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रविवार, 30 अप्रैल 2017

पटाक्षेप : ब्लॉग बुलेटिन श्रद्धांजलि

हिन्दी फ़िल्मों का एक दौर वो भी रहा जब हीरो का मतलब हैण्डसम होना या स्मार्ट लगना ही हुआ करता था. देव साहब का मूँछें न रखना ( ‘हम दोनों’ के अपवाद के अलावा) या दिलीप कुमार का फ़िल्म “मेरी सूरत तेरी आँखें” में एक बदसूरत आदमी का रोल करने से मना कर देना इसी का सबूत था. अपनी ख़ूबसूरत छवि के प्रति ये कलाकार इतने सचेत रहते थे कि सुचित्रा सेन ने फ़िल्में छोड़ने के बाद बाहर निकलना छोड़ दिया और यहाँ तक कहा जाता रहा कि वो बाहर निकलतीं भी तो बुर्क़ा पहनकर निकलती थी. देव साहब ने मरने के बाद अपनी अंत्येष्टि विदेश में करने को कहा ताकि उनके देश के लोग उनकी बीमार/ मृत छवि न देख सकें.
पर्दे पर और उसके बाहर की चमक “सितारों” की आँखों को चकाचौंध कर देती है, जबकि ओम पुरी, नसीर, नवाज़ और इरफ़ान जैसे कलाकारों को न तो अपने रंग की फ़िक्र होती है, न चेहरे के बनावट की और न चेहरे के दाग़ों की और न इस बात से कोई अंतर पड़ता है कि वो कौन सा किरदार निभा रहे हैं.
ऐसे ही एक कलाकार ने हिन्दी फ़िल्म जगत में अपनी एक जगह बनाई, उसे ख़ाली किया, दुबारा वो जगह हासिल की और अब एक स्थायी ख़ालीपन छोड़कर चला गया. वो शख्स इतना हैण्डसम था कि उसे ग्रीक गॉड वाला व्यक्तित्व कह सकते हैं. उसका काम फिल्मों में नायक, खलनायक या प्रतिनायक या सहायक कलाकार किसी भी रोल में हमेशा याद किया जाता रहेगा. हिन्दी फ़िल्मों का वो सितारा जो 27 अप्रैल 2017 को अस्त हो गया उसका नाम था विनोद खन्ना.

अभी कुछ दिन पहले जब वो बीमार होकर हस्पताल में भर्ती हुये थे तो मेरे छोटे भाई ने मेरी अम्मा से पूछा – मम्मी! आप पहचानती हैं विनोद खन्ना को?
मम्मी ने कहा – हाँ! भाई ने दुबारा पूछ लिया – इनकी कोई फ़िल्म याद है? और मम्मी के जवाब ने सबको अवाक् कर दिया... उनका जवाब था “अचानक"!
लगभग १४५ फिल्मों में काम करने के बाद मेरी माता जी के द्वारा उनकी इस एक फ़िल्म का याद रखा जाना, वास्तव में उस कलाकार की गंभीर अभिनय प्रतिभा का परिचय था.
विनोद खन्ना जी के बारे में बचपन की जो बातें याद आती हैं उनमें बहुत सी फ़िल्में ऐसी हैं जिनमें उन्होंने अमित जी के साथ काम किया. मैं फिल्मों के नाम नहीं ले रहा, उन फिल्मों में दोनों के अभिनय की तुलना की जाती रही और लगभग बराबर-बराबर लोग यह मानने वाले थे कि एक ने दूसरे को पछाड़ दिया है. विनोद खन्ना की एंग्री यंगमैन वाली छवि कहीं से भी कम न थी. और उसी समय कई फ़िल्मी पत्रिकाओं में यह भी छापा जाता रहा कि विनोद जी ने यह कहा कि अमित जी ने फिल्मों में उनके रोल कटवा दिए, उनके रोल बदल दिए या उनका चरित्र थोड़ा हल्का करवा दिया.


यह वो दौर था जब विनोद खन्ना एक अजीब से गुस्से की गिरफ्त में आ गए. उन्होंने अपने एक टीवी इंटरव्यू में यह कहा कि उन्हें लगता था कि वो कुछ कर बैठेंगे. ऐसे में उन्होंने अपना शिखर तक का सफर छोडकर ओशो की शरण में जाने का फैसला किया. लोग यह भी कहते रहे कि वहाँ उन्होंने माली का काम किया, जबकि ओशो के आश्रम में उन्हें फूलों की सेवा कहा जाता है और कोई भी काम छोटा बड़ा नहीं.

