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गुरुवार, 31 मार्च 2016

अंतिम सत्य की तलाश में - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार मित्रो,

फ़ैजाबाद के डबल लॉक में रखे गुमनामी बाबा के सामानों के खुलासे ने उम्मीद जगाई है कि शायद नेताजी का सच अब सामने आ सके. सूचीबद्ध किये गए सामानों में परिवार के फोटो, अनेक पत्र, न्यायालय से मिले समन की वास्तविक प्रति से उनके नेताजी के होने का संदेह पुष्ट होता है. इसी तरह गोल फ्रेम के चश्मे, मँहगे-विदेशी सिगार, नेताजी की पसंदीदा ओमेगा-रोलेक्स की घड़ियाँ, जर्मनी की बनी दूरबीन-जैसी कि आज़ाद हिन्द फ़ौज अथवा नेताजी द्वारा प्रयुक्त की जाती थी, ब्रिटेन का बना ग्रामोफोन, रिकॉर्ड प्लेयर देखकर सहज रूप से सवाल उभरता है कि एक संत के पास इतनी कीमती वस्तुएँ कहाँ से आईं? इन सामानों के अलावा आज़ाद हिन्द फ़ौज की एक यूनिफॉर्म, एक नक्शा, प्रचुर साहित्यिक सामग्री, अमरीकी दूतावास का पत्र, नेताजी की मृत्यु की जाँच पर बने शाहनवाज़ और खोसला आयोग की रिपोर्टें आदि लोगों के विश्वास को और पुख्ता करती हैं. 





फ़ैजाबाद के रामभवन में प्रवास के दौरान किसी के भी सामने प्रत्यक्ष रूप में न आने वाले भगवनअथवा गुमनामी बाबाके देहांत की खबर वर्ष 1985 में आग की तरह समूचे फ़ैजाबाद में फ़ैल गई और लोग उनके अंतिम दर्शनों के लिए अत्यंत उत्सुक थे. ऐसे में भी उस रहस्यमयी व्यक्तित्व का रहस्य बनाये रखा गया और उनका अंतिम संस्कार सरयू नदी किनारे कर दिया गया. देश का सच्चा सपूत आज़ादी के बाद भी भले ही गुमनाम बना रहा किन्तु उनकी भतीजी ललिता बोस और देशवासी रामभवन में मिले सामानों के आधार पर गुमनामी बाबा को ही नेताजी स्वीकारते रहे. ये महज संयोग नहीं कि इनके लम्बे संघर्ष पश्चात् सरकार द्वारा गुमनामी बाबा के 2761 सामानों की एक सूची बनाई गई जो फैजाबाद के सरकारी कोषागार में रखे हुए हैं. रामभवन के उत्तराधिकारी एवं नेताजी सुभाषचंद्र बोस राष्ट्रीय विचार केंद्र के संयोजक शक्ति सिंह द्वारा 13 जनवरी 2013 को याचिका दाखिल कर अनुरोध किया कि भले ही ये सिद्ध न हो पाए कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे किन्तु गुमनामी बाबा के सामानों के आधार पर कम से कम ये निर्धारित किया जाये कि वो रहस्यमयी संत आखिर कौन था? न्यायालय के आदेश पश्चात गुमनामी बाबा के 24 बड़े लोहे के डिब्बों और 8 छोटे डिब्बों अर्थात कुल 32 डिब्बों में संगृहीत सामानों को जब सामने लाया गया तो देश के एक-एक नागरिक को लगने लगा कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे.

हाल फिलहाल तो गुमनामी बाबा का सामान सूचीबद्ध करके पुनः डबल लॉक में है. यदि न्यायालयीन आदेश पर इस सामान को संग्रहालय के रूप में सार्वजनिक किया गया तो ये भी लोगों के विश्वास की जीत ही होगी किन्तु अंतिम विजय का पर्दा उठाना अभी शेष है. इस आशा और विश्वास के साथ कि इस रहस्य से पर्दा उठे, आज की बुलेटिन का आप सब आनन्द उठायें. जयहिन्द...


