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गुरुवार, 31 मई 2018

३१ मई २०१८ - विश्व तम्बाकू निषेध दिवस - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज ३१ मई है ... आज के दिन को विश्व तम्बाकू निषेध दिवस के रूप में मनाया जाता है| विश्व धूम्रपान निषेध दिवस अथवा 'विश्व तम्बाकू निषेध दिवस' अथवा 'अंतर्राष्ट्रीय तंबाकू निषेध दिवस' प्रत्येक वर्ष 31 मई को मनाया जाता है। तम्बाकू से होने वाले नुक़सान को देखते हुए साल 1987 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सदस्य देशों ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसके द्वारा 7 अप्रैल, 1988 से इस दिवस को मनाने का फ़ैसला किया गया। इसके बाद हर 31 मई को तम्बाकू निषेध दिवस मनाने का फ़ैसला किया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्य देशों ने 31 मई का दिन निर्धारित करके धूम्रपान के सेवन से होने वाली हानियों और ख़तरों से विश्व जनमत को अवगत कराके इसके उत्पाद एवं सेवन को कम करने की दिशा में आधारभूत कार्यवाही करने का प्रयास किया है।

भारत में विभिन्न कार्यक्रम

इस दिन विभिन्न कार्यक्रम कर लोगों को तम्बाकू से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नुक़सान के बारे में बताया जाता है। हालांकि भारत में भी सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर पाबंदी है, लेकिन लचर क़ानून व्यवस्था के चलते इस पर कोई अमल नहीं हो पा रहा है। लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करते हुए देखा जा सकता है। भारत में आर्थिक मामलों की संसदीय समिति पहले ही राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम को मंज़ूरी दे चुकी है। इसका मक़सद तम्बाकू नियंत्रण क़ानून के प्रभावी क्रियान्वयन और तम्बाकू के हानिकारक प्रभावों के बारे में लोगों तक जागरूकता फैलाना है। इसके लिए 11वीं योजना में कुल वित्तीय परिव्यय 182 करोड़ रुपये रखा गया है। इस कार्यक्रम में सम्पूर्ण देश शामिल है, जबकि शुरुआती चरण में 21 राज्यों के 42 ज़िलों पर ध्यान केन्द्रित किए गए हैं। 

भारत में 10 अरब सिगरेट का उत्पादन होता है। भारत में 72 करोड़ 50 लाख किलो तम्बाकू की पैदावार होती है। भारत तम्बाकू निर्यात के मामले में ब्राज़ील, चीन, अमरीका, मलावी और इटली के बाद छठे स्थान पर है। आंकड़ों के मुताबिक़ तम्बाकू से लगभग सालाना 2022 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा की आय होती है । विकासशील देशों में हर साल 8 हज़ार बच्चों की मौत अभिभावकों द्वारा किए जाने वाले धूम्रपान के कारण होती है। दुनिया के किसी अन्य देश के मुक़ाबले में भारत में तम्बाकू से होने वाली बीमारियों से मरने वाले लोगों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। तम्बाकू पर आयोजित विश्व सम्मेलन और अन्य अनुमानों के मुताबिक़ भारत में तम्बाकू सेवन करने वालों की तादाद क़रीब साढ़े 29 करोड़ तक हो सकती है।

सादर आपका
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आसमान उठा रखा है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