पाँच साल बाद जब उनका दुबारा प्रवेश हुआ तो उन्होंने धीर गंभीर व्यक्तित्व के साथ कुछ बेहतरीन फ़िल्में कीं. साथ ही एक सफल राजनैतिक दायित्व भी निभाया. अंतिम समय तक वे सांसद रहे.
एक ओर जहाँ उन्हें हेरा फेरी, खून पसीना, मुक़द्दर का सिकन्दर, अमर अकबर एंथनी के लिये याद किया जाएगा वहीं कुरबानी, दयावान और चाँदनी के लिये भी. उन फिल्मों को कोई नहीं भूल नहीं सकता जिन्हें हम कला फिल्मों की श्रेणी में रख सकते हैं जैसे अचानक, मेरे अपने, लेकिन...!
पिछले दिनों जब उन्हें बीमार हालत में दिखाया गया तो बहुत अंदर तक कचोट गया वो मंज़र दिल को. फिर उनकी मौत की अफवाह उड़ी. कहते हैं कि मरने की अफवाह उड़े तो उम्र बढ़ जाती है. लेकिन झूठी है यह कहावत – पहले मेहदी हसन साहब, फिर जगजीत सिंह साहब और अब विनोद खन्ना इन अफवाहों के बावजूद हमें छोड़ गए.
आपकी फिल्मों से बचपन जुड़ा है हमारा. 

तुमको न भूल पाएंगे... अभिनेता विनोद खन्ना! स्वामी विनोद भारती!!! सांसद विनोद खन्ना!!



- सलिल वर्मा 

आज की मेरी इस बुलेटिन में कोई लिंक नहीं प्रस्तुत कर रहा हूँ. केवल श्रद्धांजलि! 



शनिवार, 29 अप्रैल 2017

जाने किसकी आखिरी चिट्ठी गैरमौजूदगी में पहुँची




घर से तो हम निकल आए थे
उसके बाद भी तो डाकिया आया होगा
कुछ बन्द लिफाफे रख गया होगा
....
जाने किसी ने खोला या नहीं !!!

घर की सफाई करते हुए 
फेंक दिया होगा बाहर 
सड़क पर खेलते बच्चों ने खोला होगा
चिट्ठी की नाव बनाई होगी 
किसी नाले में बहाया होगा 
जाने किसकी आखिरी चिट्ठी गैरमौजूदगी में पहुँची
मन करता है पढ़ूँ
सम्भवतः किसी ने मनाया होगा
...

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इच्छामृत्यु की सुविधा - मेरा मन - blogger

मौजूदा हालतों में साहित्य की भूमिका और दखल



संवेदनाओं से लद कर झुकी हुई
प्रेम में पग कर परिपक्व
मेरा ऐसा झुकना और पगना
पसंद भी करोगे तुम?
शायद नहीं..
तुम फूलों के रस रूप रंग से मादक हो
और मैं फूल के बस खिल जाने से सम्मोहित..
महसूस करने का ये अंतर
युगों का फ़ासला है..😊

वस्त्र
जिंदगी के पास होते हैं
सिर्फ तीन वस्त्र
भूत, वर्तमान और भविष्य
रोज़ बदलती है वो भूत वाला वस्त्र
कुछ रेशे चिपके ही रह जाते है
यादों पर
मन पर भी कुछ कुछ
ज्यादा झाड़ों तो कमबख़्त रेशे
कांटे जैसे गढ़ जाते हैं.....
मेरा कहा मानो
आज जब जिंदगी वर्तमान पहने तो
उतरे हुए वस्त्रों को
अन्तर्मन की गंगा में
प्रवाहित कर दो.....

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

समानान्तर सत्ता स्थापित करते नक्सली : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार मित्रो,
फिर एक नक्सली हमला हुआ. फिर हमारे कई जवान शहीद हो गये. फिर सरकार की तरफ से कड़े शब्दों में निंदा की गई. फिर कठोर कदम उठाये जाने की बात कही गई. इस ‘फिर’ में हर बार हमारे जवान ही कुर्बान हो रहे हैं और इस ‘फिर’ का कोई अंतिम समाधान नहीं निकल रहा है.

