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सोमवार, 26 जून 2017

ईद मुबारक और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा नमस्कार।




समस्त देशवासियों को ईद मुबारक। ये ईद सभी देशवासियों के लिए ढेरों खुशियाँ लाएँ, बस इतना है। सादर।।

~ अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर ~ 















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर  ... अभिनन्दन।।

रविवार, 25 जून 2017

मेरी रूहानी यात्रा ... ब्लॉग से अनुपमा पाठक




"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!  ... अनुपमा पाठक

अनुशील


कुछ लोग एहसासों के मामले में समंदर का विस्तार होते हैं, लहरों की तरह हम तक आते हैं, लौट जाते हैं - और हम उसे पकड़ने को दौड़ते हैं  ... घंटों उसके आगे गुजार देते हैं 


ध्येय चाहिए!


बहती रहे कविता 
सरिता की तरह
बने यह 
कई लोगों के लिए 
जुड़ने की वजह
मानव जीवन को 
और क्या 
श्रेय चाहिए!
जीने के लिए बस हमें
पावन एक 
ध्येय चाहिए!!

अकेले 
चले थे हम 
शब्दों की 
मशाल लेकर!
मिले राह में हमें
ऐसे भी लोग 
जो 
इस ठहराव में 
स्वयं 
गति की पहचान हैं;
सजाये शब्द हमने 
उनसे ही 
हौसलों की ताल लेकर!
इस ताल पे देखो अब 
कितने भाव नाच उठते हैं 
आपकी आवाज़ जुड़ी 
तो कितने ही छन्द 
स्वयं 
कविता से आ जुड़ते हैं; 
ऐसे ही चलें हम 
स्वच्छ मन 
और कुछ सवाल लेकर!
साथ 
अनेकानेक कड़ियाँ 
जुड़ती जाए 
और उत्तर की भी 
सम्भावना जन्मे; 
स्वस्थ विचारों का 
आदान प्रदान हो 
समझ की 
वृहद् थाल लेकर!
चलते 
चलें हम 
शब्दों की 
मशाल लेकर!

बहती रहे कविता 
सरिता की तरह
बने यह 
कई लोगों के लिए 
जुड़ने की वजह
मानव जीवन को 
और क्या 
श्रेय चाहिए!
जीने के लिए बस हमें
पावन एक 
ध्येय चाहिए!!


विस्मित हम!


कैसे जुड़ जाते हैं न मन!
कोई रिश्ता नहीं...
न कोई दृष्ट-अदृष्ट बंधन...
फिर भी 
तुम हमारे अपने,
और तुम्हारे अपने हम...

भावों का बादल सघन
बन कर बारिश,
कर जाता है नम...
उमड़ते-घुमड़ते 
कुछ पल के लिए
उलझन जाती है थम...

जुदा राहों पर चलने वाले राहियों का
जुदा जुदा होना,
है मात्र एक भरम...
एक ही तो हैं, 
आखिर एक ही परमात्म तत्व
समाहित किये है तेरा मेरा जीवन... 

भावातिरेक में 
कह जाते हैं...
जाने क्या क्या हम...
सोच सोच विस्मित है,
अपरिचय का तम....
कैसे जुड़ जाते हैं न मन!

कितना लिखना है, 
कितना लिख गयी...
और जाने 
क्या क्या लिखेगी...

ज़िन्दगी! तुम्हारी ही तो है न
ये कलम...!!!

शनिवार, 24 जून 2017

मेरी रूहानी यात्रा ... ब्लॉग से सुधीर त्रिपाठी




सुधीर 

"मैने देवभूमि उत्तराखन्ड के अल्मोडा जनपद के एक छोटे से गांव में जन्म पाया। जीवन के अनमोल बचपन, किशोरावस्था से युवा होने तक नैनीताल के छोटे से नगर हल्द्वानी को जिया। अगले दो साल दिल्ली के 'जिया सराय' में रहने का अवसर मिला, जहां यह देखा कि अवसर के अभाव में भी प्रतिभाएं कैसे पनपती हैं और यह सीखा कि हर ना चमकने वाली चीज भी हीरा हो सकती है। समय के प्रवाह के साथ बहते बहते विलायत आ पहुंचा। " 
........ 
बातें यहीं खत्म नहीं होतीं 
शायद बातें कभी नहीं खत्म होती 
कभी अपने नज़रिये से 
कभी दूसरों के नज़रिये से जन्म लेती रहती हैं  ... 

आज सुधीर त्रिपाठी का नज़रिया 

किस्से कहानी - blogger



डंडा कब बाजेगा?


एक धोबी था, और उसके पास एक कुत्ता और गधा था. धोबी प्रतिदिन गधे की पीठ में कपडे रखकर नदी किनारे ले जाता और धो कर वापस गधे की पीठ में रखकर वापस लाता. कुत्ते का काम धोबी की अनुपस्थिति में घर की रखवाली करना था.

एक शाम जब धोबी घर में आराम कर रहा था, तो बाहर कुत्ता और गधा आपस में बातकर रहे थे. गधा बोला कि यार कुत्ते! मैं तो अपने काम से तंग आ गया हूँ. प्रतिदिन कपडे ढो-ढो कर मेरी कमर टेढ़ी हो गयी है, एक दिन का भी आराम नहीं है. मन तो करता है कि कहीं दूर भाग जाऊं, और वहां जाकर दिन-रात बस सोता रहूँ. भाई! तेरा काम कितना अच्छा है, तू तो रोज घर में ही रहता है, तेरे मजे हैं यार.

यह सुनकर कुत्ता तोड़ा सा अचकचाया, और बोला कि, अबे गधे! दिन भर रस्सी से बंधा रहता हूँ, ना कहीं आ सकता हूँ ना कहीं जा सकता हूँ. ऊपर से हर आने-जाने वाले पर भौंकना पड़ता है. आस-पड़ोस के बच्चे आकर पत्त्थर अलग मारते हैं. अगल-बगल के सारे फालतू कुत्ते मिलकर, यहाँ-वहाँ घूमकर कितने मजे लेते हैं, और मेरी जवानी घर के इस कोने में बीत रही है. मन तो मेरा करता है कि किसी को भी पकड़ के फाड़ डालूँ.

