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मंगलवार, 31 जनवरी 2017

सुरैया जी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
सुरैया (जन्म: 15 जून, 1929 - मृत्यु: 31 जनवरी, 2004) पूरा नाम सुरैया जमाल शेख़, हिन्दी फ़िल्मों की एक प्रसिद्ध अभिनेत्री और गायिका थीं। 40वें और 50वें दशक में इन्होंने हिन्दी सिनेमा में अपना योगदान दिया। अदाओं में नज़ाकत, गायकी में नफ़ासत की मलिका सुरैया जमाल शेख़ ने अपने हुस्न और हुनर से हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक नई इबारत लिखी। वो पास रहें या दूर रहें, नुक़्ताचीं है ग़मे दिल, और दिल ए नादां तुझे हुआ क्या है जैसे गीत सुनकर आज भी जहन में सुरैया की तस्वीर उभर आती है।

15 जून, 1929 को गुजरांवाला, पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मी सुरैया अपने माता पिता की इकलौती संतान थीं। नाज़ों से पली सुरैया ने हालांकि संगीत की शिक्षा नहीं ली थी लेकिन आगे चलकर उनकी पहचान एक बेहतरीन अदाकारा के साथ एक अच्छी गायिका के रूप में भी बनी। सुरैया ने अपने अभिनय और गायकी से हर कदम पर खुद को साबित किया है।

सुरैया के फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत बड़े रोचक तरीक़े से हुई। गुजरे ज़माने के मशहूर खलनायक जहूर सुरैया के चाचा थे और उनकी वजह से 1937 में उन्हें फ़िल्म 'उसने क्या सोचा' में पहली बार बाल कलाकार के रूप में भूमिका मिली।1941 में स्कूल की छुट्टियों के दौरान वह मोहन स्टूडियो में फ़िल्म 'ताजमहल' की शूटिंग देखने गईं तो निर्देशक नानूभाई वकील की नज़र उन पर पड़ी और उन्होंने सुरैया को एक ही नज़र में मुमताज़ महल के बचपन के रोल के लिए चुन लिया। इसी तरह संगीतकार नौशाद ने भी जब पहली बार ऑल इंडिया रेडियो पर सुरैया की आवाज़ सुनी और उन्हें फ़िल्म 'शारदा' में गवाया। 1947 में भारत की आज़ादी के बादनूरजहाँ और खुर्शीद बानो ने पाकिस्तान की नागरिकता ले ली, लेकिन सुरैया यहीं रहीं।

देवानंद और सुरैया
एक वक़्त था, जब रोमांटिक हीरो देव आनंद सुरैया के दीवाने हुआ करते थे। लेकिन अंतत: यह जोड़ी वास्तविक जीवन में जोड़ी नहीं पाई। वजह थी सुरैया की दादी, जिन्हें देव साहब पसंद नहीं थे। मगर सुरैया ने भी अपने जीवन में देव साहब की जगह किसी और को नहीं आने दिया। ताउम्र उन्होंने शादी नहीं की और मुंबई के मरीनलाइन में स्थित अपने फ्लैट में अकेले ही ज़िंदगी जीती रहीं। देव आनंद के साथ उनकी फ़िल्में 'जीत' (1949) और 'दो सितारे' (1951) ख़ास रहीं। ये फ़िल्में इसलिए भी यादगार रहीं क्योंकि फ़िल्म 'जीत' के सेट पर ही देव आनंद ने सुरैया से अपने प्रेम का इजहार किया था, और 'दो सितारे' इस जोड़ी की आख़िरी फ़िल्म थी। खुद देव आनंद ने अपनी आत्मकथा 'रोमांसिंग विद लाइफ' में सुरैया के साथ अपने रिश्ते की बात कबूली है। वह लिखते हैं कि सुरैया की आंखें बहुत ख़ूबसूरत थीं। वह बड़ी गायिका भी थीं। हां, मैंने उनसे प्यार किया था। इसे मैं अपने जीवन का पहला मासूम प्यार कहना चाहूंगा।

अभिनय के अलावा सुरैया ने कई यादगार गीत गाए, जो अब भी काफ़ी लोकप्रिय है। इन गीतों में, सोचा था क्या मैं दिल में दर्द बसा लाई, तेरे नैनों ने चोरी किया, ओ दूर जाने वाले, वो पास रहे या दूर रहे, तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी, मुरली वाले मुरली बजा आदि शामिल हैं।

31 जनवरी, 2004 को सुरैया दुनिया को अलविदा कह गईं। संगीत का महत्व तो हमारे जीवन में हर पल रहेगा लेकिन सार्थक और मधुर गीतों की अगर बात आएगी तो सुरैया का नाम जरूर आएगा।

[ जानकारी स्त्रोत - भारतकोश ~ सुरैया ]


आज महान कलाकार सुरैया जी की 13वीं  पुण्यतिथि पर हिंदी ब्लॉगजगत और ब्लॉग बुलेटिन टीम उन्हें स्मरण करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।



अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर.....



