परिचयात्मक रूप में नक्सलवाद कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का अनौपचारिक नाम है जो पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ. इसे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन के रूप में आरम्भ किया था. वे चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग से प्रभावित थे और मानते थे कि न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है. यह सशस्त्र संघर्ष उनकी मृत्यु के बाद अपनी असल विचारधारा से अलग हो गया. देखा जाये तो वर्तमान में नक्सलवाद सरकार के सामानांतर एक सत्ता स्थापित करने की मानसिकता से काम कर रहा है. अब इसका उद्देश्य किसी भी रूप में आदिवासियों को उनके अधिकारों को दिलवाना, अपने वन-जंगलों-संसाधनों पर अपना आधिपत्य बनाये रखना मात्र नहीं रह गया है. अब उनके द्वारा आदिवासियों की आड़ लेकर राजनैतिक संरक्षण प्राप्त किया जा रहा है जो कहीं न कहीं उन्हें सत्ता के करीब लाता है. सत्ता के करीब पहुँचने की इसी स्थिति का दुष्परिणाम ये है कि आज नक्सलवाद भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है. देश के 180 जिलों यानि कि भारतीय भूगोल का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा नक्सलवादियों के कब्जे में है जो लगभग 92 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है. यह देश के 10 राज्यों-उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश आदि तक फैला हुआ है. इसी इलाके को आज रेड कॉरिडोर के नाम से जाना जाता है. एक अनुमान के अनुसार लगभग 30 हजार सशस्त्र नक्सली वर्तमान में इसी विचारधारा से काम कर रहे हैं. 


नक्सलवादियों द्वारा प्रतिवर्ष सैकड़ों, हजारों की संख्या में लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता है. कई बार पुलिस मुखबिरी करने के शक में वे आदिवासी भी शामिल होते हैं, जिनके अधिकारों के लिए लड़ने की बात नक्सली करते हैं. सबसे आश्चर्यजनक बात ये है कि एक तरफ कॉरपोरेट घरानों द्वारा आदिवासियों की सम्पदा को लूटने की बात की जाती है दूसरी तरफ पूरी चर्चा में कहीं भी आदिवासी दिखाई नहीं देते हैं. ऐसे में यदि सरकार को किसी तरह का हल निकालना है तो बातचीत के मोड़ पर नक्सलियों के साथ-साथ उन आदिवासियों को भी शामिल करना होगा, जिनके अधिकारों का हनन हो रहा है.

विगत कुछ वर्षों की घटनाओं को देखने में साफ तौर पर समझ आ रहा है कि नक्सलियों द्वारा अपने प्रभाव को, शक्ति को, राजनैतिक संरक्षण को धन-उगाही के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है. उनके द्वारा सम्बंधित क्षेत्र में विकास-कार्यों को बाधित करना उनका मुख्य उद्देश्य बन गया है. वे किसी भी रूप में नहीं चाहते हैं कि क्षेत्र का विकास हो और आदिवासियों में राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल होने की मंशा जन्म ले. वे समूचे क्षेत्र और व्यक्तियों को अपनी हथियारों की सत्ता के अधीन रखना चाहते हैं. ऐसे में यदि बातचीत एक रास्ता है तो सैन्य कार्यवाही भी एक रास्ता है. सैन्य कार्यवाही के जवाब में एक तर्क हमेशा आता है कि इसमें निर्दोष नागरिक मारे जायेंगे. इसके जवाब में बस एक ही सवाल कि क्या नक्सली हमलों में अभी तक निर्दोष नहीं मारे गए? ‘गेंहू के साथ घुन भी पिसता है’ की बात को दिमाग में रखते हुए सरकार एक तरफ सैन्य कार्यवाही की छूट देनी चाहिए साथ ही स्थानीय नागरिकों के साथ तालमेल बैठाते हुए उनका समर्थन हासिल करना चाहिए क्योंकि जब तक स्थानीय नागरिकों का समर्थन नक्सलियों के साथ है (चाहे स्वेच्छा से अथवा डर से) तब तक समस्त नक्सलियों को समाप्त करना संभव नहीं. इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकारों के मध्य संबंधों को और बेहतर बनाये जाने की आवश्यकता है. केंद्र द्वारा भेजे गए सुरक्षा बलों व स्थानीय पुलिस के बीच बेहतर तालमेल बनाये जाने की जरूरत है. नक्सलियों से निपटने के लिए सरकार को अपनी रणनीति में बदलाव करने होंगे. सोचना होगा कि आखिर संसाधनों के नाम पर, विकास के नाम पर जंगलों को, वनों को, पहाड़ों को समाप्त कर देने से वहाँ से विस्थापित आदिवासी जायेंगे कहाँ? यदि उसके द्वारा आदिवासियों के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाना सुनिश्चित है तो उसके द्वारा आदिवासियों को उससे विस्थापित करने की बजाय उन्हें मालिकाना अधिकार देना होगा.

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि आदिवासी क्षेत्रों से चुने गए जनप्रतिनिधियों को इन आदिवासियों के साथ समन्वय स्थापित करना चाहिए. सत्यता यही कि नक्सलवाद का अंतिम समाधान सिर्फ हिंसा नहीं है क्योंकि नक्सलवाद अब एक विचारधारा के रूप में काम कर रहा है. इसमें राजनैतिक लोगों का सरकार के, सेना के, सुरक्षाबलों के समर्थन में आना होगा. आदिवासियों एवं आदिवासी क्षेत्रों के चहुंमुखी विकास की बात करनी होगी. यही नक्सलवाद के निराकरण के लिए रामबाण अचूक औषधि है.

