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रविवार, 24 जून 2012

रविवारीय महाबुलेटिन 101 लिंक एक्सप्रेस ...धडधडाती आ रही है



पिछले कुछ सप्ताह अपने किसी आवश्यक कारणों से महाबुलेटिन नहीं लगा सका । अलबत्ता मुझे जानने वाले जानते हैं कि मैं अंतर्जाल के उन बाशिंदों में से हूं जो " नहीं हूं फ़िर भी यहीं हूं " , कहीं न कहीं हरी बत्ती जलता जलाता , लिखता लिखाता ,पढता पढाता आपको मिल ही जाऊंगा , फ़ेसबुक , गूगल , ट्विट्टर , और  स्वाभाविक है कि ब्लॉगपोस्टों पर भी । खैर मुझे बडा ताज्जुब हुआ जब मैंने सचमुच ही पाया कि  मित्र आजकल ब्लॉग पोस्टें कम लिख रहे हैं , पढ भी कम रहे हैं और जाहिर सी बात है कि टिप्पणी तो कम कर ही रहे हैं , लेकिन कमाल ये कि सब कहीं न कहीं इसी अंतर्जाल पर टहल जरूर रहे हैं । अरे महाराज ऐसा जुलुम न किया करिए , लिखते रहा करिए और पढते रहा करिए , और ऐसा ही सब कोई किया करिए , चलिए फ़िलहाल तो आपको टहलाते हैं ब्लॉगनगरिया की पोस्टों में । इन्हें हम हमेशा की तरह ब्लॉगर , जागरण जंक्शन , बीबीसी ब्लॉग्स , नवभारत टाइम्स ब्लॉग्स और वर्डप्रेस से खदेड खदेड के धर लाए हैं आपके लिए , बांचिए बांचिए आराम से बांचिए

वही पुरनका पढनिया पोज वाला फ़ोटो ....



लप्रेक ऑफ्टर गैंग्स ऑफ वासेपुर

Posted On 2:52 PM by विनीत कुमार
रागिनी ! ओह डियर, उठो न. तुम गऊ ( गैंग्स ऑफ बासेपुर ) से आने के बाद इतनी उदास और मरी-मरी सी क्यों हो गई ? चलो-चलो, फटाफट नहाओ और लंच कर लो. फिर आज मल्कागंज भी तो चलना है. हम भी देखें कि रागिनी अपने नए कुर्ते में कैसी खिलती-दमकती है ?


रघु..रघुSssss. अरे पागल, तुम रो क्यों रही हो ? मैं अनुराग को नहीं छोडूंगी रघु, उससे बदला लूंगी. बदला लोगी ? पर किया क्या अनुराग ने तुम्हें, उसने एक बेहतरीन फिल्म ही तो बनायी है, हां गोलियों की आवाज और खून से लथपथ कटे-लटके भैंसे को देखकर कल तुम्हें चक्कर आने लगा था लेकिन आकर मैंने तुम्हें मसाज भी तो किया था घंटों,भूल गई..सिर्फ गोली और बमबारी की है, सिर्फ कटे भैंसे दिखाएं है ?


2.

........मैं लिखता हूँ--संजय भास्कर



इस भाग दौड़ भरी दुनिया में
जब भी समय मिलता है
मैं लिखता हूँ ।
जब समय नहीं कटता मेरा
समय काटने के लिए
मैं लिखता हूँ ।
जब भी लिखता हूँ,
बहुत ध्यान और
शांत मन से लिखता हूँ ,


3.

गैंग्स ऑफ़ वासेपुरः जियअ हो बिहार के लाला

गैंग्स ऑफ वासेपुर के प्रोमो देखकर कसम खाई थी कि फिल्म पहले ही दिन देखूंगा। देखी...और क्या दिखी। वाह। बहुत दिनों बाद फिल्म देखकर मजा आ गया।

अनुराग कश्यप की सभी फिल्में देखीं है। लेकिन संयुक्त बिहार या अब के झारखंड के अतीत गुंडई, लुच्चई, कमीनेपन को इस तरह किसी ने उभारा नहीं था। अपनी पहली रिलीज़ फिल्म ब्लैक फ्राइडे की तरह ही अनुराग ने एक बार फिर डॉक्यु-ड्रामा रच दिया है।

बदलते हुए लेंस, और पीय़ूष मिश्रा की कमेंट्री इस फिल्म को ऑथेंटिक बनाती


4.

डॉक्टर साहब , क्या आप डॉक्टर हैं ? एक अहम सवाल ---


मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाने पर अक्सर सीनियर्स द्वारा फ्रेशर्स से एक सवाल पूछा जाता है -- डॉक्टर क्यों बनना चाहते हो ! आजकल तो पता नहीं लेकिन हमारे समय में अक्सर बच्चे यही ज़वाब देते थे -- जी देश के लोगों की सेवा करना चाहता हूँ . इस पर सीनियर्स ठहाका लगाकर हँसते और कहते -- देखो देखो यह देश की सेवा करना चाहता है . यह रैगिंग का एक ही एक हिस्सा होता था .

लेकिन डॉक्टर बनने के बाद समझ आया--- यह भी तो एक प्रोफेशन ही है . जो डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस में हैं , उन्हें दिन रात पैसा कमाने की ही चिंता सताती रहती है . यह अलग बात है , इस प्रक्रिया में वे रोगियों का उपचार कर भला काम भी करते हैं . लेकिन यदि सोचा जाए तो सरकारी डॉक्टर्स को सही मायने में ज़रूरतमंद लोगों की सेवा और सहायता करने का पूर्ण अवसर मिलता है क्योंकि अपनी ड्यूटी सही से की जाए तो बहुत लोगों का भला किया जा सकता है

5.

तुझको छू लूं तो फिर ऐ जान ए तमन्ना

मुश्किल, आसानी, प्यार, उदासीनता, खालीपन और ज़िन्दगी से जद्दोज़हद के अट्ठारह साल.
कॉफ़ी, मसाला डोसा और दोपहर की ट्रीट वाले साल जोड़ लें तो कोई बीस साल और क्रश वाले बेहिसाब दिन... एक नज़र में टूट जाता है क्या कुछ मगर एक नज़र बचाए रख सकती है कितना. हेप्पी वाला दिन.

उम्मीद भर से नहीं आता
हौसला बरदाश्त करने का
कि सब कुछ भी दे दें,
तो भी कितना कम है, ज़िन्दगी के लिए.

6.

१५वीं जयन्ती पर संगीत-मार्तण्ड ओंकारनाथ ठाकुर का स्मरण


स्वरगोष्ठी – ७६ में आज

‘मैं नहीं माखन खायो, मैया मोरी...’

 २० वर्ष की आयु में ही वे इतने पारंगत हो गए कि उन्हें लाहौर के गन्धर्व संगीत विद्यालय का प्रधानाचार्य नियुक्त कर दिया गया। १९३४ में उन्होने मुम्बई में ‘संगीत निकेतन’ की स्थापना की। १९४० में महामना मदनमोहन मालवीय उन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संगीत संकाय के प्रमुख के रूप में बुलाना चाहते थे किन्तु अर्थाभाव के कारण न बुला सके।
‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने सभी संगीत-प्रेमी पाठकों-श्रोताओं का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। आज २४ जून है और आज के ही दिन वर्ष १८९७ में तत्कालीन बड़ौदा राज्य के जहाज नामक गाँव में एक ऐसे महापुरुष का जन्म हुआ था जिसने आगे चल कर भारतीय संगीत जगत को ऐसी गरिमा प्रदान की, जिससे सारा विश्व चकित रह गया। आज हम आपके साथ संगीत-मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे और उनकी कुछ विशिष्ट रचनाएँ आपके लिए प्रस्तुत भी करेंगे।



7.

आह राग...वाह राग

फोटो- बिना बताए अजदक से साभार। 
ट्रेन में चलते, अलसाए, उबे तो खिडकी के सहारे कुछ देर टिककर बैठे। पैदल चलते तो सिर्फ जमीन देखते कि कैसे सडक की जुडी बजरियां जल्‍दी जल्‍दी गुजर रही हैं। कंधे पर झोला भी नहीं कि कुछ इतिहासबोध ही होता। पैर में टूटी चप्‍पल भी नहीं कि थोडा सा रूमानी हो जाते। करना क्‍या चाहते हैं, पता नहीं। जाना कहां, जाने से पहले क्‍यों सोचना। कन्‍फयूजन भी नहीं कि सारी मढैया उसी पर लादकर अपना झट से किनारे हो लेते। रिक्‍शे वाले से पहाडगंज जाने का किराया तो पूछते हैं, पर तेल महंगा हो गया है, ये भी सोचते हैं। घर आने पर चाबी मेज पर फेंकते ही एक बार फिर से वही किराएदारी शुरू हो जाती है, जो हमने सांस से जोडी थी।

8.

तंत्र-सूत्र—विधि—31 (ओशो)

देखने के संबंध में दूसरी विधि:
तंत्र सूत्र--विधि --31 ओशो
तंत्र सूत्र–विधि –31 ओशो
देखने के संबंध में दूसरी विधि
‘’किसी कटोरे को उसके पार्श्‍व-भाग या पदार्थ को देखे बिना देखो। थोड़े ही क्षणों में बोध का उपलब्‍ध हो जाओ।‘’
किसी भी चीज को देखो। एक कटोरा या कोई भी चीज काम देगी। लेकिन देखने की गुणवत्‍ता भिन्‍न हो।
‘’किसी कटोरे को उसके पार्श्‍व-भाग या पदार्थ को देखे बिना देखो।‘’
किसी विषय को पूरा का पूरा देखो, उसे टुकड़ो में मत बांटो। क्‍यो? इसलिए कि जब तुम किसी चीज को हिस्‍सों में बांटते हो तो आंखों को हिस्‍सों में देखने का मौका मिलता है। चीज को उसकी समग्रता में देखो। तुम यह कह सकते हो।

9.

दरबारी संस्कृति में बुरी खबर

एम जे अकबर

गिलानी और मखदूम शहाबुद्दीन

एक प्रधानमंत्री को गंवाना बदकिस्मती कहा जा सकता है. लेकिन एक ही हफ्ते में दो-दो प्रधानमंत्रियों को गंवाना लापरवाही ही है. पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के ड्राइंग रूम में एक दूसरे की वाहवाही और पीठ थपथपाने की होड़ में किसी ने भी प्रधानमंत्री का नाम आगे भेजते हुए उसके बायोडाटा पर निगाह डालने की जरा सी भी जहमत नहीं उठायी.

उपमहाद्वीप की दरबारी संस्कृति में बुरी खबर एक आपदा की तरह है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह दरबार पाकिस्तान में है या भारत में.

राजनीति में एक साल काफी बड़ा होता है. लेकिन, निश्चित तौर पर पाकिस्तान के लोकतंत्र में यह सबसे लंबा हफ्ता कहा जा सकता है. मंगलवार को प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी क्योंकि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर अमल करने से इनकार कर दिया था, जिसके तहत उन्हें राष्ट्रपति जरदारी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कराने को कहा गया था.





10.

पुस्तक परिचय - 32 ..... " अनुभूति " / अनुपमा त्रिपाठी


अनुभूति /  अनुपमा त्रिपाठी 

कुछ समय पूर्व  मुंबई प्रवास के दौरान अनुपमा त्रिपाठी जी से मिलने का अवसर  मिला ।उन्होने मुझे अपनी दो पुस्तकें  प्रेम सहित भेंट कीं । जिसमें से एक तो साझा काव्य संग्रह है  एक सांस मेरी  जिसका  सम्पादन सुश्री  रश्मि प्रभा  और श्री  यशवंत माथुर ने किया है ...इस पुस्तक के बारे में  फिर कभी .....
आज मैं आपके समक्ष लायी हूँ अनुपमा जी  की पुस्तक अनुभूति का परिचय । अनुभूति से पहले थोड़ा सा परिचय अनुपमा जी का ... उनके ही शब्दों में --- ज़िंदगी में समय से वो सब मिला जिसकी हर स्त्री को तमन्ना रहती है.... माता- पिता की दी हुयी शिक्षा , संस्कार  और अब मेरे पति द्वारा दिया जा रहा वो सुंदर , संरक्षित जीवन जिसमें वो एक स्तम्भ की तरह हमेशा साथ रहते हैं .... दो बेटों की माँ  हूँ और अपनी घर गृहस्थी में लीन .... माँ संस्कृत की ज्ञाता थीं उन्हीं की हिन्दी साहित्य की पुस्तकें पढ़ते पढ़ते हिन्दी साहित्य का बीज हृदय में रोपित हुआ  और प्रस्फुटित हो पल्लवित हो रहा है ...


11.

किसान और आम जनता की क्रय शक्ति की किसे चिंता है?


किसी भी विकासशील देश का लक्ष्य होना चाहिए कि वह जितनी जल्दी हो सके विकसित हो, उस की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हो। लेकिन साथ ही यह प्रश्न भी है कि यह विकास किस के लिए हो? किसी भी देश की जनता के लिए भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य व चिकित्सा तथा शिक्षा प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं। विकास की मंजिलें चढ़ने के साथ साथ यह देखना भी आवश्यक है कि इन सब की स्थितियाँ देश में कैसी हैं? वे भी विकास की ओर जा रही हैं या नहीं? और विकास की ओर जा रही हैं तो फिर उन के विकास की दिशा क्या है?
भोजन की देश में हालत यह है कि हम अनाज प्रचुर मात्रा में उत्पन्न कर रहे हैं।  जब जब भी अनाज की फसल कट कर मंडियों में आती है तो मंडियों को जाने वाले मार्ग जाम हो जाते हैं।  किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए कई कई दिन प्रतीक्षा करनी पड़ती है।  इस के बाद भी जिस भाव पर उन की फसलें बिकतीं हैं वे किसानों के लिए लाभकारी मूल्य नहीं हैं।


12.

1989 की कवितायें - संगीत की तलाश

चलिये 1988 की कवितायें हो गईं अब 1989 की कविताओं पर आते हैं । यह पहली कविता - संगीत की तलाश । संगीत किसे बुरा लगता है ? यह निहायत फालतू सा सवाल होगा ना । बचपन में स्कूल में पढ़ा था संगीत और कोलाहल में अंतर । उन दिनों जब मेरी उम्र दस साल थी मैंने भंडारा के भारतीय संगीत विद्यालय में गायन की कक्षा में प्रवेश लिया था । कुछ कारण ऐसे रहे कि मैं आगे अध्ययन नहीं कर पाया लेकिन संगीत की दीवानगी बनी रही । यह दीवानगी ऐसी थी कि मैं हर कहीं संगीत तलाशता था । इस तरह इस कविता की प्रारम्भिक पंक्तियों ने जन्म लिया लेकिन तब यह कविता नहीं बन पाई । यह कविता बनी अपनी अंतिम पंक्तियों में जाकर । आप स्वयं देख लीजिये । यहीं जाकर मुझे समझ में आया कि संगीत और कोलाहल में क्या अंतर होता है ।


संगीत की तलाश
मैं तलाशता हूँ संगीत
गली से गुजरते हुए
तांगे में जुते घोड़े की टापों में
मैं ढूँढता हूँ संगीत
घन चलाते हुए
लुहार के गले से निकली हुंकार में
रातों को किर्र किर्र करते
झींगुरों की ओर
ताकता हूँ अन्धेरे में
कोशिश करता हूँ सुनने की
वे क्या गाते हैं


13.