जिन्दगी की कश्मकश से रू-ब-रू कराती कवितायें

कंकाल रूपी आदमियत

एक बस्तरिहा गीत और झपताल

मेरी नई, अद्यतित प्राइवेसी पॉलिसी

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग दर्शन

इंडस वैली - जांस्‍कर-सिन्धु संगम

मैं इश्क हूँ मैं अमृता हूँ

हिटलर और फ़ासीवाद का नया उभार

बेटी

विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर एक लघु कथा

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

बुधवार, 30 मई 2018

हिंदी पत्रकारिता दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को सादर नमस्कार।
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हिंदी पत्रकारिता दिवस (अंग्रेज़ी: Hindi Journalism Day) प्रतिवर्ष 30 मई को मनाया जाता है। इसी तिथि को पंडित युगुल किशोर शुक्ल ने 1826 ई. में प्रथम हिन्दी समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' का प्रकाशन आरम्भ किया था। भारत में पत्रकारिता की शुरुआत पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने ही की थी। हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत बंगाल से हुई थी, जिसका श्रेय राजा राममोहन राय को दिया जाता है। आज के समय में समाचार पत्र एक बहुत बड़ा व्यवसाय बन चुका है। मीडिया ने आज सारे विश्व में अपनी एक ख़ास पहचान बना ली है।

हिन्दी पत्रकारिता ने एक लम्बा सफर तय किया है। जब पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने 'उदन्त मार्तण्ड' को रूप दिया, तब किसी ने भी यह कल्पना नहीं की थी कि हिन्दी पत्रकारिता इतना लम्बा सफर तय करेगी। जुगल किशोर शुक्ल ने काफ़ी दिनों तक 'उदन्त मार्तण्ड' को चलाया और पत्रकारिता करते रहे। लेकिन आगे के दिनों में 'उदन्त मार्तण्ड' को बन्द करना पड़ा था। यह इसलिए बंद हुआ, क्योंकि पंडित जुगल किशोर के पास उसे चलाने के लिए पर्याप्त धन नहीं था। वर्तमान में बहुत-से लोग पत्रकारिता के क्षेत्र में पैसा लगा रहे हैं। यह एक बड़ा कारोबार बन गया है, जो हिंदी का 'क ख ग' भी नहीं जानते, वे हिंदी में आ रहे हैं। 192 वर्षों में हिंदी अखबारों एवं समाचार पत्रकारिता के क्षेत्र में काफ़ी तेजी आई है। साक्षरता बढ़ी है। पंचायत स्तर पर राजनीतिक चेतना बढ़ी है। इसके साथ ही साथ विज्ञापन भी बढ़े हैं। हिंदी के पाठक अपने अखबारों को पूरा समर्थन देते हैं। महंगा, कम पन्ने वाला और खराब काग़ज़ वाला अखबार भी वे ख़रीदते हैं। अंग्रेज़ी अखबार बेहतर काग़ज़ पर ज़्यादा पन्ने वाला और कम दाम का होता है। यह उसके कारोबारी मॉडल के कारण है।



~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 

वह आदमी जो ब्रह्मांड को जानता था











आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

मंगलवार, 29 मई 2018

अदृश्य मुखाग्नि को कोई नहीं देख पाता




किसी भी आवेश में 
कुछ भी कहने से 
खुद को रोको !
वह क्रोध हो,
प्रेम हो,
घृणा हो,
या ईर्ष्या ...
उस वक़्त हर शब्द चिंगारी होते हैं ,
जला देते हैं वो कितने एहसास ...
हाँ,हाँ प्रेम की चिंगारी भी !
क्योंकि, कहे हुए शब्द संचित हो जाते हैं 
मस्तिष्क में,
दिल में,
पूरे शरीर में फैलते जाते हैं 
एकांत की सोच पर फन फैलाकर 
आग उगलते हैं !
आकस्मिक मृत्यु की एक वजह 
यह चिंगारी भी होती है
अदृश्य मुखाग्नि को कोई नहीं देख पाता
लेकिन, वह उसी शब्द की होती है
जो आवेश में कह सुनाई गई होती है ! 


ठिकाना : बेटियों का समुद्र मंथन

चौथे बरस के जश्न तले चुनावी बरस में बढ़ते कदम

सबद विशेष : 21 : गीत चतुर्वेदी की चार नई कविताएँ

मेरी संवेदना : मैं सलाम करता हूँ उन बच्चों को ...

