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मंगलवार, 16 जनवरी 2018

ओ. पी. नैय्यर और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को सादर नमस्कार।
ओ.पी. नैय्यर
ओंकार प्रसाद नैय्यर (अंग्रेज़ी: Omkar Prasad Nayyar, जन्म: 16 जनवरी, 1926; मृत्यु: 28 जनवरी, 2007) हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध संगीतकार थे। अपने सुरों के जादू से आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी जैसे कई पार्श्वगायक और पार्श्वगायिकाओं को कामयाबी के शिखर पर पहुंचाने वाले महान संगीतकार ओ. पी. नैय्यर के संगीतबद्ध गीत आज भी लोकप्रिय है।

16 जनवरी 1926 को लाहौर (पाकिस्तान) के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे ओंकार प्रसाद नैय्यर उर्फ ओ.पी. नैय्यर का रुझान बचपन से ही संगीत की ओर था। वह पार्श्वगायक बनना चाहते थे। भारत विभाजन के पश्चात् उनका पूरा परिवार लाहौर छोड़कर अमृतसर चला आया। ओंकार प्रसाद ने संगीत की सेवा करने के लिए अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी। अपने संगीत के सफ़र की शुरूआत इन्होंने आल इंडिया रेडियो से की।



आज महान संगीतकार ओ. पी. नैय्यर जी के 92वें जन्म दिवस पर हम सब उनके संगीतमय योगदान को स्मरण करते हुए शत शत नमन करते हैं। सादर।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर .... अभिनन्दन।। 

सोमवार, 15 जनवरी 2018

70वां भारतीय सेना दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को सादर नमस्कार।
भारतीय थल सेना का ध्वज
थल सेना दिवस प्रत्येक वर्ष 15 जनवरी को 'भारतीय थल सेना' के लिए पूरे भारत में मनाया जाता है। वस्तुत: 'थल सेना दिवस' देश की सीमाओं की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहूति देने वाले वीर सपूतों के प्रति श्रद्धांजलि देने का दिन है। यह दिन देश के प्रति समर्पण व कुर्बान होने की प्रेरणा का पवित्र अवसर है।
भारत में 'थल सेना दिवस' देश के जांबाज रणबांकुरों की शहादत पर गर्व करने का एक विशेष मौका है। 15 जनवरी, 1949 के बाद से ही भारत की सेना ब्रिटिश सेना से पूरी तरह मुक्त हुई थी, इसीलिए 15 जनवरी को "थल सेना दिवस" घोषित किया गया। यह दिन देश की एकता व अखंडता के प्रति संकल्प लेने का दिन है। यह दिवस भारतीय सेना की आज़ादी का जश्न है। यह वही आज़ादी है, जो वर्ष 1949 में 15 जनवरी को भारतीय सेना को मिली थी। इस दिन के.एम. करिअप्पा को भारतीय सेना का 'कमांडर-इन-चीफ़' बनाया गया था। इस तरह लेफ्टिनेंट करिअप्पा लोकतांत्रिक भारत के पहले सेना प्रमुख बने थे। इसके पहले यह अधिकार ब्रिटिश मूल के फ़्राँसिस बूचर के पास था और वह इस पद पर थे। वर्ष 1948 में सेना में तकरीबन 2 लाख सैनिक ही थे, लेकिन अब 11 लाख, 30 हज़ार भारतीय सैनिक थल सेना में अलग-अलग पदों पर कार्यरत हैं।

