी के बारे में पूछ बता रहे हैं ,हमें लगता है कि ये इत्तेफ़ाक ही होगा कि इसी भी अबू हमजा नामका एक ठो खूनी गुंडा का किसी मंतरी जी के गेस्ट हाउस में रुकने की खबर आई ,

"
शब्दों का सफ़र में ऐसे अनेक उदारहरण मिल जाएँगे जैसे ऐहदी, नौकर, चाकर, पाखण्डी, गुरु आदि। तथाकथित नेता इस बात से नाराज़ रहते हैं कि उन्हें गुण्डा कहा जाने लगा है । अब उन्हें कौन समझाए कि नेता वह है जो किसी समूह को राह दिखाए, अगुवाई करे । नेता शब्द की अभिव्यक्ति वाले न जाने कितने शब्द हैं जैसे-नायक, प्रमुख, प्रधान, सरदार, आक़ा, साहिब, गुरु वगैरह वगैरह । अब गुण्डों का सरदार भी नायक ही होता है । अब अगर गुण्डा शब्द के मूल में ही प्रधान और नेता जैसे भाव हों तो उसमें बुरा मानने की क्या बात है ! और बुरा ही मानना है तो खुद को नेता कहलवाना भी बंद कर दें क्योंकि नेता की अर्थवत्ता ने भी नकारात्मक रूप अपना लिया है । जब कोई व्यक्ति ज्यादा दंद-फद दिखाता है उसे नेता  कहते हैं । नेतागीरी शब्द पूरी तरह से नकारात्मक है जिसका अर्थ है निजी स्वार्थ के लिए लोगों को बरगलाना । "








ई नय मानेंगे जब तक कि इनको संसद से विशेषाधिकार समिति का नोटिस न आ जाए , ओइसे गुंडा महासभा का भी नोटिस मिलने की पूरी संभावना है ।


जिन्हें कविताई में हाथ आजमाने का पूरा मन है उनके लिए एक खुशखबरी है , यहां संजीव सारथि जी  , शब्दों की चाक पर -04 



लेकर आए हैं , और बता रहे हैं कि ,

"


1. कार्यक्रम की क्रिएटिव हेड रश्मि प्रभा के संचालन में शब्दों का एक दिलचस्प खेल खेला जायेगा. इसमें कवियों को कोई एक थीम शब्द या चित्र दिया जायेगा जिस पर उन्हें कविता रचनी होगी...ये सिलसिला सोमवार सुबह से शुरू होगा और गुरूवार शाम तक चलेगा, जो भी कवि इसमें हिस्सा लेना चाहें वो रश्मि जी से संपर्क कर उनके फेसबुक ग्रुप में जुड सकते हैं, रश्मि जी का प्रोफाईल यहाँ है.


2. सोमवार से गुरूवार तक आई कविताओं को संकलित कर हमारे पोडकास्ट टीम के हेड पिट्सबर्ग से अनुराग शर्मा जी अपने साथी पोडकास्टरों के साथ इन कविताओं में अपनी आवाज़ भरेंगें. और अपने दिलचस्प अंदाज़ में इसे पेश करेगें.

3. हर मंगलवार सुबह ९ से १० के बीच हम इसे अपलोड करेंगें आपके इस प्रिय जाल स्थल पर. अब शुरू होता है कार्यक्रम का दूसरा चरण. मंगलवार को इस पोडकास्ट के प्रसारण के तुरंत बाद से हमारे प्रिय श्रोता सुनी हुई कविताओं में से अपनी पसंद की कविता को वोट दे सकेंगें. सिर्फ कवियों का नाम न लिखें बल्कि ये भी बताएं कि अमुख कविता आपको क्यों सबसे बेहतर लगी. आपके वोट और हमारी टीम का निर्णय मिलकर फैसला करेंगें इस बात का कि कौन है हमारे सप्ताह का सरताज कवि. "




