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रविवार, 31 दिसंबर 2017

भयमुक्त बचपन और भयभीत बचपन




भयमुक्त बचपन और भयभीत बचपन  ... साधारणतः हम कहेंगे कि भय से मुक्त जीवन ही ऊंचाई को पाता है,  ... पर नहीं, भय से लड़ता हुआ बचपन, शह देकर भी मात खाता बचपन  ... एक ऊंचाई के लिए अथक उड़ान भरता है, थकते हुए भी नहीं थकने के एहसास से भरा होता है  .



इस वर्ष 2016-17 की कुछ ख़ास पंक्तियाँ ..
बेंच पर बैठा रेल की पटरियों को देखने लगा। एक मालगाड़ी दायें से बायें गई। एक मालगाड़ी बायें से दायें गई। मालगाड़ी न हुई राजनैतिक पार्टियों की सदस्यता हुई ! इधर से उधर, उधर से इधर।
सन्नाटे के बाद प्लेटफॉर्म पर फिर भीड़ जुटने लगी। प्रसिद्ध वैवाहिक लान में जैसे बिदाई के बाद सुबह सन्नाटा और दिन शुरू होते ही चहल-पहल शुरू हो जाती है वैसे ही प्लेटफॉर्म पर एक ट्रेन जाने के बाद सन्नाटा और दूसरी ट्रेन आने से पहले गहमा-गहमी बढ़ जाती है।
एक स्टेशन पर रुकती है तो देर तक रुकी रहती है। लगता है खड़ी हो कर फोन लगाती होगी अपनी सहेलियों को-हाय! फिफ्टी तुम कैसी हो? मैं जफराबाद आ गई, तुम कहाँ फंसी हो ? बहुत कोहरा है न! सम्भल कर चलना। इन यात्रियों की चीख-पुकार से तनिक न घबड़ाना। बोलना-पहुँचा रही हूँ न, यही क्या कम है! फिफ्टी डाउन बोल रही होगी-मैं तो वहाँ रात 12 बजे तक पहुंचुंगी। अभी सुलतानपुर में सो रही हूँ। मेरी फिकर न करो, मन करे तो एक नींद ले लो तुम भी। ये यात्री तो ऐसे होते ही हैं। अभी लड़-भिड़ जाओगी तो सब तुम्हें ही कोसेंगे।'
अपनी तरक्की और ट्रेन के बीच गहरा साम्य है। कुछ भोले भाले लोग जो अपने देश की व्यवस्था से परिचित नहीं हैं, पूछते हैं-नौकरी करते-करते 28 साल हो गए आपकी तरक्की क्यों नहीं हुई ? कभी-कभी सोचता हूँ रेलवे स्टेशन वाला टेप सुना दूं-यात्रियों की असुविधा के लिए हमें खेद है! मतलब मेरी तरक्की न होने से जो आपको असुविधा हुई इसके लिए खेद है।
‪#‎ट्रेन‬ में यात्रियों से पैसे मांगने वाला हिजड़ों का दल रोज के यात्रियों को देख कर बुरा सा मुँह बनाते हुए अपने सहेलाओं से कहता है-चलो! निकलो यहाँ से, यहाँ सब स्टाफ़ के हैं!!!
मजदूर का मजा डबल मजदूरी के प्रायश्चित से ही कटता है लेकिन मालिक का मजा गंगा में डुबकी लगाने से कट जाता है। मालिक डबल मजा उड़ाता है। पहले पाप करने का मजा लेता है फिर पाप कटाने के नाम पर गंगा स्नान का मजा लेता है। मजदूर जैसे ही मजा लेता है, रोटी के लाले पड़ जाते हैं। उसके लिये मजा लेना ऐसा पाप है जो गंगा स्नान से नहीं डबल मजदूरी से ही कटता है। मनुष्यों के मामले में आलसी ग्रासोफर और मेहनती चींटी के फार्मूले में कई अपवाद हैं।