आज की ब्लॉग बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे। तब तक के लिए शुभरात्रि।  जय हिन्द। जय भारत।।

सोमवार, 30 जनवरी 2017

एक मिनट का मौन ही रख लो




 माँ बताती थीं कि जिस दिन आज़ादी मिली 
, पुरजोर आवाज़ में यह गीत बजा था -

वन्दे मातरम .....
सुजलाम सुफलाम मलयज शीतलाम शस्य श्यामलाम मातरम!
शु्भ्र ज्योत्सना पुलकित यामिनीम
फुल्ल कुसुमितद्रुमदल शोभणीम.
सुहासिनीम सुमधुर भाषणीम,
सुखदाम, वरदाम मातरम
वन्देमातरम....... आज भी उस सुबह की कल्पना में रोमांच हो आता है . पर आज़ादी के बाद जो सच आज सुरसा की तरह मुंह खोले खड़ा है , उसके आगे साल में एक बार
इन गीतों से झुंझलाहट होती है . हैप्पी इंडीपेंडेंस डे कहो या स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें .... कोई फर्क नहीं पड़ता . खुद के कर्त्तव्य से परे चर्चा होती है - गाँधी को क्या करना था , क्या नहीं . फूलों की सेज छोड़नेवाले जवाहर की नियत पर शक़ ..... कभी इस चर्चा के मध्य याद नहीं आता कि जिस जवाहर लाल के कपड़े लन्दन से धुलकर आते थे , वे बेबस जेल जा रहे थे , जब उनकी माँ पर लाठी चलाये जा रहे थे ! गाँधी जी ने सत्याग्रह किया , सिल्की परिधान में महल में नहीं रहे . उनके बच्चों को उनसे शिकायत रही ,
आजादी का स्वाद उनके बच्चों को ऊँचा स्थान देकर नहीं मिला ...
आज एक सवाल है .... देगा कोई जवाब अपने गुटों से बाहर आकर ???

बापू प्रश्न कर रहे -
........
कहाँ गयी वह आजादी
जिसके लिए हम भूखे रहे , वार सहे
सड़कों पर लहुलुहान गिरते रहे 
जेल गए
कटघरे में अड़े रहे , डटे रहे .........
सब गडमड करके
अब ये गडमड करनेवाले
मेरे निजित्व को उछाल रहे !
क्या फर्क पड़ता है कि मैं प्रेमी था या ........
खुफिया लोगों
तुम सब तो दूध के धुले हो न ...
फिर करो विरोध गलत का
अपने ही देश में अपने ही लोगों की गुलामी से
मुक्त करो सबको ...
मुझे तो गोडसे ने गोली मार दी
राजघाट में मैं चिर निद्रा में हूँ
एक नहीं दो नहीं उनहत्तर वर्ष हुए
और देश की बातें आज तलक
गाँधी , नेहरु , सुभाष ,
भगत , सुखदेव, राजगुरु , आज़ाद तक ही है
क्यूँ ?
तुम जो गोलियां चला रहे हो मुझे कोसते हुए
गांधीगिरी का नाम लेकर अहिंसा फैला रहे हो
वो किसके लिए ???
बसंती चोला किस प्राप्य के लिए ?
बम विस्फोट
आतंक
अपहरण ...... इसमें बापू को तुम पहचान भी नहीं सकते
तुम सबों की व्यर्थ आलोचना
जो भरमाने की कोशिशों में चलती है
उसके आगे कौन सत्याग्रह करेगा ?
मैं तो रहा नहीं
और अब वह युग आएगा भी नहीं
भारत हो या पकिस्तान
तुम जी किसके लिए रहे ?
तुम सब देश के अंश रहे ही नहीं
स्वार्थ तुम्हारा उद्देश्य है
और वही तुम्हारा लक्ष्य है
भले ही उस लक्ष्य के आगे
तुम्हारा अपना परिवार हो
तुम टुकड़े कर दोगे उनको
तुम तो गोडसे जैसी इमानदारी भी नहीं रखते
.................
आह !
तुम लोग इन्सान के रूप में गिद्ध हो
और शमशान हुए देश में
जिंदा लाशों को खा रहे हो !
और जो जिंदा होने की कोशिश में हैं
उनके आगे आतंक फैला रहे हो !!!
....
धिक्कार है मुझ पर
और उन शहीदों पर
जो तुम्हें आजादी देना चाहते थे
और परिवार से दूर हो गए
तुम सबने आज उस शहादत को बेच दिया
कोई मुग़ल नहीं , अंग्रेज नहीं , ....
हिन्दुस्तानी शक्ल लिए तुम असुर हो
और आपस में ही संहार कर रहे हो
देश, परिवार, समाज .......
सबको ग्रास बना लिया अपना !!!

क्या दे सकोगे कोई जवाब
या लेकर घूम रहे हो कोई सौगात
ताकि मेरे नाम की धज्जियां उड़ जाएँ
और तुम्हारी आत्मा पर कोई बोझ न रहे ?

एक मिनट का मौन ही रख लो लिंक्स देखते हुए  ... 

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कलम से..: अभिव्यक्ति की आज़ादी (लघुकथा) - सुधीर मौर्य


काफी समय से ख़ामोश ब्लॉग पर एक नई शुरुआत कुछ तुकबंदियों के साथ...

