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बुधवार, 22 नवंबर 2017

2017 का अवलोकन 8





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वर्षा...यहां सुनाई देते हैं स्त्रियों की ... - blogger


यहां गूंजते हैं स्त्रियों की मुक्ति के स्वर, बे-परदा, बे-शरम,जो बनाती है अपनी राह, कंकड़-पत्थर जोड़ जोड़,जो टूटती है तो फिर खुद को समेटती है, जो दिन में भी सपने देखती हैं और रातों को भी बेधड़क सड़कों पर निकल घूमना चाहती हैं, अपना अधिकार मांगती हैं। जो पुकारती है, सब लड़कियों को, कि दोस्तों जियो अपनी तरह, जियो ज़िंदगी की तरह  ... 

कहीं कोई टिप्पणी नहीं, ज़रूरत भी नहीं - जिनकी कलम निर्बाध चलने का संकल्प उठाती है, वह रुककर किसी का इंतज़ार नहीं करती।  
वजूद खुद तराशना होता है, निशान अपने पैरों के हों तो रास्ते बताये जा सकते हैं  ... 


शहर शहर


हर वो शहर जिससे होकर हम कभी गुजरते हैं, जहां कुछ पल ठहरते हैं, जहां की सड़कें-बाज़ार-इमारतें देखते हैं, उससे एक नाता सा बना लेते हैं। हमारी स्मृतियों के जंगल में उस शहर के लिए एक कोना तैयार हो जाता है। कई बार तो ट्रेन के सफर में मंजिल के पड़ावों में जिन स्टेशनों पर ट्रेन ठहरती है, वहां पी गई चाय, वहां की ख़ास चीज का ज़ायका भी उस जगह के ख़ास अनुभव सहेज कर रख देता है।

संडीला की रेवड़ी, आगरे का पेठा, मेरठ की गुड़ पट्टी, लखनऊ के कबाब, वाराणसी की जलेबियां, देहरादून के मोमोज, मसूरी का मैगी प्वाइंट, जयपुर के मिर्चवाले पकौड़े, मुंबई का बटाटा वड़ा और ऐसे तमाम छोटे मगर कीमती जायके अपने शहर का स्वाद बनाते हैं और उनसे हमारा रिश्ता मजबूत करते हैं। लखनऊ का भूलभुलैया किसने भी बनवाया, लेकिन लखनऊ में रहनेवाले हर किसी का उस पर हक़ है कि वो यहां का बाशिंदा है। वो जब अपने घर से कोसों दूर होता है तो अपने शहर को याद करते हुए वहां की गलियों, चौराहों, बाजार में पहुंच जाता है, वहां की ऐतिहासिक इमारतों से अपना रिश्ता जोड़ लेता है। किसी की स्मृतियां अपने शहर के घंटाघर, वहां की बारादरी के ईर्दगिर्द घूमती हैं। जिन सड़कों पर कितनी सुबह-शामों को आते-जाते,उतरते-डूबते, यूं ही गुजरते देखा, वो उनकी स्मृतियों की पूंजी में जमा हो जाती हैं। अलग-अलग शहरों के बाजारों की चहलपहल की गूंज हमारे कानों में कहीं रम जाती है। राजस्थानी बंधेजी साड़ियां, जयपुर की चूड़ियां, कन्नौज का इत्र, फर्रुख़ाबाद की दालमोठ, इनके साथ इन शहरों की तस्वीर जेहन में उतराती चली जाती है। उस शहर से हमारा ख़ास रिश्ता जोड़ देती है। 

नदियों के किनारे बसे शहर के लोग तो अपनी नदियों से ख़ास लगाव रखते हैं। उनके मन में उनकी नदी अविरल-निर्मल अपने पूरे विस्तार के साथ बहती है। कोई गंगा की धार से अपने मन को सींचता है तो कोई अपने घर के आसपास बने पोखर-कुएं से ही नमी हासिल करता है। नदी के जल में ढलता कोई सूरज सालों के लिए हमारे मन में भी ढल जाता है। गोमती के किनारे उगे चटक जंगली फूल की अनुभूति भी नदी के साथ हमारे यादों से जुड़ जाती है। वो पोखर- कुएं, उनके ईर्दगिर्द घटित घटनाएं कभी हमारा पीछा नहीं छोड़ते। अपनी नदी, अपने पोखर, अपनी झील, अपने गदन, अपनी नयार से दूर बैठे व्यक्ति को कभी अकेले में याद आती है उसकी तरल ध्वनि। मई-जून की किसी बौरायी सी दोपहर में चिहुंकती नदी की तपन से गालों पर गर्म हवा के थपेड़े पड़े होंगे। हम सब की यादों में बसी हैं ऐसी कई दोपहरें। सूखी पत्तियों के झुंड का चिड़ियों सा उड़ना हम सब के मन में कहीं बसा है। हमारे स्मृतियों के जंगल की बसावट को जो और करीने से काढ़ता है। 

किसी शहर से गुजरते हुए उस शहर की एक ख़ास गंध हमारे भीतर रह जाती है। वहां की इमारतें हमारे ख्यालों में घर बना जाती हैं, उन सब से हम अपना एक ख़ास नाता जोड़ लेते हैं। अपने शहर से दूर रहनेवाले लोग जब वहां के किस्से सुनाते हैं तो जुबान नहीं रुकती, मीठी सी यादों का कारवां सा निकल पड़ता है, वो बांवरे से अपने शहर को याद करते हैं। जहां कभी वो रहे, रुके, जिये। लोगों की बातों में उनका शहर बहुत जीवंत होता है, वहां के कंकड़-पत्थर के लिए भी उनके दिल में प्यार उमड़ता है।

हमारी स्मृतियों के इन शहरों से ठीक उलट नये मिज़ाज के शहर भी तेजी से बन और बस रहे हैं, जिनसे चाह के भी कोई रिश्ता नहीं जुड़ पाता। उनकी चौड़ी सड़कों पर भागती बड़ी-लंबी गाड़ियों में हम हर वक़्त ठिठकते-ठिठकते चलते हैं। जैसे हर वक़्त किन्हीं हादसों से बच रहे हों। ऐसी शहरों की चिकनी सड़कों पर कितने साल गुजार के भी दिल का कोई तार यूं नहीं जुड़ता जैसे अपने मोहल्ले की टूटीफूटी सड़कों से जुड़ा करता था। इन तेज मिज़ाज हाईटेक शहरों में लकदक इमारते हैं, शीशे के महल जैसे मॉल हैं, बड़े-बड़े वाटर पार्क हैं लेकिन ये उस बाजार का हिस्सा हैं जहां हम सबसे बड़े प्रोडक्ट होते हैं। हम वो प्रोडक्ट होते हैं जिनके लिए कई सारे प्रोडक्ट बनाये जा रहे हैं। बढ़िया जींस, बढ़िया कपड़े की शर्ट, खुश्बूदार साबुन,डियो,परफ्यूम। हमारे खानेपीने के लिए एक से बढ़कर एक जायके, मैक्डोनल्ड का बर्गर, पिज्जाहट, शानदार कॉफी, हर शहर की मशहूर डिशेज-कुजीन। लेकिन एक ख़ास चीज की कमी होती है, एक ख़ास जायका कहीं छूटता है। कहते हैं हर शहर के पानी का स्वाद भी अलग होता है, उससे बनी चीजों का स्वाद भी अलग होता है।

हम तरक्की का, विकास का हम अपने जीवन में स्वागत करते हैं। पर कुछ तो ऐसा है जिसे हम खो रहे हैं, जिसके चलते हम हर वक़्त बेचैन रहते हैं, हम दिन रात खटते हैं, खूब काम किया करते हैं, मगर किसी काम के न रहे। ऐसे शहर को अपने जीवन के कई साल देकर भी अजनबी से ही रहे। ऐसा मोहपाश जिसमें रहा भी नहीं जाता, छोडा भी नहीं जाता। ऐसे शहर जो सिर्फ अजनबी बनाते हैं, अजनबियत को कायम रखते हैं और जिनसे कोई रिश्ता नहीं बुना जा पाता। ऐसे शहर में हर साल करोड़ों लोग आते हैं अजनबी की तरह और अजनबी ही रह जाते हैं।

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

2017 का अवलोकन 7




क्षितिज को हम भ्रम मानते हैं, क्योंकि हम बढ़ते जाते हैं और क्षितिज आगे ही होता है ! आसान था मान लेना कि क्षितिज यानी धरती आकाश का मिलना भ्रम है।  
उसी भ्रम के साये में वह खीर बनता है, जिसे सुजाता ने बुद्ध को खिलाया था, शबरी जूठे बेर लिए प्रतीक्षित होती है, राम और केवट एक होते हैं  ... !
उसी क्षितिज पर मैंने पाया है अनीता निहलानी को, ज़िन्दगी का पारदर्शी दृष्टिकोण लिए 