नक्सली हमले में शहीद वीर जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए आज की बुलेटिन आपके समक्ष.

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बुधवार, 26 अप्रैल 2017

97वीं पुण्यतिथि - श्रीनिवास अयंगर रामानुजन और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
श्रीनिवास रामानुजन
श्रीनिवास अयंगर रामानुजन
श्रीनिवास अयंगर रामानुजन् (अंग्रेज़ी: Srinivasa Aiyangar Ramanujan, तमिल: ஸ்ரீனிவாஸ ராமானுஜன் ஐயங்கார், जन्म: 22 दिसम्बर, 1887 – मृत्यु: 26 अप्रैल, 1920) एक महान भारतीय गणितज्ञ थे। इन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है। इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए। इन्होंने अपने प्रतिभा और लगन से न केवल गणित के क्षेत्र में अद्भुत अविष्कार किए वरन भारत को अतुलनीय गौरव भी प्रदान किया। गणित के क्षेत्र में अपने समय के अनेक दिग्गजों को पीछे छोड़ने वाले श्रीनिवास रामानुजन ने केवल 32 साल के जीवनकाल में पूरी दुनिया को गणित के अनेक सूत्र और सिद्धांत दिए। गणित के क्षेत्र में रामानुजन किसी भी प्रकार से गौस, यूलर और आर्किमिडीज से कम न थे। किसी भी तरह की औपचारिक शिक्षा न लेने के बावजूद रामानुजन ने उच्च गणित के क्षेत्र में ऐसी विलक्षण खोजें कीं कि इस क्षेत्र में उनका नाम अमर हो गया। इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए। इन्होंने खुद से गणित सीखा और अपने जीवनभर में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके हैं। इन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारम्परिक परिणाम निकाले जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहा है, यद्यपि इनकी कुछ खोजों को गणित मुख्यधारा में अब तक नहीं अपनाया गया है। उनके सूत्र कई वैज्ञानिक खोजों में मददगार बने। हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल-विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है। इनके कार्य से प्रभावित गणित के क्षेत्रों में हो रहे काम के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना की गई है।




आज विश्व पटल पर भारत का नाम ऊँचा करने वाले महान गणितज्ञ श्रीनिवास अयंगर रामानुजन जी के 97वीं पुण्यतिथि पर सारा देश उनके अतुल्यनीय योगदान को याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है। सादर।।  


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ...अभिनन्दन।।  

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

दुर्गम रास्तों से होकर ही कुछ सीधे रास्ते मिलते हैं ...




काँटों में उलझ
लहूलुहान
गलत -सही बनकर
जब मैं आखिरी पायदान पर
संतुलित होकर खड़ी हो गई
तो अपनी गलतियाँ भी सार्थक लगी हैं !

कोई भी मंज़िल
बहारों से होकर नहीं गुजरती
कीचड़ अधिक मिलते हैं !
निःसंदेह,
कीचड़ शुक्रगुज़ार नहीं होते
पर,
मैं उनकी शुक्रगुज़ार हूँ
क्योंकि उनकी नियतों से वाकिफ होते हुए
मैंने बहुत कुछ जाना
कई विषम पड़ाव पार किये !

दुर्गम रास्तों से होकर ही
कुछ सीधे रास्ते मिलते हैं  ...
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यहाँ पढ़िए क्रमशः राकेश पाठक की रचनाएँ 

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

सुकमा नक्सली हमला और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
छत्तीसगढ़ में CRPF पर बड़ा हमला; 26 जवान शहीद, हमलावरों में 70% महिला नक्सली
नई दिल्ली : छत्तीसगढ़ के सुकमा में सोमवार को नक्सलियों ने सीआरपीएफ जवानों पर हमला कर दिया. इस हमले में सीआरपीएफ के 26 जवान शहीद हो गए. घात लगाकर हुए हमले में जवानों को संभलने का मौका नहीं मिला. रिपोर्टों के मुताबिक करीब 300 नक्सलियों ने सीआरपीएफ पर हमला किया. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इन 300 नक्सलियों में करीब 70 प्रतिशत महिलाएं शामिल थीं. जबकि 6 जवान लापता हैं. नक्सलियों ने दोपहर करीब 12.30 बजे घात लगाकर सीआरपीएफ जवानों पर हमला किया.