याद चंचल हो गई
रात बेकल हो गई

इश्क का चर्चा चला
हवा संदल हो गई

ज़िक्र जब तेरा हुआ
आंख बादल हो गई

चाप सुनकर बेसबर
देख सांकल हो गई

ख्वाब की तन्हाई में
आज हलचल हो गई

एक ठिठकी सी ग़ज़ल
अब मुकम्मल हो गई

रविवार, 29 जनवरी 2017

बीटिंग रिट्रीट 2017 - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
आज दिल्ली के विजय चौक पर हुये 'बीटिंग रिट्रीट' के साथ ही इस साल के गणतंत्र दिवस समारोह का समापन हो गया. बीटिंग रिट्रीट गणतंत्र दिवस समारोह की समाप्ति का सूचक है. इस कार्यक्रम में थल सेना, वायु सेना और नौसेना के बैंड पारंपरिक धुन के साथ मार्च करते हैं. आज इनके साथ बीएसएफ, सीआरपीएफ और दिल्ली राज्य पुलिस के बैंड्स ने भी अपनी सहभागिता की. यह सेना की बैरक वापसी का प्रतीक होता है जो परम्पराओं और आधुनिकता का निर्वहन करता है.


गणतंत्र दिवस के पश्चात हर वर्ष 29 जनवरी को बीटिंग रिट्रीट कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है. समारोह का स्थल रायसीना हिल्स के नजदीक स्थित विजय चौक होता है, जो राजपथ के अंत में राष्ट्रपति भवन के उत्तर और दक्षिण ब्लॉक द्वारा घिरा है. बीटिंग रिट्रीट गणतंत्र दिवस आयोजनों का आधिकारिक रूप से समापन घोषित करता है. रिट्रीट धुन के बजने के साथ ही राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान-पूर्वक उतारकर ले जाया जाता है. सभी महत्‍वपूर्ण सरकारी भवनों को 26 जनवरी से 29 जनवरी के बीच रोशनी से सुंदरता पूर्वक सजाया जाता है.






प्रतिवर्ष 29 जनवरी की शाम को अर्थात गणतंत्र दिवस के बाद अर्थात गणतंत्र की तीसरे दिन बीटिंग रिट्रीट आयोजन किया जाता है. यह आयोजन तीन सेनाओं के एक साथ मिलकर सामूहिक बैंड वादन से आरंभ होता है जो लोकप्रिय मार्चिंग धुनें बजाते हैं. इस बार के आयोजन में सोलह मिलिट्री और सोलह पाइप बैंड ड्रमर इसमें शामिल हुए. बीटिंग रिट्रीट 2017 में राग यमन की प्रस्तुति पहली बार हुई है. पूरे आयोजन में इस बार कुल 26 प्रस्तुतियाँ हुईं जिनमें से ज्यादातर देशी धुनों पर आधारित रहीं. स्क्वाड्रन लीडर जी. रामचंद्रन आज के समारोह में प्रिंसिपल कंडक्टर रहे.



ड्रमर भी एकल प्रदर्शन (जिसे ड्रमर्स कॉल कहते हैं) करते हैं. ड्रमर्स द्वारा एबाइडिड विद मी (यह महात्मा गाँधी की प्रिय धुनों में से एक कही जाती है) बजाई जाती है, इसे विलियम एच० मग ने तैयार किया था. इसके अलावा ट्युबुलर घंटियों द्वारा चाइम्‍स बजाई जाती हैं, जो काफ़ी दूरी पर रखी होती हैं और इससे एक मनमोहक दृश्‍य बनता है. इसके बाद रिट्रीट का बिगुल वादन होता है, जब बैंड मास्‍टर राष्‍ट्रपति के समीप जाते हैं और बैंड वापिस ले जाने की अनुमति मांगते हैं. तब सूचित किया जाता है कि समापन समारोह पूरा हो गया है. बैंड मार्च वापस जाते समय लोकप्रिय धुन सारे जहाँ से अच्‍छा बजाते हैं. ठीक शाम 6 बजे बगलर्स रिट्रीट की धुन बजाते हैं और राष्‍ट्रीय ध्‍वज को उतार लिया जाता हैं तथा राष्‍ट्रगान गाया जाता है और इस प्रकार गणतंत्र दिवस के आयोजन का औपचारिक समापन होता है.



आज शाम को हुये इस कार्यक्रम को नीचे दिये वीडियो पर देख सकते है. यह वीडियो दूरदर्शन के यू ट्यूब चैनल से लिया गया है. इस साल भी दूरदर्शन ने पिछले सालों की तरह यू ट्यूब पर बीटिंग द रिट्रीट कार्यक्रम का सीधा प्रसारण  किया था. इसे आप इस वीडियो के द्वारा देख सकते हैं. 



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शनिवार, 28 जनवरी 2017

शेर ए पंजाब की १५२ वीं जयंती - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |
लाला लाजपत राय ( जन्म: 28 जनवरी 1865 - मृत्यु: 17 नवम्बर 1928)
लाला लाजपत राय (अंग्रेजी: Lala Lajpat Rai, पंजाबी: ਲਾਲਾ ਲਾਜਪਤ ਰਾਏ, जन्म: 28 जनवरी 1865 - मृत्यु: 17 नवम्बर 1928) भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। इन्हें पंजाब केसरी भी कहा जाता है। इन्होंने पंजाब नैशनल बैंक और लक्ष्मी बीमा कम्पनी की स्थापना भी की थी। ये भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गरम दल के तीन प्रमुख नेताओं लाल-बाल-पाल में से एक थे। सन् 1928 में इन्होंने साइमन कमीशन के विरुद्ध एक प्रदर्शन में हिस्सा लिया, जिसके दौरान हुए लाठी-चार्ज में ये बुरी तरह से घायल हो गये और अन्तत: १७ नवम्बर सन् १९२८ को इनकी महान आत्मा ने पार्थिव देह त्याग दी।
 
