Subscribe:

Ads 468x60px

सोमवार, 4 सितंबर 2017

सिसकियाँ - १८०० वीं ब्लॉग-बुलेटिन

बहुत साल पहिले एगो सिनेमा बना था “यादें”. सुनील दत्त साहब का सिनेमा अऊर ऊ सिनेमा का खासियत एही था कि उसमें उनके अलावा कोनो कलाकार नहीं था. गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में भी ई सिनेमा सबसे कम कलाकार वाला सिनेमा के लिये दर्ज है. दत्त साहब खुद एक बार बताए थे कि एक रोज ऊ सूटिंग के कार्जक्रम से जल्दी लौट आए घर. नरगिस जी बच्चा लोग को लेकर कहीं बाहर चली गई थीं. जब दत्त साहब घर में अकेले बइठे हुए थे, उनके दिमाग में घर के बच्चा लोग का आवाज गूंजने लगा अऊर परिबार के साथ बिताया हुआ समय सब इयाद आने लगा. ओही टाइम उनके दिमाग में फिलिम “यादें” का आईडिया आया.

एक रोज हमरे साथ भी ओही सब हुआ. हमरी सिरीमती जी अपनी कोनो सहेली के घर पूजा में गई हुई थीं अऊर घर पर हम अकेले. टीवी देखने का मने नहीं हो रहा था. सोचे कि चलो आँख बंद करके तनी झपकी ले लेते हैं. आँख बंद किये हमको दू मिनिट भी नहीं हुआ होगा कि हमको दोसरका रूम से किसी का कराहने का आवाज सुनाई दिया. पहिले त हम सोचे कि हमको सपना ओपना कुछ आ रहा होगा. बाकी जब आवाज तेज हो गया, त हम हड़बड़ा कर उठ गए. एन्ने-ओन्ने नजर दौड़ाए त कोई देखाई नहीं दिया.

कुछ डर अऊर कुछ उत्सुकता से हम दोसरका कमरा में गए त महसूस हुआ कि आवाज कोना मे रखा हुआ आलमारी से आ रहा है. भागकर जब आलमारी खोले त आवाज कम हुआ अऊर अइसा लगा कि जो कराह रहा था ऊ जोर जोर से साँस ले रहा है. हमको बुझाइए नहीं रहा था कि है कौन! हम हिम्मत करके बोले – कौन है? कोनो जवाब नहीं आया. हम आलमारी का पल्ला खोलकर अऊर जोर से बोले – कौन है?? सामने आओ!

आलमारी से कमजोर आवाज आया – जरा सामने से हट जाइए आप! थोड़ी रोशनी और हवा आने दीजिए.
हमको अजीब लग रहा था कि आवाज पहचाना हुआ भी नहीं है अऊर आलमारी के भीतर से आ रहा है. अब ई आलमारी में कऊन हो सकता है.
“क्यों... हमारी आवाज़ पहचानने की कोशिश कर रहे हैं न? एक समय था जब हमारी आवाजें आपकी आवाज़ हुआ करती थीं.”
“आपकी आवाजें – मेरी आवाज़?”
“यही नहीं, अपने सीने पर हमें कितनी बार आपने सुलाया है. अपनी बेटी के अलावा आपने इतना स्नेह और प्यार अगर किसी को दिया है तो सिर्फ हमें.”

अब त हम सचमुच अचम्भा में पड़ गए थे. कऊन हो सकता है हमरा एतना करीबी, जो हमको इयाद नहीं आ रहा है. मन में अफसोस भी हुआ कि अगर ई बात सचमुच सही है त हम अपराधी हैं. माफी माँग लेते हम, बाकी मालूम त चले कि माफी मांगना किससे है.
“प्लीज़!! आप कौन हैं? अगर सचमुच मुझसे ऐसा कोई अपराध हुआ है तो मुझे माफ कीजिये. लेकिन एक बार सामने तो आएँ!”
“आपके सामने ही तो हैं हम सब!”
“सामने?? कहाँ...?”
“एक बार आलमारी के अंदर झाँक कर देख लिया होता, तो आपको यह सवाल पूछना ही नहीं पडता!... नहीं पहचाना? हम हैं आपकी आलमारी में बंद पड़ी किताबें. आपको याद है कब से आपने ये आलमारी नहीं खोली? दम घुटता था हमारा. रोशनी और हवा को तरस गए हम.”