 - شفا کجگاونوی : 05/28/18

शिफ़ा कजगाँवी

रजनीश का ब्लॉग: घड़ी की टिक-टिक

प्रतिरोध, शोर और जुलूस | प्रतिभा की दुनिया ...

http://ushascreation.blogspot.in/2018/05/blog-post_29.html



स्टोरी मिरर पर प्रोत्साहित व पुरस्कृत हुई ये रचना ....
मैं थी, मैं हूँ, मैं रहूँगी !!!!
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जिन्‍दगी को बेखौफ़ होकर जीने का
अपना ही मजा है
कुछ लोग मेरा अस्तित्‍व खत्‍म कर
भले ही यह कहने की मंशा मन में पाले हुये हों
कभी थी, कभी रही होगी, कभी रहना चाहती थी नारी
उनसे मैं पूरे बुलन्‍द हौसलों के साथ
कहना चाहती हूँ, मैं थी, मैं हूँ, मैं रहूँगी ...
न्‍याय की अदालत में गीता की तरह
जिसकी शपथ लेकर लड़ी जाती है हर लड़ाई
सत्‍य की, जहाँ हर पराजय को विजय में बदला जाता है
गीता धर्म की अमूल्‍य निधि है जैसे वैसे ही
मेरा अस्तित्‍व नदियों में गंगा है
मर्यादित आचरण में आज भी मुझे
सीता की उपमा से सम्‍मानित किया जाता है
धीरता में मुझे सावित्री भी कहा है
तो हर आलोचना से परे वो मैं ही थी जो
शक्ति का रूप कहलाई दुर्गा के अवतार में
मुझे परखा गया जब भी कसौटियों पर
हर बार तप कर कुंदन हुई मैं
फिर भी मेरा कुंदन होना
किसी को रास नहीं आता
हर बार वही कांट-छांट
वही परख मेरी हर बार की जाती
मैं जलकर भस्‍म होती
तो औषधि बन जाती
यही है मेरे अस्तित्‍व की
जिजीविषा जो खुद मिटकर भी
औरों को जीवनदान देती है, देती रहेगी !!!
मैं पूरे बुलन्‍द हौसलों के साथ फिर से
कहना चाहती हूँ, मैं थी, मैं हूँ, मैं रहूँगी ....

सोमवार, 28 मई 2018

अमर क्रांतिकारियों की जयंती और पुण्यतिथि समेटे आया २८ मई

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज २८ मई है ... आज के दिन बेहद खास है ... आज का दिन जुड़ा हुआ दो दो अमर क्रांतिकारियों से ... एक की आज १३५ वीं जयंती है तो एक की ८८ वीं पुण्यतिथि |


विनायक दामोदर सावरकर (अंग्रेजी: Vinayak Damodar Savarkar, जन्म: २८ मई १८८३ - मृत्यु: २६ फरवरी १९६६) भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के अग्रिम पंक्ति के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। उन्हें प्रायः वीर सावरकर के नाम से सम्बोधित किया जाता है। हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा (हिन्दुत्व) को विकसित करने का बहुत बडा श्रेय सावरकर को जाता है। वे न केवल स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे अपितु महान क्रान्तिकारी, चिन्तक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता भी थे। वे एक ऐसे इतिहासकार भी हैं जिन्होंने हिन्दू राष्ट्र की विजय के इतिहास को प्रामाणिक ढँग से लिपिबद्ध किया है। उन्होंने १८५७ के प्रथम स्वातंत्र्य समर का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिखकर ब्रिटिश शासन को हिला कर रख दिया था।

भगवती चरण वोहरा (4 जुलाई, 1904 - 28 मई, 1930)) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी थे। वे हिन्दुस्तान प्रजातांत्रिक सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य और सरदार भगत सिंह के साथ ही एक प्रमुख सिद्धांतकार होते हुए भी गिरफ्तार नही किए जा सके और न ही वे फांसी पर चढ़े। उनकी मृत्यु बम परिक्षण के दौरान दुर्घटना में हुई। भगवती चरण की शिक्षा-दीक्षा लाहौर में हुई। उनका विवाह भी कम उम्र में कर दिया गया। पत्नी का नाम दुर्गा था। बाद के दौर में उनकी पत्नी भी क्रांतिकारी कार्यो की सक्रिय सहयोगी बनी। उन को क्रान्तिकारियो द्वारा दिया गया " दुर्गा भाभी " सन्बोधन एक आम सन्बोधन बन गया।

ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से आज हम सब इन दोनों क्रांतिकारियों को शत शत नमन करते है !