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बेहोशी में जो भी बीतता है, वह बेहोशी को मजबूत करता है. होश में जो भी बीतता है वह होश को मजबूत करता है. वे जागकर देखें तो हरेक कृत्य पूजा हो जाता है. उनका हर क्षण सार्थक हो जाता है. आज बहुत दिनों बाद एक सखी से बात हुई, वही जो अपनी परेशानी तो बताती है पर कोई भी सुझाव देने पर उसे न मानने में अपनी मजबूरी भी झट बता देती है, तब उसे लगता है जैसे वह अपनी तकलीफ में भी खुश ही है. नन्हे से बात नहीं हो पायी, शायद वह काफी व्यस्त है. सुबह पिकेटिंग थी, ड्राइवर ड्यूटी पर नहीं आये, वह स्कूल भी नहीं जा पायी. जून इस समय नन्हे की मित्र के घर पर होंगे दिल्ली में.
किसी पक्षी की आवाज आ रही है, जो रात्रि को बोलता है अक्सर. आज सोने में कुछ देर हो गयी है, रात्रि के पौने दस बजे हैं, जून कल आ जायेंगे, फिर सब कुछ समय पर होगा. वैसे तो कल महिला क्लब कमेटी की मीटिंग उनके घर में है, देर हो सकती है. सुबह उठी तो कुछ देर यूँही आँख बंद करके बैठ गयी, एक उपस्थिति का अनुभव इतने करीब होता है कि अब ध्यान करना भी नहीं होता. ओशो को सुना, मन को साक्षी होकर देखना आ जाये तो सारा दुःख समाप्त हो जाता है. मन नहीं रहता तभी साक्षी का अनुभव होता है. आज शाम को भी भीतर कुछ घटा, जब एक सखी ने ‘नारायण हरि ॐ’ भजन गाया, वह बहुत अच्छा गाती है. मीटिंग ठीक से हो गयी, इस महीने अभी तक मृणाल ज्योति नहीं जा पाई है, जब भी जाने में देर हो जाये तो जैसे कोई टोकता है भीतर से.

आत्मा की ज्योति पर पहरे लगे हैं
ख्वाहिशों की सेना के
जो अधूरी हों तो धुआं देती हैं
पूरी हों तो छिपा देती हैं  

इतवार को उनके लॉन में आसपास के सर्वेन्ट्स के लिए ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ का ‘नव चेतना शिविर’ होने वाला है. एओल की टीचर से बात की तो वह काफी उत्साहित जान पड़ीं. यकीनन वे सभी को सद्गुरू का ज्ञान बता पाएंगी. सद्गुरु कहते हैं, जिससे भौतिक तौर पर कल्याण हो और मोक्ष भी मिले वही धर्म है. भक्ति, युक्ति, मुक्ति और प्राप्ति धर्म के अंग हैं. साधना ही वह चार्जर है जिससे आत्मा की बैटरी परमात्मा से जुड़ी रखनी है, विश्वास रूपी सिम कार्ड लगाना है और रेंज के भीतर रहना कृपा का पात्र बनना है. तब परमात्मा से कनेक्शन बना रहेगा. सरलता, सहजता ही सिद्धावस्था है. संत को कोई पराया नहीं लगता, वह स्वयं पूर्ण है और दूसरों को आशीर्वाद देता है. सुख-दुःख में सम रहना आ जाये और सबके साथ समान भाव से व्यवहार हो तो जानना चाहिए, भीतर प्रेम जगा है. सबको अपना देखने की कला ही ‘जीवन जीने की कला’ है. ध्यान, सेवा और सत्संग तब जीने का अंग बन जाते हैं.
काशी में इसी महीने गुरूजी आ रहे हैं, यहाँ भी आने की बात तो है. परमात्मा ही सदगुरुओं के रूप में धरती पर आते हैं. सुबह रामदेव जी के प्रेरणात्मक वचन सुने तो मन जैसे तृप्त और आनंदित हो गया. उनके जीवन में कितनी खुशियाँ भर गयी हैं ज्ञान के आलोक से जो संतों का दिया हुआ है. नन्हे ने कहा है, दशहरे पर वे सब मैसूर जा सकते हैं, सेलम भी जा सकते हैं एक दिन.   

सोमवार, 20 नवंबर 2017

2017 का अवलोकन 6



विष्णु बैरागी  .... 
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..... जो स्वयं को साधारण समझता है, वही असाधारण होता है , विश्वास न हो तो पढ़ डालिये 




14 फरवरी की दोपहर होने को थी। मेरे एक उदारवादी मित्र के धर्मान्ध बेटे का फोन आया - ‘अंकल! पापा आपके यहाँ हैं क्या?’ मैं दहशत में आ गया। अपनी कट्टरता और धर्मान्धता के अधीन वह मुझे तो ‘निपटाता’ ही रहता है, अपने पिता को भी मेरी उपस्थिति में एकाधिक बार लताड़ चुका। 14 फरवरी को ऐसे ‘हिन्दू बेटे’ को अपने, ‘हिन्दू धर्म के दुश्मन’ पिता को तलाशते देख मन में आशंकाओं और डर की घटाएँ घुमड़ आईं। मैंने सहज होने की कोशिश करते हुए पूछा - ‘क्यों? सब ठीक तो है? कोई गड़बड़ तो नहीं?’ खिन्न स्वरों में उत्तर आया - ‘हाँ। सब ठीक ही है।’ मैंने पूछा - ‘कोई काम आ पड़ा उनसे?’ उसी उखड़ी आवाज में बेटा बोला - ‘हाँ। उनके पाँव पूजने हैं।’ डरे हुए आदमी को हर बात में धमकी ही सुनाई देती है। ‘पाँव पूजने’ का अर्थ मैंने अपनी इसी मनोदशा के अनुसार निकाला और घबरा कर पूछा - ‘अब क्या हो गया तुम दोनों के बीच?’ वह झल्ला कर बोला - ‘ऐसा कुछ भी नहीं है जैसा आप सोच रहे हो। आज सच्ची में उनके पाँव पूजने हैं। वेलेण्टाइन डे के विरोध में आज हम लोग मातृ-पितृ दिवस मना रहे हैं।’ सुनकर, अनिष्ट की आशंका से मुक्त हो मैंने आश्वस्ति की लम्बी साँस तो ली लेकिन हँसी भी आ गई। बोला - ‘जिस बाप को हिन्दू विरोधी मानते हो, जिसे यार-दोस्तों के सामने, बीच बाजार हड़काते रहते हो, हिन्दुत्व की रक्षा के लिए आज उसी बाप को तलाश रहे हो?’ वह झुंझलाकर बोला - ‘मैं इसीलिए आपसे नहीं उलझता अंकल! आप सब जानते, समझते हो। पापा के दोस्त हो इसलिए चुप रहता हूँ। फालतू बात मत करो। पापा आपके यहाँ हो तो बात करा दो। बस!’ अगले ही पल हम दोनों एक-दूसरे से मुक्त हो गए।

समर्थन हो या विरोध, पाखण्ड के चलते प्रभावी नहीं हो पाता है। इसके विपरीत, ऐसी हर कोशिश अन्ततः खुद की ही जग हँसाई कराती है। किसी एक खास दिन या मौके के जरिए पूरी संस्कृति को, सामूहिक रूप से खारिज या अस्वीकार करने की कोई भी कोशिश कभी कामयाब नहीं हो पाती। चूँकि निषेध सदैव आकर्षित करते हैं और प्रतिबन्ध सदैव उन्मुक्त होने को उकसाते हैं इसलिए ऐसी हर कोशिश हमसे हर बार उसी ओर ताक-झाँक करा देती है जिससे आँखें चुराने को कहा जाता है।

ऐसे ‘दिवस’ (‘डे’) मनाना पाश्चात्य परम्परा है। शुरु-शुरु मैं ऐसे प्रत्येक ‘डे’ पर चिढ़ता, गुस्सा होता था। किन्तु एक बार जब मैंने विस्तार से समझने की कोशिश की तो पाया कि मेरी असहमति तो ठीक है लेकिन मेरा चिढ़ना गैरवाजिब है। पश्चिम में सामूहिक परिवार की अवधारणा नहीं है। वहाँ बच्चों के सयाने होते ही माँ-बाप का घर छोड़ना बहुत स्वाभाविक बात होती है। इसके विपरीत, हम संयुक्त परिवार से कहीं आगे बढ़कर संयुक्त कुटुम्ब तक के विचार को साकार करने मेें अपना जीवन धन्य और सफल मानते हैं। एकल परिवार का विचार ही हमें असहज, व्यथित कर देता है। बेटे का माँ-बाप से अलग होना हमारे लिए पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर अपमानजक लगता है। यह मनुष्य स्वभाव है कि वह उसीकी तलाश करता है जो उसके पास नहीं है। पराई चीज वैसे भी सबको ही ललचाती ही है। इसी के चलते हमारी अगली पीढ़ी को एकल परिवार की व्यवस्था ललचाती है। उदारीकरण और वैश्वीकरण के रास्ते पर चल पड़ने के बाद यह हमारे बच्चों की मजबूरी भी बनती जा रही है। ऊँचे पेकेजवाली नौकरियाँ अपने गाँव में तो मिलने से रहीं! बच्चों को बाहर निकलना ही पड़ता है। बचत की या माँ-बाप को रकम भेजने की बात तो दूर रही, महानगरों में जीवन-यापन ही उन्हें कठिन होता है। सीमित जगह वाले, किराये के छोटे मकान। माँ-बाप को साथ रख सकते नहीं और माँ-बाप भी अपने दर-ओ-दीवार छोड़ने को तैयार नहीं। हमारी जीवन शैली भले ही पाश्चात्य होती जा रही हो किन्तु भारतीयता का छूटना मृत्युपर्यन्त सम्भव नहीं। 