गधा बोला, अरे कुत्ता भाई! क्रोधित क्यों होते हो, बाहर की दुनिया में कुछ नहीं रखा है. एक नदी है जहां सारे धोबी आकर नहाते हैं और कपडे भी धोते हैं. बस यही है दुनिया. मैं तो कहुं भैया घर की आधी रोटी भी भली.

कुत्ता बोला, बेटे! किसको गधा बना रहा है? सुबह शाम, मुझे भी आजादी मिलती है, थोडी देर जंगल जाकर फ्रेश होने की, किसी दिन मेरे साथ चल तो तुझे दुनिया दिखाता हूँ. वो तो मालिक डंडे बरसाता है, नहीं तो मैं तो रातभर घर नहीं आऊँ. क्या करूँ धोबी का कुत्ता हूँ, ना घर का घाट का.
तभी गधा बोला, देख भाई मेरे पास एक आईडिया है, क्यों ना हम अपना काम आपस में बदल लें. तुझे घर में रहना पसंद नहीं है और मुझे रोज काम पर जाना. कल से तू मालिक के कपडे लेकर नदी किनारे चले जाना और मैं यहाँ घर की रखवाली करूंगा. देख ऐसे तू भी खुश और में भी खुश. बोल क्या बोलता है?

कुत्ते को भी विचार उत्तम लगा, और बात पक्की हो गयी. अगले दिन पौ फटते ही धोबी के उठने से पहले कुत्ते ने धोबी के सारे कपडे एक-एक कर नदी किनारे ले जाने शुरू कर दिये. इस काम को करने में कुत्ते को गधे की तुलना में अधिक समय लग रहा था क्योकि वह एक-एक दो-दो कपडे मुंह में दबाकर नदी किनारे पहुंचा रहा था. कुत्ते ने सोचा की यदि मालिक नींद से उठ गया तो मुझे फिर से बाँध देगा और गधे को नदीं किनारे ले जाएगा. अत: जितनी जल्दी हो सके सारे कपडे नदी किनारे पहुंचा दूँ. और यदि धोबी इम्प्रेस हो गया तो फिर प्रतिदिन कपडे मैं ही ले कर जाउंगा और वह गधा दिन भर जंजीर में बंधा रहेगा. इस जल्दबाजी के चक्कर में कुछ कपड़े कुत्ते के दांतों में आकर फट  गये और कुछ ले जाते समय झाड़ियों में फंस कर चीथडे-चीथड़े हो गये.  

उधर जैसे ही गधे ने देखा की कुत्ते ने अपना काम पूरा कर दिया, उसने अपने मालिक को इम्प्रेस करने के लिए जोर–जोर से ‘ढेंचू-ढेंचू’ कर रेंकना आरम्भ कर दिया. मानो गधा यह दिखाना चाहता हो की वह कुत्ते से अच्छा भौंक सकता है और घर की अच्छी रखवाली कर सकता है. गधे को क्या पता कि भौंकने का भी समय और कारण होता है, उसने सोचा की भौंकना मतलब बिना रुके रेंकते रहना. अभी उजाला नहीं हुआ था और गधे ने ढेंचू-ढेंचू कर पूरी कालोनी में हाहाकार मचा दिया था.  
कान ढककर, गधे के चुप होने  का इंतज़ार कर रहा धोबी अंतत: आधी नींद में ही क्रुद्ध होकर उठा और फिर उसने एक मोटे डंडे से गधे की जमकर कुटाई की, जब तक कि गधा निढाल हो कर गिर ना पड़ा. उसके बाद धोबी ने जब इधर-उधर बिखरे कपड़े देखे तो उसी डंडे से कुत्ते की कुकुरगत की जिसने सारे कपडों का सत्यानाश कर दिया था.

तब से यह कहावत प्रसिद्ध हुई कि, ‘’जिसका काम उसी को साजे, और करे तो डंडा बाजे’’. इसका अर्थ है की जिसको जो कार्य दिया गया है उसको उसी को ईमानदारी से पूरा करना चाहिये. यदि अपना काम को अधूरा छोड़कर दुसरे के काम में हाथ डालोगे तो डंडे ही पड़ेंगे.   

इस कहानी को कहने का उद्देश यह बताना था कि हमारे भारत देश में भी पिछले कुछ समय से यही हो रहा है. महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान व्यक्ति अपना काम छोड़ कर दूसरे काम को करने में अधिक आनंद लेते है. पहला उदाहरण हमारी पुलिस, जिसने सताए हुए लोगों की रक्षा करने के बजाय स्वयं ही असहाय जनता को सताना शुरू कर दिया. यदि यह बात सही नहीं है सोचिये क्यों आज आम आदमी पुलिस के नाम से डरता है?  जबकि पुलिस से चोर उच्चकों को डरना चाहिए, पर वे आज निर्भय हैं. बात बहुत छोटी लगती है लेकिन है बहुत गंभीर.      

दूसरा उदाहरण, नेता जिन्हें जनता की भलाई के लिए नियम क़ानून बनाने थे और देश का विकास करना था वे अपना कार्य छोड़कर अपना और अपना, अपने बेटे, बेटियों, भतीजे और भांजों का विकास करने में लगे हैं. राष्ट्र के नायक (प्रधानमंत्री), जिनको संसद में दहाड़ना था उन्होनें मौन व्रत धारण कर लिया. उत्तर प्रदेश की एक पूर्व मुख्मंत्री जिन्हें अपने राज्य में रोजगार और शिक्षा के नए अवसर खड़े करने थे, उन्होंने माली और मूर्तिकार का काम आरंभ कर दिया, और जनता का धन खड्या दिया (खड्डे में डालना) उपवन बनाने में और उसमें अपनी और हाथी की मूर्तियाँ लगाने में. वर्तमान मुखमंत्री ने जनता के पैसे से जनता को लेपटाप बंटवाने का काम शुरू कर दिया है. अरे भाई! कंप्यूटर कंपनियों के डिस्ट्रीब्यूटर हो या प्रदेश के मुख्यमंत्री. किसी ने सही ही कहा था कि जिन्हें गाय-बकरियां चरानी थी वो आज देश और प्रदेश चलाते हैं, यही मेरे भारत का दुर्भाग्य है.

