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शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

'महाकाल' की विलुप्तता के ७२ वर्ष - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों ,
प्रणाम |

 
"मृतक ने तुमसे कुछ नहीं लिया | वह अपने लिए कुछ नहीं चाहता था | 
उसने अपने को देश को समर्पित कर दिया और स्वयं विलुप्तता मे चला गया |"
 
18/08/1945 - 18/08/2017

आज़ादी के बाद कॉंग्रेस नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को इतिहास मे दफ़न कर चुकी थी ... वो नहीं चाहते थे कि नेताजी का कहीं कोई जिक्र भी आए ... और सालों तक हुआ भी ऐसा ... भाजपा सरकार के आने पर उम्मीद थी कि उपेक्षा का यह दौर हटेगा ... और काफ़ी हद तक ये हटा भी पर यह क्या जिस तारीख़ पर इतना विवाद है कि भारत सरकार के 3 3 आयोग उस तारीख़ को साबित नहीं कर पाये आज उसी 18 अगस्त को केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रियों द्वारा सुबह से नेताजी की पुण्यतिथि के रूप में मनाया गया |

हम इस का पुरजोर विरोध करते हैं ... बिना सभी तथ्यों के खुलासे के आप कैसे आधिकारिक रूप मे 18 अगस्त को नेताजी बोस की पुण्यतिथि बता सकते हैं ... साथ साथ हमारी यह मांग है कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से जुड़े सभी ... जी हाँ ... सभी दस्तावेज़ जल्द से जल्द सार्वजनिक किए जाएँ |


सादर आपका

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स्वाईन फ्लू की रोकथाम कितनी आसान है!

थोथा चना बाजे घना

जब हवा का झोंका चलता है

रामजी दीन जन का परिचय कैसे कराते हैं ?

तुम गाँधी तो नहीं !

जाने कैसे जाने क्यों ??

राष्ट्रभक्ति

...हमारी ओर से भी अब पासे श्री कृष्ण फैंकेंगे....

जो चुप हैं , वे हैं अपराधी

कितना आसाँ है आसाराम बन जाना ---

सोचता हूँ...

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

गुरुवार, 17 अगस्त 2017

वीर सपूतों का देश और ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार दोस्तो,
देश की स्वतंत्रता में अनेक शूरवीरों का योगदान रहा है. आज, 17 अगस्त को देश अपने ऐसे ही दो सपूतों को याद कर रहा है. मदन लाल ढींगरा और पुलिन बिहारी दास ऐसे ही दो वीर सपूत हैं, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने आपको बलिदान कर दिया.

अमर शहीद मदन लाल ढींगरा का जन्म 18 फरवरी 1883 को पंजाब में हुआ था. उनका परिवार अंग्रेजों का विश्वासपात्र था किन्तु वे बचपन से ही क्रांतिकारी घटनाओं में सक्रिय हो गए थे. जब उनको स्वतंत्रता सम्बन्धी क्रान्ति के आरोप में लाहौर के विद्यालय से निकाला गया तो परिवार ने उनसे नाता तोड़ लिया. इसके बाद उन्होंने कुछ दिन मुम्बई में काम किया और फिर अपने बड़े भाई से विचार-विमर्श कर सन 1906 में उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैड चले गये. वहाँ उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में यांत्रिक प्रौद्योगिकी में प्रवेश लिया.

लंदन में वह विनायक दामोदर सावरकर के संपर्क में आए. वे अभिनव भारत मंडल के सदस्य होने के साथ ही इंडिया हाउस नाम के संगठन से भी जुड़ गए जो भारतीय विद्यार्थियों के लिए राजनीतिक गतिविधियों का आधार था. इसी दौरान भारत में खुदीराम बोस, कनानी दत्त, सतिंदर पाल और कांशीराम जैसे देशभक्तों को फांसी दे दी गई. इन घटनाओं से वे तिलमिला उठे और उन्होंने बदला लेने की ठानी. 1 जुलाई 1909 को इंडियन नेशनल एसोसिएशन के लंदन में आयोजित वार्षिक समारोह में ढींगरा अंग्रेज़ों को सबक सिखाने के उद्देश्य से गए. अंग्रेज़ों के लिए भारतीयों से जासूसी कराने वाले ब्रिटिश अधिकारी कर्ज़न वाइली ने जैसे ही हॉल में प्रवेश किया, ढींगरा ने रिवाल्वर से उस पर चार गोलियां दाग़ दीं. उनको पकड लिया गया. इस प्रकरण की सुनवाई पुराने बेली कोर्ट लंदन में हुई. उनको मृत्युदण्ड की सजा सुनाई गई और 17 अगस्त सन 1909 को फांसी दे दी गयी.

