Subscribe:

Ads 468x60px

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

गुरमेहर एक सशक्त मोहरा




मैं एक सैनिक की माँ हूँ" इससे मेरी कविताओं की पुस्तकों का कोई लेना-देना नहीं। इस आधार पर वह बिक जाएँ, यह ग़लत है।  वजूद अपना होता है, और उसके बल पर चला जाता है।  
डिफेन्स हो या आम जनता, यह एक दुखद स्थिति है कि हम किसी भी स्तर पर उतरकर, कुछ भी कह देते हैं  ... कहीं कोई बंदिश ही नहीं है।  जितने माध्यम अभिव्यक्ति के बनते गए , उतनी ही गिरावट आती गई  !
......... 
मैं इस विषय पर नहीं लिखना चाहती, क्योंकि बात , गुरमेहर की हो या सहवाग की,  ... हर शख्स अपनी चाल चल रहा है, और सबसे आसान है मखौल उड़ाना ! 
विरोध किया तो इज़्ज़त ले लेंगे, यानि विकृति की हदें पार कर देंगे। 
गुलमेहर किसकी बेटी है, यह मुख्य मुद्दा यहाँ है ही नहीं, - यह एक अलग लड़ाई है और गुरमेहर क्या कह रही है, क्यूँ कह रही है - इसे समझना है।  
गुरमेहर के पिता की आड़ में एक राजनैतिक चाल चल रहे सब, गुलमेहर एक सशक्त मोहरा है,  ... 


सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

मैं सजदा करता हूँ उस जगह जहाँ कोई ' शहीद ' हुआ हो ...

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज २७ फरवरी है ... आज अमर शहीद पंडित चन्द्र शेखर आज़ाद जी की ८६ वीं पुण्यतिथि है ... आज ही के दिन सन १९३१ मे इलाहाबाद के आजाद पार्क ( अल्फ्रेड पार्क ) में हुई भयानक खूनी मुठभेड़ आजादी के इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ बन गई ...युवाओं और देशभक्तों के महान प्रेरणा स्रोत ' आजाद ' का बलिदान दिवस २७ फरवरी ... एक महान क्रांतिकारी विरासत की जीती - जागती गाथा है ... 
 
"दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे..."
 
"यूँ तो जर्रे - जर्रे में खुदा बसता है ऐ दोस्त ...
पर मैं सजदा करता हूँ उस जगह जहाँ कोई ' शहीद ' हुआ हो ..!!"
 
 
कुछ ऐसे ही भाव दिल मे बसाये मैं २६ अगस्त २०१२ को इलाहाबाद के आज़ाद पार्क पहुंचा था ... यहाँ आप को कुछ चित्र दिखा रहा हूँ जो मैंने वहाँ लिए थे !
 





 
वहाँ मैं जितने समय भी था जो जो विचार दिल मे आ रहे थे उनको मैं यहाँ शब्दों मे बयान नहीं कर सकता ... एक अलग ही अनुभूति थी ... दिल भर आ रहा था कि कैसे लालच मे आ कर अपने ही लोगो की मुखबरी के कारण आज़ाद जी को इस प्रकार यह दिन देखना पड़ा पर जो भी हो इतना जरूर है कि गद्दारों और ब्रितानी ख़ुफ़िया विभाग के प्रयासों का अंतिम परिणाम और सांप्रदायिक घिनौनी राजनीती के ताबूत पर क्रांतिकारियों के त्याग और शौर्य की अंतिम कील के रूप में ' आजाद ' का यह बलिदान अमर रहेगा |
 
अमर शहीद पंडित चन्द्रशेखर 'आजाद' जी को ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से शत शत नमन ! 

इंकलाब ज़िंदाबाद ...

वंदे मातरम ||
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
 






रविवार, 26 फ़रवरी 2017

मनमोहक मनमोहन - ब्लॉग बुलेटिन

रक्तदान से बड़ा कोनो दान नहीं होता है. ई दान अइसा दान है, जिससे कोनो अनजान आदमी को नया जिन्नगी मिलता है अऊर उसके साथ एगो नया खून का रिस्ता बन जाता है. इहो कहावत है कि खून पानी से जादा गाढा होता है, जिसका अपबाद आजकल देखाई देने लगा है. इहो बचपन से पढ़ाया गया है अऊर समय समय पर सबलोग दोहराता रहता है कि खून अइसा चीज है जिसका रंग अमीर-गरीब, ऊँच-नीच अऊर जाति-धरम से नहीं बदलता है.

