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मंगलवार, 19 सितंबर 2017

फड़फड़ाते पन्नोँ जैसे ख्याल





लिखना मेरी आदत है
या तुमसे कुछ कहना
जान पाना थोड़ा मुश्किल है …
क्योंकि मैं तो आज भी लिखती हूँ
इधर-उधर पोस्ट भी करती हूँ
पढ़नेवाले पढ़ जाते हैं
लेकिन मैं संतुष्ट नहीं होती
मेरी तलाश तुम्हारी होती है …
आत्मा अमर है
तो तुम हो
दिल को बहलाने के लिए सही है बोलना
पर ....
वो जो अपनी चमकती आँखों से तुम कहती थी
'अरे वाह !"
और मेरी मुस्कान लम्बी सी हो जाती थी
वह नहीं होती !!!
एक-दो अपने ऐसे हैं
जिनके शब्द, जिनकी तारीफ मेरे लिए अहमियत रखती है
पर .... मुस्कान नहीं फैलती
'तुम नहीं हो कहीं' यह ख्याल
फड़फड़ाते पन्नों सा होता हैं
....
समझ रही हो न फड़फड़ाते पन्नोँ जैसे ख्याल को ?
बोलो ना


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सोमवार, 18 सितंबर 2017

जन्म दिवस : काका हाथरसी, श्रीकांत शर्मा और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को मेरा सादर नमस्कार। 
काका हाथरसी
काका हाथरसी (अंग्रेज़ी:Kaka Hathrasi) (वास्तविक नाम- प्रभुलाल गर्ग, जन्म- 18 सितंबर, 1906, हाथरस, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 18 सितंबर, 1995) भारत के प्रसिद्ध हिन्दी हास्य कवि थे। उन्हें हिन्दी हास्य व्यंग्य कविताओं का पर्याय माना जाता है। काका हाथरसी की शैली की छाप उनकी पीढ़ी के अन्य कवियों पर तो पड़ी ही थी, वर्तमान में भी अनेक लेखक और व्यंग्य कवि काका की रचनाओं की शैली अपनाकर लाखों श्रोताओं और पाठकों का मनोरंजन कर रहे हैं। उनकी रचनाएँ समाज में व्याप्त दोषों, कुरीतियों, भ्रष्टाचार और राजनीतिक कुशासन की ओर सबका ध्यान आकृष्ट करती हैं। भले ही काका हाथरसी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी हास्य कविताए, जिन्हें वे 'फुलझडियाँ' कहा करते थे, सदैव हमे गुदगुदाती रहेंगी।


श्रीकांत वर्मा
श्रीकांत वर्मा (अंग्रेज़ी: Shrikant Varma; जन्म- 18 सितम्बर, 1931, बिलासपुर, छत्तीसगढ़; मृत्यु- 26 मई, 1986, न्यूयार्क) हिन्दी साहित्य में कथाकार, गीतकार और एक समीक्षक के रूप में विशेष तौर पर जाने जाते हैं। राजनीति से भी ये जुड़े हुए थे और 1976 में राज्य सभा में निर्वाचित हुए थे। श्रीकांत वर्मा दिल्ली में पत्रकारिता से भी जुड़ गये थे। वर्ष 1965 से 1977 तक उन्होंने 'टाइम्स ऑफ़ इण्डिया' से निकलने वाली पत्रिका 'दिनमान' में संवाददाता की हैसियत से कार्य किया। श्रीकांत वर्मा भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी के काफ़ी क़रीब थे। श्रीकांत वर्मा को कई पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया था।



आज काका हाथरसी जी और श्रीकांत शर्मा जी के जन्म दिवस पर हम सब उन्हें स्मरण करते हुए शत शत नमन करते हैं।  


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~



















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

रविवार, 17 सितंबर 2017

जन्म दिवस : अनंत पई और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को मेरा सादर नमस्कार।

अनंत पई (17 सितम्बर 1929, कार्कल, कर्नाटक — 24 फरवरी 2011, मुंबई), जो अंकल पई के नाम से लोकप्रिय थे, भारतीय शिक्षाशास्री और कॉमिक्स, ख़ासकर अमर चित्र कथा श्रृंखला, के रचयिता थे । इंडिया बुक हाउज़ प्रकाशकों के साथ 1967 में शुरू की गई इस कॉमिक्स श्रृंखला के ज़रिए बच्चों को परंपरागत भारतीय लोक कथाएँ, पौराणिक कहानियाँ और ऐतिहासिक पात्रों की जीवनियाँ बताई गईं । 1980 में टिंकल नामक बच्चों के लिए पत्रिका उन्होंने रंग रेखा फ़ीचर्स, भारत का पहला कॉमिक और कार्टून सिंडिकेट, के नीचे शुरू की. 1998 तक यह सिंडिकेट चला, जिसके वो आख़िर तक निदेशक रहे ।

दिल का दौरा पड़ने से 24 फरवरी 2011 को शाम के 5 बजे अनंत पई का निधन हो गया ।

आज अमर चित्र कथा सालाना लगभग तीस लाख कॉमिक किताबें बेचता है, न सिर्फ़ अंग्रेजी में बल्कि 20 से अधिक भारतीय भाषाओं में । 1967 में अपनी शुरुआत से लेकर आज तक अमर चित्र कथा ने 10 करोड़ से भी ज़्यादा प्रतियाँ बेची हैं । 2007 में अमर चित्र कथा ACK Media द्वारा ख़रीदा गया ।




