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बुधवार, 30 सितंबर 2015

जन्म दिवस - ऋषिकेश मुखर्जी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को सादर नमस्कार। 
जन्म दिवस - ऋषिकेश मुखर्जी
30 सितम्बर, सन् 1922 को कोलकाता में ऋषिकेश मुखर्जी जी का जन्म हुआ था। ऋषिकेश दा हिन्दी फिल्मों के महान फिल्मकारों में भी शामिल किए जाते है। हिन्दी फिल्मों में उन्होंने अपनी करियर की शुरुआत बतौर निर्देशक सहायक के रूप में 1951 में फिल्म 'दो बीघा जमीन' से प्रसिद्ध निर्देशक बिमल राय के मार्गदर्शन में की थी। उनके साथ छह साल तक काम करने के बाद उन्होंने 1957 में 'मुसाफिर' फ़िल्म से अपने निर्देशन के करियर की शुरुआत की। इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन तो नहीं किया लेकिन राजकपूर को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने अपनी अगली फ़िल्म 'अनाड़ी' (1959) उनके साथ बनाई। ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म निर्माण की प्रतिभा का लोहा समीक्षकों ने उनकी दूसरी फ़िल्म 'अनाड़ी' से ही मान लिया था। यह फ़िल्म राजकपूर के सधे हुए अभिनय और मुखर्जी के कसे हुए निर्देशन के कारण अपने दौर में काफ़ी लोकप्रिय हुई। इसके बाद मुखर्जी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा, उन्होंने 'अनुराधा', 'आनंद', 'गुड्डी', 'अनुपमा', 'नमक हराम', 'अभिमान', 'आशीर्वाद', 'सत्यकाम' और 'चुपके चुपके' जैसी बेहतरीन फ़िल्मों का भी निर्देशन किया। ऋषिकेश मुखर्जी ने चार दशक के अपने फ़िल्मी जीवन में हमेशा कुछ नया करने का प्रयास किया। ऋषिकेश मुखर्जी की अंतिम फ़िल्म 1998 की 'झूठ बोले कौआ काटे' थी। उन्होंने टेलीविजन के लिए तलाश, हम हिंदुस्तानी, धूप छांव, रिश्ते और उजाले की ओर जैसे धारावाहिक भी बनाए थे। ऋषिकेश मुखर्जी जी का निधन 27 अगस्त, सन् 2006 को मुंबई में हो गया।  


आज ऋषिकेश मुखर्जी जी के 93वें जन्म दिवस पर हम सब उन्हें याद करते हुए श्रद्धापूर्वक श्रद्धांजलि अर्पित करते है।    



अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर  .........















आज की बुलेटिन में सिर्फ इतना ही। कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर  … अभिनन्दन।।

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

थोड़ी बातें थोड़ा मौन ज़रूरी है …




किसी भी रिश्ते में
आपसी समझ के लिए  
निरंतर बातचीत की ज़रूरत नहीं होती 
एक मौन 
एक विराम 
हर रिश्ते की मजबूती के लिए ज़रूरी है  … 
न मौन अधिक 
न शब्द अधिक 
अधिकता हानिकारक होती है !
बातों के प्रवाह में 
संभव है अनचाहा कह देना 
मौन की अधिकता में 
मुमकिन है कुछ कहने से रह जाना 
आपसी समझ के लिए 
थोड़ी बातें 
थोड़ा मौन ज़रूरी है  … 



सोमवार, 28 सितंबर 2015

युवाओं की धार को मिले विचारों की सान - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज २८ सितंबर है ... आज शहीद ए आज़म सरदार भगत सिंह जी की १०८ वीं जयंती है |

"अहिंसा को आत्म-बल के सिद्धांत का समर्थन प्राप्त है जिसमे अंतत: प्रतिद्वंदी पर जीत की आशा में कष्ट सहा जाता है . लेकिन तब क्या हो जब ये प्रयास अपना लक्ष्य प्राप्त करने में असफल हो जाएं ? तभी हमें आत्म -बल को शारीरिक बल से जोड़ने की ज़रुरत पड़ती है ताकि हम अत्याचारी और क्रूर दुश्मन के रहमोकरम पर ना निर्भर करें ."