हमारी सारी छटपटाहट इसी कारण है। त्यौहारों पर बच्चों का घर न आना बुरा समझा जाता है। उनके न आ पाने को हम लोग बीसियों बहाने बना कर छुपाते हैं। पश्चिम में सब अपनी-अपनी जिन्दगी जीते हैं। बूढों की देखभाल की अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए ‘राज्य’ ने ‘ओल्ड होम्स’ की व्यवस्था कर रखी है। क्रिसमस वहाँ का सबसे बड़ा त्यौहार। बच्चे उस दिन अपने माँ-बाप से मिलने की भरसक कोशिश करते हैं। शेष तमाम प्रसंगों के लिए ‘डे’ की व्यवस्था है। होली-दीवाली पर हम जिस तरह अपने बच्चों की प्रतीक्षा करते हैं, उसी तरह ‘मदर्स/फादर्स/पेरेण्ट्स डे’ पर वहाँ माँ-बाप बच्चों के बधाई कार्ड की प्रतीक्षा करते हैं। बच्चे भी इस हेतु अतिरिक्त चिन्तित और सजग रहते हैं। कार्ड न आने पर माँ-बाप और न भेज पाने पर बच्चे लज्जित अनुभव करते हैं।

‘डे’ मनाने का यह चलन हम उत्सवप्रेमी भारतीयों के लिए अनूठा तो है ही, आसान भी है और प्रदर्शनप्रियता की हमारी मानसिकता के अनुकूल भी। ‘कोढ़ में खाज’ की तर्ज पर ‘बाजारवाद’ ने हमारी प्रदर्शनप्रियता की यह ‘नरम नस’ पकड़ ली। अब हालत यह हो गई है कि ऐसे प्रत्येक ‘डे’ पर हर साल भीड़-भड़क्का, बाजार की बिक्री, लोगों की भागीदारी बढ़ती ही जा रही है। पहली जनवरी को नव वर्ष की शुरुआत को सर्वस्वीकार मिल चुका है। केक और ‘रिंग सेरेमनी’ भारतीय परम्परा का हिस्सा बन गई  समझिए। बाबरी ध्वंस की जिम्मेदारी लेनेवाली, एकमात्र भाजपाई, हिन्दुत्व की प्रखर पैरोकार उमा भारती ने तो एक बार किसी हनुमान मन्दिर में केक काटा था।

वस्तुतः कोई भी परम्परा लोक सुविधा और लोक स्वीकार के बाद ही संस्कृति की शकल लेती है। सांस्कृतिक आक्रमण को झेल पाना आसान नहीं होता। हमलावर संस्कृति का विरोध कर अपनी संस्कृति बचाने की कोई भी कोशिश कभी कामयाब नहीं हो पाती। सतत् निष्ठापूर्ण आचरण से ही कोई संस्कृति बचाई जा सकती है। लेकिन हमारे आसपास ऐसी कोशिशों के बजाय अपनेवालों को ही मारकर भारतीय संस्कृति बचाने के निन्दनीय पाखण्ड किए जा रहे हैं। ऐसी कोशिशों से प्रचार जरूर मिल जाता है और दबदबा भी कायम हो जाता है किन्तु संस्कृति हाशिए से भी कोसों दूर, नफरत के लिबास में कूड़े के ढेर पर चली जाती है। पश्चिम के लोग अपनी धारणाओं, मान्यताओं पर दृढ़तापूर्वक कायम रहते हैं। उन्हें वेलेण्टाइन डे मनाना होता है। मना लेते हैं। अपने वेलेण्टाइन डे के लिए वे हमारी होली, हमारे बसन्तोत्सव का विरोध नहीं करते। अपने फादर्स डे के लिए हमारे पितृ-पक्ष का, अपने क्रिसमस के लिए हमारी दीपावली का, अपने ‘न्यू ईयर’ के लिए हमारी चैत्र प्रतिपदा का विरोध नहीं करते। 

पश्चिम के लोगों में और हममें बड़ा और बुनियादी फर्क शायद यही है कि वे अपनी लकीर बड़ी करने में लगे रहते हैं जबकि हम सामनेवाले की लकीर को छोटी करने की जुगत भिड़ाते रहते हैं। इतनी ही मेहनत हम यदि अपनी लकीर बड़ी करने में करें तो तस्वीर कुछ और हो। उनकी लकीर छोटी करने की हमारी प्रत्येक कोशिश का सन्देश अन्ततः नकारात्मक ही जाता है। हमारी छवि आतंकी जैसी होती है। हम अपनों से ही नफरत करते हैं, अपनों की नफरत झेलते हैं।

बेहतर है कि हम तय कर लें कि हमें क्या बनना है, कैसा बनकर रहना है और तय करके, जबड़े भींच कर, वैसा ही बनने में जुट जाएँ। कहीं ऐसा न हो जाए कि हम वह भी नहीं रह पाएँ जो हम हैं। 

रविवार, 19 नवंबर 2017

2017 का अवलोकन 5




हिंदी और अंग्रेजी बोलते हुए लोगों की केमिस्ट्री बदल जाती है, हिंदी सपाट चप्पल में नज़र आती है और थोड़ी उर्दू ज़ुबान हुई तो लोग बिदक जाते हैं कि सब ऊपर से निकल गया, संस्कृत अब आवश्यक विषय रहा नहीं।  रही बात अंग्रेजी की तो लगता है बोलनेवाला पेंसिल हील पर खड़ा है, और थोड़ा राउंड राउंड जीभ घुमा, तब तो अंग्रेजी के लिए कई आँखें तालियाँ  ... नहीं, नहीं क्लैप करती नज़र आती हैं। 
यही हाल है ब्लॉगिंग का  ... हिंदी के कुछ ही ब्लॉग ऊँचे पायदान पर हैं, वरना अंग्रेजी की टिटबिट्स के आगे तो दुनिया वारी है  ... लिखने में शान, बताने में शान, बुक निकल गई तब तो शान ही शान !
हिंदी की भी कभी ऐसी ही शान थी, लेकिन इस शान को हिन्दीवालों ने ही मिटा दिया, कुछ लोग आज भी शान को बरकरार रख रहे, और ब्लॉग बुलेटिन उनको रेखांकित करता है - आज की शान हैं, अनुराग शर्मा मेरा फोटो





सन 2008 की गर्मियों में जब मैंने यूनिकोड और लिप्यंतरण (ट्रांसलिटरेशन) की सहायता से हिंदी ब्लॉग लेखन आरम्भ किया तब से अब तक की दुनिया में आमूलचूल परिवर्तन आ चुका है। यदि वह ब्लॉगिंग का उषाकाल था तो अब सूर्यास्त के बाद की रात है। अंधेरी रात का सा सन्नाटा छाया हुआ है जिसमें यदा-कदा कुछ ब्लॉगर कवियों की रचनाएँ जुगनुओं की तरह टिमटिमाती दिख जाती हैं। इन नौ-दस वर्षों में आखिर ऐसा क्या हुआ जो ब्लॉगिंग का पूर्ण सत्यानाश हो गया?

एक कारण तो बहुत स्पष्ट है। ब्लॉगिंग में बहुत से लोग ऐसे थे जो यहाँ लिखने के लिये नहीं, बातचीत और मेल-मिलाप के लिये आये थे। ब्लॉगिंग इस कार्य के लिये सर्वश्रेष्ठ माध्यम तो नहीं था लेकिन फिर भी बेहतर विकल्प के अभाव में काम लायक जुगाड़ तो था ही। वैसे भी एक आम भारतीय गुणवत्ता के मामले में संतोषी जीव है और जुगाड़ को सामान्य-स्वीकृति मिली हुई है। खाजा न सही भाजी सही, जो उपलब्ध था, उसीसे काम चलाते रहे। ब्लॉगर मिलन से लेकर ब्लॉगिंग सम्मेलन तक काफ़ी कुछ हुआ। लेकिन जब फ़ेसबुक जैसा कुशल मिलन-माध्यम (सोशल मीडिया) हाथ आया तो ब्लॉगर-मित्रों की मानो लॉटरी खुल गई। त्वरित-चकल्लस के लिये ब्लॉगिंग जैसे नीरस माध्यम के मुकाबले फ़ेसबुक कहीं सटीक सिद्ध हुई। मज़ेदार बात यह है कि ब्लॉगिंग के पुनर्जागरण के लिये चलाया जाने वाला '#हिन्दी_ब्लॉगिंग' अभियान भी फ़ेसबुक से शक्तिवर्धन पा रहा है।

तकनीकी अज्ञान के चलते बहुत से ब्लॉगरों ने अपने-अपने ब्लॉग को अजीबो-गरीब विजेट्स का अजायबघर बनाया जिनमें से कई विजेट्स अधकचरे थे और कई तो खतरनाक भी। कितने ही ब्लॉग्स किसी मैलवेयर या किसी अन्य तकनीकी खोट के द्वारा अपहृत हुए। उन पर क्लिक करने मात्र से पाठक किन्हीं अवाँछित साइट्स पर पहुँच जाता था। तकनीकी अज्ञान ने न केवल ऐसे ब्लॉगरों के अपने कम्प्यूटर को वायरस या मैलवेयर द्वारा प्रदूषित कराया बल्कि वे जाने-अनजाने अपने पाठकों को भी ऐसे खतरों की चपेट में लाने का साधन बने।