++++++++++

महान स्वतंत्रता प्रेमी व क्रांतिकारी पुलिन बिहारी दास का जन्म 24 जनवरी 1877 को बंगाल के फ़रीदपुर ज़िले में हुआ था. उनके पिता नबा कुमार दास सब-डिविजनल कोर्ट में वकील और उनके एक चाचा डिप्टी मजिस्ट्रेट व एक चाचा मुंसिफ थे. उन्होंने फ़रीदपुर से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और उच्च शिक्षा के लिए ढाका कॉलेज में प्रवेश लिया. सन 1906 में बिपिन चन्द्र पाल और प्रमथ नाथ मित्र के आह्वान कि जो लोग देश के लिए अपना जीवन देने को तैयार हैं, वह आगे आयें तो पुलिन बिहारी दास तुरंत आगे बढ़ गए. उन्हें अनुशीलन समिति की ढाका इकाई का दायित्व सौंपा गया. बाद में उन्होंने 80 युवाओं के साथ ढाका अनुशीलन समिति की स्थापना की. उनके प्रयासों से जल्द ही प्रान्त में समिति की 500 से भी ज्यादा शाखाएं हो गयीं.

देशप्रेम से ओतप्रोत पुलिन दास ने क्रांतिकारी युवाओं को प्रशिक्षण देने के लिए ढाका में नेशनल स्कूल की स्थापना की. इसमें नौजवानों को शुरू में लाठी और लकड़ी की तलवारों से लड़ने की कला सिखाई जाती थी और बाद में उन्हें खंजर और अंत में पिस्तौल, रिवॉल्वर चलाने की भी शिक्षा दी जाती थी. क्रांतिकारी गतिविधियों के सञ्चालन हेतु धन की व्यवस्था के लिए 1908 के प्रारंभ में उन्होंने सनीसनीखेज बारा डकैती कांड को अंजाम दिया. सन 1908 में अंग्रेज़ सरकार ने उनको गिरफ्तार कर लिया और मोंटगोमरी जेल में कैद कर दिया. वे इससे डरे नहीं और 1910 में जेल से रिहा होने के बाद दोबारा क्रांतिकारी गतिविधियों को तेज करने में लग गए. उनकी गतिविधियों से घबरा कर अंग्रेज़ सरकार ने ढाका षड्यंत्र केस में पुलिन बिहारी दास और उनके साथियों को जुलाई 1910 को दोबारा गिरफ्तार कर लिया. इस केस में उनको कालेपानी की सजा हुई और उन्हें कुख्यात सेल्यूलर जेल भेज दिया गया. यहाँ उनकी भेंट अपने जैसे वीर क्रांतिकारियों - हेमचन्द्र दास, बारीन्द्र कुमार घोष और विनायक दामोदर सावरकर से हुई. प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर इनकी सजा कम कर दी गयी और 1918 में उन्हें रिहा कर दिया गया. इसके बाद भी उन्हें एक वर्ष तक गृह-बंदी में रखा गया. सन 1919 में रिहा होते ही उन्होंने फिर से समिति की गतिविधियों को पुनर्जीवित करने का प्रयास शुरू किया.

क्रांतिकारी विचारधारा को फैलाने के लिए उन्होंने हक़ कथा और स्वराज नामक दो पत्रिकाएँ भी निकालीं. कतिपय आंतरिक विवादों के चलते उन्होंने सन 1922 में सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया किन्तु वांग्य व्यायाम समिति की स्थापना के द्वारा वह युवकों को लाठी चलाने, तलवारबाज़ी और कुश्ती की ट्रेनिंग देने लगे. 17 अगस्त 1949 को कोलकाता पश्चिम बंगाल में उनका निधन हो गया.

बुलेटिन परिवार की ओर से मदन लाल ढींगरा और पुलिन बिहारी दास को उनकी पुण्यतिथि पर नमन सहित आज की बुलेटिन प्रस्तुत है.

बुधवार, 16 अगस्त 2017

सुभद्रा कुमारी चौहान और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
सुभद्रा कुमारी चौहान (अंग्रेज़ी: Subhadra Kumari Chauhan, जन्म: 16 अगस्त, 1904; मृत्यु: 15 फरवरी, 1948) हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका थीं। उनके दो कविता संग्रह तथा तीन कथा संग्रह प्रकाशित हुए, पर उनकी प्रसिद्धि 'झाँसी की रानी' कविता के कारण है। सुभद्रा जी राष्ट्रीय चेतना की एक सजग कवयित्री रहीं, किन्तु उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में अनेक बार जेल यातनाएँ सहने के पश्चात अपनी अनुभूतियों को कहानी में भी व्यक्त किया। वातावरण चित्रण-प्रधान शैली की भाषा सरल तथा काव्यात्मक है, इस कारण उनकी रचना की सादगी हृदयग्राही है।