कथा जारी है ....(मानस के रोचक प्रसंग -२)


कथा जारी है ....राजा दशरथ का देहान्त हो चुका है, भरत आ चुके हैं। सारी दुर्दशा और दुर्व्यवस्था की जड़ अपनी मां को फटकार चुके हैं। बिना राम के वह राजगद्दी लेकर क्या करेंगे? कौशल्या के सामने बहुत ही कातर होकर वह कहते हैं, 'मां, ये जो कुछ हुआ उसमें मेरी तनिक भी सम्मति नहीं है'। मुनि वशिष्ठ भरत को बहुत समझाते हैं कि पिता की आज्ञा, राजकाज तथा प्रजा की देखभाल के लिए आपको राजगद्दी संभाल लेनी चाहिए। मगर सोचवश भरत को यह बात अनुचित लगती है। उन्हें तो दुहरा आघात लगा है। राम का विछोह और पिता की मृत्यु...बड़े आहत हैं वह। अब वशिष्ठ उन्हें समझाते हैं जो बड़ा ही विचारोत्तेजक प्रसंग हैं। इस प्रसंग में अध्यात्म का जहां गूढ़ भाव है वही लोकाचार, जीवन दर्शन के अनमोल सूत्र भी हैं। कुछ आपके साथ साझा करना चाहता हूं। यद्यपि रामकथा पर कुछ भी टीका टिप्पणी मेरे बूते की बात नहीं है और न ही इस विषय की मेरी लेशमात्र की विशेषज्ञता ही है। मगर पूरे प्रसंग को पढ़ने पर जो भाव मन में उमड़ते हैं उन्हीं को आपसे बांटना चाहता हूं।
वशिष्ठ भरत को सोच निमग्न देखते हैं। खुद भी प्रत्यक्षतः और दुखी हो जाते हैं। मगर ज्ञानी हैं। एक ज्ञानी की तटस्थता भी उनमें है। एक बड़े पते की सीख देते हैं -
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।


14.

कार्टून:-कितना बदल गया इन्सान



15.

सोनिया के संगमा को संघ का समर्थन


सोनिया के संगमा को संघ का समर्थन
कांग्रेस की कथनी को सुनकर उसकी करनी का अंदाज नहीं लगाया जा सकता. यही उसकी राजनीतिक सिद्धि है. इसी की बदौलत अब तक कांग्रेस देश पर राज करती आई है और इसी अंतर की बदौलत इस बार राष्ट्रपति चुनाव में उसने ऐसा दांव चला है कि खुद ही सत्तापक्ष और खुद ही विपक्ष बन बैठी है. इस वक्त राष्ट्रपति चुनाव दो प्रमुख उम्मीदवार हैं और कमाल देखिए कि दोनों ही कांग्रेसी खेमे से हैं. एक का नाम है प्रणव मुखर्जी और दूसरे हैं पी ए संगमा.


16.

[परिकल्पना ब्लोगोत्सव] हम पूजा करें न करें पर प्यार करते रहें : उषा वर्मा

mailभारत में जन्मीं लेखिका उषा वर्मा जी वर्तमान में ब्रिटेन में रहकर हिन्दी के विकास में अपना योगदान दें रही हैं l संघ बरेली से सम्मानित उषा जी ‘शाने अदब’ भोपाल, ‘निराला सम्मान’ हैदराबाद, तथा कथा यू.के. लंदन से कहानी संग्रह ‘कारावास’ पर पद्मानंद साहित्य सम्मान प्राप्त कर चुकी हैं। उनकी अबतक की प्रकाशित पुस्तकों में ‘क्षितिज अधूरे’, ‘कोई तो सुनेगा’(कविता संग्रह ) ,‘कारावास’ (कहानी संग्रह) और संपादित पुस्तकों में सांझी कथायात्रा’,एवं ‘प्रवास में पहली कहानी’और अनूदित पुस्तकों में बच्चों की पुस्तक ‘हाउ डू आई पुट इट आन’, का हिन्दी अनुवाद व पचीस उर्दू कहानियों का हिन्दी अनुवाद मुख्य हैं l प्रस्तुत है उषा वर्मा जी की डॉ.प्रीत अरोड़ा से विशेष बातचीत l


(1)    प्रश्न–उषा जी आपने संगीत में उच्च शिक्षा प्राप्त की और फिर दर्शन शास्त्र में एम.ए। तो इसके बाद आपकी रुचि हिन्दी साहित्य में कैसे हुई?



17.

आज दुष्टता आसानी से जीतती नज़र आती है |

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आज के इस युग में ऐसा नहीं कि अच्छे लोग नहीं लेकिन यह भी सत्य है कि अच्छाई और अच्छे लोगों को साथी कम ही मिला करते हैं | क्या कारण है कि बुराई के साथी बहुत होते हैं और अच्छाई ? मुझे तो एक ही कारण नज़र आता है कि सत्य कि राह में तकलीफ ,परेशानियां और अकेलापन है और असत्य, भ्रष्टाचार कि राह में आराम , शोहरत और साथियों का हुजूम है |
मैं हमेशा कहा करता हूँ कि यदि आप सत्य कि राह पे नहीं चल पा रहे हैं तो कम से कम असत्य और बुराई का साथ तो न दो | यदि हर इंसान खुद को बुराई का साथ देने से भी बचा सके तब भी इस समाज में अच्छाई जीवित रह सकती है

18.

संबंधों और विमर्श की नदी

हिंदी में इन दिनों स्त्री विमर्श के नाम पर रचनाओं में जमकर अश्लीलता परोसी जा रही है । स्त्री विमर्श की आड़ में देहमुक्ति के नाम पर पुरुषों के खिलाफ बदतमीज भाषा का जमकर इस्तेमाल हो रहा है । कई लेखिकाओं को यह सुनने में अच्छा लगता है कि आपकी लेखनी तो एके 47 की तरह हैं । माना जाता है कि हिंदी में स्त्री विमर्श की शुरुआत राजेन्द्र यादव ने अपनी पत्रिका हंस में की । नब्बे के शुरुआती वर्षों में । उस वक्त विमर्श के नाम पर काफी धांय-धांय हुई थी । कई अच्छे लेख लिखे गए । कई शानदार रचनाएं आई । लंबी लंबी बहसें हुई । लेकिन कुछ साल बाद स्त्री और विमर्श दोनों अपनी अपनी अलग राह चल पड़े और उनकी जगह ले ली एक तरह की अश्लील और बदतमीज लेखन ने । शुरुआत में तो पाठकों को उस तरह का बदतमीज या अश्लील लेखन एक शॉक की तरह से लगा था जिसकी वजह से उसकी चर्चा भी हुई और लोगों को पसंद भी आई ।

19.

जागो सोने वालों ...




20.

बीते दिन लेकर मैं चल पड़ी हूँ ....



आदरणीय अम्मा ,
सादर प्रणाम !

आशा करती हूँ तुम पहले से बेहतर होगी
हमलोग सकुशल हैं .
पहले के शांत दिनों को लौटाने का यह एक प्रयास है ....
दिन लौटेंगे या नहीं
इस पर कैसा चिंतन -
प्रयास है और यकीन है
कि यादों के गीत गाती स्मृतियाँ
जो दुबकी हैं कहीं
वे सुगबुगायेंगी


21.

"अकेलापन दूर कीजिए न" (चर्चा मंच-920)

मित्रों!
      रविवार के लिए कथा के ऱूप में कुछ लिंकों की शृंखला आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ!
       कुछ बातें मेरी …भी सुनिए ! पुराना आईना  वो हदे नज़र ...से बरसात का मजा लेकर "आओ धान की पौध लगाएँ" क्योंकि यही काल-चक्र है... ! अकेलापन.....दूर कीजिए न..." हमसे है जमाना - जमाने से हम नहीं " फिर भी नींद मानो रूठ कर बैठ गयी...शायद विधना रूठ रहे होंगे! मन के तम को दूर कर...मित्रता दृढ़ता से धर ! बच्चा आपसे जिरह करता है रोज़ ? तो फ़ुरसत में ... : झूठ बोले कौआ काटे ...! तेरे मेरे मिलने का दिन था मुकरर्र* *मगर तेरे जानिब.....बहाने-बहाने..वाह बहुत खूब हैं तेरे बहाने.....! वो देखो मंगल मेघ है आया...क्योंकि लोगों को इसबार काफी झुलसा कर गगन में छा गये बादल....! अब दिखाई दे रहा है...प्रकृति का मनमोहक नज़ारा...!

22.

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (१७वीं-कड़ी)


तृतीय अध्याय
(कर्म-योग - ३.३६-४३)


अर्जुन 


हे वार्ष्णेय बताओ मुझको
ऐसा क्या कारण है होता.
नहीं चाहते हुए भी मानव 
पाप कर्म अग्रसर होता.



23.

एक ग़ज़ल : ख़यालों में जब से .....





ख़यालों में जब से वो आने लगे हैं

हमीं ख़ुद से ख़ुद को बेगाने लगे हैं



हुआ सर-ब-सज़्दा तिरी आस्तां पे

यहाँ आते आते ज़माने लगे हैं



तिरा अक़्स उतरा है जब आईने में

सभी अक़्स मुझको पुराने लगे हैं

24.

भारत को इंडिया क्यों कहा जाता है?


भारत को इंडिया क्यों कहा जाता है?
चेतन, वाया ईमेल 

प्राचीन ग्रीक और लैटिन में भारत को सिंधु नदी के पास इलाके से पहचाना जाता था। सिंधु को वे स का लोप करके इंडस बोलते थे। इसी सिंधु से फारसी अरबी में हिन्दू और हिन्द शब्द बने। चीनी भाषा में इसे इन्दु लिखते हैं।

अंग्रेज लोग अपने नाम के आगे लॉर्ड क्यों लगाते थे? जैसे-लॉर्ड डलहौजी, लॉर्ड इरविन। क्या वे खुद को भगवान समझते थे ?
शशांक मेहता mr.shashankmehta@gmail.com
लॉर्ड सामंती युग का शब्द है, जिसका अर्थ स्वामी, प्रभु और मालिक है। हम ईश्वर को भी इस अर्थ में सम्बोधित करते हैं। इंग्लैंड में यह सम्मान का शब्द भी है जैसे लॉर्ड मेयर और लॉर्ड जस्टिस। वहाँ हाउस ऑफ लॉर्ड्स पुराने तालुकेदारों की संस्था है। लॉर्ड डलहौजी वगैरह वैसे ही सामंती नाम थे। पर अब लॉर्ड सम्मानसूचक है और उनका मनोनयन होता है। इंग्लैंड की संसद के उच्च सदन हाउस ऑफ लॉर्ड्स में अब 92 ऐसे सदस्य हैं जिनका सम्बन्ध जमीन्दारी या राजशाही से है। वह परम्परा खत्म हो गई। इस सदन के सुधार का काम चल रहा है और अब एक प्रस्ताव है कि सदन में कुल 450 सदस्य हों, इनमें से 12 लॉर्ड स्पिरिचुअल यानी चर्च ऑफ इंग्लैंड के प्रतिनिधि हों। शेष किसी न किसी रूप में चुने हुए हों।


25.

संपादक हरीश पाठक के जाने की खुशी

राष्ट्रीय सहारा के स्थानीय संपादक हरीश पाठक से बास्ता बस एक जिला कार्यालय प्रभारी और संपादक का था। स्वभावगत चापलूसी नहीं करने और काम से काम रखने की आदत आज के दौर में भारी पड़ती है और मेरे साथ भी ऐसा ही था। दर्जनों बैठकों में उनके साथ बैठना हुआ और पत्रकारिता के अधोपतन देखने को मिला। साल डेढ़ साल पहले बिहारशरीफ में हुए बैठक में सिर्फ और सिर्फ विज्ञापन की चर्चा होना और संपादक का खामोश, तमाशाबीन बना रखना मुझे खटका और मैंने उसे अर्न्तजाल पर व्यक्त क्या किया महोदय को बुरा लगा था और फिर अगले बैठक में ही हरीश पाठक ने तल्ख और व्यंगात्मक लहजे में कहा कि हां आपके सुविचार मुझे न्यूज पोर्टलों पर पढ़ने को मिल जाते है पर मैंने कोई नोटिस नहीं लिया। सबसे निचले स्तर पर पत्रकारिता करते हुए किसी से डरने की बात नहीं होती और यह साहस विज्ञापन की वजह से होता है और फिर कोई नौकरी तो होती नहीं कि निकाल दोगे।


26.

अंगदानःसोचना काफी नहीं,बुनियादी जानकारी भी होनी चाहिए

मरने के बाद हमारे सभी अंगों को खाक में मिल जाना है। कितना अच्छा हो कि मरने के बाद ये अंग किसी को जीवनदान दे सकें। अगर धार्मिक अंधविश्वास आपको ऐसा करने से रोकते हैं तो महान ऋषि दधीचि को याद कीजिए, जिन्होंने समाज की भलाई के लिए अपनी हड्ड़ियां दान कर दी थीं। उन जैसा धर्मज्ञ अगर ऐसा कर चुका है तो आम लोगों को तो डरने की जरूरत ही नहीं है। सामने आइए और खुलकर अंगदान कीजिए, इससे किसी को नई जिंदगी मिल सकती है। एक्सपर्ट्स से बात करके अंगदान की पूरी प्रक्रिया के बारे में बता रहे हैं प्रभात गौड़: 
क्या है अंगदान 
अंगदान एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें एक इंसान (मृत और कभी-कभी जीवित भी) से स्वस्थ अंगों और टिशूज़ को ले लिया जाता है और फिर इन अंगों को किसी दूसरे जरूरतमंद शख्स में ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है। इस तरह अंगदान से किसी दूसरे शख्स की जिंदगी को बचाया जा सकता है। एक शख्स द्वारा किए गए अंगदान से 50 जरूरतमंद लोगों की मदद हो सकती है।


27.

साहित्य में ‘‘अविराम’’


पत्रिका: अविराम,  अंक: अपै्रल-जून 2012, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: मध्यामा गुप्ता,  आवरण/रेखाचित्र: जानकारी उपलब्ध नहीं, पृष्ठ: 32, मूल्य: 15रू.(वार्षिक 60रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं , फोन/मोबाईल: 090543712, सम्पर्क: एफ 488/2, गलीन नम्बर 11, राजेन्द्र नगर, रूड़की जिला हरिद्वार उ.खण्ड 
साहित्य की नवीन पत्रिका अविराम का समीक्षित अंक लघुकथा विशेषांक है।

28.

चल रही थी जिंदगी ,

करेलेकी कड़वाहट लिए चल रही थी जिंदगी ,
तुम उसमे शहदकी मिठाश लिए आये हो ,
बुझे चूलेकी राखमें सुस्ता रही थी चिंगारियां ,
तुम उसमे एक आतिश बनकर आये हो ,
मटरके दानेसी लुढ़क रही थी ये जिंदगी ,
तुम आलूसी दोस्ती निभाने आये हो ...
पनीरसी नर्म नर्म बेदाग स्निग्धसे चोकोरमें ,
कला नमक और लालमिर्चका स्वाद बनकर आये हो ......
जब जब मेरी जिंदगी बन गयी लौकीके सूपसी फीकी ,
तुम उसमे काली मिर्च और नमक बनकर आये हो ...

29.

बेटी .....



30.

शब्दों के सालिगराम

shaligram
लो क की भाषा हमेशा प्रवाहमयी होती है । इसका वेग शब्दों को जिस तरह माँजता, चमकाता है, जिस तरह उनका अनघड़पन तराशकर उन्हें सुघड़ बनाता है, शब्दों का मोटापा घटा कर उन्हें सुडौल बनाता है, वह सब अनुकूलन के अन्तर्गत होता है जो प्रकृति की हर चीज़, हर आयाम में नज़र आता है । अनुकूलन यानी सहज हो जाना । सहजता ही स्थायी है, सहजता में ही प्रवाह है और सहजता ही जीवन है । जीवन यानी गति, प्रवाह । प्रकृति के अर्थ से ही सब कुछ स्पष्ट है । प्रकृति यानी जो मूल है , पहले से है । अपने मूल रूप में ही कोई चीज़ सहज रहती है । इस मूल वस्तु में प्रकृति के विभिन्न रूपाकारों के साहचर्य से निरन्तर बदलाव होता है जिसका आधार ही अनुकूलन है । भाषा पर समाज और भूगोल का बड़ा प्रभाव पड़ता है । मनुष्य का सबसे महत्वपूर्ण आविष्कार भाषा की खोज है । विभिन्न मानव समुदायों में ध्वनियों के उच्चारण भी भिन्न होते हैं । मनुष्य ने ध्वनि-समूहों को पहचाना और फिर शब्दों के रूपान्तर सहज हो गए । क्ष का रूपान्तर क, ख, श हो सकता है । का रूपान्तर में हो सकता है । का रूपान्तर में हो सकता है और का रूपान्तर , में हो सकता है । के में बदलने का क्रम भारत से ब्रिटेन तक एक सा है । दिलचस्प रूपान्तरों के हजारों उदाहरण हमें बोलचाल की भाषा में मिलते हैं ।


31.

