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शनिवार, 9 जून 2012

यादों की खुरचनें - 1



यादों की खुरचनें
कड़ाही से खुरचकर निकाला गया स्वाद होता है - कभी मीठा सोंधा खोये सा , कभी जला , कभी भुना चटक , कभी कुरकुरा , कभी बेस्वाद धो देने जैसा ... एहसास जो पन्नों पर उतरते हैं , वे पन्ने दर पन्ने पाठक क्या - खुद से भी ओझल होते हैं . अच्छा लगता है उन यादों के साथ छुप्पाछुप्पी खेलते हुए उनको खींचकर ले आना - कभी एक मुस्कान बारिश के बाद की धूप सी खिल जाती है , कभी किसी थके चेहरे पर दो बूंदें गिरती हैं और राहत मिलती है . दर्द, प्यार , ख़ुशी , नर्क ..... सबका अपना अपना होता है . दूसरे के शब्द में
भी अपने एहसास मिल जाते हैं , मिल जाते हैं जीने के सबब , खुल जाते हैं कठोर बन्द रास्ते !

चलिए थोड़ा पीछे मुड़कर उन यादों को ले आएँ , जिनको हमने जीया था - फिर से उनको जी लें ...

एक लड़की शुरू में नहीं जानती अपनी विशेषताएं , क्योंकि उसे
सिर्फ घुलना मिलना सिखाया जाता है ,उसे उसके कर्तव्य बताये जाते हैं . वह त्याग की भाषा सीखती
है ,वह गुडिया घर से अपना पाठ्य क्रम जानती है . पर - उसके त्याग , उसके कर्तव्यों के आगे
जब जिल्लतों के ढेर लग जाते हैं तब वह अपनी मुट्ठी खोलती है , जिसमें मंथन से निकला अमृत होता है -
जिसकी एक एक बूंद से उसकी दैविक शक्तियां निकलती हैं . .............. सच यूँ अपना रूप बदलता है ,

" लड़की नहीं जानती
लड़की की ताकत
लड़की है नदी,
लड़की है झरना,
लड़की है पहाड़,
लड़की है पेड़,
पेड़ की डाल है लड़की
पेड़ से कटकर भी जलती है, लड़की
अलाव की आग बनकर
सुलगती है, लड़की
सुलग-सुलगकर राख नहीं होती है
सुलग-सुलगकर बनती है, लड़की
दहकता हुआ अग्निपुंज
और खाक कर देती है
समूचे डरावने जंगल को
लड़की मुट्ठी में
बंद हैं बीज
बीज सपनों के, फलों से लदे-फंदे
उंगलियों के इशारों पर
तय करती है, लड़की
हवाओं की दिशाएं
लड़की की खिलखिलाहट
लौटा लाती है बसंत "

प्रत्यक्षा: शब्दों की बाजीगरी........ शब्द बाण , जिसने किसी द्रोणाचार्य से शब्दभेदी लक्ष्य की शिक्षा नहीं ली ,
परन्तु - पूरी दुनिया को हिलाकर रख देता है ,झुलसती गर्मी में भी सिहरन पैदा कर जाता है , दो टूटे घरों को जोड़ता है ,
तो तोड़ता भी है , हौसला देता है , गीत बनकर मन बहलाता है .... बस प्रयोग पर निर्भर है शब्दों की बाजीगरी -

" मेहरबान कद्रदान !
आईये इधर आईये साहबान
आज मैं दिखाऊँ आपको ,शब्दों की बाजीगरी........

ये देखिये..इन पिटारियों में कैद हैं शब्द्...आप कौन से देखना पसंद करेंगे ?
मीठी चाशनी में पगे या जलते अँगारों से दहकते शब्द ?
फूलों के रंगों से खिले या शाम की ज़र्द उदासी में रंगे....

