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रविवार, 29 दिसंबर 2019

2019 का वार्षिक अवलोकन  (सत्ताईसवां)




डॉ. मोनिका शर्मा का ब्लॉग

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आपसी रंजिशों से उपजी अमानवीयता चिंतनीय


अमानवीय सोच और क्रूरता की कोई हद नहीं बची है अब | छोटी-छोटी बातों से उपजी रंजिशें रक्तपात की घटनाओं का कारण बन रही हैं | हाल ही में अलीगढ़ के टप्पल इलाके में  तीन साल की बच्ची की नृशंस हत्या इसी की बानगी है |  गौरतलब है कि  हाल ही में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में  महज 10 हजार रुपए के लिए इस घटना को अंजाम दिया गया। यह रकम बच्ची के पिता से उधार ली गई थी और आरोपी उसे वापस नहीं कर पाया था।  जिसके चलते आरोपी और बच्ची के पिता के बीच बहस हुई थी |  सवाल है इस पूरे प्रकरण में उस मासूम की क्या गलती है ?  उसे किस बात की सजा दी गई ? जबकि उधार चुकाने को लेकर   परिवारजनों से बहस करने वाले आरोपी ने अपने  साथी के साथ मिल कर  बच्ची का अपहरण किया और फिर हत्या कर कूड़े में फेंक दिया | पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक, मौत का कारण दम घुटना  है | लेकिन मौत से पहले  बच्ची को बहुत ज़्यादा पीटा गया है |  आत्मा को झकझोर देने वाले इस मामले में मासूम बच्ची का सड़ा-गला देखकर शव पुलिसवालों का  ही नहीं  पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सकों का भी दिल दहल गया |

 दरअसल, आपसी रंजिश, बेवजह का आक्रोश और नैतिक पतन ऐसी अमानवीय घटनाओं को अंजाम देने वाले अहम् कारण बनते जा रहे हैं |  दुःखद है कि ऐसी अमानवीय वृत्तियाँ अब इंसानी मन पर कब्ज़ा जमाकर बैठ गई हैं | नतीजनतन,  ना सही गलत सोचने की सुध बची है और ना ही इंसानियत  का मान करने का भाव | ऐसे में मन को झकझोर  देने वाली इन  घटनाओं की पुरावृत्ति इनका सबसे दुखद पहलू है | छोटी बच्चियों के साथ बर्बरता की बात हो या आपसी रंजिश के चलते  जान ले लेने का मामला | ऐसी घटनाएं आये दिन हो रही हैं |  आस-पड़ोस हो,  रिश्तेदारी हो या कोई सड़क पर चलता कोई अनजान इंसान | जाने कैसा आक्रोश  है कि जान  ले लेने की बर्बर घटनाएं बहुत आम हो गई हैं  ?  इस मासूम बच्ची की हत्या की  जड़ में  भी मात्र दस हजार रुपये की उधारी ही है |

आजकल हर छोटी बात में सबक सिखाने या बदला लेने की सोच भी हावी रहने लगी है | इस मामले में भी आरोपी ने स्वीकारा है  कि उसने बेइज्जती का बदला लेने के लिए अपने साथी के  संग मिलकर  इस भयावह  घटना को अंजाम दिया है । अफसोसनाक है कि  प्रशासन-तंत्र की विफलता भी ऐसी बढती घटनाओं के लिए जिम्मेदार है |  जब तक ऐसा कोई मामला  तूल नहीं पकड़ता कोई सक्रियता नहीं दिखाई जाती   इतना ही नहीं हमारी लचर कानून व्यवस्था भी में अपराधियों को दंड का भय नहीं है |