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(सभी चित्र गूगल छवियों के द्वारा विभिन्न वेबसाइट से साभार ली गई हैं)

बुधवार, 30 मार्च 2016

ब्लॉग बुलेटिन और आनंद बख्शी

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।।
आनंद बख्शी

आनंद बख़्शी का जन्म पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर में 21 जुलाई 1930 को हुआ था। आनंद बख़्शी को उनके रिश्तेदार प्यार से नंद या नंदू कहकर पुकारते थे। बख़्शी उनके परिवार का उपनाम था, जबकि उनके परिजनों ने उनका नाम 'आनंद प्रकाश' रखा था, लेकिन फ़िल्मी दुनिया में आने के बाद 'आनंद बख़्शी' के नाम से उनकी पहचान बनी। आनंद बख़्शी के दादाजी सुघरमल वैद बख़्शी रावलपिण्डी में ब्रिटिश राज के दौरान सुपरिंटेंडेण्ट ऑफ़ पुलिस थे। उनके पिता मोहन लाल वैद बख़्शी रावलपिण्डी में एक बैंक मैनेजर थे, और जिन्होंने देश विभाजन के बाद भारतीय सेना को सेवा प्रदान की। नेवी में बतौर सिपाही उनका कोड नाम था 'आज़ाद'। आनंद बख़्शी ने केवल 10 वर्ष की आयु में अपनी माँ सुमित्रा को खो दिया और अपनी पूरी ज़िंदगी मातृ प्रेम के पिपासु रह गए। उनकी सौतेली माँ ने उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। इस तरह से आनंद अपनी दादीमाँ के और क़रीब हो गए। आनंद बख़्शी साहब ने अपनी माँ के प्यार को सलाम करते हुए कई गानें भी लिखे जैसे कि "माँ तुझे सलाम" (खलनायक), "माँ मुझे अपने आंचल में छुपा ले" (छोटा भाई), "तू कितनी भोली है" (राजा और रंक) और "मैंने माँ को देखा है" (मस्ताना)। 



आनंद बख्शी जी 14वीं पूण्यतिथि पर हिन्दी ब्लॉगजगत और हमारी ब्लॉग बुलेटिन टीम उन्हें शत शत नमन करता है तथा भावविभोर श्रद्धांजलि अर्पित करता है। सादर।। 



अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर..........


अंतिम सत्य अभी शेष है

ब्लॉगर मंडली खिलखिला उठी बैंगलोर में

पैसा बचाने के तरीके

जब पंवारों की छोटी सी सेना के आगे भागी थी भरतपुर की शक्तिशाली सेना

गुलामी की पीड़ा : भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रासंगिकता - वीणा भाटिया/मनोज कुमार झा

मनोहर श्याम जोशी लेखन के ज्वालामुखी थे

मन चंगा तो कठौती में गंगा

न्यूज़ ब्रेक करता है सोशल मीडिया

क्या विजय माल्या को भारत वापस लाया जा सकता है?

माँ कहती थी आ गौरैया कनकी चांवल खा गौरैया

आजकल


आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे। तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर  … अभिनन्दन।।

मंगलवार, 29 मार्च 2016

अपनी कलम को निःस्वार्थ रखिये



जीवन के अंश अंश को लिखनेवाला कोई वाल्मीकि हो 
हर दृश्य को शब्दों में उपस्थित करने को वेद व्यास हो 
तो - व्यक्तित्व के कई पहलू स्थापित होते हैं !
सोचिये 
यदि वाल्मीकि राम से प्रतिस्पर्धा रखते 
तो रामायण' की रचना नहीं होती 
राम का हर पहलु उजागर नहीं होता
....
तो अपनी कलम को निःस्वार्थ रखिये 

सोमवार, 28 मार्च 2016

मंथन से अलग चलना ही है




ज़िन्दगी तुम्हारी भी तय थी 
ज़िन्दगी हमारी भी तय थी 
कभी तुमने शकुनि को नहीं पहचाना 
कभी मैंने 
पर दाव तो जीने के हमदोनों ने खेले थे !!!
भूमिका, कहानी, उपसंहार  ... 
कोई क्या कर लेगा ये जानकर 
कि तुम्हारे पास प्रेम के पासे थे 
सामनेवाले ने छल के पासे फेंके 
कुरुक्षेत्र तो बन ही गया न 
और अभिमन्यु  ... !!!
अब जयद्रथ को मारो 
या चिता सजाओ 
घटनायें तो घट चुकीं 
... 
और सुकून ???
कहाँ है ?
कब तक है ?
इस मंथन से अलग चलना ही है  
जब तक निर्धारित है 
जिस तरह निर्धारित है 
!

