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शुक्रवार, 19 मई 2017

मेरी रूहानी यात्रा जयश्री राय


मैं दौड़ने लगती हूँ 
जब कोई इकहरी हरी घास मुझे दिखती है 
ढूँढती हूँ जड़ें 
कहाँ से ये पनपी हैं !
स्वतः तो नहीं निकल पडी धरती से 
मिट्टी ने साथ दिया 
बारिश की बूंदों ने आवाज़ दी 
मिट्टी को नम किया 
जड़ें इठलाईं 
और एक हरी घास 
बहार का संदेशा ले आई  ... 


जयश्री राय 
इनका कोई ब्लॉग तो मुझे नहीं मिला, लेकिन इनकी उपस्थिति कई ब्लॉग पर मुझे मिली।  
देश के प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिाकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। कविता संकलन 'तुम्हारे लिए' के साथ कहानी पुस्तक 'अनकही' प्रकाशित। पिफल्मों में अभिनय के साथ फ्रीलांस पत्राकारिता भी की। इन दिनों स्वतंत्रा लेखन।

लोग गंगा जल लेकर आते हैं, मैं शब्दों, भावनाओं की नर्म दूब लेकर आई हूँ -


  औरत जो नदी है  उनका उपन्यास है, बहुतों ने पढ़ा होगा, यदि नहीं पढ़ा तो गूगल पर इनका नाम लिखकर इन तक पहुँचे, मेरी तरफ से आपकी रूचि के आगे एक रास्ता है उनकी रचना -


औरत जो नदी है


मार्च का महीना - हमेशा की तरह उदास और उलंग... धूल के अनवरत उठते बवंडर के बीच पलाश की निर्वसन डालों पर सुलगते रंगों की अनायास खुलती गाँठें और हवा में उड़ते सेमल के रेशमी फूलों के दिन - सपनों के अँखुआने और निःशब्द झर जाने का वही वेमुरव्वत मौसम... ये सिरे से उदास हो जाने के दिन थे और मैं इसी अहसास में हर साँस जज्ब था जब मैंने उस कौंधती आँखोंवाली औरत को पहली बार देखा था - पतझड़ के अकेले फूल की तरह - मलिन और आँसुओं के नमक में घुली हुई, साथ ही विवर्ण और बेतरह उदास भी... पलकों की गहरी साँवली पाँत के बीच नीली लपटों में धधकती उन आँखों की चावनी में मानों अपरिहार्य मृत्यु का खुला निमंत्रण और जीवन का अंतहीन शोक था।

उसे देखकर मुझे मेरे अंदर की खामोश मुरादों और हवस का खयाल आया था। उन बेशक्ल अहसासों का जैसे जिंदा चेहरा थी वह - सुहाग के गाढ़े रंगों में लिपटी एक उदास जोगन की तरह... मैं उन दिनों जीना चाहता था, इसलिए एकदम से मरने के लिए तैयार हो गया। कुछ जिंदगियाँ मौत की कीमत पर ही मिलती हैं, उस क्षण का एकमात्र सच शायद यही था।

कायदे से मुझे उस सांघातिक क्षण की हर बात शब्द-शब्द याद होनी चाहिए थी, मगर हवा में ओर-छोर पसरे जादू के उस मौसम में बस उसकी वे दो दिपती हुई आँखें थीं और था मेरा पारा-पारा होकर गलता-बहता सर्वस्व... बीच में से लगता था, समय भी गुजरने से रह गया है। समय के कुछ अंश ऐसे ही विलक्षण होते हैं - बीतते हैं, मगर कभी नहीं बीतते, रह जाते हैं हमारे अंदर की किसी महफूज जगह में हमेशा-हमेशा के लिए, हमारे गुजर जाने तक, या शायद उसके बाद भी... हुआ-अनहुआ और तारीखों की लंबी फेहरिस्त के साथ!

एकबार मैंने उससे किसी अतरंग क्षण में पूछा भी था कि क्या उसकी आँखें हमेशा से ऐसे ही कौंधती रही हैं जो उसका नाम दामिनी रखा गया था। वह अपनी हँसी की उजली धूप से भर उठी थी - अरे नहीं, ये आग तो मैंने बहुत बाद में इकट्ठी की है। पहले तो बस आँखों में यकीन और सुकून हुआ करता था। यकीन - हर अच्छी चीज के होने का और सुकून उस कभी न खत्म होनेवाले खूबसूरत अहसास का अटूट हिस्सा होने का!

उसकी बातें ऐसी ही हुआ करती थी - उल्टी-पल्टी चलती हवा की तरह, न जाने किस पल किस तरफ का रुख अख्तियार कर ले। उसे बाँधने की चाह वस्तुतः खुद को बिखरा देने का पागलपन ही था। और एकदिन मैंने समझ लिया था, दामिनी के जीवन में मरने-जीनेवालों को प्रश्न करना छोड़ देना चाहिए। एक-दो बार की गलतियों के बाद मैंने ये कोशिश फिर कभी नहीं की थी।

मैंने जिस क्षण उसे देखा, उसी क्षण मानो मन उसका हो लिया। मेरे लिए अबतक का जहाँ जो कुछ भी था, एकदम से बेमानी होकर रह गया था। उसके पास जाने की अनिवार्यता मैंने अपनी पूरी सत्ता से महसूस ली थी। एक छोटे-से क्षण के सत्य ने अबतक के पूरे जीवन को झूठ में तब्दील कर दिया था। आसपास रिश्ते और चेहरे ताश के पत्तों की तरह ढह रहे थे। जिंदगी के सारे सपने, हलचल और उम्मीदें उस एक चेहरे के आसपास जाकर इकट्ठी हो गई थीं। एक बहुत बड़े शून्य में डूब रहा था मैं। अंदर कुछ शेष था तो बस कल्पना में उसकी मादक देहगंध और मसृन त्वचा का नमकीन स्वाद - मांस के जवान पौधे पर गंधाते बौर का दुनिर्वार निमंत्रण! मैं अंदर तक भीगा था, अपनी ही हवस के निरंतर रिसाव से। एक तटबंध के बँधते ही चाहना की पागल नदी दूसरा किनारा तोड़ देती थी। कैसा जुनून था कि मैं खुद को अपने अबतक के तमाम हासिलों के साथ फूँकने पर आमादा हो गया था! जिसे प्यार कहती है दुनिया, उसकी वास्तविक विडंबनाओं को क्या कोई समझता भी है...