'चमक उठी सन् सत्तावन में
वह तलवार पुरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी
ख़ूब लड़ी मरदानी वह तो

झाँसी वाली रानी थी।'


वीर रस से ओत प्रोत इन पंक्तियों की रचयिता सुभद्रा कुमारी चौहान को 'राष्ट्रीय वसंत की प्रथम कोकिला' का विरुद दिया गया था। यह वह कविता है जो जन-जन का कंठहार बनी। कविता में भाषा का ऐसा ऋजु प्रवाह मिलता है कि वह बालकों-किशोरों को सहज ही कंठस्थ हो जाती हैं। कथनी-करनी की समानता सुभद्रा जी के व्यक्तित्व का प्रमुख अंग है। इनकी रचनाएँ सुनकर मरणासन्न व्यक्ति भी ऊर्जा से भर सकता है।



आज महान कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान जी के 113वीं जयंती पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर  .... अभिनन्दन।।

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

71वां स्वतंत्रता दिवस और श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई - ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।

तिरंगा के लिए चित्र परिणाम

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के लिए चित्र परिणाम

आज भारत के 71वें स्वतंत्रता दिवस और स्वतंत्रता की 70वीं वर्षगांठ तथा श्री कृष्ण जन्माष्टमी की सभी भारतवासियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ। जय हिन्द। जय भारत। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~
















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। जय हिन्द। जय भारत।।

सोमवार, 14 अगस्त 2017

श्री कृष्ण, गीता और व्हाट्सअप

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज व्हाट्सअप पर एक संदेश प्राप्त हुआ ... 

ये जो कुल्फी खाते हुए
एक हथेली कुल्फी के नीचे लगाये रहते हो ना

 इसे ही गीता में श्रीकृष्ण ने "मोह" बताया है.
😂😂😜😜😜
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और कुल्फी खतम होने के बाद भी जो डण्डी चाटते ही रहते हैं

इसे ही गीता में श्रीकृष्ण ने "लोभ" कहा है
🙏😀🙏
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और डण्डी फेंकने के बाद , सामने वाले की कुल्फी देखकर सोचना कि उसकी खत्म क्यों नहीं हुई,

इसे गीता मे "ईर्ष्या" कहा गया है,  ☺☺
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और कुल्फी खतम होने से पहले डन्डी से नीचे गिर जाये और केवल डण्डी हाथ मे रह जाये तब तुम्हारे मन में जो आता है....                             😁  इसे ही गीता मे "क्रोध" कहा है 😳
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ये जो नींद पूरी होने के बाद भी 3 घंटे तक बिस्तर पर मगरमच्छ की तरह पड़े रहते हो ना !
गीता में इसे ही "आलस्य" कहा गया है। 😂😂
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ये रेस्टोरेंट में खाने के बाद जो कनस्तर भरके सौंफ और मिश्री का बुक्का मारते हो ना !!
गीता में इसे ही "टुच्चापन" कहा है ।।😂😝😜
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ये जो ताला लगाने के बाद उसे पकड़ कर खींचते हो ना !!

इसे ही गीता में 'भय' कहा गया है ।।😜😝😂
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ये जो तुम WhatsApp पर मैसेज़ भेजने के बाद
बार बार दो नीली धारियाँ चेक
करते हो ना !

इसे ही गीता में 'उतावलापन' कहा है...😂😂
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वो जो तुम गोलगप्पे वाले से कभी मिर्च वाला 🙄 कभी सूखा 😬 कभी दही वाला 😑 कभी मीठी चटनी 🙁

वाला माँगते वक़्त उसे "भैया" बोलती हो ना..

बस इसी को गीता में "शोषण" कहा है 😂😂
___________
फ्रूटी खत्म होने के बाद ये जो आप स्ट्रा से सुड़प-सुड़प करके आखिरी बून्द तक पीने की कोशिश करते हो न....

गीता में इसे ही "मृगतृष्णा" कहा गया है😜😜
___________
ये जो तुम लोग केले 🍌 खरीदते वक्त, अंगूर 🍇 क्या भाव दिये ? बोल के 5-7 अंगूर खा जाते हो ना......गीता में इसे ही "अक्षम्य अपराध" कहा गया है। 😂😂😜😜😜😜
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ये जो तुम.. भंडारे में बैठकर..

खाते हुए.. रायते वाले को आता देखकर..