- शहीद ऐ आज़म सरदार भगत सिंह जी


ब्लॉग बुलेटिन टीम और पूरे हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से शहीद ऐ आज़म सरदार भगत सिंह जी की १०८ वीं जयंती पर उन्हें शत शत नमन ।

इंक़लाब जिंदाबाद ।।
सादर आपका
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शाहिदे आजम सरदार भगत सिंह

भगतसिंह आज भी भारत की जनता के मार्गदर्शक हैं - शैलेन्द्र चौहान

हर औरंगजेब को अब मिटा देंगे

डिजिटल इंडिया

वर्ल्ड रेबीज डे ...

अब पोस्टमैन बनने के लिए बीटेक छात्र भी होड़ में

मौतों पर रहस्य क्यों?

मेरे दिल आज ये बता दे

मशीन से आदमी

दास्तानें

बाबा रे बाबा

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कितना भी तेज़ हथियार हो ... उसकी धार बनाए रखने के लिए एक न एक 'सान' चाहिए ही चाहिए ... ऐसी ही एक 'सान' Anubhav Priya जी हम सब के लिए लाये है ... हमारे मन के लिए ... हमारे विचारों के लिए ... क्यों कि इंसानी दिल ओ दिमाग से बड़ा कोई अस्त्र शस्त्र नहीं ... देखिये और अपने दिल ओ दिमाग की धार तेज़ कर लीजिये ... आज के दिन इस से उम्दा श्रद्धांजलि शहीद ए आज़म सरदार भगत सिंह जी को दी नहीं जा सकती जब आज के युवा उनको इस शिद्दत से याद करें |

शाबाश ... अनुभव शाबाश ...चलता रहे यह इंकलाब ...

इंकलाब ज़िंदाबाद !!


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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!! 

रविवार, 27 सितंबर 2015

महान समाज सुधारक राजा राम मोहन राय - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज २७ सितंबर है ... आज भारत के महान समाज सुधारक राजा राम मोहन राय जी  की १८२ वीं पुण्यतिथि है |
राजा राममोहन राय (जन्म: 22 मई, 1772 - मृत्यु: 27 सितम्बर, 1833) को 'आधुनिक भारतीय समाज' का जन्मदाता कहा जाता है। वे ब्रह्म समाज के संस्थापक, भारतीय भाषायी प्रेस के प्रवर्तक, जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता तथा बंगाल में नव-जागरण युग के पितामह थे। धार्मिक और सामाजिक विकास के क्षेत्र में राजा राममोहन राय का नाम सबसे अग्रणी है। राजा राम मोहन राय ने तत्कालीन भारतीय समाज की कट्टरता, रूढ़िवादिता एवं अंध विश्वासों को दूर करके उसे आधुनिक बनाने का प्रयास किया।

सादर आपका
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'बौरा'

अर्चना तिवारी at पंखुड़ियाँ 
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अब आज्ञा दीजिये ...
 
जय हिन्द !!! 

शनिवार, 26 सितंबर 2015

आए हाए तेरी अंग्रेजी - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज एक लतीफ़ा मिला व्हाट्सअप पर ... सो आप सब से सांझा कर रहा हूँ |

एक हरियाणवी छोरा अपनी गर्लफ्रेंड ने 5 स्टार होटल मे रोटी खवान लेग्या।

छोरा वेटर ने बला के बोल्या, "Sir, With due respect, I beg to say that I am ill so I can not come to school. Kindly grant me Tea for 2 please."

वेटर के कुछ खास समझ नी आया पर फेर बी ओ 2 ग्लास चा ले आया...

गर्लफ्रेंड: आए हाए तेरी अंग्रेजी!