उस पहली मुलाकात के दिन वह समंदर के किनारे शाम की नर्म पड़ती धूप में चुपचाप बैठी हुई थी। मैं उसे देखकर चलते-चलते ठिठक गया था। साथ में सबकुछ। कितना अद्भुत था वह दृश्य - आकाश, समंदर और वह - एक-दूसरे में घुलती हुई, एकाकार होती हुई-सी... मैं मंत्रमुग्ध-सा उसे देखता रह गया था। एक नीला जादू उसकी आँखों, समंदर और आकाश में एक-सा फैला था। मैं उसी की जद में था - नसों के संजाल में उसके हल्के, मादक रिसाव को महसूसते हुए - एकदम डिफेंसलेस और वलनरेवल। मैं जानता था, मैं अब आगे बढ़ नहीं पाऊँगा। मुझे रुकना ही था, न जाने कबतक के लिए... मैं उससे कुछ दूर एक सूखी जगह तलाशकर बैठ गया था। सामने की स्लेटी रेत एकदम गीली थी, उतरते हुए ज्वार के पद-चिह्न! छोटे-छोटे गुलाबी केकड़ों के निरंतर भागकर धँसने से उसमें डिंपल-से पड़ते जा रहे थे।

पीछे, पानी से काफी दूर एक-दूसरे पर आड़े-तिरछे ढंग से टिके ताश के पत्तों की तरह छोटी-छोटी हरी-भरी पहाड़ियों की तलहटी पर नारियल की सघन कतारें तेज हवा में दुहरी हुई जा रही थीं। चारों तरफ हवा में महीन रेत के कण उड़ रहे थे। समंदर के ऊपर जलबिंदुओं का सफेद कुहरा... पारदर्शी बादल की तरह - यह ज्वार का समय था। पानी उफन रहा था धीरे-धीरे। लहरों के शोर में जलपक्षियों की उदास पुकार घुली हुई थी।

न जाने ऐसे क्षणों में क्या होता है। समंदर का हाहाकार अंदर कहीं पछाड़ें खाने लगता है। एक अनाम उदासी से मन घिरने लगता है। मैंने फिर उसे देखा था - हरसिंगार-सी उजली काया - साँझ की ललछौंह धूप में केसर होती हुई... कमर तक लहराते हुए खुले बाल आग की सुनहरी लपटों की तरह बेतरतीब लहरा रहे थे। उन्हें देखकर किसी जंगल में लगी आग की याद हो आती थी - वही कौंध, वही लहक...

हर तरफ से निर्लिप्त और असंपृक्त वह ढलते हुए सूरज की तरफ अपलक देख रही थी - एक न देखती-सी दृष्टि से, शायद दृश्यों के पार कहीं... जाहिर है, वह किसी और दुनिया में थी - अपने आसपास के माहौल से एकदम कटी हुई... किसी एकाकी द्वीप की तरह।

अबतक उसके पाँवों के पास तक लहरें चढ़ आई थीं, पछाड़ें खाते, सिर धुनते हुए। उसकी गहरी चुप्पी को देखकर न जाने क्यों एकपल के लिए मेरे मन में यह पागल-सी इच्छा उत्पन्न हुई थी कि हाथ बढ़ाकर समंदर की लहरों को किनारे पर टूटने से रोक दूँ। उसके चेहरे पर ठहरे हुए उदासी और नीरवता के उस खूबसूरत इंद्रधनुष को मैं इतनी जल्दी टूटने देना नहीं चाहता था। न जाने इसके पीछे कितनी गहरी बारिश होगी, आषाढ़ का मेघिल आकाश होगा, साँवले, मटमैले दिनों की अछोर कतार होगी... उसे देखता हुआ मैं खो-सा गया था। समय का ध्यान तक नहीं रहा था।

इसी बीच सूरज का सिंदूर समंदर के सीने में उतरकर न जाने कब एकदम से घुल गया था। क्षितिज के ठीक पास आकाश का रंग गहरा गेरुआ हो रहा था। घर लौटते हुए पक्षियों की सुनहरी पाँत दूर-दूरतक झिलमिला रही थीं। उनके उजले पंखों में शाम का गहरा काशनी रंग था। अपने कपड़े झाड़कर उठते हुए मैंने सामने की ओर देखा था - दूर समंदर के सीने पर लंगर डाले हुए जहाजों का प्रतिबिंब पानी पर टूटता-बिखरता हुआ लहरों पर काँप रहा था। उनमें जलती हुई बत्तियाँ फिरते हुए दीयों की तरह जल की सतह पर झिलमिला रही थीं।

वह औरत भी अबतक उठ खड़ी हुई थी। हल्के नीले अंधकार में उसका माथा और दो कंधे ही चमक रहे थे। जैसे कुछ उजले कबूतर अँधेरे के सीने में सिमटकर बैठे हों... देह का निचला हिस्सा हवा के लहराते हुए साँवले समंदर में खो-सा गया था। तरल अंधकार में तैरता हुआ वह जैसे कोई गहरा नीला फूल हो... मैं उसे देखता रहा था। वह चलने लगी थी। और फिर कई कदम चलकर यकायक मुड़ी थी और मेरी ओर देखा था। वह मुझे स्पष्ट दिख नहीं रही थी, मगर मुझे उसकी नजरों का अहसास था। कोई अदृश्य उँगली मुझे चुपके से छू गई थी, अनायास देह में सिहरन-सी दौड़ने लगी थी। कितना जीवंत था ये अनुभव - अँगुलियों के पोरों पर धड़कता हुआ-सा...! ...मांसल! मैं जान गया था, हम दोनों के बीच कोई अबोला संवाद घटा है - संवेदना के पारदर्शी स्तर पर। शब्दों और भाषा से परे हम किसी न किसी स्तर पर एक-दूसरे तक पहुँचे है, फिर चाहे हमारे पाँवों ने कोई जमीनी फासला तय किया हो या न हो।

सामने नए चाँद की हल्की रोशनी में समंदर की लहरें झिलमिला रही थीं। किनारे के दृश्य अब एक स्याह, सपाट दीवार में तब्दील हो चुके थे। उसी में डूबा मैं कुछ पलों के लिए खड़ा रह गया था। और फिर चलते हुए उस जगह आ रुका था जहाँ थोड़ी देर पहले वह औरत बैठी हुई थी। रेत पर बड़े-बड़े अक्षरों में एक फोन नंबर लिखा हुआ था!