खैर, आज हम ई पोस्ट के माध्यम से उस महान आदमी को याद कर रहे हैं, जो एक आदमी के सरीर से दोसरा जरूरतमंद आदमी के सरीर में खून चढ़ाने के बिधि का आबिस्कार किया था अऊर हमको इस बात का गर्व है कि ऊ आदमी हमारे भारतवर्स का था. साल था १९७७ अऊर उस महान बैज्ञानिक का नाम था मनमोहन कीकूभाई देसाई. 

उनका एगो सिनेमा था “अमर अकबर एंथनी” जिसमें ई तीनों लोग मिलकर एगो बूढ़ी अंधी औरत को अपना खून देते हैं. खून देने का तरीका भी मेडिकल इतिहास में पहिला बार... तीनों के सरीर से खून निकलकर नीचे से ऊपर बोतल में जमा होता है अऊर ओहीं से डायरेक्ट ऊ बूढ़ी औरत के देह में चढ़ा दिया जाता है. मनमोहन देसाई जी का ई आबिस्कार पर तीन ठो फिलिमफेयर पुरस्कार मिला.

बहुत पहिले मसहूर ऐक्टर-डायरेक्टर आई. एस. जौहर एगो बात कहे थे सिनेमा के बारे में. उनका कहना था कि भारत में दू तरह का सिनेमा बनता है, एगो ख़राब अऊर दोसरा बहुत ख़राब. अपना बारे में ऊ बताते थे कि ऊ दोसरका कैटेगरी का सिनेमा बनाते थे माने बहुत ख़राब. मनमोहन देसाई का सबसे बड़ा खासियत एही था कि ऊ दिमाग वाला आदमी के लिये सिनेमा बनइबे नहीं करते थे. उनके सिनेमा में आपको दिमाग, तर्क अऊर बास्तबिकता से दूर दूर तक कोनो पाला नहीं पड़ने वाला है. तनिको दिमाग आप लगाए, त माथा में हेडेक होने लगेगा.

मनमोहन देसाई गुजराती थे अऊर बिजनेस का दांव-पेंच जानते थे. एही से उनके सिनेमा में आम से भी आम जनता के लिये सब तरह का मसाला मिलता था. बचपन में जुल्मी के अत्याचार से बिखरा हुआ परिबार, अलग अलग धरम का मेल, हीरो-हिरोइन का रोमांस अऊर सबसे जरूरी अऊर महत्वपूर्ण हिस्सा था मधुर संगीत. कल्याणजी आनंदजी से लेकर पंचम दा, लक्ष्मी-प्यारे, चाहे अन्नू मलिक... गाना ऐसा कि जनता के जुबान पर चढ जाए.

एतना बड़ा अऊर सफल फिलिम बनाने वाला आदमी होने के बादो, ऊ मुम्बई के चाली में रहते थे. एही वजह से उनको साधारण जनता का नब्ज पहचानना आता था. अमिताभ बच्चन भी एक बार कहीं बोल रहे थे कि जब ऊ कहानी सुनाते थे उनका हँसी निकल जाता था, मगर मन (प्यार से लोग उनको मन कहते थे) भाई का कन्भिक्सन के आगे ऊ भी चुप रह जाते थे. अऊर नतीजा में सिनेमा सुपर हिट.

जेतना अबिस्वास से भरा हुआ उनका सिनेमा का घटना होता था, ओतने अबिस्वास वाला उनका मौत भी हुआ. लोग कहता है कि ऊ अपना घर का रेलिंग से टिककर बतिया रहे थे, रेलिंग टूट गया अऊर ऊ गिरकर खतम हो गए. कोनो कोनो लोग आत्महत्या भी कहता है. एकदम सिनेमा जैसा मौत पाने वाला ई सो-मैन का आज जन्मदिन है.