हिंदी के कितने ही चिट्ठों के टिप्पणी बॉक्स स्पैम या अश्लील लिंक्स से भरे हुए हैं।कुछ स्थितियों में अनामी और नाम/यूआरएल का दुरुपयोग करने वाले  टिप्पणीकार भी एक समस्या बने। टिप्पणी मॉडरेशन इन समस्याओं का सामना करने में सक्षम है। मैंने ब्लॉगिंग के पहले दिन से ही मॉडरेशन लागू किया था और कुछ समय लगाकर अपने ब्लॉग की टिप्पणी नीति भी स्पष्ट शब्दों में सामने रखी थी जिसने मुझे अवांछित लिंक्स चेपने वालों के बुरे इरादे के प्रकाशन की ब्लॉगिंग-व्यापी समस्या से बचाया। मॉडरेशन लगाने से कई लाभ हैं। इस व्यवस्था में सारी टिप्पणियाँ एकदम से प्रकाशित हो जाने के बजाय पहले ब्लॉगर तक पहुँचती हैं, जिनका निस्तारण वे अपने विवेकानुसार कर सकते हैं। जो प्रकाशन योग्य हों उन्हें प्रकाशित करें और अन्य को कूड़ेदान में फेंकें। 

टिप्पणी के अलावा अनुयायियों (फ़ॉलोअर्स) की सूची को भी चिठ्ठाकारों की कड़ी दृष्टि की आवश्यकता होती है। कई ऐसे ब्लॉगर जिन्हें ग़ैरकानूनी धंधों की वजह से जेल में होना चाहिये, अपने लिंक्स वहाँ चेपते चलते हैं। यदि आपने अपने ब्लॉग पर फ़ॉलोअर्स का विजेट लगाया है तो बीच-बीच में इस सूची पर एक नज़र डालकर आप अपनी ज़िम्मेदारी निभाकर उन्हें ब्लॉक भी कर सकते हैं और रिपोर्ट भी। वैसे भी नए अनुयाइयों के जुड़ने पर उनकी जाँच करना एक अच्छी आदत है।

कितने ही ब्लॉग 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु:' के सिद्धांत के अनुसार बंद हुए। किसी ने जोश में आकर लिखना शुरू किया और होश में आकर बंद कर दिया। कितने ही ब्लॉग हिंदी चिट्ठाकारी के प्रवक्ताओं के 'सदस्यता अभियान' के अंतर्गत बिना इच्छाशक्ति के जबरिया खुला दिये गये थे, उन्हें तो बंद होना ही था। लेकिन कितने ही नियमित ब्लॉग अपने लेखक के देहांत के कारण भी छूटे। पिछले एक दशक में हिंदी ब्लॉगिंग ने अनेक गणमान्य ब्लॉगरों को खोया है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे। 

केवल तकनीक ही नहीं कई बार व्यक्ति भी हानिप्रद सिद्ध होते हैं। हिन्दी चिठ्ठाकारी का कुछ नुकसान ऐसे हानिप्रद चिट्ठाकारों ने भी किया। घर-परिवार से सताए लोग जो यहाँ केवल कुढ़न निकालने के लिये बैठे थे उन्होंने सामाजिक संस्कारों के अभाव और असभ्यता का प्रदर्शन कर माहौल को कठिन बनाया जिसके कारण कई लोगों का मन खट्टा हुआ। कुछ भोले-भाले मासूम ब्लॉगर जो शुरू में ऐसे लोगों को प्रमोट करते पाये गये थे बाद में सिर पीटते मिले लेकिन तब तक चिट्ठाकारी का बहुत अहित हो चुका था। कान के कच्चे और जोश के पक्के ब्लॉगरों ने भी कई फ़िज़ूल के झगड़ों की आग में जाने-अनजाने ईंधन डालकर कई ब्लॉग बंद कराए।

गोबरपट्टी की "मन्ने के मिलेगा" की महान अवधारणा भी अनेक चिट्ठों की अकालमृत्यु का कारण बनी। ब्लॉगिंग को कमाई का साधन समझकर पकड़ने वालों में कुछ तो ऐसे थे जिन्होंने अन्य चिठ्ठाकारों की कीमत पर कमाई की भी लेकिन अधिकांश के पल्ले कुछ नहीं पड़ा। विकीपीडिया से ब्लॉग और ब्लॉग से विकीपीडिया तक टीपीकरण की कई यात्राएँ करने, भाँति-भाँति के विज्ञापनों से लेकर किसम-किसम की ठगी स्कीमों से निराश होने के बाद ब्लॉगिंग से मोहभंग स्वाभाविक ही था। सो यह वाला ब्लॉगर वर्ग भी सुप्तावस्था को प्राप्त हुआ। हालांकि ऐडसेंस आदि द्वारा कोई नई घोषणा आदि होने की स्थिति में यह मृतपक्षी अपने पर फ़ड़फ़ड़ाता हुआ नज़र आ जाता है।

हिंदी ब्लॉगरों के सामूहिक सामान्य-अज्ञान ने भी ब्लॉगिंग का अहित किया। मौलिकता का पूर्णाभाव, अभिव्यक्ति की स्तरहीनता, विशेषज्ञता की कमी के साथ, चोरी के चित्र, चोरी की लघुकथाएँ मिल-मिलाकर कितने दिन चलतीं। कॉपीराइट स्वामियों की शिकायतों पर चोरी की कुछ पोस्टें तो खुद हटाई गईं लेकिन कितने ही ब्लॉग कॉपीराइट स्वामियों की शिकायतों पर ब्लॉगर या वर्डप्रैस आदि द्वारा बंद कर दिये गये।

कितने ही ब्लॉगर उचित प्रोत्साहन के अभाव में भी टूटे। एक तो ये नाज़ुकमिज़ाज़ सरलता से आहत हो जाते थे, ऊपर से स्थापित मठाधीशों को अपने राजपथ से आगे की तंग गलियों में जाने की फ़ुरसत नहीं थी। कइयों के टिप्पणी बक्सों में लगे वर्ड वेरिफ़िकेशन जैसे झंझटों ने भी इनके ब्लॉग को टिप्पणियों से दूर किया। बची-खुची कसर उन तुनकमिज़ाज़ों ने पूरी कर दी जो टिप्पणी में सीधे जंग का ऐलान करते थे। कोई सामान्य ब्लॉगर ऐसी खतरनाक युद्धभूमि में कितनी देर ठहरता? सो देर-सवेर घर को रवाना हुआ। यद्यपि कई अस्थिर-चित्त ब्लॉगर ऐसे भी थे जो हर तीसरे दिन टंकी आरोहण की घोषणा सिर्फ़ इसी उद्देश्य से करते थे कि लोग आकर मनाएंगे तो कुछ टिप्पणियाँ जुटेंगी। किसे खबर थी कि उनकी चौपाल भी एक दिन वीरान होगी।

ऐसा नहीं है कि ब्लॉगिंग छूटने के सभी कारण निराशाजनक ही हों। बहुत से लोगों को ब्लॉगिंग ने अपनी पहचान बनाने में सहायता की। कितने ही साथी ब्लॉगर बनने के बाद लेखक, कवि और व्यंगकार बने। उनकी किताबें प्रकाशित हुईं। कुछ साथी ब्लॉगिंग के सहयोग से क्रमशः कच्चे-पक्के सम्पादक, प्रकाशक, आयोजक, पुरस्कारदाता, और व्यवसायी भी बने। कितनों ने अपनी वैबसाइटें बनाईं, पत्रिकाएँ और सामूहिक ब्लॉग शुरू किये। कुछ राजनीति से भी जुड़े।

खैर, अब ताऊ रामपुरिया के हिन्दी ब्लॉगिंग के पुनर्जागरण अभियान के अंतर्गत 1 जुलाई को "अंतरराष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगिंग दिवस" घोषित किये जाने की बात सुनकर आशा बंधी है कि हम अपनी ग़लतियों से सबक लेंगे और स्थिति को बेहतर बनाने वालों की कतार में खड़े नज़र आयेंगे।

शुभकामनाएँ!