नीयत' साफ नहीं है नीतीश की!

भाजपा नेतृत्व सावधान हो जाए! कभी बिहार को पूरे संसार की नजरों में 'कुख्यात' बना डालने वाले लालू प्रसाद यादव के पुराने सहयोगी और अब  जदयू के 'लाडले' बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी उसी रणनीति को अंजाम दे रहे हैं जिसकी रूपरेखा उन्होंने पिछले बिहार विधानसभा चुनाव के पहले ही तैयार कर ली थी। तब विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बिहार में नहीं आने देने की शर्त नीतीश ने यूं ही नहीं रखी थी। वे वस्तुत: भाजपा नेतृत्व को भड़का उसकी परीक्षा ले रहे थे। तब की राजनीतिक जरूरत के कारण भाजपा ने नीतीश की शर्त को मान लिया था। ना की हालत में नीतीश कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने वाले थे। अगर चुनाव परिणाम अप्रत्याशित नहीं होते, भाजपा को 91 सीटों के साथ बड़ी सफलता नहीं मिलती, तब नीतीश अपना रंग उसी समय दिखा देते। तब नरेंद्र मोदी को बिहार-प्रवेश से वंचित रखने में सफल नीतीश अब अगर राष्ट्रीय परिदृश्य से मोदी को अलग रखने का मंसूबा पाल रहे हैं, तो अपनी संकुचित अवसरवादी सोच के कारण ही।


32.

निशा से.. तारिणी अवस्थी की कानपुर ब्लागर्स असोसिएसन पर प्रथम रचना: स्वागत्





















हे निशे! कितनी विचित्र!
वर्षों से रोज़ मुझको कहीं
बहका के ले जाती हो तुम |
एकांत है चहु और
हम ही हैं प्रकाशित इस समय |


व्याप्त हो हर वास्तु में तुम
दृश्य में, अदृश्य में |
स्वयं रहती हो मगर
अदृश्य सुदृढ़-निश्चयेन |
औ' तुम्हारा मौन
आकृष्ट मुझको नित्य करता |

33.

कंटीली झाड़ियां

   इस वसन्त ऋतु में परमेश्वर ने हमें अच्छी बारिश दी, इस कारण हमारे घर के पिछवाड़े में उगने वाली जंगली कंटीली झाड़ीयां और जंगली फूल भी बहुतायात से हुए। बटरकप फूलों की छटा तो देखे ही बनती थी, वे आकार में बड़े और बहुत सुन्दर थे। इससे पहले कि वे मुर्झा जाएं, मैंने चाहा कि उनकी फोटो उतार कर रख लूँ। लेकिन उनके निकट पहुंचना कठिन था, क्योंकि वे कीचड़ और कंटीली झाड़ियों में उगे हुए थे। एक दोपहर को मैंने फोटो लेने की ठान ही ली, और अपनी तैयारी कर के मैं उन फूलों की ओर चल पड़ी। उन बटरकप फूलों तक पहुँचने से पहले ही मेरे पांव कीचड़ में लथपथ हो गए, मेरे हाथ-पैरों पर झाड़ियों से खरोंचें आ गईं और मुझे कई जगह पर कीड़ों ने भी काट लिया; परन्तु उन फूलों की सुन्दरता को निकट से देख तथा निहार पाने के आनन्द ने मेरे उन सभी कष्टों को भुला दिया; उन सुन्दर फूलों की ली गई फोटो के द्वारा आते समय में दूसरों तक उनकी सुन्दरता को पहुँचा पाने और उनके जीवनों को भी आनन्दित कर पाने के आनन्द के सामने मेरे वे कष्ट कुछ भी नहीं थे।


34.

अब कहाँ मिलते हैं, ऐसे भारत के लाल, ऐसे भाई, ऐसे शिष्य और ऐसे पुलिस वाले (संस्मरण )

बिहार के ही नहीं पूरे देश के पुलिस महकमें में एक नाम स्वर्णाक्षरों में हमेशा लिखा जाएगा, नाम है 'रणधीर  प्रसाद वर्मा' जो एक आई. पी.एस थे। रणधीर वर्मा धनबाद के बैंक की डैकती के सुराग का पता लगाने में लगे हुए थे, कहा जाता है, इसी डकैती के लिए कुछ टिप देने के लिए धोखे से उनको बुलाया गया था, और वो अकेले ही चले गए थे, और इसी दौरान उनको घात लगा कर, मारा गया था।

मैं रणधीर भईया के परम प्रिय गुरु, की पुत्री हूँ, उनका स्नेह मुझे हमेशा मिला था। मेरे पिता एक शिक्षक थे, और एक शिक्षक का धर्म, उन्होंने पूरी आस्था से जीवनपर्यंत निभाया। रणधीर भईया उनके बहुत प्रिय छात्र थे। रणधीर भईया अक्सर हमारे घर आया करते थे, मेरे बाबा के साथ बैठ कर घंटों बतियाया करते थे। कहा करते थे मुझसे  'मुन्ना तुम खुशकिस्मत हो, जो सर तुम्हारे पिता हैं, लेकिन मैं तुमसे ज्यादा खुशकिस्मत हूँ क्योंकि वो मेरे गुरु हैं' उम्र में वो मुझसे बहुत बड़े थे, और मुस्कुराते भी कम थे, इसलिए उनसे डर ही लगता था, जब भी आयें यही पूछते थे, खाली गाना चल रहा है या कुछ पढाई-लिखाई भी होता है। और हम डर कर सकुचा जाते थे। मुझसे वो बहुत कम बोलते थे, लेकिन स्नेह बहुत करते थे।

स्व. रणधीर वर्मा को मरणोपरान्त भारत सरकार ने 'अशोक चक्र' भी दिया है ।


35.

अदरक, लहसुन, हरी मिर्च, बेहया, शीशम और नीम की पत्ती

 



गाजियाबाद। जानलेवा पेस्टीसाइड्स से सेहत के खतरे अब दूर होंगे। भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने फसलों को कीड़ों से सुरक्षित रखने के लिए ऐसा देसी फार्मूला तैयार किया है जो
 
पेस्टीसाइड्स की निर्भरता कम करेगा। लंबे शोध से पता लगा है कि लहसुन, मिर्ची, अदरक , नीम और शीशम से तैयार बॉयो प्रोडक्ट फसलों को सुरक्षित रखने के काम आएगा।


36.

आदि शक्ति उवाच (छंद)


(पर्यावरण सुरक्षा के प्रति जागरण)

नहीं  बालिका  जान  मुझे  तू   ,  मैं  हूँ  माता  का अवतार |
सात   समुंदर   हैं   आँखों   में  ,  मेरी   मुट्ठी   में   संसार ||
मैंने   तुझको  जन्म  दिया  है  ,  बहुत  लुटाये   हैं  उपहार |
वन  उपवन  फल  सुमन  सुवासित, निर्मल नीर नदी की धार ||

स्वाद  भरे  अन  तिलहन  दलहन ,  सूखे  मेवों  का  भंडार |
हरी - भरी  सब्जी  - तरकारी ,  जिनमें   उर्जा   भरी  अपार ||
प्राणदायिनी   शुद्ध   हवा  से   ,   बाँधे  हैं  श्वाँसों  के  तार |
तन - तम्बूरा  तब  ही  तेरा  ,  करता  मधुर-  मधुर  झंकार ||


37.

किसी की नज़र भी लगती किसी को



मानता नहीं था
किसी की नज़र भी
लगती किसी को
जब से वो रूठ गए
समझ आ गया
                                                                   नज़र वाकई लगती



38.

ज़ख्म

जिनसे हमे थी नफ़रत तुम्हारे वो मीत हुए
ज़ख्म जो दिये हैं तुमने हमारे वो गीत हुए

जब भी मिला है मौका ज़ख्मो को यूँ है छेडा
हर  रिस्ते ज़ख्म पर तुम  मुस्कान ही लिये

अपनी थी ये नादानी विश्वास तुम पर करके
तुम्हारी  नफरतों की मोहबत में यूँ जिए

39.

प्यार

दफ़न की हुई
यादो की कब्र पर
जिन्दगी का दिया
बुझने की लालसा मे
टिमटिमा रहा हैं

जब दिया बुझ जायेगा
कब्र को मज़ार कहा जाएगा
और
मन्नत मांगने के लिये
कोई ना कोई
अपने प्यार को पाने के लिये
अपनी यादो के साथ
वहां आकर
फिर एक दिया जलायेगा

40.

जाम्बवंत गुफा मंदिर

जम्मू की ओर बढ़ते हुए हमने देखा जाम्बवंत गुफा मंदिर.
मंदिर के पास व्यस्त शौपिंग सेंटर होने से प्रवेश द्वार पहचानना कठिन हैं. सामने दाहिने किनारे जो छोटा सा मार्ग नज़र आ रहा हैं वही प्रवेश द्वार हैं -

सीधे सीढियां चढ़ कर ऊपर जाना हैं. ऊपर अहाते में शिव मंदिर हैं. यही से गुफा की ओर जाने का मार्ग हैं.
सीढियां उतर कर गुफा की ओर जाने पर नीचे रोशनी के बल्ब हैं. यह पहली गुफा हैं जो बाबा अमरनाथ की गुफा कही जाती हैं. यहाँ बर्फानी बाबा हैं. यहाँ शिवलिंग के दर्शन कर हम गुफा में दूसरी ओर बढे.


41.

गांव का "ब्राईट फ्यूचर कंप्यूटर एजुकेशन सेंटर"

रोजगार के अलावा अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए भी गांवों से लोगों का पलायन जारी है| गांव में फ़ौज की नौकरी करने वाले ज्यादातर सैनिकों की बीबियाँ गांव के आस-पास के शहरों में अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए किराए के घरों में रहती है तो कई शहरों में अपने घर बनाकर गांव से पलायन ही कर जाती है| इस वजह से गांव में उनकी बड़ी बड़ी हवेलियाँ, मकान व खेत खिलहान सुने हो जाते है|

42.

तत्काल टिकट में हैकिंग का खेल

          जिस तरह से तत्काल टिकट बनवाने में लगने वाले समय से आम लोग परेशान रहते हैं और रेलवे तमाम कोशिशें करने के बाद भी इस समस्या को अभी तक सुलझा नहीं पाई है उससे यह तो पता चलता है कि कहीं न कहीं पर इस पूरे तंत्र में बहुत बड़ी खामी है. रेलवे को तत्काल टिकट के मामले में एक फ़र्ज़ी तरह से टिकट बनाने के गिरोह के बारे में पता चला और उसकी शिकायत पर एसटीएफ़ ने जिस तरह से रेलवे की साईट हैक करके अधिक दाम वसूल कर टिकट बनाने के गिरोह के सदस्यों को धर दबोचा है उससे यह बात पक्की होती है कि कहीं न कहीं पर इस पूरे तंत्र में रेलवे के कुछ लोगों की मदद से बहुत बड़ा खेल चल रहा है. हिरासत में लिए गए लोगों ने इस पूरी प्रक्रिया में किये जाने वाले खेल का खुलासा जब किया तो सभी को बहुत अचरज हुआ क्योंकि एक तकनीकी विशेषज्ञ की सहायता से बनाये गए सॉफ्टवेयर के माध्यम से रेलवे की साईट को हैक करके पूरा खेल कुछ मिनटों में ही पूरा कर लेते थे और बुकिंग विंडो पर खड़े हुए लोगों को टिकट मिल ही नहीं पाते हैं.

43.

आश्वासन,,,,,


आश्वासन,,गाँव में मंत्री जी वर्षों बाद पधारे,
यह सुनकर गाँव वालो के हो गए वारे न्यारे,
दौड़ा-दौड़ा मै भी उनके पास आया
एक ही साँस में गाँव की सारी बात कह सुनाया!
सोचा था मंत्री जी करवा देगें सारे काम,
हमारे गाँव को देगें आदर्श ग्राम का नाम
पर क्या वे ढेर सारे कागज अपने साथ ले गए,
और हमे आश्वासनो का झूठा पुलिंदा दे गए


44.
रात के अँधेरे में....
चन्द्रमा के घेरे में,
 


सूरज की बांतो में....
तारों की रातों में,
जग-मगा रहे थे तारे....

चंद्रमा व सूरज लग रहे थे प्यारे,
मन करता है उनको छुलूं....
मन करता है उनसे बोलूं,
उनको अपने पास बुलाकर....
अलग-अलग सवाल मैं पूछूं,
रात के अँधेरे में चंद्रमा के घेरे में....





45.

बात अपनों की...

हाँ बात सिर्फ़ अपनों की। जो मेरे अपने हैं... अब आप कहेंगे ये अपने कहीं आपके रिश्तेदार तो नही? रिश्तेदार कहें तो रिश्ता मेरा उन सभी से है जिन्हें दिल मानता है अपना। किसी भी रिश्ते पर बात करने से पहले मै बात करूँगी मेरे पिता की।


मै अपने माता-पिता, भाई बहनों के साथ एक खूबसूरत शहर पिलानी में रहती थी। अब इसे शहर कहें या कस्बा पिलानी जो पहले दलेल गड़ के नाम से जानी जाती थी। सचमुच मेरी जन्म भूमि भी मेरी माँ की तरह बहुत खूबसूरत लगती है।

मेरे पिता श्री रमाकांत पांडॆ


  मेरे पिता एक बहुत ही सुलझे हुए संवेदनशील व्यक्तित्व के इंसान हैं। वो मुझे चालीस साल से जानते हैं लेकिन मै उन्हें तब से जानती हूँ जब मै चार साल की थी। इसके पूर्व का मुझे याद नही। मुझे याद है जब मेरे पिता देख सकते थे। मेरा हाथ पकड़ कनॉट प्लेस मोती हलवाई की दुकान पर जाते थे जहाँ मुझे रसमलाई खाने को मिलती थी। समोसे से मुह जल जाने का डर था वो बस माँ और बहन के लिये पैक करवा कर लाया जाता था। बस वही कुछ साल याद हैं जब पिता मेरा हाथ पकड़ मुझे ले जाते थे। और मै उछलती-कूदती उनके साथ तितली सी उड़ती चलती जाती थी।




46
फुदुक  रही है फूल फूल पर ,
कोमल पंख पसारे ।
रंग - बिरंगे पंख पसारे ,
प्यारे -प्यारे रंग - ढंग को इसके देखो ।
हाथ कभी न इसे लगाना ,
पकड़ोगे तो उड़ जाएगी ।
 क्योंकि फिर न होगा,
 इसका आना ...................।






47.

फ़ुरसत में ... 106 : झूठ बोले कौआ काटे


फ़ुरसत में ... 106
झूठ बोले कौआ काटे
-- मनोज कुमार



पिछले सप्ताह जो पोस्ट लगाई तो सबसे पहले वाणी जी का मेल आया। http://manojiofs.blogspot.in/2012/06/105.html
something wrong while displaying this webpage ...इस ब्लॉग पर यह वार्निंग आ रही है !
मुझे समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है? मेरे कंप्यूटर पर तो ब्लॉग खुल रहा था। फिर एक-दो और मित्रों ने यह शिकायत की। इस बीच कुछेक टिप्पणियां आ चुकी थीं। इसलिए उन मित्रों की शिकायत पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। लगा उनके कंप्यूटर में ही कोई समस्या होगी। जब बुधवार को एक मित्र ने जानकारी दी कि ब्लॉग खुल नहीं रहा और चेतावनी दे रहा है, तो मेरा माथा ठनका। मैंने अपने कंप्यूटर पर जब इस ब्लॉग को खोलने की कोशिश की तो मेरे कम्प्यूटर पर भी यही दशा थी। अपने अल्प तकनीकी ज्ञान से ब्लॉग को खोलने की कोशिश की पर असफल रहा। तब मुझे संकट मोचक की याद आई।  आप सभी जानते हैं बीएस. पाबला जी संकट की घड़ी में “ही” याद आते हैं। इस “ही” को इनवर्टेड कॉमा में रखने का कारण मैं आगे बताऊंगा, इसमें पाबला जी का दर्द भी छुपा है।

48.