अगर सिनेमा को मनोरंजन के एंगिल से देखें, त सायद मनमोहन देसाई एगो सच्चा फिलिमकार थे. छलिया, ब्लफ़ मास्टर, सच्चा झूठा, रामपुर का लक्ष्मण, आ गले लग जा, धरमवीर, नसीब जैसा अनगिनत सिनेमा ई बात का सबूत है.



 हैप्पी बर्थ डे मन अंकल!

                             - सलिल वर्मा 

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

मेरे पास क्या है एक बेजुबान आं है - देवी प्रसाद मिश्र की कविता

चुन्नियों में लिपटा दर्द

लिपस्टिक अंडर माई बुर्का पर कैंची !

कार्टून कुछ बोलता है .....मजबूत लोकतंत्र के मायने ....

कोदूराम दलित की साहित्य साधना

वक़्त

रूद्र पलाश के फूल

यौन शिक्षा :साइट्स से या पाठ्यक्रम से ? प्रकाशित लेख

समस्त गर्दभ प्रजाति की तरफ से इंसानों को समर्पित -

जन्म दिन का जश्न न मनने की खुशी

वीर सावरकर जी की ५१ वीं पुण्यतिथि

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

डॉ. अमरनाथ झा और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
अमरनाथ झा
अमरनाथ झा (अंग्रेज़ी: Amarnath Jha, जन्म: 25 फ़रवरी, 1897 - मृत्यु: 2 सितम्बर, 1955) भारत के प्रसिद्ध विद्वान, साहित्यकार और शिक्षा शास्त्री थे। वे हिन्दी के प्रबल समर्थकों में से एक थे। हिन्दी को सम्माननीय स्तर तक ले जाने और उसे राजभाषा बनाने के लिए अमरनाथ झा ने बहुमूल्य योगदान दिया था। उन्हें एक कुशल वक्ता के रूप में भी जाना जाता था। उन्होंने कई पुस्तकों की रचना भी की। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें वर्ष 1954 में 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया गया था।

अमरनाथ झा का जन्म 25 फ़रवरी, 1897 ई. को बिहार के मधुबनी ज़िले के एक गाँव में हुआ था। उनके पिता डॉ. गंगानाथ झा अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान थे। अमरनाथ झा की शिक्षा इलाहाबाद में हुई। एम.ए. की परीक्षा में वे 'इलाहाबाद विश्वविद्यालय' में सर्वप्रथम रहे थे। उनकी योग्यता देखकर एम.ए. पास करने से पहले ही उन्हें प्रांतीय शिक्षा विभाग में अध्यापक नियुक्त कर लिया गय़ा था।

अमरनाथ झा की नियुक्त 1922 ई. में अंग्रेज़ी अध्यापक के रूप में 'इलाहाबाद विश्वविद्यालय' में हुई। यहाँ वे प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रहने के बाद वर्ष 1938 में विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर बने और वर्ष 1946 तक इस पद पर बने रहे। उनके कार्यकाल में विश्वविद्यालय ने बहुत उन्नति की और उसकी गणना देश के उच्च कोटि के शिक्षा संस्थानों मे होने लगी। बाद में उन्होंने एक वर्ष 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' के वाइस चांसलर का पदभार सम्भाला तथा उत्तर प्रदेश और बिहार के 'लोक लेवा आयोग' के अध्यक्ष रहे।

डॉ. अमरनाथ झा अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। इलाहाबाद और आगरा विश्वविद्यालयों ने उन्हें एल.एल.ड़ी. की और 'पटना विश्वविद्यालय' ने डी.लिट् की उपाधि प्रदान की थी। वर्ष 1954 में उन्हें 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया गया।

हिन्दी को राजभाषा बनाने के प्रश्न पर विचार करने के लिए जो आयोग बनाया था, उसके एक सदस्य डॉ. अमरनाथ झा भी थे। वे हिन्दी के समर्थक थे और खिचड़ी भाषा उन्हें स्वीकर नहीं थी। डॉ. अमरनाथ झा ने अनेक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया।

एक कुशल वक्ता के तौर पर भी अमरनाथ झा जाने जाते थे। उन्होंने अनेक पुस्तकों की रचना भी की। देश और समाज के लिए अपना बहुमूल्य योगदान देने वाले इस महापुरुष का 2 सितम्बर, 1955 को देहांत हो गया।




आज भारत के महान साहित्यकार और शिक्षाशास्त्री डॉ. अमरनाथ झा जी की 120वीं जयंती पर हमारी ब्लॉग बुलेटिन टीम और समस्त हिंदी ब्लॉग जगत उनको याद करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करता है।  सादर।।


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर ....