जल्दी से.. रायता पी लेते हो....!!
..
गीता में.. इसे भी "छल" कहा गया है !!😂😂
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और इस पोस्ट को पढ़कर जो हँसी आती है उसे "मोक्ष" कहते है |

सादर आपका

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भला मैं किस तरह ज़िन्दा रहूँगा

इन चुप्पियों के समन्दरों में...

७५ वर्ष पहले हुआ था उषा मेहता के खुफिया कांग्रेस रेडियो का प्रसारण

ग़ज़ल (बोलेंगे जो भी हमसे बह ,हम ऐतवार कर लेगें )

कुकुभ छंद

घरों में मातम और जन्मोत्सव?

तू ही जाने तेरा राज

यह देश तुम्हारा नहीं

केवल राष्ट्र के लिए था यह सृजन

इन्तज़ार का सम्मोहन

सर्प कब तक आस्तीनों में छुपे पलते रहेंगे ...

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

रविवार, 13 अगस्त 2017

डॉ॰ विक्रम साराभाई की ९८ वीं जयंती

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |
विक्रम अंबालाल साराभाई (१२ अगस्त, १९१९- ३० दिसंबर, १९७१) भारत के प्रमुख वैज्ञानिक थे। इन्होंने ८६ वैज्ञानिक शोध पत्र लिखे एवं ४० संस्थान खोले। इनको विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में सन १९६६ में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
डॉ॰ विक्रम साराभाई के नाम को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से अलग नहीं किया जा सकता। यह जगप्रसिद्ध है कि वह विक्रम साराभाई ही थे जिन्होंने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में भारत को अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर स्थान दिलाया। लेकिन इसके साथ-साथ उन्होंने अन्य क्षेत्रों जैसे वस्त्र, भेषज, आणविक ऊर्जा, इलेक्ट्रानिक्स और अन्य अनेक क्षेत्रों में भी बराबर का योगदान किया।
परिचय
डॉ॰ साराभाई के व्यक्तित्व का सर्वाधिक उल्लेखनीय पहलू उनकी रूचि की सीमा और विस्तार तथा ऐसे तौर-तरीके थे जिनमें उन्होंने अपने विचारों को संस्थाओं में परिवर्तित किया। सृजनशील वैज्ञानिक, सफल और दूरदर्शी उद्योगपति, उच्च कोटि के प्रवर्तक, महान संस्था निर्माता, अलग किस्म के शिक्षाविद, कला पारखी, सामाजिक परिवर्तन के ठेकेदार, अग्रणी प्रबंध प्रशिक्षक आदि जैसी अनेक विशेषताएं उनके व्यक्तित्व में समाहित थीं। उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि वे एक ऐसे उच्च कोटि के इन्सान थे जिसके मन में दूसरों के प्रति असाधारण सहानुभूति थी। वह एक ऐसे व्यक्ति थे कि जो भी उनके संपर्क में आता, उनसे प्रभावित हुए बिना न रहता। वे जिनके साथ भी बातचीत करते, उनके साथ फौरी तौर पर व्यक्तिगत सौहार्द स्थापित कर लेते थे। ऐसा इसलिए संभव हो पाता था क्योंकि वे लोगों के हृदय में अपने लिए आदर और विश्वास की जगह बना लेते थे और उन पर अपनी ईमानदारी की छाप छोड़ जाते थे।
 
 
ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से ९८ वीं जयंती के अवसर पर डॉ॰ विक्रम साराभाई को शत शत नमन |
सादर आपका
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शनिवार, 12 अगस्त 2017

अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस वर्ष 2013 का प्रतीक चिह्न
अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस (अंग्रेज़ी: International Youth Day) (IYD) '12 अगस्त' को प्रतिवर्ष मनाया जाता है। किसी भी देश का युवा उस देश के विकास का सशक्त आधार होता है, लेकिन जब यही युवा अपने सामाजिक और राजनैतिक जिम्मेदारियों को भूलकर विलासिता के कार्यों में अपना समय नष्ट करता है, तब देश बर्बादी की ओर अग्रसर होने लगता है। पहली बार सन 2000 में अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन किया गया था। अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाने का मतलब है कि सरकार युवाओं के मुद्दों और उनकी बातों पर ध्यान आकर्षित करे। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन 1985 ई. को अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष घोषित किया गया।