ये दौड है राष्ट्रपति चुनाव के लिए , या वडा पाव के लिए ....









राष्ट्रपति भवन की ओर हर कोई लगा रहा ऐसी दौड ,
अबे महामहिम बनना चाह रहे हो कि राउडी राठौड



तीन नए नामांकन और दाखिल हुए हैं , राष्ट्रपति चुनाव के लिए ,
हा हा हा अबे , ये प्रेसिंडेट के लिए ही दौड है न , या है वडा पाव के लिए ..
(लग नय रहा है बेट्टा ..लछ्न्न से तो हमको )


ममता को मनाने प्रणब दा कोलकाता जाएंगे ,
उडी बाबा , फ़ीर कोई कोथा से नया गंडोगोल खिलाएंगे ,
(इत्ता कंपटीसन ..हाय अब तो सट्टेबाज इस पर भी सट्टा लगाएंगे :)


जदयू सांसद निषाद ने राष्ट्रपति चुनाव लडने की इच्छा जताई ,
हायं , अबे ई बात है तो फ़िर कोई हमको भी पूछिए लो भाई ..
(मामता दीदी एकदम्म भीरोध नोही कोरेगी ..ई गारंटी हाय रे बाबा , ऊ हामको चीन्हती नोही है भेरी शियोर



49.

बॉस इज़ आलवेज़ राइट .. प्लीज़ डोंट फ़ाइट ...

सर्वशक्तिवान  बॉस  
की वक्र-दृष्टि से
स्वयम  बॉस  ही बचाते हैं.  
 
                            सरकारी गैर-सरकारी दफ़्तरों, संस्थानों के प्रोटोकाल में कौन ऊपर हो कौन नीचे ये तय करना आलमाईटी यानी सर्व-शक्तिवान  बॉस नाम के जीवट जीव का कर्म  है. इस कर्म पर किसी अन्य के अधिकार को अधिकारिता से बाहर जाकर अतिचार का दोष देना अनुचित नहीं माना जा सकता. एक दफ़्तर का   बॉस   जो भी तय करता है वो उसके सर्वश्रेष्ठ चिंतन का परिणाम ही कहा जाना चाहिये.उसके किये पर अंगुली उठाना सर्वथा अनाधिकृत रूप से किये गये कार्य यानी "अनुशासनहीनता" को क़तई बर्दाश्त नहीं  करना चाहिये. 
 हमारे एक मित्र हैं गिलबिले  एक दिन बोले- बॉस सामान्य आदमी से भिन्न होता है ..!
हमने कहा -भई, आप ऐसा कैसे कह सकते हैं ? प्रूव कीजिये ..
 गिलबिले :- उनके कान देखते हैं.. हम आपकी आंखे देखतीं हैं. 
हम:-"भैये तो फ़िर आंख ?"
गिलबिले:- आंख तो तिरछी करने के लिये होतीं हैं..सर्वशक्तिवान  बॉस  
की वक्र-दृष्टि से स्वयम  बॉस  ही बचाते हैं.दूजा कोई नहीं. गिलबिले जी के ब्रह्म ज्ञान के हम दीवाने हो गए बताया तो उनने  बॉसों के बारे में बहुत कुछ पर हज़ूर यक़ीन मानिये खुलासा हम न कर पाएंगे बस इत्ती बात को सार्वजनिक करने की अनुमति हमको मिली थी सो कर दी. और आगे-पीछे की बात उनके रिटायर होने के बाद पेंशन केस निपटने के बाद खोल दूंगा वरना अब कोई दूसरे परसाई जी तो हैं नहीं जो  "भोला राम का जीव" की तर्ज़ पर गिलबिले जी का जीव लिखेंगे..   



50.

अच्छा होने की कठिनाईयाँ

पहले यह स्पष्ट कर दूँ कि इस विषय में लिखने की योग्यता और अधिकार, दोनों ही मेरे पास नहीं है, योग्यता इसलिये क्योंकि इस विषय पर अब भी मैं भ्रम लिये जीता हूँ, अधिकार इसलिये क्योंकि मैं इतना अच्छा भी नहीं हूँ कि अच्छाई पर साधिकार लिख सकूँ। मेरे पास भी मेरे हिस्से की बुराईयाँ हैं, सहेजे हूँ, चुप रहता हूँ, उनसे लड़ता नहीं हूँ, संभवतः उतनी शक्ति नहीं है या संभवतः उतनी ऊर्जा नहीं है जो उन पर व्यर्थ की जा सके। कुछ तो इस उपेक्षा से दुखी होकर चली गयी हैं, कुछ धीरे धीरे चली जायेंगी। जो रहेंगी, वो रहें, पर उन्हें अपने पूरे जीवन पर अधिकार नहीं करने दूँगा।

प्रश्न पर स्वाभाविक है, क्या अच्छा होने से कठिनाईयाँ कम हो जाती है, क्या है जो आपको अच्छा होने पर मिल जाता है, क्या अच्छा होना सच में इतना आवश्यक है? जब हम प्रश्नों का उत्तर स्वयं से नहीं पाते हैं तो उसका उत्तर बाहर ढूढ़ते हैं, वर्तमान में, भूतकाल में, घटनाओं में, ग्रन्थों में। भले ही ऐसे प्रश्न जीवन भर अनुत्तरित रहें पर अतार्किक और भ्रामक उत्तरों से संतुष्ट न हो बैठें।

अच्छा होने की कठिनाईयाँ
इन प्रश्नों को समझने और उसका उत्तर ढूढ़ने में गुरचरनदास ने महाभारत का आधार लिया है। बड़े ही चिन्तनशील लेखक हैं, उन्होंने महाभारत का न केवल विधिवत अध्ययन किया है वरन उसके पहले के ३० वर्षों में अपने कार्यक्षेत्र में उस महाभारत को जिया है। व्यावसायिक युद्ध में निरत किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के शीर्ष तक पहुँचने के क्रम में ये प्रश्न नित ही आते होंगे। उन्होंने महाभारत क्यों चुनी, इसका स्पष्ट उत्तर उन्होंने अपनी पुस्तक 'द डिफ्कल्टी ऑफ बीईंग गुड' में नहीं दिया है, पर महाभारत में ऐसे उदाहरणों की बहुतायत है जिससे यह द्वन्द्व गहनता से समझा जा सकता है। पोस्ट का शीर्षक उनकी पुस्तक के नाम का हिन्दी अनुवाद भर है।




51.

नैहर जाने के पहले ...

पत्नी के नैहर जाने के पहले पति पत्नी संवाद (अगर कह सकें तो) : 

1. पेपर वाला एडवांस ले गया है। फिर से माँगने आये तो भगा दीजियेगा। हो सके तो छुट्टी ही कर दीजियेगा। 
- हूँ। (मन में - पढ़ता ही कहाँ हूँ, फालतू का खर्च। तुम्हें यही दिखता है न?) 
2. कामवाली एक टाइम आ कर कर जायेगी सब काम। आप रोटी तो नहीं बनायेंगे न
- (मुझे अकेले में कामवालियों के साथ  उलझन होती है) अरे मैं खुद कर लूँगा। उसे भी छुट्टी दे दो। 
- नहीं, आ कर कर जायेगी एक ही टाइम 
 
- (मन में) अब कौन समझाये इन्हें
3. रात में पौधों में पानी दे दिया है। शाम शाम को पानी देते रहियेगा। 
- हूँ (मन में - बारिश होगी ही, पानी देने की क्या आवश्यकता? इतना भी नहीं समझती)।


52.

वो मेरी भूख को भी अब कुपोषण ही बताता है

ख्यात जनकवि बल्ली सिंह चीमा की एक नई गज़ल पेश है. इत्तेफाक है कि बल्ली भाई अभी हल्द्वानी में मेरे घर पर विराजमान हैं और  ये गज़ल उन्होंने बाकायदा डिक्टेट कर के लिखाई है. 

पराई कोठियों में रोज संगमरमर लगाता है
किसी फुटपाथ पर सोता है लेकिन घर बनाता है

लुटेरी इस व्यवस्था का मुझे पुरजा बताता है
वो संसाधन गिनाता है तो मुझको भी गिनाता है

बदलना चाहता है इस तरह शब्दों व अर्थों को
वो मेरी भूख को भी अब कुपोषण ही बताता है

53.

तितलियां...!

एक लड़की जिसका , नाम झू येंगताई था , घर में सब उसे प्यार से ज्यू मेई भी कहते ! उसकी हार्दिक इच्छा थी कि वो हांगजोऊ में जाकर अध्ययन करे ! उसके पिता चाहकर भी उसकी इच्छा के सामने प्रतिरोध नहीं कर सके , किन्तु उन्होंने शर्त रखी कि झू येंगताई वहां पुरुष वेश में जायेगी और पुरुषों की तरह से रहेगी तथा उसके साथ एक युवा सेविका भी भेजी जायेगी ! रास्ते में उन्हें एक युवा शिक्षार्थी लियांग शानबो मिला जो स्वयं भी हांगजोऊ में अध्ययन करने जा रहा था , वो क्वाईजी से आया था ! उन्होंने एक दूसरे के साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक बातचीत की और तय किया कि अब वे भाइयों की तरह से रहेंगे ! इसके बाद उन्होंने तीन वर्षों तक वानसांग के स्कूल में अध्ययन किया ! सहपाठी बने रहने के वर्षों में लियांग शानबो को पता नहीं था कि उसका कथित सहपाठी युवा भाई , वास्तव में एक लड़की है ! 

एक दिन झू येंगताई के पिता ने उसे यथाशीघ्र घर वापस लौटने का सन्देश दिया ! झू येंगताई अब तक लियांग शानबो से गहन प्रेम करने लगी थी किन्तु उसमें सीधे सीधे अपना प्रेम प्रदर्शित करने का साहस नहीं था ! अतः उसने अपनी गुरु पत्नी को अपने प्रेम के संकेत बतौर एक पत्र सौंपा और याचना की , कि वे उसे लियांग शानबो को दे दें ! घर वापसी के रास्ते में उसने लियांग शानबो के लिए कई पहचान चिन्ह गिराये ! लियांग शानबो उसे विदाई देने आया ! अब तक उसे प्रेम के बारे में कुछ भी पता नहीं था किन्तु उसे झू येंगताई से अपने प्रेम का अहसास तब हुआ जब वे , फोनिक्स पहाड़ी पर पहुंचे और झू येंगताई ने उससे कहा कि मेरी युवा बहन ज्यू मेई विवाह के योग्य हो गई है ! उसके लिए एक योग्य सहचर की आवश्यकता होगी , उसे पूरी उम्मीद है कि लियांग शानबो शीघ्रता से अपना विवाह प्रस्ताव लेकर उसके घर पहुंचेगा !


54.

जवानी ओ दीवानी तू ज़िंदाबाद.बुढापा तो आज सच में डरा रहा है,एक सुपर स्टार का बुढापा देख कर लग रहा है कि टाईम आ ही रहा है अपना भी.

बडा डर सा लगने लगा है,कुछ कुछ श्मशान वैराग्य सा भी,राजेश खन्ना की हालत देख कर.अपने ज़माने में ज़माने को दीवाना बना देने वाले की लाचारगी देख कर उन पर फिल्माया गया गाना बहुत याद आ रहा है जवानी ओ दीवानी तो ज़िंदाबाद.आगे बुढापा सयाना,पता नही कब उनपर बेताल की तरह सवार हो गया.बुढापे का बोझ उन्हे इस कदर तोड देगा इस बात की कल्पना मात्र सिहरन भर गई है.सुपरस्टार क्या होता है कैसा होता है ये राजेश खन्ना ने ही बताया था.मुझे बहुत ज्यादा तो पसंद नही रहे लेकिन उनकी फिल्मे देखता जरूर रहा हूं.उस दौर में सिनेमा हाल में पहली बार 6 शो में फिल्मे लगने लगी थी और रायपुर जैसे छोटे शहर में एक साथ दो दो थियेटर में.शहज़ादा,दुश्मन,सच्चा झूटा,अजनबी,दाग,रोटी,सफर,आनंद,अमर प्रेम,आराधना लिस्ट बडी लम्बी है सुपर हिट फिल्मो के नामों की.हर फिल्म को देख्नने के पहले पहला शो देखने के लिये दुनिया भर के बहाने और प्लानिंग के साथ जाते थे सिनेमा हाल.सुबह 6 बज़े वाले शो की टिकट के लिये रात भर लाईन में खडे रहने का जुनून राजेश ख्नन्ना के दीवानो के सिर पर चढ कर बोलता था.

55.

झारखंड का विकास

झारखंड में विकास जोरों पर है. इसका पता झारखंड जाने वाली ट्रेन में ही लग जाता है. अधिकतर जवान..लेकिन तोंद निकली हुई. छोटे बच्चों से बोगी भरी हुई है. कोई ठेकेदारी करता है तो कोई ट्रकों का धंधा. कोई कोयले की दलाली में है तो कोई सूदखोरी में. सच में विकास जोरों पर है.
मोबाइल फोन पर लगातार बजते हुए गाने साबित करते हैं कि रांची के बच्चे भी छम्मक छल्लो और रा वन से आगे निकल कर रिहाना और लेडी गागा तक पहुंच सकते हैं. लेकिन हिंदी की चार पंक्तियां भी सही सही बोल लें वही बहुत है.
सत्यमेव जयते का फैन क्लब यहां भी है. लोग रिकार्ड कर के लैपटॉप पर आमिर से ज्ञान ले रहे हैं. दहेज पर. दहेज में लैपटॉप भी मिलता है ऐसा बिहार झारखंड के लोग कहते हैं. दहेज के लैपटॉप पर आमिर का ज्ञान कितना अच्छा लगता है. बोलने में अच्छा लगता है दहेज नहीं लेना चाहिए लेकिन लेने में बुरा किसी को नहीं लगता. दहेज नहीं वो तो विवाह खर्च होता है. बड़े घर में शादियां ऐसे ही होती है. सच में विकास जोरों पर है.


56.

कितना फितरती है इन्सान

अपने स्वार्थपूर्ति अथवा तथाकथित आत्मसम्मान की संतुष्टि के लिए , हम एक दुसरे का शोषण करते हैं ,रौब ज़माते हैं और अपनी शर्तें मनवाते हैं .इस प्रकार का व्यव्हार कर हम कौन सी सभ्यता और आधुनिकता का परिचय दे रहे हैं ?’जियो और जीने दो ’की धारणा को भूल गए हैं .इन्सान अपने भौतिक विकास को देख कर अभिभूत है .,परन्तु इसी भौतिक विकास ने समाज को नैतिक पतन की खाई में धकेल दिया है .यह कटु सत्य है बिना सामाजिक उत्थान के , बिना नैतिक मूल्यों के ,बिना इंसानियत का परचम लहराए सारी भौतिक उपलब्धियां औचित्यहीन हो जाती हैं . मानव विकास का मुख्य एवं मूल उद्देश्य मानव जीवन को सुविधा जनक एवं शांति दायक बनाना होता है .सामाजिक अशांति ,अत्याचार ,व्यभिचार ,के रहते मानव जाति सुखी नहीं हो सकती .बिना मानसिक शांति के सारी सुख सुविधाएँ अर्थहीन हो जाती हैं .