आज की ब्लॉग बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

शिव का देवत्व और ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
आज महाशिवरात्रि का पावन पर्व है. भगवान शिव की अतिप्रिय रात्रि को शिवरात्रि कहा जाता है. शिवरात्रि अथवा महाशिवरात्रि हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है. वैसे तो हिन्दी माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि कही जाती है किन्तु फाल्गुन की चतुर्दशी सबसे महत्त्वपूर्ण मानी जाती है और महाशिवरात्रि कहलाती है. गरुड़पुराण, स्कन्दपुराण, पद्मपुराण, अग्निपुराण आदि में इसका वर्णन भी है. महाशिवरात्रि पर रुद्राभिषेक का बड़ा महत्त्व है और माना जाता है कि इस दिन रुद्राभिषेक करने से सभी रोग और दोष समाप्त हो जाते हैं. शिवरात्रि का शिवतत्त्व से घनिष्ठ संबंध है. शिव पुराण के ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोडों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए-
फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि।
शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:॥


ज्योतिषशास्त्र के अनुसार इस तिथि में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है. इसी समय जीवनरूपी चन्द्रमा का शिवरूपी सूर्य के साथ मिलन होता है. इस चतुर्दशी को शिवपूजा करने से जीव को अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है. महाशिवरात्रि का पर्व परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का मंगल सूचक पर्व है.

आप सभी को इस पावन पर्व की मंगलकामनाओं सहित आज की बुलेटिन प्रस्तुत है.

++++++++++














गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

फ़ाइल ट्रांसफर - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय  ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

पप्पू एक बार कुछ फाइल्स एक पीसी से दूसरे को ट्रांसपर करना चाहता था ... पप्पू ने उसकी प्रक्रिया कुछ इस प्रकार की ...

1. पप्पू ने राईट क्लीक उस फ़ाइल पर किया जिसे वह ट्रांसफर करना चाहता था और कट ऑप्शन पर क्लीक किया!

2. उसके बाद उस पीसी से मॉउस को डिस्कोनेक्ट किया!

3. उस मॉउस को बड़ी सावधानी से उस पीसी के साथ जोड़ दिया जिस पर फ़ाइल को कॉपी करना चाहता था!

4. फिर से मॉउस पर राईट क्लीक किया और पेस्ट ऑप्शन पर क्लीक किया ...

पर न जाने क्यूँ फ़ाइल ट्रांसफर नहीं हुई ... !!!???

क्या आप बता सकते हैं क्यूँ !!??

सादर आपका
शिवम् मिश्रा
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 

शिकवा

लंबे अंतराल के बाद - कहीं तुम वो तो नहीं

एक अलौकिक प्रेम कथा - सती से पार्वती तक !!!

शिव पार्वती विवाह

ओपीनियन पोल और एग्जिट पोल में क्या फर्क है?

अफसाना

NASA opportunity: धरती के आकार वाले सात नए ग्रहों का पता लगा, इन सभी ग्रहों पर पानी मिलने की पूरी संभावना

एक लेखक का जाना

मालती जोशी जी की स्नेह भरी पाती

मधुबाला की ४८ वीं पुण्यतिथि

आज दिल मचल गया

 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

मौलाना अबुल कलाम आजाद जी की 59वीं पुण्यतिथि और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार। 
मौलाना अबुल कलाम आजाद ( Abul Kalam Azad जन्म-11 नवम्बर, 1888 - मृत्यु- 22 फ़रवरी, 1958 ) एक मुस्लिम विद्वान थे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। वह वरिष्ठ राजनीतिक नेता थे। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता का समर्थन किया और सांप्रदायिकता पर आधारित देश के विभाजन का विरोध किया। स्वतंत्र भारत में वह भारत सरकार के पहले शिक्षा मंत्री थे। उन्हें 'मौलाना आज़ाद' के नाम से जाना जाता है। 'आज़ाद' उनका उपनाम है।