छोरा: बस ईतने में ए मेरी फेन होगी, जे तनै मेरा पानी वास्ते "Thirsty Crow" अर रोटियां खातर "Greedy Dog" सून लिया नी तू तो जमा ऐ बावली हो जै गी!

आशा है लतीफ़ा आप सब को पसंद आया होगा |

सादर आपका
शिवम् मिश्रा

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अपने मोबाइल को बनाएँ अपना हिंदी ओसीआर

मरे रि‍श्‍ते...

भारत में हिन्दू है सबसे गरीब

भ्रष्टाचार के देवता:एक आईएएस का सेवाकाल संस्मरण

प्रकाश स्तम्भ

ज्ञानार्जन

सीहोर के सिध्द चिंतामन गणेश

पूर्व की काशी भुवनेश्वर और छेना गाजा - कलिंग यात्रा

कौन जाए जौक, ये दिल्ली की गलियाँ छोड़कर !

हार्दिकी..

जहां भारतीयों का प्रवेश निषेद्ध है, एक कड़वी सच्चाई

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

सूरज भी तुम्हारे हिस्से में है




एक तीली तुम जलाना 
एक तीली मैं 
अँधेरा कट जायेगा 
एक कदम तुम नापना 
एक कदम मैं 
बीहड़ रास्ता छोटा हो जायेगा 
अँधेरे में एक बात याद रखना 
सूरज भी तुम्हारे हिस्से में है 
मेरे हिस्से भी 
कुछ आग तुम बटोरना 
कुछ मैं 
पूरा दिन मुट्ठी में होगा ही होगा 


गुरुवार, 24 सितंबर 2015

भाव-बोध (ब्लॉग बुलेटिन)

नमस्कार मित्रो,
आज बहुत कुछ लिखने का मन नहीं हुआ. आज से ठीक पाँच वर्ष पूर्व लिखी कविता याद आ रही है. २५ सितम्बर २०१० को लिखी कविता आपके सामने, आज की बुलेटिन के साथ.
आशा है कि आपको कविता और बुलेटिन मन भाएगी.

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मैं
भाव-बोध में
यूं अकेला चलता गया,
एक दरिया
साथ मेरे
आत्म-बोध का बहता गया।

रास्तों के मोड़ पर
चाहा नहीं रुकना कभी,
वो सामने आकर
मेरे सफर को
यूं ही बाधित करता गया।

सोचता हूं
कौन...कब...कैसे....
ये शब्द नहीं
अपने अस्तित्व की
प्रतिच्छाया लगे,
जिसकी अंधियारी पकड़ से
मैं किस कदर बचता गया।

भागता मैं,
दौड़ता मैं,
बस यूं ही कुछ
सोचता मैं,
छोड़कर पीछे समय को
फिर समय का इंतजार,
बचने की कोशिश में सदा
फिर-फिर यूं ही घिरता गया।

भाव-बोध गहरा गया,
चीखते सन्नाटे मिले,
आत्म-बोध की संगीति का
दामन पकड़ चलते रहे,
छोड़कर पीछे कहीं
अपने को,
अपने आपसे,
खुद को पाने के लिए
मैं
कदम-कदम बढ़ता गया।

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बुधवार, 23 सितंबर 2015

रामधारी सिंह 'दिनकर' और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।।
रामधारी सिंह 'दिनकर'
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक, कवि एवं निबंधकार हैं। राष्ट्रकवि दिनकर आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं। रामधारी सिंह 'दिनकर' का जन्म 23 सितम्बर, 1908 ई. में बिहार राज्य के मुँगेर जिले के सिमरिया नामक गाँव में हुआ था। "रेणुका", "हुंकार", "रसवन्ती", "सामधेनी", "कुरुक्षेत्र", "रश्मिरथी", "उर्वशी", "परशुराम की प्रतिज्ञा" आदि इनके काव्य संग्रह है। "अर्द्धनारीश्वर", "वट-पीपल", "उजली आग", "संस्कृति के चार अध्याय" (निबन्ध) , "मिट्टी की ओर", "काव्य की भूमिका", "देश-विदेश" (यात्रा) आदि इनकी गद्य रचनाएँ है। सन् 1959 ई. में भारत सरकार ने इन्हें "पद्मभूषण" की उपाधि से सम्मानित किया तथा सन् 1962 ई. में भागलपुर विश्वविद्यालय ने इन्हें डी. लिट्. की मानद उपाधि से सम्मानित किया। दिनकर जी को इनके सुप्रसिद्ध काव्य संग्रह "उर्वशी" के लिए सन् 1972 ई. में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। दिनकर जी की असामयिक मृत्यु  24 अप्रैल, सन् 1974 ई. में हुई थी। 


आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की 107वीं जयंती पर  पूरा हिंदी ब्लॉगजगत और हमारी ब्लॉग बुलेटिन टीम उनको स्मरण करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करती है। सादर।।


अब चलते हैं आज की बुलेटिन  की ओर ….













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे। तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर  … अभिनन्दन।। 

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

खिड़कियों को भी जागने दो




मन के दरवाजों को खुला रखो, खिड़कियों को भी जागने दो
एहसास बिना किसी पते के घूमते हैं, उनको बेफिक्र आने दो  … 


प्रिय कवि...
नहीं होती एक कोई, रचना सर्वोत्तम...
नहीं ही होता सर्वश्रेष्ठ कोई एक कवि...
तुम मुझे प्रिय हो कवि...
समूचे के समूचे, जैसे कि तुम हो...
अपने विषय, विश्लेषण, विवेचना मे...
प्रबोधक-प्रहार, प्रपंच-परिक्रमा मे...
... द्वंद, संताप, पश्ताचाप, प्रार्थना मे...
निश्चित रहो कवि...
तुम्हारे शब्दों से पहले...
मैं समझ सकता हूँ, तुम्हें...
... आखर-आखर धुएँ मे...
अभिव्यक्ति तुम्हारी...
विलीन होती हुयी...
अपेक्षाओं के नभ मे...
और 'होम' होते हुए तुम...
शब्द-शब्द संज्ञान मे...
सच कहता हूँ, कवि...
शब्द केवल, सिहरा सकते हैं...
... मर्म, समवेदनाएँ, सहानुभूति...
क्षणभंगुरता के पार...
शब्द फिर-फिर इन्द्रजाल हैं...
... कलम कि नोंक पर सतत सवाल हैं...
तुम मुझे प्रिय हो कवि...
जो मुझसे ही तो हो तुम...
आतुर, आशंकित, आकुल...
अविराम, व्यथित, व्याकुल...
शांत, स्थिर, तृप्त, मृदुल...
एक ही समय मे...
साधु, शैतान, सब्र, और संकीर्णता से...
निबटते हुए, निजता से, कुशलता से...
अपने भीतर के सब किवाड़ धकेल कर...
... बाहर, मुझ सा ही तो, निकल आते हो...
प्रयास का सम्मान बड़ा होता है...
तुम शब्दों से कितना ही गहरा...
कोहरा, भेद दो, रचो कालजयी...
... मुझे तुम्हारा तुम्हारे भीतर से...
उबर आने का प्रयास प्रिय है...
मुझे प्रिय हूँ मैं, और...
'तुम' मुझे प्रिय हो कवि... ... ... !!

अनुशील: जीवन-मृत्यु!



Ruchi Bhalla

देखना है अपने मिलखे का गाँव........
गाँव देखने से पहले मुझे ढूँढना है
एक वो ऊँचा पहाड़ी टीला
जहाँ से खड़े होने पर
मेरे और उस गाँव के बीच में
कोई कँटीला तार न आ सके.......

