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गुरुवार, 7 जून 2012

विवाह की सही उम्र क्या और क्यूँ ?? फैसला आपका है...

           5 जून को दिए दिल्ली हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने 15 वर्ष की उम्र में हुए एक मुस्लिम लड़की के विवाह को जायज ठहराया.. वैसे भारतीय संविधान के हिन्दू मैरेज एक्ट के अनुसार विवाह की मानित उम्र लड़कियों के लिए 18 और लड़कों के लिए 21 तय की गयी है... लेकिन इसमें मुस्लिम, पारसी, ईसाई और जेविश धर्म का जिक्र नहीं किया गया है... इस्लामिक क़ानून के मुताबिक़ कोई भी मुस्लिम लड़की बिना अपने माता-पिता की इजाज़त के शादी कर सकती है, बशर्ते उसने प्यूबर्टी हासिल कर ली हो. अगर उसकी उम्र 18 साल से कम भी है तो उसे अपने पति के साथ रहने का हक़ है... तो क्या भारतीय संविधान भी धर्म के हिसाब से शादी की उम्र तय करेगा... वैसे अगर दूसरे मुल्कों की बात करें तो मुस्लिम देशों को छोड़कर अधिकतर पश्चिमी देशों में विवाह की उम्र लडकों के लिए 18 और लड़कियों के लिए 16 है... हालाँकि एशिया महाद्वीप में अधिकतर जगह लड़कों के साथ-साथ लड़कियों की भी उचित उम्र 18 ही है... इरान में लड़कियों की न्यूनतम आयु 9 साल निर्धारित की गयी है और ब्रुनेई में तो इससे जुड़ा कोई नियम ही नहीं है यानी वहां बाल विवाह आज भी जायज है... ध्यान रहे कि आज से करीब एक साल पहले कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में सुनाया था कि बिना माता-पिता की अनुमति की कोई भी लड़की 21 साल से कम की उम्र में विवाह नहीं कर सकती... वैसे अगर धर्म, प्रदेश का पक्ष हमलोग दरकिनार कर दें तो भी एक सवाल तो मेरे मन में उठ ही रहा है कि क्या 15 वर्ष की उम्र में विवाह उचित है... अगर हाँ तो इसे बाल विवाह की ही संज्ञा दे दें तो क्या गलत होगा... भले ही लड़की शारीरिक तौर पर थोड़ी तैयार हो लेकिन क्या वो मानसिक तौर पर विवाह की ज़ेम्मेदारियां उठा पाने में सक्षम होगी...बहरहाल उम्मीद करता हूँ इस फैसले का असर आने वाली शादियों पर तो नहीं पड़ना चाहिए... क्यूंकि इतनी कम उम्र में होने वाले विवाह की  संख्याओं में अब कटौती हो रही है और मेरे ख्याल से ऐसा होना भी चाहिए... भले ही कोर्ट ने १५ वर्ष की उम्र को विवाह के लिए पर्याप्त मान लिया हो लेकिन ये फैसला आपको करना है कि आप विवाह के लिए उचित अवस्था क्या मानते हैं...
इस सोच को आपके लिए छोड़कर आईये शुरू करता हूँ आज की बुलेटिन रेलगाड़ी रंग बिरंगे डब्बों के साथ....
            दिल्ली हाई कोर्ट के उक्त फैसले पर फिरदौस जी पूछ रही हैं कि हिन्दुस्तान में कौन सा कानून लागू है... भाई मेरा तो कहना है कि कानून कोई भी हो लेकिन उसके फायदे और नुक्सान पर भी गौर कर लिया जाना चाहिए... क्या 15 साल की उम्र भी कोई शादी की उम्र होती है... ये तो पढने-लिखने और खेलने-कूदने की उम्र होती है.... अरे खेलने कूदने से याद आया, अभी तो बच्चों की गर्मी की छुट्टियाँ चल रही हैं, आपको याद आप गर्मी की छुट्टियों में क्या करते थे, उस समय तो ये कंप्यूटर नाम की बला भी नहीं थी, टीवी भी गिने चुने घरों में ही होता था... वो तरह तरह के खेल और मस्ती जो आप कभी नहीं भूल सकते है न...?? देखिये न पाखी की छुट्टियाँ चल रही है और वो दिखा रही है अपने स्केच... और सतीश पंचम जी को भी देखिये उनके सफ़ेद घर में वो बता रहे हैं 'राजशौचालय' रॉक्स डूड... जाईये उनका राजशौचालय  मेरा मतलब है पोस्ट देख आईये... और निवेदिता जी बोल रही है और घूँघट डालना आ ही गया ...:)चलिए अच्छा ही है ये तो हर भारतीय नारी को आना ही चाहिए... साधना वैध जी बोल रही हैं कोई तो मूरत दे देते...जनपक्ष पर अदम गोंडवी को याद करते हुए अशोक कुमार पाण्डेय जी कह रहे हैं देखना अदम को यहाँ से... दिलीप जी भी अजीब सी ख्वाईश लिए कहते हैं मुझे इंसान न कर, मुझको कैलेंडर कर दे... अरविन्द मिश्र जी कह रहे हैं ग्रीषम दुसह राम वन गमनू ....अशोक सलूजा जी एक दर्द सा बाँट रहे हैं जैसे बस प्यार से पुकार लो ...!!! आशा जी अपने ब्लॉग पर एक कविता में मिलवा रही हैं एक सतर्क और निडर माँ से... सौम्या जी एक छोटी सी कविता लिखते हुए कहती हैं मानो चाँद ना हो... वंदना गुप्ता जी अपनी दो कवितायें पढ़ा रही हैं हमें हे..... मत रोना.. और फिर पीड़ा का पाणिग्रहण कौन करे... रचना जी दिखा रही हैं कुछ पदचिन्ह...   अनुपमा जी के ब्लॉग पर एक कविता पढ़ें मन के नीड़ में...!माधवी शर्मा गुलेरी जी कह रही हैं बदल रहा है सिनेमा और उसकी सुंदरता भी...हम भी आपसे पूरा इत्तेफाक रखते हैं... अब आज की फिल्मों में वो बात कहाँ...                