अबुल के पिता 'मौलाना खैरूद्दीन' एक विख्यात विद्वान थे, जो बंगाल में रहते थे। उनकी माँ 'आलिया' एक अरब थी और मदीन के शेख़ मोहम्मद ज़ाहिर वत्री की भतीजी थी। अरब देश के पवित्र मक्का में रहने वाले एक भारतीय पिता और अरबी माता के घर में उनका जन्म हुआ। पिता मौलाना खैरूद्दीन ने उनका नाम मोहिउद्दीन अहमद या फ़िरोज़ बख़्त (खुश-क़िस्मत) रक्खा। आगे चलकर वे 'मौलाना अबुलकलाम आज़ाद' या 'मौलाना साहब' के नाम से प्रसिद्ध हुए। बचपन से ही उनमें कुछ ख़ास बातें नज़र आने लगी थीं, जो जीवन भर उनके साथ रहीं। मौलाना आज़ाद को एक 'राष्ट्रीय नेता' के रूप में जाना जाता हैं। वास्तव में राष्टीय नेता तो वह थे, लेकिन वह नेता बनना चाहते ही नहीं थे।



मौलाना अबुल कलाम आजाद जी की 59वीं पुण्यतिथि पर सभी भारतवासी उनको याद करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर  ...... 














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

भवानी प्रसाद मिश्र और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
भवानी प्रसाद मिश्र
भवानी प्रसाद मिश्र (जन्म: 29 मार्च, 1913 - मृत्यु: 20 फ़रवरी, 1985) हिन्दी के प्रसिद्ध कवि तथा गांधीवादी विचारक थे। भवानी प्रसाद मिश्र दूसरे तार-सप्तक के एक प्रमुख कवि हैं। मिश्र जी विचारों, संस्कारों और अपने कार्यों से पूर्णत: गांधीवादी हैं। गाँधीवाद की स्वच्छता, पावनता और नैतिकता का प्रभाव और उसकी झलक भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं में साफ़ देखी जा सकती है। उनका प्रथम संग्रह 'गीत-फ़रोश' अपनी नई शैली, नई उद्भावनाओं और नये पाठ-प्रवाह के कारण अत्यंत लोकप्रिय हुआ।

भवानी प्रसाद मिश्र उन गिने चुने कवियों में थे जो कविता को ही अपना धर्म मानते थे और आमजनों की बात उनकी भाषा में ही रखते थे। वे 'कवियों के कवि' थे। मिश्र जी की कविताओं का प्रमुख गुण कथन की सादगी है। बहुत हल्के-फुलके ढंग से वे बहुत गहरी बात कह देते हैं जिससे उनकी निश्छल अनुभव संपन्नता का आभास मिलता है। इनकी काव्य-शैली हमेशा पाठक और श्रोता को एक बातचीत की तरह सम्मिलित करती चलती है। मिश्र जी ने अपने साहित्यिक जीवन को बहुत प्रचारित और प्रसारित नहीं किया। मिश्र जी मौन निश्छलता के साथ साहित्य-रचना में संलग्न हैं। इसीलिए उनके बहुत कम काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। 'गीत-फ़रोश' के प्रकाशन के वर्षों बाद 'चकित है दुख', और 'अंधेरी कविताएँ' नामक दो काव्य-संग्रह इधर प्रकाशित हुए हैं।

20 फरवरी सन् 1985 को हिन्दी काव्य-जगत् का यह अनमोल सितारा अपनी कविताओं की थाती यहाँ छोड़ हमेशा के लिए हमसे बिछड़ गया।


( जानकारी स्त्रोत - http://bharatdiscovery.org/india/भवानी_प्रसाद_मिश्र )


आज हिन्दी भाषा के महान साहित्यकार श्री भवानी प्रसाद मिश्र जी की 32वीं पुण्यतिथि पर हमारा ब्लॉग बुलेटिन समूह और समस्त हिंदी ब्लॉग जगत उनको स्मरण करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर ... 
















हिन्दू खिचड़ी , मुस्लिम रायता !


आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

एयरमेल हुआ १०६ साल का

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

वर्तमान में ई-मेल का जमाना है क्लिक करते ही संदेश एक स्थान से दूसरे तक पहुंच जाता है किंतु पिछले दशक तक लाल नीले स्ट्रिप बार्डर वाले पत्र की खास अहमियत थी और एयरमेल सेवा ही सबसे तेज थी। हार्ड कापी को जल्द से जल्द भेजने का माध्यम आज भी एयरमेल सेवा ही बनी हुई है जिसे शुरू हुए अब एक सौ छह साल हो रहे हैं।
फ्रेंच पायलट हैनरी पिक्वइट ने पहला एयरमेल लेटरों के पैकेट को इलहाबाद से एयर लिफ्ट करके नैनी पहुंचाया था। इस पहली एयरमेल फ्लाइट के आयोजकों को भलीभांति आभास हो गया था कि वह एक इतिहास बनाने जा रहे हैं, इसी लिये इस लोक उपयोगी सेवा की शुरूआत को एक अन्य चेरिटी के काम से जोड़ते हुए शुरू किया। 18 फरवरी 1911 को हुई इस पहली फ्लाइट से भेजे गये पत्रो से हुई आय को बैंगलूर के ट्रिनिटी चर्च के एक हॉस्टल निर्माण के लिये दान कर दिया गया।
राइट्स बंधुओं के द्वारा पहली पावर फ्लाइट की कामयाबी के बाद महज सात साल बाद हुई इस ऐतिहासिक उडान में 6500 पत्र ले जाये गये थे जिनमें पं. मोतीलाल नेहरू द्वारा अपने पुत्र जवाहर लाल नेहरू को लिखे चर्चित खत के अलावा किंग जार्ज पंचम और नीदरलैंड की महारानी के नाम लिखे गये खत भी शामिल थे। 

हैनरी पर भी जारी हुआ था डाक टिकट 

 
सन 2011 मे विश्व की पहली एयरमेल सेवा के लिए इस्तेमाल होने वाले वायुयान को चलाने वाले फ्रेंच पाइलट हैनरी पिक्वट पर भी उनकी यादगार शुरूआत में साहसिक योगदान के लिए फ्रांस में एक स्पेशल पोस्टल स्टाप भी जारी किया गया था| 
 
सादर आपका
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

आख़िरी कविता

कार्टूनों में देखें कैसा रहा पिछला सप्ताह

अच्छी पत्नी

जब नए कपड़े पहनती हूं तो लाज लगती है...

और तभी...

मौसम की वर्दी

ताड़केश्वर-बीरो खाल-थलीसैण पौड़ी

बादशाह पर जुर्माना...डॉ. रश्मि शील

निरपेक्षता का ‘सुमन भाष्य’

ऐसे भी कोई जाता है क्या!

जलसेना विद्रोह (मुम्बई) - १८-२३ फ़रवरी सन् १९४६

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!! 

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

युद्ध की शुरुआत - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

लीजिये ... एक लतीफ़ा पढ़िये ...

बेटा: पिताजी, युद्ध कैसे शुरू होते हैं?

पिताजी: मान लो अमेरिका और इंग्लैंड में किसी बात पर मतभेद हो गया...

माँ: लेकिन अमेरिका और इंग्लैंड में मतभेद हो ही नहीं सकता।

पिताजी: अरे भई मैं तो सिर्फ उदाहरण दे रहा था...

माँ: मगर तुम गलत उदाहरण देकर बच्चे को बहका रहे हो।

पिताजी: मैं नहीं बहका रहा हूँ...

माँ: ये बहकाना नहीं तो और क्या है?

पिताजी: चुप रहो.. एक बार कह दिया न कि नहीं बहका रहा हूँ, मतलब नहीं बहका रहा हूँ।

माँ: मैं क्यों चुप रहूँ, ये मेरे बच्चे की पढ़ाई का सवाल है। आज ये बॊल रहे हो कल को कुछ और गलत बोलोगे...