शनिवार, 18 नवंबर 2017

2017 का अवलोकन 4




चलते चलते ठिठकी हूँ कई बार 
ओस सी भीगी दूब 
जैसे एक अनोखा एहसास देती है 
ठीक उसी तरह 
शब्दों के गलीचे मुझे एक नई सोच देते हैं 
कई उलझे तारों को झंकृत कर देते हैं 

राहुल सिंह का ब्लॉग सिंहावलोकन आपको भी कुछ सोचने को मजबूर करेगा -



शहर में शहर रहता है
शहर में सिर्फ शहर होता है
हर शहर का अपना वजूद है
उसका अपना वजूद, अपने होने से 

चिरई-चुरगुन, तालाब-बांधा, मर-मैदान
गुड़ी-गउठान, पारा-मुहल्ला
बाबू-नोनी, रिश्ते-नाते
शाम-ओ-सहर सब
या समाहित या शहर बदर
अब शहर में बस शहर ही शहर

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

2017 का अवलोकन 3


मेरा फोटो


अवलोकन की यात्रा मैं कछुए की तरह करती हूँ, ताकि अधिक से अधिक तराशी हुई कलम से साक्षात्कार हो, नज़रों से शब्दों का एहसासों का कोई महारथी न छूट जाए  ... और यह आप तय करेंगे मेरे द्वारा किये गए अवलोकन से कि मैं इन्साफ कर पाई हूँ या नहीं 


सत्यार्थमित्र: झाड़-फ़ूंक की अदृश्य शक्ति से सामना



कई दिनों के व्यतिक्रम के बाद आज साइकिल से सैर करने निकला। हालाँकि सोकर उठने में थोड़ी देर हो गयी थी लेकिन मैंने मन को बहानेबाज़ी का कोई मौका देना उचित नहीं समझा। बाहर का मौसम बहुत ख़ुशगवार नहीं था। सूरज निकल चुका था और सुबह की हवा में अपनी किरणों की आंच मिलाने लगा था। आसमान में कुछ फुटकर बादल इधर-उधर तैर रहे थे। इन विरल बादलों से धूप की तेजी पर यदा-कदा विराम लगने का झूठा संतोष हो रहा था। जमीन से धूल उठने लगी थी और 'इंदिरा-उद्यान' में टहलने वाले आखिरी लोग घरों की ओर लौटने लगे थे।
घर से बाहर निकलते ही एडीएम साहब मिल गये। रुककर कुशल-क्षेम पूछने के लिए ब्रेक लगाया। बायें पैर से जमीन पर टेक लेकर मैं साइकिल की सीट पर ही खुद को अटकाये रहा। वे एक-दो महीने में ही सेवानिवृत्त होने वाले हैं इसलिए उनका हाल-चाल लेता रहता हूँ। मैंने देखा कि उनकी तर्जनी अंगुली में पट्टी बंधी थी। वह लाल दवा से सनी हुई थी। पूछने पर उन्होंने बताया कि सीलिंग फैन की ब्लेड लग गयी थी। टाइप-4 के सरकारी आवास के बरामदे की छत में लगा पंखा इतना नीचे होता है कि सामान्य ऊंचाई के व्यक्ति का हाथ भी छू ले। ये साहब तो छः फुट वाले हैं। मैंने अफसोस व्यक्त करते हुए चलने की इज़ाजत मांगी और बताया कि आज भुएमऊ गेस्ट-हाउस तक जाऊँगा। उन्होंने अनुमान लगाया- मतलब आठ किलोमीटर जाएंगे।
परसदेपुर रोड पर इंदिरानहर पुल की ढलान से उतरते हुए पैडल नहीं मारना पड़ता। ढलान खत्म होने के सौ मीटर बाद भुएमऊ गाँव शुरू हो जाता है जिसकी शुरुआत कांग्रेस पार्टी के गेस्ट-हाउस से होती है। आज जब मैं ढलान से नीचे उतरते हुए अपनी साँसे स्थिर कर रहा था तो सड़क की दाहिनी ओर घने पेडों के बीच एक स्थान पर कुछ हलचल दिखी। झाड़ियों के पीछे एक लंबे पेड़ के नीचे कुछ महिलाएँ थीं। वहीं सड़क किनारे एक रिक्शा, एक बाइक और कुछ साइकिलें खड़ी थीं।
मैंने अपनी गति धीमी कर दी और अभी-अभी रिक्शे से उतरकर खड़ी हुई युवती से पूछा - यहाँ क्या हो रहा है? उसने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि कंधे पर सो रहे बच्चे का सिर अपने पल्लू से ढंकने लगी। उसके चेहरे पर एक असुरक्षा व संकोच का भाव तैर गया था। रिक्शे वाले ने तबतक अपने मुँह का मसाला थूक दिया था। उसने बताया - कुछ नहीं, वहाँ बाबा बैठते हैं। उन्हीं को दिखाने आयी हैं। मैंने पूछा- क्या, झाड़-फूँक? उसने सहमति में सिर हिलाया। मुझे तत्काल वहाँ से आगे बढ़ जाना ठीक लगा।
आगे गेस्ट-हाउस के गेट तक जाते-जाते मेरा खोजी मन कुलबुलाने लगा। आखिर इस निर्जन स्थान पर घनी झाड़ियों के बीच, ऊँचे जंगली पेड़ों की ओट में ऐसा क्या हो रहा है जो इन गरीबों को यहाँ खींचे ले जा रहा है? मैंने साइकिल वापस मोड़ दी और उसी स्थान पर लौट आया। एक किशोर अपनी बाइक खड़ीकर उसकी सीट पर बैठा हुआ था। वह अपनी भाभी को लेकर आया था जो अपने नवजात शिशु को दिखाने आयीं थीं। मैंने सड़क पर से ही वहाँ की तस्वीर ली। लेकिन इससे कुछ खास स्पष्ट नहीं हो सका। मैंने साइकिल को सड़क से उतारकर नीचे खड़ा किया और ताला लगाकर उस पगडंडी पर उतर गया जो सड़क किनारे के गढ्ढे को पारकर मुझे उस पेड़ के पास ले गयी।
वहाँ का नजारा बड़ा रोचक था। करीब दर्जन भर माताएँ अपने-अपने बीमार बच्चों को गोद में लिए मौजूद थीं। एक दुग्ध-धवल लंबे बालों और दाढ़ी वाले बाबा जी पेड़ की जड़ के पास बैठे थे। बगल में एक बड़ी सी पोटली रखी थी जो धीरे-धीरे भर रही थी। उनके हाथ में करीब दस इंच का एक लोहे का चाकू था। उसकी मूठ भी लोहे की थी। बच्चों का इलाज़ प्रत्यक्षतः इसी यंत्र से किया जा रहा था। इसके अतिरिक्त कदाचित कुछ अनसुने मन्त्र भी थे जो चमत्कारी बाबाजी बुदबुदाए जा रहे थे। जिस बच्चे का 'इलाज' होते हुए मैंने देखा उसकी उम्र एक माह से कम ही रही होगी। बाबाजी चाकू की धार को जमीन की मिट्टी में धँसाकर खींचे जा रहे थे। बार-बार चाकू की धार से कटकर वहाँ की सूखी मिट्टी बारीक धूल जैसी हो गयी थी। मंत्र पूरा होने के बाद बाबाजी ने वह धूल मुठ्ठी में भर ली और उसे मसलने लगे और कुछ ध्यान करने लगे। इस प्रकार 'अभिमंत्रित' की जा चुकी धूल को उन्होंने बच्चे की माँ को देकर कुछ अस्फुट निर्देश दिया। उसने उसे लेकर बच्चे की नाभि व तलवों में लगा दिया। फिर अगले बच्चे की बारी आ गयी। बाबाजी इस इलाज़ के लिए कोई फीस नहीं मांग रहे थे। लेकिन सभी माताएँ उन्हें दस-बीस रुपये या/ और आटा-चावल इत्यादि देती जा रही थीं। यह सब उनकी पोटली के पेट में समाता जा रहा था।
एक कम उम्र की औरत के बुखार से तप रहे बच्चे को देखते हुए बाबा जी ने पूछा - कितने बच्चे हैं? उसने सिर झुकाकर बताया - तीन। उफ्फ, बीस-इक्कीस साल की इस दुबली-पतली कृषकाय लड़कीनुमा औरत को तीन बच्चे? मैं सोच में पड़ गया। बाबा जी ने फिर पूछा - इसे अपना दूध पिलाती हो? उसने जिस प्रकार अपना सिर हिलाया उससे मैं नहीं समझ पाया कि उत्तर हाँ है या ना। उसने कहा- बच्चे की टट्टी भी सूख गयी है। बाबा जी बोले - अभी इसका बुखार उतार रहा हूँ। जब बुखार उतर जाय तब आना। तब वह भी देख लेंगे। उसने पॉलीथिन का आटा और दो-तीन सिक्के बाबा जी को थमाये और उठ खड़ी हुई।
मैंने अगले बच्चे से पहले बाबाजी को टोका- आप किन-किन तकलीफों का इलाज करते हैं बाबा जी?
वे बोले- कोई भी तकलीफ हो जो लोग आते हैं उनकी मदद कर देता हूँ। वैसे छोटे बच्चे जिन्हें 'सूखा' हो गया हो, बुखार हो, खाते-पीते न हों उनके लिए कुछ कर देता हूँ।
मैंने पूछा- क्या कुछ? मतलब झाड़-फूँक? क्या सही में फायदा होता है? 
बाबाजी थोड़े अनमने हो गये। लेकिन मेरा यह प्रश्न सबके लिए खुला था। एक लड़के ने स्थानीय बोली (अवधी) में जो कहा उसका अर्थ यह था कि यदि फायदा नहीं होता तो प्रत्येक मंगलवार और रविवार को इतनी भीड़ कैसे लगती? उसकी बात से बाबाजी के चेहरे पर संतुष्टि लौट आयी और नये उत्साह से काम में लग गये। मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही थी।