जीवन वृत्त
 
लाला लाजपत राय का जन्म पंजाब के मोगा जिले में हुआ था। इन्होंने कुछ समय हरियाणा के रोहतक और हिसार शहरों में वकालत की। ये भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम दल के प्रमुख नेता थे। बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल के साथ इस त्रिमूर्ति को लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाता था। इन्हीं तीनों नेताओं ने सबसे पहले भारत में पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग की थी बाद में समूचा देश इनके साथ हो गया। इन्होंने स्वामी दयानन्द सरस्वती के साथ मिलकर आर्य समाज को पंजाब में लोकप्रिय बनाया। लाला हंसराज के साथ दयानन्द एंग्लो वैदिक विद्यालयों का प्रसार किया भाग जिन्हें आजकल डीएवी स्कूल्स व कालेज के नाम से जाना जाता है। लालाजी ने अनेक स्थानों पर अकाल में शिविर लगाकर लोगों की सेवा भी की थी। 30 अक्टूबर 1928 को इन्होंने लाहौर में साइमन कमीशन के विरुद्ध आयोजित एक विशाल प्रदर्शन में हिस्सा लिया, जिसके दौरान हुए लाठी-चार्ज में ये बुरी तरह से घायल हो गये। 
उस समय इन्होंने कहा था: 
 
"मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक-एक कील का काम करेगी।"  
 
और वही हुआ भी; लालाजी के बलिदान के 20 साल के भीतर ही ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य अस्त हो गया। 17 नवंबर 1928 को इन्हीं चोटों की वजह से इनका देहान्त हो गया। 
 

शेर ए पंजाब स्व॰ लाला लाजपत राय जी की १५२ वीं जयंती पर ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से उनको हमारा शत शत नमन |
सादर आपका
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नींव मजबुत कराे, दरारें आ रही मीनाराे में ।

सबके अपने युद्ध अकेले

एक्स्ट्रा दांत निकलवाने ही ठीक रहते हैं...

वर्ष 2017, सोशल मीडिया और अभिव्यक्ति की आजादी...3

नॉस्टाल्जिया...

"ऐ मेरे वतन के लोगों" के ५४ साल

आदमी, मूलतः सूअर की औलाद ही है!

भारतीय इतिहास पर एसिड अटैक

हम हिंदूस्तान को भूल गये,

फ़िल्में बनें मासांत के लिए, सप्ताहांत के लिए नहीं

वे जड़े ढूंढ रहे हैं

संवैधानिक स्वतंत्रता का दुरुपयोग न होने दें

खजुराहो का इतिहास और कामुक मूर्तियां

बिना झंडे के लोग लावारिस हो रहे हैं

प्यार करने का एक ज़रूरी रास्ता यह भी है

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

दलबदल ज़िन्दाबाद - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो, 

देश के पाँच राज्यों में चुनावी माहौल है। राजनैतिक दलों में भागमभाग मची हुई है। ऐसे माहौल में ये लघुकथा याद आ गई। आप भी इसका आनंद उठाते हुए आज की बुलेटिन का आनंद लें।

जय हिन्द 




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जोर-शोर से नारेबाजी हो रही थी। महाशय मंत्री बनने के बाद अपने शहर में पहली बार आ रहे थे। उनके परिचित तो परिचित, अपरिचित भी अपनेपन का एहसास दिलाने के लिए उनकी अगवानी में खड़े थे। शहर की सीमा-रेखा को निर्धारित करती नदी के पुल पर भीड़ पूरे जोशोखरोश से अपने नवनिर्वाचित मंत्री को देखने के लिए आतुर थी। उस सम्बन्धित दल के एक प्रमुख नेता माननीय भी मुँह लटकाये, मजबूरी में, नाराज होने के बाद भी उस मंत्री के स्वागत हेतु खड़े दिखाई पड़ रहे थे। मजबूरी यह कि पार्टी में प्रमुख पद पर होने के कारण साथ ही ऊपर तक अपने कर्तव्यनिष्ठ होने का संदेश भी देना है। नाराज इस कारण से थे कि नवनिर्वाचित मंत्री ने अपने धन-बल से उन महाशय का टिकट कटवा कर स्वयं हासिल कर लिया था। 

तभी भीड़ के चिल्लाने और रेलमपेल मचने से नवनिर्वाचित मंत्री के आने का संदेश मिला। माननीय ने स्वयं को संयमित कर, माला सँभाल महाशय की ओर सधे कदमों से बढ़े। भीड़ में अधिसंख्यक लोग धन-सम्पन्न मंत्री के समर्थक थे। उनका पार्टी के समर्थकों, कार्यकर्ताओं, वोट बैंक से बस जीतने तक का वास्ता था। पार्टी के असल कार्यकर्ता हाशिये पर थे और बस नारे लगाने का काम कर रहे थे। माननीय हाथ में माला लेकर आगे बढ़े किन्तु हो रही धक्कामुक्की के शिकार होकर गिर पड़े। मंत्री जी की कार उनकी माला को रौंदती हुई आगे बढ़ गई। अनजाने में ही सही किन्तु एक बार फिर महाशय के द्वारा पछाड़े जाने के बाद माननीय खिसिया कर रह गये। अपनी खिसियाहट, खीझ और गुस्से को काबू में करके वे अपनी पार्टी के असली समर्थकों के साथ मिलकर नारे लगाने में जुट गये। अब वे जान गये थे कि वर्ग विशेष का भला करने निकला उनका दल अब धन-कुबेरों के बनाये दलदल में फँस गया है, जहाँ बाहुबलियों और धनबलियों का ही महत्व है। उन जैसे समर्थित और संकल्पित कार्यकर्ता अब सिर्फ नारे लगाने और पोस्टर चिपकाने के लिए ही रह गये हैं। 