57. कल
कल…कहा था तुमसे बार बार
जिद न करो,
तूफान का अंदेशा है
नाव किनारे रहने दो,
हवा का रुख ठीक नही
कल तक इंतजार करो.
तुम हठी हुए…
“नही नही कल का क्या,
मुझे तो आज पर भरोसा है
समय की कीमत जानो
जो गया , तो गया ….”
कश्ती छुटी किनारे से
थोडा ही सरक पाई,


58.
गंगा कब बनेगी लंदन की टेम्स !
टेम्स नदी को लंदन की गंगा भी कहा जाता है। करीब 80 लाख की आबादी वाला लंदन शहर टेम्स के किनारे बसा है। टेम्स नदी चैल्थनम में सेवेन स्प्रिंग्स से निकलती है और ऑक्सफार्ड, रैडिंग, मेडनहैड, विंड्सर, ईटन और लंदन जैसे शहरों से होती हुई 346 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर इंग्लिश चैनल में जाकर गिरती है। टेम्स कभी दुनिया का सबसे व्यस्त जलमार्ग हुआ करता था। लंदन की आबादी बढ़ने के साथ ही टेम्स नदी में भी प्रदूषण बढ़ता गया। टेम्स नदी की सफाई के लिए हालांकि समय समय पर लंदन में कई अभियान शुरू किए गए…लेकिन 2000 में शुरू हुई टेम्स रिवर क्लीन अप अभियान टेम्स के लिए वरदान साबित हुआ। इस अभियान के तहत साल में तय एक दिन चैल्थनम, ऑक्सफार्ड, रैडिंग, मेडनहैड, विंड्सर, ईटन और लंदन जहां जहां से टेम्स नदी गुजरती है…हर जगह लोग एकत्र होकर नदी की सफाई करते हैं। पिछले 13 सालों से टेम्स रिवर क्लीन अप अभियान निरंतर जारी है…2012 में इस अभियान के तहत 21 अप्रेल को टेम्स नदी की सफाई की थी।

59.मोह का बंदीग्रह ……..?
———–
मेरे ……
शरीर -में…….
अपवाद -स्वरूप …….
वो -सासें ……
जो -मर चुकीं हैं ……..
क्यों …….?
जीतीं -हैं ……!


60.s.
जब से मिले हो ऐसा लगा की दुनिया मिल गयी।
तूने देखा तो ऐसा लगा की सारी कली खिल गयी।
तेरा होना चाहता हूँ , तुझमे खोना चाहता हूँ।
मेरी सुबह भी होती है तेरी यादों की तस्वीर से।
हर लम्हा तेरा ख्याल जो आये सवाल पूछूँ मै तकदीर से।
तूने फेरी निगाहें तो ऐसा लगा की सासें सिल गयी।
जब से मिले…
तुझमें सोना चाहता हूँ,दिल में कोना चाहता हूँ।
हाथों में जो तेरा हाथ हो जन्नत का सहारा मिल जाये।
जिन्दगी से अनबन कर लूँ जो तेरा इशारा मिल जाये।
तुम मुस्कुराये तो ऐसा लगा की चरागों को रौशनी मिल गयी।
जब से मिले…

61.

सौन्दर्य

जबसे समझ लिया सौन्दर्य का असल रूप
तबसे उतार फेंके जेवरात सारे
न रहा चाव, सजने सवरने का
न प्रशंसाओं की दरकार ही रही
नदी के आईने में देखी जो अपनी ही मुस्कान
तो उलझे बालों में ही संवर गयी
खेतो में काम करने वालियों से
मिलायी नजर

62.

फिल्‍म समीक्षा : गैंग्‍स ऑफ वासेपुर-रवीश कुमार

 (चेतावनी- स्टाररहित ये समीक्षा काफी लंबी है समय हो तभी पढ़ें, समीक्षा पढ़ने के बाद फिल्म देखने का फैसला आपका होगा )

डिस्क्लेमर लगा देने से कि फिल्म और किरदार काल्पनिक है,कोई फिल्म काल्पनिक नहीं हो जाती है। गैंग्स आफ वासेपुर एक वास्तविक फिल्म है। जावेद अख़्तरीय लेखन का ज़माना गया कि कहानी ज़हन से का़ग़ज़ पर आ गई। उस प्रक्रिया ने भी दर्शकों को यादगार फिल्में दी हैं। लेकिन तारे ज़मीन पर, ब्लैक, पिपली लाइव,पान सिंह तोमर, विकी डोनर, खोसला का घोसला, चक दे इंडिया और गैंग्स आफ वासेपुर( कई नाम छूट भी सकते हैं) जैसी फिल्में ज़हन में पैदा नहीं होती हैं। वो बारीक रिसर्च से जुटाए गए तमाम पहलुओं से बनती हैं। जो लोग बिहार की राजनीति के कांग्रेसी दौर में पनपे माफिया राज और कोइलरी के किस्से को ज़रा सा भी जानते हैं वो समझ जायेंगे कि गैंग्स आफ वासेपुर पूरी तरह एक राजनीतिक फिल्म है और लाइसेंसी राज से लेकर उदारीकरण के मछलीपालन तक आते आते कार्पोरेट,पोलिटिक्स और गैंग के आदिम रिश्तों की असली कहानी है।

63.

सीमेंट के कार्टेल कारोबारियों पर 6,300 करोड़ का जुर्माना


भारत में नव्य आर्थिक उदार नीतियों के गंभीर दुष्परिणाम आने लगे हैं। बाजार की चालक शक्तियों के कामकाज में सरकार की हस्तक्षेप न करने की नीति का यह परिणाम निकला है कि अब एक ही क्षेत्र में व्यापार करने वाली बड़ी कंपनियां आपस मिलकर समूह या कार्टेल बनाकर कारोबार कर रही हैं। इस तरह का कारोबार एकाधिकार विरोधी भारतीय कानूनों की नजर में अवैध है। लेकिन बड़े पूंजीपतियों का कार्टेल बनाकर कारोबार करना जारी है। इसके जरिए वे अवैध ढ़ंग से आम उपभोक्ता से मनमाने दाम वसूल रहे हैं। कायदे से कार्टेल बनाकर काम करने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना ठोंकने के साथ दंड़ स्वरूप उनके कारोबार को बंद कर दिए जाने का कानूनी प्रावधान होना चाहिए।


64.

शिखर पर अकेलापन.....युवाओं में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति


अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका लांसेट का सर्वे कहता है कि भारत में युवाओं की मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है आत्महत्या।  हालांकि हमारे समाज और परिवारों का विघटन जिस गति से हो रहा है किसी शोध के ऐसे नतीजे चौंकाने वाले नहीं हैं। जीवन का अंत करने वाले इन युवाओं की उम्र है 15 से 29 वर्ष है। यानि कि  वो  आयुवर्ग जो  देश का भविष्य है। एक ऐसी उम्र जो अपने लिए ही नहीं समाज, परिवार और देश के लिए कुछ स्वपन संजोने और उन्हें पूरा करने की ऊर्जा और उत्साह का दौर होती है। पर जो कुछ हो रहा है वो हमारी आशाओं और सोच के बिल्कुल विपरीत है। 
शिखर पर अकेलापन 
आमतौर पर माना जाता है कि गरीबी अशिक्षा और असफलता से जूझने वाले युवा ऐसे कदम उठाते हैं। ऐसे में इस सर्वे के परिणाम थोड़ा हैरान करने वाले हैं। इस शोध के मुताबिक उत्तर भारत के बजाय दक्षिण भारत में आत्महत्या करने वाले युवाओं की संख्या अधिक है। इतना ही नहीं देशभर में आत्महत्या से होने वाली कुल मौतों में से चालीस प्रतिशत अकेले चार बड़े दक्षिणी राज्यों  में होती हैं । यह बात किसी से छिपी ही नहीं है कि शिक्षा का प्रतिशत दक्षिण भारत में उत्तर भारत से कहीं ज्यादा है। काफी समय पहले से ही वहां रोजगार के बेहतर विकल्प भी मौजूद रहे हैं। ऐसे में देश के इन हिस्सों में भी आए दिन ऐसे समाचार अखबारों में सुर्खियां बनते हैं । इनमें एक बड़ा प्रतिशत जीवन से हमेशा के लिए पराजित होने वाले ऐसे युवाओं का है जो सफल भी हैं, शिक्षित भी और धन दौलत तो इस पीढ़ी ने उम्र से पहले ही बटोर लिया है। 


65. दौड रायसीना हिल्स की
आज कल पूरे देश में एक ही चर्चा है कि रायसीना हिल्स की फार्मूला-1फर्राटा रेस कौन जीतेगा?इस रेस को जीतने के लिए कांग्रेस ने अपने फार्मूला-1 फर्राटा रेसस्पेशलिस्ट वित्तमंत्री प्रणव दा उर्फ पोल्टू दादा को ट्रैक पर उतारने की घोषणा करने के साथ-साथ उपराष्ट्रपति जनाब हामिद अंसारी को रिसर्व में रख लिया है। कांग्रेस इस मुक़ाबले में रा॰ज॰ग॰के मुख्य घटक भा॰ज॰पा॰ को अपना मुख्य प्रतिद्वंदी मानकर चल रही थी, लेकिन सं॰प्र॰ग॰ की अध्यक्ष सोनिया आंटी द्वारा रेस के संदर्भ में हुई गुफ्तगू में बाहर से समर्थन दे रहे स॰पा॰ और तृणमूल कांग्रेस को तवज्जो न दिए जाने से खफा हुए मामू मुलायम और ममता दीदी ने इस फर्राटा रेस में पूर्व राष्ट्रपति ए॰पी॰जे॰ अब्दुल कलाम साहब को उतारने का ऐलान कर दिया।




66.राजनीति के कालिदास "शिवानंद तिवारी "


'शिवानंद तिवारी' ने बिहार की राजनीति में अपनी पहचान 'कालिदास' के रूप में बनाई है. अब 'कालिदास' से आप ये मत समझइएगा कि ये संस्कृत या फिर किसी अन्य भाषा के 'विद्वान' के रूप में इन्होंनें अपनी पहचान बनाई है.........बल्कि इन्हें 'कालिदास' इसलिए माना जाता है कि ये ...... जिस डाल पर बैठते हैं, उसी डाल को सफाई के साथ काटते भी रहते हैं. अपने डाल काटने के लंबे अनुभव और अपनी खास तकनीक के वजह से......ये कटने वाले डाल के गिरने से पहले ही.......उछलकर दूसरे डाल पर चले जाते हैं. 'जनता दल यूनाइटेड' में आने से पहले ये लालू जी के 'राष्टीय जनता दल' में थे. राष्टीय जनता दल की लुटिया डुबोने में इनका भी बड़ा सराहनीय योगदान रहा.......ये आहिस्ता-आहिस्ता अपनी पैनी कुल्हाड़ी से 'राष्टीय जनता दल' की शाख को काटते रहे और जब इन्हें 'राष्टीय जनता दल' के गिरने का अंदाज़ा हो गया।



67.“महल पर कागा बोला है री”

बचपन में माँ की डायरी में पढ़ी लोकगीत की एक कड़ी,आज अनायास ही याद आ गई है.
“महल पर कागा बोला है री”
ससुराल में अपने मायके को श्रेष्ठ बताती स्त्रियाँ तरह तरह की उपमा देती हैं.तब माँ
एक डायरी में तरह तरह के लोकगीत,मैथिली के,अंगिका के, लिखा करती थीं.एक बार अचानक ही
माँ की डायरी हाथ लग गई थी.सुन्दर मोतियों से अक्षर और किसिम-किसिम के मिथिला के अंचलों
में गाये जाने वाले लोकगीत.आश्चर्य होता कि माँ कहाँ से इतने सारे गीत सुन लेती हैं
और कब डायरी में लिख भी लेती हैं.तब उन गीतों की महत्ता और दिन ब दिन क्षरण होते सामाजिक
परम्पराओं,लोकगीतों के ह्रास का अंदाजा न था.

पशु,पक्षियों का मानव जीवन से अटूट सम्बन्ध रहा है.लोकगीतों,ग्राम्यगीतों में पशु-पक्षियों
के प्रति प्रेम का अद्भुत संसार दिखता है.वे कब मनुष्य के जीवन का अंग बन जाते हैं,पता
ही नहीं चलता.खाना बनाते वक्त पशु,पक्षियों के लिए पहला कौर निकाल कर रख देना,सामूहिक
आयोजनों में, पंगत में बैठकर खाते समय,कुछ दाने पशु,पक्षियों के लिए अलग रख देने में
ऎसी ही भावना रही होगी.



68.

ज़रा सोचो


 राम क़ृष्ण खुराना

आज गरीब और गरीब क्यों हो रहा है ज़रा सोचो,
मां की छाती से लिपटा बच्चा क्यों रो रहा ज़रा सोचो !
गरीबी और भूख में अपनों की आंखें भी बदल जाती हैं,
स्कूल जाने की उम्र में बचपन टोकरी ढो रहा ज़रा सोचो !


हर किसी में दूसरों को कुछ देने का जज्बा नहीं होता !
बिना गली, बिना मोहल्ले के कोई कस्बा नहीं होता !
किसी का दर्द बांटने में कितना सकून मिलता है,
ठिठुरता नंगा बदन ढकने से कम रुतबा नहीं होता !


एक जलता हुआ दिया कई और दिए जला सकता है !
एक पढा-लिखा इंसान कई लोगों को पढा सकता है !
मिट्टी में मिलकर एक बीज बनाता हैं लाखों बीज,
शीतल दरिया जल का, सबकी प्यास बुझा सकता है !



69.

ये चीत्कार !


ये चीत्कार !
ये हाहाकार !
ये संहार !!!    क्यों ?


ये संत्रास ! 
ये परिहास !
सब बदहवास ! क्यों?








ये वारदात !
ये मारकाट !
सब बरबाद ! क्यों?




प्रशासन हाय !
नाकामी दर्शाय !
नाकाबिल ये !   क्यों??



70.मैं तलाशता ...
Searching For Your Love
मै तलाशता खुद को …
कभी सागर की गहराई में….
कभी पहाड़ो की ऊंचाई में…
कभी बादलों की काली घटाओ में…
कभी सावन में महकती लताओं में …
मै तलाशता खुद को…
कभी ऑरकुट के अंधियारे में..
कभी फेसबुक के उजाले में…
कभी गूगल में खोजता खुद को …
कभी याहू में खुद को तलाशता ….
कभी मंदिरों में भगवान् से पूछता…
कभी मस्जिद में खुद को खोजने की फ़रियाद करता…
हजारों मन्नतें मांगी गुरूद्वारे में…
और यीशु से भी खुद का पता पूछा…
मै तलाशता खुद को…



71.जल संरक्षण के सुन्दर उपाय
जल संरक्षण के सुन्दर उपाय
देवी जी आपने दिए बताये
पत्नी प्रसन्न हो मुझ से बोली
देवर जी कैसे खेलेंगे होली
पत्नी की बात सुन बोला संता
फ़िक्र होली की पानी की न चिंता
होली तो हर बरस आयेगी
पानी की कमी क्या न सताएगी
पानी बचाओ न धोवो वाहन
पानी न होगा बनेगा कैसे राशन
खुली देखो टोंटी बूँद मत बहाओ
कच्चे पक्के कूप खुदवाओ



72.

मानव न बन सका मनुज


यह कविता मेरे पापा प्रोफसर महेंद्र जोशी ने लिखी है |
मै ही तो एक नही हूं ऐसा,
मुझ से पहले भी लोग बड़े थे :
जिन को तो था संसार बदलना ,
अंधेरों में जो लोग खड़े थे :
उन लोगों में मेरी क्या गिनती ,
मुझ से तो वे सब बहुत बड़े थे :
खा कर भी हत्यारे की गोली ,
गांधी जी कितने मौन पड़े थे :
और अहिंसा हिंसा ने खाई ,
था नफरत ने ही प्यार मिटाया :
प्यार दिया इस जग को जिसने ही ,
क्रास पर गया था वह लटकाया



73.