कर्नाटक के एक मुख्मंत्री ने सारी खानें खोद डाली, तो कोयला मंत्री ने आव देखा ना ताव सारा कोयला, कोयले के दामों में बेच दिया. संचार मंत्री को सूचना लगी तो बोले कि मैं तो पीछे रह गया, उसने सारे स्पेक्ट्रम औने-पौने दामों में बेच दिये, और फिर जब किसी ने मौनी बाबा से प्रश्न पूछे तो बाबा बोले, कि मैं ईमानदार हूँ, इससे अधिक मैं कुछ नहीं जानता हूँ.      

जिन व्यक्तिओं को तिहाड के अन्दर होना था वो बाहर बैठे हैं और जो बाहर रहने लायक हैं, उन्हें अन्दर करने की जुगत निरंतर जारी है. जिन पत्रकारिता समूहों ने जनता को जागरुक करने के लिए समाचार चैनल खोले थे, अब वो अपना कार्य छोडकर अलग-अलग राजनीतिक शक्तियों के सम्मान गान जनता को सुनाते हैं. क्रिकेट खिलाड़ी, क्रिकेट अच्छा खेलें या नहीं परन्तु सामान बेचना खूब जानते हैं.

ना फिल्में अच्छी नहीं बन रही हैं और ना देश सही से चल रहा है, क्योंकि नेता और अभिनेता दोनों क्रिकेट में, और क्रिकेटर सट्टेबाजी में व्यस्त हैं.  दोयम दर्जे की विदेशी अभिनेत्रियाँ भारतीय फिल्मों में प्रथम दर्जे में अभिनय कर रही हैं और प्रथम श्रेणी की भारतीय अभिनेत्रियाँ तृतीय श्रेणी के कार्यों में लगी हैं. देश के युवा आई पी एल  देख रहे हैं, कुछ फेसबुक से खेल रहे हैं, और बांकी बचे हुए ‘बिग-बाँस’ देख रहे हैं.

जिन अपराधियों की विशेषज्ञता दादागिरी, हत्याएं, बलात्कार और चोर-बाजारी में थी, वो आज अपना काम छोड़कर संसद में बैठकर, जनता के लिये योजनाएं और नियम कानून बनाते हैं, और जो लोग देश का भला करना चाहते हैं वो जंतर-मंतर, रामलीला मैदान या फिर इंडिया गेट में देखे जाते हैं.

इसके विपरीत जो व्यक्ति अपना काम ईमानदारी से पूरा करना चाहता है, उसे दूसरा काम दे दिया जाता है, यदि इसे भी ईमानदारी से करे तो तीसरा काम दे दिया जाता है, मतलब ट्रांसफर कर दिया जाता है.   

स्थिति बड़ी विकट है, किसी भी ओर देख लीजिये  हर कोई अपना काम छोड़कर दुसरे का काम, और दूसरा, तीसरे का काम कर रहा है, पर पता नहीं हे भगवान! ये डंडा कब बाजेगा?  



आज़ादी ही कुछ और है (व्यंग्य कविता)


रोज दफ्तरों के चक्कर लगाने की 
चपरासी को भी ‘सर’ कह कर बुलाने की 
अंततः जेब गरम कर के काम करवाने की 
फिर भी ईमानदार भारतीय कहलाने की
आज़ादी ही कुछ और है|१

काला धन कमाने की
खाने में जहर मिलाने की 
बेईमान को सीना तान के चलने की
ईमानदार हो? तो डर के रहने की  
आज़ादी ही कुछ और है|२

कन्या भ्रूण हत्या की
महिला के यौन शोषण की
सामूहिक बलात्कार करने की
और फिर बहन से राखी बंधवाने की 
आज़ादी ही कुछ और है|३

पेट में चाकू भौंकने की
चेहरे को तेज़ाब से छोंकने की
चलते को दिन दहाड़े लूटने की 
और लुटते पिटते को शान्ति से देखने की 
आज़ादी ही कुछ और है|४

पानी मोटर से खींचने की 
बिजली का मीटर रोकने की
घर का कूड़ा सड़क पर फेंकने की
और फिर सरकार को कोसने की 
आज़ादी ही कुछ और है|५

पंचायत बिठाने की 
प्रेमियों को लटकाने की 
बहु से दहेज मंगाने की 
नहीं तो शमशान तक पहुंचाने की
आज़ादी ही कुछ और है|६

भ्रष्टाचार करने की
गलत देख मूक बनने की
बिना टिकट यात्रा करने की
फिर विंडो सीट के लिए झगड़ने की 
आज़ादी ही कुछ और है|७

पैसे से काम करवाने की 
नकली डिग्रियां बंटवाने की
वोट के बदले नोट दिलवाने की 
और फिर भी माननीय कहलाने की 
आज़ादी ही कुछ और है|८

गरीब को भूखे पेट सोने की
बाल-मजदूरी पर रोने की
नदियों में गंदगी मिलाने की 
और फिर गंगा स्नान के लिए जाने की
आज़ादी ही कुछ और है|९

जंगलों को अंधाधुन्ध काटने की 
अपनों को रेवड़ी बांटने की
सच्चे को फंसाने, और झूठे को बचाने की
फिर कलियुग पर दोष लगाने की 
आज़ादी ही कुछ और है|१०

अपनी बीबी को कोसने की 
पडोसन के बारे में सोचने की
घर से निकलते ही घूरने की 
घर में बीबी-बच्चों को पीटने की 
आज़ादी ही कुछ और है|११

महिला सीट पर बैठने की
चलती गाडी से कूदने की 
पान खा के थूकने की
और दीवार पे मूतने की
आज़ादी ही कुछ और है|१२

शुक्रवार, 23 जून 2017

मेरी रूहानी यात्रा ... ब्लॉग से उमेश पंत




Blog - Gullak - पहला पन्ना - Gullak


तस्वीरें बहुत कुछ कहती हैं 
बुलाती हैं अपने पास - बहुत कुछ सुनाने को 
तो चलते हैं न  ... 