मैंने बाबाजी से फोटो खींचने की औपचारिक अनुमति मांग ली। उन्होंने मना नहीं किया बल्कि सहर्ष पोज देने लगे।हालाँकि इसके पहले ही अनेक फोटो मेरे मोबाइल कैमरे में कैद हो चुके थे।
मैंने जब उनका नाम पूछा तो थोड़े असहज हो गये। फिर बोले- मेरा नाम कोई नहीं जानता, लेकिन मुझे जानते सब हैं। यहाँ यह काम और कोई तो करता नहीं है। बस यह जान लीजिए कि हम पंडित हैं। इसी गाँव (भुएमऊ) के। इतवार-मंगल को यहीं मिलते हैं।
मैंने कहा- फिर भी कोई नाम तो होगा आपका। मान लीजिए बाहर किसी को बताना हो तो कैसे बताया जाएगा? आप इतनी भलाई का काम कर रहे हैं। लोगों को पता कैसे चलेगा?
वहाँ उपस्थित ग्रामीणों ने मेरे समर्थन में सिर हिलाया। एक लड़के ने कहा-इसे ले जाकर व्हाट्सअप पे डाल दीजिए। (उसे शायद फेसबुक की कल्पना नहीं थी।) अब बाबा जी पसीजकर बोले- नाम तो मेरा शिवदास है। 
मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और उन सबको अपने पीछे दिखाते हुए सेल्फी ली और चल पड़ा।

मेरे दिमाग में अभी यह चल ही रहा था कि क्या यहाँ वाकई कोई अदृश्य, अलौकिक शक्ति है जो इस बाबा के हाथों की धूल के माध्यम से इन नवजात शिशुओं की बीमारी ठीक कर देती है। क्या वास्तव में इन बच्चों पर किसी भूत-प्रेत की छाया है जिसे बाबा शिवदास नियंत्रित कर रहे हैं? तभी मैंने देखा कि मेरी साइकिल की चेन उतर गयी है। अच्छी-भली खड़ी करके गया था। फिर यह उतर कैसे गयी और अंदर की ओर स्पॉकिट में बुरी तरह फँस कैसे गयी? मन मे उठी भूत की क्षणिक आशंका को मैंने सिर झटक कर नकारा और चेन चढ़ाने में पसीना बहाने लगा। बड़ी मुश्किल से बात बनी। मेरे दोनो हाथ ग्रीस की कालिख से काले हो गये। अब हैंडल कैसे पकड़ूँ? मैंने जमीन से सूखी मिट्टी उठाकर दोनो हाथों में रगड़ा तो कालिख का गीलापन खत्म हो गया। इसके बाद वहीं झाड़ी से कुछ हरी पत्तियां तोड़कर उन्हें हाथ मे मसलने लगा।
हाथ की कालिख कुछ कम हुई तो मैं चलने को उद्यत हुआ। तभी पैर उछालकर साइकिल की सीट पर बैठते हुए 'चर्र...' की आवाज हुई। धत तेरे की...। बिल्कुल नयी पैंट थी। 'कलर-प्लस' के स्पेशल डिस्काउंट ऑफर में पिछले हफ्ते ही लिया था। अब इसकी मजबूत सिलाई करानी पड़ेगी। यह सोचते हुए मैं सीट पर आसीन हो चुका था। अब घर पहुंचने से पहले कहीं रुकने की कोई गुंजाइश नहीं थी। बाबाजी से पिटी हुई कोई आत्मा मुझे तंग तो नहीं कर रही थी?

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

2017 का अवलोकन 2




धरती और आकाश के मिलने का आभास जहाँ होता है, वह है क्षितिज  ... 
सामाजिक,पारिवारिक,राजनैतिक, हास्य-व्यंग्य  ... इन सारी धुरियों पर जिनकी कलम कमाल करती है, वह हैं उड़नतश्तरी समीर लाल जी। 




विवाह में अब तक सप्तपदी और सात वचन ही सुने थे. मगर अब, वेदों पुराणों वाले सात वचन मुंह जुबानी और आँठवा सरकारी – शपथपत्र भर कर सुनने में आ रहा है. बिहार में अगर शादी करनी है तो आपको पहले शपथ पत्र देना होगा कि यह विवाह बाल विवाह नहीं है और इसमें दहेज का कोई लेन देन नहीं है. यह प्रावधान  बिहार सरकार लेकर आई है. जित्ति सरकारें उत्ती लाठियां, जो जैसा हांक ले जाए.
अब तो लगता है कि वो दिन दूर नहीं जब विवाह करने हेतु पैन कार्ड, बैंक खाता एवं आधार कार्ड अनिवार्य हो जायेंगे और पैन नंबर शपथ पत्र का हिस्सा हो जायेंगे. पंडित जी की दक्षिणा भीम एप से देना अनिवार्य कर दी जायेगी अन्यथा विवाह अमान्य घोषित किया जाएगा.. ऐसा नियम बना दिया जायेगा.
समय बदल रहा है. आज के आठ वचन एक रेट वाले जीएसटी के बदले हजार रेट वाले जीएसटी की तर्ज पर कई वचनों में बदलते जायेंगे. नित बदलाव हमारी आदत का हिस्सा बन गया है ..हमने गीता पढ़ी है..हमें ज्ञात है की परिवर्तन ही जीवन का नियम है.. बदलाव को झेलना भी और झिलाना भी..हमें आता है. आगे से इसके चलते विवाह में वचन कुछ यूँ हो सकते है:
हम दोनों शपथपत्र भर कर यह घोषणा करते हैं कि:
-    हम दोनों के पास आधार कार्ड है जो एक दुसरे से लिंक है,
-    हम दोनों के बैंक खाते आपस में लिंक हैं,
-    हम दोनों एक ही राजनीतिक दल को वोट दे सकते हैं जिसका निर्णय मेरी पत्नी करेगी और जिस दल का नाम भाजपा होगा..
-    अगर मेरी पत्नी अगर कमल के बदले किसी और निशान पर वोट डालेगी तो मेरा कमल पर डाला गया बाई डिफाल्ट वोट ही वैध्य होगा और पत्नी का वोट बदल कर कमल कर दिया जाएगा. इस हेतु इवीएम में जो जरुरी फेरबदल करने हों उसके लिए सरकार स्वतंत्र है. बजट में इसका प्रावधान किया जा रहा है.
-    अगर हम दोनों किसी कार्यवश वोट देने न आ पायें तो हमारा वोट बाई डिफाल्ट कमल पर लगा दिया जाए
-    हमारे होने वाले बच्चे को भारतीय नागरिकता के साथ साथ संघ की सदस्यता दे दी जाए.
-    हम एतद द्वारा वादा करते हैं कि बच्चे को अम्मा बाबु बोलने से पहले वन्दे मातरम बुलवायेंगे
-    हम स्वच्छता अभियान के तहत रोज मोहल्ले में झाड़ू लगायेंगे..यूँ भी कुछ और करने को है भी नहीं..इसी बहाने व्यस्त नजर आयेंगे.
यूँ शपथ दर शपथ वादे करता हर भारतीय यह समझता है कि यहाँ सब वादे और शपथें एक तरह के जुमले भर तो हैं..कौन भला सप्तपदी के वचन निभाता है और कौन पूरी करता हैं शपथें जो भला अब हम करेंगे?
न हम शपथकर्ता से किसी तरह की उम्मीद पालते हैं ओर न ही हम इस मुगालते में जीतें हैं कि कोई हमारे कहे पर भरोसा करेगा. बोला ही तो है बस!! कोई दे तो न दिये हर खाते में १५ लाख...
हमारे मूंह के बदले हमारी कलम ने बोल दिया तो आप क्या सिरियस हो जाओगे? मने की हमारी जुबान से बड़ी आपके लिए हमारी निर्जीव कलम हो गई? हद करते हो जी आप!!
जुमलों की दुनिया में वादों की भरपाई..महज एक मजाक ही कहलाएगी, है की नहीं?
आने वाले समय में अगर विवाह जैसे संस्कार बचे रह गए जिसकी की उम्मीद अब न के बराबर है, तब बदला जमाना शायद सप्तपदी की जगह सहस्त्रपदी पढ़ता नजर आये..इत्तेफाकन..
आज एक से सात तक के वचन चूकते हैं..कल सहस्त्र तक चूक जायेंगे..और क्या?
क्या फरक पड़ता है..हमें तो आदत है वादों को जुमलों में बदलते देखने की...

बुधवार, 15 नवंबर 2017

2017 का बुलेटिन अवलोकन आरम्भ




यह,वह,वह,यह  ..... कहते सुनते, कुछ शिकायतें लिए, कुछ सकारात्मकता लिए 2017 भी धीरे धीरे अपने बक्से सहेज रहा है, -जाने के लिए।  2018 के लिए रख देगा पूरब का सूरज, अस्त होता सूरज, पर्व-त्यौहार, कुछ गीत, कुछ संकल्प, कुछ अभियान, कुछ ज्ञान,  ... पुनः एक वार्षिक बजट !
        जनवरी के आते चल देगा यह 2017 दिसम्बर के आखिरी गीत गाते हुए ! अभी फिलहाल तो नवम्बर की भीनी सर्द आगोश में किसी अबोध बच्चे की तरह लिपटा है ठुनकता सा  .. कि मुझे नहीं जाना।  पर जाना तो है, जाने से पहले धीरे धीरे पूर्व की तरह ब्लॉग यात्रा हो जाए, वार्षिक अवलोकन हो जाए !

साल गुजरता है, उम्र भागती है या ज़िन्दगी  ... इसे समझते समझते जाना कि मोबाइल एक महत्वपूर्ण हिस्सा है ज़िन्दगी का, काम-बेकाम मोबाइल होता है हमेशा काम का  ... 