बच्चा: प्लीज... आप लोग झगड़ा मत करिये... मैं समझ गया कि युद्ध कैसे शुरू होते हैं।
 
सादर आपका 

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

ब्लॉग बुलेटिन और दादा साहेब फाल्के

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
दादा साहब फाल्के के लिए चित्र परिणाम
भारतीय फ़िल्म उद्योग के पितामह दादा साहब फाल्के का पूरा नाम 'धुन्दीराज गोविंद फाल्के' था किंतु वह दादा साहब फाल्के के नाम से प्रसिद्ध हैं। दादा साहब फाल्के का जन्म 30 अप्रैल, 1870 को नासिक के निकट 'त्र्यंबकेश्वर' में हुआ था। उनके पिता संस्कृत के प्रकाण्ड पंडित और मुम्बई के 'एलफिंस्टन कॉलेज' के अध्यापक थे। अत: इनकी शिक्षा मुम्बई में ही हुई। वहाँ उन्होंने 'हाई स्कूल' के बाद 'जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट' में कला की शिक्षा ग्रहण की। फिर बड़ौदा के कलाभवन में रहकर अपनी कला का ज्ञान बढ़ाया। वे प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता-निर्देशक एवं पटकथा लेखक थे जो भारतीय सिनेमा के पितामह की तरह माने जाते हैं। दादा साहब फाल्के की सौंवीं जयंती के अवसर पर दादा साहब फाल्के पुरस्कार की स्थापना वर्ष 1969 में की गई थी। दादा साहब फाल्के पुरस्कार भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा पुरस्कार है, जो आजीवन योगदान के लिए भारत की केंद्र सरकार की ओर से दिया जाता है।



आज दादा साहेब फाल्के जी की 73वीं पुण्यतिथि पर हमारी ब्लॉग बुलेटिन टीम सहित हिंदी ब्लॉग जगत उनके योगदान को स्मरण करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर  .... 















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

सोलह आने खरी १६००वीं ब्लॉग बुलेटिन

ठण्डा का मौसम जाते-जाते हमको बहुत बुरा तरह से परेसान कर गया है. मकर संक्रांति के बाद त इहाँ बुझाया कि ठण्डा गायबे हो गया है, बाकी अचानके छब्बीस जनवरी को जो झमाझम पानी बरसा कि हमलोग का सांस्कृतिक कार्जक्रम त गडबडएबे किया हमरा तबियत भी तभिये से बिगड़ा हुआ है. जो हमरा अवाज अमिताभ बच्चन जैसा था ऊ असित सेन का जइसा हो गया है. करीब-करीब एक महीना हो जाने के बाद भी नाक परनाला का जइसा बह रहा है अऊर खाँसी लगता है कि दम निकाल के दम लेगा. अब जेतना भोगना है, ओतना त भोगबे करेंगे, काहे आप लोग का मजा ख़राब करें.

त हम कहने ई जा रहे थे कि ठण्डा का मौसम में बहुत बढ़िया-बढ़िया परब त्यौहार आता है, जिसका सेलेब्रेसन बसंत ऋतु तक चलता है... बसंत पंचमी, सिबरात्री अऊर अंत में होली के बाद बस गर्मी दरवाजा खटखटाने लगता है. एही बीच में ऊ अंगरेजी वाला भी एगो त्यौहार आता है, जिसमें जवान लड़का-लड़की सब बौरायेल रहता है... का कहते हैं भुलेटन बाबा का परब. बाकी भुलेटन बाबा का भगत लोग ई कैसे भुला जाता है कि अभी सिबरात्रि आने वाला है.

सिब भगवान के बारे में सुरुये से ई प्रचलित है कि उनसे प्रेम से जो कोनो बरदान मानिए, अगर ऊ खुस हो गए त बिना आगा-पीछा सोचे पट से देते हैं. बाद में बिसनु भगवान उसका तोड़ निकालते फिरते हैं. ई भुलेटन बाबा के पीछे जो सोरह साल के लड़की/लड़का सब अभिबेक्ति का आजादी के नाम पर अपना सच्चा प्रेम खोजते फिरती/फिरता है, भुला जाता है कि सिब जी का सोरह गो ब्रत रखने से भी सिब जी खुस होकर मनचाहा प्रेम जीबन भर के लिये त छोड़िये सात जनम के लिये दिला देते हैं.

