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गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

फ़ाइल ट्रांसफर - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय  ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

पप्पू एक बार कुछ फाइल्स एक पीसी से दूसरे को ट्रांसपर करना चाहता था ... पप्पू ने उसकी प्रक्रिया कुछ इस प्रकार की ...

1. पप्पू ने राईट क्लीक उस फ़ाइल पर किया जिसे वह ट्रांसफर करना चाहता था और कट ऑप्शन पर क्लीक किया!

2. उसके बाद उस पीसी से मॉउस को डिस्कोनेक्ट किया!

3. उस मॉउस को बड़ी सावधानी से उस पीसी के साथ जोड़ दिया जिस पर फ़ाइल को कॉपी करना चाहता था!

4. फिर से मॉउस पर राईट क्लीक किया और पेस्ट ऑप्शन पर क्लीक किया ...

पर न जाने क्यूँ फ़ाइल ट्रांसफर नहीं हुई ... !!!???

क्या आप बता सकते हैं क्यूँ !!??

सादर आपका
शिवम् मिश्रा
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शिकवा

लंबे अंतराल के बाद - कहीं तुम वो तो नहीं

एक अलौकिक प्रेम कथा - सती से पार्वती तक !!!

शिव पार्वती विवाह

ओपीनियन पोल और एग्जिट पोल में क्या फर्क है?

अफसाना

NASA opportunity: धरती के आकार वाले सात नए ग्रहों का पता लगा, इन सभी ग्रहों पर पानी मिलने की पूरी संभावना

एक लेखक का जाना

मालती जोशी जी की स्नेह भरी पाती

मधुबाला की ४८ वीं पुण्यतिथि

आज दिल मचल गया

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

मौलाना अबुल कलाम आजाद जी की 59वीं पुण्यतिथि और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार। 
मौलाना अबुल कलाम आजाद ( Abul Kalam Azad जन्म-11 नवम्बर, 1888 - मृत्यु- 22 फ़रवरी, 1958 ) एक मुस्लिम विद्वान थे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। वह वरिष्ठ राजनीतिक नेता थे। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता का समर्थन किया और सांप्रदायिकता पर आधारित देश के विभाजन का विरोध किया। स्वतंत्र भारत में वह भारत सरकार के पहले शिक्षा मंत्री थे। उन्हें 'मौलाना आज़ाद' के नाम से जाना जाता है। 'आज़ाद' उनका उपनाम है।

अबुल के पिता 'मौलाना खैरूद्दीन' एक विख्यात विद्वान थे, जो बंगाल में रहते थे। उनकी माँ 'आलिया' एक अरब थी और मदीन के शेख़ मोहम्मद ज़ाहिर वत्री की भतीजी थी। अरब देश के पवित्र मक्का में रहने वाले एक भारतीय पिता और अरबी माता के घर में उनका जन्म हुआ। पिता मौलाना खैरूद्दीन ने उनका नाम मोहिउद्दीन अहमद या फ़िरोज़ बख़्त (खुश-क़िस्मत) रक्खा। आगे चलकर वे 'मौलाना अबुलकलाम आज़ाद' या 'मौलाना साहब' के नाम से प्रसिद्ध हुए। बचपन से ही उनमें कुछ ख़ास बातें नज़र आने लगी थीं, जो जीवन भर उनके साथ रहीं। मौलाना आज़ाद को एक 'राष्ट्रीय नेता' के रूप में जाना जाता हैं। वास्तव में राष्टीय नेता तो वह थे, लेकिन वह नेता बनना चाहते ही नहीं थे।



मौलाना अबुल कलाम आजाद जी की 59वीं पुण्यतिथि पर सभी भारतवासी उनको याद करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर  ...... 














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

भवानी प्रसाद मिश्र और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
भवानी प्रसाद मिश्र
भवानी प्रसाद मिश्र (जन्म: 29 मार्च, 1913 - मृत्यु: 20 फ़रवरी, 1985) हिन्दी के प्रसिद्ध कवि तथा गांधीवादी विचारक थे। भवानी प्रसाद मिश्र दूसरे तार-सप्तक के एक प्रमुख कवि हैं। मिश्र जी विचारों, संस्कारों और अपने कार्यों से पूर्णत: गांधीवादी हैं। गाँधीवाद की स्वच्छता, पावनता और नैतिकता का प्रभाव और उसकी झलक भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं में साफ़ देखी जा सकती है। उनका प्रथम संग्रह 'गीत-फ़रोश' अपनी नई शैली, नई उद्भावनाओं और नये पाठ-प्रवाह के कारण अत्यंत लोकप्रिय हुआ।

