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रविवार, 10 जून 2012

यादों की खुरचनें - 2



यादों के अपने अपने ख़ास मौसम , बरामदे , बिस्तर , चाय की भाप , एक कौर सना हुआ माँ की हाथ का , एक खिलखिलाती हँसी , एक खामोश लम्हा .... और न जाने क्या क्या होते हैं . ढूंढ रही हूँ उस मकानमालिक को , जिसने एक डायरी रख दी है इस ख्याल से - ' कभी वक़्त मिले , मुझे समझना चाहो तो मुझे कतरा कतरा पढ़ना .... शायद तुम्हारी सोच से परे कोई और शक्स तुम्हें मिल जाए !

दिल की बात: अपने अपने तर्कों से गुजरते हुए - ज़िन्दगी को अपने शीशे में उतारकर ... अपेक्षाओं के मार्ग से

गुजरना अपनी व्याख्या नहीं करता -


" जिस रोज महज़ तीन हज़ार रुपये में दिन रात आपकी कालोनी के दरवाजे पे खड़ा चौकीदार आपको सलाम नही ठोकता है .रोज के इस अपेक्षित आदर को न पाकर आप आहत हो उठते है ,दरअसल ये भी एक प्रकार का अहं है....ठीक उसी तरह जैसे अपने द्वारा किए गए अच्छे कामो की लिस्ट तैयार करके रखना .या उन्हें सार्वजनिक करना ... नेकी के पीछे गौरवान्ववित होने का लोभ है .......खामिया भी इस इश्तिहारी जमाने में खूबिया सी लगने लगी है...
बचपन में स्कूल के कोर्स में पढ़ा एक निबंध याद आता है जिसमे लेखक कहता है की एक शराबी ओर स्त्रेन जहाज़ का कप्तान भी अगर डूबते वक़्त अपने जहाज को नही छोड़ता है तो वास्तव में उसका चरित्र मन्दिर के पुजारी या गिरजाघरों के पादरियों से कही ऊँचा है .....अपने परिवार बच्चो के प्रति अति सवेदनशील व्यक्ति अपने कार्य स्थल या किसी दूसरी जगह असंवेदनशील हो सकता है...यानी सवेदनशीलता के भी दायरे है ....चरित्र के भी ....ऐसा लगता है चरित्र की कई परीक्षाये है जिसकी एक परीक्षा में डिस्टिंक्शन से पास हुआ विधार्थी दूसरी में फेल हो जाता है .... चरित्र की व्याख्या या उसकी माप तोल मुश्किल है .बेहद मुश्किल .....
तो क्या अब वर्तमान समय में अच्छे चरित्र विलुप्त हो गये है या उनकी प्रोग्रामिंग सिर्फ़ १९५० तक ही थी ? या हमने अच्छे चरित्र की कोई जटिल परिभाषा गढ़ दी है जिसके सांचे में अब कोई फिट बैठता नजर नही आ रहा है ?तो क्या आदर्शो को खीच कर थोड़ा नीचे लाया जाये ...... ( जारी है ) "

लेखनी जब फुर्सत पाती है...: आओ चलो... - कभी कभी नहीं कई बार बस यूँ हीं कुछ जादू सा करने का दिल

करता है ... अच्छा लगता है कई सीढ़ियाँ लगाकर आकाश को छूना , आकाशिए नदी से मटका भर ले आना , परियों के

पंखों की चाह में उड़ना ... उड़ते जाना . लेखनी जब फुर्सत पाती है तो कुछ भी चाह लेती है - कुछ इस तरह ,


" आओ चलो...

आसमां की ताक पर
जो चाँद बादल की झाडियों में उलझा है,
उसे एक स्टूल पर पैर रखकर
अपने तलवे उचका कर
दोनों हाथों से बड़े जतन से उतार लायें

आओ चलो...
फिर उसमें अपना चेहरा देखकर मुस्कुराएँ
और फिर उसको थाली में सजाएं
कभी बच्चे को दे दें
की लो खेलो
कभी किसी के प्रेम कहानी के गवाही दिलवा दे
किसी को निहार ले इसमें
जो भुला-बिछडा हो
कोई दुल्हन अपना श्रृंगार करे

आओ चलो...
यह चांदी का सिक्का सबके गले में बाँध दें
किसी प्रियतम के दामन में टांक दें
किसी खास को तोहफे में दे दें
चलो, चाँद को धरती पर ले आयें
इससे पहले की विज्ञान
चाँद को एक और धरती में तब्दील कर दे
आओ चलो... "

कस्बा qasba: अगर मैं प्रधानमंत्री होता - इस शीर्षक से निःसंदेह सबको अपना बचपन याद आ जायेगा . लगभग सबने इस विषय पर लिखा होगा . ...