चिट्ठाचर्चा हमेशा से ही पाठकों को आकर्षित करती रही है , इसका एक अपन अलग अंदाज़ रहा है । आज इसमें अनूप जी ने , भाई अजित वडनेकर जी की एक लाइव वीडियो दिखा कर बता दिया कि

"हुनर यहां और भी हैं दिखाने को , वो तो वो छुपाए बैठे  हैं ,
यहां सुनने को बेताब हैं गीत उनके , वहां वो शर्माए बैठे हैं "


इस महफ़िल में जो आखिरी शेर उन्होंने खुद का लिखा हुआ  गाया है ,



"
मुद्दतों से नींद न मिली, ख्वाब बेपनाह हो गए ,
जब से हम तबाह हो गए , तुम जहांपनाह हो गए ....."



चलिए अब कुछ पोस्टों का रैपिड फ़ायर राउंड हो जाए


शराबी खरगोश:        उफ़्फ़ , तो खरगोश भी बेवडे हो गए


आओ बारिश ...आओ न :     अब इत्ता तो तडपाओ न    


मुझे क्षमा करना :  आपकी भलमनसाहत है जी


धरती तो पूरी लूट खाई हरामखोरों , जाकर गगन देखो :    कोई टिरिंग भिरिंग नहीं , जाकर अभी फ़ौरन देखो 


घर-बाहर :आते जाते रहना चाहिए


आंखों से  नींद बहे रहे :   क्या उम्दा बात कहे रे      


हाल सेरोविट्ज़ : किताबें देना :    हमें भी देना , जब पढ लेना


श्रीनगर के बाग बगीचे -चश्मे शाही     : पोस्ट लूट रही वाहवाही


नोट कोई नहीं जला सकता :     अजी , जला , हम कहते हैं कोई नहीं दिला सकता


चन्द्रमा की हेयरपिन :   आयं , मिस चन्द्रमा भी सीरीयल देखने लगीं शायद , हेयरपिन ...उन्हें भी


जिंदा होने का प्रमाण :        बर्थ सर्टिफ़िकेट लाइए श्रीमान  


हर युग के प्रारब्ध में :     दम है हर शब्द में


इन दिनों रहता है डिहाड्रेशन का खतरा :       हमरी बॉडी में हाय कितना रे लफ़डा  


बेडनी नाचती है सारी रात :  वाह वात बात में क्या खूब कह दी बात


परायों के घर :      अपनों सा कहां लगता है


कविता में आज आपके लिए हम अपने फ़ेसबुक मित्र नवीन कुमार चौरसिया जी की एक कविता को सहेज़ कर लाए हैं देखिए ,

Profile Picture

उम्र का एक ऐसा पड़ाव जहाँ पहुंचकर इंसान एक बार पीछे मुड़कर देखता है और सारी ज़िन्दगी के जद्दोजहद पर नज़र दौड़ता है और पाता है की सब कुछ करने के बाद भी मै अपने आखरी पड़ाव में आज असुरक्षित हूँ...तब सोंचता है....