भवानी प्रसाद मिश्र उन गिने चुने कवियों में थे जो कविता को ही अपना धर्म मानते थे और आमजनों की बात उनकी भाषा में ही रखते थे। वे 'कवियों के कवि' थे। मिश्र जी की कविताओं का प्रमुख गुण कथन की सादगी है। बहुत हल्के-फुलके ढंग से वे बहुत गहरी बात कह देते हैं जिससे उनकी निश्छल अनुभव संपन्नता का आभास मिलता है। इनकी काव्य-शैली हमेशा पाठक और श्रोता को एक बातचीत की तरह सम्मिलित करती चलती है। मिश्र जी ने अपने साहित्यिक जीवन को बहुत प्रचारित और प्रसारित नहीं किया। मिश्र जी मौन निश्छलता के साथ साहित्य-रचना में संलग्न हैं। इसीलिए उनके बहुत कम काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। 'गीत-फ़रोश' के प्रकाशन के वर्षों बाद 'चकित है दुख', और 'अंधेरी कविताएँ' नामक दो काव्य-संग्रह इधर प्रकाशित हुए हैं।

20 फरवरी सन् 1985 को हिन्दी काव्य-जगत् का यह अनमोल सितारा अपनी कविताओं की थाती यहाँ छोड़ हमेशा के लिए हमसे बिछड़ गया।


( जानकारी स्त्रोत - http://bharatdiscovery.org/india/भवानी_प्रसाद_मिश्र )


आज हिन्दी भाषा के महान साहित्यकार श्री भवानी प्रसाद मिश्र जी की 32वीं पुण्यतिथि पर हमारा ब्लॉग बुलेटिन समूह और समस्त हिंदी ब्लॉग जगत उनको स्मरण करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर ... 
















हिन्दू खिचड़ी , मुस्लिम रायता !


आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

एयरमेल हुआ १०६ साल का

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

वर्तमान में ई-मेल का जमाना है क्लिक करते ही संदेश एक स्थान से दूसरे तक पहुंच जाता है किंतु पिछले दशक तक लाल नीले स्ट्रिप बार्डर वाले पत्र की खास अहमियत थी और एयरमेल सेवा ही सबसे तेज थी। हार्ड कापी को जल्द से जल्द भेजने का माध्यम आज भी एयरमेल सेवा ही बनी हुई है जिसे शुरू हुए अब एक सौ छह साल हो रहे हैं।
फ्रेंच पायलट हैनरी पिक्वइट ने पहला एयरमेल लेटरों के पैकेट को इलहाबाद से एयर लिफ्ट करके नैनी पहुंचाया था। इस पहली एयरमेल फ्लाइट के आयोजकों को भलीभांति आभास हो गया था कि वह एक इतिहास बनाने जा रहे हैं, इसी लिये इस लोक उपयोगी सेवा की शुरूआत को एक अन्य चेरिटी के काम से जोड़ते हुए शुरू किया। 18 फरवरी 1911 को हुई इस पहली फ्लाइट से भेजे गये पत्रो से हुई आय को बैंगलूर के ट्रिनिटी चर्च के एक हॉस्टल निर्माण के लिये दान कर दिया गया।
राइट्स बंधुओं के द्वारा पहली पावर फ्लाइट की कामयाबी के बाद महज सात साल बाद हुई इस ऐतिहासिक उडान में 6500 पत्र ले जाये गये थे जिनमें पं. मोतीलाल नेहरू द्वारा अपने पुत्र जवाहर लाल नेहरू को लिखे चर्चित खत के अलावा किंग जार्ज पंचम और नीदरलैंड की महारानी के नाम लिखे गये खत भी शामिल थे। 

हैनरी पर भी जारी हुआ था डाक टिकट 

 
सन 2011 मे विश्व की पहली एयरमेल सेवा के लिए इस्तेमाल होने वाले वायुयान को चलाने वाले फ्रेंच पाइलट हैनरी पिक्वट पर भी उनकी यादगार शुरूआत में साहसिक योगदान के लिए फ्रांस में एक स्पेशल पोस्टल स्टाप भी जारी किया गया था| 
 
सादर आपका
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आख़िरी कविता

कार्टूनों में देखें कैसा रहा पिछला सप्ताह

अच्छी पत्नी

जब नए कपड़े पहनती हूं तो लाज लगती है...