रविवार, 27 मार्च 2016

एक अधूरी ब्लॉग-बुलेटिन

जब हम बहुत छोटा थे त एगो कहानी हमारे कोर्स के किताब में था. एगो लड़का एक रोज अपने इस्कूल से अपने कोनो साथी का पेंसिल अपने साथ ले आया. जब घर में उसकी माँ देखी त ऊ लड़का बताया कि उसके सहपाठी का है. माँ कुछ नहीं बोली. फिर धीरे-धीरे ऊ लड़का रोज एक न एक चीज इस्कूल से लेकर आने लगा अऊर उसकी माँ कभी कुछ नहीं बोली. समय बीतता गया अऊर देखते देखते ऊ लड़का जवान हो गया. अब ऊ छोटा-छोटा चीज नहीं चोराता था, बल्कि बड़ा-बड़ा चोरी करने लगा था. खाली चोरी भी नहीं, उसके अपराध के लिस्ट में हर तरह का अपराध सामिल था.

एक रोज ऊ पकड़ा गया अऊर उसको हत्या के इल्जाम में फाँसी का सजा सुनाया गया. जब उससे उसका आखरी इच्छा पूछा गया तो बोला कि ऊ पना माँ से मिलकर उसको कुछ कहना चाहता है. जब उसकी माँ को बुलाया गया तो ऊ माँ के कान में कुछ बोला अऊर माँ का कान काट लिया. जब जज उसको पूछा कि ऊ कान में का बोला था, तो ऊ जवाब दिया, “हम अपनी माँ के कान में बोले कि जब हम पहिला रोज पेंसिल लेकर  आए थे इस्कूल से, अगर ओही रोज ऊ मेरा कान खींचती त आज हम फाँसी के फन्दा पर नहीं होते!”

अब ई कहानी में माँ काहे है, बाप काहे नहीं, ऊ लड़का का तर्क केतना सही है केतना गलत, ऊ लड़का का अपराधी बनने के पीछे खाली बचपन में चोराया गया पेंसिल का हाथ था या अऊर भी केतना कारन था... ई सब सवाल का जवाब ऊ कहानी में नहीं था. पढा लिखा लोग सोच सकता है, समाजसास्त्र का लोग इसका कारन खोज सकता है अऊर मनोबैग्यानिक लोग इसका बिस्लेसन कर सकते हैं. लेकिन ई कहानी भी आज बड़ा होकर बहुत जटिल हो गया है, जटिल होता हुआ अपराध के जइसा.

निर्भया काण्ड के बाद बी.बी.सी. एगो डॉक्युमेण्टरी बनाया था जिसमें निर्भया के माँ-बाप के मुँह से निर्भया के निर्मम अपराधी को जुवेनाइल कहते हुये देखाया था, जैसे: जुवेनाइल ने ये किया, जुवेनाइल ने वो किया. अइसा लगता था कि ऊ अपराधी का नाम जुवेनाइल है. उसका नाम छुपाना, अपराध छुपाना अऊर उसको सुधरने का मौका देना. वाह, कमाल है.

अब ई बात त बैग्यानिक लोग बता सकते हैं कि आदमी का दिमाग केतना उमर तक पूरा हो जाता है अऊर आदमी का चरित्र केतना उमर तक फाइनल हो जाता है. हालाँकि बहुत सा सिनेमा में देखाया गया है कि आदमी का चरित्र उसका परिस्थिति अऊर माहौल से बनता है या उसके खून के हिसाब से निर्धारित होता है, माने चोर का बेटा चोर. राज कपूर साहब ‘आवारा’ फिलिम में बताते हैं कि खराब माहौल खराब इंसान बनाता है अऊर दोसरा तरफ ‘धरम करम’ फिलिम में एही बात को उलट कर बताते हैं कि अच्छा माँ-बाप का बेटा अच्छा होता है, परिस्थिति चाहे जइसा हो.