खोई हुई एक चीज़


कविता
यहीं कहीं तो रख्खी थी

दिल के पलंग पर
यादों के सिरहाने के नीचे  शायद
या फिर वक्त की
जंग लगी अलमारी के ऊपर

तनहाई की मेज पे या फिर
उदासियों की मुड़ी तुड़ी चादर के नीचे ?
यहीं कहीं तो रख्खी थी

कुछ तो रखकर भूल गया हूं
आंखिर क्या था
ये भी याद नहीं आता

कई दिनों से ढूंढ रहा हूं
वो बेनाम सी ,बेरंग
और बेशक्ल सी कोई चीज़

ऐसी चींजें खोकर वापस मिलती हैं क्या ?

एक-दूजे की ज़िंदगी में
हम दोनों भी ऐसी ही खोई हुई एक चीज़ हैं न ?

मैं फिर भी कोशिश करता हूं
तुम तो अब ढूंढना भी शायद भूल गई हो



ट्रेन के छूटने का वक्त


कुछ रिश्ते
जैसे बहुत जल्दी बहुत पास आ जाते हैं
आते हैं लेकर
जरा सी फिक्र, जरा सा प्यार, जरा जरा अपनापन भी

कुछ रिश्ते जैसे उन एक दिन के मेहमानों के से होते हैं
जिनको छोड़ आते हैं हम स्टेशन
जो चढ चुके होते हैं ट्रेन में
जिनसे कह चुके होते हैं हम अलविदा
ना चाहने के बावजूद हो चुका होता है
जिनकी ट्रेन के छूटने का वक्त
घुल जाता है हथेली की रेखाओं में कहीं
जिनके हाथों का स्पर्श
रह जाती है आंखो में अलविदा कहती मुस्कान
छूट जाती हैं पीछे दो खाली पटरियां
तकती हुई जिनकी वापसी की राह

कुछ रिश्ते
जैसे बहुत जल्दी दूर चले जाते हैं
छोड़ जाते हैं पीछे
जरा सी कसक, जरा सा इंतजार, जरा जरा अधूरापन भी


गुरुवार, 22 जून 2017

मेरी रूहानी यात्रा ... ब्लॉग से वंदना अवस्थी





वन्दना अवस्थी दुबे



कुछ खास नहीं....वक्त के साथ चलने की कोशिश कर रही हूं.........

मैं वक़्त हूँ 
देखता हूँ कोशिशों को 
थाम लेता हूँ उन कहानियों को 
उन एहसासों को 
जो समंदर होने का दम रखती हैं  ... 
जो मेरे साथ चले, वह समंदर है - जो निःसंदेह खारा है तो मीठा भी, चखो तो हर बार 

किस्सा-कहानी


क्या फ़र्क पड़ता है ?
===============

सर्दियों की
गुनगुनी धूप सेंकतीं औरतें,
उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता
किसी घोटाले से,
करोड़ों के घोटाले से,
या उससे भी ज़्यादा के.
गर्मियों की दोपहर में
गपियाती ,
फ़ुरसत से एड़ियां रगड़ती औरतें,
वे नहीं जानतीं
ओबामा और ओसामा के बीच का फ़र्क,
जानना भी नहीं चाहतीं.
उन्हें उत्तेजित नहीं करता
अन्ना का अनशन पर बैठना,
या लोगों का रैली निकालना.
किसी घोटाले के पर्दाफ़ाश होने
या किसी मिशन में
एक आतंकी के मारे जाने से
उन्हें क्या फ़र्क पड़ता है?
या किसी को भी क्या फ़र्क पड़ता है?
ये कि अब आतंकी नहीं होंगे?
कि अब भ्रष्टाचार नहीं होगा?
कि अब घोटाले नहीं होंगे?
इसीलिये क्या फ़र्क पड़ता है,
यदि चंद औरतें
देश-दुनिया की खबरों में
दिलचस्पी न लें तो?
कम स कम इस मुग़ालते में तो हैं,
कि सब कुछ कितना अच्छा है!


प्रिया की डायरी
===========


"प्रिया...रूमाल कहां रख दिये? एक भी नहीं मिल रहा."
" अरे! मेरा चश्मा कहाँ है? कहा रख दिया उठा के?"
" टेबल पर मेरी एक फ़ाइल रखी थी, कहाँ रख दी सहेज के?"
दौड़ के रूमाल दिया प्रिया ने.
गिरते-पड़ते चश्मा पकड़ाया प्रिया ने.
सामने रखी फ़ाइल उठा के दी प्रिया ने.
" ये क्या बना के रख दिया? पता नहीं क्या करती रहती हो तुम? कायदे का नाश्ता तक बना के नहीं दे सकतीं...."
रुआंसी हो आई प्रिया.

अनंत के ऑफ़िस जाते ही धम्म से सोफ़े पर बैठ गई . सुबह पांच बजे से शुरु होने वाली प्रिया की भाग-दौड़, अनन्त के ऑफ़िस जाने के बाद ही थमती थी. सुबह अलार्म बजते ही प्रिया बिस्तर छोड़ देती है. आंखें बाद में खोलती है, चाय पहले चढा देती है. उसके बाद दोनों बच्चों का टिफ़िन बनाने, यूनिफ़ॉर्म पहनाने,बस स्टॉप तक
छोड़ने, फिर अनन्त की तमाम ज़रूरतें पूरी करने उन्हें ऑफ़िस भेजने में नौ कब बज जाते, पता ही नहीं चलता. सुबह से प्रिय को चाय तक पीने का समय नहीं मिलता. नौ बजे प्रिया आराम से बैठ के चाय पीती है.

फिर शुरु होता सफ़ाई का काम. बच्चों का कमरा, अपना कमरा, ड्रॉंइंग रूम सब व्यवस्थित करती. साथ ही कपड़ा धुलाई भी चलती रहती. नहाते और खाना बनाते उसे एक बज जाता. फ़ुर्सत की सांस ले, उससे पहले ही बच्चों के आने का टाइम हो जाता, और स्टॉप की तरफ़ भागती प्रिया. दोनों बच्चों के कपड़े बदलते, खाना खिलाते-खिलाते ही अनन्त के आने का समय हो जाता. अनन्त का लंच दो बजे होता है.उन्हें खाना दे, खुद खाने बैठती. अनन्त के जाने के बाद पूरा किचन समेटती, बर्तन ख़ाली करती,घड़ी तब तक साढ़े तीन बजाने लगती.