देश की सीमाओं की चौकसी करने वाली भारतीय सेना का गौरवशाली इतिहास रहा है। देश की राजधानी दिल्ली के इंडिया गेट पर बनी अमर जवान ज्योति पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है। इस दिन सेना प्रमुख दुश्मनों को मुँहतोड़ जवाब देने वाले जवानों और जंग के दौरान देश के लिए बलिदान करने वाले शहीदों की विधवाओं को सेना मैडल और अन्य पुरस्कारों से सम्मानित करते हैं। हर वर्ष जनवरी में 'थल सेना सेना' दिवस मनाया जाता है और इस दौरान सेना अपने दम-खम का प्रदर्शन करने के साथ ही उस दिन को पूरी श्रद्धा से याद करती है, जब सीमा पर वर्ष के बारह महीने जमे रह कर भारतीय जवानों ने समस्त देशवासियों के साथ ही साथ देश की रक्षा भी की थी। दिल्ली में आयोजित परेड के दौरान अन्य देशों के सैन्य अथितियों और सैनिकों के परिवारों वालों को बुलाया जाता है। सेना इस दौरान जंग का एक नमूना पेश करती है और अपने प्रतिक्रिया कौशल और रणनीति के बारे में बताती है। इस परेड और हथियारों के प्रदर्शन का उद्देश्य दुनिया को अपनी ताकत का एहसास कराना है। साथ ही देश के युवाओं को सेना में शामिल होने के लिये प्रेरित करना भी है। 'थल सेना दिवस' पर शाम को सेना प्रमुख चाय पार्टी आयोजित करते हैं, जिसमें तीनों सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उनकी मंत्रिमंडल के सदस्य शामिल होते हैं।

भारतीय थल सेना के प्रशासनिक एवं सामरिक कार्य संचालन का नियंत्रण थल सेनाध्यक्ष करता है। सेना को अधिकतर थल सेना ही समझा जाता है, यह ठीक भी है क्योंकि रक्षा-पक्ति में थल सेना का ही प्रथम तथा प्रधान स्थान है। इस समय लगभग 13 लाख सैनिक-असैनिक थल सेना में भिन्न-भिन्न पदों पर कार्यरत हैं, जबकि 1948 में सेना में लगभग 2,00,000 सैनिक थे। थल सेना का मुख्यालय नई दिल्ली में है।


जय हिन्द। जय भारत।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। जय हिन्द। जय भारत।।

रविवार, 14 जनवरी 2018

मकर संक्रांति पर ब्लॉग बुलेटिन की शुभकामनायें करें स्वीकार

नमस्कार साथियो,
आज पूरे देश में मकर संक्रांति का पावन पर्व मनाया जा रहा है. सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को ही संक्रांति कहते हैं. इसी दिन, पौष मास में सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है. मकर संक्रान्ति के दिन से ही सूर्य की उत्तरायण गति भी प्रारम्भ होती है अर्थात सूर्य दक्षिण के बजाय अब उत्तर दिशा में जाने लगता है. जब तक सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर से चलता है तब उसकी किरणों का असर खराब माना गया है, लेकिन जब वह पूर्व से उत्तर की ओर जाने लगता है तब उसकी किरणें सेहत और शांति को बढ़ाती हैं.  वैसे तो सूर्य संक्रांति बारह हैं किन्तु इनमें से चार- मेष, कर्क, तुला, मकर संक्रांति महत्वपूर्ण हैं. मकर संक्रांति के शुभ मुहूर्त में स्नान, दान और पुण्य के शुभ समय का विशेष महत्व है.


विभिन्न नाम भारत में
मकर संक्रान्ति - छत्तीसगढ़, गोआ, ओड़ीसा, हरियाणा, बिहार, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, बिहार, पश्चिम बंगाल, और जम्मू
ताइ पोंगल, उझवर तिरुनल - तमिलनाडु
उत्तरायण - गुजरात, उत्तराखण्ड
माघी - हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब
भोगाली बिहु - असम
शिशुर सेंक्रात - कश्मीर घाटी
खिचड़ी - उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार
पौष संक्रान्ति - पश्चिम बंगाल
मकर संक्रमण – कर्नाटक

विभिन्न नाम भारत के बाहर
बांग्लादेश - पौष संक्रान्ति
नेपाल - माघे सङ्क्रान्ति या माघी सङ्क्रान्ति, खिचड़ी सङ्क्रान्ति
थाईलैण्ड - सोङ्गकरन
लाओस - पि मा लाओ
म्यांमार - थिङ्यान
कम्बोडिया - मोहा संगक्रान
श्रीलंका - पोंगल, उझवर तिरुनल


बुलेटिन परिवार की ओर से सभी को इस पावन पर्व की शुभकामनाओं सहित आज की बुलेटिन आपके समक्ष प्रस्तुत है.