हमको काटो त खून नहीं. नौकरी का भागादौड़ी में किताब सब से मिलने का समये नहीं मिला. मन कचोटने लगा अऊर अंदर से गिल्टी फीलिंग आने लगा. न माफी मांगते बन रहा था, न अफसोस करते. अचानक एक बहुत पहचाना सा आवाज सुनाई दिया आलमारी के अंदर से. ई आवाज पहचाना हुआ था गुलज़ार साहब का.

किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से 

बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर
बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है


जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधड़े-उधड़े हैं

कोई सफा पलटता है तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो सब अल्फ़ाज़
जिनपर अब कोई मानी नहीं उगते.


इसके बाद हमरे पास न कहने को कुछ बचा था, न सोचने को. हम आलमारी के अंदर अपना चेहरा ले जाकर, सब किताब को अपना होंठ से चूमे अऊर माथा से लगाए... हाथ जोडकर अपराधी के जइसा माथा नवा दिए.

आप लोग भी एक बार अपने मन में सोचिये अऊर एक बार प्यार से हाथ फेरिये ऊ सब किताब पर जिनसे आपका मुलाक़ात नहीं हुआ है. अच्छा लिखने के लिये अच्छा पढना बहुत जरूरी होता है.

ई ओही सब अच्छा पढाई का नतीजा है कि अपना तमाम ब्यास्तता के बावजूद भी हम आप लोग के लिये १८०० वाँ बुलेटिन लिखने का उत्साह जुटा पाए हैं. हमरा अनियमितता के लिये हमको माफ कीजिये, मगर ब्लॉग बुलेटिन के साथ प्यार बनाए रखिये.

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

किताबों की दुनिया -141

शताब्दी वर्ष पर देवदास...

ज़रा जब चाँद को थोड़ी तलब सिगरेट की उट्ठी...

प्रतीक्षा...........महाकवि हरिवंश राय बच्चन

युवा

पलायन

धम्म गंगा

पंचचूली बेस कैंप ट्रैक

तीसरी किताब (साँझा काव्य संग्रह) "कविता अभिराम"

किशन बाहेती : घुमक्कड़ी एक चलती फिरती पाठशाला है।

35A जैसे दमनकारी कानूनों का बोझ देश क्यों उठाए

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
 

16 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह। लाजवाब बुलेटिन सलिल जी । आभार किताब याद दिलाने के लिये।

सदा ने कहा…

हमेशा की तरह जबरदस्त पोस्ट .... अच्छा लिखने के लिये अच्छा पढना बहुत जरूरी होता है.👌
सहमत 🙏

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

बात को कही से शुरु करके बड़े सार्थक और रोचक तरीके से कहना आपका ही हुनर हो सकता है .

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

रोचक प्रस्तुति। बधाई।

yashoda Agrawal ने कहा…

अद्भुत 1800 वीं प्रस्तुति
शुभ कामनाएँ
सादर

दीपिका रानी ने कहा…

अच्छा लिखने के लिए अच्छा पढ़ना जरूरी है – वाकई। इस वेदवाक्य को अब बहुत कम लोग अपनाते हैं। लोगों को जल्दी-जल्दी लिखना है, मशहूर होना है। किताबें सच में बेहतरीन साथी होती हैं।

Digamber Naswa ने कहा…

वाह ... किताबों का दर्द आपने सही लिखा है ...
सुन्दर बुलेटिन ...

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत अच्छी बुलेटिन प्रस्तुति ...

Arun Roy ने कहा…


बाकी किताबों के कराहने की आवाज़ कम लोग सुन पाते हैं। अब तो किताबें विस्थापित हो रहे हैं, बेदखल हो रहे हैं घरों से। किताबें कराहें नहीं इसलिए अपने घर में किताबों को अलमीरा में नहीं रखे हैं. खुले में रहते हैं। खुशबू फैलाये रहते हैं ये।

सलिल जी कभी आप हमारी कविताओं के पहले पाठक हुआ करते थे। आपकी टिप्पणियाँ हमारे कविता की जान हुआ करती थी। आपने हमारे सैकड़ो कविताओं पर सार्थक कहा है। उनको कविता के साथ जोड़ लूं तो आधी किताब तक बन जाएगी। काफी दिनों बाद आपने हमारी कविता पढ़ी और इस सार्थक बुलेटिन में शामिल किया है। धन्यवाद कहते अच्छा नहीं लग रहा है। अपने आप कोई उपयुक्त शब्द ढूंढ लीजियेगा।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

"यादें" आज बनी होती तो शायद ऑस्कर भी पा जाती !