किसी सम्मोहन के गहरे नीले रंग में डूबता-उतराता उस दिन मैं अपने कमरे में लौटा था - बहुत कुछ खोने के साथ सबकुछ पा जाने की एक परस्पर विरोधी मनोदशा में घिरा हुआ - किसी अनचीन्हे गंध में डूबकर पूरी रात जागने और ख्वाब देखने के लिए...

मुझे याद है, कितनी भारी थी वह रात मुझपर। जैसे जिंदगी यकायक किसी तेज तूफान की जद में आ गई हो। पलभर में सबकुछ अस्त-व्यस्त हो गया था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था, क्या कुछ समेटूँ और किस तरह। मेले में खो गए किसी बच्चे की तरह मेरी हालत थी - परेशान और डरा हुआ!

बिस्तर पर लेटकर मैंने बहुत चुपके से अपनी ख्वाहिशों और मुरादों से उस चेहरे का मिलान किया था जो समुद्र तट से उठकर मेरे साथ मेरे कमरे तक बेआवाज चली आई थी और अब खिड़की पर खड़ी होकर, बिस्तर पर बैठकर मुझे ही अपलक तके जा रही थी। वह हू ब हू वही थी, जिसे मैं जानता न जाने कब से था, बस सिर्फ पहचानता नहीं था। वही आँखों की नीली नदी, वही रंगत की सुनहरी धूप और देहमन के वही अनवरत खिलते सुरभिले अमलतास... उसदिन पहली बार अहसास हुआ था, बेशक्ल-सी ख्वाहिशें हमारे अंदर एक पूरी दुनिया रचती रहती हैं और हम उनसे अनजान ईंट-पत्थरों को जोड़ने-सजाने में अपनी उम्र जाया कर देते हैं। उस रात नींद न जाने कब आई थी।

कमरे के तरल अंधकार में उसका चेहरा एक खिले हुए सूरजमुखी की तरह मुस्कराता रहा था - उसी सुनहली कौंध, गंध और लहक के साथ। एक अजीब-सी कैफियत ने मेरे पूरे वजूद को अपनी जद में ले लिया था। एक हादसा जो अचानक घटा था और अब मेरी जड़ों तक पहुँचते हुए मुझे बेघर कर रहा था। स्वयं पर ढीली पड़ती पकड़ का अहसास लिए मैं अपने आसपास सलाखें खड़ी करता रहा था, लकीरें खींचता रहा था, कितना असुरक्षित महसूस करने लगा था अचानक स्वयं को। बहते हुए साहिल पर ठिकाना बाँधना चाह रहा था, बार-बार बिखर जाने की त्रासदी से तो मुझे गुजरना ही था।

एक आकस्मिक प्रतीति ने मुझे विसन्न कर दिया था - मुझे उसके पास जाना ही पड़ेगा! एक तरफ सारे निषेध थे, वर्जनाएँ और विवेक था और दूसरी तरफ अकेला मन - सब पर भारी पड़ता हुआ, सारी सीमाबद्ध मर्यादाओं से परे... वह क्षण विस्मय और ग्लानि का था, मगर इन सबके बावजूद था - अपन पूरे वजन और शिद्दत के साथ! प्रेम जिस अनुभूति या करिश्मा का नाम है उसकी वास्तविक विडंबनाओं को आज शायद पहली बार इस गहराई से समझ पाया था। इस अनुभूति के घटने के साथ ही टूटने और कमजोर पड़ने का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। मुझे प्रेम हुआ था या नहीं, मैं नहीं जानता, मगर एक गहरे असुरक्षा बोध और अव्यक्त पीड़ा ने मुझे रातभर घेरे रखा था। मैं अनचीन्ही खुशियों के बीच बेतरह उदास था, आँसुओं से भरा था, मगर गुनगुनाना चाहता था... बहुत कुछ पाया था, किनारे-किनारे तक भर आया था, मगर साथ ही न जाने क्या कुछ बहुत बेशकीमती हमेशा के लिए खो गया था। मैं लुटकर अमीर हुआ था! अब अपनी तलाश में कहाँ निकलूँ, सोच नहीं पा रहा था। कस्तूरी मृग की-सी दशा थी मेरी।

मैंने बिस्तर के उस खाली हिस्से को टटोला था जो अबतक मेरी पत्नी उमा का हुआ करता था। मगर अब वहाँ कोई नहीं था। मैं रिश्तों की एक भरी-पूरी दुनिया में एकदम से अकेला हो गया था। एक छोटे-से क्षण ने मुझसे मेरा आप, मेरा घर चुरा लिया था। मैं किससे शिकायत करता? सारा गुनाह मेरा - मेरे मन का - था। इल्जाम भी मुझपर आना था। मैं इनकार कैसे करता... मैं जानता था, मुझे उसके पास जाना होगा, मगर कब, ये बस समय की बात थी। इसी समय के कुछ पलों को अपनी मुट्ठी में समेटकर मैं ऊहापोह के एक विशाल सिंधु में डूब-उतर रहा था। किनारा सामने था - बहुत स्पष्ट, मगर मैं हर साँस लहरों की ओर लौट रहा था - सायास, सचेष्ट - कितना विवश था मैं...

उस फोन नंबर को लेकर उसके बाद मैं कई दिनों तक बेतरह परेशान रहा था। दो मन था, दो तरफ का खिंचाव। उसके पास होना चाहता था, उससे मिलना चाहता था। किसी वर्ज्य का दुर्वार आकर्षण हरपल अपनी तरफ बुलाता था तो कहीं एक निषेध बढ़ते कदमों के सामने अडोल चट्टान की तरह खड़ा हो जाता था। घर से सैकड़ों मील दूर होना संयम पर भारी पड़ रहा था। कई बार अपने पर अंकुश लगाने की मंशा से घर पर फोन लगा चुका था, मगर उमा की आवाज सुनते ही फोन रख देता था। उसका - उसकी आवाज का - सामना कर सकूँ, इतना भी ताव नहीं रह गया था अंदर। उमा की आवाज में अपनापन होता है। अपनापन से भी ज्यादा विश्वास... वह मुझपर भारी पड़ जाता है। उसे उठाने में मेरे कंधे असमर्थ हो गए-से लगते थे।