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शनिवार, 13 जनवरी 2018

बैक ग्राउंड से




बैक ग्राउंड से - बारिश  की बूंदें भी बोलती  हैं उस दिन भी कुछ कह रही थीं ...

उसकी आँखों में सपनों की 
एक नदी बहती थी 
रंगबिरंगी मछलियाँ डुबकियां लेतीं 
कोई अनचाहा  मछुआरा मछलियाँ न पकड़ ले 
जब तब वह अपनी आँखें 
कसके मींच लेती...
....
एक दिन -
किसी ने बन्द पलकों पर उंगलियाँ घुमायीं
और बड़ी बड़ी आँखों ने देखना चाहा 
कौन है .....
और पलक झपकते 
सपनों की नदी से 
छप से एक मछली  बाहर निकली 
मछुआरे ने उसे अपनी आँखों की झील में डाला 
और अनजानी राहों पर चल पड़ा................


शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

स्वामी विवेकानन्द जी की १५५ वीं जयंती - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |


"सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। 


भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।"

- स्वामी विवेकानन्द

ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से स्वामी विवेकानन्द जी की १५५ वीं जयंती के अवसर पर उनको शत शत नमन |


सादर आपका

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विवेकानंद जयंती : तुम्हारी आत्मा के अलावा कोई और गुरु नहीं है
बचपन
दो नन्हे शावक
ठंड
दूधनाथ सिंह : एक प्रतिबद्ध स्वर
विवेकानंद और वेश्या.. सोशल मीडिया के युग मे एक क्रांतिकारी विचार.. पढ़िए तो!
हवाई द्वीप - सृष्टी के बदलते रँग
सर्दी ने ढाया सितम
फिल्मों को जरुरत है, स्वस्थ दिलो-दिमाग वाले निर्माताओं की
आपकी अदालत में कुमार विश्वास
महान क्रान्तिकारी सूर्य सेन "मास्टर दा" की ८४ वीं पुण्यतिथि
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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

श्रद्धा-सुमन गुदड़ी के लाल को : ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय साथियो,
आज का दिन भारतीय इतिहास में काले दिन के रूप में याद किया जाना चाहिए. आज, 11 जनवरी को गुदड़ी के लाल कहे जाने वाले लाल बहादुर शास्त्री जी का निधन हो गया था. सन 1966 में ताशकंद समझौते के बाद ताशकंद में ही शास्त्री जी का निधन हो गया था. कहा जाता है कि उनको दिल का दौरा पड़ा था मगर तत्कालीन स्थितियाँ कुछ और ही कहती थीं. सूत्र बताते हैं कि उनकी देह नीली पड़ गई थी और उनका पोस्टमार्टम भी नहीं करवाया गया था. उनकी मृत्यु को लेकर आज तक संशय बना हुआ है और इसे लेकर कोई आधिकारिक रिपोर्ट भी सामने नहीं लाई गई है. उनके परिजन भी समय-समय पर उनकी मौत का सवाल उठाते रहे हैं. यह देश के लिए एक शर्म का, दुर्भाग्य का विषय है कि उसके इतने योग्य नेता की मौत का कारण आज तक साफ नहीं हो पाया है. (लाल बहादुर शास्त्री जी के बारे में विस्तार से यहाँ से जानें)


शास्त्री जी एक प्रसिद्ध भारतीय राजनेता, महान् स्वतंत्रता सेनानी और भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे. वे एक ऐसी हस्ती थे जिन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में देश को न सिर्फ सैन्य गौरव का तोहफा दिया बल्कि हरित क्रांति और औद्योगीकरण की राह भी दिखाई. शास्त्री जी किसानों को देश का अन्नदाता मानते थे और सैनिकों के प्रति भी उनके मन में अगाध प्रेम था. इसी के चलते उन्होंने जय जवान, जय किसान का नारा दिया. उनकी दूरदर्शिता भारत-पाकिस्तान युद्ध में नजर आई. उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद सन 1965 में पाकिस्तान ने कश्मीर घाटी को भारत से छीनने की योजना बना कर देश पर हमला कर दिया. उसके नापाक इरादों का जवाब देते हुए शास्त्री जी ने दूरदर्शितापूर्ण कदम उठाते हुए पंजाब के रास्ते लाहौर में सेंध लगा पाकिस्तान को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. पाकिस्तान ने अपनी पराजय के बाद तत्कालीन सोवियस संघ से समझौते के लिए संपर्क साधा. न चाहते हुए भी विश्व समुदाय के दवाब के चलते शास्त्री जी सन 1966 में पाकिस्तान के साथ शांति समझौता करने के लिए राजी हो गए और ताशकंद पहुँच गए. इस समझौते पर हस्ताक्षर के कुछ घंटों बाद ही उनका देहांत हो गया.




