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शनिवार, 24 दिसंबर 2011

प्रतिभाओं की कमी नहीं - अवलोकन २०११ (15) - ब्लॉग बुलेटिन



कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०११ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०११ का १५ वां भाग ...

 



बड़ी बड़ी आँखों में बड़े बड़े सपने
हारना फितरत नहीं
और किसी के सपने मरते देखना
स्वीकार नहीं ...
कुछ नहीं था गुड़िया के पास
न हीरे जवाहरात , न महल
न ढेर सारे पैसे , न कोई जादुई छड़ी
उसके पास था हौसला ...
सपने दिखाने की
पूरे करने की निष्ठा
अपने सपनों की कीमत पर
सबके सपने पूरे करती .... शब्दों के उड़नखटोले पर बादलों से बातें करते वह कभी हँस बन गई , भावों के महारथियों के द्वार से शब्दों के दाने चुगे , कभी गौरैया बन किसी पेड़ पर घोंसला बनाया और सभी पक्षियों को बुला लिया . यह अवलोकन का मंच एक घोंसला ही है , कीमती दाने .... बस चुगते जाना है , जाने कब लम्बी उड़ान भरनी हो ! तो पंखों की मजबूती कायम रहे ..................

"सच को कहना सच को मनन करना
बहुत जरूरी होता है
तभी वह एक आवाज बनता है
जो टकरा सकता है
हर तूफान से जिसमें होती है
वह शक्ति
जो दस्‍तक देती है हर दरवाजे पर
जहां सोई हुई रूहें जाग जाती हैं
और हौसले बुलन्‍द हो
एक आवाज बनते हैं ..... !!! " एक एक झूठ क्षणिक मार्ग तो खोलता है, पर आत्मा पर बोझ होता है ! सच के रास्ते कठिन होते हैं , पर उसीमें सुकून होता है ... उस जीत को मनाओ न मनाओ , मन में ख़ुशी का जश्न होता है .

जीवन के सफ़र में सबको जाना है बारी बारी तो आते रहना भी है बारी बारी .... एहसासों का वही काफिला निकलता है - ये अलग बात है कि कभी उसने कहा कभी मैंने कभी वो कहेगा ... सूर्य की प्रथम रश्मि वही होगी , जिसे कवि पन्त ने देखा - उन्होंने विहंगिनी से प्रश्न किया , तुम कुछ और कहोगे पर भाव मिलते रहेंगे .

अविनाश वाचस्पति http://www.nukkadh.com/2011/11/blog-post_2539.html
"पिंजरे में सिर्फ
बुलबुलें ही कैद
नहीं की जातीं
तोते भी किए
जाते हैं बंद
तोते यूं तो
काटते नहीं है
बंद हों पिंजरे में
और दिखाओ ऊंगली
तो काट लेते हैं।" भावनाओं के प्रवाह थमते नहीं , सत्य की आड़ में सत्य कहते हुए पिजरे के अन्दर की घुटन, झुंझलाहट समझता है .

इक फौजी के दिल के एहसास और उनकी ख्वाहिशें हमसे अलग नहीं होतीं , वह फौलादी दिल लिए मुस्कुराता तो है ,'रंग दे बसंती चोला ' गाता तो है , सरफरोशी की तमन्ना लिए सीमा पर खड़ा रहता तो है ..... पर बासंती हवाएँ उनको भी सहलाती हैं , सोहणी उनको भी बुलाती हैं ..... कुछ इस तरह -


"जब तौलिये से कसमसाकर ज़ुल्फ उसकी खुल गयी
फिर बालकोनी में हमारे झूम कर बारिश गिरी " सच तो है घर से दूर सरहद के पास - पुरवा की शोख अदाएं झटक के बातों को ,इनके दिल में भी चुपके से सुगबुगाती है ...