लिखते वक़्त महसूस होता कि बड़े होने की देर है , फिर तो प्रधानमंत्री बन ही जाना है . तब और अब के परिप्रेक्ष्य में पढ़ते हैं अगर मैं प्रधानमंत्री होता !

" अक्सर लेख का यह विषय स्कूल में मिल जाया करता था। २० अंकों का लेख। मास्टर जी क्लास में इधर उधर देखे बिना लिखने को कहते थे। १३-१४ साल की उम्र में इस अनजान सपने को देखते हुए हम लिखने लगते थे। बिना भूगोल और लोग को जाने हम लिखते रहते थे। अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो भारत को आधुनिक बना देता। जहां कोई गरीब नहीं होता। सबके पास काम और पढ़ाने के लिए मास्टर होता। विज्ञान के क्षेत्र में भारत का नाम रौशन करता। सड़के बनवाता। बिजली पहुंचाता। वगैरह, वगैरह।

१५ साल बाद अगर मास्टर जी यह लेख लिखने के लिए तो आप कैसे लिखेंगे। शायद मैं यूं लिखता कि अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो अपने सात पुश्तों का इंतज़ाम करता । पार्टी हाईकमान के कहने पर सरकार गिरा देता। झूठे वादे करता कि हजारों नौकरियां हम दे रहें हैं आप बस लाखों वोट दे दीजिए। प्रधानमंत्री बनने के बाद गरीबी रेखा से नीचे के आंकड़ों में हेर फेर करता और गरीबों को आंकड़ों से गायब कर देता। अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो अयोघ्या से लेकर गुजरात तक के दंगों में मौन हो जाता । अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो अपनी सरकार को बचाए रखने के लिए ब्रीफकेस में नोट भर कर सांसद खरीदता। अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो पुरानी लिखी कविताओं को सुनाता रहता। अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो प्रधानमंत्री बनने वाले संभावितों को फंसाता रहता । अरे हां विकास, बिजली और विज्ञान की भी बातें करता। अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो भारत के फटे हाल लोगों का हाल छोड़ कर अपना हाल ठीक करता ।

शायद यह सब इसलिए लिखता क्योंकि अब प्रधानमंत्री के बारे में हम यही सब जानते हैं। स्कूल वाले लेख में वो बातें इसलिए लिखते क्योंकि एनसीईआरटी की किताबों में भारत के बारे में यही पढ़ाया जाता रहा था। प्रधानमंत्री को एक आदर्श संवैधानिक आचरण वाला शख्स बताया जाता रहा था। पत्रकार बनने के बाद न जाने क्यों हर वक्त सरकारों पर शक होता रहता है। मंत्रियों के कारनामे काले ही लगते हैं। इसलिए अब मैं दावे के साथ नहीं कह सकता हूं कि स्कूल के १५ साल के अनुभवों के बाद मैं वैसा मासूम लेख फिर से लिख पाऊंगा। कि अगर मैं प्रधानमंत्री होता...."


धीरे धीरे अच्छे ब्लॉग्स को पढ़ने का अलग आनंद होता है , तो एक बार में ही मैं बहुत सारी खुरचनें नहीं देना चाहती कि बजाय स्वाद के सब गड़बड़ हो जाए ...

10 टिप्पणियाँ:

shikha varshney ने कहा…

थोड़ी थोड़ी ही ठीक है रश्मि दी !!! हल्का मीठा ही ठीक रहता है.:):).ज्यादा हो जाये तो शुगर का प्रोब्लम हो सकता है.

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

accha laga padhkar....

expression ने कहा…

सच है दी.....
एक बार में ढेर सा पढ़ कर उतना मज़ा भी नहीं आता.......

आभार.

dheerendra ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति सुंदर ,,,,, ,

MY RECENT POST,,,,काव्यान्जलि ...: ब्याह रचाने के लिये,,,,,

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

धीरे धीरे अच्छे ब्लॉग्स को पढ़ने का अलग आनंद होता है...


हम भी बचपन में सबसे अच्‍छी मि‍ठाई एक तरफ रख लेते थे, सबसे बाद में धीरे धीरे खाते रहने के लि‍ए ☺

Shah Nawaz ने कहा…

अरे वाह! यह भी अच्छा प्रयास है.... अच्छे लगे आपके द्वारा प्रस्तुत यह लिंक.... पढने में भी आसानी रही.... :-)

शिवम् मिश्रा ने कहा…

अरे वाह एक और प्लेट खुरचन ... लाओ भई लाओ ... जय हो रश्मि दी !

सदा ने कहा…

वाह ... यह स्‍वाद और लेखन का जादू यूँ ही बरकरार रहे ... आभार

संजय भास्कर ने कहा…

:)

वाणी गीत ने कहा…

कदम छोटे ही सही , चला तो जाए ...मिठाई थोड़ी- थोड़ी ही स्वाद देती है !

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