आज उनकी पुण्यतिथि पर बुलेटिन परिवार की ओर से उनको श्रद्धा-सुमन अर्पित हैं...

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बुधवार, 10 जनवरी 2018

विश्व हिन्दी दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को सादर नमस्कार।
विश्व हिन्दी दिवस (अंग्रेज़ी: World Hindi Day) प्रत्येक वर्ष 10 जनवरी को पूरे विश्व में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना तथा हिन्दी को अन्तराष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना है। विदेशों में भारत के दूतावास इस दिन को विशेष रूप से मनाते हैं। सभी सरकारी कार्यालयों में विभिन्न विषयों पर हिन्दी में व्याख्यान आयोजित किये जाते हैं।
विश्व में हिन्दी का विकास करने और इसे प्रचारित-प्रसारित करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दी सम्मेलनों की शुरुआत की गई और प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी, 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ था। इसीलिए इस दिन को विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी, 2006 को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी। उसके बाद से भारतीय विदेश मंत्रालय ने विदेश में 10 जनवरी 2006 को पहली बार विश्व हिन्दी दिवस मनाया था। इसका उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना तथा हिन्दी को अन्तराष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना है। विदेशों में भारत के दूतावास इस दिन को विशेष रूप से मनाते हैं। सभी सरकारी कार्यालयों में विभिन्न विषयों पर हिन्दी में व्याख्यान आयोजित किये जाते हैं।







मंगलवार, 9 जनवरी 2018

ऐतिहासिकता को जीवंत बनाते वृन्दावन लाल वर्मा : ब्लॉग बुलेटिन

हिन्दी उपन्यासों के वाल्टर स्कॉट कहलाने वाले वृन्दावनलाल वर्मा की आज 129 वीं जयंती है. आज ही 9 जनवरी सन 1889 को उनका जन्म झाँसी जिले के मऊरानीपुर में हुआ था. उनका बचपन अपने चाचा के पास ललितपुर में बीता. चाचा के साहित्यिक-सांस्कृतिक रुचि के होने के कारण उनकी भी रुचि पौराणिक तथा ऐतिहासिक कथाओं के प्रति बचपन से ही थी. लेखन प्रवृत्ति बचपन से ही होने के कारण उन्होंने नौंवीं कक्षा में ही तीन छोटे-छोटे नाटक लिखकर इण्डियन प्रेस प्रयाग को भेजे. जहाँ से उनको पुरस्कार स्वरूप 50 रुपये भी प्राप्त हुए. प्रारम्भिक शिक्षा भिन्न-भिन्न स्थानों पर संपन्न करने के बाद उन्होंने बी.ए. और क़ानून की परीक्षा पास की. इसके बाद वे झाँसी में वकालत करने लगे.

वृन्दावन लाल वर्मा 
 पौराणिक और ऐतिहासिक विषयों के प्रति रुचि होने के चलते और लेखन के द्वारा भारतीय इतिहास की सत्यता सबके सामने लाने की उनकी प्रतिज्ञा ने मात्र बीस साल की अल्पायु में सन 1909 में उनसे सेनापति ऊदल नाटक लिखवा लिया. इसके राष्ट्रवादी तेवरों से बौखलाकर अंग्रेज़ सरकार ने इस नाटक पर पाबंदी लगा कर इसकी प्रतियाँ जब्त कर लीं. बचपन में भारतीय समृद्ध इतिहास के प्रति नकारात्मक भाव देखकर वृन्दावन लाल वर्मा देश का वास्तविक इतिहास सबके सामने लाने की प्रतिज्ञा कर चुके थे. इसी के चलते उन्होंने ऐतिहासिक विषयों की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया. इसके साथ-साथ ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की प्रेरणा उनको प्रसिद्द ऐतिहासिक उपन्यासकार वाल्टर स्काट से मिली.