आज अनंत पई जी के 88वीं जयंती पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

शनिवार, 16 सितंबर 2017

श्रद्धांजलि : एयर मार्शल अर्जन सिंह और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को मेरा सादर नमस्कार।

वायु सेना के एयर मार्शल अर्जन सिंह का शनिवार को निधन हो गया। वह 98 वर्ष के थे. अर्जन सिंह को जब वायु सेना प्रमुख बनाया गया था तो उनकी उम्र उस वक्त महज 44 साल थी और आजादी के बाद पहली बार लड़ाई में उतरी भारतीय वायुसेना की कमान उनके ही हाथ में थी। पीएम नरेंद्र मोदी ने भी ट्वीट कर उनके निधन पर शोक जताया।
भारतीय वायुसेना के मार्शल अर्जन सिंह, डीएफसी, पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित (पंजाबी: ਅਰਜਨ ਸਿੰਘ) (15 अप्रैल 1 9 1 9 को अर्जन सिंह औलख के रूप में जन्म,मृत्यु 16 सितंबर 2017) भारतीय वायु सेना के एकमात्र अधिकारी हैं जिन्हें पांच सितारा रैंक में पदोन्नत किया गया था ,[2] उनका जन्म पंजाब के शहर लयालपुर, ब्रिटिश भारत ,अब फैसलाबाद, पाकिस्तान में हुआ था। जून 2008 में फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की मृत्यु के बाद वे पांच सितारा रैंक वाले अकेले भारतीय सैन्य अधिकारी हैं।



आज एयर मार्शल अर्जन सिंह जी के आकस्मिक निधन पर हम सब उन्हें मौन श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। जय हिन्द। जय भारत।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~




रेलगाड़ी

हिन्दी पर हाय-हाय क्यों?

हिंदी दिवस 2017 विशेष - हमारी राष्ट्रभाषा

व्यायाम कीजिये, अच्छा खाइये और स्वस्थ रहिये

जीवन की विरासत !!!

सुख या फिर ख़ुशी..

भूख

खाता नम्बर

स्वच्छ भारत

अभी अभी पैदा हुआ है बहुत जरुरी है बच्चा दिखाना जरूरी है


आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। जय हिन्द। जय भारत।।

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

मिग बज्ज


मिग बज्ज एक शंखनाद ब्लॉग, ब्लोगर्स के लिए  ... www.migbuzz.com

ये बड़ी ख़ुशी की बात है कि  ललित चहर जी https://www.facebook.com/info.chahar , जिन्होंने 2013 से ब्लॉग्स पढ़ना शुरू किया, तो उन्हें ब्लॉग में सम्भावनाएं दिखीं।  मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहे इस युवा ने तय किया कि कुछ कर दिखाना है,  .... जब भी हम पहला कदम उठाते हैं तो कई तरह की प्रतिक्रियाएँ होती हैं - कोई खुश होता है, कोई सोचता है 'गिर जायेगा', कोई हाथ थाम लेता है  ... 
मुझे हमेशा यही लगता है कि यदि कोई एक कदम बढाए तो सौ क़दमों को उसकी ताकत बन जाना चाहिए ! नकारात्मकता से ऊपर उठकर आशा की किरणों को आने देना चाहिए !
आइये हम मिलकर इस युवा के रास्तों को समतल बनायें, बीच बीच में ब्रेकर मिलेंगे - यह समझायें, उसे किस तरह  करना होगा - इसका हल बतायें  :)

ललित जी से बस इतना कहना चाहूँगी कि हरिवंश राय बच्चन की इन पंक्तियों को कभी ना भूलें -







आज मैं कुछ ब्लॉग्स लेकर आई हूँ, जिन्हें पढ़ना आपको अच्छा लगेगा 


गुरुवार, 14 सितंबर 2017

हिन्दी ध्वजा फहराने का, दिल में एक अरमान रहे - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार दोस्तो,
आज, १४ सितम्बर, हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है। हमारे देश में आज के दिन हिन्दी दिवस क्यों मनाया जाता है, ये आप सबको पता है (अच्छे से पता होगा क्योंकि हर साल दिवस, सप्ताह, पखवाड़ा, माह के नाम पर अच्छे से रटवा दिया जाता है), हमें भी पता है। जब पता ही है तो फिर इस पर चर्चा नहीं। अब आज के दिन यदि हिन्दी पर ही चर्चा नहीं तो किस पर चर्चा? तो चर्चा न करते हुए हिन्दी पर स्व-रचित कविता.... आप सबके लिए। पढ़िए इसे और आनंद लीजिये आज की बुलेटिन का।


++
  
अपनी धरती, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा का अभिमान रहे।
हिन्दी ध्वजा फहराने का, दिल में एक अरमान रहे।।

दिव्य-दिव्य कंठों से मुखरित,
संस्कृत की संस्कृति से पल्लवित,
युगों-युगों से जो है सुरभित,
जन-जन में है जो प्रतिष्ठित,
उस गौरव गाथा का, पल-पल हमको भान रहे।
हिन्दी ध्वजा फहराने का, दिल में एक अरमान रहे।।

वाणी सूर कबीर तुलसी की,
दिव्य ज्ञान है आज भी देती,
प्रसाद निराला और महादेवी,
हैं कितने ही भाषा के प्रहरी,
हिन्दी भाषी आभामण्डल, बना सदा दैदीप्यमान रहे।
हिन्दी ध्वजा फहराने का, दिल में एक अरमान रहे।।