इंकलाब ज़िंदाबाद !!!

सादर आपका

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क्या मधुपुर बेतहाशा भागने से पहले थोड़ा सोचेगा?












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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

शनिवार, 26 मई 2018

बुन्देलखण्ड की प्रतिभाओं को मंच देगा फिल्म समारोह : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
बुन्देलखण्ड सदैव से अनेकानेक रत्नों से सुशोभित रहा है. शौर्य, सम्मान, कला, संस्कृति, साहित्य, सामाजिकता आदि में यहाँ विलक्षणता देखने को मिलती आई है. यहाँ के निवासी अपने-अपने स्तर पर बुन्देलखण्ड की संस्कृति को उत्कर्ष पर ले जाने का कार्य करते रहते हैं. इसी कड़ी में बुन्देलखण्ड निवासी फिल्म अभिनेता राजा बुन्देला उनकी पत्नी सुष्मिता मुखर्जी (जो फ़िल्मी दुनिया का जाना-पहचाना नाम है) द्वारा ओरछा में इस वर्ष, 2018 में भारतीय फिल्म समारोह का आयोजन किया गया. पाँच दिवसीय यह आयोजन 18 मई से लेकर 22 मई तक चला. राजा बुन्देला फिल्मों की दृष्टि से जाना-पहचाना नाम है और उनकी एक विशेषता यह भी है कि मुम्बई में रहने के बाद भी वे बराबर, नियमित रूप से बुन्देलखण्ड से सम्पर्क बनाये हुए हैं. बुन्देलखण्ड राज्य की माँग में भी उनकी आवाज़ सुनाई देती है.


बुन्देलखण्ड की उस पावन धरा में, जहाँ श्रीराम राजा रूप में विराजमान हैं, भारतीय फिल्म समारोह का आयोजन अपने आपमें सुखद एहसास जगाता है. ओरछा में राजा बुन्देला द्वारा स्थापित, संस्कारित रुद्राणी कलाग्राम में पाँच दिवसीय फिल्म समारोह का आयोजन निश्चित ही बुन्देलखण्ड की उन प्रतिभाओं को एक मंच दिया, जो स्व-प्रोत्साहन, स्व-संसाधनों से फिल्म निर्माण में सक्रिय हैं. ओरछा में बेतवा नदी के किनारे लम्बे-चौड़े प्राकृतिक क्षेत्र में फैले रुद्राणी कलाग्राम में भारतीय फिल्म समारोह के लिए दो टपरा टॉकीज बनाई गईं हैं. टपरा टॉकीज एक तरह की अस्थायी व्यवस्था होती है जो बाहर से महज एक विशालकाय तम्बू जैसी प्रतीत होती है मगह अन्दर से पूरी तरह से किसी हॉल का एहसास कराती है. एक टपरा टॉकीज में बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बनी फिल्मों का प्रदर्शन किया जा रहा है और दूसरी में हिन्दी फीचर फ़िल्में दिखाई जा रही हैं. इसके साथ-साथ सांध्यकालीन सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के लिए सुरम्य प्राकृतिक वातावरण में, हरे-भरे घने वृक्षों के आँचल में मुक्ताकाशी मंच का निर्माण किया गया है. कलाग्राम के दूसरी ओर बने स्थल पर फिल्म से सम्बंधित विषय पर आख्यान की भी व्यवस्था है. जहाँ फ़िल्मी दुनिया के रोहिणी हट्टंगड़ी, रजत कपूर, केतन आनंद, नफीसा अली, यशपाल शर्मा जैसे नामचीन कलाकार सबसे रू-ब-रू होते हैं.