उनका ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की तरफ प्रवृत्त होना उस समय बहुत ही साहसिक कदम कहा जायेगा क्योंकि उस दौर में प्रेमचंद उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति हिन्दी साहित्य में बनाये हुए थे. इसके बाद भी उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास गढ़कुंडार को जबरदस्त प्रसिद्धि मिली. इसके बाद तो वृन्दावन लाल वर्मा ने विराटा की पद्मिनी, कचनार, झाँसी की रानी, माधवजी सिंधिया, मुसाहिबजू, भुवन विक्रम, अहिल्याबाई, टूटे कांटे, मृगनयनी आदि सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास लिखे. उनके उपन्यासों में इतिहास जीवन्त होकर बोलता है. इसके साथ-साथ उन्होंने सामाजिक उपन्यास, नाटक, कहानियाँ भी लिखीं. उनकी आत्मकथा अपनी कहानी  भी सुविख्यात है.


भारतीय ऐतिहासिकता को साहित्यिक जगत में जीवंत स्वरूप में प्रदान करने वाले साहित्यकार वृन्दावन लाल वर्मा सन 23 फ़रवरी 1969 में हमसे विदा हो गए. उनकी मृत्यु के 28 साल बाद 9 जनवरी सन 1997 को भारत सरकार ने उन पर एक डाक टिकट जारी किया.

आज उनके जन्मदिन पर बुलेटिन परिवार की ओर से उनकी पुण्य स्मृतियों को नमन...

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सोमवार, 8 जनवरी 2018

नंदा और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को सादर नमस्कार।
नन्दा
नन्दा (अंग्रेज़ी: Nanda, जन्म: 8 जनवरी, 1938 - मृत्यु: 25 मार्च, 2014) भारतीय फ़िल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं। उन्होंने हिन्दी और मराठी फ़िल्मों में विशेष रूप से कार्य किया। अपने समय की ख़ूबसूरत अभिनेत्रियों में नन्दा का नाम भी लिया जाता है। 60 और 70 के दशक की इस सुन्दर और मासूम अदाकारा ने अपने फ़िल्मी सफ़र की शुरूआत एक बाल कलाकार के रूप में की थी। बाद में वे सफल नायिका बनीं और फिर चरित्र अभिनेत्री। अपने संवेदनशील अभिनय से उन्होंने कई फ़िल्मों में अपनी भूमिकाओं को बखूबी जीवंत किया।


आज अभिनेत्री नंदा जी के 79वें जन्म दिवस पर हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। 

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

रविवार, 7 जनवरी 2018

सोचती हूँ




धैर्य मेरी मुंडेर पर भी रहता है 
पर सही ढंग से बेतकल्लुफ होना मुझे नहीं आया - 
जब तुम्हें चंद स्पष्ट शब्दों के साथ टहलते हुए 
बढ़ते देखती हूँ 
तो .... अच्छा लगता है 
सोचती हूँ
कुछ बेतकल्लुफी उधार ले लूँ तुमसे
दोगे ?
मुस्कुराओ मत
मुझे पता है
तुम्हारी साँसों में दर्द का आना-जाना है
आश्चर्य मत करो - मैंने कैसे जाना !
जाहिर सी बात है
गम पे धूल वही डालते हैं
जो गम की बारीकी से गुजरते हैं


जिंदगी हमें आज़माती रही और हम भी उसे आज़माते रहे ...


नमन तुम्हें मैया गंगे
गिरिराज तुम्हारे आनन को
छूती हैं रवि रश्मियाँ प्रथम
सहला कर धीरे से तुमको 
करती हैं तुम्हारा अभिनन्दन
उनकी इस स्नेहिल उष्मा से
बहती है नित जो जलधारा
वह धरती पर नीचे आकर
करती है जन जन को पावन !