लोहे के घर में कई परिवार अपने-अपने में मगन साथ-साथ चलते हैं। जब तक रहते हैं बड़े खुश दिखते हैं। पत्नी के मुख से पानी उच्चारित हुआ नहीं कि पति पूरी बोतल निकाल कर समर्पित खड़ा हो जाता है। थोड़ी देर बाद प्रेम से पूछता भी है-और? पत्नी भी बड़ी अदा से बोतल परे हटाती है-बस्स.. रहने दो! गरम हो गया है।
पापा को तंग कर रहा है बेटा-मैंगो जूस लेंगे। मम्मी बैग से नोट निकालती है-दिला दो न! छोटे स्टेशन पर दौड़ पड़ते है पापा। ट्रेन चल दी, पापा आये नहीं! गहरी बेचैनी के बाद हर्ष से खिल उठता है बेटे का चेहरा-बड़ी बोतल लाये हैं पापा! पीछे से आ रहे हैं।
टिफिन खोल सलीके से पूड़ी निकाल पति को नाश्ता कराती पत्नी। आहा! कितने प्रेम से रहते हैं ये लोग जब ‪#‎ट्रेन‬ में चलते हैं! क्या घर में भी ऐसे ही रहते हैं ? आज्ञाकारी और विशाल ह्रदय के स्वामी! सभी के पास एक दूसरे के लिये समय ही समय। वाह! क्या बात है।
काली चिड़िया आज भी बैठी है बिजली के तार पर! बचपन से देख रहा हूँ भैंस की पीठ पर बैठते बगुले। तीन बच्चे आज भी दौड़ते दिखे। उनके हाथों में साइकल के टायर नहीं, फटी धोती का लम्बा टुकड़ा था। जुग बदला, समय बदला, बच्चे से बूढ़े होने को आये मगर लोहे के घर की खिड़की से दिखने वाला भारत का सीन न बदला।
सगरो धान बोआई गयल हौ। कत्तो-कत्तो अभहिन रोपात हौ। पानी में पूरा हल के, धोती कमर में लपेट के, निहुर-निहुर धान रोपत हइन मेहरारु। गीत गावत होइयें सावन क पर हमें सुनाई नाहीं देत हौ। टरेन से दिखाई देला, सुनाई नाहीं देत। जौन दिखाई देला ऊ ठीक से बुझाइयो नाहीं देत। जउन देखे में अच्छा लगsला ऊ करना मुश्किल हौ। धानी चादर ओढ़ मगन हइन धरती माई अउर उनके देख-देख मगन हौ हमरो जीया।
बहुत पागल हउअन ई देश में। चढ़ल हउअन यहू ‪#‎ट्रेन‬ में। बहसत हउअन आपस में। एक मिला दोजख अउर जन्नत समझा रहल हौ। अउर दू मिला पाप-पुन्य, सरग-नरक समझा रहल हउअन। सावन क महीना हौ, पानी बरसत हौ, सामने स्वर्ग जइसन सुंदर सीन हौ लेकिन इन्हहने के आपस में दोजख-जन्नत बहस करे में ढेर मजा आवत हौ! ई अइसन जीव हउअन कि इनहने के सच्चो स्वर्ग में छोड़ दिहल जाये त वोहू के नरक बना देइहें। फेर न मनबा! झूठ कहत हई ? कश्मीर के का कइलन? धरती क स्वर्ग हौ? नरक बना देहलन कि नाहीं?
ई भगवान क कृपा हौ कि पागल हउअन त प्रेमियो ढेर हउअन देश में। यही से गाड़ी चल रहल हौ पटरी पर।