मोबाइल पर निर्भर ज़िंदगी...~
My photo 



  
आज के इस दौर में तकनीक के बिना जीवन सोचने में भी ऐसा लगता है मानो यह कोई असंभव सी बात हो, दिन प्रतिदिन हम तकनीक पर कितने निर्भर हो गए हैं कि उसका उपयोग करना हमारे लिए सांस लेने जितना ज़रूरी हो गया है। गैरों की तो मैं क्या बात करूँ, मेरा ही जीवन बिना किसी तकनीकी साधन के नहीं चलता क्यूंकि आज की जीवन शैली ही ऐसी हो गयी है कि हर छोटी बड़ी चीज़ किसी न किसी ऐसे प्रसाधन से जुड़ी है जो तकनीक के माध्यम से चलता है। घर की छोटी-मोटी जरूरतों से लेकर मनोरंजन और अहम जरूरतों की पूर्ति तक सब से पहले कोई न कोई तकनीकी साधन ही काम आता है। जैसे रसोई में मिक्सी, टोस्टर, माइक्रोवेव, इंडकशन चूल्हा, रसोई से बाहर निकलो तो सर्वप्रथम मोबाइल, टीवी, फ्रिज, सभी कुछ ज़िंदगी का इतना अहम हिस्सा बन गया है कि इन में से यदि एक भी चीज़ काम न करे तो ऐसा लगता है जैसे जीवन रुक सा गया है।

जिसमें सब से अत्यधिक आवश्यक है मोबाइल और कुछ काम करे या न करे किन्तु मोबाइल का काम करना सारी दुनिया के चलते रहने का सबूत है। मोबाइल ठीक तरह से काम कर रहा है अर्थात हम ज़िंदा है और यदि उसे जरा सा भी कुछ हुआ है तो मानो हम बीमार है और यदि पूरी तरह ही खराब हो गया है तब तो समझो ऐसा लगता है न कि हम मर ही गए हों जैसे, डॉक्टर ढूँढने से लेकर ख़रीददारी करने तक सब चीज़ के लिए मोबाइल का साथ रहना बहुत ज़रूरी है और अब तो लिखने पढ़ने से लेकर मनोरंजन तक के लिए भी मोबाइल होना ही चाहिए। अब न टीवी में मज़ा आता है, न रेडियो पर, न सिनेमा हाल में, सारी दुनिया सिमटकर मोबाइल में जो आ गयी है। रसोई में भी मोबाइल चाहिए क्यों ? क्यूंकि कुछ नया बनाना है या कोई पुरानी चीज़ भूल गए हैं तो वीडियो पर देखने के लिए मोबाइल साथ होना चाहिए न भाई...!

फिर हाथ के नाखून या मेनीक्यौर खराब नहीं होना चाहिए ना...तो फूड प्रोसेसर भी चाहिए, नहीं तो कौन हाथ से आटा गूँदे सब नेलपोलिश खराब हो जाती है। अपने यहाँ तो फिर भी लोग अब भी हाथ से काम कर लेते हैं। लेकिन विदेशों में तो अब फ़्रोजन रोटियों का चलन है, लाओ तवे पर गरम करो और खा लो न आटा गूँदने की कोई दिक्कत न एक-एक रोटी बनाने की कोई टेंशन। अब देख लीजिये महिलाओं का भी सर्वाधिक समय मोबाइल पर ही व्यतीत होता है। फिर चाहे बात करना हो या वीडियो देखकर कुछ सीखना हो या कुछ ढूँढना हो, यहाँ तक की बच्चों की पढ़ाई भी अब तो वीडियो पर उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त आजकल सब आराम पसंद भी हो गए हैं, तो सब्जी भाजी की खरीद फ़रोख्त हो या घर के लिए किराने का सामान या फिर कपड़े ही क्यूँ न खरीदने हो सब कुछ मोबाइल से ही तो होता है।

बाकी संसाधनों के लिए तो अन्य उपाय भी मिल जाते हैं लेकिन मोबाइल के लिए कोई और साधन नहीं मिलता कहने को एसटीडी/पीसीओ (STD PCO) बूथ अब भी हैं, लेकिन फिर भी जब तक कोई आपातकालीन समस्या न हो, कौन जाता है वहाँ उस से कॉल करने। अभी मैं एक कॉफी शॉप में बैठी हूँ तो मेरे जहन में जगजीत सिंग जी का गाया हुआ एक पुराना गीत घूम रहा है

“हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी”

जिसे सुनकर मुझे लग रहा है कि उस समय में ही लोगों को भीड़ में भी तन्हाइयों का एहसास होने लगा था, तो फिर आजकल की तो बात ही क्या है। आजकल तो संगी साथी, दोस्त यार, नाते रिश्तेदार, साथ होते हुए भी लोग तन्हा रहना ही ज्यादा पसंद करते हैं। एक वह ज़माना था जब सयुंक्त परिवार हुआ करते थे और लोग एकल ज़िंदगी की कल्पना करते हुए भी घबराते थे। आज ठीक इस का उल्टा है, आज लोग साथ रहने से कतराते हैं। ज़िंदगी भर का साथ तो छोड़िए, आज तो घंटे दो घंटे भी बिना मोबाइल के लोग एक दूजे के साथ समय नहीं बिता पाते या यह कहना ज्यादा ठीक होगा शायद कि बिता तो सकते हैं, परंतु बिताना नहीं चाहते। अभी मेरे सामने का नज़ारा ही ऐसा है कि चार दोस्त एक साथ एक कॉफी शॉप में आते हैं और चारों अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त हैं क्या फायदा है ऐसे साथ घूमने फिरने का राम ही जाने।
  
यह सब देखकर लगता है अब तो दुनिया का सबसे सुंदर रिश्ता दोस्ती भी भावनात्मक ना रहते हुए दिखावे का पर्याय बन गया है। तकनीकी संसाधनों के साथ तेज़ी से बदलती ज़िंदगी ने जहाँ एक ओर लोग का जीवन सरल बनाया है वही दूसरी ओर उतनी ही तेज़ी से लोगों के मानसिक और आर्थिक स्तर पर भी गहरा प्रभाव छोड़ा है। जिसके आधीन होकर नित नए-नए साधनों के उपयोग के लालच में लोग बैंक द्वारा उधार ली गयी मोटी रकम के कर्जदार बन गए हैं और बैंक कों की चाँदी हो गयी है। शायद इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि मोबाइल पर उपलब्ध सीधा बैंक से पैसा देने वाली सुविधा के चलते जब ऑनलाइन पैसा चला जाता है, तब वह हाथ से जाता हुआ दिखाई नहीं देता। इसलिए उस समय महसूस नहीं होता कि आपने ज़रा सी देर में कितना बड़ी धन राशि खर्च कर दी। फिर जब लम्बा बिल आता है तब आँखें खुलती है और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है या फिर थोड़े दिन बाद जीवन उसी ढर्रे पर आ जाता है।


इस तरह बच्चों से लेकर बड़ों तक और बड़ों से लेकर बुज़ुर्गों तक हम सभी का जीवन मोबाइल पर कुछ इस तरह निर्भर हो गया है कि अब तो ऐसा लगता है मोबाइल के बिना जीवन संभव ही नहीं है।             

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

सबकुछ राजनैतिक नहीं होता




कोई यह मानने से इंकार नहीं करेगा कि एक वक़्त था, जब देश जवहर लाल नेहरू का था, उनकी वेशभूषा, उनका व्यक्तित्व  ... उनकी लिखी किताबें अपनी ओर खींचती थीं।  बच्चों के बीच उनका होना बच्चों को ख़ुशी से भर देता था, गुलाब उनकी पहचान थी , उनका जन्मदिन बच्चों का दिन था !
आज वही दिन है - बच्चों का।  हर बच्चों के नाम एक गुलाब,  ... 
जवाहरलाल नेहरू के बाल्यकाल की घटना है। उनके घर पिंजरे में एक तोता पलता था। पिता मोतीलालजी ने तोते की देखभाल का जिम्मा अपने माली को सौंप रखा था। एक बार नेहरूजी स्कूल से वापस आए तो तोता उन्हें देखकर जोर-जोर से बोलने लगा। नेहरूजी को लगा कि तोता पिंजरे से आजाद होना चाहता है। उन्होंने पिंजरे का दरवाजा खोल दिया। तोता आजाद होकर एक पेड़ पर जा बैठा और नेहरूजी की ओर देख-देखकर कृतज्ञ भाव से कुछ कहने लगा। उसी समय माली आ गया। उसने डाँटा- "यह तुमने क्या किया! मालिक नाराज होंगे।

बालक नेहरू ने कहा- "सारा देश आजाद होना चाहता है। तोता भी चाहता है। आजादी सभी को मिलनी चाहिए।

बच्चों का दिन सबको मुबारक हो 





सोमवार, 13 नवंबर 2017

तुम जियो हज़ारों साल




तुम जियो हज़ारों साल 
साल के दिन हों पचास हज़ार  ... जी हाँ, आज ब्लॉग बुलेटिन का जन्मदिन है, हर कलम को शुभकामना :)

