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रविवार, 23 जून 2019

अमर शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जी की ११८ वीं जयंती - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी
राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी (अंग्रेजी:Rajendra Nath Lahiri, बाँग्ला:রাজেন্দ্র নাথ লাহিড়ী, जन्म:२३ जून १९०१ - मृत्यु:१७ दिसम्बर १९२७) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण स्वतंत्रता सेनानी थे। युवा क्रान्तिकारी लाहिड़ी की प्रसिद्धि काकोरी काण्ड के एक प्रमुख अभियुक्त के रूप में हैं।
संक्षिप्त जीवनी
बंगाल (आज का बांग्लादेश) में पबना जिले के अन्तर्गत मड़याँ (मोहनपुर) गाँव में २३ जून १९०१ के दिन क्षिति मोहन लाहिड़ी के घर राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी का जन्म हुआ। उनकी माता का नाम बसन्त कुमारी था। उनके जन्म के समय पिता क्रान्तिकारी क्षिति मोहन लाहिड़ी व बड़े भाई बंगाल में चल रही अनुशीलन दल की गुप्त गतिविधियों में योगदान देने के आरोप में कारावास की सलाखों के पीछे कैद थे। दिल में राष्ट्र-प्रेम की चिन्गारी लेकर मात्र नौ वर्ष की आयु में ही वे बंगाल से अपने मामा के घर वाराणसी पहुँचे। वाराणसी में ही उनकी शिक्षा दीक्षा सम्पन्न हुई। काकोरी काण्ड के दौरान लाहिड़ी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में इतिहास विषय में एम० ए० (प्रथम वर्ष) के छात्र थे। १७ दिसम्बर १९२७ को गोण्डा के जिला कारागार में अपने साथियों से दो दिन पहले उन्हें फाँसी दे दी गयी। राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को देश-प्रेम और निर्भीकता की भावना विरासत में मिली थी। राजेन्द्रनाथ काशी की धार्मिक नगरी में पढाई करने गये थे किन्तु संयोगवश वहाँ पहले से ही निवास कर रहे सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी शचींद्रनाथ सान्याल के सम्पर्क में आ गये। राजेन्द्र की फौलादी दृढ़ता, देश-प्रेम और आजादी के प्रति दीवानगी के गुणों को पहचान कर शचीन दा ने उन्हें अपने साथ रखकर बनारस से निकलने वाली पत्रिका बंग वाणी के सम्पादन का दायित्व तो दिया ही, अनुशीलन समिति की वाराणसी शाखा के सशस्त्र विभाग का प्रभार भी सौंप दिया। उनकी कार्य कुशलता को देखते हुए उन्हें हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन की गुप्त बैठकों में आमन्त्रित भी किया जाने लगा।
काकोरी काण्ड
फाँसी की फन्दा और लाहिड़ी का अन्तिम सन्देश
क्रान्तिकारियों द्वारा चलाये जा रहे स्वतन्त्रता-आन्दोलन को गति देने के लिये धन की तत्काल व्यवस्था को देखते हुए शाहजहाँपुर में दल के सामरिक विभाग के प्रमुख पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल' के निवास पर हुई बैठक में राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी भी सम्मिलित हुए जिसमें सभी क्रान्तिकारियों ने एकमत से अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना को अन्तिम रूप दिया था। इस योजना में लाहिड़ी का अहम किरदार था क्योंकि उन्होंने ही अशफाक उल्ला खाँ के ट्रेन न लूटने के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप अशफाक ने अपना प्रस्ताव वापस ले लिया था।
इस योजना को अंजाम देने के लिये लाहिड़ी ने काकोरी से ट्रेन छूटते ही जंज़ीर खींच कर उसे रोक लिया और ९ अगस्त १९२५ की शाम सहारनपुर से चलकर लखनऊ पहुँचने वाली आठ डाउन ट्रेन पर क्रान्तिकारी पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने अशफाक उल्ला खाँ और चन्द्रशेखर आजाद व ६ अन्य सहयोगियों की मदद से धावा बोल दिया। कुल १० नवयुवकों ने मिलकर ट्रेन में जा रहा सरकारी खजाना लूट लिया। मजे की बात यह कि उसी ट्रेन में सफर कर रहे अंग्रेज सैनिकों तक की हिम्मत न हुई कि वे मुकाबला करने को आगे आते।
काकोरी काण्ड के बाद बिस्मिल ने लाहिड़ी को बम बनाने का प्रशिक्षण लेने बंगाल भेज दिया। राजेन्द्र बाबू कलकत्ता गये और वहाँ से कुछ दूर स्थित दक्षिणेश्वर में उन्होंने बम बनाने का सामान इकट्ठा किया। अभी वे पूरी तरह से प्रशिक्षित भी न हो पाये थे कि किसी साथी की असावधानी से एक बम फट गया और बम का धमाका सुनकर पुलिस आ गयी। कुल ९ साथियों के साथ राजेन्द्र भी गिरफ्तार हो गये। उन पर मुकदमा दायर किया और१० वर्ष की सजा हुई जो अपील करने पर ५ वर्ष कर दी गयी। बाद में ब्रिटिश राज ने दल के सभी प्रमुख क्रान्तिकारियों पर काकोरी काण्ड के नाम से मुकदमा दायर करते हुए सभी पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने तथा खजाना लूटने का न केवल आरोप लगाया बल्कि झूठी गवाहियाँ व मनगढ़न्त प्रमाण पेश कर उसे सही साबित भी कर दिखाया। राजेन्द्र लाहिड़ी को काकोरी काण्ड में शामिल करने के लिये बंगाल से लखनऊ लाया गया।
तमाम अपीलों व दलीलों के बावजूद सरकार टस से मस न हुई और अन्तत: राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल,अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह- एक साथ चार व्यक्तियों को फाँसी की सजा सुना दी गयी। लाहिड़ी को अन्य क्रान्तिकारियों से दो दिन पूर्व १७ दिसम्बर को ही फाँसी दे दी गयी।
आजादी के इस दीवाने ने हँसते-हँसते फाँसी का फन्दा चूमने से पहले वंदे मातरम् की हुंकार भरते हुए कहा था- "मैं मर नहीं रहा हूँ, बल्कि स्वतन्त्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ।"
 
ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से अमर शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जी उनकी ११८ वीं जयंती पर शत शत नमन |
 
सादर आपका 
 
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"स्नेह का रुतबा"

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कभी अलविदा ना कहना तुम

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अब आज्ञा दीजिए ...

जय हिन्द !!!

14 टिप्‍पणियां:

  1. अमर स्वतंत्रता सेनानी बाबू राजेन्द्र लाहिड़ी जी के जीवन चरित को साझा करने के लिए विशेष आभार।

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  2. हमारे अमर स्वतंत्रता सेनानी राजेन्द्र लाहिड़ी जी के जीवन चरित्र की जानकारी को साझा करने के लिए बहुत बहुत आभार ऐसे सपूत को शत शत नमन |
    बेहतरीन रचना एक ही मंच पर पढ़वाने के लिए तहे दिल से आभार सभी एक से बढ़ के एक रचनाएँ
    मुझे स्थान देने के लिए आभार
    सादर

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  3. बुलंद थी इतनी जिनकी हस्ती , वो लोग जाने कौन थे?
    मिट गए जो शान से, अहले वतन के वास्ते:
    रह अडिग जो भिड गए हर तूफान से
    सर बांध के कपडा जो फिरते थे कफ़न के वास्ते!!!
    माँ भारती के वीर सपूत और आजादी की लडाई के सेनानी राजेन्द्र लाहिड़ी जी को कोटि नमन | सभी सार्थक सूत्रों से सजे इस अंक में अपनी रचना पाकर बहुत ख़ुशी हुई | सादर आभार शिवम् जी | सभी पाठकों को नमन जिन्होंने आपके लिंक के माध्यम से मेरी रचना को पढ़ा | सादर -

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  4. स्वतंत्रता सेनानी राजेन्द्र लाहिड़ी जी को शत-शत नमन, श्रद्धांजलि !

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  5. शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जी को शत शत नमन!!
    इस प्रस्तुति के लिए साधुवाद!

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  6. उम्दा संकलन लिंक्स का |मेरी रचना की लिंक शामिल करने के लिए धन्यवाद

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  7. मेरी रचना को ब्लॉग बुलेटिन में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, शिवम जी।
    अमर शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जी उनकी ११८ वीं जयंती पर शत शत नमन |

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  8. सुन्दर लिंक्स. मेरी कविता शामिल करने के लिए शुक्रिया.

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  9. अमर शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जी को उनकी ११८ वीं जयंती पर शत-शत नमन
    हार्दिक आभार आपका
    शानदार संकलन

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  10. संकलित सभी लिंक्स पढ़े.
    तुम्हारा परिश्रम सार्थक है.

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  11. राजेंद्र लाहिड़ी जी को शत शत नमन। रोचक लिंक्स से सुसज्ज्ति बुलेटिन। आभार।

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  12. राजेन्द्र जी को नमन
    सार्थक संयोजन
    मुझे सम्मिलित करने का आभार
    सादर

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  13. अमर शहीद को नमन. 'फ़िल्टर कॉफ़ी' को शामिल करने के लिए आभार !

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