तालिबान से ही सीखो हे मनमोहन…


अर्थ व्यवस्था के क्षेत्र में देश तीन कारणों से विशेष रूप से चर्चा में है। एक तो रुपया का भारी अवमूल्यन दूसरे विकास दर घटकर ६ प्रतिशत रह जाने की आशंका और तीसरे फिज द्वारा प्रमुख बैंकों को नकारात्मक रेटिंग में डालना। विलाप किया जा रहा है कि डॉ. मनमोहन सिंह जैसे महान अर्थशास्त्री के होते हुए आखिर अर्थ नीति के परिणाम इतने निराशाजनक क्यों सामने आ रहे हैं। मनमोहन सिंह को कड़े फैसले लेने की हिदायत दी जा रही है। मनमोहन सिंह खुद भी कह रहे हैं कि वे अब कठोर फैसला लेने में चूक नहीं करेंगे। उनका यह कठोर फैसला किनके खिलाफ होगा, वे जो टैक्स दे सकते हैं लेकिन छूट के दायरे में रखे जा रहे हैं या वह आम जनता जो एक-एक रोटी काटकर रसोई गैस की मूल्यवृद्धि के चलते बढ़ने वाले घरेलू बजट के खर्चे की भरपाई करती है। मनमोहन सिंह ने तो अभी तक यही साबित किया है कि देश की जरूरतें पूरी करने के नाम पर उन्हें गरीब जनता का खून चूसना आता है जबकि खरबपति से शंखपति की ओर कदम बढ़ा रहे धनाढ्यों से वे अपनी सरकार के लिए उनकी कृपाकोर चाहते हैं।



74.

" हमसे है जमाना - जमाने से हम नहीं " ......>>>> संजय कुमार

 ऐसा नहीं है कि मेरे होने से ये देश चल रहा हो , ऐसा भी नहीं है कि मेरे ना होने से ये देश नहीं चलेगा ! हमारी गिनती तो उन लोगों में होती है जो गरीबी , मंहगाई , भ्रष्टाचार , घोटाले आदि को लेकर चिल्ल पों मचाते रहते हैं , हम तो उन लोगों में से हैं जिन्होंने सरकार की नाक में दम कर रखा है ! भले ही सरकार की नजर में हम कीड़े-मकौड़े हों फिर भी .................... मुझे एक फेमस फ़िल्मी डायलॉग  याद आता है ! " हमसे है ज़माना , जमाने से हम नहीं " .......... क्योंकि हम हैं भारत के " अनमोल रत्न ", हम नहीं होंगे तो कुछ भी नहीं होगा ! हम हैं मजबूर , लाचार , हर जगह से ठुकराए  हुए इस देश के  " गरीब "  मैं यहाँ बात कर रहा हूँ हमारे देश के सबसे बड़े गहने का यानि देश के वीर, गरीबों की , ये वो  गरीब हैं जो इस देश की शान हैं और  जिनके बिना इस देश में  कुछ भी संभव नहीं है ! अगर हम  हमारे देश का भगवान इन गरीबों को कहें तो गलत नहीं होगा !



75.

वाह रे सानंदः खूब कट रहा केक

वाह रे स्वामी सानंद।उत्तराखंड को आपने श़ॉप्ट केक बना िदया।जब मर्जी आई और रुख कर दिया उत्तराखंड की ओर।कभी गंगा की पवित्रता के नाम पर, तो कभी अविरलता के नाम पर बैठ गए धरने पर। पूरी जिंदगी भर गंगा की याद नहीं आई।रिटायर्डमेंट के बाद अचानक गंगा के प्रति आपका प्रेम जागा।यह प्रेम कितना सच्चा है, यह आप जाने, लेकिन यह तो सच ही है कि आपने खुद को व्यस्त रखने का एक अच्छा मनोरंजन का साधन तलाश लिया। यदि मन में कभी गंभीरता होती तो पूरे जीवन जिस कानपुर में गंगा को मैली होते देखते आए, वहां से ही गंगा की पवित्रता के लिए आंदोलन तो करते।ऐसा नहीं कर स्वामी का चोला पहनकर हर बार आप उत्तराखंड की तरफ रुख करते हो और इससे वहां का माहौल भी खराब होने लगता है।



76.

सृष्टि का मूल


 मानव के ह्रदय-पटल पर स्फुरित होने वाली भावना ‘प्रेम’ ही इस सृष्टि का मूलाधार है,नींव है, स्थायित्व है| प्रेम ही सृजनकर्ता और पालनकर्ता होता है अर्थात् प्रेम से रिक्त जीवन, जीवन नहीं हो सकता |एक नवजात शिशु के मस्तक पर माँ का ममताभरा पहला स्पर्श, माँ के  प्रेम का पहला उपहार हुआ करता है और जब पिता उसे अपनी गोद में लेकर दुलारते हैं तो यही प्रेम वात्सल्य का रूप धर उस नयी जिंदगी को जिस दिव्यानंद के सागर में प्रेम-तरंगों का झूला झुलाता है,वही आनंद माता-पिता के ह्रदय में शिशु को एक ऐसे रिश्ते से जोड़ देता है कि अब उन्हें हर ओर अपने शिशु के ‘होने’ का आभास संसार के साथ एक नूतन प्रेममय डोर से बांध लेता है |प्रेमभरी लोरियाँ सुनते-सुनते बालक अब जब थोड़ा बड़ा होने लगता है, तो उसको सिखाये जाने वाले ‘विवेक’ के रूप में माता-पिता एवं घर के अन्य सदस्यों का प्रेम उसके प्रति हरपल उसे हर अनहोनी से बचाता रहता है |अब जैसे-जैसे बालक का संसार विस्तृत होता जाता है ,प्रेम के स्वरूप भी बदलते जाते हैं क्योंकि अब उसके अपने सपने , अपने मित्र अपनी पसंद एवं नापसंद ,अपनी रूचियाँ,अपने विचार, अपनी मनोवृत्तियाँ ,अपने तौर-तरीके, अपने भय,अपना साहस,अपना अहंकार ,अपना धैर्य,अपनी सहनशीलता ---अपना ही एक व्यक्तित्व होता है जिसमें वह कोई बदलाव नहीं करना चाहता क्योंकि वह जैसा है ,स्वयं से बहुत प्रेम करता है |



77.

भाड़ में जाए ये इज्जत !

(वुसतुल्लाह ख़ान के इस ब्लॉग में पाकिस्तान में बनने वाली एशिया की सबसे बड़ी हाउसिंग सोसायटी बहरिया टाउन का जिक्र है जिसके मालिक रियाज मलिक के टीवी पर एक 'प्लांटेड इंटरव्यू' ने पिछले दिनों पाकिस्तान में खूब सुर्खियां बटोरीं. दरअसल मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी के बेटे अरसलान इफ्तिखार पर रियाज मलिक से करोड़ों का फायदा हासिल करने के आरोप लगे हैं)
यार लानत है ऐसे पत्रकार और उसकी पत्रकारिता पर, मैं तो शर्म के मारे किसी से आंख मिलाने के काबिल नहीं रहा!
क्यों? क्या तेरा नाम भी बहरिया टाउन के लेटर हेड पर आ गया है?
नहीं आया ना ! यही तो दुख है. हर कोई तंज कर रहा है कि अबे तुम कैसे पत्रकार हो कि बत्तीस साल से छक मार रहे हो. तुम्हारे बाद इस पेशे में पैदा होने वाले मोटर साइकिल से उतर कर लेक्सस पर चढ़ गए, तीन मरले के मकान से फॉर्म हाउस में शिफ्ट कर गए, गोसिया होटल के बेंच पर चाय सुड़कते सुड़कते नादिया कॉफी शॉप में दरबार लगाने लगे, राष्ट्रपति को आसिफ और प्रधानमंत्री को गिल्लू कह कर पुकारने लगे और तुम आज भी उबेदुल्लाह अलीम के इस शेर को झंडा बना कर घूम कर हो कि:
अभी खरीद लूं दुनिया कहां की महंगी है,
मगर जमीर का सौदा बुरा सा लगता है.



78.

फ़िजी में हिन्दी : एक वर्ष का लेखाजोखा


भारत का उच्चायोग 
सूवा 

वार्षिक प्रगति रिपोर्ट -2011 - 2012 



फीजी में हिंदी दिवस समारोह – 2011 

संसार भर में बसे भारतवंशियों के देशों में संभवत: फीजी ही एकमात्र राष्ट्र है जहाँ हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति आज भी खूब फल – फूल रही है। इसका प्रमाण है वर्ष 2011, के सितम्बर माह में समूचे राष्ट्र में हर्ष और उल्लास के साथ आयोजित किया गया हिंदी दिवस समारोह । इस संबंध में प्रस्तुत है एक रिपोर्ट :-- 


1. भारतीय उच्चायोग और साउथ पैसिफिक यूनिवर्सिटी :-
 भारतीय उच्चायोग द्वारा साउथ पैसिफिक यूनिवर्सिटी के सहयोग से ता. 14/09/11 को दो श्रेणियों में , (प्राइमरी एवं सैकिंडरी ) , भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया । प्राइमरी एवं सैकिंडरी दोनों श्रेणियों के विद्यार्थियों ने हिंदी भाषी और अहिंदी भाषी उप-श्रेणियों में “ “मीडिया एवं बच्चे" , “अध्ययन का आनंद", “रामायण न होती तो हमारी संस्कृति कहाँ होती", “नैतिक शिक्षा का महत्व", “संसार एक परिवार है”, “भाषा द्वारा ही संस्कृति का ज्ञान संवभ है”, “रिश्तों की संजीवनी में बुजुर्गो की भूमिका”, “चिंता नहीं चिंतन कीजिए”, “बदलते परिवेश में नारी की भूमिका”, “प्राकृतिक सोंदर्य और मनुष्य में बढता हुआ फासला”, आदि बहुआयामी विषयों पर भाषण प्रस्तुत किए । इस अवसर पर भारत के उच्चायुक्त श्री विनोद कुमार जी ने मुख्य मेहमान के रुप में बच्चों के ओजपूर्ण और गरिमामय भाषणों का भरपूर आनंद लिया यहाँ यह उल्लेखनीय है कि फीजी मूल के अहिंदी भाषी बच्चों दारा प्रस्तुत भाषण आकर्षण का केंद्र रहा । इस अवसर पर साउथ पैसिफिक यूनिर्विसिटी की हिंदी विभागाध्यक्ष श्रीमती इंदु चंद्रा एवं उनके साथी शेलेश ने आयोजन में महम भूमिका अदा की। श्री रामवीर प्रसाद द्वितीय सचिव (हिंदी) ने दो अन्य योग्य व्यक्तियों के साथ मुख्य निर्णायक की भूमिका निभाई । दोनों श्रेणियों में प्रथम , दितीय , तृतीय पुरुस्कार के रुप में नकद राशि के साथ – साथ विदेश मंत्रालय , हिंदी अनुभाग से प्राप्त उपयोगी हिंदी की पुस्तकें महामहिम श्री विनोद कुमार द्वारा विजेता प्रतिभागियों को भेंट की गई । इस अवसर पर अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने समारोह में हिस्सा लिया तथा लगभग 200 बच्चों की तालियों से सभागार गुंजायमान होता रहा । इस अवसर पर बोलते हुए उच्चायुक्त श्री विनोद कुमार जी ने हिंदी भाषा के महत्व और इसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए मिशन की प्रतिबध्द्ता दोहराई और बच्चों के साहसी प्रयास के लिए उन्हें बधाई दी । उन्होने संतोष व्यक्त किया कि फीजी में मात्र भाषा के प्रति सजगता और अनुराग अभी भी मौजूद है । भविष्य में भी ऐसे प्रयासों के लिए मिशन के सहयोग का आश्वासन दिया | रामवीर प्रसाद, दितीय सचिव हिंदी ने विजेता प्रतिभागियों के ओज, भाषण कला, भाषा विन्यास और भाषा की शैलीगत विशेषताओं का तुलनात्मक विवेचन प्रस्तुत किया । श्रीमती इंदु चंद्र ने धन्यवाद ज्ञापन कर समारोह समाप्ति की घोषण की।



79.

मैं किस बिध तुमको पाऊँ प्रभु..?

मैं किस बिध तुमको  पाऊँ प्रभु..?

अब अखियन  नीर बहाऊँ प्रभु ...
पग धरो श्याम मत बेर करो ...
मन मंदरवा   सुधि-छाप धरो..
अब  अंसुअन पांव पखारूँ प्रभु ...

मैं किस बिध तुमको  पाऊँ प्रभु..?

मन का इकतारा बाज रहा ..
सुर बिरहा  आकुल साज रहा ...

तुम कौन गली ....ऋतु बीत चली ....!



80.

औपचारिकता से लगे हैं सुधारवादी प्रयास


इस समय देश में जो हालात बने दिखाई दे रहे हैं उन्हें देखकर तो ऐसा आभास होता है जैसे कि सबकुछ स्वतः स्फूर्त रूप से सम्पन्न हो रहा है। स्थिति कैसे विकट से विकटतम रूप धारण करती जा रही है, अर्थव्यवस्था कैसे चरमरारने की कगार पर है, राजनीति कैसे अपने पराभव की सीमा पर पहुंचने को है, आपसी सम्बन्ध लगातार पतन की कहानी कहने में लगे हैं, कुतर्कों के सहारे से अपनी बात को सही साबित करने का प्रयास किया जा रहा है…..। और भी बहुत है, जो आप सभी को बहुत आसानी से दिख रहा होगा। ऐसा लगता है जैसे कि हम सभी इन सबके पर्याप्त आदी हो चुके हैं, अब तो लगता है कि यदि ऐसी अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, अत्याचार, अनाचार हमें न दिखाई दे तो हमारा भोजन ही न पचे।
.



81.

क्षमा शोभती उसी भुजंग को जिसमें बहुत गरल हो...

जोशीजी, ध्‍यान रखना
क्षमा शोभती उसी भुजंग को जिसमें बहुत गरल हो, उसका क्‍या, जो दंतहीन, विषहीन विनीत सरल हो...
एक साथी स्‍वतंत्र पत्रकार ने मुझे उस समय यह बात कही जब मुझे अपने संस्‍थान में डेस्‍क से उठाकर पूरी तरह रिपोर्टर बना दिया गया था और कुछ बड़े विभाग मुझे रिपोर्टिंग के लिए सौंपे गए थे। इनमें राजस्‍थान का शिक्षा मुख्‍यालय यानी शिक्षा निदेशालय भी शामिल था। मुझे इस तथ्‍य को समझने में अधिक वक्‍त भी नहीं लगा। मेरे जिस साथी का बाहर तबादला हुआ था, वे शिक्षा विभाग की सालों तक रिपोर्टिंग करते रहे थे, शायद दस साल से वे इस विभाग से जुड़े थे। ऐसे में निदेशालय ने नए रिपोर्टर को एक जल्‍दी से स्‍वीकार नहीं किया। मेरा संस्‍थान बड़ा था और रसूखदार भी, लेकिन न मैं उस समय इतना प्रभाव रखता था, न मेरा भय। कई दिन तक निदेशालय में एक अनुभाग से दूसरे अनुभाग तक चक्‍कर लगाता रहा। मंत्रालयिक कर्मचारियों के नेता हो या शिक्षक नेता, मुझसे मीठी मीठी बातें तो करते, लेकिन खबर नहीं देते। मैं परेशान, पूरा दिन निदेशालय के चक्‍कर काटकर शाम को प्रेस लौटता को संपादक की झिड़कियां सुनने को और मिलती। फिर मुझे मिले एक प्रशासनिक अधिकारी, मुझे परेशान देखकर ही उन्‍होंने माजरा समझ लिया। पूछा कितनी खबरें निकाली है अब तक, मैं खिसियाया, बोला अब तक तो प्रतिस्‍पर्द्धी से पिट ही रहा हूं। उन्‍होंने कुछ ऐसी ही बात दोहराई कि पीटोगे नहीं तो पिटोगे। मैंने कहा अपने ही लोग हैं, अच्‍छे लोग हैं पीटने से क्‍या होगा, खबर है ही नहीं उनके पास। तो अधिकारी महोदय ने कहा कि दूसरा अखबार यहां आकर खबर पैदा थोड़े ही करता है।



82.