मिली जानकारी के मुताबिक चिंतागुफा के पास बुर्कापाल में नक्सलियों ने रोड ओपनिंग पार्टी पर घात लगाकर हमला किया. सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन रोड ओपनिंग के लिए निकली थी. इसी दौरान घात लगाकर बैठे नक्सलियों ने जवानों पर फायरिंग कर दी. अन्य जवानों ने भी फायरिंग कर नक्सलियों को जवाब दिया. लंबे समय तक दोनों ओर से फायरिंग चलती रही. इस दौरान कई जवान गंभीर रुप से घायल हो गए जिन्हें अस्पताल ले जाया गया. 
गौर हो कि सुकमा नक्सलियों का गढ़ है और यहां नक्सलियों की सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमले की कई वारदातें हुई है जिसमें कई जवानों को शहीद होना पड़ा है. इसी साल 11 मार्च को नक्सलियों ने घात लगाकर सुरक्षा बलों पर हमला किया था जिसमें सेना के 12 जवान शहीद हो गए थे. इसके पहले 10 मार्च को नक्सलियों ने सुकमा में मुखबिर होने के संदेह में एक सरपंच की हत्या कर दी थी. नक्सल प्रभावित सुकमा इलाके में आए दिन नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच मुठभेड़ होती रहती है.

आज हम सब सुकमा नक्सली हमले में शहीद हुए अपने वीर जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और घायल जवानों के जल्द स्वस्थ होने की कामना करते है। सादर। जय हिन्द। जय भारत।। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~   













आज की बुलेटिन में अब तक के लिए इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए जय हिन्द। जय भारत। वंदे  मातरम्। 

रविवार, 23 अप्रैल 2017

उम्मीद




रोज नई उम्मीदों के पानी से
खुद को मथती हूँ
आग जलाकर
 खुद को आकार देकर
तवे पर रखती हूँ
पलटती हूँ
जरा सा ध्यान भटका
जल जाती हूँ
झल्लाते हुए झाड़ती हूँ
...
भूख किसी तरह मिटाकर 
अगले दिन की बेहतरी की उम्मीद लिए 
सो जाती हूँ  ... 


मृग्‍ाया...... - रूप-अरूप - blogger


रोज मरते हैं रोशनी के लिए
अंधेरों की हमको फिक्र है कहाँ ?
फूलों की बात तो हर जुबाँ पर है
टहनी के उगे काँटों का जिक्र है कहाँ ?
पल-पल और घना हो रहा है सूनापन
खुश्क हवाओं के थपेड़ों से रीतापन.
मुर्दा जिस्मों की आवाज एक आहट है
बिना सुने कब से पहरा देता है मन.
सांस एक फन्दा है,जिंदगी का गला है
बीते पल मुजरिम हैं,कैसा अजीब फैसला है.
रात की इस कहानी में, हिज्र है कहाँ,
 रोज मरते हैं रोशनी के लिए
अंधेरों की हमको फिक्र है कहाँ ? 

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

विश्व पृथ्वी दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
विश्व पृथ्वी दिवस के लिए चित्र परिणाम
पृथ्वी दिवस (अंग्रेज़ी:Earth Day) पूरे विश्व में 22 अप्रॅल को मनाया जाता है। पृथ्वी दिवस को पहली बार सन् 1970 में मनाया गया था। इसका उद्देश्य लोगों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाना था। पृथ्वी पर अक्सर उत्तरी ध्रुव की ठोस बर्फ़ का कई किलोमीटर तक पिघलना, सूर्य की पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी तक आने से रोकने वाली ओज़ोन परत में छेद होना, भयंकर तूफ़ान, सुनामी और भी कई प्राकृतिक आपदाओं का होना, जो भी हो रहा है इन सबके लिए मनुष्य ही ज़िम्मेदार हैं। ग्लोबल वार्मिग के रूप में जो आज हमारे सामने हैं। ये आपदाएँ पृथ्वी पर ऐसे ही होती रहीं तो वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी से जीव-जन्तु व वनस्पति का अस्तिव ही समाप्त हो जाएगा। जीव-जन्तु अंधे हो जाएंगे। लोगों की त्वचा झुलसने लगेगी और कैंसर रोगियों की संख्या बढ़ जाएगी। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से तटवर्ती इलाके चपेट में आ जाएंगे।



अब चलते हैं आज कि बुलेटिन की ओर .....







शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

ट्वीट से उठा लाउडस्पीकर-अज़ान विवाद : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार दोस्तो,
लोग एक बार फिर मुद्दे से भटक कर उसे धर्म, मजहब की चौखट पर खींच लाये. यदि आपने गौर किया होगा तो आप एकदम सही जगह पहुँच रहे हैं. जी हाँ. गायक सोनू निगम के चार ट्वीट और फिर उसके बाद उठा विवाद. उस विवाद के बाद का विवाद तो और भी हास्यास्पद रहा जबकि फतवे के नाम पर दोनों तरफ से अपने-अपने कदम देखने को मिले. एक ने सिर घोंट देने के दस लाख लगाये और अगले ने अपना सिर मुडवा लिया. बहरहाल, मुद्दा ये नहीं कि किसका फतवा? किसके लिए फतवा? सोनू निगम ने ट्वीट के द्वारा अपनी परेशानी बताई या फिर अपनी लोकप्रियता की राह को और साफ़ किया ये वही जानें किन्तु उससे एक मुद्दा निकला कि धार्मिक कृत्यों में लाउडस्पीकर का इस्तेमाल हो या न हो. जो लोग भी अपने-अपने स्तर में इस चर्चा में सहभागी बने वे इससे भटक कर हिन्दू, मुस्लिम में विभक्त हो गए.

देखा जाये तो विगत कुछ वर्षों से समाज दो भागों में बंट गया है. एक हिन्दू और दूसरा गैर-हिन्दू. यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ. सोनू निगम के चार ट्वीट में यदि पहले ट्वीट में अजान शब्द आया है तो तीसरे शब्द में मंदिर, गुरुद्वारा शब्दों का भी प्रयोग किया गया है. इसके बाद भी बवाल पैदा करने में अज़ान-प्रेमी ही सामने आये हैं. इसमें मुस्लिम और गैर-मुस्लिम दोनों तरफ के लोग हैं. वैसे सोचने की बात बस इतनी है कि आखिर मुस्लिम समुदाय को इस पर आपत्ति क्या है कि उनकी मजहबी क्रिया में लाउडस्पीकर का उपयोग न होने का ट्वीट आ गया? कहीं उनको ये तो नहीं लग रहा कि ट्वीट के बहाने सरकार उनकी मजहबी क्रिया में उपयोग होने वाले लाउडस्पीकर को प्रतिबंधित तो करने जा रही है?

बहरहाल अंतिम निष्कर्ष क्या होगा ये तो बाद की बात है मगर एक सामान्य से ट्वीट पर आक्रोशित हो जाना, फतवा जारी करना, सोनू निगम पर मुकदमा दर्ज करने की अपील, धार्मिक भावनाओं को भड़काने का आरोप लगाने जैसे कदम मुस्लिम समुदाय की आक्रामकता को ही दर्शाता है. यही आक्रामकता उनको समुदाय में सबसे कहीं अलग-थलग खड़ा कर देती है. अपने आपको मुख्यधारा से अलग न होने देने की दिशा में वे खुद ही कुछ सोचें और विचार करें. उन्हें समझना होगा कि समाज-निर्माण में फैसले लेने का आधार न तो ट्वीट होता है और न ही लाउडस्पीकर. आपसी समझ, विश्वास, स्नेह ही सबको आगे बढ़ाता है, सबकी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करता है.

चलिए, जो हो रहा है उसका आनंद लीजिये, जो होगा उसका आनंद लीजियेगा. हल फ़िलहाल अभी तो सोनू निगम के चारों ट्वीट का अवलोकन करते हुए आज की बुलेटिन का आनंद लीजिये. 







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गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

काम की बात - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज ज्यादा बातचीत न करते हुये सीधे सीधे आप को एक काम की बात बताता हूँ ...

आप किसी की भी 'तारीफ' कर सकते हैं, लेकिन बेइज़्जती' नाप-तौल कर करनी चाहिये, क्योंकि . . ये वो उधार है, जो हर कोई 'सूद' समेत वापस करता है!

तो ज़रा ख़्याल रखिएगा |

सादर आपका

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चुटकी भर प्यार

राक्षस धर्म और संस्कृति

प्यार किया उनसे तो यह रिश्ता है निभाना

{३४०} नज़रों से दरकिनार मत करना

पान मसाला छोड़ने के १५ साल बाद भी...

अवध बनाम लखनऊ

आस्तिक देश के नास्तिक लोग...

अचारी पनीर बनाने की विध‍ि

असहमति में बसते हैं लोकतन्त्र के प्राण

अंगूठा

यूँ ही तुम्हारे साथ इक सफर याद आ गया...!!!

