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शनिवार, 19 अगस्त 2017

नाम का औरा लिए चेहरों को पढ़ती हूँ




एक नदी 
शताब्दियों का उत्तरार्ध लिए 
वर्तमान के आगे बहती है 
मैं किसी साधक की तरह 
उस जल से आचमन करती हूँ 
नाम का औरा लिए चेहरों को पढ़ती हूँ 
सूर्योदय सूर्यास्त के मध्य 
उनमें ध्यानावस्थित होती हूँ 
रात्रि के चौथे प्रहर में उनसे रूबरू होती हूँ 

... 

सुकून/चैन कहीं नहीं,
भटकाव/ठहराव-
एक खोज,
सतत चलते रहना-
श्वांस चलने तक..

बेचैन आत्मा: नदी


छोले भठूरे के साथ सी,
कहानी तेरी मेरी.
तू सादा, सफ़ेद, फूला हुआ, 
मैं मसालेदार,तीखी, चटपटी. 
तेरे बिना भी मेरा अस्तित्व है, 
पर मेरे बिना तू कुछ भी नहीं.

तुम उम्र का हिसाब पूछते हो / मैं बेहिसाब ढलान से उतर रही /तन्हाई की उम्र नही
आज कल एडियों में एक दर्द कसकता है
ज्यदा देर खड़ी रहूँ तो झुक झुक जाती है कमर
बड़ी तेज़ी से उड़ कर दूर चला जाता है परिंदा
नजर के धुंधलके में मैं उसके नाम का होना तय करती हूँ
परछाइयों में काँपता है अतीत आजकलकाले घेरे से घिरी रौशनी टटोलती हूँ
उम्र के बदलने से नही बदल गया मेरी पसंद का गाना
करवटें बदलते रहे पर एक उजास से भर जाता है उदास चेहरा
आज कल बड़ी और बड़ी होने के क्र्म में
मैं छोटी चीजों को घबरा कर पकड़ लेती हूँ
सुई के छेद से आर पार चली जाती है मेरी नजर धागे लकवे के हाथ सा झूल जाते है बहुत छोटी सी कलाई घड़ी की टिकटिक में नया समय चल रहा है
सांस तेज़ है मेरी ,निगाह किसी पुराने कलेंडर का एक रोचक महिना पलट देती है
मैं ट्रेन में हूँ ,मैं साड़ी में हूँ ,मैं कुछ रिश्तो के साथ बंधी हूँ मैं इसकी हूँ ,उसकी हूँ ,मैं मैं नही हूँ
मैं अब अपनेा साथ हूँ झूरियो में सिमट गई यात्रतों ने मुझे यहाँ रोक दिया है
मैं इसकी नही उसकी नही बंधी नही मैं खुली किताब सी एक कबाड़ी के तराजू पर डाल दी जाउंगी
मैं जिल्द की कॉपी से निकल जाउंगी
मैं कोरी हूँ मैं कविता हूँ लिखी जाउंगी......

3 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर बुलेटिन।

'एकलव्य' ने कहा…

बहुत उम्दा ! आभार
"एकलव्य"

कविता रावत ने कहा…

बहुत अच्छी बुलेटिन प्रस्तुति

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