और तभी...

मौसम की वर्दी

ताड़केश्वर-बीरो खाल-थलीसैण पौड़ी

बादशाह पर जुर्माना...डॉ. रश्मि शील

निरपेक्षता का ‘सुमन भाष्य’

ऐसे भी कोई जाता है क्या!

जलसेना विद्रोह (मुम्बई) - १८-२३ फ़रवरी सन् १९४६

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!! 

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

युद्ध की शुरुआत - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

लीजिये ... एक लतीफ़ा पढ़िये ...

बेटा: पिताजी, युद्ध कैसे शुरू होते हैं?

पिताजी: मान लो अमेरिका और इंग्लैंड में किसी बात पर मतभेद हो गया...

माँ: लेकिन अमेरिका और इंग्लैंड में मतभेद हो ही नहीं सकता।

पिताजी: अरे भई मैं तो सिर्फ उदाहरण दे रहा था...

माँ: मगर तुम गलत उदाहरण देकर बच्चे को बहका रहे हो।

पिताजी: मैं नहीं बहका रहा हूँ...

माँ: ये बहकाना नहीं तो और क्या है?

पिताजी: चुप रहो.. एक बार कह दिया न कि नहीं बहका रहा हूँ, मतलब नहीं बहका रहा हूँ।

माँ: मैं क्यों चुप रहूँ, ये मेरे बच्चे की पढ़ाई का सवाल है। आज ये बॊल रहे हो कल को कुछ और गलत बोलोगे...

बच्चा: प्लीज... आप लोग झगड़ा मत करिये... मैं समझ गया कि युद्ध कैसे शुरू होते हैं।
 
सादर आपका 

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

ब्लॉग बुलेटिन और दादा साहेब फाल्के

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
दादा साहब फाल्के के लिए चित्र परिणाम
भारतीय फ़िल्म उद्योग के पितामह दादा साहब फाल्के का पूरा नाम 'धुन्दीराज गोविंद फाल्के' था किंतु वह दादा साहब फाल्के के नाम से प्रसिद्ध हैं। दादा साहब फाल्के का जन्म 30 अप्रैल, 1870 को नासिक के निकट 'त्र्यंबकेश्वर' में हुआ था। उनके पिता संस्कृत के प्रकाण्ड पंडित और मुम्बई के 'एलफिंस्टन कॉलेज' के अध्यापक थे। अत: इनकी शिक्षा मुम्बई में ही हुई। वहाँ उन्होंने 'हाई स्कूल' के बाद 'जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट' में कला की शिक्षा ग्रहण की। फिर बड़ौदा के कलाभवन में रहकर अपनी कला का ज्ञान बढ़ाया। वे प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता-निर्देशक एवं पटकथा लेखक थे जो भारतीय सिनेमा के पितामह की तरह माने जाते हैं। दादा साहब फाल्के की सौंवीं जयंती के अवसर पर दादा साहब फाल्के पुरस्कार की स्थापना वर्ष 1969 में की गई थी। दादा साहब फाल्के पुरस्कार भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा पुरस्कार है, जो आजीवन योगदान के लिए भारत की केंद्र सरकार की ओर से दिया जाता है।



आज दादा साहेब फाल्के जी की 73वीं पुण्यतिथि पर हमारी ब्लॉग बुलेटिन टीम सहित हिंदी ब्लॉग जगत उनके योगदान को स्मरण करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर  .... 















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

सोलह आने खरी १६००वीं ब्लॉग बुलेटिन

ठण्डा का मौसम जाते-जाते हमको बहुत बुरा तरह से परेसान कर गया है. मकर संक्रांति के बाद त इहाँ बुझाया कि ठण्डा गायबे हो गया है, बाकी अचानके छब्बीस जनवरी को जो झमाझम पानी बरसा कि हमलोग का सांस्कृतिक कार्जक्रम त गडबडएबे किया हमरा तबियत भी तभिये से बिगड़ा हुआ है. जो हमरा अवाज अमिताभ बच्चन जैसा था ऊ असित सेन का जइसा हो गया है. करीब-करीब एक महीना हो जाने के बाद भी नाक परनाला का जइसा बह रहा है अऊर खाँसी लगता है कि दम निकाल के दम लेगा. अब जेतना भोगना है, ओतना त भोगबे करेंगे, काहे आप लोग का मजा ख़राब करें.