अभी दिल्ली में डॉ. नारंग के हत्या का मामला गरमाया हुआ है. बहुत सा लोग को इसमें राजनीति देखाई दे रहा है. बहुत सा लोग ई सरकार को दोसी, अऊर ऊ सरकार  को चुस्त चौबन्द बता रहा है. हैश-टैग के जमाना में हैश-टैग क्रांति फैला हुआ है.

हम ई सोच रहे हैं कि इसमें भी दू-चार ठो जुवेनाइल सामिल है. जुवेनाइल के माय भी सामिल है. अब मीडिया, मानवाधिकार अऊर बाल मनोबैग्यानिक लोग उसको बचाने आएंगे अऊर डॉ. नारंग का मौत नारा बनकर रह जाएगा.

कभी-कभी बुझाता है कि कुछ लिखना बेमकसद रह जाता है. कोई कंक्लूडिंग रिमार्क नहीं सूझता है. त जाने दीजिये अधूरा पोस्ट छोड़ देते हैं. आप लोग समझदार हैं, सरकार सम्बेदनसील है, त कनक्लूड करिये लीजियेगा. बस इति!
                                                                                                                           सलिल वर्मा 

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अस्पताल के उस कमरे

विजय गौड़ at लिखो यहां वहां

गुरुभक्त बालक

हीरामन

माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेसी...?

आनन्द वर्धन ओझा at मुक्ताकाश....

आओ भी

चला निर्देशक हीरो बनने !

अनंत विजय at हाहाकार

कहानी - विजया - जयशंकर प्रसाद

बंधन कच्चे घागों का

Asha Saxena at Akanksha 

भोजपुरी बैटमैन बिरुद्ध सुपरमैन

याचक नहीं हूं मैं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

हम जैसे सख्त जान भी, बरबाद हो गए ! -सतीश सक्सेना

Satish Saxena at मेरे गीत !
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शनिवार, 26 मार्च 2016

वोटबैंक पॉलिटिक्स - ब्लॉग बुलेटिन

भारत एक लोकतांत्रिक देश है, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र जहाँ हर पांच साल में देश की सरकार चुनी जाती है। यहाँ केंद्र और राज्य के बीच फेडरलिज़्म (संघीय) शासन प्रणाली है। यह दोनों की अंग एक दूसरे के साथ काम करते हैं। इस लोकतान्त्रिक प्रणाली का आधार 1939 में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित GOIAct है। इस एक्ट में भारत को ब्रिटिश उपनिवेश माना गया और नेहरू के सत्ता हस्तांतरण के बाद उसी पर जल्दीबाजी में भारत का संविधान थोप दिया गया। ध्यान देने योग्य बात यह है कि हमारी स्वतंत्रता का प्रस्ताव ब्रिटिश संसद ने पारित किया था और यह स्वतंत्रता हमें लड़कर या ब्रिटिश हुकूमत को किसी युद्ध में पराजित कर नहीं मिली थी। बहरहाल लोकतंत्र की बहाली के बाद असंगठित हिंदू कभी भी किसी भी राजनैतिक दल के लिए वोटबैंक नहीं रहे। वहीँ संगठित और फतवे के आधार पर वोट देने वाले मुस्लिम कांग्रेस के वोट बैंक बने रहे। कांग्रेस ने इस वोट बैंक की राजनीति को खुलकर समर्थन दिया और यह एक आम बात हो गयी। हिन्दू में भी कई धड़े अलग अलग समुदाय के नाम से अलग होने लगे और दलित स्वयं को हिन्दू कहलवाने से झिझकने लगे। बाबा साहेब के अनुयायी यह वर्ग प्रचंड रूप से संगठित था और इस कारण जल्दी ही राजनीतिक दलों को उनका महत्त्व समझ में आ गया। यह दलित और मुस्लिम वर्ग अब भारत में सबसे संगठित वोट बैंक है और प्रत्येक राजनीतिक दल उन्हें खुद की ओर आकर्षित करने के लिए लोक लुभावन प्रलोभन देता रहा(बेवकूफ बनाता रहा)। यह कांग्रेस पोषित वोट बैंक की कौम थी सो कांग्रेस पोषित मीडिया ने भी उसके वोट बैंक बनाए रखने के लिए कवरेज के हिन्दू विरोधी तौर तरीके अपना लिए। कांग्रेस ने भी मेन स्ट्रीम मीडिया को खड़ा करने के लिए अपनी पसंद के प्यादों को खड़ा किया। इन मीडिया के प्रतिनिधि कांग्रेस के खिलाफ बहुत कम ही मौकों पर गए और मुख्य रूप से सरकारी चारण-भाट बनकर रहे। इसका नुकसान यह हुआ कि हिन्दू जो कि युगों युगों से असंगठित था वह और भी किनारे होता गया। मीडिया और कांग्रेस, सपा, बसपा जैसे राजनैतिक दल खुलकर जाति आधारित लाइन लेने लगे। खुलकर बयान आने लगे, खुलकर इमाम के फतवे आने लगे और किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि मीडिया में तो पहले ही सेटिंग थी और बाकी सब "चलता है, पॉलिटिक्स है" कहकर खुद को समझा लिया गया। बांग्लादेश से वोटर लाये गए, उन्हें बसाया गया और पूरा राजनैतिक संरक्षण दिया गया। देश की जनता को इसमें कुछ भी अजीब नहीं लगा। 