शनिवार, 6 जनवरी 2018

१०० में से ९९ बेईमान ... फ़िर भी मेरा भारत महान

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

एक बार एक व्यक्ति मरकर नर्क में पहुँचा, तो वहाँ उसने देखा कि प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी देश के नर्क में जाने की छूट है। उसने सोचा चलो अमेरिका वासियों के नर्क में जाकर देखें। जब वह वहाँ पहुँचा तो द्वार पर पहरेदार से उसने पूछा, "क्यों भाई अमेरिकी नर्क में क्या-क्या होता है?

पहरेदार बोला, "कुछ खास नहीं, सबसे पहले आपको एक इलेक्ट्रिक कुर्सी पर एक घंटा बिठाकर करंट दिया जायेगा, फ़िर एक कीलों के बिस्तर पर आपको एक घंटे तक लिटाया जायेगा, उसके बाद एक दैत्य आकर आपकी जख्मी पीठ पर पचास कोडे मारेगा।

यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत घबराया और उसने रूस के नर्क की ओर रुख किया, और वहाँ के पहरेदार से भी वही पूछा। रूस के पहरेदार ने भी लगभग वही वाकया सुनाया जो वह अमेरिका के नर्क में सुनकर आया था। फ़िर वह व्यक्ति एक-एक करके सभी देशों के नर्कों के दरवाजे पर जाकर आया, सभी जगह उसे भयानक किस्से सुनने को मिले। अन्त में जब वह एक जगह पहुँचा, देखा तो दरवाजे पर लिखा था "भारतीय नर्क" और उस दरवाजे के बाहर उस नर्क में जाने के लिये लम्बी लाईन लगी हुई थी, लोग भारतीय नर्क में जाने को उतावले हो रहे थे। 

उसने सोचा कि जरूर यहाँ सजा कम मिलती होगी। तत्काल उसने पहरेदार से पूछा कि सजा क्या है? 

पहरेदार ने कहा, "कुछ खास नहीं...सबसे पहले आपको एक इलेक्ट्रिक कुर्सी पर एक घंटा बिठाकर करंट दिया जायेगा, फ़िर एक कीलों के बिस्तर पर आपको एक घंटे तक लिटाया जायेगा, उसके बाद एक दैत्य आकर आपकी जख्मी पीठ पर पचास कोडे मारेगा। 

चकराये हुए व्यक्ति ने उससे पूछा, "यही सब तो बाकी देशों के नर्क में भी हो रहा है, फ़िर यहाँ इतनी भीड क्यों है?"

पहरेदार: इलेक्ट्रिक कुर्सी तो वही है, लेकिन बिजली नहीं है, कीलों वाले बिस्तर में से कीलें कोई निकाल ले गया है, और कोडे़ मारने वाला दैत्य सरकारी कर्मचारी है, आता है, दस्तखत करता है और चाय-नाश्ता करने चला जाता है और कभी गलती से जल्दी वापस आ भी गया तो एक-दो कोडे़ मारता है और पचास लिख देता है।

१०० में से ९९ बेईमान ... फ़िर भी मेरा भारत महान |

सादर आपका

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चट्टान जैसे मजबूत होते हैं वायुसेना के ‘गरुड़ कमांडो’, जानें 7 खास बातें

भारतीय हैं हम (?)

कॉन्सुलर एक्सेस का मतलब

तीन तलाक की समाप्ति---- मानव संस्कृति का एक और एतिहासिक कदम --- डा श्याम गुप्त....

‘एक फोटो तो खिंचवा लो हमारे साथ.’- नीरज

कविता उन याद आये लोगों के पास है

कांग्रेस की भारतविरोधी गन्दी राजनीति

.... बदलाव :)

राज्यसभा में अटका तीन तलाक बिल - तुच्छ राजनीति ?

पारिवारिक आयोजन का सार्वजनिकीकरण

नेता पिटने लगे हैं....!