वर्तमान सदी में युवा वर्ग मानव सभ्यता के ऐसे मुकाम पर खड़ा है, जब "मानव विकास गति" का रथ जेट विमान की गति से भाग रहा है। यह तीव्र विकास गति जहाँ अनेकों उपलब्धियां-सुविधाएँ और चमत्कार लेकर आ रही है, वहीँ युवा वर्ग के लिए तीव्र गति से भागने की क्षमता पा लेने की चुनौती भी। क्योंकि यदि युवा वर्ग इतना क्षमतावान है की वह तेजी से हो रहे परिवर्तन को समझ सके, उसे अपना सके, नयी खोजों, नयी तकनीकों की जानकारी प्राप्त कर अपनी कार्यशैली परिवर्तित कर सके, तो ही वह अपने जीवन को सम्मानजनक एवं सुविधा संपन्न बना सकता है, और विश्व स्तर पर अपने अस्तित्व को बनाये रख सकता है। प्रतिस्पर्द्धा की कड़ी चुनौतियों को स्वीकार करना ही सुरक्षित भविष्य की गारंटी है। आज के युवा वर्ग को विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्द्धा में शामिल होना आवश्यक हो गया है।

पूरे विश्व में भारत को युवाओं का देश कहा जाता है। अपने देश में 35 वर्ष की आयु तक के 65 करोड़ युवा हैं। अर्थात हमारे देश में अथाह श्रमशक्ति उपलब्ध है। आवश्यकता है आज हमारे देश की युवा शक्ति को उचित मार्ग दर्शन देकर उन्हें देश की उन्नति में भागीदार बनाने की, उनमे अच्छे संस्कार, उचित शिक्षा एवं प्रोद्यौगिक विशेषज्ञ बनाने की, उन्हें बुरी आदतों जैसे- नशा, जुआ, हिंसा इत्यादि से बचाने की। क्योंकि चरित्र निर्माण ही देश की, समाज की, उन्नति के लिए परम आवश्यक है। दुश्चरित्र युवा न तो अपना भला कर सकता है, न समाज का और न ही अपने देश का। देश के निर्माण के लिए, देश की उन्नति के लिए, देश को विश्व के विकसित राष्ट्रों की पंक्ति में खड़ा करने के लिए युवा वर्ग को ही मेधावी, श्रमशील, देश भक्त और समाज सेवा की भावना से ओत प्रोत होना होगा।

भारत में प्राथमिक शिक्षा जो विद्यार्थी जीवन की नींव होती है, कुछ निजी स्कूलों को छोड़ कर बच्चों में शिक्षा के प्रति रूचि पैदा करने में असफल हैं। शिक्षा में गुणात्मकता के अभाव होने के कारण बच्चे सिर्फ परीक्षा पास करने की विधा सीखने तक सीमित रह जाते हैं, जिसका मुख्य कारण है शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश करने में विद्वान् और मेधावी युवाओं की अरुचि। शिक्षा के क्षेत्र में अपेक्षाकृत मध्यम श्रेणी की योग्यता वाले युवा इसे अपना कार्यक्षेत्र बनाते हैं। जब शिक्षक ही अधूरे ज्ञान के साथ पढ़ाने के लिए आते है, तो उनके विद्यार्थी कितने मेधावी एवं योग्य नागरिक बन सकते हैं। ऐसे शिक्षक कैसे विद्यार्थी में शिक्षा के प्रति रूचि विकसित कर सकते हैं। बिना रूचि जगाये किसी भी बच्चे को योग्य नागरिक नहीं बनाया जा सकता, उसे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के योग्य नहीं बनाया जा सकता। परिणाम सवरूप नब्बे प्रतिशत छात्र हाईस्कूल तक की शिक्षा प्राप्त कर आगे की शिक्षा से मुंह मोड़ लेते हैं या कुछ बेमन से सिर्फ डिग्री प्राप्त करने के लिए आगे पढ़ते हैं।



~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~












आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर  .... अभिनन्दन।।

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

देश के तेरहवें उपराष्ट्रपति बने एम वेंकैया नायडू

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

चित्र गूगल से साभार
एम वेंकैया नायडू आज देश के तेरहवें उपराष्ट्रपति बन गए। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन के दरबार हाल में गरिमापूर्ण समारोह में उन्हें उपराष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई। नायडू ने हिन्दी में शपथ ग्रहण की। इस अवसर पर निवर्तमान उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद, कई केन्द्रीय मंत्री, विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता और कई अन्य गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे।

शपथ ग्रहण से पहले अड़सठ वर्षीय नायडू ने राजघाट जाकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में से एक पंडित दीनदयाल उपाध्याय तथा महान स्वतंत्रता सेनानी एवं देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। उपराष्ट्रपति के नाते नायडू राज्यसभा के नए सभापति भी बन गए हैं। शपथ ग्रहण के कुछ ही देर बाद वह संसद भवन पहुंचे, जहां उन्होंने  राज्यसभा के उपसभापति पी जे कुरियन, संसदीय कार्यमंत्री अनन्त कुमार, सदन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता डी राजा, द्रविड़ मुनेत्र कषगम के नेता त्रिची शिवा तथा कुछ अन्य दलों के नेताओं ने उनकी अगवानी की।