सबकुछ यथावत चलता देखकर अच्छा लगा. एक अकेले व्यक्ति राजा बुन्देला के प्रयास और उनके छोटी सी टीम के समर्पण से यह समारोह सुखद अनुभूति दे रहा है. यद्यपि इस पहले प्रयास में कुछ कमियां भी देखने को मिलीं तथापि वे इस कारण नकारने योग्य हैं क्योंकि एक तो यह पहला प्रयास है, दूसरे बिना किसी तरह की आर्थिक मदद के इतना बड़ा आयोजन करवाना अपने आपमें जीवट का काम है. राजा बुन्देला और उनकी पत्नी सुष्मिता मुखर्जी इन कमियों को देख-महसूस कर रहे हैं और अगले आयोजन में इनको सुधारने की इच्छाशक्ति भी व्यक्त करते हैं. यही संकल्पशक्ति ही ऐसे समारोहों का भविष्य तय करती है. जिस स्तर का समारोह हो रहा है, जिस तरह का उद्देश्य लेकर समारोह संचालित है, जिस तरह का मंच कलाकारों को प्रदान किया जा रहा है उससे आने वाले समय में निश्चित ही बुन्देलखण्ड को, यहाँ के कलाकारों को फिल्म क्षेत्र में उत्कृष्ट पहचान मिलेगी. बुन्देलखण्ड की कला-प्रतिभाओं को शुभकामनाओं, उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना सहित आज की बुलेटिन आपके सामने प्रस्तुत है.

सामाजिक कार्यकर्ता - अरुणा रॉय और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
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अरुणा रॉय (अंग्रेज़ी: Aruna Roy, जन्म- 26 मई, 1946, चेन्नई) भारत की उन महिलाओं में से एक हैं, जो बेहतर सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ राजनीति में भी सक्रिय रूप से क्रियाशील हैं। इन्हें राजस्थान के ग़रीब लोगों के जीवन को सुधारने और इस दिशा में किये गए उनके प्रयासों के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है। भारत में सूचना का अधिकार लागू करने के लिए उनके द्वारा किये गए प्रयत्न और योगदान प्रशंसनीय हैं। अरुणा रॉय राजस्थान के राजसमंद ज़िले में स्थित देवडूंगरी ग्राम से सम्पूर्ण भारत में संचालित 'मज़दूर किसान शक्ति संगठन' की संस्थापिका और अध्यक्ष हैं।


आज सामाजिक कार्यकर्त्ता अरुणा रॉय जी के 72वें जन्म दिवस पर हम सब उन्हें बहुत बहुत बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं देते हैं। सादर।।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~












आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

शुक्रवार, 25 मई 2018

रास बिहारी बोस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स नमस्कार।
रास बिहारी बोस
रास बिहारी बोस (अंग्रेज़ी: Rash Bihari Bose, जन्म: 25 मई, 1886; मृत्यु: 21 जनवरी, 1945) प्रख्यात वकील और शिक्षाविद थे। रास बिहारी बोस प्रख्यात क्रांतिकारी तो थे ही, सर्वप्रथम आज़ाद हिन्द फ़ौज के निर्माता भी थे। देश के जिन क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता-प्राप्ति तथा स्वतंत्र सरकार का संघटन करने के लिए प्रयत्न किया, उनमें श्री रासबिहारी बोस का नाम प्रमुख है। रास बिहारी बोस कांग्रेस के उदारवादी दल से सम्बद्ध थे। रास बिहारी बोस ने उग्रवादियों को घातक, जनोत्तेजक तथा अनुत्तरदायी आंदोलनकारी कहा। रासबिहारी बोस उन लोगों में से थे जो देश से बाहर जाकर विदेशी राष्ट्रों की सहायता से अंग्रेजों के विरुद्ध वातावरण तैयार कर भारत की मुक्ति का रास्ता निकालने की सोचते रहते थे। 1937 में उन्होंने 'भारतीय स्वातंय संघ' की स्थापना की और सभी भारतीयों का आह्वान किया तथा भारत को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया।