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

सोशल मीडिया पर हम सब हैं अनजाने जासूस : ब्लॉग बुलेटिन

सोशल मीडिया के माध्यम से अपने विचारों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता होने के कारण आज बहुतायत लोगों द्वारा इसे पसंद किया जा रहा है. कोई भी व्यक्ति सहजता से अपनी बात को वैश्विक स्तर तक पहुँचा रहा है. उसके लिए अब न किसी संस्थान की जरूरत है, न किसी सम्पादक की मनमर्जी का सवाल है. अब व्यक्ति पूरी स्वतन्त्रता के साथ अपने विचारों का प्रकटीकरण कर रहा है. वैचारिक स्वतन्त्रता के इस दौर में जहाँ किसी व्यक्ति को असीमित आसमान मिला है, वहीं निर्द्वन्द्व रूप से एक तरह का घातक हथियार भी उसके हाथ में लग गया है.


लोगों ने अपनी रुचियों को स्थापित करने का रास्ता भी तलाशा है. अव्यवस्थाओं के विरुद्ध एकजुट होना शुरू किया है. सरकार के कार्यों की प्रशंसा हुई तो उसकी बुराई भी की गई है. इसके बाद भी सोशल मीडिया पर मिली यह स्वतन्त्रता अपने साथ एक तरह की बुराई लेकर भी आई है. स्वतन्त्रता के अतिउत्साह में लोग इस तरह की सामग्री को सामने ला रहे हैं जो किसी भी रूप में समाज-हित में नहीं कही जा सकती हैं. सरकार, शासन, प्रशासन से सम्बन्धित लोगों ने इधर-उधर से, गोपनीय ढंग से जानकारी लेकर उसको सोशल मीडिया पर प्रकट करने का कार्य किया है. सरकारी आँकड़ों, खबरों को तोड़मरोड़ कर विकृत, भ्रामक रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है. धर्म, जाति को आधार बनाकर अन्य दूसरे धर्मों, जातियों पर टिप्पणी करने का काम अब इस मंच पर बहुतायत में होता दिखता है. और तो और व्यक्तियों द्वारा अपने जीवन की अंतरंगता को सामने रखा गया. पति-पत्नी के बीच की गोपनीयता को सार्वजनिक किया गया. इन कदमों को भले ही व्यक्तियों की जागरूकता का पैमाना समझा जाने लगा हो किन्तु जानकारी के स्तर पर, सूचनाओं के स्तर पर यह किसी खतरे से कम नहीं है.

हो सकता है कि बहुत से लोगों को ये कपोलकल्पना जैसा लगे किन्तु हम अनजाने अपने देश की, अपने समाज की, अपने परिवार की सूचनाओं को विदेशी हाथों में सहजता से पहुँचा रहे हैं. हम सब मुफ्त मिली स्वतन्त्रता और मुफ्त मिले मंच के द्वारा अनायास ही चित्रों, विचारों, तथ्यों द्वारा जानकारी, सूचना आदि खतरनाक हाथों में देते जा रहे हैं. हम सोशल मीडिया के माध्यम से सहजता से विदेशी मंचों तक सूचना प्रेषित करने में लगे हैं कि हमारे देश में कोई एक वर्ग किसी दूसरे वर्ग के प्रति क्या सोच रखता है. एक जाति के लोग दूसरी जाति के लिए किस तरह की सोच रखते हैं. सोचने वाली बात है कि कहीं हम सब विचाराभिव्यक्ति के अतिउत्साह में स्वयं ही तो सभी सूचनाएँ, जानकारियाँ विदेश तो नहीं भेजे दे रहे? हम सभी को ये विचार करना होगा कि सबकुछ पोस्ट कर देने, प्रचारित कर देने की लालसा में हम विदेशों के लिए जासूसी तो नहीं किए जा रहे? सजग होना, सजग रहना आज के  दौर में अत्यावश्यक है.

शेष तो समझदार सभी हैं. आप सब आनंदित होइए आज की बुलेटिन के साथ.