अब ई आजकल का बचवन सब बोलेगा कि मजाक है, अंध बिस्वास है. त बाबू जऊन भुलेटन बाबा को बिना देखले एक रोज के प्यार के ख़ातिर एतना खर्चा-पानी कर रहे हो कि दस रुपया का गुलाब सौ रुपया में खरीद रहे हो, त भगबान सिब त धतूरा जइसा चीज से भी खुस हो जाते हैं. एक बार आजमा कर देख लो.

मगर सोलह साल का उम्र होब्बे बहुत खतरनाक करता है. जब ऊ उम्र में हम नहीं समझे, जो ए घड़ी भासन दे रहे हैं, त मोबाइल जुग का बचवा कहाँ से हमरा बात समझेगा. ई सोलह साल का उमर का भटकाव भी सोलह आना सच है, जिसमें सोलह सोमबार का ब्रत नहीं समझ में आता है, बस सोलह सिंगार देखाई देता है. सोलह सिंगार के बारे में आचार्य केसब दास कमाल का बरनन किये हैं:

प्रथम सकल सुचि, मंजन अमल बास, जावक, सुदेस किस पास कौ सम्हारिबो।
अंगराग, भूषन, विविध मुखबास-राग, कज्जल ललित लोल लोचन निहारिबो।
बोलन, हँसन, मृदुचलन, चितौनि चारु, पल पल पतिब्रत प्रन प्रतिपालिबो।
'केसौदास' सो बिलास करहु कुँवरि राधे, इहि बिधि सोरहै सिंगारन सिंगारिबो।
    
बात बात में ई त सोलह का पहाड़ा हो गया. हद्द हैं हम भी कहाँ का बात कहाँ ले जाते हैं. बाकी अब जब इहाँ तक ले आए हैं त मंजिल तक पहुंचाना भी हमरे काम है मितरों.


ई सोलह के चक्कर में याद आया कि ई त हमरा ब्लॉग-बुलेटिन का सोलह सौवाँ पोस्ट हो गया. 

मगर सोलह के चक्कर में आज का पन्द्रह तारीख कों भूल गए त हमरा अंतरात्मा हमको कहियो माफ नहीं करेगा. आज का तारीख है एगो ऐसा महान सायर का पुण्य तिथि जिसके बिना गजल के दुनिया का बिस्मिल्लाह नहीं हो सकता है. अब ऊ महान सायर का नाम भी हम ही कों बताना होगा. 

चलिए उनसे पूछते हैं जो खुद कों उनका खादिम कहते हैं अऊर उन्हीं के नज्म के रूप में ऊ सायर को याद करके उनके सामने माथा नवाते हैं.

बल्लीमारान के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों के सी गलियाँ
सामने टाल के नुक्कड़ पे बटेरों के कसीदे
गुड़गुडाती हुई पान की पीकों में वो दाद, वो वाह वाह
चंद दरवाजों पे लटके हुए बोसीदा से टाट के परदे
एक बकरी के मिमियाने की आवाज़
और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अँधेरे
ऐसे दीवारों से मुँह जोड़के चलते हैं यहाँ
चूड़ीवालान के कटरे की बड़ी बी जैसे
अपने बुझती हुई आँखों से दरवाज़े टटोले
इसी बेनूर अंधेरी सी गली कासिम से
एक तरतीब चरागों की शुरू होती है
कुरआनेसुखन का सफहा खुलता है 
     मिर्ज़ा असद उल्लाह खां ग़ालिब का पता मिलता है.

अऊर अंत में आप सब लोग अपना-अपना पीठ ठोंकिये, काहे कि आज हमारा देस बिग्यान के छेत्र में एतना बड़ा छलांग लगाया है अंतरिच्छ में कि एक्के बार में बिस्व रिकॉर्ड हो गया.

एक साथ १०४ सैटेलाईट लॉन्च करके हमारा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान आसमान पर लिख दिया कि हम किसी से कम नहीं. हर भारतीय के लिये गर्व करने का मौक़ा आज मिला है. 

जोर से भारत माता की जय बोलिए, हमको दीजिए इजाजत अऊर आप लोग आनन्द लीजिए हमरे बुलेटिन से भी मनोरंजक पोस्ट सब का.

सादर

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

लेखागार