धर्म कर्म ज्ञान योग में समृद्ध,
वैभव निज भाषा का उन्नत,
सोचो क्यों कर बैठे विस्मृत,
बिन निजता क्या होंगे विकसित,
संस्कार और मर्यादा की, बनी हमेशा शान रहे।
हिन्दी ध्वजा फहराने का, दिल में एक अरमान रहे।।

ज्ञानदायिनी उनकी भाषा
दुष्प्रचार में लगे हुए हैं,
जिससे सीखा सकल विश्व ने
उस भाषा को भुला रहे हैं,
ओढ़ आवरण गैरों का हम
खुद अपने को मिटा रहे हैं,
लिए खड़े हैं बैशाखी और
धोखा है कि दौड़ रहे हैं,
एक राष्ट्र और एक निशान की, अपनी एक पहचान रहे।
हिन्दी ध्वजा फहराने का, दिल में एक अरमान रहे।।

++++++++++













बुधवार, 13 सितंबर 2017

रामास्वामी परमेस्वरन और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को मेरा सादर नमस्कार।
मेजर रामास्वामी परमेस्वरन
मेजर रामास्वामी परमेस्वरन (अंग्रेज़ी: Major Ramaswamy Parameshwaran, जन्म: 13 सितम्बर, 1946; शहादत: 25 नवम्बर, 1987) परमवीर चक्र से सम्मानित भारतीय थे। उन्हें यह सम्मान सन 1987 में मरणोपरांत मिला। भारत की सेनाओं ने हमेशा युद्ध के लिए हथियार नहीं उठाए बल्कि ऐसा भी मौका आया, जब उसकी भूमिका विश्व स्तर पर शांति बनाए रखने की रही। श्रीलंका में ऐसे ही उदाहरण के साथ भारत का नाम जुड़ा हुआ है। विस्तृत इतिहास के बीच एक प्रसंग 'ऑपरेशन पवन' का है, जो 1987 से 1990 तक श्रीलंका में चला, जिसमें भारतीय सेना के वीर मेजर रामास्वामी परमेस्वरन ने शांति विरोधी तत्वों के हाथों अपने प्राण गँवाए और इसके लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा परमवीर चक्र प्रदान किया गया।

जीवन परिचय

मेजर रामास्वामी परमेस्वरन का जन्म 13 सितम्बर 1946 में बम्बई में हुआ था। सेना में कमीशंड अधिकारी के रूप में वह महार रेजिमेंट में 16 जनवरी, 1972 को आए थे। उन्होंने मिजोरम तथा त्रिपुरा में युद्ध में भाग लिया था। वह अपने स्वभाव में अनुशासन तथा सहनशीलता के कारण बहुत लोकप्रिय अधिकारी थे और उन्हें उनके साथी 'पेरी साहब' कहा करते थे।

तमिल ईलम की माँग 

श्रीलंका में शांति भंग की समस्या की जड़ में वहाँ के निवासी सिंघली तथा तमिलों के बीच का द्वन्द्व है। तमिल लोग वहाँ पर अल्पसंख्यकों के रूप में बसे हैं। आंकड़े बताते हैं कि तमिल श्रीलंका की कुल आबादी का केवल 18 प्रतिशत हिस्सा हैं और श्रीलंका की सिंघली बहुल सरकार की ओर से तमिलों के हितों की अनदेखी होती रही है। इससे तमिलों में असंतोष की भावना इतनी भरती गई कि उसने विद्राह का रूप ले लिया और वह स्वतंत्र राज्य तमिल ईलम की माँग के साथ उग्र हो गया। स्पष्ट है कि श्रीलंका इस प्रकार की उग्र तथा विघटनकारी भावना का दमन करती। इस दमन चक्र का परिणाम यह हुआ कि श्रीलंका से तमिल नागरीक बतौर शरणार्थी भारत के तमिलनाडु में भागकर आने लगे। यह स्थिति भारत के लिए अनुकूल नहीं थी। ऐसे में 29 जुलाई, 1987 को भारत और श्रीलंका के बीच एक अनुबंध हुआ, जिसमें श्रीलंका के कई तमिल प्रतिनिधि भी साथ लिए गए। इस अनुबंध के अनुसार भारत की इण्डियन पीस कीपिंग फोर्स (IPKF) का श्रीलंका जाना तय हुआ जहाँ वह तमिल उग्रवादियों का सामना करते हुए वहाँ शांति बनाने का काम करें ताकि श्रीलंका से भारत की ओर शरणार्थियों का आना रुक जाए।

टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (LTTE) 

इस IPKF अर्थात् भारतीय शांति सेना ने सभी उग्रवादीयों से हथियार डालने का दवाब वनाया, जिसमें वह काफ़ी हद तक सफल भी हुई लेकिन तमिल ईलम का उग्रवादी संगठन LTTE अर्थात् टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम इस काम में कुटिलता बरत गया। उसने पूरी तरह से हथियार न डाल कर अपनी नीति बदल ली और उन्होंने आत्मघाती दस्तों का गठन करके गोरिल्ला युद्ध शिल्प अपना लिया। 5 अक्टूबर, 1987 को टाइगर्स की ओर से ऐसा ही कृत्य देखने को मिला। ऐसी स्थिति में भारत की शांति सेना की भूमिका बदल गई। खुद को टाइगर्स के हमले से बचने के लिए उन्हें भी सतर्क योद्धा का तरीक़ा अपनाना पड़ा और वहाँ भी युद्ध जैसी स्थिति आने से बच नहीं पाई।