हाज़रीन ! आप किसका खेल देखना पसंद करेंगे ?
यह देखिये....इन शब्दों को..जो बडे नाज़ुक , मीठे से हैं..इनकी रेखायें साफ नहीं हैं...ये बच्चों के तुतलाते शब्द हैं..प्यार के रस में भीगे, खूबसूरत तितलियों जैसे..
फूल फूल पर उडते.....
मैने बडी आसानी से पकडा था इन्हें, बस आँखें बंद की थीं, इनके नाज़ुक पँख मेरे चेहरे के इर्द गिर्द फडफडाये थे..
मैने मुलायमियत से इन्हे पकड लिया था......
पर मेहरबानो इन्हें पकडना आसान है, रखना नही..इसके लिये दिल में प्यार होना चाहिये वर्ना यह मुरझा जाते हैं.
पर देखिये जनाब.....मेरे शब्द कितने रंगीन, कितने हसीन, कितने दिलकश हैं...

पर क्या कहा जनाब ?
आपको ये पसंद नहीं हैं ? मेरे पास और भी हैं, जाईये मत ! देखिये तो सही !!
इन्हे देखिये, ये नटखट बच्चों से शब्द हैं.....मैं चाहता कुछ और हूँ ये कहते कुछ और हैं.....
मैं मात्राओं को कान पकड कर खींचता हूँ..एक कतार में लगाने के लिये , पर ये एक दूसरे पर गिरते पडते, हँसते खिलखिलाते कतार तोड देते हैं..
बडी मुश्किल से खींचतान करके एक वाक्य में पिरोता हूँ, पर अंतिम मात्रा लगते ही , सैनिकों की तरह परेड करते ये निकल जाते हैं बाहर...मेरी सोच के दायरे से..
बडी मशक्कत की, तब काबू में आये हैं..डाँट खाये बच्चों की तरह सर झुकाये खडे हैं

अब आप ही बतायें साहबान , हैं न ये नटखट शैतान शब्द्......शर्त बदता हूँ....मौसम बे मौसम ये आपके चेहरे पर मुस्कान ला देंगे.......
पर क्या कहा आपने ? आप खुश नहीं होना चाहते अभी ?
आपके ख्याल में दुनिया बडी बेडौल है ? सही फरमाया आपने जनाब!
पर इसका भी इलाज है मेरे पास..
और भी शब्द हैं न मेरे पास...
इन्हें भी देखते जाईये.......
इन्हे देखिये..ये खून से रंगे शब्द हैं..विद्रोह के......ये तेज़ धार कटार हैं….
संभलिये..वरना चीर कर रख देंगे....बडी घात लगाकर पकडा है इन्हे...कई दिन और कई रात लगे, साँस थामकर, जंगलों में, पहाडों पर , घाटियों में, शहरों में पीछा करके ,
पकड में आये हैं..
पर अब देखें मेरे काबू में हैं.....
बीन बजाऊँगा और ये साँप की तरह झूमकर बाहर आ जायेंगे..ये हैं बहुत खतरनाक, एक बार बाहर आ गये तो वापस अंदर डालना बहुत मुश्किल है....
ये क्रांति ला दें, विस्फोट कर दें, दुनिया उलट पुलट हो जाये..ये बाढ की तरह सब अपने चपेट में ले लें…….क्या कहते हैं जनाब ! ये कुछ ज्यादा धारदार हो गये.........
आप डर तो नहीं गये, मत घबडाइये, अभी तो पिटारी में बंद हैं, मुँह गोते बैठे हैं..जब कद्रदान मिलें, तब इन्हे बाहर निकालूँगा
अभी सोते हैं, तब इन्हे जगाऊँगा..
आईये आईये आईये...मेहरबान कद्र्दान...आईये आईये......!!! "


पहलू: शांति प्रस्ताव यादों की गलियों से अपनी टोकरी लेकर जब निकलती हूँ , तो कई अनदेखी गलियाँ मिल जाती हैं , कुछ देर बैठ जाती हूँ , क्योंकि उन
गलियों में जो शांत हवा बेचैनी में भी बहती है , वह एक मीठी नींद की खुराक सी लगती है . इन हवाओं को कुछ नहीं चाहिए , इनको बहने दो - बिना किसी तर्क वितर्क या कुतर्क
के ...क्योंकि ,