मन की दुविधा उस अनजान परिवेश में और भी भीषण हो उठी थी। इस शहर में आए मुझे मुश्किल से एक महीना ही हुआ था। बच्चों की पढ़ाई की वजह से परिवार को साथ नहीं ला पाया था। नौकरी ज्वाइन करने के बाद दो हफ्ते तक होटल में ही रहना पड़ा था। बाद में मिसेज लोबो के यहाँ पेइंग गेस्ट की जगह मिल गई थी।

एक कमरा और एक बॉल्कनी। बाथरूम, टॉयलेट कमरे के साथ ही संलग्र। दोनों शाम का खाना होटल में ही खाना पड़ता था। सिर्फ सुबह का नाश्ता मिसेज लोबो के यहाँ मिल जाता था। यह किराये में शामिल था।

शुरू-शुरू के दिन काफी उलझन भरे थे। व्यवस्थित होने में थोड़ा समय लगा था। अजनबी माहौल, भाषा और खान-पान को समझने-अपनाने में स्वाभाविक रूप से दिक्कत हो रही थी। ऑफिस में भी सबसे परिचय गहरा नहीं हुआ था।

अधिकतर शामों को ऑफिस के बाद अपने कमरे में लौटकर मैं उदास हो जाया करता था। एक कप चाय पीकर या तो लेट जाता था या बॉल्कनी में बैठकर सामने की सड़क पर लोगों और वाहनों की भागती-दौड़ती आवाजाही देखता रहता था। धीरे-धीरे शाम गहराती जाती और उसी के साथ मेरी उदासी भी। रात को सोने से पहले मैं बच्चों से और उमा से बात जरूर करता था। मैं जानता था, मेरा परिवार भी मुझे मिस कर रहा होगा। खासकर मेरी पत्नी उमा। मेरे पीछे घर, परिवार के उत्तरदायित्व को अकेले सँभालना उसके लिए जरूर काफी मुश्किल हो रहा होगा। वह फोन पर हर बात के लिए मुझसे पूछती रहती थी, मशविरा लेती रहती थी। बच्चों के सोने के बाद मुझे अपने अकेलेपन की बातें बताती थी। सुनकर मैं और भी उदास हो जाता था।

दामिनी को देखने के बाद तो मेरी उदासी की परतें और भी मोटी हो गई थीं। दफ्तर और नींद के बीच बचा रह गया ढेर सारा समय किसी सूरत काटना कठिन हो गया था। अपने परिवार को याद करने के साथ-साथ अब दामिनी को भुलाने की दुश्वार कोशिश भी करनी पड़ रही थी। स्वयं से दूर जाने के लिए, अपना ध्यान भटकाने के लिए जाने मैं क्या-क्या मशक्कतें करता रहता था, कैसी-कैसी वाहियात हरकतें अपनाता रहता था। कोई भी उपाय, कुछ भी उसके खयालों को मन से दूर करने में सफल हो पाया था या नहीं, यह एक अलग बात थी।

इसके बाद मैं शामों को अक्सर समुद्र तट पर जाने लगा था। वहाँ मेरा समय बीत जाता था। गहरे स्लेटी रंग की गीली रेत पर नंगे पाँव चलना और घंटों बैठकर सूर्यास्त देखते रहना। वह एक अलग ही दुनिया थी! पानी का रंग आकाश और समय के साथ बदलता रहता था - कई-कई शेड्स में - हल्के से गहरा, और गहरा... जिंदगी में मैंने पहली बार आकाश और पानी के इतने सारे रंग देखे थे, हर पल बदलते और गहराते हुए - हल्का नीला, फिरोजी, मयूरकंठी... सूरज की सफेदी में पहले हल्के, पीले रेश पड़ते, फिर बासंती रंग में केसर घुलता और अंत में गहरा सिंदूरी, रक्तिम आँच में सूरज का गोला दहक उठता। फिर धीरे-धीरे कुमकुम की बिंदी-सा लाल सूरज ठंडा होकर पानी में बूँद-बूँद पिघलकर पूरी तरह घुल जाता। लहरों का इस्पाती नीला, ताँबई और सुनहरा आँचल चमकते हुए शनैः-शनैः एक शीतल आग में तब्दील हो जाता और फिर म्लान होते-होते आखिर में बुझ जाता - अपने पीछे गहरा गेरुआ, काशनी, प्याजी और न जाने कितने अनाम, अजाने रंग आकाश में छोड़ते हुए।

ऐसे समय में न जाने क्यों मन एक रूमानियत भरी उदासी में डूब जाता है। अपनी निसंगता का बोध और उग्र होकर सालने लगता है। क्षितिज में अपने-अपने नीड़ों की तरफ लौटती हुई पक्षियों की धुँधली कतार को देखकर अपने घर की याद हो आती है। आत्मीयता और निकटता के लिए एक कलप-सी उठती है, कहीं अंदर कुछ टीसने लगता है रह-रहकर।

कितने लोग होते हैं समुद्र तटपर - देशी-विदेशी शैलानी, जिनमें अधिकतर विदेशी ही होते हैं। उन्हें देखकर लगता है, प्रकृति की सुंदरता का उपभोग करना सही अर्थों में उन्हें ही आता है... समंदर का आनंद उठाने के उनके अंदाज अनोखे होते हैं। धूप, हवा, पानी के साथ मिलकर जैसे एक हो जाते हैं। घंटों धूप में सन क्रीम लगाकर अपना रंग साँवला करने के लिए पड़े रहना, लहरों के ऊपर झूले डालकर उसमें लेटकर किताबें पढ़ना... नमकीन पानी में डूब-डूबकर बादामी हो जाते हैं और दिन-दुनिया से बेखबर होकर सबके सामने निःसंकोच आकाश के खुले चँदोवे के नीचे अपने साथी से टूटकर प्रेम करते हैं। यह सबकुछ नया है मेरे लिए। उत्सुकता होती है, देखता रहता हूँ। और इसी तरह कभी-कभी बहुत कुछ भूल जाता हूँ।