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बुधवार, 25 जनवरी 2017

ब्लॉग बुलेटिन - राष्ट्रीय मतदाता दिवस और राष्ट्रपति का सन्देश

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
भारत में राष्ट्रीय मतदाता दिवस प्रत्येक वर्ष 25 जनवरी को मनाया जाता है। राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाने का प्रारंभ वर्ष 2011 से शुरू हुआ। क्योंकि भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी, 1950 को हुई थी जिसकी 61वीं वर्षगांठ पर भारत सरकार ने इस खास दिन को 'राष्ट्रीय मतदाता दिवस' मनाने की शुरुआत की। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य आज की युवा पीढ़ी और महिलाओं को मतदान के प्रति जागरूक और उसका मूल्य क्या है इसे ज्ञात करने के लिए मनाया जाता है। क्योंकि एक जागरूक मतदाता ही देश का वर्तमान और भविष्य का निर्माण करता है।

pranab mukharji

आज गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश के राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी जी ने देश को संबोधित किया -

राष्ट्रपति मुखर्जी ने कहा है कि चुनौतिपूर्ण वैश्विक गतिविधियों के बावजूद हमारी अर्थव्यवस्था अच्छा प्रदर्शन कर रही है. उन्होंने नोटबंदी की नीति की प्रशंसा करते हुए कहा है कि कालेधन से लड़ने के लिए लागू की गई इस नीति का असर अच्छा होगा. साथ ही, डिजिटल पेमेंट से लेनदेन में भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी. उन्होंने कहा है कि सरकार की प्रमुख पहलों में मनरेगा जैसी स्कीम लोगों को रोज़गार दे रही हैं और डायरेक्ट ट्रांसफर भ्रष्टाचार रोकने और पारदर्शिता बनाने में सहयोगी है।

गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर राष्ट्र के नाम संबोधन में राष्ट्रपति ने जोर दिया कि देश की ताकत इसकी बहुलतावाद और विविधता में निहित है और भारत में पारंपरिक रूप से तर्कों पर आधारित भारतीयता का जोर रहा है, न कि असहिष्णु भारतीयता का. उन्होंने कहा, हमारे देश में सदियों से विविध विचार, दर्शन एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्ण ढंग से प्रतिस्पर्धा करते रहे हैं. लोकतंत्र के फलने फूलने के लिए बुद्धिमतापूर्ण और विवेकसम्मत मन की जरूरत है. प्रणब मुखर्जी ने भारतीय लोकतंत्र की ताकत को रेखांकित किया लेकिन संसद और राज्य विधानसभाओं में व्यवधान के प्रति सचेत भी किया।



चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर.....


गणतंत्र का लोकतंत्र जिन्दाबाद

गणतंत्र दिवस कि शुभकामना .....एक विचार

तिरंगा हमारा

कर्पूरी ठाकुर को जाति की चौखट पर मत टांगो!

आम आदमी और सरकारी अफसर

दांव...!

दिलचस्प चुनावी घोषणापत्र

लौट आना है उसे घर

जिंदगी तो रोज छपती है

बधाई है बधाई है बधाई है बधाई है


आज की ब्लॉग बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे। तब तक के लिए शुभरात्रि।  जय हिन्द। जय भारत।।

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

राष्ट्रीय बालिका दिवस




बेटी" घर की रौनक होती है
लक्ष्मी 
सरस्वती 
अन्नपूर्णा 
शक्तिदायिनी 
कठिन से कठिन वक़्त में 
वह माँ,बहन,पत्नी,बेटी,के रूप में 
हौसले का आधार बनती है 

आज राष्ट्रीय बालिका दिवस है 

बहुत सारे परिवर्तन हुए हैं 
सामाजिक 
पारिवारिक 
फिर भी, 
कहीं कुछ कमी है 
निःसंदेह लोगों की मानसिकता में !!!

