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रविवार, 18 जून 2017

पिता यानि वटवृक्ष




पिता की उपस्थिति बड़ी गंभीर होती है, घर का कोना कोना सुरक्षित,संस्कारयुक्त अनुशासन में होता है।
नीलम प्रभा जी का यह गीत पिता के सम्मान में बहुत सार्थक लगता है -

तेरे आशीषों की छांव तले 
ये लता हर पल फूले फले 
कहीं भूले से ये छांव हटे ना 
सुख के शारदीय धूप हटे ना 
प्यार के उजले ये बादल छंटे ना  ... 
जीवन पात्र मेरा खाली रह जाता 
पिता के रूप में जो तुम्हें नहीं पाता 
इसके आगे नहीं निष्कर्ष कोई 
दूसरा नहीं मेरा आदर्श कोई 
और कहीं पे कभी हम तो झुके ना  ... "

आज विशेष रूप से पिता को याद करने का, उनकी यादों की खुशबू  से मन आंगन भिगोने का दिन है  ... 
माना अपवाद हर जगह है, कुछ पिता हिरण्यकश्यप से होते हैं, लेकिन वह भी न हो तो प्रह्लाद कैसे निखरेगा।  उसके शब्द भी कुछ यूँ होंगे -


पिता !
वह शब्द,
वह संबोधन,
जो ढाल बनकर
हर मुसीबतों से
हमारी रक्षा करता है !
ज़िन्दगी के सम्मान का पर्याय बन
साथ चलता है !
वह नाम,
जहाँ से एक पहचान मिलती है,
अंधेरे से डर नहीं लगता...........
रौशनी कवच बन
वह पास रहता है !
पर्वत-सी विराट छवि लिए
वह गर्व से भर देता है.............
..............
पर,
जब-जब तुम्हें देखा ,
तुम्हारी आँखें -
मुझे बेचैन कर गयीं !
एक तलाश में अपमानित वजूद,
नफरत से भींचे होठ
कितना कुछ कहना चाहते हैं............
हँसते हुए भी,
एक ज़हरीला दंश,
पूरे रक्त में
अग्नि की तरह दहकता नज़र आता है !
अखंड ज्योति की उजास में भी,
एक खाली मौन देखा है !
महसूस किया है इस सच को-
कि,
कुछ धरती बंजर रह जाती है,
सूखे रहना पसंद करती है,
बीजों को पनपने
और लहलहाने का मौका नहीं देती..........!
नाम का मिलना,
यूँ शर्मनाक भी होता है
तुम्हे देखते हुए जाना है
और पिता की परिभाषा को
चाक-चाक होते देखा है !

खैर 
 सत्य की विराटता के आगे अपवाद तुच्छ है !


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जवाहरलाल नेहरू :: :: :: पिता के पत्र पुत्री के नाम :: पत्र


कुछ झलकियाँ फेसबुक से 

यह कहने में मुझे कभी कोई संकोच नहीं हुआ कि
आज मैं ज़िंदा हूँ तो अपने पिताजी की वजह से 💜
लोग मनाते रहें फादर्स डे, यहाँ तो फादर ही ज़िंदगी है.


पितृ प्रेम को शब्द नहीं है
गीत लिखे माँ की ममता पर,
प्यार पिता का किसने देखा,
माँ के आंसू सबने देखे, 
 दर्द पिता का किसने देखा.
माँ की ममता परिभाषित है,
पितृ प्रेम को शब्द नहीं है,
कितने अश्क छुपे पलकों में,
वहां झाँक कर किसने देखा.
उंगली पकड़ सिखाया चलना,
छिटक दिया है उन हाथों को,
तन की चोट सहन हो जाती,
मन का घाव न भरते देखा.
दर्द छुपा कर बोझ उठाया,
झुकने दिया नहीं कन्धों को,
कोई रख दे हाथ प्यार से,
इन्हें तरसते किसने देखा.
विस्मृत हो जायें कटु यादें,
मंजिल पर जाने से पहले,
हो जायें ये साफ़ हथेली,
मिट जायें रिश्तों की रेखा.

आज इंडिया के सभी पिताओं और उनके घर को इंडिया की जीत के लिए शुभकामनायें :)

3 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

पितृ दिवस की शुभकामनाएं। सुन्दर प्रस्तुति।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

मेरी शब्दांजलि को भी शामिल के लिए आभार।

Sanju ने कहा…

बहुत प्रभावपूर्ण रचना......
मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपके विचारों का इन्तज़ार.....

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