कुरियन और अनंत कुमार ने उन्हें गुलदस्ता भेंटकर उनका स्वागत किया। उसके बाद सभी नेता उन्हें ससम्मान सभापति के कक्ष में ले गये। बाद में नायडू ने राज्यसभा की कार्यवाही का संचालन भी किया। नायडू भारतीय जनता पार्टी के ऐसे दूसरे नेता हैं, जो उपराष्ट्रपति पद पर पहुंचे। उनसे पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान भाजना नेता भैरों सिंह शेखावत इस पद के लिए चुने गये थे। नायडू के उपराष्ट्रपति बनने के साथ ही देश के चार सर्वोच्च पदों पर बीजेपी से जुड़े नेता आसीन हो गए हैं। 

देश के नए उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू की राजनीतिक यात्रा छात्र जीवन से ही शुरू हो गई थी और वह सियासत के कई सोपान तय करते हुए आज इस मुकाम तक पहुंचे हैं। एक जुलाई 1949 को आंध्रप्रदेश के नेल्लोर जिले के छवतपलम में जन्मे वेंकैया नायडू की पहचान हमेशा एक 'आंदोलनकारी' के रूप में रही है। वह 1972 में 'जय आंध्र आंदोलन' के दौरान पहली बार सुर्खियों में आए। 

आपातकाल के दौरान जेल गए
1974 में आंध्रप्रदेश में जयप्रकाश नारायण छात्र संघर्ष समिति की भ्रष्टाचार निरोधक इकाई के संयोजक रहे। उन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण की विचारधारा से प्रभावित होकर आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष में हिस्सा लिया और उन्हें जेल भी जाना पड़ा। आपातकाल के बाद वे 1977 से 198० तक जनता पार्टी की युवा शाखा के अध्यक्ष रहे।

दो बार भाजपा के अध्यक्ष रहे        
नायडू भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष रहने के अलावा अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री रहे। उन्होंने मोदी सरकार में शहरी विकास मंत्रालय के अलावा संसदीय कार्य मंत्री और सूचना प्रसारण मंत्रालय का भी कामकाज संभाला।राजनीतिक सक्रियता और कुशल वक्तृत्व की बदौलत वेंकैया नायडू 1978 और 1983 में नेल्लोर जिले के उदयगिरि विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए और कुछ ही समय में आंध्रप्रदेश में भाजपा का चेहरा बन गए। वह 1996 से 2000 तक भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे। जना कृष्णमूर्ति के बाद वह 2002 में भाजपा के अध्यक्ष बने। 
                         
चार बार राज्यसभा के लिए चुने गए
28 जनवरी 2004 को वह फिर इस पद के लिए निर्विरोध चुने गए लेकिन उसी वर्ष लोकसभा चुनाव में भाजपा नित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की हार के बाद उन्होंने 18 अक्टूबर 2004 को अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। नायडू कनार्टक से 1998 में राज्यसभा के सदस्य रहने के बाद 2004 और 2009 में फिर संसद के उच्च सदन के लिए चुने गए। वह 29 मई 2016 को राजस्थान से राज्यसभा के लिए चुने गए।

ग्रामीण विकास मंत्री के रूप में उल्लेखनीय कार्य
ग्रामीण विकास मंत्री के रूप में उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र के विकास में सुधारों को तेजी से लागू किया तथा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना समेत कई अन्य योजनाएं भी शुरू कीं। नायडू का संबंध हालांकि दक्षिण भारत से है लेकिन वह हिन्दी में भी धाराप्रवाह भाषण देने की क्षमता रखते हैं। उन्हें इस साल 17 जुलाई को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था।

ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से हम महामहिम उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू जी को हार्दिक शुभकामनाएं देते हैं |
सादर आपका
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अंसारी साहब…शहर के कुछ बुत ख़फ़ा हैं इसलिये, चाहते हैं हम उन्हें सज़दा करें