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

अंजू बॉबी जॉर्ज और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
अंजू बॉबी जॉर्ज
अंजू बॉबी जॉर्ज (अंग्रेज़ी: Anju Bobby George) भारत की प्रसिद्ध एथलीट हैं। अंजू ने सितम्बर 2003, पेरिस में हुए वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनसिप लंबी कूद में कांस्य पदक जीत कर भारत को पहली बार विश्वस्तर की प्रतियोगिता में पुरस्कार दिलाया था। अंजू बी. जॉर्ज वर्ष 2003 में 25 वर्ष की उम्र में विश्व एथलेटिक्स में भारत की प्रथम पदक विजेता बनी। एक नज़रिये से देखा जाए तो अंजू का प्रदर्शन भारतीय एथलेटिक्स को नई दिशा देने की पहल है। इससे पहले भारत का नाम एथलेटिक्स में जरा-सी चूक के लिये जाना जाता था। 2004 में अंजू बॉबी जॉर्ज को 'राजीव गाँधी खेल रत्न' सम्मान प्रदान किया गया।

अंजू का जन्म 19 अप्रैल, 1977 दक्षिण मध्य केरल के कोट्टायम ज़िले के छोटे से कस्बा चीरनचीरा में हुआ। वह बचपन में सेंट एनी गर्ल्स स्कूल चंगी ताचेरी में पढ़ती थी। इन्होंने पाँच वर्ष की उम्र में एथलेटिक्स स्पर्धाओं में भाग लेना शुरू कर दिया था। इनकी माँ ग्रेसी तथा पिता के. टी. मार्कोस ने अपनी बेटी के एथलेटिक्स की दिशा में बढ़ते कदमों में रुचि लेकर उसे आगे बढ़ाने के लिये प्रोत्साहित किया। इनके पिता का फर्नीचर का व्यवसाय है। अंजू के स्कूल ने उसके लिए कूद थ्रो और दौड़ने के लिए अलग से कार्यक्रम बनाकर उसे अभ्यास के लिए पर्याप्त मौका दिया। इसके बाद अंजू सी. के. केश्वरन स्मारक हाई स्कूल कोरूथोडू चली गईं। वहाँ सर थॉमस ने उसकी कला को चमकाया और तब अंजू ने स्कूल को लगातार 13वें साल ओवरऑल खिताब दिलाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। यहाँ अंजू ने ऊँची कूद, लम्बी कूद, 100 मी. दौड़ और हैप्थलॉन आदि सभी खेलों की प्रैक्टिस की। अंजू की आदर्श पी. टी. उषा थीं।



आज अंजू बॉबी जॉर्ज जी के 40वें जन्मदिन पर हम सब उन्हें जन्मदिन की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ देते हैं । सादर।। 


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर.......











विश्वविध्यालय बोले तो ? तेरे को क्या पड़ी है रे ‘उलूक’


आज की बुलेटिन में सिर्फ इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

आज़ादी के परवानों को समर्पित १८ अप्रैल

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज १८ अप्रैल है ... आज भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के एक प्रमुख सेनानायक तात्या टोपे का १५८ वां महाबलिदान दिवस है |
रामचंद्र पाण्डुरग राव यवलकर (तात्या टोपे) १८१८ – १८ अप्रैल १८५९
तात्या टोपे भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के एक प्रमुख सेनानायक थे। सन १८५७ के महान विद्रोह में उनकी भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण, प्रेरणादायक और बेजोड़ थी। तात्या का जन्म महाराष्ट्र में नासिक के निकट पटौदा जिले के येवला नामक गाँव में एक देशस्थ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता पाण्डुरंग राव भट्ट़ (मावलेकर), पेशवा बाजीराव द्वितीय के घरू कर्मचारियों में से थे। बाजीराव के प्रति स्वामिभक्त होने के कारण वे बाजीराव के साथ सन् १८१८ में बिठूर चले गये थे। तात्या का वास्तविक नाम रामचंद्र पाण्डुरग राव था, परंतु लोग स्नेह से उन्हें तात्या के नाम से पुकारते थे। तात्या का जन्म सन् १८१४ माना जाता है। अपने आठ भाई-बहनों में तात्या सबसे बडे थे।
सन् सत्तावन के विद्रोह की शुरुआत १० मई को मेरठ से हुई। जल्दी ही क्रांति की चिन्गारी समूचे उत्तर भारत में फैल गयी। विदेशी सत्ता का खूनी पंजा मोडने के लिए भारतीय जनता ने जबरदस्त संघर्श किया। उसने अपने खून से त्याग और बलिदान की अमर गाथा लिखी। उस रक्तरंजित और गौरवशाली इतिहास के मंच से झाँसी की रानीलक्ष्मीबाई, नाना साहब पेशवा, राव साहब, बहादुरशाह जफर आदि के विदा हो जाने के बाद करीब एक साल बाद तक तात्या विद्रोहियों की कमान संभाले रहे।