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गुरुवार, 4 जनवरी 2018

अंधियारे में शिक्षा-ज्योति फ़ैलाने वाले को नमन : ब्लॉग बुलेटिन

आज, चार जनवरी को दृष्टिबाधितों के मसीहा एवं ब्रेल लिपि के आविष्कारक लुई ब्रेल का जन्म हुआ था. उनका जन्म फ्रांस के छोटे से गाँव कुप्रे में 4 जनवरी 1809 को मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. महज तीन साल की उम्र में एक हादसे में उनकी दोनों आँखों की रौशनी चली गई थी. हर बात को सीखने के प्रति उनकी ललक को देखते हुए उनके पिता ने उनका दाखिला दस वर्ष की उम्र में पेरिस के रॉयल नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड चिल्ड्रेन  में करवा दिया था. उस समय स्कूल में वेलन्टीन होउ द्वारा बनाई गई लिपि से पढ़ाई होती थी पर यह लिपि अधूरी थी. इसी स्कूल में एक बार फ्रांस की सेना के एक अधिकारी कैप्टन चार्ल्स बार्बियर एक प्रशिक्षण के सिलसिले में आए. यहाँ उन्होंने सैनिकों द्वारा अँधेरे में पढ़ी जाने वाली नाइट राइटिंग या सोनोग्राफी लिपि के बारे में बताया. यह लिपि कागज पर अक्षरों को उभारकर बनाई जाती थी. इसमें 12 बिंदुओं को 6-6 की दो पंक्तियों को रखा जाता था किन्तु इस लिपि में विराम चिह्न, संख्‍या, गणितीय चिह्न आदि का अभाव था. प्रखर बुद्धि के लुई ने इसी लिपि को आधार बनाकर 12 की बजाय मात्र 6 बिंदुओं का उपयोग कर 64 अक्षर और चिह्न बनाए. उसमें न केवल विराम चिह्न बल्कि गणितीय चिह्न और संगीत के नोटेशन भी लिखे जा सकते हैं.

लुई ब्रेल 
कहते हैं ईश्वर ने सभी को इस धरती पर किसी न किसी प्रयोजन हेतु भेजा है. लुई ब्रेल के बचपन की दुर्घटना के पीछे ईश्वर का कुछ खास मकसद छुपा हुआ था. 1825 में लुई ब्रेल ने मात्र 16 वर्ष की उम्र में एक ऐसी लिपि का आविष्कार कर दिया जिसे ब्रेल लिपि कहते हैं. इस लिपि के आविष्कार ने दृष्टिबाधित लोगों की शिक्षा में क्रांति ला दी. यही लिपि आज सर्वमान्य है.

ब्रेल लिपि 
उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हे बहुत जल्द ही विद्यालय में अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिली. वे पूर्ण लगन के साथ शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करते रहे. 35 वर्ष की अल्पायु में ही क्षय रोग की चपेट में आ गये. जिसके चलते 43 वर्ष की अल्पायु में ही अंधकार भरे जीवन में शिक्षा की ज्योति जलाने वाला यह व्यक्तित्व 6 जनवरी 1852 को इस दुनिया को अलविदा कह गया.

लुई ब्रेल को उनके जीवन में वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हक़दार थे. 1837 में फ्रांस का संक्षिप्त इतिहास  नामक पुस्तक भी ब्रेल लिपि में छापी गई, फिर भी संसार ने इसे मान्यता देने में बहुत समय लगाया. फ़्रांस की सरकार ने ही लुई ब्रेल की मृत्यु के दो वर्ष बाद 1854 में इसे सरकारी मान्यता प्रदान की. ब्रेल लिपि की असीम क्षमता और प्रबल प्रभाविकता के कारण सन 1950 के विश्व ब्रेल सम्मेलन में ब्रेल को विश्व ब्रेल का स्थान मिल गया. उनकी प्रतिभा का सम्मान करते हुए फ़्रांस ने उनके देहांत के सौ वर्ष बाद वापस राष्ट्रीय सम्मान के साथ उनको दफनाया. अपनी इस भूल के लिये फ्रांस की समस्त जनता तथा नौकरशाह ने लुई ब्रेल के नश्वर शरीर से माफी माँगी. 2009 में 4 जनवरी को जब लुई ब्रेल के जन्म के दो सौ वर्ष पूरे हुए तो हमारे देश ने भी उन्हें पुर्नजीवित करने का प्रयास किया. उनकी द्विशती के अवसर पर उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया.


लुई ब्रेल ने अपने कार्य से सिद्ध कर दिया कि जीवन की दुर्घटनाओं में अकसर बड़े महत्व के नैतिक पहलू छिपे हुए होते हैं. ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व को बुलेटिन परिवार की ओर से सादर नमन.

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