संघ की चौसर पर नीतीश का वार ही है मोदी का हथियार


जनसंघ के दौर में आडवाणी की तुलना में अटल बिहारी वाजपेयी कहीं ज्यादा कट्टर संघी थे। और वाजपेयी की इसी पहचान ने उन्हें दीनदयाल उपाध्याय के बाद जनसंघ का अध्यक्ष बनवाया। लेकिन वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के दौर में आडवाणी की पहचान कट्टर संघी के तौर पर हो गई। और वाजपेयी सेक्युलर पहचान के साथ पहचाने जाने लगे। अब नरेन्द्र मोदी के लिये दिल्ली का रास्ता संघ खोल रहा है तो आडवाणी सेक्युलर लगने लगे हैं। नरेन्द्र मोदी सांप्रदायिक हो चुके हैं। जबकि अयोध्या मामले में आडवाणी के खिलाफ अभी भी आपराधिक साजिश का मामला दर्ज है। और गुजरात को झुलसाने के बाद जिस नरेन्द्र मोदी को देश ने ही नहीं दुनिया ने सांप्रदायिक माना, उन्हीं को डेढ महीने पहले टाइम मैगजीन ने कवर पर छाप कर 2014 का नायक करार दिया।


83.

उत्तरकाशी और नेहरू पर्वतारोहण संस्थान

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें
6 जून 2012 की शाम तक हम उत्तरकाशी पहुंच गये थे। लगातार बारह घण्टे हो गये थे हमें बाइक पर बैठे बैठे। आधा घण्टा नरेन्द्रनगर और आधा घण्टा ही चम्बा में रुके थे। थोडी देर चिन्यालीसौड भी रुके थे। इन बारह घण्टों में पिछवाडे का ऐसा बुरा हाल हुआ जैसे किसी ने मुर्गा बनाकर पिटाई कर दी हो। बाइक से उतरते ही हमारे मुंह से निकला- आज की अखण्ड तपस्या पूरी हुई।
मैंने बताया था कि मेरे साथ चौधरी साहब थे, जो दिल्ली के एक प्रसिद्ध अखबार में पत्रकार थे। अब पत्रकारों का बडा जबरदस्त नेटवर्क होता है। कहीं भी चले जाओ, मोबाइल नेटवर्क मिले या ना मिले, पत्रकारों का पूरा फुल नेटवर्क मिलता है।
उत्तरकाशी में नेहरू पर्वतारोहण संस्थान है जहां पर्वतारोहण की कक्षाएं चलती हैं, पर्वतारोहण सिखाया जाता है, वो भी बिल्कुल सस्ते दामों पर। हमारे पत्रकार साहब का एक नेटवर्क उस संस्थान में भी है। उसका शॉर्ट नाम निम (NIM- Nehru Institute of Mountaineering) है। उत्तरकाशी में कहीं भी किसी से पूछ लो कि निम कहां है, आपको सही जानकारी मिल जायेगी। तो जी, हम भी निम में जा पहुंचे। जिससे मिलना था, मिले। उन्होंने ही निम के पास हमारे लिये एक होटल में कमरा बुक करा दिया था। बाद में पता चला कि वो कमरा 600 रुपये का था।



84.

सीमा आज़ाद की गिरफ्तारी और लोकतंत्र का सच

  • अनिल पुष्कर कवीन्द्र 



जब अर्थव्यवस्था का दर्शन, देश के विकास का दर्शन, समाज में फैले भ्रष्ट-तन्त्र का दर्शन, लोकतांत्रिक अधिकारों को खारिज कर पूँजी का दर्शन, सरकारी अनियमितताओं का दर्शन भारतीय लोकतंत्र में बेखौफ फल फूल रहा हो, ऐसे हालात में सीमा आज़ाद की गिरफ्तारी पर आश्चर्य क्यों? जिस समय सीमा आज़ाद की गिरफ्तारी हुई उस दरमियान सारे मानवाधिकार कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, समाजवादी व्यवस्था के लिए पहल करने और लगातार मानवतावादी विचारधारा से सम्बन्ध रखने वाले श्रमजीवी, लेखक, कलाकार, पत्रकार, चिन्तक, सामाजिक विषमता के विरुद्ध लड़ने वाले आम लोग सभी के दिलों में दहशत पसरी हुई थी. तमाम जगहों पर तयशुदा संगोष्ठियाँ, आयोजन, रैली, हड़ताल, जुलूस, सभी कुछ पर अचानक ही एक गहरा सन्नाटा छाया था. आखिर सीमा आज़ाद और विश्वविजय को सेसन कोर्ट से उम्र-कैद की सजा के बाद फिर से ये गवाहियाँ देने वाले लोग, सीमा और विश्वविजय (सजायाफ्ता मुजरिम घोषित किए जा चुके)  से अपरिचित होने का भाव रखने वाले सजग लोग अब क्यूँ हंगामा मचाने की तैयारियों में जुटते जा रहे हैं?



85.

खुरपेंचिया ब्लॉगर अनूप शुक्ल जी !







ब्लॉग-जगत में इन दिनों एक विशेष प्रकार का तत्व सक्रिय है जिसे हम अपनी स्थानीय बोली में खुरपेंच कहते हैं.इसको ऐसे भी कह सकते हैं कि चलते हुए बैल को अरई मारना !अरई एक प्रकार का हथियार है जिससे किसान बैलों में नाहक उत्तेजना भरने का काम लेते हैं.इस तरह का काम अपनी कलम से द्वारा करना 'खुरपेंच' की श्रेणी में आता है.इस काम को पहले आदरणीय स्वर्गीय डॉक्टर अमर कुमार जी किया करते थे,पर उनके जाने के बाद इस विधा को और गति प्रदान करने व विशिष्टता से करने का काम हमारे फुरसतिया वाले अनूप शुक्ल जी ने लगातार किया है.इस प्रकार वे अप्रत्यक्ष रूप से अमर कुमार जी के ब्लॉगरीय-वारिस बनने की दौड़ में भी हैं.


86.

भारत सरकार की उच्‍च शिक्षा के लिए 10 हजार छात्रवृत्तियाँ (10,000 Scholarship for Higher Education)


भारत सरकार ने उच्‍च शिक्षा को प्रोत्‍साहित करने के लिए 10 हजार छात्रवृत्तियों की घोषणा की है, जिसके तहत चुने गये प्रत्‍येक विद्यार्थी को अधिकतम पाँच वर्षों (या कोर्स की समाप्ति, जो पहले हो) तक रू0 80,000 की वार्षिक छात्रवृत्ति प्रदान की जाएगी, जिसके साथ ग्रीष्‍मकालीन प्रोजेक्‍ट को निष्‍पादित करने के लिए मेंटरिंग संस्‍थान को रू0 20,000 का ग्रीष्‍मकालीन अटैचमेंट शुल्‍क भी देय होगा।



87. 

मुख दुर्गन्ध नाशी ही नहीं मुख कैंसर से भी बचाती है 'ग्रीन टी' (Green tea can beat bad breath, Cancer)


इजराइल प्रोद्योगिकी संस्थान के एक ताजातरीन शोध के अनुसार 'ग्रीन-टी' न सिर्फ दुर्गन्ध मय सांस (मुख निश्वास से पैदा दुर्गन्ध) से बचाती है, मुख कैंसर से भी बचाव कर सकती है. यह कमाल है इसमें मौजूद उन जादुई पोलिफिनोल्स (एंटीओक्सिडेंट) का जो मुख में ऐसे कई यौगिकों का खात्मा कर देतें हैं जो दुर्गन्ध की वजह बनतें हैं. दंत क्षय और ओरल कैंसर की वजह भी यही यौगिक बनते हैं. इसीलिए इसे अब कुदरती सुपर फ़ूड माना जाने लगा है. कुदरत का ऐसा तोहफा जो न सिर्फ हृदय रोगों और कैंसर रोग समूह से बचाए रह सकता है, खून से चर्बी भी निकाल बाहर करता है. पार्किन्संस एवं लाइलाज बने एल्जाईमार्स रोग को भी मुल्तवी रख सकता है.
ताज़ा शोध में रिसर्चरों ने एक ख़ास फिनोल ईजीसीजी (EPI GALLO ATECHIN 3  GALLATE, संक्षिप्‍त रूप EGCG) की पड़ताल की है. यही इस हरी-चाय का प्रमुख घटक है. मुख स्वास्थ्य को बनाए रखने में अब ग्रीन टी की ओर अधिकाधिक ध्यान गया है. हालाकि हरी चाय और साधारण चाय का पौधा एक ही है लेकिन दोनों के संश्लेषण का, संशाधन का तरिका जुदा है. इसमें  केफीन की मात्रा कमतर रह जाती है. केफीन शून्य भी इसे बनाया जा सकता है. अलग स्वादों में भी. लेकिन डेरा रहता है इसमें पोलिफिनोल्स का.



88.

अभिशप्त हिन्दुस्तान

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जो अपनी बेबाक राय, स्पष्ट नीति और कठोर निर्णयों के लिए जाने जाते हैं आज राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन चुके हैं। गैर भाजपा दलों की बात करना ठीक नहीं होगा सिर्फ एन.डी. ए. के विभिन्न घटक दलों और भाजपा के जंग-लगे लेकिन सत्ता की आस में लार टपकाने वाले पदाधिकारियों की बात करें। प्रथम दृष्टतयः सभी के घुटने कांपते नज़र आ रहे हैं। नितीश कुमार का कम्पन तो इस कदर बढ़ चुका है कि घुटनों में मंजीरे बाँध दो तो पूरे हिन्दुतान में सेकुलर कीर्तन करने को वाद्य यंत्रों की जरूरत नहीं पड़ेगी। मोदी के विरोधियों की सूची इतनी लम्बी है कि सिर्फ नाम लिखूं तो एक छोटा ब्लॉग बन जाए। लेकिन मोदी के समर्थकों का नाम लिखूंगा कम से कम एक अरब नाम लिखने पड़ेंगे। मेरे विचार से इतना लिखने के बाद मैं सर्वाधिक ब्लॉग लिखने का वर्ल्ड रिकार्ड बना लूँगा !



89.

नारी का जीवन-?????


आज के आधुनिक युग में भी स्त्रियों की दुर्दशा और कन्या भ्रूण हत्या की घटनाओं को देखते हुए मुझे ये लेख लिखना पड़ रहा है….
प्रत्येक माता एवं पिता को संबोधित-
कितने आश्चर्य की बात है की नारी की कोख से ही जन्म लेने वाले स्त्री और पुरुष उसी स्त्री की दुर्दशा के लिए बराबर के ज़िम्मेदार हैं….और इससे भी अधिक आश्चर्य तब होता है जब एक स्त्री स्वयं दूसरी स्त्री को निकृष्ट समझने लगती है और उसके दुखों का कारण बनती है, दादी माओ को तो अक्सर ही पोती नहीं पोता चाहिए होता है, कभी कभी कुछ माएं भी लड़की नहीं लड़के की इच्छा रखती हैं…..बचपन से लेकर बुढापे तक अलग-अलग रिश्तों में एक स्त्री दूसरी स्त्री के दुखों कारण बनती है, कभी दादी-नानी के रूप में, कभी भाभी तो कभी नन्द के रूप में तो कभी कभी माँ के ही रूप में एक स्त्री दूसरी स्त्री के प्रति पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाती है और इन सबसे बढ़कर एक रिश्ता सास और बहु का जो एक-दुसरे के लिए बहुत ही बुरा साबित होता चला आ रहा है. …..क्या स्त्रियाँ यह बात भूल जाती है की वे स्वयं एक स्त्री हैं?



90.जिन्दगी खूबसूरत है

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जिन्दगी खूबसूरत है
बस देखने के लिए
एक नजर चाहिए ……
क्या देखा कभी ध्यान से
नीले – नीले अम्बर में
कहीं रंगों भरे कैनवास भी हैं ……
शांत से दिखने वाले जल में
कितना गहरा संसार भी है ……
बारिश की बूंदों में
रुनझुन रुनझुन आवाज भी है ……
ची ची करती चिड़ियों में
कहीं मनमोहक गान भी है …….




91.नैनीताल-अतीत की तलाश के बहाने
नैनीताल -
अतीत की तलाश के बहाने
ताल, माल, किरकिट (फ्लैट्स), हरे-भरे वन और शीतल बयार। इन पंचतत्वों से निर्मित, मध्य हिमालय की इस रमणीय प्राकृतिक संरचना का नाम नैनीताल है। देश-विदेश के पर्यटकों की चहल-पहल से वर्ष भर किसी मेले की सी गहमागहमी से परिपूर्ण यह शहर क्या 1840 में अंग्रेज पर्यटक पी0बैरन को सम्मोहित करने से पहले केवल घना जंगल था, या उसके अतीत में भी कोई हलचल थी? यह प्रश्न बार-बार मन को कुरेदता है। ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः‘ की भावना से अभिभूत हमारे पुरखों ने इतने रमणीय स्थल को बिना देवत्व की कल्पना से मंडित किये, छोड़ा हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता।
भूमि को देवत्व प्रदान करने का जिम्मा लिया पुराणों ने। नदियों, उनके संगमों, सरोवरों, शुभ्र पर्वतों, सभी में उन्होंने न केवल देवत्व की कल्पना की अपितु उनके दरस-परस पर पूरा माहात्म्य लिख डाला। फिर नैनीताल कैसे छूटता। लगा अतीत के ग्रन्थों को टटोला जाय।



92.

न जाने कौन सा घोटाला दफन हुआ…


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दिनांक २१ जून, जगह महाराष्ट्र की सब से सुरक्षित जगहों में से एक मुंबई मंत्रालय जहाँ मुख्यमंत्री और सारे मुख्य बिभागों का मुख्यालय था और वहाँ देखते ही देखते आग और धुवें के मंजर में तब्दील हो गया, चौथी मंजिल से लगी आग ने पांचवी और छट्टी मंजिल भी आगोश में ले लिया
क्या आप को ये बात पच रही है???
जो सरकार इतने घोटालों में फंसी हो, सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस पे नोटिस भेजे जा रहा हो, और चरों तरह से कोई सरकार फंसी हो अचानक एक दिन खबर आती है कि मंत्रालय में आग लग गयी सब कुछ जल के ख़ाक… बिठा लो जांच…क्या कर सकता है कोई????


93.

पिता से पुत्री के भरण पोषण की राशि प्राप्त करने के लिए माता कब कार्यवाही करे?


समस्या-
मैं मुम्बई में केन्द्र सरकार की नौकरी में हूँ। मेरा विवाह 2006 दिसम्बर में हुआ था। लेकिन मेरी कुछ गलतियों के कारण अब मेरे पति मुझ से तलाक चाहते हैं। मैं ने सब कुछ पति के सामने स्वीकार किया लिया और यह विश्वास दिलाया कि फिर भविष्य में कभी भी ऐसा नहीं होने दूंगी।  लेकिन पति मुझ पर विश्वास नहीं है और वे मुझ से अलग होना चाहते हैं।  मेरे एक चार वर्ष की पुत्री भी है। पति ने कहा है कि यदि मैं चाहूँ तो पुत्री को अपने संरक्षण में रख सकती हूँ।  मेरे पति ने सहमति से तलाक की कानूनी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं।  मेरा सवाल यह है कि सहमति से तलाक के बाद यदि मैं पुत्री को अपने पास रखूँ तो क्या उस के पिता से भरण पोषण के लिए वित्तीय सहायता की मांग कर सकती हूँ?   कानूनी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के पहले मुझे क्या करना चाहिए।
-वृषाली, कल्याण, महाराष्ट्र


94.मेरा ‘मन’ बड़ा पापी -नहीं-मन-मोहना
——————————————–
‘मन’ बड़ा निर्मल है
न अवसाद न विषाद
ना ज्ञान ना विज्ञान
न अर्थ ना अर्थ शास्त्र
चंचल ‘मन’ बाल हठ सा
बड़ा गतिशील है..
गुडिया खिलौने देख
रम जाता है ! कभी -
राग क्रोध से ऊपर …
न जाने ‘मन’ क्या है ?
लगता है कई ‘मन’ हैं ?
एक कहता है ये करो
दूजा “वो” करो



95.पछतावा ………?
कभी -कभी किसी जान लेबा दुर्घटना या हादसे के -सीधे -सीधे तौर पर हम जिम्मेदार न होते हुए भी ,उस हादसे के शिकार इन्सान की गैर मौजूदगी -को इस हद तक दिल से लगा लेते हैं कि अपनी उपस्थिति का अहसास करना भी मुश्किल सा प्रतीत होता है |
सन्दर्भ और सुवर्णा बहुत अच्छे दोस्त थे,अपने -अपने शहरों और परिवारों से दूर” मुम्बई जैसी -माया नगरी में “दोनों एक -दूसरे के वक्त जरूरत में पूरक थे -बावजूद इस के दोनों अपने कार्य -क्षेत्तों में संघर्ष रत थे ,सुवर्णा को अपनी योग्यता और डिग्री के अनुसार जल्द ही -नौकरी मिल गयी ,और वह अपने कार्य में इतनी व्यस्त रहने लगी कि उसे कभी-कभी छुट्टी बाले -दिन भी आफिस जाना होता -उसकी इस व्यस्तता के चलते सन्दर्भ के साथ धीरे -धीरे संवाद के अवसर कम होने लगे,सन्दर्भ -फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाने बाले संघर्ष कर रहे कलाकारों में था ,यहाँ वह कई वर्षों से अपनी -किस्मत को आजमा रहा था,उसे छोटे -छोटे अवसरों को छोड़ कर कोई विशिष्ठ अभिनय करने का अभी तक यादगार -अवसर नहीं मिला था ,एक -तरह से बेरोजगार ही था |



96.