एक समय के बाद, देर शाम गए मैं चुपचाप उठकर वहाँ से चला आता हूँ - अपने कमरे के अकेलेपन में! एक और उदास रात बीताने के लिए... उस अनजान औरत की एक झलक ने मुझे कितना अकेला कर दिया था - रिश्तों की एक भरी-पूरी दुनिया में - अपने घर और जीवन में! क्यों किसी का होना या न होना इनसान को इस तरह से निसंग बना देता है? मैं चलता हूँ और हर मोड़पर मुड़कर देखता हूँ, दिन में कई-कई बार अपना मेल चेक करता हूँ, घड़ी की तरफ देखता हूँ, मोबाइल के मैसेज पढ़ता हूँ, कैलेंडर में तारीखों के नीचे निशान लगाता हूँ। न जाने किसकी चिट्ठी, किसका फोन आना है। कौन न जाने कब दरवाजा खटखटानेवाला है... कौन था जो आनेवाला था, मगर नहीं आया! अंदर निराशा के काले बादल घुमड़ते हैं, अँधेरा छा जाता है। अवसाद की एक प्रच्छन्न अनुभूति रातदिन अंदर बनी रहती है, मन मेघिल आकाश-सा अवसन्न, धूसर प्रतीत होता है। इनसे छूट जाना चाहता हूँ, मगर स्वयं से नहीं छूट पाता। हाँ, कुछ ऐसा ही हुआ है। वह मेरे वजूद का हिस्सा हो गई है। ऐसा हिस्सा जिसका मैं नाम तक नहीं जानता।

एकदिन देर शाम गए शहर की गलियों में भटकते हुए मैं एक काउंसलर का बोर्ड देखकर अंदर घुस गया था। काउंसलर ने बहुत देर तक बातें करके मेरे अंदर ढेर सारी बीमारियों के लक्षण ढूँढ़ निकाले थे। मैं भी समझ रहा था, मुझमें प्राब्लम्स हैं, मगर इतने सारे... ढेर सारी दवाइयाँ, एक्सरसाइज और लाइफ स्टाइल चेंज के नुस्खे तथा एक अदद बीमारी का नाम लेकर उसदिन वहाँ से दो घंटे बाद मैं निकला था - ऑबसेशन एंड एक्यूट डिप्रेसन... एक भारी-भरकम बिल भी चुकाया था। उस डॉक्टर की क्लीनिक से निकलकर थोड़ी दूर पर एक अँधेरा कोना देखकर मैंने सारी दवाइयाँ फेंक दी थीं। साथ में दवाई की पर्ची भी। खाक डॉक्टर है, इश्क का इलाज करने चला है...!

उस अनजानी, अपरिचित जगह के एकांगी जीवन ने मुझे पहले ही उबा रखा था। सोच रहा था, विनीता की छुट्टियाँ शुरू होते ही उमा को यहाँ बुलवा लूँगा। रहने के लिए अभी तक कोई ढंग का मकान नहीं मिल पाया था, यही सबसे बड़ी दिक्कत थी। अपने घर को मिस कर रहा था। बच्चों का साथ और उमा के सान्निध्य को भी। होटल का खाना खाकर भी ऊब चुका था। एकरस जीवन की बोरियत से छूटने के लिए अंदर-ही-अंदर छटपटाने लगा था।

घूम-फिरकर कहीं बाहर से लौटता हूँ तो उदासी की परछाइयाँ फिर से घनीभूत होकर घेर लेती है। समय काटना एक बड़ी समस्या बन जाता है। सुबह होती है तो रात का इंतजार करने लगता हूँ और रात होते ही सुबह की। इसलिए नहीं कि रात या सुबह में मेरे लिए कुछ खास है। ये तो सुबह की आपाधापी से पीछा छुड़ाने के लिए रात की और रात के एकाकीपन से मुक्ति के लिए सुबह की प्रतीक्षा होती है। कहीं ठहराव नहीं, बस भागना। न जाने किस चीज के लिए, कबतक के लिए...

इन दिनों मैं बहुत सोचने लगा था। फुर्सत में था और अकेला भी। बहुत सारी चीजें, बातें, जिनपर कभी शायद ही गौर कर पाया था कभी, इन दिनों अनायास ध्यान में आने लगी थी। एकदिन एक गाँव के छोटे-से चर्च के पिछवाड़े बने कब्रिस्तान को देखते हुए खयाल आया था, न जाने कितना अर्सा हो गया उमा को ‘आइ लव यू’ कहे हुए। अजीब बात थी। कौन सी बात कहाँ याद आई! सामने मृत्यु का नीरव संसार था और मन जीवन की खुशियाँ अजपाजप की तरह अपनी अदृश्य उँगलियों पर फेर रहा था। शायद ऐसा ही होता है - मौत का सामना होते ही अंदर की जिजीविषा जीवन की ओर मुँह फेर लेना चाहती है, सच की अँगुलियाँ छुड़ाकर भुलावे की झिलमिल दुनिया में खो जाना चाहती है।

कब्रिस्तान में गहरी चुप्पी थी। मैं कब्रों पर जड़े संगमरमर के फलक पर मृत लोगों के नाम, संदेश पढ़ता जा रहा था। एक पर नजर ठिठकी थी - शैरोन डि’सा - 1990-2009। पढ़ते हुए मन में एक तस्वीर बनी थी शैरोन डि’सा की - उन्नीस वर्ष की शैरोन - रूप, रंग और जीवन के उमंग से भरी हुई... न जाने उसने अपने भावी जीवन को लेकर कैसे-कैसे सपने देखे होंगे! सोचते हुए मेरी नजर कब्र पर रखे हुए एक लाल कार्नेशन के फूल पर पड़ी थी। नहीं, तुम एकदम से खत्म नहीं हो गई हो शैरोन, किसी की याद में आज भी जिंदा हो - इस ताजे फूल की तरह... उस सेमिट्री के शांत, उदास माहौल में शायद मैं कुछ ज्यादा ही फलसफाना मूड में होता जा रहा था। समय के बीत गए गलियारे में कहीं बहुत पीछे छूट गई उस युवा लड़की को एकबार देखने की अद्भुत इच्छा मन में अनायास जागती है, जिसके लिए कोई आज भी उसकी कब्र पर कार्नेशन के लाल फूल लेकर आता है, उसकी आत्मा की शांति के लिए जरूर प्रार्थना भी करता होगा। क्या तुम्हें अंततः शांति मिल पाई शैरोन...?