तकलीफ शुरू हुई जब 2014 में मोदी का चुनाव हुआ क्योंकि इस चुनाव में पहली बार हिन्दू संगठित हुआ। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस चुनाव में भी मुस्लिम समुदाय ने भाजपा को वोट नहीं दिया था। इस चुनाव के बाद मुस्लिम नेता, कांग्रेस और मीडिया बौखला गयी क्योंकि उसकी बनी बनाई सिस्टम के बाद भी उसकी हार हुई, यह अल्पसंख्यक और जाति आधारित राजनीति करने वाले अब खुलकर अपने हिन्दू विरोधी एजेंडे पर आ गए। अब यह स्थिति है कि रोहित वेमुला के बंद कमरे में खुद की परिस्थितियों से नाखुश होकर किये गए आत्महत्या पर छः महीने चिल्लाते हैं लेकिन उन्हें मालदा नहीं दिखता। वह एक गाँव की घटना को मुस्लिम विरोधी और असहिष्णु भारत से जोड़ देते हैं लेकिन उन्हें प्रशांत पुजारी नहीं दीखता है। जेएनयू के भारत विरोधी नारे अभिव्यक्ति की आज़ादी बने लेकिन वहीँ कमलेश तिवारी के (पता नहीं क्या टिप्पणी की थी इस आदमी ने) कथित विरोध बयान पर रोना पीटना मच गया। स्थिति अब इस हद तक है की स्क्रीन काली करके पत्रकार देश के असहिष्णु होने की बात कह देते हैं लेकिन वह कभी खुद को जातिवाद से ऊपर उठा ही नहीं पाते। उन्हें इतना घनघोर विषैला बनाने वाली कांग्रेस चुप चाप सिर्फ तमाशा देखती है क्योंकि उसे पता है कि अगली बार फिर से जब अपनी आदत के अनुसार हिन्दू असंगठित होंगे तो फिर से वह उसी जातिगत राजनीति की सीढ़ी पर सत्ता प्राप्त कर लेगी। 