ऑपरेशन पवन

इसी शांति सेना की भूमिका में 8 महार बटालियन से मेजर रामास्वामी परमेस्वरन श्रीलंका पहुँचे थे। उनके साथ 91 इंफेंटरी ब्रिगेड तथा 54 इंफेंटरी डिविजन था और उनके इस लक्ष्य का नाम 'ऑपरेशन पवन' दिया गया था। यह ग्रुप 30 जुलाई, 1987 को ही, यानी अनुबंध होने के अगले ही दिन श्रीलंका पहुँचा था और जाफ़ना पेनिनसुला में तैनात हुआ था वहाँ पहुँचते ही इन्हें कई मोर्चों पर टाइगर्स का सामना करना पड़ा था, जिनमें मरुथनामादास, तथा कंतारोदाई प्रमुख कहे जा सकते हैं। 24 नवम्बर, 1987 को इस बटालियन को, जिसकी अगुवाई मेजर रामास्वामी कर रहे थे, सूचना मिली कि कंतारोताई के एक गाँव में शस्त्र तथा गोलाबारूद का एक जखीरा किसी घर में उतारा गया है। सूचना मिलते ही कैप्टन डी. आर. शर्मा के साथ 20 सैनिकों का एक दल इस सूचना की सत्यता और उससे जुड़े तथ्य पता करने रवाना कर दिया गया। इस गस्ती दल पर, उस संदिग्ध घर के पास एक मन्दिर के परिसर से गोली बरसाई गई जिससे इस दल को भी गोलियां चलानी पड़ीं। उस समय भारत की बटालियन उडूविल में थी। वहाँ इस दल ने सूचना भेजी कि संदिग्य मकान में टाइगर्स का अड्डा है और वहाँ इनकी गिनती हमारे अनुमान से कहीं ज्यादा है। इस सूचना के आधार पर मेजर रामास्वामी तथा 'सी' कम्पनी के कमाण्डर ने यह तय किया कि इस स्थिति का मुकाबला नियोजित ढंग से किया जाना चाहिए। उन्होंने मजबूर गश्ती दल के साथ-साथ साढ़े 8 बजे कैप्टन शर्मा के दल के साथ मिलने के लिए कूच किया ताकि उस संदिग्ध मकान पर कार्यवाही की जा सके। मेजर रामास्वामी का पूरा दल उस मकान के पास रात को डेढ़ बजे 25 नवम्बर 1987 को पहुँच गया। वहाँ कोई हलचल उन्हें नजर नहीं आई, सिवाय इसके कि एक ख़ाली ट्रक घर के पास खड़ा हुआ था। मेजर रामास्वामी के दल ने उस मकान की घेरा बन्दी कर ली और तय किया कि सवेरे रौशनी की पहली किरण के साथ ही वहाँ तलाशी अभियान शुरू कर दिया जाएगा।

सुबह पाँच बजे तलाशी का काम शुरू हुआ लेकिन वहाँ कुछ भी नहीं मिला। आखिर वे लोग वापस चल पड़े। तभी मन्दिर के बगीचे से गोलाबारी शुरू हो गई। इस दल ने भी जवाबी कार्यवाही की। दुश्मन की अचानक गोलाबारी से इस दल का एक जवान मारा गया था और एक घायल हो गया था। इस पर मेजर रामास्वामी तथा कैप्टन शर्मा ने अपनी रणनीति तय की और उसके हिसाब से कार्यवाही शुरू की। इस दौरान मन्दिर की बगिया और वहाँ नारियल के झुरमुटों के बीच से दुश्मन गोलाबारी कर रहा था। इसी का सामना करते हुए जब मेजर रामास्वामी नारियल के बाग के सामने पहुँचे तो उनका सामना उग्रवादी टाइगर्स से हो गया और स्थिति आमने-सामने की मुठभेड़ की बन गई। तभी अचानक एक उग्रवादी की राइफल से छूट कर एक गोली सीधे मेजर रामास्वामी परमेस्वरन की छाती पर लागी। यह एक प्राणघाती हमला था लेकिन रामास्वामी ने इसकी परवाह किए बगैर उस उग्रवादी से झपट कर उसकी राइफल छीनी और उसी दुश्मन का काम तमाम कर दिया। छाती पर गोली लगने से मेजर रामास्वामी परमेस्वरन निढाल हो गए थे, तब भी वह साहस पूर्ण नेतृत्व क्षमता दिखाते हुए अपने दल को निर्देश देते रहे उनके दल ने फुर्ती से दुश्मन को घेर लिया था और दुश्मन भी समझ गया था कि अब वह आक्रामक रुख नहीं अपनाए रह सकता। उसने तुरंत पैंतरा बदल और जंगल की तरफ भागने के लिए रुख किया, फिर भी भारत के, जवानों ने इनमें से छह उग्रवादी तमिल ईलमों को मार गिराया तथा उनसे तीन ए. के. 47 राइफल्स तथा दो रॉकेट लांचर्स हथिया लिए जिनमें बम भी लगे हुए थे। इस तरह से वीरतापूर्वक मेजर रामास्वामी परमेस्वरन श्रीलंका के 'ऑपरेशन पवन' में शहीद हो गए और उन्होंने भारत सरकार का युद्ध में दिया जाने वाला सर्वश्रेष्ठ सम्मान परमवीर चक्र प्राप्त किया। 25 नवम्बर, 1987 को 46 वर्ष की आयु में पराक्रमी रामास्वामी वीरगति को प्राप्त हुए लेकिन उन्होंने देश के हित में एक आदर्श स्थापित किया।