       

15 टिप्पणियाँ:

कौशलेन्द्र ने कहा…

भारतीय लड़कियों की शादी की उम्र..किसी के लिये 15 किसी के लिये 18,यह भारत में ही सम्भव है।
एक देश एक कानून। अन्यथा देश की अखंडता और एकता को दाँव पर लगा देंगे ऐसे फ़ैसले।

मनोज कुमार ने कहा…

एक विचारोत्तेजक आलेख के साथ सुंदर लिंक्स।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

अगर मैं गलत नहीं तो हमारा संविधान धर्म के नाम पर भेद भाव की आज्ञा नहीं देता ... ऐसे मे क्या यह विवाह कानून संविधान के खिलाफ नहीं है ... कानून के जानकारो से अनुरोध है इस पर भी प्रकाश डालें !

एक विचारोत्तेजक बुलेटिन के लिए आभार ... शेखर !

Sadhana Vaid ने कहा…

धन्यवाद शेखर सुमन जी ! मेरी रचना को आपने ब्लॉग बुलेटिन के लिए चयनित किया आभारी हूँ ! सभी लिंक्स बेहतरीन हैं !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हर समाज के अपने नियम, फिर भी साथ रहने की कलाकारी..

Suman ने कहा…

nice

dheerendra ने कहा…

[ma] देश में सबके लिये क़ानून एक समान होने चाहिए,,, [/ma]

रश्मि प्रभा... ने कहा…

संविधान ! जब जो जोड़ दो, सब कानून .... मनचाहा निर्णय समयानुसार !
लिंक्स अच्छे हैं , पढ़ने चली

अनुपमा पाठक ने कहा…

सार्थक आलेख,
अच्छी बुलेटिन!
आभार!

वन्दना ने कहा…

विचारणीय प्रश्न उठाता सुन्दर व सार्थक लिंक्स से सजा ब्लोग बुलेटिन्।

निवेदिता श्रीवास्तव ने कहा…

सामयिक चर्चा और तार्किक प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी ....
ब्लॉग - बुलेटिन में मेरे ब्लॉग का प्रवेश और भी अच्छा लगा ..:)

Saumya ने कहा…

good work,,,thanks a lot!!!

shikha varshney ने कहा…

अच्छी चर्चा के साथ अच्छे लिंक्स .

अजय कुमार झा ने कहा…

बाह बाह शेखर बच्चा बहुत ही बढिया बुलेटिन बांचे हो , एकदम सुंदर और सुघड बुलेटिन ।
अब रही बात न्यायालय के फ़ैसले की तो जैसा कि मिसर जी भी पूछे हैं । विधि का छात्र होने के नाते यदि संक्षिप्त में उत्तर दूं तो ये फ़ैसला सिर्फ़ एक इसी खास मुकदमे के परिप्रेक्ष्य में आया है और इसके पीछे सबसे बडा सिद्धांत ये है कि न्याय सिर्फ़ होना नहीं चाहिए बल्कि न्याय हुआ है ऐसा महसूस भी होना चाहिए । और यहां अन्य पाठकों की जानकारी के लिए बता दूं कि ऐसा ही निर्णय पहले भी आ चुका है जिसमें चौदह वर्षीय बालिका की शादी को अदालत ने कानूनी मंजूरी दी । हालात और स्थिति दोनों में ही बहुत विशेष थीं । यहां इस फ़ैसले के पीछे का एक त्वरित और ठोस कारण , जहां तक मैं समझा हूं वो है उस बालिका/युवती का भविष्य और जीवन । शेष मैं अपनी पोस्ट में लिखूंगा क्योंकि विषय बहुत गंभीर है और बहुत सारी स्थितियों को सामने रखना होगा । टिप्पणी में समेट पाना संभव नहीं होगा ।

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

आपने बहुत प्रासंगिक विषय पर चर्चा की है...इस बारे में धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठकर सोचना होगा...आपने उपयोगी लिंक्स दिए हैं...

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