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मेरे गीत !: मैं गंगा को ला तो दूंगा पर क्या धार संभाल ...


(570) साल के मध्‍य में लिखी गई कविता जो साल के अंत में फिर से याद आ रही है :
जो हमें होना था : राजेश उत्‍साही
**********************************
हम पेड़ नहीं हुए 
हम पहाड़ नहीं हुए
नदी नहीं हुए हम
नहीं हुए समुन्‍दर भी
हम आग नहीं हुए
हम पानी नहीं हुए
हवा नहीं हुए हम
नहीं हुए मौसम भी
हम चाँद नहीं हुए
हम सूरज नहीं हुए
तारे नहीं हुए हम
नहीं हुए पृथ्‍वी भी
पेड़,पहाड़,नदी,समुन्‍दर
आग,पानी,हवा,मौसम
चाँद,सूरज,तारे,पृथ्‍वी
कुछ भी नहीं हुए हम
होना तो हमें मनुष्‍य था
वह भी हम नहीं हुए।
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ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आप सब को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं |

शनिवार, 30 दिसंबर 2017

विक्रम साराभाई और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को सादर नमस्कार।
विक्रम साराभाई
विक्रम साराभाई (अंग्रेज़ी: Vikram Sarabhai, जन्म- 12 अगस्त, 1919, अहमदाबाद; मृत्यु- 30 दिसम्बर, 1971, तिरुवनंतपुरम) को भारत के 'अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक' माना जाता है। इनका पूरा नाम 'डॉ. विक्रम अंबालाल साराभाई' था। इन्होंने भारत को अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में नई ऊँचाईयों पर पहुँचाया और अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर देश की उपस्थिति दर्ज करा दी। विक्रम साराभाई ने अन्य क्षेत्रों में भी समान रूप से पुरोगामी योगदान दिया। वे अंत तक वस्त्र, औषधीय, परमाणु ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई अन्य क्षेत्रों में लगातार काम करते रहे थे। डॉ. साराभाई एक रचनात्मक वैज्ञानिक, एक सफल और भविष्यदृष्टा उद्योगपति, सर्वोच्च स्तर के प्रर्वतक, एक महान् संस्थान निर्माता, एक भिन्न प्रकार के शिक्षाविद, कला के पारखी, सामाजिक परिवर्तन के उद्यमी, एक अग्रणी प्रबंधन शिक्षक तथा और बहुत कुछ थे।



आज विक्रम साराभाई जी की 46वीं पुण्यतिथि पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

ख़ुशी की कविता या कुछ और?

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

"मन था उदास... बड़ी हसरतों से निगाहें दरवाजे पर थीं... सहसा कुछ खटका सा हुआ।
उल्लसित मन से मैं दरवाजे की ओर बढ़ी कि लेकिन यह क्या।
वह मन का भ्रम था; दिल बैठने सा लगा, बुझे मन से लौट ही रही थी... कि सहसा एक आवाज आई... 

"भाभी"!

मन की वीणा झंकृत हो उठी।
मन मयूर नाच उठा।
यह कोई स्वप्न नहीं तुम साक्षात पधार चुकी थीं।

धन्य हो भगवन धन्य अब मन नहीं था उदास, माहौल हो गया था ख़ुशगवार, मन मृदंग के बज रहे थे तार, वह आ चुकी थी। सचमुच वो आ चुकी थी ... "

यह कविता नहीं... कामवाली बाई के चार दिन की छुट्टी के बाद काम पर आने की ख़ुशी में एक गृहिणी के हृदय से निकले उदगार हैं। चाहें तो फिर से पढ़ लें।

सादर आपका
शिवम् मिश्रा
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उदासी का रंग


एक था सरवन


आजकल (ग़ज़ल)



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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

एक पर एक ग्यारह - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
आजकल समाज में कुछ ऐसा चलन देखने को मिल रहा है कि जिसे देखो वो खुद को ही एकमात्र बुद्धिमान समझ रहा है. सामने वाले को उसने जन्मजात बेवकूफ समझ रखा है. राजनीति हो, व्यवसाय हो, नौकरी हो या फिर कोई अन्य क्षेत्र सभी में सब अपनी-अपनी ढपली पीटने में लगे हैं. अपनी ही बात को सत्य सिद्ध करना चाह रहे हैं. दूसरे की मानना ही नहीं चाहते. यही कारण है कि सब एक पर एक ग्यारह बने हुए हैं और न केवल अपना वरन समाज का नुकसान कर रहे हैं.
ऐसी सोच वालों के साथ कुछ ऐसा ही होता है जैसा कि उस शहरी ठग के साथ हुआ. क्या हुआ, ये जानने के लिए पढ़ जाइए, पूरे आनंद के साथ. पहले ये कथा फिर आज की बुलेटिन.


++
एक गाँव में रात के समय एक शहरी ठग पहुँचा. उसने सोचा कि रात के अँधेरे में गाँव के किसी बूढ़े व्यक्ति को ठगा जाये. ऐसा सोच वह एक छोटी सी दुकान पर पहुँचा, दुकान पर एक बहुत ही बुजुर्ग व्यक्ति बैठा था.
उस शहरी युवक ने एक नोट देकर उस बूढ़े व्यक्ति से कहा - बाबा, छुट्टे दे दो.
बूढ़े ने देखा कि नोट तेरह रुपये का है. उसने कहा - बेटा ये नोट तो नकली है. अभी तक तेरह रुपये का नोट आया ही नहीं है.  
युवक ने कहा - बाबा, नोट तो असली है. सरकार ने ये नया नोट चलाया है. अभी शहर में ही आ पाया है, गाँव तक आने में कुछ समय लगेगा.  
बूढ़े व्यक्ति ने सहमति में सिर हिलाया और अंदर से दो नोट लाकर उस शहरी ठग को दिये. युवक ने नोट देखे और कहा - बाबा, ये क्या? एक नोट छह रुपये का और एक नोट सात रुपये का, ये तो नकली हैं.  
बूढ़े ने कहा - नहीं बेटा, ये दोनों नोट असली हैं, अभी सरकार ने नये-नये चलाये हैं. गाँव में आये हैं, शहर तक आने में समय लगेगा.