आज के  दिन इंदिरा गांधी को नारी शक्ति के रूप में याद किया जाता है। इस दिन इंदिरा गांधी पहली बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठी थी इसलिए इस दिन को राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया । 
कन्या शक्ति को लोगों के सामने लाने तथा उसके प्रति समाज में जागरूकता और चेतना पैदा करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने वर्ष 2008 में 24 जनवरी को प्रति वर्ष ‘राष्ट्रीय बालिका दिवस’ मनाने का निर्णय लिया था।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने राष्‍ट्रीय बालिका दिवस पर बालिकाओं की अद्वि‍तीय उपलब्‍धियों का अभिनंदन किया है।
प्रधानमंत्री ने कहा “राष्‍ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर मैं बालिकाओं की अद्वितीय उपलब्‍धियों का अभिनंदन करता हूं। राष्‍ट्र निर्माण में उनकी भूमिका सर्वोंपरि‍ है। आइए, हम बालिकाओं के प्रति भेदभाव समाप्‍त करने और अपनी बेटियों को आगे बढ़ने का समान अवसर सुनिश्‍चित करने के प्रति संकल्‍प करें।”

आइये हम संकल्प करें, अपनी मानसिकता बदलें और इस कथन को आधार दें -


बेटी कुदरत का उपहार
नहीं करो उसका तिरस्कार
जो बेटी को दे पहचान
माता-पिता वही महान 


गाय सी लड़की के पास समन्दर की प्यास है सपनों का ऊँचा पहाड़ भी ...
मेरे रसोई में कोई खिड़की नही
चावल दाल आटे से घिरी दिवार है
नमक तेल मसाले की छोटी अलमारी 
आग के सामने रहती हूँ
तो निपट अकेली महसूसती हूँ
एक खिड़की होती तो आसमान होता
परिंदे होते कुछ चहल पहल होती
मेरा मन चूल्हा चौका में लगा रहता
बन्द रसोई का एक ही निकास है
जहाँ से बने हुए स्वाद बाहर पहुचाएं जाते हैं
फिर खाली हाथ लौटती हूँ मैं
लड़कियों को चिड़िया कहा और आसमान ले लिया
करेजा कहा और दूर किया
गिलहरी की पेट कहा और उनके मुँह की एक मूँगफली भी छीन ली
हाँ परी भी कहाँ था
पर वो सुफेद पन्नों की सुनहरी कहानियाँ थी
रसोई में डिब्बे हैं डिब्बे में सामान है
मकान के इसी कोने में मेरा मान सम्मान है
इसके बाहर की कथा में व्याप्त अंधेरा है
अँधेरे में उलाहनों का डेरा है
मन कितना अकेला है
इसी रसोई में जिंदगी की भीड़ है मेला है
तमाम है काम रोज का खाना
रविवार का आयोजन
कोई कार प्रयोजन
दीवाली की मिठाई
होली का पुआ
चढ़े नशे की काली चाय
वाह रे लड़की सी गाय
यही धुन है गुनगुन है माता का गीत है
यही रसोई प्यार है प्रीत है
नमक के स्वाद में डूबी उँगलियों की कब्र गाह है
यही गले है सपनें यही याद आये अपने यही मंगल गारी है
यही घर यही अटारी है
यही जंग यहीं धार है
रसोई की दीवारों में कैद
कितनों की मौन कतार है
हाथ में पानी लो
अंजलि भरो
पूरब का मुँह करो
मन ही मन कहो रसोई में ही पैदा हुई थी मानों वही मर गई
जाओ माई तुम तर गई
पितरौ को न्योता है
लो खाओ पीओ मत भटको
मैंने रसोई की दिवार से आवाज लगाई
मेरे घर परिवार की औरतें
जो तुम खप गई इसी नमक में पानी में
एक खिड़की को तरसी हो भरी जवानी में
मत आना इनके बुलावे पर
बनी रहो आसमान के ऊपर
कौआ तो कतई मत बनना
तुम मैना बन के आना
गौरय्या बन जाना
बन जाना लालमन चिड़िया
तुम मोरनी बन जाना
जो मन हो बन जाना
पर झांसे में मत आना
आज भी है बन्द दरवाजे
नही रखी खिड़की
न आसमान इनका
तिनके भर पेट की तुम्हारी गौरय्या
कैद है
ये खिड़कियों का इंतजाम नही करते
हम नन्हे चोंच से भिड़े है दीवारों से
हमनें खिड़कियों पर उठाये है सवाल
हम रसोई में जन्म लेकर रसोई में नही मरेंगे
कुछ तो कभी तो हम भी अपने मन की करें ....


एक रचना , प्रथम काव्य संग्रह ' पहली किरन'
से --------------------
जी चाहता है
जी चाहता है, आज कुछ नया करूं |
सिन्धु की तरंग सी
चाँद को चूम लूँ
वसंत के उल्लास में
पवन संग झूम लूँ
बीच जल धार में
भंवर बन घूम लूँ !
जी चाहता है ----
साज की तार में
गीत बन कर सजूँ
कोकिला के गान में
प्रेम के स्वर भरूँ
धरा के खंड-खंड को
राग रंग से रंगूँ !
जी चाहता है ---
पंछियों की पाँत में
गगन तक जा उडूँ
पुष्प के पराग में
सुगंध बनकर बसूँ
तितलियों के पंख में
रंग बन कर घुलूँ !
जी चाहता है -----
तारों के इंद्रजाल में
दीप बन कर जलूँ
दूधिया नभगंग में
धार सी जा मिलूँ
ओढ़ नीली ओढ़नी
बादलों में जा घिरूँ !
जी चाहता है ---
प्राण में उमंग हो
गान में तरंग हो
जिस राह मैं चलूँ
हास मेरे संग हो
धरा से आकाश तक
प्रेम का ही रंग हो !
जी चाहता है – जी भरकर जियूँ-----------
जी चाहता है -----------------------------