थोड़ी देर आराम करने की सोचती है प्रिया. अभी बिस्तर पर लेटी ही थी कि फोन घनघनाने लगा. रोज़ ही ऐसा होता है. कई बार तो बस टेलीफोन कम्पनियों के ही फोन होते हैं, लेकिन उठ के जाना तो पड़ता ही है न! कई बार सोचती है प्रिया, कि लैंड लाइन फोन कटवा दे, लेकिन बस सोचती ही है.

पाँच कब बज जाते हैं, उसे पता ही नहीं चलता. पाँच बजते ही फिर काम शुरु. बच्चों को दूध दिया, अपने लिये चाय बनाई. बच्चों को सामने वाले पार्क में खेलने भेज के खुद रात के खाने की तैयारी शुरु कर देती
है. अभी तैयारी कर के न रक्खे, तो बच्चों को पढाये कब? साढ़े छह बजे बच्चों को पढाने बैठती. उनका होमवर्क या टैस्ट जो भी होता, उसके तैयारी करवाती.साढ़े सात बजे अनन्त आ जाते. आते ही नहाते और पेपर ले के टी.वी. के सामने बैठ जाते. बच्चों का शोर पसंद नहीं उन्हें. बच्चे शोर करते तो झल्लाते प्रिया के ऊपर, जैसे इसके पीछे प्रिया का हाथ हो!

कभी बच्चों का झगड़ा निपटवाती , तो कभी रसोई में सब्जी चलाती , हलकान हो जाती है प्रिया.
रात का खाना होते , बच्चों को सुलाते , किचेन समेटते साढ़े दस बज जाते. मतलब सुबह पाँच बजे से लेकर रात साढ़े दस बजे तक जुटी रहती है प्रिया. अनन्त की ड्यूटी सुबह नौ बजे शुरु होती है,

और सात बजे खत्म, यानी दस घंटे. और प्रिया की? सुबह पांच बजे से रात साढ़े दस बजे तक! साढ़े सत्रह घंटे! उसके बाद भी सुनना यही पड़ता है, कि करती क्या हो??? दिन भर तो घर में रहती हो!!!

मतलब घर का काम, काम नहीं है? बाहर नौकरी करने पर ही कुछकरना कहलायेगा?

बहुत बुरा लगता है प्रिया को, जब अनन्त दूसरी कामकाजी महिलाओं से उसकी तुलना करते हैं, और कमतर आंकते हैं.

चाहे तो प्रिया भी नौकरी करने लगे. अच्छी भली एम.ए. बी.एड.है. किसे भी प्रायवेट स्कूल में नौकरी मिल ही जायेगी. पिछले साल तो डब्बू की प्रिंसिपल ने उससे कहा भी था, हिन्दी टीचर की जगह ख़ाली होने पर. उसने ही मना कर दिया था. अपनी सारी इच्छाएं, सारे शौक घर के काम के नाम कर दिये, और हाथ में
क्या आया? निठल्ले की उपाधि?

"करती क्या हो-करती क्या हो.." सुनते- सुनते प्रिया भी उकता गई है. सो इस बार जब डब्बू का रिज़ल्ट लेने गई तो अपना रिज़्यूम भी थमा आई प्रिंसिपल को. उन्होंने कहा- " मैने तो पहले ही आपसे कहा था. आपके जैसी ट्रेंड टीचर को अपने स्टाफ़ में शामिल कर के बहुत खुशी होगी हमें". एक अप्रैल से ही डैमो के लिये आने को कहा,. एक अप्रैल!! यानी तीन दिन बाद ही!

घर में नयी व्यवस्थाएं शुरु कर दीं उसने. सबसे पहले अनन्त को बताया- कि " लो. अब कुछ न करने की शिक़ायत दूर होगी तुम्हारी" अनन्त अवाक!!
"अरे! कैसे होगा?"
"होगा. जैसे और कामकाजी महिलाओं के घर होता है." प्रिया ने भी लापरवाही से जवाब दिया.
"तुम्हें भी काम में हाथ बंटाना होगा".
क्या कहते अनन्त? खुद ही तो सहकर्मी महिलाओं का उदाहरण देते थे.
घर के नये नियमों का बाक़ायदा लिखित प्रारूप तैयार किया प्रिया ने. अनन्त को पकड़ाया-
नियमावली-
सुबह पांच बजे उठना होगा.
अपने कपड़े खुद तैयार करने होंगे.
अपना सामान खुद व्यवस्थित रखना होगा.
बच्चों को छोड़ने स्टॉप तक जाना होगा.
टिफ़िन साथ में ले जाना होगा.
शाम को बच्चों का होमवर्क कराना होगा, क्योंकि उस वक्त प्रिया को सुबह के खाने की तैयारी करनी होगी.

" ये कौन से मुश्किल काम हैं? तुम्हें क्या लगता है, मैं नहीं कर पाउंगा?"
" न. कोई मुश्किल काम नहीं हैं. तुम कर पाओगे, मुझे पूरा भरोसा है" कहते हुए हंसी आ गई थी प्रिया को. जानती थी, कितना मुश्किल है अनन्त के लिये सुबह पांच बजे उठना. ये भी जानती थी, कि यदि वो शुरु से ही नौकरी कर रही होती, तो पूरा रुटीन उसी तरह बना होता सबका. अब जबकि सबकी निर्भरता प्रिया पर है, तब दिक्कत तो होगी न? लेकिन कोई ये कहां मानता है कि उसके नहीं होने से दिक्कत भी हो सकती है? यही तो साबित करना चाहती है प्रिया.