ऐ मेरे दोस्त…!!!


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ऐ मेरे दोस्त ये चेहरे पे उदासी कैसी?
क्या तेरा दिल भी मेरे दिल की तरह टूट गया?
क्या तुझे भी किसी हमराज की याद आती है?
क्या तबियत तेरी तन्हाई में घबराती है?

ऐसा लगता है कि तुने भी कभी मेरी तरह,
अपने महबूब को जी-जान से चाहा होगा,




97.

वर्ल्ड म्यूजिक डे एंड Bombaim..


आज विश्व संगीत दिवस(वर्ल्ड म्यूजिक डे) है.२१ जून को सारा संसार प्रकृति के संगीत रुपी इस जादुई उपहार को विश्व संगीत दिवस(वर्ल्ड म्यूजिक डे) के रूप में मनाता है.विश्व संगीत दिवस पहली बार फ्रांस में सन 1976 में एक अमेरिकी संगीतकार के द्वारा शुरुआत की गयी थी.तब से,यह दुनिया भर में लगभग 30 से अधिक देशों में अपने अपने तरीके से एक उत्सव के तरह मनाया जा रहा है.विश्व संगीत दिवस(वर्ल्ड म्यूजिक डे) का मुख्य नारा है Make Music. मनोरंजन उद्योग की राजधानी Bombaim आज म्यूजिक डे मानाने में मशरूफ दिखा तो जरूर मगर सख्त अनुशाषण की छत्रछाया कभी न सोने वाली Bombaim को थोडा समय पर सोने को मजबूर होते हुए.शायद यह कभी न सोने वाली Bombaim इसे विशेषण कहे या फिर गुमान,शब्दों को जिस तरह निचोड़े, यही इंडिया से हटके होने की इसकी परिपूर्णता को दर्शाता है नहीं तो देश की आर्थिक राजधानी एवं सबसे अमीर शहर होने के बाबजूद भी आज बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता में बाकी महानगरो के मुकाबले बहुत पीछे होता दिख रहा है.



98.

लकीर जरूरी है…


समझ में नहीं आ रहा कि,आखिरकार हमारे राजनेता चाहते क्या हैं। कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी कहते हैं कि,मुलायम सिंह यादव भाजपा के एजेंट हैं,और सोनिया गांधी कुर्सी बचाने के लिए मुलायम से दोस्ती करना चाहती हैं। यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान जरा दिग्विजय सिंह के तेवर को याद कीजिए। कैसे-कैसे बयानबाजी कर दिग्गी राजा मीडिया में हेडलाइन बन जाते थे,और अभी जब दिग्गी ने ममता दीदी को नखरेबाज कहकर संबोधित किया तो,कांग्रेस की ओर से फरमान जारी कर दिया गया कि, दिग्विजय सिंह अपनी जुबान को लगाम दें। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार में भाजपा की बदौलत सीएम की कुर्सी पर विराजमान हैं,लेकिन उनको गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा पंसद नहीं है। जिस नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुखिया बनाने के लिए कभी संजय जोशी ने जी तोड़ कोशिश की,उसी संजय जोशी के चलते मोदी को अब सीएम की कुर्सी पर खतरा मंडराते नजर आ रहा है। मोदी को विकास पुरुष कहने वाले लाल कृष्ण आडवाणी को अब ये बात नागवार गुजर रही है कि,नरेंद्र मोदी दिल्ली की कुर्सी पर विराजमान होने का ख्वाब क्यों संजो रहे हैं।


99.

कार्टून पर सरकार के दिशा निर्देश व्यंग्य


लोकसभा में देश के संविधान-निर्माता तथा प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलालजी पर बने एक कार्टून को सरकारी पाठ्य पुस्तक में शामिल करने का कुछ सदस्यों ने विरोध किया था। सरकार को इस विषय पर अन्य कई प्रतिवेदन भी प्राप्त हुए हैं। इस राष्ट्रीय विवाद के समग्र विस्तार और दूरगामी नतीजों पर सरकार ने सचिवों की समिति तथा उच्चस्तरीय मंत्रियों की कमेटी के माध्यम से गहन विचार-विमर्श किया है और उसके बाद, राजनैतिक दलों के नेताओं से सर्वदलीय बैठक बुलाकर, व्यापक वैचारिक आदान-प्रदान भी और निम्नलिखित दिशा निर्देश जारी करने का निर्णय लिया है -

1. कार्टून इस देश की सांस्कृतिक परम्परा के अनुकूल नहीं हैं। बाइबिल, रामायण, गुरुग्रन्थ साहब, कुरआन आदि धर्म ग्रन्थों में किसी आराध्य का कोई काटरूून नहीं है। देश के स्वर्गवासी तथा वर्तमान नेता इसी श्रेणी में आते हैं। वह पूजनीय हैं। सम्मान के पात्र हैं, कार्टून के नहीं। पाठ्य-पुस्तकों में उनके कार्टूनों के समावेश से किशोर मन पर दुष्प्रभाव पड़ेगा, जो कि कदापि वांछनीय नहीं है। इससे प्रचलित पारिवारिक प्रजातांत्रिक व्यवस्था पर भी कुठाराघात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।




100.

अमरीश पुरी: खलनायक नहीं नायक


amrish puriपर्दे पर किरदारों को जीने वाले कलाकारों की अपनी भी एक पर्सनल लाइफ होती है जहां वह रील लाइफ से अलग एक जिंदगी जीते हैं. पर्दे की जिंदगी असल जिंदगी से बिलकुल अलग होती है. पर्दे की दुनिया में अकसर खलनायक दिखने वाले खिलाड़ी असल जिंदगी में किसी नायक से कम नहीं होते और इस बात के एक आदर्श उदाहरण हैं अमरीश पुरी. आज अमरीश पुरी की जयंती है.

पर्दे पर अमरीश पुरी को “गब्बर सिंह” (अमजद खान) के बाद दूसरा सबसे प्रसिद्ध और कामयाब विलेन माना जाता था. अमरीश पुरी के अंदर ऐसी अद्भुत क्षमता थी कि वह जिस रोल को करते थे वह सार्थक हो उठता था. अगर आपने उन्हें  मिस्टर इंडिया के मोगैंबो के रोल में देख कर उनसे नफरत की थी तो उन्होंने ही “दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे” में सिमरन का पिता बन सबके दिल को छू लिया था. अमरीश पुरी हर किरदार में फिट होने वाले एक आदर्श अभिनेता थे. एक पिता, दोस्त और विलेन तीनों ही किरदार पर उनकी पकड़ उन्हें एक महान कलाकार बनाती थी. हिंदी सिनेमा इस महान अभिनेता के बिना शायद अधूरी ही रहती. यूं तो अमरीश पुरी की पूरी जिंदगी ही एक कहानी है पर चलिए उनके जीवन के कुछ अंश पर एक नजर डालें.




101.

मंत्रालय जैसी आग लगती रहे!


 यह निबंध उस छात्र की कॉपी से लिया गया है, जिसे निबंध प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार मिला है। विषय था - आग।

आग लगी मुंबई मंत्रालय में, वो घोटाला थी - लगभग। यह बात बाहर वाले कहें, तो अलग बात है। पर अंदर वालों की बात का संकेत भी यही है। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री ने सवाल उठाया कि मेरा पूरा दफ्तर जल गया, पर मुख्यमंत्री का लैटरपैड तक नहीं जला। खैर आशंका यह है कि आग तत्व के घोटाले में पंच तत्व के दूसरे तत्व यानी पृथ्वी तत्व के घोटाले की फाइलें जल गईं। हाउसिंग सोसायटी घोटाले की फाइलों की सुरक्षा को लेकर शंकाएं हो रही हैं।

पंच तत्व के एक और तत्व पानी के घोटाले तो रोज ही हो रहे हैं। दिल्ली, हरियाणा में मारकाट चल ही रही है इस पर। हवाई तत्व में  घोटाले की खबर भी जल्दी आ जाएगी, क्योंकि खबर आई है कि करोड़ों में एयर डिफेंस मिसाइलें खरीदी जायेंगी। आसमान तत्व यानी स्पेस से घोटाले की खबर का इंतजार है। तमाम भारतीय सैटलाइट आसमान में घूम रहे हैं, जो फोटो खींच रहे हैं कि आग तेज हो गई है, मानसून धीमा हो गया है। स्पेस में घोटाला हो जाए, तो पंचतत्व घोटाले पूरे हो जाएंगे।

खैर मसला आग का है। आग बहुत महत्वपूर्ण तत्व है। आग बहुत घोटाले शुरू करवाती है, बहुत से घोटालों का अंत भी आग से होता है। पर्सनल लाइफ  में लगभग हर आदमी की जिंदगी में एक घोटाला होता है - जिसे तमीज से हम विवाह कहते हैं। इसमें आग का रोल होता है। आग के इर्द-गिर्द सात फेरे लेकर इस घोटाले की शुरुआत होती है। उधर पॉलिटिकल ऑफिशल लाइफ  में तमाम घोटालों का अंत दफ्तर में लगी आग से होता है


तो आज के लिए इतना ही अब हमको विदा दीजीए मिलते हैं फ़िर अगला बुलेटिन के साथ ...

आपके अपने ब्लॉग रिपोर्टर ...अजय कुमार झा ...बोले तो भईया जी ईश्श्श्श्माईईईल :) :)

30 टिप्पणियाँ:

वन्दना ने कहा…

जय हो बुलेटिन की………अब सब घुमक्कडी पर निकल लिये हैं आप को देख देख कर :))))

डॉ टी एस दराल ने कहा…

वाह भैया ! पूरे सप्ताह भर के पढने की सामग्री का जुगाड़ बना दिया है .
पहले लगा की आज अर्ध शतक लगा कर छोड़ेंगे . फिर लगा आज तो शतक ही लगा दिया है .
लेकिन आपने तो १०१ पूरे कर विधिवत रूप से संस्कृति में बांध दिया है .

बहुत बढ़िया और उत्तम लिंक्स दिए हैं . बेहतरीन पोस्ट्स का चुनाव किया है .
सार्थक प्रयास .

Arvind Mishra ने कहा…

बाप रे इतना परिश्रम? कोई ब्लॉग दीवाना लगे है मार दिया एक सैकड़ा और एक -बहरहाल एक हप्ते की सामग्री पकड़ा दी है आपने!आभार

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

अरे वाह....!
आपने तो चर्चा मंच की एक चर्चा लेकर बहुत से लोंगों की पोस्टों को चर्चित कर दिया
आभार!

Kailash Sharma ने कहा…

वाह ! इतने सुन्दर सूत्र...सप्ताह में पढने के लिये बहुत कुछ दे दिया...आभार

Ratan singh shekhawat ने कहा…

वाह ! बहुत बढ़िया :)

Anupama Tripathi ने कहा…

ओह ...जबर्दस्त बुलेटिन ....हृदय से आभार अजय जी ...ऐसा लग रहा है ...प्रभु प्रसाद मिल गया है आज ....संगीता जी द्वारा दी गयी अनुभुती की सुंदर समीक्षा भी है और मेरी रचना प्रभु को ढूंढती हुई यहाँ आ पहुंची है ...सच मे प्रभु प्रसद मिल गया ...!!

ana ने कहा…

apke buletin ka jawab nahi.....mere do rachanao ko sthan dene ke liye shukriya

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

आपकी मेहनत को प्रणाम

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

गज़ब....पूरे महीने का राशन-पानी देकर कहीं राष्ट्रपति-भवन में बैठने का इरादा तो नय है !

हमरे खुरपेंच को शामिल करने का आभार !

DrZakir Ali Rajnish ने कहा…

झकाझक है ये एक्‍सप्रेस।

ऐसे ही चलती रहे, यही कामना है।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत बढ़िया ...सच में श्रमसाध्य कार्य...आभार

रश्मि प्रभा... ने कहा…

कीमती रेल , आरामदायक डब्बे किताबों से भरे ... पन्नों के लिंक्स शानदार - और कमाल कि भाई की बड़ी बहन भी है २० वें नम्बर पर ...
नेट कट गया है तो मेरी अनुपस्थिति बीच बीच में होगी .

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

ज़बरदस्त बुलेटिन .... काफी लिंक्स पर हो आई हूँ ....

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

महा बुलेटिन से हुआ,पहला साक्षात्कार
हमें जगह दी आपने,बहुत बहुत आभार |

101 लिंक्स से सुसज्जित महा बुलेटिन में आपका श्रम निश्चय ही सराहनीय है.

veerubhai ने कहा…

बहुत बड़े फलक पर है ब्लॉग बुलेटिन पढने वालों को भी धैर्य बनाए रखना होगा .शुक्रिया ग्रीन चाय को सजाने के लिए .

singhSDM ने कहा…

Best Collection

अदा ने कहा…

बहुत ही परिश्रम का काम है..
धन्यवाद, आपने इस योग्य समझा..

संजय भास्कर ने कहा…

बेहतरीन पोस्ट्स बहुत बढ़िया और उत्तम लिंक्स दिए हैं
101 लिंक्स सराहनीय है हमे शामिल करने का आभार अजय भैया
@ आज पहली बार बुलेटिन में जगह मिली है अपनी ख़ुशी बयाँ नहीं कर पा रहा हूँ

................इसका सारा श्रेय आपको जाता है अजय भैया
......बहुत बहुत आभार !!

संजय भास्कर

संजय भास्कर ने कहा…

......बहुत बहुत आभार !!
......बहुत बहुत आभार !!

मनोज कुमार ने कहा…

आपके बुलेटिन की खासियत है कि इसमें आम ब्लॉगर्स के साथ-साथ खास ब्लॉगर्स को भी उतना ही महत्व दिया गया है। इतने लिंक्स और इस वैरिएशन के बाद किसी एग्रिगेटर की क्या ज़रूरत है।

कुल मिलाकर एक सौ एक मनकों की यह माला जाप कर मन तृप्त हुआ।

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

धन्यवाद, आपने इस योग्य समझा

शिवम् मिश्रा ने कहा…

आप के परिश्रम को नमन ... अजय भाई !

BS Pabla ने कहा…

आते हैं टिकिस ले के :-)
फिर चलते हैं इस एक्सप्रेस पर
दो-चार दिन तो लग ही जायेंगे

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

काफी लिंक्स ...

सुनीता शानू ने कहा…

मुझे मालूम था यह काम अजय ही कर सकता है। इतने सारे लिंक्स एक साथ देख कर बहुत अच्छा लगा। बहुत खुशी हुई आपने मेरी वो पोस्ट चुनी जो मेरे लिये बहुत महत्वपूर्ण है। शुक्रिया छोटे भाई:) :)

संजय भास्कर ने कहा…

ज़बरदस्त बुलेटिन

Rajeev Sharma ने कहा…

हर रंग के फूल एक स्थान पर परोसने का शुक्रिया

SAFAR ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रयास.
Tufail A. Siddequi
http://siddequi.jagranjunction.com

mark williams ने कहा…

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