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

किताबी चेहरे ने कुछ देर के लिए ही सही इन अनमोल खजानों पर तरजीह पा ली हो पर पुस्तकें कभी चुप नहीं रह सकतीं !
2000वीं पर जल्द भेंट होगी।

Anita ने कहा…

वाह ! बहुत रोचक प्रस्तुति..आभार आज के बुलेटिन में मुझे शामिल करने के लिए..

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

अरुण जी! बहुत से ब्लॉग पोस्ट्स का मैं पहला और इकलौता पाठक और टिप्पणिकर्त्ता भी हुआ करता था! अब व्यस्तताओं ने कमर तोड़ रखी है! अपने ब्लॉग पर भी कुछ नहीं लिख पा रहा! ब्लॉग बुलेटिन से प्यार हो गया है! इसलिए इससे बेवफाई नहीं कर पाता! धन्यवाद आपके मुख से मेरे प्रति अस्वीकार्य होगा! अच्छी रचना पढ़ने का सौभाग्य प्रदान करना आपको धन्यवाद का पात्र बनाता है!
आदरणीय गगन शर्मा जी, 2000 वीं पोस्ट पर मिलने की बात कहकर पराया कर दिया! अभी तो 1850, 1900, 1950 और तब 2000. इस बीच भी कभी कलम कुलबुलाई तो यहाँ दिखूँगा, बस आपका आशीष मिलता रहे!!
सभी बुलेटिन पाठकों का ह्रदय से आभार!!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

अरुण जी! बहुत से ब्लॉग पोस्ट्स का मैं पहला और इकलौता पाठक और टिप्पणिकर्त्ता भी हुआ करता था! अब व्यस्तताओं ने कमर तोड़ रखी है! अपने ब्लॉग पर भी कुछ नहीं लिख पा रहा! ब्लॉग बुलेटिन से प्यार हो गया है! इसलिए इससे बेवफाई नहीं कर पाता! धन्यवाद आपके मुख से मेरे प्रति अस्वीकार्य होगा! अच्छी रचना पढ़ने का सौभाग्य प्रदान करना आपको धन्यवाद का पात्र बनाता है!
आदरणीय गगन शर्मा जी, 2000 वीं पोस्ट पर मिलने की बात कहकर पराया कर दिया! अभी तो 1850, 1900, 1950 और तब 2000. इस बीच भी कभी कलम कुलबुलाई तो यहाँ दिखूँगा, बस आपका आशीष मिलता रहे!!
सभी बुलेटिन पाठकों का ह्रदय से आभार!!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

सभी पाठकों और पूरी बुलेटिन टीम को १८०० वीं पोस्ट की हार्दिक बधाइयाँ |
ऐसे ही स्नेह बनाए रखिए |

सलिल दादा ,
प्रणाम |

मनोज भारती ने कहा…

अच्छी याद दिलाई !!!

एक टिप्पणी भेजें

बुलेटिन में हम ब्लॉग जगत की तमाम गतिविधियों ,लिखा पढी , कहा सुनी , कही अनकही , बहस -विमर्श , सब लेकर आए हैं , ये एक सूत्र भर है उन पोस्टों तक आपको पहुंचाने का जो बुलेटिन लगाने वाले की नज़र में आए , यदि ये आपको कमाल की पोस्टों तक ले जाता है तो हमारा श्रम सफ़ल हुआ । आने का शुक्रिया ... एक और बात आजकल गूगल पर कुछ समस्या के चलते आप की टिप्पणीयां कभी कभी तुरंत न छप कर स्पैम मे जा रही है ... तो चिंतित न हो थोड़ी देर से सही पर आप की टिप्पणी छपेगी जरूर!

लेखागार