शेष समय की सीमा पर घबराता - पछताता।


शेष समय की सीमा पर घबराता - पछताता।
चाह है अब भी उड़ जाने की,
साँस नहीं पर भर पाता,
है जान नहीं अब पंखों में,
अभिमान नहीं क्यों मर पाता,
रुका नहीं कभी जीवन में,
झुका नहीं कभी जीवन में,
हाथ नहीं कभी फैलाया,
जब चाहा जिस मंजिल को ,
खुद ही मैंने जय लाया,
इस स्वाभिमान को कैसे समझाता।
शेष समय की सीमा पर घबराता - पछताता ।।
जीवन तो है चक्र समय का,
चलता चक्र बदलता जीवन,
कई रंगों में ढलता जीवन,
खुद को ढालूँ चक्र समय -संग,
या बन वक्र विरोधी राग विरह के,
मन ही मन में गाऊं ;
कोई ये दुविधा सुलझाता ।
शेष समय की सीमा पर घबराता - पछताता ।।
बचपन और जवानी घिस गई,
तिल-तिल जोड़ ख्वाईशें पिस गई,
सब को खुश कर खुशियाँ पाया,
हाथ थाम कर राह दिखाया,
न उम्मीद की कोई, न सपना देखा,
बस अपनों को अपना देखा,
आज हुआ है रूप ये कैसा ,
सारी उम्र न देखा ऐसा ,
राही मंजिल को छूते ही,
भूल गए उस अंगुली को,
थामकर जिसको पहुंचे मंजिल,
बोझ कहते हैं उस साहिल को ।
गिद्धों की सी आँख पड़ी है,
मरने के पहले ही सर पे,
क्यों इंसानों- सा दीखते हैं ये,
जो पाल लिया मैंने इसे घर पे।
कैसी बुद्धि की भ्रष्ट, व्यथा है,
इस उम्र की मेरी करुण कथा है,
क्यों रोऊँ , चिल्लाऊं मै,
कैसे हंसू और गाऊं मैं,
हर पल , छल कर 
छिल दिया है छाती,
क्यों विषाद ये मौन दबाऊं मैं।
गर मशाल न हो मेरे हांथों में,
कैसे होगी रक्षा हमारी,
जीवन की शाम ढलने को आयी,
इस जंगल में हम दो नर-नारी;
अब सोंचा था जीवन जीने को,
कर्तव्य मुक्त निःश्वासे पिने को,
ये आश भी रह गई अधूरी,
ले पलकों पे मोती की ढेरी,
ये दर्द किसे मै दिखलाता, कहो कहाँ इसे दफनाता ।
शेष समय की सीमा पर घबराता - पछताता ।।
ये शान संपत्ति विरासत तो ,
गर्व, गुमान और गद्दी - सा -
चल , चंचल और निष्ठुर है,
आज किसी की सेवा में ,
कल किसी और की हस्ती है,
क्या मै मोह से कट जाता,
छोड़ लगाम सारथि से हट जाता,
बैठ किनारे देके इशारे -
क्या कृष्ण-सा,कर्म -फल का जीवन सत्य बताता,
या रुपये की जगह इंसान कमाता,
जो रुपयों से कोसों ऊपर आता,
और गाँधी की तरह "हे राम " बोलकर,
हजारों हृदयों में छा (बस) जाता ।
शेष समय की सीमा पर घबराता - पछताता ।।
 
और एक कार्टून देखिए

राहुल गाँधी ने क्या सीख लिया !!

rahul gandhi cartoon, congress cartoon, pranab mukharjee cartoon, inflation cartoon, GDP Cartoon, indian political cartoon























अच्छा जी , तो अब मुझे आज्ञा दीजीए । मैं चलता हूं , अपना ख्याल रखिए और पढते लिखते रहिए ।

28 टिप्पणियाँ:

रचना ने कहा…

ajay thanks

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

शुक्रिया अजय जी .मेरी कविता को स्थान देने के लिये .
आपका
विजय

dheerendra ने कहा…

नए अंदाज में प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी,,,,,

MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: बहुत बहुत आभार ,,

अनुपमा पाठक ने कहा…

योगेन्द्र पाल जी को बधाई:)
ब्लॉग बुलेटिन पढ़ गए धाराप्रवाह, श्रमसाध्य है यह प्रस्तुति, पोस्ट के लिंक्स एवं टिपण्णी को कुशलता से सहेजा है!
@अजय जी, आभार!

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

चर्चा में कमेंट को भी स्थान देना एक अच्छी शुरूआत है। इससे ब्लॉगिंग सुधरेगी। लोग पढ़कर कमेंट करेंगे। हिंद युग्म ने पाठक को महत्व दिया था। कमेंट को भी पुरस्कृत करने की परंपरा थी। प्रिंट मीडिया में भी एक कोना पाठक का सुरक्षित होता है। इसके लिए विशेष रूप से आपको धन्यवाद देता हूँ।

मेरा खींचा चित्र अच्छा लगा, जानकर खुशी हुई।

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

kyaa baat hai Ajay ji, ish roop mein bhee aap meree tippani parosenge, nahee maaloom thaa. Glad to know. Thanks a lot !