सोमवार, 23 जनवरी 2017

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी की 120वीं जयंती और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी और आजाद हिन्द फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी का जन्म 23 जनवरी, सन् 1897 ई. को कटक ( ओडिशा ) में हुआ था। इनके पिता जानकी नाथ बोस और माता प्रभावती थीं। ये बचपन से ही काफी मेधावी और निर्भय थे। नेताजी का स्वभाव भी काफी दयालु था। वे लोगों की मदद करने के लिए सदा अग्रसर रहते थे। उन्होंने वर्ष 1913 में हाईस्कूल, 1915 में इंटर और 1919 में बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। वे 1920 में पिता की इच्छानुसार आईसीएस की परीक्षा भी पास कर चुके थे वे भी केवल 23 साल की छोटी सी आयु में लेकिन देश सेवा करने की खातिर उन्होंने इस सम्मानित नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और कांग्रेस से जुड़ गए वे 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए लेकिन महात्मा गाँधी से हुए कुछ मतभेदों के कारण उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और फ़ॉरवर्ड ब्लॉक नामक नए संगठन का निर्माण किया। अंग्रेज सरकार उनके हौसले और व्यक्तिव से काफी भयभीत और विचारशील हो गई थी। जिस कारण उनकों उनके ही घर में नजरबंद कर दिया गया था। जहाँ से वे 16 जनवरी, 1941 को भागकर अफगानिस्तान, इटली और जर्मनी से होते हुए जापान पहुँचे थे। यहाँ पर उन्होंने आजाद हिन्द फौज का गठन किया और अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध का ऐलान किया। शुरूआती कुछ सफलताओं के बाद आजाद हिन्द फौज हार मुँह देखना पड़ा। जापान का आत्मसमर्पण और कमजोर युद्ध नीति के कारण आजाद हिन्द फौज ने भी आत्मसमर्पण कर दिया। अपनी आगे की रणनीति को स्थायी रूप देने के लिए नेताजी जापान रवाना हुए जहाँ ताइपेई के फारमोसा द्वीप पर हुए एक विमान दुर्घटना में 18 अगस्त, 1945 को उनकी मृत्यु हो गयी। आज भी अधिकतर देश वासी यहीं मानते हैं कि उनकी मृत्यु उस दिन नहीं हुई थी। अपने रहस्मय मृत्यु के बाद कई दावों के अनुसार उनके रूस के जेल में होने की बात भी कही गयी और फैजाबाद में गुमनामी बाबा के रूप में रहने की भी चर्चा होती रही। आज से ठीक एक साल पहले भारत सरकार द्वारा जारी हुई नेताजी की फाइल्स में इस बात की साफ़ तौर पर पुष्टि हो गई कि नेताजी उस विमान हादसे के बाद भी जीवित थे। नेताजी का रहस्य कब सामने आएगा इसके बारे में कई देशवासियों को इंतजार है।


आज नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी की 120वीं जयंती पर पूरा भारत उनके संघर्षों और योगदान को स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता है।


जय हिन्द। जय भारत।

अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर...















आज की ब्लॉग बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। जय हिन्द। जय भारत।

रविवार, 22 जनवरी 2017

कैंची, कतरन और कला: रविवासरीय ब्लॉग-बुलेटिन

पुस्तक मेला के दौरान एक रोज दोस्त चैतन्य आलोक से बात हो रही थी, तो उन्होंने बताया कि राज्य सभा टीवी पर “कविता कोष” के संस्थापक ललित कुमार जी का इंटरव्यू आ रहा था. इंटरनेट पर
इतना सारा लिखा पढ़ा जा रहा है और उसके बाद अब उन सभी लेखक-कवियों की किताबें भी छपने लगी है. इस पर ललित जी ने कहा कि इन रचनाओं की गुणवत्ता के साथ सबसे बड़ी  दिक्कत ये है कि वहाँ से “संपादन” यानि एडिटिंग समाप्त हो गई है. याद आया कि यही बात हमारे बड़े भाई राजेश उत्साही जी ने भी एक बार कही थी. कहानी-कविता इकट्ठा करके, किताब की शक्ल में छाप देना संपादन नहीं हो सकता.

टीवी से लेकर समाचार पत्र या पत्रिका तब तक प्रभावशाली नहीं हो सकती, जबतक उसका संपादन कसा हुआ नहीं हो. पत्रिका में मिज़ाज के हिसाब से रचना का चुनाव, उनका क्रम, पत्रिका का कलेवर, सम्पादकीय... ये सब इतना आसान नहीं है. आज भी कितनी सारी पत्रिकाएं (नंदन, पराग, कादम्बिनी, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग, दिनमान) अपनी सामग्री के अलावा उनके संपादकों के नाम से याद की जाती है. धर्मवीर भारती, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, कन्हैया लाल नंदन, मनोहर श्याम जोशी, राजेन्द्र अवस्थी, मृणाल पाण्डे ऐसे ही कुछ नाम हैं, जो बतौर साहित्यकार तो अपना एक स्थान रखते ही हैं, एक संपादक के तौर पर भी उनका मुकाम उसी बुलंदी पर रहा है.