खाली हसरतें

एक शेर

इस नये इतिहास में हमारा स्थान कहाँ होगा

नेताओं की पेंशन तो बनती है

जो विशाल है वही विकास है

लालच की सजा

हामिद अंसारी का दुर्भाग्यपूर्ण बयान

मुण्डन

फलफूल रही है नफरत की राजनीति

अमर शहीद खुदीराम बोस जी की १०९ वीं पुण्यतिथि

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

मिलिए देश की पहली महिला संगीतकार से आज की बुलेटिन में

नमस्कार साथियो,
आज, 10 अगस्त को भारत की पहली महिला संगीतकार सरस्वती जी की पुण्यतिथि है. तीस और चालीस के दशक में हिन्दी सिनेमा में काम करने वाली सरस्वती जी का जन्म सन 1912 में मुम्बई के एक संपन्न और सम्मानित पारसी परिवार में हुआ था. उनका वास्तविक नाम खुर्शीद मिनोखर होमजी था. बचपन से ही उन्हें संगीत से अत्यंत लगाव था. जिस कारण से उनके पिता ने उन्हें शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दिलवाई. उनकी संगीत की आरंभिक शिक्षा विख्यात संगीताचार्य विष्णु नारायण भातखंडे के निर्देशन में संपन्न हुई. मैट्रिक पास करने के बाद लखनऊ के प्रसिद्ध मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) से शिक्षा प्राप्त की और वहीं अध्यापन भी किया.


बीस के दशक में मुम्बई में रेडियो स्टेशन खुलने पर सरस्वती जी अपनी बहन माणिक के साथ मिलकर होमजी सिस्टर्स के नाम से एक संगीत कार्यक्रम को प्रस्तुत करने लगीं. उनका यह कार्यक्रम अत्यंत लोकप्रिय हुआ. इसी दौरान सन 1933-34 में उनकी मुलाकात हिमांशु राय से हुई. हिमांशु राय ने खुर्शीद को बॉम्बे टाकीज़ में संगीतकार बनने और उनकी बहन माणिक को अभिनय और गायन का निमंत्रण दिया. चूँकि उस समय पारसी समाज में महिलाओं का फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था, इस कारण कुछ हिचकिचाहट के बाद दोनों बहनें बॉम्बे टाकीज़ के लिए काम करने को राज़ी हो गईं. उनके इस निर्णय का पारसी समाज ने विरोध किया. इस विरोध के कारण हिमांशु राय ने ही खुर्शीद को सरस्वती देवी और माणिक को चन्द्रप्रभा नाम दिया.

सरस्वती देवी को शुरु में देविका रानी को संगीत सिखाने का काम सौंपा गया था. इसी दौरान वे जवानी की हवा के लिए भी संगीत तैयार करने लगीं. इसी क्रम में बॉम्बे टाकीज़ से सन 1935 में उनकी पहली फ़िल्म जवानी की हवा आई. पारसी समाज द्वारा इसके ख़िलाफ़ मोर्चा निकाल कर इस फ़िल्म के प्रदर्शन में बाधा पैदा करने की कोशिश की गई. जिसके चलते पुलिस की निगरानी में इम्पीरियल सिनेमा में फ़िल्म को रिलीज़ किया गया. हिमांशु राय से पूरी तरह सरस्वती जी का साथ दिया और पारसी समाज के विरोध के बाद भी उनको बतौर संगीतकार काम दिया. इस तरह वे देश की पहली महिला संगीतकार के रूप में चर्चित हुईं. इसके बाद सन 1936 में उन्होंने फ़िल्म जीवन नैया के लिये संगीत दिया. इसके अलावा अछूत कन्या, बंधन, नया संसार, प्रार्थना, भक्त रैदास, पृथ्वी वल्लभ, खानदानी, नकली हीरा, उषा हरण आदि में भी उन्होंने संगीत दिया. एक संगीतकार के रूप में सन 1961 में उनकी आखिरी फिल्म राजस्थानी फ़िल्म, बसरा री लाडी आई थी. इसके बाद उन्होंने हिन्दी फ़िल्मों से संन्यास लेकर संगीत सिखाने का कार्य आरम्भ किया था.

देश की प्रथम महिला संगीतकार सरस्वती जी का निधन 10 अगस्त 1980 को हो गया था. उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए प्रस्तुत है आज की बुलेटिन.

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बुधवार, 9 अगस्त 2017

काकोरी कांड की 92वीं वर्षगांठ तथा अगस्त क्रांति की 75वीं वर्षगांठ - ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।