अभी ताज़ा उदाहरण दिल्ली के डॉक्टर नारंग का है जिन्होंने मामूली सी घटना पर अपनी जान गँवा दी। तीस पैतीस लोगों का संगठित समूह जिसमे कथित तौर पर चार नाबालिग थे और हॉकी, विकेट, बल्ले से सुसज्जित यह लोग डॉक्टर साहब की जान ले गए। आदतन मेन स्ट्रीम मीडिया (जोकि दादरी को देश के असहिष्णु होने से जोड़ रहा था) उसे अब सांप सूंघ गया होगा। अब वह तब तक इंतज़ार करेगा जब तक उसे इस वोट बैंक वाली कौम को बचाने के लिए कोई तर्क या सेटिंग नहीं मिल जायेगी। ऐसा करना उसको विरासत में मिला है तो वह करेगा ही। अब भी अगर देश की जनता नहीं चेती तो वह दिन दूर नहीं जब भारत में यह वोटबैंक सब कुछ ले डूबेगा। मैं चिंतित हूँ बहुत लेकिन आप आराम से टीवी पर मैच देखिएगा, कोई फर्क नहीं पड़ता है न, सब चलता है न.... मैं बुलेटिन और पूरे ब्लॉग जगत की ओर से ऐसे जाति आधारित वोटबैंक पॉलिटिक्स की भर्त्सना करता हूँ, ऐसा राजनीतिक खेल जिसमे जनता को सिर्फ जात से जाना पहचाना जाता हो, उसे मैं परिपक्व लोकतंत्र तो नहीं ही कह सकता हूँ!!!

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ये उम्मीद इन दिनों तोड़ देती है......

प्रकृति और समाज पर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद - १

मेरा ९ वां जन्मदिन

भूतों के डेरे वाले गोलकोंडा में बिताया हमने वक्त

देखो परख लो सच सभी इस प्यार से पहले ...

बच्चों को जरूर पढ़ाएं ये किताबें---।

तेरी दहलीज पर कुछ इंतजाम हो जाए

हिन्दू धर्म, आध्यात्म और हम

विरोध के लिए अब शहीदों का अपमान करती कांग्रेस

महापुरुषों का चरित्र-हनन कांग्रेस के नैतिक पतन की पराकाष्ठा

" लग जा गले कि फिर ........"

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शुक्रवार, 25 मार्च 2016

एक बार पुकार तो सही !




तेरे मटके की सोंधी सी खुशबू
और इश्क़ का पानी
चनाब में बुलाता है तैरने को

आ जाऊँगी पाजेब उतारकर
एक बार हीर' कहकर बुला
ओ रांझे एक बार हीर' कहकर पुकार तो सही …
इश्क़ दा आगे कोई डर नहीं
वारिस शाह की आँखों में छुप जायेंगे
लिखता रहेगा वो प्रेम कहानी
सदियों पहले मिलकर भी मिल न पाये
ज़माना कुछ बदल गया है
एक बार पुकार तो सही !

बस एक बार - ज़िन्दगी…


अब ये पड़ाव अपना होकर रहेगा
सोचता रहता है आदमी
इस शहर से उस शहर
इस गली से उस गली
.... पड़ाव बदलते रहते हैं
एक घर,
थोड़ी जमीन
खरीद भी लो
तो भी
शहर, गली, पड़ाव
बदलते जाते हैं
खानाबदोश सी ज़िन्दगी से बढ़कर
नहीं होती ज़िन्दगी !
कभी अपने विस्तार के लिए
कभी बच्चों के विस्तार के लिए
घर,
शहर छोड़कर
नए शहर में
नई पहचान के लिए बढ़ना होता है
छत अंततः किराये की होती है
असली घर वही होता है
जहाँ सब इकट्ठे होते हैं
…… जहाँ नींद - वहाँ सपने
वही घर .... जहाँ सुबह
खानाबदोश सी होती है सुबह
कभी गाँव में
कभी पहाड़ों पर
कभी सागर के किनारे
कभी अजनबी रास्तों पर ....
पैसा पैसा जोड़कर
व्यवहारिक सोच का परिणाम
मेरा' है के सुकून के लिए
होता है एक घर
और फिर
पूरी उम्र किराया बैंक को !
अंततः यही सुकून
बनता है बँटवारे का मुद्दा
और किसी मुहाने पर हो जाती है मौत …
आनन-फानन में
बगैर किसी पसंद के
मिलता है - श्मशान का कोना
किसी खानाबदोश की तरह

और कहानी खत्म !!!

रश्मि .... 