प्रत्युत्तर में तेज धूप में जलते हुए बोगनबेलिया के लाल, चटक फूल मुस्कराते रहते हैं, चंपा की फूली हुई पाँत उसाँसें लेती-सी मौन खड़ी रहती है। मैं मुड़कर देखता हूँ, कब्रिस्तान के एक कोने में कुछ लोग हाथों में फूल लिए खड़े थे। साथ का पादरी गाने के स्वर में शायद कोई मंत्र उच्चार रहा था। उसके चुप होते ही सबने मिलकर एकसाथ ‘आमीन’ कहा था - भँवरे के गुँजार की तरह! पादरी के सफेद चोंगे के ऊपर लाल सैटिन का पट्टा तेज धूप में चमक रहा था। एक सुबकती हुई औरत के कंधे पर उसने कुछ कहते हुए हाथ रखा था। भीड़ धीरे-धीरे तितर-बितर होने लगी थी। कैसा लगता है किसी बहुत अपने को इस तरह से हमेशा के लिए पीछे छोड़ जाना... सोचते हुए अंदर एक शून्य-सा पैदा हो गया था। बहुत उदास होकर वहाँ से लौटा था उस दिन। पूरी शाम उसी अनाम अहसास की मटमैली परछाइयाँ अंदर घिरी रही थीं।

दूसरे दिन सुबह-सुबह टहलने के लिए निकला था। लग रहा था, मुझे व्यस्त होना है, कहीं, किसी तरह खो जाना है, किसी भीड़ में - नामालूम... अपना आप ही एक समस्या हो गया था जैसे। मेरे लिए यह जरूरी हो गया था कि मैं कुछ समय के लिए स्वयं से दूर रहूँ। रविवार का दिन था। लोग सज-धजकर चर्च जा रहे थे सुबह की प्रार्थना के लिए। चर्च का घंटा रह-रहकर बज रहा था। सुबह के शांत माहौल में उसकी ध्वनि-प्रतिध्वनि दूर-दूरतक सुनाई पड़ रही थी। घंटे के बजते ही न जाने क्यों मुहल्ले के सारे कुत्ते एक स्वर में रोने लगते थे। मैं एक बरसाती नाले के ऊपर बनी छोटी-सी पुलिया पर बैठकर आते-जाते लोगों को देखने लगा था। उनके कपड़े, बोलचाल के ढंग - मुझे सभी कुछ अनोखा और इसलिए शायद अच्छा भी लग रहा था। कुछ लोग जाते हुए रुककर मेरा अभिवादन कर रहे थे - अपनी टोपी सर से उतारकर उसे लहराते हुए। मुझे लग रहा था, मैं अपने देश में नहीं, किसी परदेश की धरती में हूँ।

अद्भुत है ये देश। कितनी संस्कृतियाँ, कितनी नस्लें, धर्म यहाँ आकर इस देश की उदार, उदात्त मिट्टी से मिलकर एकाकार हो गए हैं, पूरी तरह अभिन्न, अभिभाज्य हो गए हैं। तभी तो ऐसी समृद्ध, वैविध्यपूर्ण है यहाँ की सभ्यता। कई बार इच्छा हुई थी, चर्च के अंदर जाकर देखूँ कि वहाँ क्या कुछ होता है, मगर संकोचवश नहीं जा पाया था।

एक दिन चर्च का पादरी सुबह-सुबह गाँव के वेकरी में मिल गया था - ताजी, गर्म पावरोटियाँ खरीदते हुए। रंगीन लिबास में था इसलिए अचानक पहचान नहीं पाया था। देरतक मुझसे बातें करता रहा था। पूछा था, मैं किस धर्म का अनुयायी हूँ। उसके कुछ दिनों बाद मेरे लिए मिसेज लोबो के हाथों एक बाइबल भिजवाया था - हिंदी में।

मिसेज लोबो का बर्ताव उसके बाद मेरे प्रति काफी सहृदय हो गया था। न जाने क्यों। शायद चर्च के पादरी के साथ मेरे परिचय के कारण ही। ईसाई समुदाय के लोगों में अपने धर्म के साथ-साथ धर्म गुरुओं के प्रति भी गहरी श्रद्धा-भक्ति के भाव होते हैं। गाँव के लोग अपने चर्च के पादरी के सलाह-मशविरे से ही अधिकतर काम करते हैं। यहाँ के सामाजिक जीवन में उनका गहरा प्रभाव होता है। शादी-ब्याह - सब उन्हीं की स्वीकृति से तय होता है। मुझे यह सब काफी रोचक लग रहा था। धर्म का ऐसा अनुशासन हमारे हिंदू समाज में नहीं होता। शायद तभी इतना बिखराव और उच्छृंखलता है।

कई दिनों तक इधर-उधर भटककर मैंने अपना ध्यान बहुतेरा उस फोन नंबर पर से हटाने का प्रयास किया था। मगर सब व्यर्थ। सारा दिन वह मेरे अवचेतन पर छाया रहता। और रात होते-होते उसके अंक फैलकर जैसे मेरे पूरे अस्तित्व को ही ढँक लेते। सपने में भी वे दिखते - तरह-तरह के रंग और आकार में। कभी पतंग बनकर आकाश में लहराते, मेरे छज्जे के मुँडेर तक उतर आते। उन्हें लूटने के लिए मैं बेतहासा दौड़ता और दौड़ते हुए नीचे गिर पड़ता...! मेरी नींद टूट जाती और मैं जागकर देरतक बैठा रहता। कभी-कभी उठकर बाहर बॉल्कनी में भी आ जाता। रात का शहर सन्नाटे की गहरी नींद में डूबा कितना अलग लगता है। जिन सड़कों पर सारा दिन इतना शोर-गुल, भीड़-भाड़ रहती है, रात के समय वही कैसी वीरानी पसर जाती है। उसपर टहलते हुए या कभी बैठकर अजीब लगता है। ये सड़कें कितने लोगों को कितनी जगह पहुँचाती हैं, मगर खुद कहीं नहीं जातीं। सबको मंजिल तक पहुँचानेवाले की अपनी कोई मंजिल नहीं होती। किसी-किसी की नियति भी कुछ ऐसी ही होती है।

मैं अनझिप आँखों से आकाश की तरफ देखता रहता हूँ। गहरा स्लेटी आकाश दूर मांडवी नदी के पास पीली उजास से भरा रहता है। पणजीम शहर की रोशनी आकाश में ऊपर तक फैलती है। पानी पर ठहरे जहाज, कैसिनो, सैलानी बोट्स की बत्तियाँ - रंगीन लट्टू, नियॉन लाइट्स जलते-बुझते रहते हैं। उनकी नीली, हरी - तरह-तरह के रंगों की रोशनियाँ पानी की गहरी नीली सतह पर काँपती है, दूर तक फिसलती जाती है। एक अद्भुत स्वप्नवत दृश्य उपस्थित होता है, जैसे रंगों की झिलमिलाती परियों का नृत्य लगा हो... कई बार देर रात तक मैं मांडवी के किनारे-किनारे भटका हूँ। चौड़ी, खाली, सुनसान सड़कें, किनारे पर फूलों और क्रोटोन्स की रंग-बिरंगी सघन झाड़ियाँ और पानी पर पूरे चाँद का टूटता-बिखरता प्रतिबिंब... ऐसी आवारगी का एक अपना नशा होता है, घर लौटकर जाने का मन नहीं होता। उस घर में तो हर्गिज नहीं जहाँ मैं इन दिनों रह रहा था।