आज रामास्वामी परमेस्वरन जी की 71वीं जयंती पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं। सादर।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

फिरोज गाँधी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को मेरा सादर नमस्कार।
फ़ीरोज़ गाँधी
फिरोज़ गाँधी (अंग्रेज़ी:Feroze Gandhi, जन्म: 12 सितम्बर, 1912, मुम्बई; मृत्यु- 8 सितम्बर, 1960, दिल्ली) प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और लोकसभा के प्रभावशाली सदस्य थे। वे भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के पति थे। अगस्त, 1942 में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में फिरोज़ गाँधी कुछ समय तक भूमिगत रहने के बाद गिरफ़्तार कर लिए गए थे। रिहा होने के बाद 1946 में उन्होंने लखनऊ के दैनिक पत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ के प्रबन्ध निर्देशक का पद सम्भाला।

स्वतंत्रता सेनानी फिरोज़ गाँधी का जन्म 12 सितम्बर, 1912 ई. को मुम्बई के एक अस्पताल में पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम जहाँगीर एवं माता का नाम रतिमाई था। 1915 ई. में वे अपनी माँ के साथ इलाहाबाद में कार्यरत एक सम्बन्धी महिला के पास आ गए। इस प्रकार उनकी आरम्भिक शिक्षा-दीक्षा इलाहाबाद में हुई। इलाहाबाद उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों का केन्द्र था। युवक फिरोज़ गाँधी इसके प्रभाव में आए और नेहरू परिवार से भी उनका सम्पर्क हुआ। उन्होंने 1928 ई. में साइमन कमीशन के बहिष्कार में भाग लिया तथा 1930-1932 के आन्दोलन में जेल की सज़ा काटी। फिरोज़ गाँधी 1935 में आगे के अध्ययन के लिए लंदन गए और उन्होंने ‘स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स’ से अंतर्राष्ट्रीय क़ानून में स्नातक की डिग्री प्राप्त की।



आज हम सब फिरोज गाँधी जी के 105वीं जयंती पर शत शत नमन करते हैं।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

रविवार, 10 सितंबर 2017

सबको सबका ख़ौफ़ है ... !!!


ज़िंदा कौन है ? 
पूरी ज़मीर कब्र है 
भूतों का बसेरा है 
सबको सबका ख़ौफ़ है  ... !!!
........ 
ज़िक्र किस इतिहास का करें ?
वर्तमान सत्य है 
वर्तमान को जीना है 
घिनौना ही सही !!!
...... 
कोई ज़िंदा नहीं , सबके सब बुद्धिजीवी हैं  
बुद्धिजीवी !!!



बच्चों का यौन उत्पीड़न १९८७ में भी था..... ऐसे ही मार डाला गया था मेरे पड़ोसी के १२ साल के लड़के को ईंट से कूचकर, वह भी स्कूल के लिए घर से निकला था, बस पर बैठकर अपने पापा को बाय किया था और छुट्टी के बाद घर नहीं पहुँचा था... रात में पता चला कि फलां स्थान पर से एक बॉडी मॉर्च्युरी ले जायी गयी है... कई रात कॉलोनी में कोई नहीं सो पाया था .......... यौनकुंठित हत्यारा कोई तीस साल का था ........वह पकड़ा गया था......पता चला था कि वह बच्चा उनके गैंग का शिकार हो गया था और बाद में घर में बताने की धमकी पर वह डर गया था कि मम्मी पापा क्या कहेंगे? जाने कितने दिनों तक वह मासूम उनकी दरिंदगी झेलता रहा था लेकिन हत्या के दिन उसने जाने किस बात पर हिम्मत करके उन लोगों की शिकायत करने की धमकी दे दी और वहाँ से भागा और बस उन नाराज़ दरिंदों में से एक ने उसे दिन दहाड़े सड़क पर दौड़ाया और पीछे से ईंटें मारता रहा.... जब तक कि वह मासूम मर नहीं गया.........उस समय बड़ी दबी छुपी सी ये खबर अखबारों में आयी थी.......... तब मैंने पहली बार इस बाबत कुछ जाना था...... आश्चर्यचकित रह गयी थी.... तब सोच भी नहीं पायी थी कि यौनजनित कुंठा किसी आदमी में इस कदर भी हो सकती है कि लड़के, लड़कियाँ, जानवर, हिंजड़ा इन्हें कुछ भी मिल जाये....... हद है बच्चे, बूढ़े कुछ भी | मर जाओं सालों ..........अगर ये मानसिक विकृति है तो ये उस व्यक्ति के परिवार वालों के लिए भी खतरनाक है.......