हालिया सालों में रंजिशों के कारण हो रही हत्याओं के आंकड़े तेज़ी से बढ़े हैं | इनमें सियासी रंजिशों से लेकर सामाजिक-पारिवारिक स्तर पर भी प्रतिशोध लेने के मामले शामिल हैं |  हाल ही में सामने आये  दिल्ली पुलिस  के आंकड़ों  बताते हैं कि देश राजधानी में  वर्ष 2017 में 462 के मुकाबले 2018 में 477 लोगों की  हत्या कर दी गई। इनमें सबसे ज्यादा 38 प्रतिशत लोगों को किसी न किसी रंजिश की वजह से जान गंवानी पड़ी। हर दो दिन में औसतन तीन लोगों को किसी न किसी वजह से मौत के घाट उतार दिया गया। कई मामलों में तो बेहद छोटी सी बात पर  किस इंसान की जान ले ली गई है | कभी -कभी बरसों के मनमुटाव के बाद ऐसी घटनाओं को सोच-समझकर अंजाम दिया जाता है |  गाँव-कस्बे हों या महानगर  क्रोध और प्रतिशोध का भाव इस हद तक बढ़ गया  है कि  मामूली रंजिश में भी लोग परायों को ही नहीं अपनों को भी दर्दनाक मौत देने में नहीं चूक रहे | ऐसे  भी मामले हुए हैं जिनमें केवल शक के आधार पर आवेश में आकर अपनों-परायों की जान लेने के अपराध हुए हैं |  निःसंदेह, इन घटनाओं की बढ़ती संख्या बताती है कि अब नैतिकता के कोई मापदण्ड नहीं बचे हैं |   बस, कहीं बदला लेने का भाव बाकी है तो कहीं सबक सिखाने की सोच |

विचारणीय है कि इन मामलों से अब एक और पहलू भी जुड़ गया है | अब मन को उद्वेलित करने वाली इन घटनाओं के प्रति भी जुर्म का विरोध करने का  भाव  नहीं बल्कि चुनी हुई चुप्पी या मुखरता देखने को मिलती है | सवाल यह है कि जिस समाज में जघन्य अपराधों का विरोध भी सलेक्टिव अप्रोच के साथ किया जाये वहां आपराधिक  प्रवृत्ति के लोगों को डर हो भी तो  किसका ?  अब इस बंटे हुए समाज में बेटियों को सुरक्षा का भरोसा दे भी कौन ?  हाँ,  हम भूल रहे हैं कि धर्म, सम्प्रदाय और  जात -पात के खांचे में  बंटकर हम इस अमानवीयता को और  खाद  पानी दे रहे हैं | जबकि इस  भेदभाव का फर्क तक ना समझने वाली  मासूम बच्चियां आये दिन हो रहे बर्बर मामलों में एक इंसान होने की ख़ता की सजा भोग रही  हैं | ऐसी घटनाओं को लेकर दी जा रहीं प्रतिक्रियाएं हों या मौन रहने चुनाव  | समाज के  विद्रूप हालातों के बारे में  तो सोचा  ही नहीं जा रहा है | सार्थक कानूनी बदलावों और सक्रिय कार्रवाई करने का दबाव बनाने के बजाय बहुत कुछ आरोप-प्रत्यारोपों तक सिमट जाता है | जिसका फायदा आपराधिक प्रवृत्ति के लोग उठाते हैं | कानून और प्रशासनिक अमले की लचरता तो  पहले से ही निराश करने वाली है |  ऐसे में समाज का यूँ   बंटना वाकई तकलीफदेह है |

यह एक कटु सच है कि समाज में हर स्तर पर लोगों में असंतोष और अधीरता की भावना पनप रही है।  ऐसी  घटनाएं आक्रोश, असहिष्णुता और मानसिक रुग्णता की  बानगी बन रही हैं  | आज की आपाधापी ने सबसे पहले हमारा धैर्य ही छीना है | जिसके चलते नकारात्मकता और बेरहमी भी हमारे जीवन में घुसपैठ करने में कामयाब हुई है | अफ़सोस कि यह हिंसक व्यवहार अब आम जीवन में  अपनी इतनी दखल रखने लगा है कि ऐसे बर्बर मामले सामने आ रहे हैं | 



34 टिप्‍पणियां:

  1. चिंतनपरक लेख के साथ सार्थक प्रस्तुती | शुक्रिया ब्लॉग बुलेटिन | मोनिका जी को हार्दिक बधाई और शुभकामनायें |

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  2. आपने सच मैं बहुत अच्छा पोस्ट लिखा है
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