रविवार, 12 नवंबर 2017

डॉ. सालिम अली - राष्ट्रीय पक्षी दिवस - ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को मेरा नमस्कार।
सालिम अली (अंग्रेज़ी:Salim Ali, पूरा नाम: 'सालिम मोइज़ुद्दीन अब्दुल अली', जन्म: 12 नवम्बर, 1896; मृत्यु: 27 जुलाई, 1987) एक भारतीय पक्षी विज्ञानी और प्रकृतिवादी थे। सालिम अली को भारत के बर्डमैन के रूप में जाना जाता है। सलीम अली भारत के ऐसे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत भर में व्यवस्थित रूप से पक्षी सर्वेक्षण का आयोजन किया और पक्षियों पर लिखी उनकी किताबों ने भारत में पक्षी-विज्ञान के विकास में काफ़ी मदद की है। सन् 1906 में दस वर्ष के बालक सालिम अली की अटूट जिज्ञासा ने ही पक्षी शास्त्री के रूप में उन्हें आज विश्व में मान्यता दिलाई है। पक्षियों के सर्वेक्षण में 65 साल गुजार देने वाले इस शख़्स को परिंदों का चलता फिरता विश्वकोष कहा जाता था। पद्म विभूषण से नवाजे इस 'परिंदों के मसीहा' के प्रकृति संरक्षण की दिशा में किए गए प्रयासों को कभी भुलाया नहीं जा सकता है।


राष्ट्रीय पक्षी दिवस प्रत्येक वर्ष '12 नवम्बर' को मनाया जाता है। 12 नवम्बर (1896) डॉ. सालीम अली का जन्म दिवस है, जो कि विश्वविख्यात पक्षी विशेषज्ञ थे। इन्हें भारत में "पक्षी मानव" के नाम से भी जाना जाता था।


  • पक्षी विशेषक्ष सालिम अली के जन्म दिवस को 'भारत सरकार' ने राष्ट्रीय पक्षी दिवस घोषित किया हुआ है।
  • सालिम अली ने पक्षियों से सम्बंधित अनेक पुस्तकें लिखी थीं। 'बर्ड्स ऑफ़ इंडिया' इनमें सबसे लोकप्रिय पुस्तक है।
  • डाक विभाग ने इनकी स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया है।
  • वर्ष 1958 में सालिम अली को 'पद्मभूषण' तथा 1976 में 'पद्मविभूषण' से अलंकृत किया गया था।



आज भारत के प्रसिद्ध पक्षी वैज्ञानिक डॉ. सालिम अली जी के 121वें जन्म दिवस पर हम सब उनको शत शत नमन करते हैं।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर .... अभिनन्दन।।

शनिवार, 11 नवंबर 2017

मैंने तुमसे तो कभी पंख नहीं माँगे




चलो मान लिया 
मेरे पास  परियों जैसे पंख नहीं
पर अगर मुझे लगता है 
कि मैं उड़ान भर सकती हूँ 
तो तुम 
मुझे पंखहीन होने का एहसास क्यूँ देते हो ?!
मैंने तुमसे तो कभी पंख नहीं माँगे 
जो बेशक 
तुम्हारे पास भी नहीं थे !
और मैंने तुम्हें एहसास भी नहीं कराया 
पंखहीन होने का 
नहीं गिराया तुमको किसी की नज़र में 
या तुम्हारी खुद की नज़र में !
तुम्हें शायद ये  ज्ञात न हो 
कि उड़ान मन की होती है 
मन की ताकत ही 
उड़ने का हौसला देती है 
पंख होने से क्या 
यदि मन ही न उड़ना चाहे !
हौसला अपना होता है मित्र,
कोई विशेष बनकर जन्म नहीं लेता 
उसकी कर्मठता उसे विशेष बनाती है 
तुम ही कहो  -
पालने में बुद्ध की जीवनगाथा लिखी थी क्या ?


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उम्र चौदह की होने को है... - प्रतिभा की दुनिया - blogger

मृत्यु के से बर्फ़ीले फैलाव पर
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हृदय
चीखना चाहता है
फूट-फूट कर
रोना चाहता है
ऐसी सहूलियतें कहाँ
जीवन की कँटीली राह में
कि रुक कर
रो लिया जा सके
सब कुछ स्थगित कर
अपना हो लिया जा सके
जीवन की निरीहता
सालती है
कैसे-कैसे तो साँचों में पीड़ा खुद को
ढ़ालती है
एक साँस के बाद दूसरी आ सके
इसे संभव करने को
टूटे मन से ही
टूटे मन को
कलम लिखने लगती है
कविता सुनाई पड़ती है
वो धुंधली आँखों को
दिखने लगती है
स्थगित हो जाता है गति का सत्य
विराम की पीड़ा बेध जाती है
उस विकटता में
कविता स्नेहिल रूदन बन आँखों से बरस जाती है
कि
अवश्यम्भावी होकर भी
चीख नहीं निकलती
वो वहीँ दबी है
हृदय की मिट्टी में
दरअसल
टूटे-फूटे शब्द ये
उसी चीख का परिवर्तित रूप हैं
कविता
मृत्यु के से बर्फ़ीले फैलाव पर
झुरमुटों से होकर पड़ती
अजानी धूप है.

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

109वां शहादत दिवस - कनाईलाल दत्त - ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को मेरा नमस्कार।
कनाईलाल दत्त
कनाईलाल दत्त (अंग्रेज़ी: Kanailal Dutta; जन्म- 30 अगस्त, 1888 ई. हुगली ज़िला, बंगाल; मृत्यु- 10 नवम्बर, 1908 ई., कोलकाता) भारत की आज़ादी के लिए फाँसी के फंदे पर झूलने वाले अमर शहीदों में से एक थे। उन्होंने 1905 में बंगाल के विभाजन का पूर्ण विरोध किया था। अपनी स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करके कनाईलाल कोलकाता आ गये थे और बारीन्द्र कुमार के दल में शामिल हो गए। 1908 में मुजफ़्फ़रपुर के अंग्रेज़ अधिकारी किंग्सफ़ोर्ड पर हमला किया गया था। इस हमले में कनाईलाल दत्त, अरविन्द घोष, बारीन्द्र कुमार आदि पकड़े गये। इनके दल का एक युवक नरेन गोस्वामी अंग्रेज़ों का सरकारी मुखबिर बन गया। क्रांतिकारियों ने इससे बदला लेने का निश्चय कर लिया था। अपना यह कार्य पूर्ण करने के बाद ही कनाईलाल पकड़े गए और उन्हें फाँसी दे दी गई।


आज कनाईलाल दत्त जी के 109वें शहादत दिवस पर हम सब उनको शत शत नमन करते हैं।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

जोकर

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज का ज्ञान :-

एक जोकर को उसके दर्शक सिर्फ एक जोकर के रूप में देखते है ... पर वो खुद को हमेशा एक कलाकार के रूप में देखता है |

सबक :- भले ही लोग आपके बारे में जो भी सोचे ... फर्क इस से पड़ता है कि आप अपने बारे में क्या सोचते है !

सादर आपका

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रथ और सेनासहित भरत की यात्रा

प्रबल और वरिष्ठ समाजसेवियों का चुनाव

अँधेरा का निर्जन द्वीप

दो भाइयों का निर्मल और निस्वार्थ प्रेम

तुम मेरे हो..............

सुबह .... हमेशा एक सी नहीं होती

"यहाँ हमारा सिक्का खोटा"

चुपचाप

उस्ताद शाहिद परवेज जी "सांस्कृतिक सफ़र मानोशी के साथ में"

पुस्तक-चर्चा: बादलों में बारूद

दस ग्राम हींग सफेद रही, करोड़ों रुपये काले हो गए

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

बुधवार, 8 नवंबर 2017

97वां जन्म दिवस - सितारा देवी - ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को मेरा सादर नमस्कार।
आज भारत की प्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना सितारा देवी जी के 97वें जन्म दिवस पर गूगल उनका डूडल बनाकर उन्हें याद किया।
सितारा देवी (8 नवम्बर, 1920 – 25 नवम्बर, 2014) ) भारत की प्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना थीं। जब वे मात्र १६ वर्ष की थीं, तब उनके नृत्य को देखकर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने उन्हें 'नृत्य सम्राज्ञी' कहकर सम्बोधित किया था। उन्होने भारत तथा विश्व के विभिन्न भागों में नृत्य का प्रदर्शन किया।

इनका जन्म 1920 के दशक की एक दीपावली की पूर्वसंध्या पर कलकत्ता हुआ था। इनका मूल नाम धनलक्ष्मी और घर में धन्नो था। इनको बचपन में मां-बाप के लाड-दुलार से वंचित होना पड़ा था। मुंह टेढ़ा होने के कारण भयभीत मां-बाप ने उसे एक दाई को सौंप दिया जिसने आठ साल की उम्र तक उसका पालन-पोषण किया। इसके बाद ही सितारा देवी अपने मां बाप को देख पाईं। उस समय की परम्परा के अनुसार सितारा देवी का विवाह आठ वर्ष की उम्र में हो गया। उनके ससुराल वाले चाहते थे कि वह घरबार संभालें लेकिन वह स्कूल में पढना चाहती थीं।[1] स्कूल जाने के लिए जिद पकड लेने पर उनका विवाह टूट गया और उन्हें कामछगढ हाई स्कूल में दाखिल कराया गया। वहां उन्होंने मौके पर ही नृत्य का उत्कृष्ट प्रदर्शन करके सत्यवान और सावित्री की पौराणिक कहानी पर आधारित एक नृत्य नाटिका में भूमिका प्राप्त करने के साथ ही अपने साथी कलाकारों को नृत्य सिखाने का उत्तरदायित्व भी प्राप्त कर लिया।


आज सितारा देवी जी के 97वें जन्म दिवस पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~












आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभ संध्या। सादर ... अभिनन्दन।।  

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