फिल्मों में संपादन के महत्व को नकारा जा ही नहीं सकता है. किसी फ़िल्म से एडिटिंग को निकाल दीजिए, तो पूरी फ़िल्म एक कांच के घरौंदे की तरह गिरकर चूर-चूर हो जाएगी. आम तौर पर लोगों में यह प्रचलित धारणा है कि फ़िल्म एडिटर का काम अलग-अलग फिल्माए हुए दृश्यों को पटकथा के हिसाब से जोड़ देना है, जबकि यह काम इससे कहीं ज़्यादा मुश्किल है. फ़िल्म की गति बनाए रखना, फिल्मांकन की कलात्मकता को उभारना, निर्देशक की सोच को हू-ब-हू प्रस्तुत कर पाना, बेकार के दृश्यों को निकालना और दृश्यों को उनके प्रभाव के हिसाब से आगे पीछे बिठाना, यह सब एडिटर की जिम्मेवारी है. कई बार पूरी फ़िल्म की शूटिंग समाप्त हो जाने के बाद भी सिर्फ एडिटर के कहने पर कुछ नए दृश्यों को अलग से शूट करना पड़ा है, क्योंकि फ़िल्म की गति के लिये उनका होना ज़रूरी लग रहा होता है एडिटर को.

फ़िल्म के विभिन्न पहलुओं की चर्चा करते हुए हमने कभी इस एडिटर के बारे में सोचा ही नहीं. आपसे नाम लेने को कहा जाए, तो बमुश्किल कोई एक नाम आप गिना पाएंगे. याद कीजिये सीरियल “करमचंद” जो दो पंकज (निर्देशक पंकज पाराशर और अभिनेता पंकज कपूर) के लिये भले याद किया जाता हो, लेकिन सीरियल की लोकप्रियता का एक पहलू ए.के.बीर के अनोखे कैमरा ऐंगल और आफाक़ हुसैन की ज़बरदस्त एडिटिंग थी.

एक नज़र पुरानी फिल्मों पर डालें तो पाएंगे कि सारे अच्छे निर्देशक, बेहतरीन एडिटर भी रहे हैं. हृषिकेश मुखर्जी साहब को कौन नहीं जानता... उनकी निर्देशित फ़िल्में यादगार हैं. लेकिन वे इसलिए यादगार हैं कि उनकी एडिटिंग कमाल की थी. उन्हें नौकरी, मधुमती, आनन्द जैसी फिल्मों के लिये सर्वश्रेष्ठ संपादक का पुरस्कार मिला.

ऐसे ही एक निर्देशक और एडिटर थे विजय आनन्द. एक बेहतरीन एडिटर और उतने ही ख़ूबसूरत निर्देशक. फ़िल्म तीसरी मंजिल, गाइड, ज्यूल थीफ और जॉनी मेरा नाम में ओ हसीना जुल्फों वाली, काँटों से खींचके ये आँचल, होठों में ऐसी बात और पल भर के लिये कोई हमें प्यार कर ले का फिल्मांकन हो या इन्हीं फिल्मों की एडिटिंग जो आपको आख़िरी पल तक कुर्सी से बांधकर रखती है वो भी दम साधे हुए. फ़िल्म गाइड तो अपने आप में एक मील का पत्थर है और इसे उस मुकाम पर पहुंचाने वाला केवल एक शख्स था – विजय आनन्द, जिन्हें प्यार से लोग गोल्डी कहते थे. एक दीक्षित ओशो सन्यासी का सम्पूर्ण प्रभाव फ़िल्म गाइड की पटकथा और संवाद पर दिखाई देता है और यही कारण है कि इस फ़िल्म ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ संवाद और निर्देशन का फिल्मफेयर पुरस्कार दिलवाया.

अभिनय के मामले में वो बहुत सफल नहीं रहे. लेकिन कुछ बहुत ही अच्छी फ़िल्में उन्होंने ज़रूर कीं – कोरा कागज़, मैं तुलसी तेरे आँगन की, तेरे मेरे सपने और कुछ दूसरी फ़िल्में ज़रूर बतौर अभिनेता की उन्होंने. लेकिन आज भी फ़िल्म उद्योग के कुछ गिने चुने एडिटर्स में उनका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है.

साल २००७ में बनी फ़िल्म “जॉनी गद्दार” उनको समर्पित की गई श्रीराम राघवन द्वारा. यह एक बहुत छोटा ट्रिब्यूट था लेकिन बहुत माने रखता है. फ़िल्म का टाइटल भी ‘जॉनी मेरा नाम’ से लिया गया... फ़िल्म में कई जगह पात्रों को यही फ़िल्म देखते हुए दिखाया गया.

लेकिन इस बेहतरीन संपादक के काम को याद रखना और उसको ट्रिब्यूट देना कहाँ याद रहता है किसी को. लोग संपादक को सिर्फ इसलिए इसलिए याद रखते हैं कि वो कैंची चलाता है, और कोई भी अपने काम पर कैंची चलवाना पसंद नहीं करता, अहंकार जो उसके आड़े आ जाता है. ज़रा सोचिये कि आपके बेतरतीब बालों पर अगर कैंची न चले तो आपका यह चेहरा भला कैसे नूरानी चेहरा कहलाएगा.

तो आज की ब्लॉग-बुलेटिन का ट्रिब्यूट उस महान संपादक के नाम जिसका नाम है – विजय आनन्द!  

आज उनका जन्मदिन है और इससे बेहतर दिन कोई हो ही नहीं सकता उन्हें याद करने के लिये!! 


हैप्पी बर्थ डे गोल्डी सर!!

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