9 अगस्त क्रांति दिवस के लिए चित्र परिणाम

काकोरी काण्ड (अंग्रेजी: Kakori conspiracy) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रान्तिकारियों द्वारा ब्रिटिश राज के विरुद्ध भयंकर युद्ध छेड़ने की खतरनाक मंशा से हथियार खरीदने के लिये ब्रिटिश सरकार का ही खजाना लूट लेने की एक ऐतिहासिक घटना थी जो ९ अगस्त १९२५ को घटी। इस ट्रेन डकैती में जर्मनी के बने चार माउज़र पिस्तौल काम में लाये गये थे। इन पिस्तौलों की विशेषता यह थी कि इनमें बट के पीछे लकड़ी का बना एक और कुन्दा लगाकर रायफल की तरह उपयोग किया जा सकता था। हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के केवल दस सदस्यों ने इस पूरी घटना को अंजाम दिया था। क्रान्तिकारियों द्वारा चलाए जा रहे आजादी के आन्दोलन को गति देने के लिये धन की तत्काल व्यवस्था की जरूरत के मद्देनजर शाहजहाँपुर में हुई बैठक के दौरान राम प्रसाद बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनायी थी। इस योजनानुसार दल के ही एक प्रमुख सदस्य राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने ९ अगस्त १९२५ को लखनऊ जिले के काकोरी रेलवे स्टेशन से छूटी "आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन" को चेन खींच कर रोका और क्रान्तिकारी पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफाक उल्ला खाँ, पण्डित चन्द्रशेखर आज़ाद व ६ अन्य सहयोगियों की मदद से समूची ट्रेन पर धावा बोलते हुए सरकारी खजाना लूट लिया। बाद में अंग्रेजी हुकूमत ने उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के कुल ४० क्रान्तिकारियों पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व मुसाफिरों की हत्या करने का मुकदमा चलाया जिसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह को मृत्यु-दण्ड (फाँसी की सजा) सुनायी गयी। इस मुकदमें में १६ अन्य क्रान्तिकारियों को कम से कम ४ वर्ष की सजा से लेकर अधिकतम काला पानी (आजीवन कारावास) तक का दण्ड दिया गया था।



9 august movement के लिए चित्र परिणाम
भारत के इतिहास में 9 अगस्त के दिन को अगस्त क्रांति दिवस के रूप में जाना जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध में समर्थन लेने के बावज़ूद जब अंग्रेज़ भारत को स्वतंत्र करने को तैयार नहीं हुए तो राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने भारत छोड़ो आंदोलन के रूप में आज़ादी की अंतिम जंग का ऐलान कर दिया जिससे ब्रितानिया हुक़ूमत में दहशत फैल गई। 9 अगस्त, सन् 1942 ई. में इस आंदोलन की शुरुआत हुई थी, इसीलिए 9 अगस्त के दिन को इतिहास में अगस्त क्रांति दिवस के रूप में जाना जाता है। यह आंदोलन मुम्बई के जिस पार्क से शुरू हुआ उसे अब अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाता है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अंग्रेज़ों को देश से भगाने के लिए 4 जुलाई, सन् 1942 ई. को एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें कहा गया कि यदि अंग्रेज़ भारत नहीं छोड़ते हैं तो उनके ख़िलाफ़ व्यापक स्तर पर नागरिक अवज्ञा आंदोलन चलाया जाए।



आज हम सब काकोरी कांड के शहीदों और अगस्त क्रांति के स्वतंत्रता सेनानियों को हम सब शत शत नमन करते हैं। सादर।। 


~ अब चलते हैं बुलेटिन की ओर ~














 
आज की बुलेटिन में सिर्फ इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक लिए शुभरात्रि। सादर .... अभिनन्दन।।  

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

जन्मदिवस : भीष्म साहनी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
भीष्म साहनी ( Bhisham Sahni; जन्म- 8 अगस्त, 1915, रावलपिण्डी, अविभाजित भारत; मृत्यु- 11 जुलाई, 2003, दिल्ली ) प्रसिद्ध भारतीय लेखक थे। उन्हेंहिन्दी साहित्य में प्रेमचंद की परंपरा का अग्रणी लेखक माना जाता है। वे आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। भीष्म साहनी मानवीय मूल्यों के सदैव हिमायती रहे। वामपंथी विचारधारा से जुड़े होने के साथ-साथ वे मानवीय मूल्यों को कभी आंखों से ओझल नहीं करते थे। आपाधापी और उठापटक के युग में भीष्म साहनी का व्यक्तित्व बिल्कुल अलग था। उन्हें उनके लेखन के लिए तो स्मरण किया ही जाता है, लेकिन अपनी सहृदयता के लिए भी वे चिरस्मरणीय हैं। भीष्म साहनी ने कई प्रसिद्ध रचनाएँ की थीं, जिनमें से उनके उपन्यास 'तमस' पर वर्ष 1986 में एक फ़िल्म का निर्माण भी किया गया था। उन्हें कई पुरस्कार व सम्मान प्राप्त हुए थे। 1998 में भारत सरकार के 'पद्म भूषण' अलंकरण से भी वे विभूषित किये गए थे।

( साभार - http://bharatdiscovery.org/india/भीष्म_साहनी )


आज स्वर्गीय भीष्म साहनी जी के 102वें जन्मदिवस पर पूरा हिन्दी ब्लॉग जगत और हमारी ब्लॉग बुलेटिन टीम उन्हें शत शत नमन करते हैं। सादर।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे, तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

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