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बुधवार, 27 दिसंबर 2017

मिर्जा ग़ालिब और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को मेरा सादर नमस्कार।
आज भारत के महान शायर मिर्जा ग़ालिब के 220वें जन्मदिवस पर गूगल ने भी उनका डूडल बनाकर उन्हें याद किया।

Mirza-Ghalib.jpg
ग़ालिब अथवा मिर्ज़ा असदउल्ला बेग ख़ान (अंग्रेज़ी:Ghalib अथवा Mirza Asadullah Baig Khan, उर्दू: غالب अथवा مرزا اسدللا بےغ خان) (जन्म- 27 दिसम्बर, 1797 ई. आगरा; निधन- 15 फ़रवरी, 1869 ई. दिल्ली) जिन्हें सारी दुनिया 'मिर्ज़ा ग़ालिब' के नाम से जानती है। इनको उर्दू-फ़ारसी का सर्वकालिक महान शायर माना जाता है और फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी जबान में लोकप्रिय करवाने का श्रेय भी इनको दिया जाता है। ग़ालिब के लिखे पत्र, जो उस समय प्रकाशित नहीं हुए थे, को भी उर्दू लेखन का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है। ग़ालिब को भारत और पाकिस्तान में एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में जाना जाता है। उन्हें दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला का ख़िताब मिला। ग़ालिब आजीवन क़र्ज़ में डूबे रहे, लेकिन इन्होंने अपनी शानो-शौक़त में कभी कमी नहीं आने दी। इनके सात बच्चों में से एक भी जीवित नहीं रहा। जिस पेंशन के सहारे इन्हें व इनके घर को एक सहारा प्राप्त था, वह भी बन्द कर दी गई थी। ग़ालिब नवाबी ख़ानदान से ताल्लुक रखते थे और मुग़ल दरबार में उंचे ओहदे पर थे। ग़ालिब (असद) नाम से लिखने वाले मिर्ज़ा मुग़ल काल के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि भी रहे थे। ग़ालिब शिया मुसलमान थे, पर मज़हब की भावनाओं में बहुत उदार एवं मित्रपराण स्वतंत्र चेता थे। जो आदमी एक बार इनसे मिलता था, उसे सदा इनसे मिलने की इच्छा बनी रहती थी। उन्होंने अपने बारे में स्वयं लिखा था कि दुनिया में यूं तो बहुत से अच्छे कवि-शायर हैं, लेकिन उनकी शैली सबसे निराली है-

“हैं और भी दुनिया में सुख़न्वर बहुत अच्छे 
कहते हैं कि ग़ालिब का है अन्दाज़-ए बयां और”



आज मिर्जा ग़ालिब जी के 220वें जन्मदिवस पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

स्वतंत्रता सेनानी - ऊधम सिंह और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को सादर नमस्कार।
Udham-Singh.jpg
ऊधम सिंह (अंग्रेज़ी: Udham Singh, जन्म: 26 दिसंबर, 1899, सुनाम गाँव, पंजाब; शहादत: 31 जुलाई, 1940, पेंटनविले जेल, ब्रिटेन) भारत की आज़ादी की लड़ाई में अहम योगदान करने वाले पंजाब के महान् क्रान्तिकारी थे। अमर शहीद ऊधम सिंह ने 13 अप्रैल, 1919 ई. को पंजाब में हुए भीषण जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के उत्तरदायी माइकल ओ'डायर की लंदन में गोली मारकर हत्या करके निर्दोष भारतीय लोगों की मौत का बदला लिया था।

ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 में पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम गाँव में हुआ। ऊधमसिंह की माता और पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। उनके जन्म के दो साल बाद 1901 में उनकी माँ का निधन हो गया और 1907 में उनके पिता भी चल बसे। ऊधमसिंह और उनके बड़े भाई मुक्तासिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। 1917 में उनके भाई का भी निधन हो गया। इस प्रकार दुनिया के ज़ुल्मों सितम सहने के लिए ऊधमसिंह बिल्कुल अकेले रह गए। इतिहासकार वीरेंद्र शरण के अनुसार ऊधमसिंह इन सब घटनाओं से बहुत दु:खी तो थे, लेकिन उनकी हिम्मत और संघर्ष करने की ताक़त बहुत बढ़ गई। उन्होंने शिक्षा ज़ारी रखने के साथ ही आज़ादी की लड़ाई में कूदने का भी मन बना लिया। उन्होंने चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन को ऐसे घाव दिये जिन्हें ब्रिटिश शासक बहुत दिनों तक नहीं भूल पाए। इतिहासकार डॉ. सर्वदानंदन के अनुसार ऊधम सिंह 'सर्व धर्म सम भाव' के प्रतीक थे और इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद आज़ाद सिंह रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मो का प्रतीक है।



आज महान स्वतंत्रता सेनानी ऊधम सिंह जी के 118वें जन्म दिवस पर समस्त भारत वासी उनके त्याग और बलिदान को स्मरण करते हुए उन्हें शत शत नमन करते हैं।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर .... अभिनन्दन।। 

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

ब्लॉग बुलेटिन - क्रिसमस डे और प्रकाश उत्सव पर्व की ढेर सारी बधाई और शुभकामनाएँ

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।

क्रिसमस डे और प्रकाश उत्सव के लिए इमेज परिणाम
गुरु गोविन्द सिंह जयंती गुरु गोविन्द सिंह की याद में मनायी जाती है। गुरु गोविंद सिंह सिक्खों के दसवें व अंतिम गुरु माने जाते थे, और सिक्खों के सैनिक संगति, ख़ालसा के सृजन के लिए प्रसिद्ध थे। गुरु गोविन्द सिंह जयंती नानकशाही कैलेंडर के अनुसार मनाई जाती है।


क्रिसमस डे और प्रकाश उत्सव के लिए इमेज परिणाम
क्रिसमस अथवा बड़ा दिन ईसा मसीह के जन्म की खुशी में मनाया जाने वाला पर्व है। यह प्रत्येक वर्ष 25 दिसम्बर को मनाया जाता है और इस दिन लगभग संपूर्ण विश्व में अवकाश रहता है। क्रिसमस से 12 दिन के उत्सव 'क्रिसमसटाइड' की भी शुरुआत होती है। क्रिसमस शब्‍द का जन्‍म क्राईस्‍टेस माइसे अथवा क्राइस्‍टस् मास शब्‍द से हुआ है। ऐसा अनुमान है कि पहला क्रिसमस रोम में 336 ई. में मनाया गया था। यह प्रभु के पुत्र जीसस क्राइस्‍ट के जन्‍म दिन को याद करने के लिए पूरे विश्‍व में 25 दिसंबर को मनाया जाता है। यह ईसाइयों के सबसे महत्त्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। इस दिन भारत व अधिकांश अन्‍य देशों में सार्वजनिक अवकाश रहता है।



आप सभी को क्रिसमस डे और प्रकाश उत्सव पर्व की ढेर सारी बधाई और शुभकामनाएँ। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

रविवार, 24 दिसंबर 2017

आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज का ज्ञान :-

हर काम कल पर टालने वालो कुछ काम परसों पर भी टाल दिया करो।
नहीं तो कल कितना काम करोगे?

सादर आपका

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बाजीगर बन गई व्यवस्था

चुनाव या अखाडा
















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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

वेटर का बदला - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

एक बार बैंक मैनेजर अपने बीवी बच्चों के साथ होटल में गये।
बैंक मैनेजर: खाने में क्या क्या है?
वेटर: जी मलाई कोफ्ता, मटर पनीर, कढ़ाई पनीर, दम आलू, मिक्स वैज, आलू गोभी।
बैंक मैनेजर: मटर पनीर और रोटी दे दो। दाल कौन कौन सी है?
वेटर: दाल फ्राइ, दाल तड़का, मूंग की दाल और मिक्स पंचरत्न दाल।
बैंक मैनेजर: 1 फुल दाल फ्राई दे दो।
वेटर: सर पापड़ ड्रॉइ दूँ या फ्राई?
बैंक मैनेजर: फ्राई।
वेटर (बड़ी शालीनता से): सर मिनरल वाटर ला दूँ।
बैंक मैनेजर: हाँ ला दे।
वेटर: सर आपका आर्डर हुआ है - मटर पनीर, रोटी, दाल फ्राई, फ्राई पापड़ और 1 मिनरल वाटर।
बैंक मैनजर: हाँ भाई, फटाफट लगा दे।
वेटर: लेकिन सब कुछ खत्म हो चुका है अभी कुछ नहीं है।
बैंक मैनजर (विनम्रता सेे): तो महाराज आप इतनी देर से बक-बक क्यों कर रहे थे? पहले ही बता देते।
वेटर: बैंक मैनेजर साहब, मैं रोज एटीएम जाता हूँ। वो एटीएम मुझसे पिन कोड, Saving/Current Account, Amount, Receipt सब कुछ पूछता है और लास्ट में बोलता है "No Cash"। अब समझ में आया मुझे उस टाइम कैसा लगता है?

