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बुधवार, 12 जुलाई 2017

मेरी रूहानी यात्रा ... ब्लॉग से फेसबुक अंजना टंडन




आँसुओं से बचा कर सपनों की आँख रखी है
बारिशों के इंतज़ार में काग़ज़ों की नाव रखी है  -  ये भाव हैं अंजना टंडन के 

फेसबुक हो या ब्लॉग, मेरी कुछ यात्रायें तय होती हैं, जैसे सुबह की आहट होते चिड़िया घोंसले से ज़रूर झांकती है, ठीक उसी तरह आदतन मैं कुछ लोगों को अवश्य पढ़ती हूँ, भले लाइक बटन दबाना भूल जाऊँ या कुछ लिखना  ... जैसे प्रथम रश्मि को रंगिणी के सुगबुगाने का यकीं है, वैसे ही इन्हें भी यकीं होगा कि पंखों को खोलते ही मैं उनतक आई होउंगी :) 


भावों के नीड़ बनाने के लिए मैं अनगिनत भावों को संजोती हूँ, हर पंछी को नीड़ का उपहार देती हूँ 
आज यह उपहार -


अब कोई डूब कर नहीं मरता


सृष्टि के
तमाम वृक्षों की जड़े
 धरा के मनपसंद घाव
झरते सूखे पत्ते
लौटाया गया नमक
नमक
स्त्री देह की लोनाई मात्र नहीं
स्त्रीत्व का लौटाया गया उधार है
तमाम वर्जनाएँ जकड़न नही थी
तमाम पीड़ाएँ
कृतज्ञता के ककहरे सी लौटी
मोल केवल दूध का ही नहीं
ह्रदय के कृत्य सब
अपनी दक्षिणा ले लौटे
जिसके पास जो हैसियत थी
आखिर वो ही तो वो लौटता
किसी नांदा बच्चे की तरह
परमार्थ की किसी आदिम गुफ़ा में
अब भी बचने के
सारे अलोने वास उपवास
जैसे इलाज में प्रगाढ़ विश्वास
नमक के संतुलन का सम्पादन
रसोईघर से अधिक मन में है
छाती के रसघन की रसालता को
इस क्षारता से बचाने का हुनर
प्रत्येक बेटी के नाम माँ की वसीयत
ऋृणी है विज्ञान
दुनिया की हर औरत का
जिससे ज्ञात हुआ कि
जहर को मारने के लिए
नमक का लोहा चाहिए
पुरूषों की रंगशाला का सबसे खूबसूरत
और संतुष्टिप्रदत चित्र
मन की पेशानी पर उभरे स्वेद कणों के साथ दिखती स्त्री
अब बहुत दुर्लभ होता जा रहा
भरते भरते आत्मा
नोनसारी समंदर बन बैठी
खून में मिलते नमक से
ललछौंही से डैड सी में
अब कोई डूब कर नहीं मरता  ... 


मैंने सच में नहीं देखा


जानती हूँ
सप्तपदी पर लिए
सातवें वचन का मान
तुम्हारे बामअंग आने से पूर्व ही
मिली थी नियमावली
जिसमें विकल्प नहीं होते
" पर पुरूष देखना भी पाप था"
बस ध्यान ही तब गया जब
किसी ने काले और सफेद का झूठ ढूँढ निकाला
मालूम नहीं ये दुस्साहस था या परमार्थ
उकेर कर रख दी थी उसने
मुझ जैसी कई दारूण गाथाएँ अदब के पन्नों पर
पर सच मानो
मैंने कभी नहीं देखा
उसका चेहरा मोहरा
सिवाय शाब्दिक झलक के
किसी संवेदनशील समझदार सह्रदय मित्रवत्
और
स्त्री समझ दुख साझा कर लिया
वास्तव में
वो कोई पर पुरूष नहीं
मेरे ही ईश का कोई टुकड़ा निकला....
स्त्रियाँ जानती हैं
वचनों का मान क्या होता है
हाँ....मैंने सच में नहीं देखा


इस सत्य से आप वाकिफ होंगे - 
बड़े से बड़े हादसों को
निर्लिप्तता से देखना
और कुछ ना कहना
अंदर किसी नदी का सूखना है - अंजना टंडन 

4 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह सुन्दर रचनाएं।

atoot bandhan ने कहा…

स्त्रियाँ जानती हैं
वचनों का मान क्या होता है
हाँ....मैंने सच में नहीं देखा... बहुत सुन्दर कवितायें - वंदना बाजपेयी

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत ही सुंदर और सार्थक रचनाएं, शुभकामनाएं.
रामराम
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत अच्छी बुलेटिन प्रस्तुति ...

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