कई बार पुलिस की गश्ती गाड़ियों ने रोककर मुझसे पूछताछ भी की थी। मेरा परिचय पत्र देखकर तथा मैं शराब के नशे में नहीं हूँ, इस बात की तसल्ली करके मुझे जाने दिया था - कई एक हिदायतों के साथ।

घर लौटते हुए उस दिन जेब से कागज का वह पुर्जा निकल आया था - उस अनजान औरत का मोबाइल नंबर। उसे देखते हुए न जाने क्या हुआ था। अंदर एक तेज घुमेर-सी उठी थी - सिरा दूँ अपनी सारी यंत्रणा, छटपटाहट इस मांडवी में, इसके शीतल जल में शांत हो मेरे अंतस की सारी दाह, संताप! मुक्त हो जाऊँ इस रातदिन की दुविधा से...

एकदम से उस कागज का गोला बनाकर नदी में उछाल दिया था। गोला तेज पानी में डूबता-उतराता बह चला था। दूर से भी वह गहरे बैंजनी पानी में स्पष्ट होकर दिख रहा था। मैं अपनी जगह खड़ा उसे बहता हुआ देखता रहा था कुछ देरतक - बिल्कुल निर्लिप्त और उदासीन भाव से। और फिर हड़बड़ाकर दौड़ पड़ा था, पानी में उतर गया था दूरतक। मुझे वह कागज का टुकड़ा चाहिए - कैसे भी, किसी भी कीमत पर...

अरे रे मैन, क्या करता है?

पास ही पानी में मछली के लिए काँटा डालकर बैठा हुआ एक आदमी चिल्लाया था - सुसाइड करने को माँगता है क्या! तो कहीं और जाओ न बाबा...

किस्मत से कागज का वह गोला एक बँधी हुई नाव से टकराकर वहीं कोने में अटककर रह गया था। उसे मुट्ठी में लेकर मैं पानी से बाहर निकल आया था, पूरी तरह भीगा हुआ। पीछे वह आदमी अब भी बड़बड़ा रहा था -

न जाने ये घाटी लोग किधर-किधर से यहाँ मरने के वास्ते आ जाता है, बेयोरा मारकर एकदम टुन्न हो जाता है...

उसकी बातों पर ध्यान न देकर मैंने स्ट्रीट लाइट के नीचे जाकर उस भीगी हुई पुड़िया को खोलकर देखा था। भीतर का हिस्सा सौभाग्य से पूरी तरह अभी भीगा नहीं था। दो अंक बहरहाल धुँधला गए थे, मगर शुरू के दो अंक, जिन्हें समझना आसान था। एक अनाम खुशी से मैं भर उठा था। घर की तरफ लौटते हुए मैंने मुड़कर उस बड़बड़ाते हुए व्यक्ति की तरफ हवा में एक चुंबन उछाल दिया था - गुडनाइट साहेबा...

‘चल-चल, वचुन घरा नींद (जाओ, अपने घर में जाकर सो जाओ)!

वह व्यक्ति फिर बड़बड़ाया था, मगर इस बार हल्के ढंग से। मैं मुस्कराते हुए अपने कमरे में लौट आया था। न जाने मुझे क्या इतना कीमती दुबारा मिल गया था।

अपने कमरे में लौटकर मैंने उस कागज पर धुँधले पड़ गए अंकों को स्केच पेन से बार-बार गहरा किया था। और एहतियातन तीन-चार जगहों में और भी लिखकर रख लिया था। आज की तरह फिर कभी पागलपन का दौरा पड़ा तो! मैं अब किसी तरह इस नंबर को खोना नहीं चाहता था। इसी में शायद कहीं मेरा पता भी मिलना था। उस रात मुझे अच्छी नींद आई थी। अपने ही अनजाने शायद मैं किसी निर्णय पर पहुँच गया था। कई दिनों से ये दस काले अंक मेरा पीछा कर रहे थे - हर जगह, हर समय! एक अंदरूनी बेचैनी मुझे अपने जद में लिए हुए था। मेरे पाँव रुके हुए थे, मगर मैं एक निरंतर यात्रा में था – यात्रा - अपनी ही तरफ, एकदम अंदरूनी... शायद तभी इतना कठिन भी। ये भीतर के सफर ही होते हैं जो इतना थका देते हैं। मैं स्वयं से भाग रहा था - मगर कैसे भाग सकता था। अब जो यह बचकानी कोशिश छोड़ दी तो जैसे राहत मिल गई। साथ में नींद भी - लंबी, बिना सपनों की - बँधे हुए पत्थरों की तरह - स्याह और गहरी, एकदम तलहीन, अछोर...

सुबह उठा तो सबसे पहले घर पर फोन किया। जैसे किसी युद्ध पर जाने की तैयारी में हूँ। उमा की आवाज सुननी थी और उसकी शुभकामनाएँ भी लेनी थी। फोन पर आते ही उमा चहकी थी - किसी ताजे, मीठे पानी के घने होकर बहते सोते की तरह थी उसकी आवाज - राहत और सुकून से भरी हुई। उसने कल रात मुझे सपने में देखा था। हम दोनों एक-दूसरे से प्यार कर रहे थे, बहुत डूबकर, देरतक। मैंने पूछा था - कहो तो पहली फ्लाइट पकड़कर अभी आ जाऊँ... वह शरमाकर हँसती रही थी।

