Subscribe:

Ads 468x60px

कुल पेज दृश्य

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

समझें और समझायें प्यार की पवित्रता को - ब्लॉग बुलेटिन



नमस्कार साथियो,
गुरुवार की बुलेटिन के साथ आपका मित्र कुमारेन्द्र उपस्थित है. पूरे सप्ताह बुलेटिन की प्रस्तावना को लेकर जद्दोजहद रहती है. एक-दो अच्छे संदेशों के अलावा जो भी सुनाई देता है वो सिर्फ और सिर्फ क्रंदन ही रहता है. मन भटकता है, विचलित होता है किन्तु ‘शो मस्ट गो ऑन’ के दर्शन के चलते लगातार आगे ही आगे बढ़ना होता है. इसी विचलित करने और आगे बढ़ने की अवस्था के बीच एक शब्द आजकल समाज में तैर रहा है और वो है ‘लव जिहाद’ का. सत्य क्या है, ये एक अलग विषय है किन्तु आज जिस तरह से प्यार के नाम पर खिलवाड़ होने लगा है वो अवश्य ही चिंतित करता है.
.
टीनएजर्स पढ़ाई, कैरियर से ज्यादा प्यार की तरफ आकर्षित दिख रहे हैं. विपरीतलिंगी साथी के साथ बढ़ती नजदीकियाँ हमारे किशोरों को उनके रास्ते से भटका रही है. एकतरफा प्यार करने के, जबरन प्यार स्वीकार करवाने के अनेक किस्से सहजता से सुने-देखे जा सकते हैं और इस तरह के प्यार में बच्चियाँ तेजाबी हमलों का, शारीरिक हिंसा का शिकार हो रही हैं, हताशा-निराशा में लड़कों में अपराध, नशे, अवसाद की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है. इसके अलावा अनब्याही माँ, आत्महत्या करती लडकियाँ, गर्भपात से होते शारीरिक नुकसान को भी देखा जा सकता है.
.
आज अधिकांश माता-पिता खुद को अपने बच्चों के दोस्त के रूप में प्रस्तुत करते हैं किन्तु उनकी यथोचित परवरिश में कहीं न कहीं चूक कर जाते हैं. अपने बच्चों के प्रेम-संबंधों पर भले ही हम खुश न हों पर आज की आधुनिक शिक्षा में उनके अधिक से अधिक विपरीतलिंगी साथी देखकर बहुत खुश हो लेते हैं. इस जरा सी असावधानी में अक्सर हमारे बच्चे गलती कर बैठते हैं और खामियाजा उठाते हैं. हम अपने बच्चों को प्यार करना सिखाएं, उन्हें बताएं कि वाकई प्यार क्या है, उन्हें बताएं कि प्यार कितना पवित्र और महान है. आज सिर्फ उनको ही नहीं सम्पूर्ण समाज को प्यार की आवश्यकता है. क्या हम समझा पाएंगे अपने बच्चों को प्यार का सही अर्थ?
विचार करिए... आगे बढ़िए और आनन्द लीजिये आज की ब्लॉग-लिंक्स का....
आभार...!!!

+++++++++++++++++++++++++++++++












+++
चित्र गूगल छवियों से साभार

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

बच्चों के साथ बच्चा बनकर तो देखें - ब्लॉग बुलेटिन



नमस्कार मित्रो,
कई बार अबोल की स्थिति होती है; सब कुछ सहज होते हुए भी असहज सा लगता है; कहने की स्थिति के बाद भी कुछ न कहने का मन करता है; भीड़ में होने के बाद भी अकेलापन महसूस होता है; बहुत-बहुत व्यस्त होने के बाद भी खालीपन का एहसास बना रहता है. कुछ लोगों की नजर में ये मानसिक अवसाद की स्थिति होती है तो कुछ लोग इसे नैराश्य का भाव कहते हैं. कई लोगों के अनुसार ये विभ्रम की स्थिति है तो कुछ लोगों के मुताबिक किसी बीमारी के लक्षण. कुछ भी हो मगर ऐसा होना सही नहीं है और विडंबना देखिये कि हमारी आज के युवा, किशोरवय और बचपन की मानसिकता कुछ ऐसी ही दिखती है. सभी अलग-अलग तरह की अपेक्षाओं के बोझ से दबे अपनी उम्र से अधिक बड़े बनने-दिखने का प्रयास कर रहे हैं. 
.
इस स्थिति को गौर किया जाना चाहिए, आज माता-पिता और बच्चों के बीच मित्रवत व्यवहार देखने को मिल रहा है. अभिभावकों में अपने बच्चों की समस्याओं-परेशानियों को जानने-समझने की मानसिकता भी दिख रही है. इसके बाद भी बच्चों में हताशा का भाव है, परिवार से भागने का भाव है, अपने माता-पिता के प्रति उदासीनता का भाव है, उनके प्रति बेरुखी का भाव है. शायद यही कारण है कि बहुत बड़ी संख्या में ये बच्चे अपराध, आत्महत्या, नशे आदि की गिरफ्त में आते जा रहे हैं. हमें जागना होगा, माता-पिता को समझना होगा कि मंहगी-मंहगी बाइक देकर, मोटा-मोटा जेबखर्च देकर, कुछ देर बैठ कर उनसे मित्रवत बात करके बच्चों की मनोदशा को समझा नहीं जा सकता है.  बच्चों के साथ भरपूर समय गुजारने की जरूरत है, उनको ये एहसास करवाने की जरूरत है कि वे उनसे दूर नहीं हैं. हम सभी को समझना होगा कि बच्चे भविष्य की धरोहर हैं और उन्हीं के कांधों पर समाज निर्माण की जिम्मेवारी है.
.
आइये हम अपनी व्यस्तता में से कुछ समय निकालें और अपने युवाओं के, किशोरों के, बच्चों के दिल में बैठने का, उनके साथ घुलने-मिलने का कार्य करें. आप भी बच्चे बनकर देखिये, आपके बच्चे तो प्रसन्न होंगे ही आपको भी अच्छा लगेगा. करके देखिये ऐसा..... फिर मिलते हैं अगली बुलेटिन के साथ. तब तक के लिए नमस्कार....!!!
तब तक इस बुलेटिन का आनंद उठायें....
++++++++++++++++++++

प्यारी माँ

जुवेनाइल: किशोर या छिछोर

संयुक्त परिवार की अहमियत

कैसे कहें कि हम आज़ाद है?

मैं रक्त-बीज हूं.. जी उठता हूं…!!

लेखागार