" पांच तो क्या एक भी गांव मुझे नहीं चाहिए।
सुई के नोक बराबर भी जमीन
तुम मुझे नहीं देना चाहते
मत दो, मुझे उसका क्या करना है।

मुझे तुमसे कोई युद्ध नहीं लड़ना
न जर, न जमीन, न जोरू के लिए
न बतौर कवि
एक जरा सी हैसियत के लिए।

मेरी महाभारत तो खुद मुझसे है
जिसे मैं जितना भी बस चलता है,
लड़ता रहता हूं।

किसी कुत्ते-कबूतर गोजर-गिरगिट की तरह
मेरे भी हाथ एक जिंदगी आई है
इसको तुमसे, इससे या उससे नापकर
मुझे क्या मिल जाएगा।

इस दुनिया में हर कोई अपने ही जैसा
क्यों नहीं रह सकता
इस पर इतना टंटा क्यों है
बस, इतनी सी बात के लिए
लड़ता रहता हूं।

मेरी कविता की उड़ान भी
इससे ज्यादा नहीं है
मेरी फिक्र में क्यों घुलते हो
मुझे तुमसे कोई युद्ध नहीं लड़ना। "

गलियाँ और भी हैं , खुरचनों के स्वाद के साथ आऊँगी फिर .... क्योंकि शब्दों का यह रिश्ता तोड़ने से भी नहीं टूटता !!!

11 टिप्पणियाँ:

dheerendra ने कहा…

. दर्द, प्यार , ख़ुशी , नर्क ..... सबका अपना अपना होता है .
डॉ.मीनाक्षी स्वामी जी :,,,,,की रचनाए पढवाने के लिये आभार,,,,,,

वन्दना ने कहा…

इस खुरचन का स्वाद तो लाजवाब है।

Rajesh Kumari ने कहा…

bahut behtreen prastuti bahut sundar padhvaane ke liye aabhar.

शिखा कौशिक ने कहा…

bahut khoob .sarthak blog posts se parichay karvaya hai aapne .aabhar

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

यादें दर्द की गठरी ही नहीं हुआ करतीं। यादें आनंद भी देती हैं।

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा…

अपनी कविता "यादों की खुरचन" में देख सुखद अनुभूति से भर गई। अनायास ही फिर से वे भाव मानस पटल पर जीवंत हो गए, जो कविता की रचना के समय थे। अपनी कविता फिर नए सिरे से पढी।
प्रत्यक्षा जी की कविता "शब्दों की बाजीगरी" पढना भी अनूठे आस्वाद से गुजरना रहा।
लाजवाब प्रस्तुति।

Saras ने कहा…

शब्द तो केवल शब्द होते हैं.......लेकिन उनका सही इस्तेमाल कोई जादूगर ही कर सकता है ....वोह किसी पर ऐसी सम्मोहिनी डाल सकता है की वह देर तक उस तिलस्मी दुनिया में स्तब्ध रह जाये ...जैसे मैं हो गयी हूँ.....अभी तक उबर नहीं पाई इनके असर से.....आभार रश्मिजी इन्हें हम तक पहुँचाने के लिए

शिवम् मिश्रा ने कहा…

यह खुरचन तो खा ली ... बड़ी स्वाद थी ... और है क्या दीदी ???

लीना मल्होत्रा ने कहा…

sundar kavitayen..

shikha varshney ने कहा…

बहुत सुन्दर.

सदा ने कहा…

एहसास जो पन्नों पर उतरते हैं शब्‍द बनकर उन यादों के साथ छुप्पाछुप्पी खेलते तो फिर ऐसा ही कमाल दिखाते हैं.. इस यादों की खुरचन सा ..बहुत बढिया।

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