आज से प्रिया को स्कूल ज्वाइन करना था. तीन बार उठा चुकी अनन्त को, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं. अनन्त के चक्कर में स्कूल बस भी निकल गई. अनन्त अभी भी सो रहे थे. सैकेंड ट्रिप की बस में प्रिया को जाना था. जल्दी-जल्दी उसने नोट लिखा-

" तुम्हारे समय पर न उठने के कारण बच्चे स्कूल नहीं जा सके. अब अब तुम्हें लंच तक की छुट्टी लेनी होगी"

नोट टेबल पर दबा के रखा, और भागी प्रिया. उठने के बाद अनन्त पर क्या बीती, ये तो वही जानता है.
अगले तीन दिनों में सबकी दिनचर्या अस्त-व्यस्त हो गयी.अनन्त बच्चों को ठीक से पढा ही नहीं पा रहे थे. बच्चों ने एलान कर दिया कि वे पापा से नहीं पढ़ेंगे।

रात में अनन्त ने अनुनय भरे स्वर में कहा-
" प्रिया, ये घर तुम्हारे बिना नहीं चलने का. तुम्हारा घर में रहना कितना अहम है, ये मैं पहले भी जानता था, और अब तो बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहा हूं. अभी तो तुम्हारा डैमो चल रहा है, तुम अगर सचमुच नौकरी करना चाहती हो, तो करो, लेकिन हम सबको तुम्हारी ज़रूरत है."
अंधेरे में भी अनन्त ने महसूस किया कि प्रिया मुस्कुरा रही है, विजयी मुस्कान, लेकिन अनन्त को प्रिया की यह जीत मंजूर थी। :)




बुधवार, 21 जून 2017

21 जून अंतरराष्ट्रीय योग दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (अंग्रेज़ी: International Yoga Day) को प्रतिवर्ष '21 जून' को मनाने का निर्णय संयुक्त राष्ट्र द्वारा लिया गया है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील पर संयुक्त राष्ट्र ने '21 जून' को 'विश्व योग दिवस' घोषित किया है। योग हज़ारों साल से भारतीयों की जीवन शैली का हिस्सा रहा है। ये भारत की धरोहर है। विश्व के कई हिस्सों में इसका प्रचार-प्रसार हो चुका है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के इस निर्णय के बाद उम्मीद की जा रही है कि अब इसका विस्तार और भी तेज़ी से होगा।

'अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' को मनाये जाने की पहल भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 सितम्बर, 2014 को 'संयुक्त राष्ट्र महासभा' में अपने भाषण में रखकर की थी, जिसके बाद '21 जून' को 'अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' घोषित किया गया। 11 दिसम्बर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्यों द्वारा 21 जून को 'अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली। प्रधानमंत्री मोदी के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय है।

'अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' को मनाये जाने की पहल भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 सितम्बर, 2014 को 'संयुक्त राष्ट्र महासभा' में अपने भाषण में रखकर की थी, जिसके बाद '21 जून' को 'अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' घोषित किया गया। 11 दिसम्बर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्यों द्वारा 21 जून को 'अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली। प्रधानमंत्री मोदी के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय है।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर... अभिनन्दन।। 

मंगलवार, 20 जून 2017

मेरी रूहानी यात्रा ... ब्लॉग से फेसबुक सुशोभित सक्तावत








सुशोभित सक्तावत - चाँद कौन छिनेगा ?
चाँद यही था  ... तुम्हारी उम्र को वह अपने शुक्ल पक्ष से असंख्य चांदनी भर के देता, नीलआर्मस्ट्रोंग से चाँद  ने कोई दोस्ती नहीं की।  कभी नहीं 
चाँद जो था, उसका पूरा वजुद उनलोगों ने मिटा दिया 
चाँद उसी समय अपनी बुढ़िया माँ के साथ उनके पास  लौट आया था, जिनके पास चाँद के लिए कहानियाँ थीं और सोने के कटोरे में दूध भात :) 




"चंद्रमा", हम और नील आर्मस्‍ट्रांग
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चंद्रमा का चरखा सपनों का सूत कातता था, जिसमें हम "दूधमोगरे" की लड़ियां पिरोते थे।
चंद्रमा "एक" था। जिस दिन नील आर्मस्‍ट्रांग ने चंद्रमा पर चहलक़दमी की, उसी दिन चंद्रमा "दो" हो गए। एक हमारा चांद, दूजा नील आर्मस्‍ट्रांग का चांद।
फिर चंद्रमा बारह हुए, फिर अठाइस। चंद्रमा की कलाएं बढ़ती गईं। और एक दिन हमने पाया कि चंद्रमा वहां नहीं था, जहां वह होता था, वैसा नहीं था, जैसा वह दिखता था। वास्‍तव में, अब सभी के पास अपने-अपने चंद्रमा थे।
एकबारगी हमें लगा नील आर्मस्‍ट्रांग ने हमारा चंद्रमा छीन लिया है।
अब हम चांदनी के सफ़ेद फूलों से अपनी रातों को नहीं सजा सकते थे। चांद अब केवल धरती का उपग्रह था, एक रूखा-सूखा पिंड, जिसे "अपोलो-11" ने फ़तेह कर लिया था। लेकिन सच पूछो तो हम इसके लिए कभी नील आर्मस्‍ट्रांग से नाराज़ नहीं हुए।
20 जुलाई 1969 की सुबह तो हमारे रोमांच का कोई ठौर न था। हम चंद्रमा पर थे। नील आर्मस्‍ट्रांग चंद्रमा पर हमारा प्रतिनिधि था। हम बेहद ख़ुश थे और अलबत्‍ता हमारे मन में एक टीस भी थी, पर हम उस टीस को भरसक छुपा गए थे। हम विज्ञान के विजय-पर्व पर ख़ुद को एक बौड़म भाववादी नहीं साबित करना चाहते थे।
उस दिन हम उस चंद्रमा का कोई जिक्र नहीं करना चाहते थे, जिसे हमने चुपचाप अपने भीतर पोसा था।
नील आर्मस्‍ट्रांग को चंद्रमा पर चरखा कातने वाली कोई बुढ़ि‍या नहीं मिली थी। वहां न दूध के समुद्र थे, न रूई के पहाड़। चांद का मुंह तो टेढ़ा था। वह दाग़दार था। वहां केवल धूल के ग़ुबार और बड़े-बड़े गड्ढे थे। "चलो दिलदार चलो" गाने वालों के लिए वह क़तई उपयुक्‍त जगह नहीं थी।
लेकिन हम उस मीठे अफ़सोस को ख़ामोशी से जज्‍़ब कर गए। चंद्रमा एक से दो हो गया था, दो से बारह, बारह से अठाइस। उस दिन के बाद चंद्रमा से हमारा रिश्‍ता बदल गया। उस रिश्‍ते में एक सहज द्वैत आ गया और हमने इस द्वैत को स्‍वीकार कर लिया।
लेकिन कविताओं और कल्‍पनाओं में चंद्रमा को उसके बाद जगह मिलना बंद हो गई, ऐसा नहीं है। हम जानते थे कि चंद्रमा एक भौतिक तथ्‍य है, धूल-मिट्टी है, तब भी उसे अपने भीतर जगह देते रहे।
चंद्रमा की हक़ीक़तों को हमने साइंस की किताबों तक मेहदूद कर दिया और अपना-अपना चांद बचा लाए : चवन्‍नी की तरह। चंद्रमा अब भी हमारा कल्‍पतरु था : रोशनी का एक दरख्‍़त। हम एक दरपेश सच्‍चाई को मुंह चिढ़ाने लगे।
हम हमेशा ऐसा करते हैं। हर उस चीज़ के साथ ऐसा करते हैं, जिससे बहुत प्‍यार करते हैं। हम उसकी तमाम हक़ीक़तों को जानते-बूझते हैं, तब भी उसे अपना चंद्रमा बनाकर मन में बसाते हैं और चुपचाप उसे प्‍यार करते हैं। कि हम प्यार में ख़ुद को जानबूझकर कितना छलते हैं! छलते नहीं थकते!
साल 2012 में जब नील आर्मस्‍ट्रांग की मौत हुई, तो वह अपने पीछे चंद्रमा छोड़कर चला गया।
मैं दावे से कह सकता हूं ख़ुदावंद को उसके पास से कोई चांद बरामद नहीं हुआ होगा। चंद्रमा उसका था भी नहीं। चंद्रमा हमारा है। चंद्रमा हर उस शख्‍़स का है, जो उसके बिम्‍ब को अपने भीतर जगह देता है : प्‍यार की चांदनी की तरह, जिसके लिए हमारा दिल एक आंगन है। हमेशा से हमेशा तक।