बैंक मैनेजर बेहोश!

सादर आपका

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दिल तो अभी बच्चा है जी ...


माँ ..... पिता ......


२९०. ज़िम्मेदारी


दोनों ही गूंगे !!!!


कानून के साथ एक साक्षात्कार


ट्रेन नोट्स - अयांश बाबु की शैतानियों के चिट्ठे


स्कूल गया बच्चा : आरसी चौहान


पूर्व प्रधानमंत्री के 'सम्मान' की लड़ाई


पर्ल हार्बर, हवाई


बेचारा गुल्लक !


ख़्वाहिशें सुलगती हैं इश्तहार में लिपटे देख कर हसीं मंज़र


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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

ब्लॉग बुलेटिन - श्रीनिवास अयंगर रामानुजन और राष्ट्रीय गणित दिवस

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को मेरा सादर नमस्कार।
श्रीनिवास रामानुजन
श्रीनिवास अयंगर रामानुजन् (अंग्रेज़ी: Srinivasa Aiyangar Ramanujan, तमिल: ஸ்ரீனிவாஸ ராமானுஜன் ஐயங்கார், जन्म: 22 दिसम्बर, 1887; मृत्यु: 26 अप्रैल, 1920) महान् भारतीय गणितज्ञ थे। इन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है। इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए। इन्होंने अपने प्रतिभा और लगन से न केवल गणित के क्षेत्र में अद्भुत अविष्कार किए वरन् भारत को अतुलनीय गौरव भी प्रदान किया। गणित के क्षेत्र में अपने समय के अनेक दिग्गजों को पीछे छोड़ने वाले श्रीनिवास रामानुजन ने केवल 32 साल के जीवनकाल में पूरी दुनिया को गणित के अनेक सूत्र और सिद्धांत दिए। गणित के क्षेत्र में रामानुजन किसी भी प्रकार से गौस, यूलर और आर्किमिडीज से कम न थे। किसी भी तरह की औपचारिक शिक्षा न लेने के बावजूद रामानुजन ने उच्च गणित के क्षेत्र में ऐसी विलक्षण खोजें कीं कि इस क्षेत्र में उनका नाम अमर हो गया। इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए। इन्होंने खुद से गणित सीखा और अपने जीवनभर में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके हैं। इन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारम्परिक परिणाम निकाले जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहा है, यद्यपि इनकी कुछ खोजों को गणित मुख्यधारा में अब तक नहीं अपनाया गया है। उनके सूत्र कई वैज्ञानिक खोजों में मददगार बने। हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल-विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है। इनके कार्य से प्रभावित गणित के क्षेत्रों में हो रहे काम के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना की गई है।


राष्ट्रीय गणित दिवस (अंग्रेज़ी: National Mathematics Day) प्रत्येक वर्ष 22 दिसम्बर को महान् गणितज्ञ श्रीनिवास अयंगर रामानुजन की स्मृति में मनाया जाता है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने चेन्नई में महान् गणितज्ञ श्रीनिवास अयंगर रामानुजन की 125वीं वर्षगांठ के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में श्रीनिवास रामानुजम को श्रद्धांजलि देते हुए वर्ष 2012 को राष्ट्रीय गणित वर्ष घोषित किया। साथ ही गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के जन्मदिन 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस भी घोषित किया गया। महान् गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजम की 125वीं वर्षगांठ के मौके पर 26 दिसंबर 2011 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश में योग्य गणितज्ञों की संख्या कम होने पर चिंता जताई थी।



आज श्रीनिवास अयंगर रामानुजन जी के 130वें जन्मदिवस पर हम सब उनके अतुलनीय योगदान को याद करते हुए शत शत नमन करते हैं।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

लेखागार