त हम कहने ई जा रहे थे कि ठण्डा का मौसम में बहुत बढ़िया-बढ़िया परब त्यौहार आता है, जिसका सेलेब्रेसन बसंत ऋतु तक चलता है... बसंत पंचमी, सिबरात्री अऊर अंत में होली के बाद बस गर्मी दरवाजा खटखटाने लगता है. एही बीच में ऊ अंगरेजी वाला भी एगो त्यौहार आता है, जिसमें जवान लड़का-लड़की सब बौरायेल रहता है... का कहते हैं भुलेटन बाबा का परब. बाकी भुलेटन बाबा का भगत लोग ई कैसे भुला जाता है कि अभी सिबरात्रि आने वाला है.

सिब भगवान के बारे में सुरुये से ई प्रचलित है कि उनसे प्रेम से जो कोनो बरदान मानिए, अगर ऊ खुस हो गए त बिना आगा-पीछा सोचे पट से देते हैं. बाद में बिसनु भगवान उसका तोड़ निकालते फिरते हैं. ई भुलेटन बाबा के पीछे जो सोरह साल के लड़की/लड़का सब अभिबेक्ति का आजादी के नाम पर अपना सच्चा प्रेम खोजते फिरती/फिरता है, भुला जाता है कि सिब जी का सोरह गो ब्रत रखने से भी सिब जी खुस होकर मनचाहा प्रेम जीबन भर के लिये त छोड़िये सात जनम के लिये दिला देते हैं.

अब ई आजकल का बचवन सब बोलेगा कि मजाक है, अंध बिस्वास है. त बाबू जऊन भुलेटन बाबा को बिना देखले एक रोज के प्यार के ख़ातिर एतना खर्चा-पानी कर रहे हो कि दस रुपया का गुलाब सौ रुपया में खरीद रहे हो, त भगबान सिब त धतूरा जइसा चीज से भी खुस हो जाते हैं. एक बार आजमा कर देख लो.

मगर सोलह साल का उम्र होब्बे बहुत खतरनाक करता है. जब ऊ उम्र में हम नहीं समझे, जो ए घड़ी भासन दे रहे हैं, त मोबाइल जुग का बचवा कहाँ से हमरा बात समझेगा. ई सोलह साल का उमर का भटकाव भी सोलह आना सच है, जिसमें सोलह सोमबार का ब्रत नहीं समझ में आता है, बस सोलह सिंगार देखाई देता है. सोलह सिंगार के बारे में आचार्य केसब दास कमाल का बरनन किये हैं:

प्रथम सकल सुचि, मंजन अमल बास, जावक, सुदेस किस पास कौ सम्हारिबो।
अंगराग, भूषन, विविध मुखबास-राग, कज्जल ललित लोल लोचन निहारिबो।
बोलन, हँसन, मृदुचलन, चितौनि चारु, पल पल पतिब्रत प्रन प्रतिपालिबो।
'केसौदास' सो बिलास करहु कुँवरि राधे, इहि बिधि सोरहै सिंगारन सिंगारिबो।
    
बात बात में ई त सोलह का पहाड़ा हो गया. हद्द हैं हम भी कहाँ का बात कहाँ ले जाते हैं. बाकी अब जब इहाँ तक ले आए हैं त मंजिल तक पहुंचाना भी हमरे काम है मितरों.


ई सोलह के चक्कर में याद आया कि ई त हमरा ब्लॉग-बुलेटिन का सोलह सौवाँ पोस्ट हो गया. 

मगर सोलह के चक्कर में आज का पन्द्रह तारीख कों भूल गए त हमरा अंतरात्मा हमको कहियो माफ नहीं करेगा. आज का तारीख है एगो ऐसा महान सायर का पुण्य तिथि जिसके बिना गजल के दुनिया का बिस्मिल्लाह नहीं हो सकता है. अब ऊ महान सायर का नाम भी हम ही कों बताना होगा. 

चलिए उनसे पूछते हैं जो खुद कों उनका खादिम कहते हैं अऊर उन्हीं के नज्म के रूप में ऊ सायर को याद करके उनके सामने माथा नवाते हैं.

बल्लीमारान के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों के सी गलियाँ
सामने टाल के नुक्कड़ पे बटेरों के कसीदे
गुड़गुडाती हुई पान की पीकों में वो दाद, वो वाह वाह
चंद दरवाजों पे लटके हुए बोसीदा से टाट के परदे
एक बकरी के मिमियाने की आवाज़
और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अँधेरे
ऐसे दीवारों से मुँह जोड़के चलते हैं यहाँ
चूड़ीवालान के कटरे की बड़ी बी जैसे
अपने बुझती हुई आँखों से दरवाज़े टटोले
इसी बेनूर अंधेरी सी गली कासिम से
एक तरतीब चरागों की शुरू होती है
कुरआनेसुखन का सफहा खुलता है 
     मिर्ज़ा असद उल्लाह खां ग़ालिब का पता मिलता है.