प्यार के एहसास कितने महीन होते हैं , ख्वाब की उड़ान कितनी अनोखी होती है - दिल कुछ भी सोचता है , पर सच ही तो होता है ...

"तुम्हारे घर की बंद खिड़की के बाहर
मैंने अपने आँचल में बंधे
खूबसूरत यादों के सारे के सारे पुष्पहार
बहुत आहिस्ता से नीचे रख दिये थे !
सुबह उठ कर ताज़ी हवा के लिये
जब तुमने खिड़की खोली होगी
तो उनकी खुशबू से तुम्हारे
आस पास की फिजां
महक तो उठी थी ना ?" बस यही कहने का दिल करता है , रिश्तों की उम्र बड़ी छोटी है कोई एक पल के लिए कोई दो पल के लिए ,वक़्त खो जाये उससे पहले
- आओ एक अपना घर बना लें हम भी !

वरना जाने कब कोई नज़्म उदास हो जाए ...
" मैं लौट आती हूँ वहाँ , जहाँ
लहर ठहरी हुई थी .....
देखती हूँ वह मुहब्बत तमाम के शब्द
मिटाए जा रही थी .....
रेत से ...पानी से ...दरख्तों से ...पत्तों से
मुस्कुराहटों से ..हँसी से ...पलकों से
वह आईने के सामने खड़ी होकर
दुपट्टा ओढ़ती है .....
और फिर उसके टुकड़े टुकड़े कर
फेंक़ देती है समुंदर में .." सच कहते हैं लोग - कौन जाने किस घड़ी वक़्त का बदले मिजाज़ !

ऐसे में दिगम्बर नासवा http://swapnmere.blogspot.com/2011/10/blog-post_28.html सही फरमाते हैं ,
"बाजुओं का दम अगर है तोलना
वक्त से पंजा लड़ा कर देखिये " समय हौसलों की परख रखता है , बदले मिजाज़ में नरमी लाता है ...
जब तक नरमी है मिजाज़ में पढ़ते जाइये , मैं अगली उड़ान भरती हूँ ....

रश्मि प्रभा

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

प्रतिभाओं की कमी नहीं - अवलोकन २०११ (14) - ब्लॉग बुलेटिन



कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०११ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०११ का १४ वां भाग ...
 

"हींग टिंग झट बोल चिंग चिंग पा
खुल जारे ताले झट से फटाक....
काबुलीवाले , चलो यहाँ से भाग निकलें .
ओहो काबुलीवाले ,
बन्द कमरे से निकलो ...
देखो बाहर निकलकर कितने ज्ञानी लोग हैं !
.............. अच्छा काबुलीवाले तेरी झोली में क्या है ?
जादू की कलम , जादू की कलम
इससे लिखें चलो एक कहानी हम !" रुको , रुको हम बाद में लिखेंगे , अभी देखें कि जादू की कलम से औरों ने क्या लिखा है ...
धर्मेन्द्र कुमार सिंह http://www.dkspoet.in/2011/11/blog-post_24.html
"कविता लिखना
जैसे चाय बनाना
कभी चायपत्ती ज्यादा हो जाती है
कभी चीनी, कभी पानी, कभी दूध
कभी तुलसी की पत्तियाँ डालना भूल जाता हूँ
कभी इलायची, कभी अदरक
मगर अच्छी बात ये है
कि ज्यादातर लोग भूल चुके हैं
कि चाय में तुलसी की पत्तियाँ
अदरक और इलायची भी पड़ते हैं " अपरोक्ष कुछ भी नहीं कहा है कवि ने ... कविता बिल्कुल चाय जैसी . अदरक , इलायची तो बाद में - पहले तो पत्तियाँ अलग अलग - गोल दानेदार , लम्बी हरी पत्ती... पानी, दूध , शक्कर का सही अनुपात ....... पर पसंद अपनी अपनी . है न ?