शशि पाधा
तस्वीरें बोलती हैं ------
वर्ष 1965 में भारत – पाक युद्ध चल रहा था | मेरे पति उस समय अपनी यूनिट के साथ अमृतसर –लाहौर सीमा पर तैनात थे | 20 दिन के घमासान युद्ध के बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तान का बहुत सा क्षेत्र जीत लिया था | इच्छोगिल नहर पर बसा हुआ बरकी गाँव लाहौर से लगभग 13/14 किलोमीटर दूर था और युद्ध के समय भारतीय सेना वहाँ तक पहुँच गई थी | अब यह क्षेत्र और इसके आस पास के क्षेत्र भारतीय सेना के अधीन थे | युद्ध अपने पूरे वेग पर था | इस गाँव के निवासी अपनी सुरक्षा के लिए गाँव छोड़ कर किन्हीं सुरक्षित स्थानों की ओर चले गए थे | किन्तु कुछ बूढ़े और असहाय निवासी अपना गाँव छोड़ कर नहीं जाना चाहते थे | २३ सितम्बर को युद्ध विराम की घोषणा भी हो गई थी | अब बरकी गाँव के बचे-खुचे निवासी भारतीय सेना के मेहमान थे | भारतीय सैनिक उनकी सेवा करते, दवा दारू देते और हर परिस्थिति में उनकी सहायता कर रहे थे | इस तस्वीर में बंद वृद्ध दम्पति किसी भी हालत में अपना गाँव छोड़ कर नहीं जाना चाहते थे | वृद्ध पुरुष का नाम था चिरागदीन | उनकी पत्नी काफी अस्वस्थ थीं और वो कहीं जाने में असमर्थ थीं | उन्हें शायद शान्ति की उम्मीद भी थी |
एक दिन मेरे पति इस दम्पति से बातचीत कर रहे थे कि उस वृद्ध पुरुष ने इन्हें बताया कि उसका जन्म पंजाब के जालन्धर जिले के किसी गाँव में हुआ था | उसे अपने जन्मस्थान की, अपने बचपन के घर की बहुत याद सताती रहती है | यह बात कहते हुए मेरे पति ने देखा कि उस वृद्ध की ऑंखें अश्रुपूर्ण थी | आते -आते इन्होने जब उससे पूछा कि क्या उन्हें किसी चीज़ की ज़रुरत है तो उसने हाथ जोड़ कर कहा,” साहब , आप मुझे एक बार मेरे गाँव में ले जाइए | मैं मरने से पहले अपना जन्म स्थान देखना चाहता हूँ |” उसकी इच्छा पूरी करने में कुछ कठिनाइयाँ तो थी किन्तु मेरे सहृदय पति ने एक दिन उसे एक फौजी जेकेट पहनाई, गाड़ी में बिठाया और ले गए उसे उसके गाँव | उस पाकिस्तानी वृद्ध की खुशियों का विवरण तो मैं शब्दों में नहीं दे सकती | आप केवल उसे महसूस कर सकते हैं | वापिस आकर जब मेरे पति ने उनसे विदा ली तो उसने दोनों हाथ आसमान की ओर उठा कर इन्हें दीर्घ आयु का आशीर्वाद दिया |
लगभग छह महीनों के बाद ताशकंद समझौते के बाद भारतीय सेना को यह क्षेत्र पाकिस्तान को वापिस लौटाना था | मेरे पति इस वृद्ध दम्पति से मिलने गए | उन्होंने इन्हें बड़े स्नेह से गले लगाया, तस्वीर लेने को कहा और साथ में भेंट किया एक मिटटी का कटोरा और कुरान शरीफ की एक प्रति | विदा के समय दोनों की आँखें नाम थीं |
अब आप ही बताएँ कि इस युद्ध मे किसकी हार –किसकी जीत ?????

परहित सरिस धर्म नहीं भाई..

१० सितंबर समर्पित है परमवीरों को

रास बिहारी बोस का पत्र सुभाष के नाम

माँ

वर्तुल धारा

शनिवार, 9 सितंबर 2017

डॉ॰ वर्गीज़ कुरियन - 'फादर ऑफ़ द वाइट रेवोलुशन'

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

डॉ॰ वर्गीज़ कुरियन (26 नवम्बर 1921 - 9 सितंबर 2012) एक प्रसिद्ध भारतीय सामाजिक उद्यमी थे और 'फादर ऑफ़ द वाइट रेवोलुशन' के नाम से अपने 'बिलियन लीटर आईडिया' (ऑपरेशन फ्लड) - विश्व का सबसे बड़ा कृषि विकास कार्यक्रम - के लिए आज भी मशहूर हैं। इस ऑपरेशन ने 1998 में भारत को अमरीका से भी ज़यादा तरक्की दी और दूध -अपूर्ण देश से दूध का सबसे बड़ा उत्पादक बना दिया| डेयरी खेती भारत की सबसे बड़ी आत्मनिर्भर उद्योग बन गयी। उन्होंने पदभार संभालकर भारत को खाद्य तेलों के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता दी। उन्होंने लगभग 30 संस्थाओं की स्थापना की (AMUL, GCMMF, IRMA, NDDB) जो किसानों द्वारा प्रबंधित हैं और पेशेवरों द्वारा चलाये जा रहे हैं। गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन संघ (GCMMF), का संस्थापक अध्यक्ष होने के नाते डॉ॰ कुरियन अमूल इंडिया के उत्पादों के सृजन के लिए ज़िम्मेदार थे। अमूल की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी कि उन्होंने प्रमुख दुग्ध उत्पादक राष्ट्रों में गाय के बजाय भैंस के दूध का पाउडर उपलब्ध करवाया| डॉ॰ कुरियन की अमूल से जुडी उपलब्धियों के परिणाम स्वरुप तब प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने उन्हें 1965 में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड का संस्थापक अध्यक्ष नियुक्त किया तांकि वे राष्ट्रव्यापी अमूल के "आनंद मॉडल" को दोहरा सकें. विश्व में सहकारी आंदोलन के सबसे महानतम समर्थकों में से एक, डॉ॰ कुरियन ने भारत ही नहीं बल्कि अन्य देशों में लाखों लोगों को गरीबी के जाल से बाहर निकाला है। डॉ॰ कुरियन को पद्म विभूषण (भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान), विश्व खाद्य पुरस्कार और सामुदायिक नेतृत्व के लिए मैगसेसे पुरस्कार सहित कई पुरुस्कारों से सम्मानित किया गया था|

