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रविवार, 16 जून 2019

पितृ दिवस की शुभकामनाएं




माँ को आँगन बनाते हुए,
हर कमरे का फर्श बनाते हुए,
ईश्वर ने पिता की मजबूत दीवारें खड़ी कीं,,
दहलीज बनाया,
माँ को नम,
पिता को सुरक्षा स्तम्भ बनाया ।
ऐसा करते हुए,
उसने न पुरुष को ज्यादा बनाया
ना स्त्री को कम ।
धरती बनी माँ की क्षमता अद्भुत,
तो आकाशीय विस्तार देनेवाले पिता का गौरव अविस्मरणीय ।
कहीं धरती अकेली हो जाये,
कहीं आकाश...
इससे सत्य नहीं बदलता,
न ईश्वर का चयन गलत होता है !
और समय का यह चयन भी
अपना अस्तित्व रखता है,
धरती-आकाश को
एकसाथ बनने का 
स्वर्णिम अवसर देता है 
माँ और पिता को पर्णकुटी बना देता है । 

पितृ दिवस की शुभकामनाएं 

पिता को समर्पित --------क्षणिकाएॉं
याद आता है
गिने थे अनगिन तारे
गोदी में बैठे तुम्हारे
हर रात ढूँढा ध्रुव तारा
तुम्हारी तर्जनी के सहारे
तुमसे ही जाने थे
दिशाओं के नाम
फूलों के रंग, पर्वत,पहाड़
नदियाँ,सागर देश गुमनाम
पास थी तुम्हारे
जादू की छड़ी
जो हल कर देती थी
प्रश्न सारे।
याद आता है
पिता का चश्मा
जिसे लगाने की
कितनी ज़िद्द थी मेरी
और तुम
केवल मुस्कुरा के कहते
अभी उम्र नहीं है तेरी---
अब रोज़ लगाती हूँ
और ---
लगता है
आप पास हो आप
यहीं कहीं
बस चश्मा थोड़ा
धुंधला है |
याद आता है
हर शाम पिता से अधिक
उनके झोले की प्रतीक्षा करना
उसी में से पूरे होते थे
सारे सपने, मनोकामना
तुमने कभी नहीं दुखाया
बालमन
उसमें थी निधि स्नेह की
त्याग का अपरिमित धन।
कथनी से करनी बड़ी
तुम्हारी सीख,
है धरोहर
पीढ़ी दर पीढ़ी
दीप स्तम्भ सी
पथ प्रदर्शक।
मैंने ना छुआ आकाश कभी
और ना मापी सागर की गहराई
ना कभी समेटी बरगद की छाया
ना देखी हिमालय की ऊँचाई
मैंने तो बस अपने पिता में
इन सब को समाहित होते देखा है।


महज़ दो दिन हुए हैं पिता से मिलकर लौटी हूँ ।
उन्होंने गिलहरियों से बचा कर रखा था, लीची के पेड़ में लगे मीठे रसीले लीचियों को मेरी ख़ातिर .....
बंगालियों के घर जब भी बेटी आती है तो रसोई में पकाई जाती है मछली ....पिता ने मां को ख़ास हिदायत देकर बनवा रखी थी ... मेरी मनपसंद फिश करी ....
मेरे खाने के एक एक निवाले पर उनकी मुस्कान बस देखते ही बनती थी ....
पिता ! कहते हैं अब बहुत ही कम ....
समझने की कोशिश करते हैं चीज़ों को पहले से ज़्यादा ....
बच्चों का कलरव उन्हें अब भाने लगा है ख़ूब !
धीमी रौशनी वाले बेतरतीब फ़ैले अपने कमरे में बनाते हैं सुध बुध खो कर असंख्य चित्र ....
रंगों का समावेश अब तलक उनके मिज़ाज का परिचायक बना हुआ है ।
पिता ! अनाम ही लिखते रहते हैं अनंत कविताएं ....
जैसे कि , सृजन उनके लिए प्राणवायु हो ....
अपनी आत्मा में बुनते हैं कोई निराला संगीत ! स्वरलहरियों को छेड़ते हैं अपनी मध्यम आवाज़ में ....फ़िर करने लगते हैं अनर्गल अपने बचपन की बातें ....
भोजन स्वादिष्ट चाहिए आज भी उन्हें किंतु किंचित मात्र से भर लेते हैं अपना पेट ...
पिता ! मीठे के शौक़ीन हैं , मना करने पर भी मानते नहीं ....बीमारियों से डर नहीं लगता उन्हें , जीवन के संत्रासों को झेलकर बन चुके हैं - लौहपुरुष !
पिता ! बोलते बतियाते समय पढ़ते हैं ग़ौर से मेरे चेहरे के हर एक भाव को ...फ़िर तपाक से पूछ बैठते हैं कि - ये निशान कैसे पड़ गए ....पहले तो नहीं देखा कभी ...जैसे बच्चे टटोलते हैं न अपने ही खिलौने , दूसरे किसी को देकर ...ठीक वैसी ही जिज्ञासु भरी भंगिमाओं से भरकर वो पूछते हैं- मेरे चेहरे , हाथ या पांव के किसी भी चोट के विषय में .....और अक़्सर वज़ह पता चलते ही , दुलार से भरते देखा है उनको .....
हरियाली का संवर्धन पिता की दैनिक दिनचर्या का हिस्सा है । वो जहां कहीं भी रहें , पौधे लगाना और पौधों की देखरेख करना कभी नहीं भूलते ... जैसे उन्होंने कसम खा रखी हो हरियाली में ही अपनी ख़ुशहाली ढूढ़ने की ...
सांस्कृतिक गतिविधियों में , घर और बाहर के मांगलिक कार्यों में या की सामाजिक अनुष्ठानों में, सम्पूर्ण प्रभुता के साथ आज भी सक्रिय रहते देखा है मैंने पिता को.......
बहरहाल , इस तरह मेरे पिता ने बचा रखा है जीवन जीने का ख़ुद का फ़लसफ़ा ....जो देता है - बल , ऊर्जा और उल्लास मुझे .....अच्छे सेहत की दुआ के साथ विश्व भर के समस्त पिताओं को ख़ूब सारा प्यार - दुलार और ढेर सारी शुभकामनाएं ......
पिता हैं - तो हर मुश्क़िल आसान है !

4 टिप्‍पणियां:

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