शिवम् मिश्रा ने कहा…

सब से पहले तो योगेंद्र जी का बहुत बहुत हार्दिक आभार उन्होने हम सब की मेहनत को सफल कर दिया ... साथ साथ यह भी समझ आ गया कि अब और भी मेहनत करनी है ... जो भरोसा और स्नेह ब्लॉग बुलेटिन टीम पर आप सब ने दिखाया है हम किसी भी कीमत पर उसको खोने का खतरा नहीं उठा सकते ...

अजय भाई ने ठीक याद दिलवाया 29 जून को योगेंद्र जी अपने जीवन की एक नई पारी की शुरुआत करने जा रहे है ... पूरी बुलेटिन टीम और ब्लॉग जगत की ओर से उनको हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

ana ने कहा…

jabardast collection .....umda

शिवम् मिश्रा ने कहा…

अजय भाई इस बार आप की यह छुट्टियाँ ब्लॉग जगत को खूब रास आई है ... खास कर ब्लॉग बुलेटिन और इस के पाठको को ... एक नया ही रूप दिखा आपका ... हर बुलेटिन मे कुछ न कुछ खास ... ऐसे ही भगाये रहिए बुलेटिन की यह मेल ... जय हो !

P.N. Subramanian ने कहा…

प्रस्तुति बड़ी सुन्दर रही. मनोरंजक भी लगी. आभार.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

यह पढ़कर तो अब विश्वास हो चला है कि टिप्पणियाँ पोस्टों पर भारी पड़ रही हैं।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

Bahut hi Badhiya Buletin.....

ZEAL ने कहा…

वाह अजय जी, का बात है ? इकदममय चका-चक बुलेटिन है.....गजबबय आनंद...आनंद...आनंदम...

Kumar Radharaman ने कहा…

Aap ka ye prayas aggregataron ko aprasangik bana dega.

shikha varshney ने कहा…

बाप रे बाप ..भयंकर बुलेटिन है ये तो.

मनोज पटेल ने कहा…

बढ़िया बुलेटिन, आभार अजय जी!!

अदा ने कहा…

वाह..!
इसको कहते हैं बुलेट-इन (Bullet-In)...
अगर गोली चले तो लगे..वरना न चले
बहुत बढ़िया..
धन्यवाद

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत जोरदार बुलेटिन

Vivek Rastogi ने कहा…

गज्जब बुलेट मारे हैं आप बुलेट पर बैठकर ।

yogendra pal ने कहा…

धन्यवाद अजय जी तथा शिवम जी

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

खूबसूरत और विस्तृत चर्चा। पढकर अच्छा लगा। धन्यवाद!

रविकर फैजाबादी ने कहा…

सुन्दर |

वन्दना ने कहा…

गज़ब का बुलेटिन …………बढिया लिंक संयोजन्।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

:) बहुत सोची समझी गोलियां ... और लिंक्स - कभी बेकार होते ही नहीं

Shah Nawaz ने कहा…

वाह अजय भय्या.... गज़ब ढा दिया.... तो यह हुआ 'अजय-गज़ब बुलेटिन'

PD ने कहा…

अब का कहें जी आपको.. जहाँ कहीं बियाह का चर्चा होता है, तो आप जैसे लोग हमको जबरिया घसीट लेते हैं.. कोई ना.. बदनाम हुए तो क्या हुआ, नाम तो हुआ ना!! ;-)

Naveen Kr Chourasia ने कहा…

अनेकानेक धन्यवाद आपको,मेरी कविता को आपने इतने प्यार से इस ब्लॉग में पिरोया...

Bamulahija dot Com ने कहा…

jordar

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