ए काबुलीवाले भरते जाओ अपनी झोली में ये कलम .... तुम आराम से बैठो , मैं ढूंढ कर चुपके से रखती हूँ ...
सुना काबुलीवाले , अमृता का मकान बिक गया ... मैं तो बड़ा रोई ... अंजू ने लिखा है इसमें http://anjuananya.blogspot.com/2011/11/blog-post_15.html
"साहित्य जगत में खलबली है ,सवालों की बारिशें हैं , हर नजर इमरोज़ की मोहब्बत पर सवाल करने को आतुर है..???????????.. पर इमरोज़ किससे साँझा करे..? और क्यूँ करे ?जब ये मकान घर बना ,सवाल तब भी उठे थे... दर्द तब भी मिला था,पर हौंसला था....आज मकान (घर नहीं)बिका तो फिर वही सवाल ...." सवाल उठाना बहुत आसान होता है , और जब कोई जवाब न दे तो अनुमान के घोड़े दौड़ाना इंसानी फितरत है . बचना चाहोगे तो चुप रहोगे , पर अनुमान से कोई नहीं बचा है .... लगाने दो अनुमान !

फिर भी एकांत में दिल घबराये तो प्रतिभा कटियार की सुनो http://pratibhakatiyar.blogspot.com/2011/10/blog-post.html
"चीखो दोस्त
जितनी तेजी से तुम चीख सकते हो
इतनी तेज की गले की नसें
फटकर बहार निकल आयें
और तुम्हारी आवाज
दुनिया का हर कोना हिला दे." ख़ामोशी इतनी भी अच्छी नहीं कि सामनेवाला तुम्हें गुनहगार ही सिद्ध कर दे और तुम घुटते रहो और दिमाग की नसें फट जाएँ . उदाहरण बनने के लिए कभी कभी चीखना भी होता है .........

पता है काबुलीवाले , आलस बुरी बला है ... पर आजकल तो ब्रह्ममुहूर्त का समय ही बदल गया . भले सूरज अपने समय से निकले , पर उठने का समय , सोने का समय - सब बदल गया है .
गुंज झाझारिया की सुनो http://lekhikagunj.blogspot.com/2011/11/blog-post_28.html
"आज सुबह मैंने पूछा आलस्य से,
" भाई, तुम क्यूँ मुझे इतना सताते हो?
हर समय बिन बुलाये मेहमान के जैसे आस-पास
मंडराते हो!
मुझे नहीं पसंद है यूँ तुम्हारा आना,
तुम्हारे आने से ही तो मेरे काम अधूरे रह जाते हैं!
मेरे नाम न कमाने की,
धन न पाने की एक-मात्र वजह तुम ही हो!" पर आलस्य भी ज़रूरी है , ऐसा आलस्य भी कहता है - !!!

जब तक हम होते हैं , हमें लगता है - हमारे बगैर ये काम नहीं हो सकता , पर जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है - हाँ चाहो न चाहो , चलना होता है, चलना आ जाता है .
" मेरी माँ
जीती रही इसी भरम मैं ;
कि उसके बिना ,
बच्चे रह न सकेंगे
अब वो नहीं है |
अब मैं जी रही हूँ
इसी भरम मैं |" सच पूछो तो माँ का यह भरम नहीं , माँ को खुद पर विश्वास होता है अपने बच्चों के सुख को लेकर ...

कम शब्दों में भी कोई कितना कुछ कह जाता है न काबुलीवाले , यह भी एक कला है -
विभा रानी श्रीवास्तव http://vranishrivastava.blogspot.com/2011/10/blog-post.html
"जिन्दगी में कई बार ऐसे अनुभवों से गुजरना पड़ता हैं जो बाद में मृगतृष्णा ही साबित होता हैं…. " सच , कई बार रास्ते गुमशुदा ही रह जाते हैं ...

काबुलीवाले अब सबकुछ समेटो और चलो - कुछ और कलम तलाशें...


रश्मि प्रभा   

लेखागार