गुरुवार, 24 मार्च 2016

ब्लॉग बुलेटिन पर ब्लॉगर होली मिलन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों ,
प्रणाम |
आज हिन्दी ब्लॉगर मित्रों का एक होली मिलन समारोह आयोजित किया गया ... मजे की बात यह की इस आयोजन कोई कहीं भी आया गया नहीं ... फिर भी होली मिलन हो ही गया | देश - विदेश के लगभग ३३ ब्लॉगर मित्रों ने इस मे अपने अपने बंधु - बांधव और परिवार के साथ शिरकत की |

अब आप सोचे रहे होंगे कि कैसे !!??

तो देखिये यह चमत्कार कैसे हुआ !!
चित्र पर क्लिक कर बड़ा करें 
 ब्लॉग बुलेटिन की पूरी टीम की ओर से आप सभी को होली की हार्दिक मंगलकामनाएँ|

हैप्पी होली ... ;)
सादर आपका 

बुधवार, 23 मार्च 2016

शहादतपूर्ण होली को नमन - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार मित्रो
आज का दिन, 23 मार्च अपने आपमें बहुत ख़ास है. आज शहीद दिवस है, लोहिया जी का जन्मदिन है और इस वर्ष आज ही होली मनाई जा रही है. ये बात तो सभी लोग जानते हैं कि लोहिया जी ने जमीनी राजनीति का एक मानक स्थापित किया और इसी के चलते वे आज भी राजनीति में एक स्तम्भ के रूप में स्वीकारे जाते हैं. लोहिया जी के बारे में इस तथ्य को भी सभी को ज्ञात होना चाहिए कि उन्होंने ने अपना जन्मदिन कभी इसलिए नहीं मनाया क्योंकि इसी दिन भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को फाँसी दी गई थी. ये अपने आपमें उनके प्रति लोहिया जी की श्रद्धांजलि है. एक तरफ राजनीति में ऐसे प्रेरक व्यक्तित्व हैं दूसरी तरफ वर्तमान में ऐसे राजनैतिक व्यक्तित्व हैं जो शहीद भगत सिंह के सापेक्ष देशद्रोही मामले के आरोपी को खड़ा कर रहे हैं. जेएनयू मामले में देशद्रोह के आरोपी कन्हैया, जो सशर्त जमानत पर रिहा होने के बाद से केंद्र सरकार-विरोधी तत्त्वों द्वारा जबरिया हीरो बनाया जा रहा है, के देशद्रोही होने न होने को अदालत में साबित किया जायेगा किन्तु जिस तरह से उसे भगत सिंह के समान बताया गया वो निंदनीय है. एक पल को कन्हैया-समर्थकों की इस दलील को स्वीकार भी लिया जाये कि जेएनयू में लगने वाले देश-विरोधी नारों में उसकी सहभागिता नहीं थी; माना कि उसने नारे नहीं लगाये थे मगर इस बात से किसी को इनकार नहीं है कि उस शाम उस संस्था में देश-विरोधी नारे लगे; देश की बर्बादी के नारे लगे; अफज़ल को शहीद घोषित करने के नारे लगे. ठीक इसी बिंदु पर आकर कन्हैया-समर्थकों से मात्र एक सवाल कि यदि ऐसे नारे भगत सिंह के सामने लगे होते तो उनकी प्रतिक्रिया क्या होती?



ऐसे हालात में अक्सर दिमाग संज्ञा-शून्य हो जाता है कि आखिर देश की राजनीति, राजनीतिज्ञ किस दिशा में जा रहे हैं? सरकार-विरोध, प्रधानमंत्री-विरोध करते-करते ये लोग देश-विरोध में संलिप्त हो गए हैं. कितनी बड़ी विडम्बना है कि एक तरफ पाकिस्तान में भगत सिंह की सजा के विरोध में अदालत में सुनवाई पुनः आरम्भ कर उनके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया जा रहा है, दूसरी तरफ यहाँ भारत में किसी भी ऐरे-गैरे से उनकी समानता कर भगत सिंह का अपमान किया जा रहा है. लोगों का शांत रह जाना ऐसे माहौल को और बल देता है. काश कि लोग अपनी-अपनी ख़ामोशी को तोड़कर देश-विरोधी ताकतों को मुंहतोड़ जवाब दें.