आज महान स्वतंत्रता सेनानी रास बिहारी बोस जी 132वीं जयंती पर हम सब उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन की में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

गुरुवार, 24 मई 2018

एवरेस्ट को नापने वाली पहली भारतीय महिला को शुभकामनायें : ब्लॉग बुलेटिन


आप सभी को नमस्कार,
आज, 24 मई को माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा लहराने वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल का जन्मदिन है. उनका जन्म उत्तराखंड के उत्तरकाशी में सन 1954 को हुआ था. एक खेतिहर परिवार में जन्म लेने के बाद भी उनमें पढ़ने के प्रति ललक थी और उन्होंने बी०एड० कर लिया. पर्वतों की सुरम्य वादियों में जन्मी बछेंद्री पाल का मन कुछ और ही करना चाहता था सो वे स्कूल में शिक्षिका बनने के बजाय पेशेवर पर्वतारोही का पेशा अपनाने निकल पड़ीं. उनके इस निर्णय का परिवार और रिश्तेदारों ने बहुत विरोध किया किन्तु अपने निर्णय पर वे टिकी रहीं. उनको पर्वतारोहण का पहला अवसर 12 साल की उम्र में ही मिल चुका था जबकि उन्होंने अपने स्कूल के सहपाठियों संग पिकनिक जाने पर 400 मीटर की चढ़ाई की थी. चूँकि यह चढ़ाई किसी योजनाबद्ध तरीके से नहीं की गई थी, वे लगातार चढ़ती चली गईं और शाम होने पर उन्हें आभास हुआ कि अब उतरना सम्भव नहीं है. ऐसे में बिना भोजन और टैंट के उन्होंने खुले आसमान में रात गुजारी. 


पर्वतारोही के रूप में उन्होंने भारतीय अभियान दल के सदस्य के रूप में माउंट एवरेस्ट पर आरोहण किया. इसके कुछ ही समय बाद उन्होंने इसी शिखर पर महिलाओं की एक टीम का सफल नेतृत्व किया.
प्रतिभाशाली होने के बाद भी जब उन्हें कोई रोज़गार न मिला तो उन्होंने नौकरी करने के बजाय नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग से कोर्स के लिये आवेदन किया. इसके बाद उन्होंने 1982 में एडवांस कैम्प के तौर पर गंगोत्री (6,672 मीटर) और रूदुगैरा (5,819) की चढ़ाई पूरी की. इसी कैम्प में बछेंद्री को इंस्ट्रक्टर के रूप में पहली नौकरी मिली. सन 1984 में जब भारत का चौथा एवरेस्ट अभियान शुरू हुआ उस समय तक दुनिया में सिर्फ चार महिलाऐं ही एवरेस्ट चढ़ने में सफल हो सकी थीं. सन 1984 के अभियान की टीम में बछेंद्री पाल समेत सात महिलायें और ग्यारह पुरुष शामिल हुए. इस टीम ने 8,848 मीटर की ऊंचाई के सागरमाथा (एवरेस्ट) पर भारत का झंडा लहरा दिया. इसके साथ ही वे एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक क़दम रखने वाली दुनिया की पाँचवीं महिला बनीं. इसके अलावा सन 1997 में बछेन्द्री पाल ने केवल महिला दल का नेतृत्व करते हुए हिमालय पर्वतारोहण किया.

बछेन्द्री पाल का नाम सन 1990 में गिनीज बुक ऑफ़ रिकार्ड में और सन 1997 में लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में शामिल किया गया. केंद्र सरकार द्वारा उन्हें सन 1985 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. सन 1986 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार तथा सन 1995 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यश भारती पुरस्कार प्रदान किया गया.