अऊर अंत में आप सब लोग अपना-अपना पीठ ठोंकिये, काहे कि आज हमारा देस बिग्यान के छेत्र में एतना बड़ा छलांग लगाया है अंतरिच्छ में कि एक्के बार में बिस्व रिकॉर्ड हो गया.

एक साथ १०४ सैटेलाईट लॉन्च करके हमारा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान आसमान पर लिख दिया कि हम किसी से कम नहीं. हर भारतीय के लिये गर्व करने का मौक़ा आज मिला है. 

जोर से भारत माता की जय बोलिए, हमको दीजिए इजाजत अऊर आप लोग आनन्द लीजिए हमरे बुलेटिन से भी मनोरंजक पोस्ट सब का.

सादर

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मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

१४ फरवरी, मधुबाला और ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम|

" कोई इश्क़ का नाम ले ... और अनारकली का जिक्र न हो ... यह मुमकिन नहीं "
और आज वैसे भी इश्क़ का दिन है ...
१४ फरवरी 
  
 
मधुबाला (जन्म: 14 फरवरी, 1933, दिल्ली - निधन: 23 फरवरी, 1969, बंबई) भारतीय हिन्दी फ़िल्मों की एक अभिनेत्री थी। उनके अभिनय में एक आदर्श भारतीय नारी को देखा जा सकता है।चेहरे द्वारा भावाभियक्ति तथा नज़ाक़त उनकी प्रमुख विशेषता है। उनके अभिनय प्रतिभा,व्यक्तित्व और खूबसूरती को देख कर यही कहा जाता है कि वह भारतीय सिनेमा की अब तक की सबसे महान अभिनेत्री है। वास्तव मे हिन्दी फ़िल्मों के समीक्षक मधुबाला के अभिनय काल को स्वर्ण युग की संज्ञा से सम्मानित करते हैं।
 
प्रारम्भिक जीवन
मधुबाला का जन्म १४ फरवरी १९३३ को दिल्ली में एक पश्तून मुस्लिम परिवार मे हुआ था। मधुबाला अपने माता-पिता की ५ वीं सन्तान थी। उनके माता-पिता के कुल ११ बच्चे थे। मधुबाला का बचपन का नाम 'मुमताज़ बेग़म जहाँ देहलवी' था। ऐसा कहा जाता है कि एक भविष्यवक्ता ने उनके माता-पिता से ये कहा था कि मुमताज़ अत्यधिक ख्याति तथा सम्पत्ति अर्जित करेगी परन्तु उसका जीवन दुखःमय होगा। उनके पिता अयातुल्लाह खान ये भविष्यवाणी सुन कर दिल्ली से मुम्बई एक बेहतर जीवन की तलाश मे आ गये। मुम्बई मे उन्होने बेहतर जीवन के लिए काफ़ी संघर्ष किया।
 
बालीवुड में प्रवेश
बालीवुड में उनका प्रवेश 'बेबी मुमताज़' के नाम से हुआ। उनकी पहली फ़िल्म थी बसन्त (१९४२)। देविका रानी बसन्त मे उनके अभिनय से बहुत प्रभावित हुयीं, तथा उनका नाम मुमताज़ से बदल कर ' मधुबाला' रख दिया। उन्हे बालीवुड में अभिनय के साथ-साथ अन्य तरह के प्रशिक्षण भी दिये गये। (१२ वर्ष की आयु मे उन्हे वाहन चलाना आता था)।

आगे पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ 

आज उनकी ८४ वीं जयंती के अवसर पर ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से हम सब उनको नमन करते हैं !!

सादर आपका
शिवम् मिश्रा
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प्रेम

राष्ट्रद्रोह

खस्ता दिल...

संवाद

छुपी है मुहब्बत भी इनकार में

आल्हा छंद

वेलेंटाइन दिवस पर वह कहानी, जो प्रेम की पराकाष्ठा है

मोहब्बत की मिसाल 'पाकीजा'

प्रेम-गीत

सरकारी योजनाओं का सच...!