नरवर का राजा मानसिंह अंग्रेजों से मिल गया और उसकी गद्दारी के कारण तात्या ८ अप्रैल, १८५९ को सोते में पकड लिए गये। रणबाँकुरे तात्या को कोई जागते हुए नहीं पकड सका। विद्रोह और अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लडने के आरोप में १५ अप्रैल, १८५९ को शिवपुरी में तात्या का कोर्ट मार्शल किया गया। कोर्ट मार्शल के सब सदस्य अंग्रेज थे। परिणाम जाहिर था, उन्हें मौत की सजा दी गयी। शिवपुरी के किले में उन्हें तीन दिन बंद रखा गया। १८ अप्रैल को शाम पाँच बजे तात्या को अंग्रेज कंपनी की सुरक्षा में बाहर लाया गया और हजारों लोगों की उपस्थिति में खुले मैदान में फाँसी पर लटका दिया गया। कहते हैं तात्या फाँसी के चबूतरे पर दृढ कदमों से ऊपर चढे और फाँसी के फंदे में स्वयं अपना गला डाल दिया। इस प्रकार तात्या मध्यप्रदेश की मिट्टी का अंग बन गये। कर्नल मालेसन ने सन् १८५७ के विद्रोह का इतिहास लिखा है। उन्होंने कहा कि तात्या टोपे चम्बल, नर्मदा और पार्वती की घाटियों के निवासियों के ’हीरो‘ बन गये हैं। सच तो ये है कि तात्या सारे भारत के ’हीरो‘ बन गये हैं। पर्सी क्रास नामक एक अंग्रेज ने लिखा है कि ’भारतीय विद्रोह में तात्या सबसे प्रखर मस्तिश्क के नेता थे। उनकी तरह कुछ और लोग होते तो अंग्रेजों के हाथ से भारत छीना जा सकता था।

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आज से ठीक ८ साल पहले ... आज़ादी के दीवानों ने अमर क्रांतिकारी सूर्य सेन 'मास्टर दा' के कुशल नेतृत्व मे क्रांति की ज्वाला को प्रज्वलित किया था जिस इतिहास मे आज "चंटगाव विद्रोह" के नाम से जाना जाता है |  
 
चटगांव विद्रोह

इंडियन रिपब्लिकन आर्मी की स्थापना और चटगाँव शाखा के अध्यक्ष चुने जाने के बाद मास्टर दा अर्थात सूर्यसेन ने काउंसिल की बैठक की जो कि लगभग पाँच घंटे तक चली तथा उसमे निम्नलिखित कार्यक्रम बना-
  • अचानक शस्त्रागार पर अधिकार करना।
  • हथियारों से लैस होना।
  • रेल्वे की संपर्क व्यवस्था को नष्ट करना।
  • अभ्यांतरित टेलीफोन बंद करना।
  • टेलीग्राफ के तार काटना।
  • बंदूकों की दूकान पर कब्जा।
  • यूरोपियनों की सामूहिक हत्या करना।
  • अस्थायी क्रांतिकारी सरकार की स्थापना करना।
  • इसके बाद शहर पर कब्जा कर वहीं से लड़ाई के मोर्चे बनाना तथा मौत को गले लगाना।
मास्टर दा ने संघर्ष के लिए १८ अप्रैल १९३० के दिन को निश्चित किया। आयरलैंड की आज़ादी की लड़ाई के इतिहास में ईस्टर विद्रोह का दिन भी था- १८ अप्रैल, शुक्रवार- गुडफ्राइडे। रात के आठ बजे। शुक्रवार। १८ अप्रैल १९३०। चटगाँव के सीने पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध सशस्त्र युवा-क्रांति की आग लहक उठी।
चटगाँव क्रांति में मास्टर दा का नेतृत्व अपरिहार्य था। मास्टर दा के क्रांतिकारी चरित्र वैशिष्ट्य के अनुसार उन्होंने जवान क्रांतिकारियों को प्रभावित करने के लिए झूठ का आश्रय न लेकर साफ़ तौर पर बताया था कि वे एक पिस्तौल भी उन्हें नहीं दे पाएँगे और उन्होंने एक भी स्वदेशी डकैती नहीं की थी। आडंबरहीन और निर्भीक नेतृत्व के प्रतीक थे मास्टर दा। क्रांति की ज्वाला के चलते हुकूमत के नुमाइंदे भाग गए और चटगांव में कुछ दिन के लिए अंग्रेजी शासन का अंत हो गया।
 
 
वन्दे मातरम !! 
सादर आपका
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नई उम्मीदों की आहट है- “खिड़कियों से….

उसने कहा था

एक खाली जगह की बात (अमृता प्रीतम )

अनिच्छा

यहाँ बिना लड़े नहीं मिलता जीने का अधिकार

विशाल जलराशि के बीच स्टीमर में सफ़ारी : सुंदरबन यात्रा

लघुत्तम नवविचारः धर्म भावनात्मक विषय नहीं

पत्थरबाजों का समर्थन करने से बाज आएं नेता

डर के साये में : लघुकथा

नंगा किसान, पिटता जवान, कैसे कहूं मेरा देश महान।

उम्मीद

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!