जिसने कभी चांद पर चलने की कोशिश की थी
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"जैक्सन की मौत नहीं हुई थी, वह केवल अपने प्लैनेट वापस लौट गया था!"
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ये अफ़वाहों और अंधड़ों की कहानी है!
अजीब बात है, लेकिन इस कहानी की शुरुआत एक जवान मौत के इर्द-गिर्द होती है... और एक क़त्‍ल के भी. गोया ये अपने आपमें एक 'थ्रिलर' हो. लेकिन सचाई ये ही है कि इस पूरी कहानी पर एक अजब तरह का स्‍याह रंग छाया हुआ है और इससे भी बड़ी सचाई ये है कि एक निहायत उजले इलाक़े तक भी इस कहानी की तफ़सीलें पहुंचती हैं...दरअसल, ये स्‍याह और उजले की आपसी कशमकश वाली कहानी है, जिसमें शोहरत के नश्‍तर हैं, तो प्रतिमाओं का धुंधलका भी...ये अफ़वाहों की क़तरनें जोड़कर बनाई गई एक अजीबोग़रीब कहानी है.
इस कहानी की शुरुआत अटलांटिक के दूसरी तरफ़ से होती है!
जबकि समंदर के इस तरफ़ बीटल्‍स का वो शीराज़ा बिखर चुका था...योरोप में सन्‍नाटा था, अमरीका में नई आहटों की महज़ दबी-घुटी आवाज़ें... 'रॉक' संगीत के गिटार की भर्राई हुई आवाज़ मद्धम पड़ती जा रही थी, और 'रिदम एंड ब्‍ल्‍यूज़' की अफ्रीकी-अमरीकी ध्‍वनियों को नई पहचान की तलाश थी. जॉन लेनॅन के क़त्‍ल की ख़बर तो बाद में आती है, लेकिन ऐल्विस प्रेस्‍ले की मौत का अफ़सोसनाक वाक़या दुनियाभर के उन लोगों के कलेजे में गड़ा हुआ था, जो मौसिक़ी से मोहब्‍बत करते हैं.
ऐन इसी दौरान अटलांटिक के उस तरफ़ "जैक्‍सन फ़ाइव" के कमसिन लड़कों ने गाना-गुनगुनाना शुरू किया था. वे लोग 'न्‍यू जैक स्विंग' के ताज़ातरीन शगूफ़े में पूरी ताक़त से शुमार थे. इस अफ़साने में डायना रॉस शुरू से ही शामिल रहीं, और क्विन्सी जोन्स तो इस कहानी का आलातरीन क़िरदार है.
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ये कहानी तब शुरू होती है जब जोसेफ़ जैक्‍सन की बीवी एक दोपहर उसे आकर बताती है कि बग़ल वाले कमरे में माइकल कुछ गुनगुना रहा है... जोसेफ़ एक ठंडी मुस्‍कराहट के साथ कहते हैं - हां, मैंने सुना... जरमाइन से कह दो कि अपनी गिटार उसे सौंप दे.
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बहुत शुरुआत में इस कहानी में "जैक्‍सन फ़ाइव" के लड़कों की मासूम आवाज़ें शामिल थीं, जो 'एबीसी', 'आई वांट यू बैक', और फिर 'द लव यू सेव' में नुमायां हुईं. बिलबोर्ड ने इन नवागतों को टॉप चार्ट से नवाज़ा, लेकिन इस ग्रुप के कुल जमा ग्‍यारह बरस उम्र वाले 'लीड वोकल' को एक नई ज़मीन गढ़ना थी, जिस पर उसे नए क्षितिज रखने थे. 'ऑफ़ द वॉल' तो ख़ैर बाद में आया, लेकिन उसके पीछे की बुनावटें उस लड़के के ज़ेहन में तरतीब लेने लग‍ी थीं. वो 70 के सालों की आख़िरी सुगबुगाहटें थीं.
'रॉक विद यू' सुनकर स्‍टीफ़न स्पिलबर्ग ने एक नए चमत्‍कार के साक्षी होने की बात कही थी, अगरचे वो भी एक दूसरी कहानी मानी जाए, तब भी 'थ्रिलर' तक आते-आते उस चमत्‍कार को हक़ीक़त में तब्‍दील होते सभी ने देखा. 82 के साल में सामने आया 'थ्रिलर' कई मायनों में एक फ़ि‍नामिना था, और उसने पॉपुलर संगीत की पिछली तमाम परिभाषाएं बदलकर रख दीं. अब इसमें रॉक, या जैज़, या ब्‍ल्‍यूज़ का इकहरापन नहीं था...इसमें शामिल थीं फ़ंक, सोल, गोस्‍पेल और बैलेड तक की‍ ख़राशें. बीटल्‍स के सॉफ़्ट रॉक और हार्ड रॉक भी इसमें शुमार थे. बाद में न्यू जैक स्विंग का हिपहॉप भी इसमें जुड़ा.
अब चौबीस बरस के हो चुके उस लड़के के क़दमों के नीचे से ज़मीन को फिसलते हुए 'मोटाउन 25' में पूरी दुनिया ने देखा. उसके पैरों में बिजलियां थीं और उसने 'ज़ीरो ग्रेविटी' को झुठला दिया था. इस कहानी में 80 के दशक का गर्म ख़ून और मांस के दरिया की मचलती मछलियां शामिल थीं. 'बिली जीन' और 'बीट इट' पश्चिमी पॉप के नए सूत्रगान बन चुके थे. लड़के की आवाज़ के पीछे म्‍यूजिक वीडियोज़ के तिलिस्‍मी परदे लहराते रहे. देखने-सुनने वालों ने अचरज के साथ ये तमाम नई चीज़ें देखीं और उस सितारे का नाम अच्‍छी तरह से अपने ज़ेहन में टांक लिया.
