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बुधवार, 25 सितंबर 2019

बिना किसी जीत हार के




कमी न तुममें थी
न मुझमें थी,
और शायद कमी तुझमें भी थी,
मुझमें भी थी ...
कटु शब्द तुमने भी कहे,
हमने भी कहे,
मेरी नज़रों से तुम गलत थे,
तुम्हारी नज़रों से हम !
बना रहा एक फासला,
न तुम झुके,
न हम - 
शिकायतें दूर भी हों तो कैसे ?
आओ, चुपचाप ही सही,
कुछ दूर साथ चलें,
मुमकिन है थकान भरे पल में,
तुम मुझे पानी दो
मैं तुम्हें ...
बिना किसी जीत-हार के,
बातों का एक सिलसिला शुरू हो जाए ।

रश्मि प्रभा 


एक ब्लॉग लिंक उठाती हूँ और उसके कुछ कमरों से गुजरती हूँ आपको साथ लेकर, शायद इसी बहाने रुके कदम,फिर चल पड़े -

    प्रदीपिका सारस्वत

इनफ़िडल




तन तंबूरा तार मन...




इसके बाद आप इन्हें पढ़िए और कहिये और लिखें 

7 टिप्पणियाँ:

विभा रानी श्रीवास्तव 'दंतमुक्ता' ने कहा…

सदा चलते रहें कदम
जीवनोदय है अनेकानेक का

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

ये बात समझ में आ जाये तो जीवन में खुशियों की कमी नहीं रहेगी ..शानदार अभिव्यक्ति ..

Sweta sinha ने कहा…

सुखद एहसास हुआ।
सार्थक और सारगर्भित रचना और बहुत सुंदर ब्लॉग लिंक।
अनवरत सफ़र जारी रहे शुभकामनाएँ।🙏🙏

yashoda Agrawal ने कहा…

जिन्दाबाद-जिन्दाबाद
अच्छा लगा
सादर नमन

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

बिना किसी जीत हार के बातों का सिलसिला शुरू हो जाए..वाह! आनन्द दायक।

noopuram ने कहा…

बात बहुत अच्छी लगी ।
सादर धन्यवाद, रश्मि जी ।

Jyoti Dehliwal ने कहा…

बहुत सुंदर बात रश्मि दी कि बातों का सिलसिला शुरू तो किया जाए।

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