बुलेटिन परिवार बछेंद्री पाल के स्वस्थ, खुशहाल जीवन की कामना करते हुए उन्हें जन्मदिन की शुभकामनायें प्रदान करता है.....

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बुधवार, 23 मई 2018

23 मई - विश्व कछुआ दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
23 मई को संपूर्ण विश्व में विश्व कछुआ दिवस (World Turtle Day) मनाया जाता है। यह दिवस कछुओं की दुर्लभ प्रजातियों को लुप्त होने से बचाने के लिए लोगों में जागरूकता हेतु मनाया जाता है। कछुओं की प्रजाति विश्व की सबसे पुरानी जीवित प्रजातियों में से एक मानी जाती है। ये प्राचीन प्रजातियों स्तनधारियों, चिड़ियों सांपों और छिपकलियों से भी पहले धरती पर अस्तित्व में आ चुके थे। जीव-वैज्ञानिकों के अनुसार कछुए इतने लंबे समय तक सिर्फ इस लिए खुद को बचा सके क्योंकि उनका कवच उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है। अंटार्कटिका को छोड़कर ये लगभग सभी महाद्वीपों में पाए जाते हैं। बोग कछुए जो कि लंबाई में 4 इंच के होते हैं, सबसे छोटे कछुए होते हैं। भारत में असम राज्य के जिला दीमा हसाओं में स्थित हेजोंग झील (जिसे कछुआ झील के नाम से पुकारा जाता है) में लगभग 400-500 कछुए निवास करते हैं।

कछुआ धीरे –धीरे विलुप्त होने की कगार पर है, यदि इनके प्रति लोगों में जागरूकता नही फैलायी गयी तो यह प्रजाति पूरी तरह से ख़त्म हो सकती है।  कछुओं की प्रजाति विश्व की सबसे पुरानी जीवित प्रजातियों (लगभग 200 मिलियन वर्ष) में से एक मानी जाती है और ये प्राचीन प्रजातियां स्तनधारियों, चिड़ियों ,सांपों और छिपकलियों से भी पहले धरती पर अस्तित्व में आ चुके थे। जीववैज्ञानिकों के मुताबिक, कछुए इतने लंबे समय तक सिर्फ इसलिए खुद को बचा सके क्योंकि उनका कवच उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है। आईये एक संकल्प लें दुनिया की प्राचीन प्रजाति को बिलुप्त होने से बचाने का, इनके संरक्षण का। अपने आसपास के तालाबों, नदियों, जंगलों में इन्हें सुरक्षित रहने दें। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

मंगलवार, 22 मई 2018

जन्म दिवस - राजा राममोहन राय और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
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राजा राममोहन राय (अंग्रेज़ी: Raja Ram Mohan Roy, जन्म: 22 मई, 1772; मृत्यु: 27 सितम्बर, 1833) को 'आधुनिक भारतीय समाज का जन्मदाता' कहा जाता है। वे ब्रह्म समाज के संस्थापक, भारतीय भाषायी प्रेस के प्रवर्तक, जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता तथा बंगाल में नव-जागरण युग के पितामह थे। धार्मिक और सामाजिक विकास के क्षेत्र में राजा राममोहन राय का नाम सबसे अग्रणी है। राजा राम मोहन राय ने तत्कालीन भारतीय समाज की कट्टरता, रूढ़िवादिता एवं अंध विश्वासों को दूर करके उसे आधुनिक बनाने का प्रयास किया।



आज गूगल इंडिया ने समाज सुधारक राजा राममोहन राय जी के 246वें जन्म दिवस पर डूडल बनाकर उनको याद किया। 

आज आधुनिक भारत के प्रणेता और समाज सुधारक राजा राममोहन राय जी की 246वीं जयंती पर हम सब उन्हें याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर अभिनन्दन।।