सोमवार, 21 सितंबर 2015

दिल,दिमाग और आप - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज का ज्ञान :-
 जो आपसे दिल से बात करता हो;उसे कभी दिमाग से जवाब मत देना।

सादर आपका
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बाल कथा

सुधाकल्प at बालकुंज 

टैक्सीवाले भाईजान

योग्य चपरासी और अयोग्य अध्यापक

HARSHVARDHAN TRIPATHI at बतंगड़ BATANGAD

टीप टीप

तलाश जारी है

sadhana vaid at Sudhinama

497. मगज का वो हिस्सा...

डॉ. जेन्नी शबनम at लम्हों का सफ़र

फेसबुक पन्‍ने पर एक लाइक लगाकर सपोर्ट अवश्‍य करें ...

मेरी परलोक-चर्चाएँ... (२)

आनन्द वर्धन ओझा at मुक्ताकाश...

यही है सैनिक धर्म मेरा...

उड़न परी

अर्चना तिवारी at पंखुड़ियाँ

गोपी गीत का माधुर्य

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अब आज्ञा दीजिये ... 

जय हिन्द !!!

रविवार, 20 सितंबर 2015

पागलों की पहचान - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

एक पागलखाने में एक पत्रकार ने डॉक्टर से प्रश्न किया। "आप कैसे पहचानते हैं कि, कौन पागल है और कौन नहीं?"

डॉक्टर: हम एक बाथटब पानी से पूरा भर देते हैं और मरीज को एक चम्मच, एक गिलास और एक बाल्टी देकर कहते हैं कि वो बाथटब को खाली करे।

पत्रकार: अरे वाह, बहुत बढ़िया। यानि जो नार्मल व्यक्ति होता होगा वो बाल्टी का उपयोग करता होगा क्योंकि वो चम्मच और गिलास से बड़ी होती है।

डॉक्टर: जी नहीं। नार्मल व्यक्ति बाथटब में लगे हुए ड्रेन प्लग को खींच कर टब को खाली करता है। आप 39 नंबर के बैड पर जाइए ताकि हम आप की पूरी जाँच कर सकें।

अगर आप ने भी बाल्टी ही सोचा था तो कृपया बैड नंबर 40 पर जाइए।

सादर आपका
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" अपनी बीबी की तारीफ ......."

यादों के झरोखों से....

सकारात्मक सोच से आसान होगा जीवन

कल्पना

अनंग गंध

पुरानी कब्रें

कदी-कदी एवंई ख्याल आंदा ए :

बस सच सामने आना चाहिए.....

वेज मोमोज बनाने की विधि

चल रही है जिंदगी..!!

kitchen Tips- भाग  5

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

शनिवार, 19 सितंबर 2015

पंत की बेटी स्व सरस्वती प्रसाद को तर्पण अर्पण




वक़्त भागता दिखाई देता है, लेकिन वक़्त के असंख्य पैरों में से कितने पाँव रुके होते हैं - गौर तो किया ही होगा 
मेरे वक़्त के पाँव भी कहीं कहीं थम गए हैं, जिसमें है अम्मा की पुकार, अम्मा का ठुनकना,  … अम्मा जैसी पत्नी,अम्मा जैसी छात्रा,अम्मा जैसी पंत की बेटी हो जाना, अम्मा जैसी अम्मा, सबकी ज़ुबान पर 20 वर्ष की उम्र से 'अम्मा' सम्बोधन बन जाना,अम्मा जैसी नानी-दादी  … बिरले ही कोई हो सकता है। 
भाई-बहनों से अधिक अम्मा से होती थी बहस 
क्योंकि कमज़ोर की ढाल होती थी अम्मा 
और हम सब उस ढाल को गिराने की पुरज़ोर कोशिश करते  … 
लेकिन क्या हम सचमुच गिराना चाहते थे ढाल ?
नहीं, 
ढाल गिरते हमारी ज़िद टूट जाती 
और मुस्कुराकर हम खुद ढाल बन जाते थे :)
"जाने दो" के मूलमंत्र की अनेकों पुड़िया अम्मा ने बनाई 
हर सुबह घरेलु उपचार की तरह 
उसे हमारी जिह्वा पर रख दिया 
और लड़ते झगड़ते हम "जाने दो" का 
कई माला जाप करते हैं 
हमारे बच्चे भी इस जाप से अछूते नहीं !
सारा रोष हमारा आपस में है 
"क्यूँ कहा"
"क्यूँ नहीं कहा ?"