इन दोहन पर न जाइए

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

ब्लॉग बुलेटिन - भारत कोकिला से हिन्दी ब्लॉग कोकिला और विश्व रेडियो दिवस

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार। 

सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी, सन 1879 ई. को हैदराबाद में भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. अघोरनाथ चट्टोपाध्याय के यहाँ हुआ था। इनकी माता का नाम वरदासुन्दरी था। सरोजिनी जी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि की थी। 12 वर्ष की अवस्था में ही सरोजिनी ने मद्रास यूनिवर्सिटी से मैट्रिक उत्तीर्ण किया था। सन 1895 ई. में वह विदेश गई और लंदन के किंग्स कॉलेज व कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में सरोजिनी जी ने 3 वर्ष तक शिक्षा प्राप्त की। श्रीमती सरोजिनी नायडू 1913 में पहली बार राजनीतिक मंच पर आई। 1918 ई. में सरोजिनी नायडू की मुलाकात महात्मा गांधी से हुई। 1925 के कांग्रेस के 48वें अधिवेशन में कानपुर में वह प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष चुनी गई।1926 म वह दूसरी बार पुन : अध्यक्ष निर्वाचित हुई। गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में स्वतन्त्रता आन्दोलन की गतिविधियों को सक्रिय रूप में चलाया। 8 अगस्त, 1942 को वह गिरफ्तार कर ली गई तथा आगा खाँ महल में कारावास में अन्य प्रमुख नेताओं के साथ नज़रबन्द हुई। 1948 में वह उत्तर प्रदेश की प्रथम महिला राज्यपाल बनी। राज्यपाल के रूप में उन्होंने अपनी प्रशासनिक योग्यता का अभूतपूर्व परिचय दिया। 2 मार्च, 1949 ई. को श्रीमती सरोजिनी नायडू जी का देहावसान हो गया। उन्हें भारत कोकिला की उपाधि से विभूषित किया गया।

आज सरोजिनी नायडू जी के 138वें जन्म दिवस पर पूरा हिंदी ब्लॉगजगत और हमारी ब्लॉग बुलेटिन टीम उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करती है।   


आज हिन्दी ब्लॉगजगत की "कोकिला" आदरणीया रश्मि प्रभा जी का भी जन्मदिन है। लगभग दर्जन भर हिन्दी चिट्ठों को समृद्ध करने वाली हमारी कोकिला रश्मि जी ने अपनी उपस्थिति से हिन्दी ब्लॉग जगत को काफी मान प्रतिष्ठा दिलाई है। अपनी प्यारी - प्यारी कविताओं और अभिव्यक्ति से उन्होंने हम जैसे कई चिट्ठाकारों और पाठकों को बांधे रखा है। आप हमेशा ऐसे ही खिलखिलाते रहे और अपनी लेखनी से हमेशा हम सबको बांधे रखे। बस ईश्वर से हमारी यही कामना है। सादर।।


आज मैं अपनी, ब्लॉग बुलेटिन टीम और पूरे हिन्दी ब्लॉगजगत की तरफ से आदरणीय रश्मि प्रभा जी को जन्मदिन की हार्दिक बधाईयाँ और शुभकामनाएँ देता हूँ।   🎊 अभिनन्दन 🎉


विश्व रेडियो दिवस पर भारत के प्रधानमंत्री जी के विचार 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को विश्व रेडियो दिवस पर बधाई दी। प्रधानमंत्री ने ट्वीट कर कहा, "विश्व रेडियो दिवस की बधाई। मैं सभी रेडियो प्रेमी, रेडियो को सक्रिय और जीवंत बनाए रखने के लिए रेडियो में काम करने वाले सभी लोगों को बधाई देता हूं।"

उन्होंने कहा, "रेडियो बातचीत करने, सीखने और संवाद करने का सबसे अच्छा माध्यम है। मेरे अपने रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' ने मुझे देशभर के लोगों से जोड़ा। "उन्होंने अपने सभी रेडियो कार्यक्रमों का लिंक भी साझा किया। विश्व रेडियो दिवस हर साल 13 फरवरी को मनाया जाता है। यह मनोरंजन, सूचना और संचार के माध्यम के तौर पर रेडियो के महत्व को रेखांकित करता है।


अब चलते हैं आज की ब्लॉग बुलेटिन की ओर .... 















देखो भईया हमने तो बधाई दे दी, अब आपकी बारी है जल्दी - जल्दी अपने शुभकामनाएँ संदेश भेजिए। सादर। ... अभिनन्दन।

लेखागार