आज उनकी पाँचवीं पुण्यतिथि के अवसर पर ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से हम सब डॉ॰ कुरियन को  शत शत नमन करते हैं |

सादर आपका

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बुद्धा..चाइनिज मन्दिर-सारनाथ

एक उम्मीद जरूरी है जीने के लिए

अगर रवीश कुमार ने पीएम को गुंडा नहीं कहा तो सवाल है कि....?

558. हिसाब-किताब के रिश्ते

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कब और कैसे हुई ?

छोड़ दे माजी के ग़म रोता है क्या

अमर शहीद कैप्टन विक्रम 'शेरशाह' बत्रा जी की ४३ वीं जयंती

महाभारत की लोककथा - भाग 24

२७६. पिता

डिज़ाइनर नेता और स्तरहीन पत्रकारिता

चित्रकथा - 35: शायर व गीतकार ज़फ़र गोरखपुरी का फ़िल्म संगीत में योगदान

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस २०१७

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस:- इस साल भी पिछले साल की जेसे ही अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस 2017, शुक्रवार 8 सितंबर को मनाया गया|

अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस का इतिहास के बारे में जाने
युनेस्को ने 7 नवंबर 1965 में एक ऐसा फैसला किया कि अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस हर वर्ष 8 सितंबर को मनाया जाएगा जोकि पहली बार 1966 से मनाना शुरु हुआ था | हमारे समाज, व्यक्ति और समुदाय के लिये साक्षरता के बड़े महत्व को ध्यान दिलाने के लिये पूरे विश्व भर में इसे मनाना शुरु किया गया। समुदाय में  बच्चे व बड़ो को शिक्षा और साक्षरता की दर को दुबारा से एक बार ध्यान दिलाने के लिये इस दिन को खासतौर पुरे विश्वव में ही मनाया जाता है।

अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस २०१७ 
हमारे देश में शिक्षा पर वैश्विक निगरानी रिपोर्ट के अनुसार ये ध्यान देने योग्य बात है कि हर पाँच में से एक पुरुष और दो-तिहाई महिलाएँ अनपढ़ है। उनमें से कुछ के पास कम साक्षरता कौशल है, कुछ बच्चों की पहुँच आज भी स्कूलों से बाहर है और कुछ बच्चे स्कूलों में अनियमित रहते हैं। लगभग 58.6% की सबसे कम वयस्क साक्षरता दर दक्षिण और पश्चिम एशिया के नाम है। बुरकिना फासो, माली और नाइजर वो देश है जहाँ सबसे कम साक्षरता दर है।

यह पूरे विश्व में शिक्षा की खास विषय-वस्तु, कार्यक्रम और लक्ष्य से साथ मनाया जाता है। वर्ष 2007 और 2008 में इस दिन की विषय-वस्तु साक्षरता और स्वास्थ्य था (टीबी, कॉलेरा, एचआईवी और मलेरिया जैसी फैलने वाली बीमारी से लोगों को बचाने के लिये महामारी के ऊपर मजबूत ध्यान देने के लिये)। वर्ष 2009 और 2010 का मुद्दा साक्षरता और महिला सशक्तिकरण था जबकि 2011 और 2012 के इस उत्सव का विषय साक्षरता और शांति था।

अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस क्यों मनाया जाता है :-
अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस को मनाने का उद्देश्य साक्षरता की दिशा में लोगों का ध्यान खींचना और सामाजिक और मानव विकास के लिए उसके अधिकारों का ज्ञान देना है | सफलता के साक्षरता उतना ही महत्वपूर्ण है जितना जीवित रहने के लिए खाद्य पदार्थ है | यह गरीबी उन्मूलन (poverty), बाल मृत्यु (child mortality) दर को कम करने, जनसंख्या वृद्धि (population growth) को नियंत्रित करने, लैंगिक समानता ( gender equality) की प्राप्ति आदि के लिए भी आवश्यक है | साक्षरता में व्यक्ति को अपनी पारिवारिक स्थिति और देश को अपना दर्जा बढ़ाने की क्षमता है | यह दिन सतत शिक्षा प्राप्त करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने और परिवार , समाज और देश के लिए अपनी जिम्मेदारियों को समझने के लिए मनाया जाता है |

ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से आप सभी को अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं |

सादर आपका

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मैट्रो के डिब्बों में 'आसन व्यवस्था' की नई परिकल्पना !

तर्पण मेरा इस पितृपक्ष मे !!!