आज उनकी यानी अम्मा की पुण्यतिथि है, अपनी अपनी जगह से सबने यादों के फूल चढ़ाये हैं, यहाँ हम भी वृद्धाश्रम गए, मालविका का भजन उनके लिए अश्रुपूरित आनन्द बना, फल,मिठाई हमने प्रसाद के तौर पर दिया।  यूँ प्रतीत हो रहा था कि चारों ओर अम्मा खड़ी हैं  … 

आज उनसे संबंधित लिंक्सऔरउनकी भावनाओं से उन्हें तर्पण अर्पण करते हैं 


शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

आयकर और एनआरआई ... ब्लॉग बुलेटिन

विदेश में बसे हुए पंछी को रह रह कर देश की याद सताती है, उससे इतर वह देश के लिए क्या करता है वह ज्यादा जरूरी है। यहाँ कई लोग ऐसे मिलते हैं जो टैक्स छुपाने और बचाने के लिए न जाने क्या क्या हथकंडे अपनाते हैं। मैंने कल दो लोगों को समझाया और उनका टैक्स फाईल करवाया। अच्छा लगा कि देश के खाते में सवा लाख रुपए गए और काला पैसा बचा। मित्रों विदेश में बसे भारतीयों के लिए टैक्स के नियम और लचीले होने चाहिए, निवेश भी आसान चाहिए और संपर्क बने रखने के लिए ई-गवर्नेंस का एक एन आर आई डिपार्टमेंट चाहिए ताकि लोग टैक्स फाईलिंग आराम से करें और देश के विकास में भागीदार बनें। एक समस्या जो मुझे दिखी वह थी दसियों साल से बसे लोगों के पास जानकारी का अभाव। ऑनलाईन के बारे में व्यापारी वर्ग अनभिज्ञ है, सो निश्चित ही यह एक बडी बात है। इसके लिए प्रचार की जरुरत है। विदेश मंत्रालय विदेश में बसे भारतीयों को वालंटेयरली टैक्स मित्र बनने को कहे और यह जानकारी नेट पर दे दे। कोई भी व्यक्ति या कोई डिफाल्टर यदि पुराना बकाया जमा करना चाहे तो वह आराम से अपने टैक्स मित्र से संपर्क कर लें और अपना पर्सनल टैक्स खाता बनाए रख सके। यह जानकारी हम उन देशों से साझा कर सकते हैं जिनके साथ हमारी ड्यूल टैक्स पर संधि है। वाकई यह एक क्रांतिकारी कदम होगा और लोग आराम से अपना आयकर भरेंगे। 

वैसे मामला पैसे से जुडा होने के कारण कई लोग बचना चाहते हैं और यही काले धन का एक बडा भाग है। मैने तो सवा लाख का काला धन बचा कर अपनी जिम्मेदारी का एक भाग निभा दिया, आप भी जब मौका मिले कीजीए अच्छा लगेगा।

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अब चलते है आज़ की बुलेटिन की ओर ...

भाई कोई खबर नहीं है खबर गई हुई है

टीचर फटीचर( पार्ट - 1 )

मायाजाल

चाइनीज शॉट (यूनान -१)

'दो रुपए का नोट'

जरूरी तो नहीं

श्री गणेश जन्मोत्सव

अमर क्रान्तिकारी - मदनलाल ढींगरा जी की १३२ वीं जयंती

संघ को बदनाम करने से बाज आए कांग्रेस

धार्मिक अनुष्ठान से स्वास्थ्य रक्षा

भारत में अपनी मातृभाषा हिंदी क्या सदैव ऐच्छिक ही बनी रहने को अभिशप्त है?