अंत में शहीदों को नमन करते हुए आप सभी को पावन पर्व होली की शुभकामनाओं सहित आज की बुलेटिन आपके समक्ष पेश है.

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मंगलवार, 22 मार्च 2016

प्राकृतिक उद्देश्य



यूँ मैं जमीन पर ही कल्पना करती हूँ 
जमीन पर ही जीती हूँ 
पर कई बार 
हौसलों की खातिर 
क्षितिज से मिल आती हूँ :)
ले आती हूँ थोड़ी चिंगारी 
जंगल में फैली आग से 
समेट लाती हूँ कुछ कतरे 
जल,वायु,अग्नि,धरती - आकाश से 
जमीन पर खड़े रहने के लिए। 
सूरज से वाष्पित कर अपने को 
मैं आकाश से जमीन पर उतरती हूँ 
गंगा बनने का हर सम्भव प्रयास करती हूँ … 
क्षितिज खुले आकाश में 
धरती के सीने से दिखता है 
सूरज को मुट्ठी में भरने की ख्वाहिश 
धरती से होती है 
तो जमीनी कल्पना में ही 
मुझे जमीनी हकीकत मिलती है 
जमीनी ख़ुशी जमीनी दुःख 
जमीन से जुड़ा ज़मीर 
जमीन से उगती तक़दीर 
यही मेरी सम्पत्ति है 
इसी सम्पत्ति से मैं स्वयं का निर्माण करती हूँ 
शिव की जटाओं से निःसृत होती हूँ 
……… धरती के गर्भ में पावन गंगा सी बहती हूँ 
जमीनी हकीकत जब पवित्र नहीं रह जाती 
तब काल्पनिक पाताल में अदृश्य हो 
शिव तांडव में प्रगट होती हूँ 
न स्वयं को खोती हूँ 
न स्वयं में खोती हूँ 
मैं जमीनी कल्पना और हकीकत के बीच 
निरंतर जागती हूँ 
भयाक्रांत करती लपटों से घिरकर 
अविचल 
कल्पनाओं का जाप 
हकीकत के तपिश में करती हूँ 
हकीकत का जीर्णोद्धार 
कल्पनाओं के रंगों से करते हुए 
सृष्टि के गर्भ में अदृश्य कारीगरों का आह्वान करती हूँ 
कल्पना और हकीकत को एकसार करने में 
मैं पल पल जीती हूँ 
पल पल अपने जन्म को एक काल्पनिक सार्थकता देते हुए 
मैं हकीकत के ऐतिहासिक पन्नों में उतरती हूँ 
कल्पना को हकीकत 
हकीकत को कल्पना बनाना 
- जमीन से जुड़ा मेरा प्राकृतिक उद्देश्य है

सोमवार, 21 मार्च 2016

बंजारा

सभी ब्लॉगर मित्रों को राम राम....

आज के दिन का आगाज़ करती हूँ सीमा दी के एक गीत के साथ जो सभी रचनाकारों को समर्पित है......
चूल्हा और किसी के घर का 
किसी और का है भंडारा 
और किसी का पत्तल-दोना
किसी और का है चटकारा
यहां वहां से मांग-तांग कर 
हल्ला-गुल्ला,गर्जन-तर्जन
बहरे कानो ने लिख डाले 
जाने कितने क्रंदन-कूजन
राम राम जप धरा जेब में 
माल पराया मीठा-खारा
फुटपाथों की भोर-निशाएं
'
पाँच सितारा' ने रच डाली 
भरे हुए पेटों ने परखी 
भूख-प्यास की रीती थाली
पनही गाये फटी बिवाई
ले सिसकारी का इकतारा
खुले व्योम ने लिखी कथाएं 
पिंजरे वालों के पाँखों की 
नदियों ने खींची तस्वीरें 
तृषा भरी जलती आँखों की
कुल-कुनबे के गीत रच रहा 
गलियों में फिरता बंजारा.......सीमा अग्रवाल
एक नज़र आज के बुलेटिन पर
आज की बुलेटिन में बस इतना ही मिलते है फिर इत्तू से ब्रेक के बाद । तब तक के लिए शुभं।