'वी आर द वर्ल्‍ड' के साथ उसने बहुत शुरुआत में ही दुनिया-जहान की आदमियत से एक वादा कर लिया था. उसके बाद उसने उस वादे को हर बार निभाया. रियो-डी-जेनेरियो की संकरी गलियों में बच्‍चों के साथ और उनके लिए 'दे डोंट रियली केयर अबाउट अस' गाते-गुनगुनाते हमने उसे देखा था, तो नेवरलैंड के परियों के संसार में भी वो हमें मिला. 'मैन इन द मिरर' के बाद वो 'हील द वर्ल्‍ड' लेकर आया, तो सबसे आख़ि‍र में आत्‍मा की अतल गहराइयों से उपजा हुआ 'अर्थ सॉन्‍ग'...जिसके बाद अब उसका कोई अंत नहीं था. उसे सुनने वाली अवाम अपनापे से भरे उस चेहरे को हमेशा पहचानती रही...आंसुओं में सबसे ज्‍़यादा.
उसका संगीत वक्‍़त के साथ गाढ़ा होता गया. 'यू आर नॉट अलोन' को उसने एक अनचीन्‍हीं मिठास से भर दिया, तो 'रिमेंबर द टाइम' में उसने गति और ठहराव के नए आयाम खोजे. 'जैम' और 'डर्टी डायना' में उसने अपनी उद्दाम कामुकता को उघाड़कर सामने रख दिया था, तब भी, 'स्‍ट्रेंजर इन मॉस्‍को' की बेपनाह तनहाइयों में उसकी रूह तड़कती रही. वो पिघला हुआ शीशा सभी ने देखा... ये शीशा उसके गले में शहद बन जाया करता था...और उसकी आवाज़ हमारा आइना. 'बैड' और 'डेंजरस' के साथ वो आवाज़ों के नए-नए मौसम गढ़ता रहा, और 'हिस्‍ट्री' तक पहुंचते-पहुंचते उसका संगीत एक लाजवाब शराब बन गया.
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ये शोर और भीड़ के बीचोबीच वाले अकेलेपन की एक कहानी है... ये लांछन, पराजय और अफ़वाहों से भरा एक अफ़साना है, जिसमें रोशनी के तेज़गाम साये सरकते रहे, बेलगाम चीख़ें और बेहोशियां गुमी रहीं... वो चमत्‍कार हमारी नज़रों के सामने ही हुआ, वो मिथक उठा, और फिर उसे कीचड़ में लथपथ होते देख एक चीप और मीडि‍याकॅर क़ि‍स्‍म की ख़ुशी भी हमने ही हासिल की.
वो उस सब के लायक़ था, जो कुछ उसने हासिल किया... और जो कुछ उसे मिला.
ये सनसनीख़ेज़ ख़बरों सरीखी दिलचस्‍प तफ़सीलों वाली कहानी है, जिससे सालोंसाल अख़बारनवीसों की रूहें तस्‍क़ीन पाती रहीं... और फिर उसकी मौत के बाद भी. सुइयों से छिदी उसकी देह दवाइयों की तेज़ गंध में गुमती रही...'इनविंसिबल' के बाद वो जो डूबा, तो फिर उबर नहीं सका... उसकी आख़ि‍री मेहफ़ि‍लों के लिए मेहमान सब जुट चुके थे, लेकिन वो ग़ैर-मौजूद रहा... वो अब वहां कभी नहीं पहुंच सकेगा.
ये एक बहुत-बहुत स्‍याह, और एक बहुत-बहुत उजली कहानी है...उसकी चमड़ी के बदलते रंग सरीखी... जैसे दिन और रात के एकसाथ सच होने की कोई तिलिस्‍माई तरक़ीब हो...बहरा कर देने वाले उन्‍मादी शोर के बीच हम उसे देख रहे हैं...सुन रहे हैं... और वक्‍़त? वो कहीं नहीं है!
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ये मौत के आख़ि‍री दरवाज़े के पीछे से झांकते माइकल जैक्‍सन की कहानी है, जिसने कभी चांद पर चलने की कोशिश की थी...वो आज भी चुपचाप चांद की वो गिटार बजा रहा है- जो जरमाइन ने एक बहुत पुरानी दोपहर आंसू और ख़ून के वि‍रसे के साथ उसे सौंपी थी!
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[ जून जैक्सन का महीना है. जून में जैक्सन की बहुत याद आती है. वो आज होता तो साठ का हो जाता. यह लेख आठ साल पहले लिखा था. कच्ची लिखावट है फिर भी लगा रहा हूँ. जैक्सन पर नया लिखने की वक़अत अब नहीं. बाय द वे, सुशोभित ने जैक्सन पर एक पूरी किताब लिखी है, इंशाअल्ला जिस दिन वो छपेगी, हंगामा बरपेगा ]

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