माँ दुर्गा के नव-रूप के श्लोक

ठर्रा विद ठाकुरः एवरीबडी लव्स अ गुड बाढ़

जनता फटेहाल...नेता मालामाल

पोंटहा जरदोह

हत्यारा

......पीढ़ियाँ आती रहेंगी :))

स्व ॰ भूपेन हजारिका की ९१ वीं जयंती

गौरी लंकेश की हत्या एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना

गौरी लंकेश हत्याकाण्ड : विरोध या सियासत

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

नीरजा - हीरोइन ऑफ हाईजैक और ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार दोस्तो,
आज साहसी महिला, नीरजा भनोट का जन्मदिन है जिसे अशोक चक्र से सम्मानित किया गया. इनका जन्म 7 सितंबर 1963 को चंडीगढ़ पंजाब में हुआ था. आपके पिता हरीश भनोट मुंबई में पत्रकारिता क्षेत्र में थे. नीरजा की प्रारंभिक शिक्षा अपने गृहनगर चंडीगढ़ में हुई, इसके बाद की शिक्षा मुम्बई में हुई. वर्ष 1985 में उनका विवाह संपन्न हुआ किन्तु रिश्ते में स्नेह-प्रेम न होने के चलते वे विवाह के दो महीने बाद ही मुंबई आ गयीं. इसके बाद उन्होंने पैन एम एयरलाइंस में नौकरी के लिये आवेदन किया और ट्रेनिंग पश्चात् एयर होस्टेज के रूप में काम करने लगीं. 


5 सितम्बर को पैन एम 73 विमान लगभग 400 यात्रियों को लिए पाकिस्तान के कराची एयरपोर्ट पर अपने पायलट के इंतजार में खड़ा था. तभी 4 आतंकवादियों ने पूरे विमान को गन प्वांइट पर ले लिया. उन्होंने पाकिस्तानी सरकार पर दबाव बनाया कि विमान में पायलट को जल्दी भेजा जाये. पाकिस्तानी सरकार ने ऐसा करने से मना कर दिया. तब आतंकियों ने नीरजा और उसकी सहयोगियों को सभी यात्रियों के पासपोर्ट एकत्रित करने का आदेश दिया ताकि वह किसी अमरीकी नागरिक को मारने की धमकी से पाकिस्तान पर दबाव बना सकें. नीरजा ने विमान में बैठे 5 अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छुपाकर बाकी सभी पासपोर्ट आतंकियों को सौंप दिये. फिर आतंकियों ने एक ब्रिटिश को मारने की धमकी दी किन्तु नीरजा ने उस आतंकी से सूझबूझ से बात करके ब्रिटिश नागरिक को बचा लिया. धीरे-धीरे 16 घंटे बीत गये. अचानक नीरजा को ध्यान आया कि विमान में ईंधन किसी भी समय समाप्त हो सकता है और उसके बाद अंधेरा हो जायेगा, तब यात्रियों को बचाना आसान होगा. ऐसा विचार आते ही उन्होंने अपनी सहपरिचायिकाओं को यात्रियों को खाना और साथ में विमान के आपातकालीन द्वारों के बारे में समझाने वाला कार्ड भी देने को कहा.

नीरजा ने जैसा सोचा था वैसा ही हुआ. विमान का ईंधन समाप्त होते ही चारों ओर अंधेरा छा गया. नीरजा ने विमान के सारे आपातकालीन द्वार खोल दिये. सभी यात्री भी आपातकालीन द्वार पहचान चुके थे. योजना के अनुसार सारे यात्री उन द्वारों से नीचे कूदने लगे. यह देख आतंकियों ने अंधेरे में ही फायरिंग शुरू कर दी. नीरजा के सावधानी भरे कदम से कोई यात्री मारा नहीं गया. हां, कुछ घायल अवश्य हो गये थे. इस बीच पाकिस्तानी सेना के कमांडो विमान में आ गए थे. उन्होंने तीन आतंकियों को मार गिराया. सबसे अंत में नीरजा निकलने को हुई तभी उन्हें बच्चों के रोने की आवाज सुनाई दी. वे उन बच्चों को खोज कर आपातकालीन द्वार की ओर बढीं तभी बचे हुए चौथे आतंकवादी ने गोलीबारी शुरू कर दी. नीरजा बच्चों को आपातकालीन द्वार की ओर धकेल कर उस आतंकी से भिड़ गईं. यद्यपि उस चौथे आतंकी को पाकिस्तानी कमांडों ने मार गिराया तथापि वे नीरजा को न बचा सके. 5 सितम्बर 1986 को मात्र 23 वर्ष की उम्र में नीरजा अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए शहीद हो गई.


नीरजा देश की पहली महिला हैं जिन्हें भारत सरकार ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान अशोक चक्र से सम्मानित किया. पाकिस्तान सरकार ने भी नीरजा को तमगा-ए-इन्सानियत प्रदान किया. भारत सरकार ने सन 2004 में नीरजा के सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीरजा का नाम हीरोइन ऑफ हाईजैक के रूप में मशहूर है. वर्ष 2005 में अमेरिका ने उन्हें जस्टिस फॉर क्राइम अवार्ड दिया. उनकी स्मृति में मुम्बई के घाटकोपर इलाके में एक चौराहे का नामकरण किया गया, जिसका उद्घाटन अमिताभ बच्चन ने किया. नीरजा के साहसिक कार्य और उनके बलिदान को याद रखने के लिये राम माधवानी के निर्देशन में नीरजा फ़िल्म का निर्माण किया गया. इस फ़िल्म में नीरजा का किरदार अभिनेत्री सोनम कपूर ने निभाया. इस फिल्म को 19 फ़रवरी 2016 को रिलीज किया गया.

आज इस साहसी महिला के जन्मदिन पर ब्लॉग बुलेटिन परिवार अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित करता है.

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