फोन रखकर न जाने क्यों मैं बहुत देर तक वही बैठा रह गया था। आँखों के कोने जल उठे थे। उमा की हँसी के साथ उसका चेहरा भी तैर रहा था मेरे सामने - गुलाबी पतंग की तरह - तेज हवा में चंचल, उन्मुक्त... मगर क्या करता, मेरा मन भी अब कहाँ मेरे अधिकार में था, कटी पतंग की तरह उड़ कर आँखों से ओझल हो गया था, शायद लूट ही लिया गया था! मगर मेरा अवचेतन जानता था उसका पता। मैंने अपनी जेब टटोलकर वह तुड़ा-मुड़ा कागज का टुकड़ा निकाला था - दस अंक - स्याह, लिसरे-से - साँवले फूल की तरह मुस्करा रहे थे। मैंने मोबाइल उठाकर नंबर मिलाया था। दूसरी तरफ फोन की घंटी बजते-बजते मेरा पूरा शरीर पसीने से भीग उठा था। जैसे ही किसी ने फोन उठाकर हलो कहा था, मैंने फोन मेज पर रख दिया था और फिर दूसरे ही क्षण उठा भी लिया था।

दूसरे दिन उसके घर के लिए निकलते हुए मैं जानता था, मैं आसरे की तलाश में अपने घर से आगे जा रहा हूँ। अनुभव कर सकता था, मेरे पीछे मेरा अबतक का सारा पाया-सहेजा छूटता जा रहा है - शायद हमेशा के लिए। कितने आँसुओं से भीगे चेहरे थे, कितनी जुड़ी हथेलियाँ और अनुनय में बँधे हाथ... मगर कुछ भी - कोई भी तो मुझे उसदिन रोक नहीं पाया था। घर फूँककर निकल पड़ना शायद ऐसे ही किसी जुनून को कहते हैं! जिस समय मैं स्वयं के ही वहाँ होने पर हैरान और एक हदतक शर्मिंदा उसके दरवाजे पर खड़ा हुआ था, वह इस तरह से सहज मुस्कराते हुए दरवाजा खोली थी, जैसे उसे हमेशा से पता हो, मुझे उसदिन उसके पास आना ही है। यहाँ औरत की छठी इंद्रिय काम कर रही थी शायद। वह मेरी हार का पहला दिन था। उसके साथ पराजित होने और निरंतर होते चले जाने की प्रतीति हर पल होती रही है। ये मेरी अपनी चारित्रिक दुर्बलता थी या उसके विलक्षण व्यक्तित्व का सहज परिणाम, मैं अंत तक जान नहीं पाया था।

उसने अपने घर के दरवाजे इस तरह खोले थे जैसे आकाश को विस्तार दे रही हो। जो आकाश उसकी आँखों में था, वही उसके घर में भी ओर-छोर पसरा था। ऐसा प्रतीत होता था जैसे उसका घर सब्ज, हवा और धूप से बना हुआ हो। उस घर की दीवारें ठोस नहीं, बल्कि पारदर्शी थी - हर मौसम को स्वयं से निर्द्वंद्व गुजारती हुई, उसके तमाम तेवर और मिजाज के साथ! - दीवार से दीवार तक जुड़ी हुई काँच की खिड़कियाँ, पेपर के जींस की बनी जापानी दीवारें, खुली बॉल्कनी और बरामदे... हर कोने पर रंग-बिरंगे क्रोटोंस, दीवारों को ढँके मनी प्लांट्स, और नाटी-बौनी बोंसाई की लंबी पाँत... घर के अंदर दाखिल होकर लगा था, खुले में आ गया हूँ।

मुझे उसके घर के गोबर लीपे आँगन और उसके बीचोंबीच खड़े तुलसी चौरे ने सबसे अधिक प्रभावित किया था। एक शहर के शोर-गुल से भरे माहौल में एक छोटे गाँव का-सा शांत वातावरण था वहाँ। दरवाजे पर बँधे चाइम्स की मीठी ठुनक रह-रहकर घर के अंदर पसरे मौन को अपनी मीठी गूँज से तोड़ रही थी। उसने मुझे न जाने किस नजर से देखा था - तुम्हारा इंतजार हमसब को जाने कब से था। पूरे घर को मानो अपनी बाँहों में लेते हुए उसने कहा था, गहरी उछाह से भरी हुई। मैं बिल्कुल अभिभूत था, क्या कहता - अपनी खोई हुई जबान से...

पहले-पहल उसने कुछ भी नहीं पूछा था मेरे विषय में। न अपने विषय में ही कुछ कहा था। मुस्कराकर बस इतना ही कहा था - ये तुम हो जिसके विषय में जानना चाहती हूँ - तुम्हारी सोच, तुम्हारे खयाल, पसंद-नापसंद... न कि तुम्हारी जात, धर्म, गोत्र, समाज के विषय में! वाट्स इन ए नाम... राम हो या श्याम - क्या फर्क पड़ता है!

मैं उसकी कजलाई आँखों की मीठी चावनी में डूबता बैठा रह गया था। अपने बिखरे बालों को एक ढीले जूड़े में गूँथते हुए वह सामने बैठ गई थी, चेहरे पर अस्त-व्यस्त लापरवाह-सी मुस्कराहट लिए - क्षणों को जियो अशेष, इन्ही से जिंदगी बनती है। जो बीत चुका या आनेवाला है, वह महज फसाना या ख्वाब है। हम हमेशा जिंदगी को जीना छोड़कर जीने की तैयारी में क्यों लगे रहते हैं?

मैंने अपने आने की एक लंबी-चौड़ी भूमिका बाँधनी चाही थी, मगर उसने रोक दिया था - आज यह सब नहीं। जीवन को थोड़ी देर के लिए बिना शर्त, बिना पाबंदियों के जी लेने दो। देखो न कैसा लगता है... उसकी आँखों में चमक आए मोतिया आब को देखकर प्रतीत हुआ था जैसे कोई नटखट-सी बच्ची शरारत के मनसूबे बाँध रही हो।

मुझे खुले बरामदे में बैठाते हुए उसने यकीन से कहा था - तुम अपने घर आ गए हो अशेष! इस घर में सबकुछ था, बस तुम ही नहीं थे। आज आ गए हो तो यह घर घर बन गया है। मुझे आश्चर्य हो रहा था, उसके यकीन पर।

इतना यकीन कैसे कर लेती हो? मुझे उससे एक तरह से ईर्ष्या होने लगी थी।

अविश्वास में जीने से तो अच्छा है, विश्वास के हाथों मारा जाना, नहीं? वह एक बार फिर हँसी थी - अपने पूरे वजूद से। यह उसकी एक और विशेषता थी, हँसती या उदास होती थी अपनी पूरी काया से। बस उसकी आँखें थीं जो मुस्कराकर भी नहीं मुस्कराती थी। वहाँ खूबसूरत वर्क में लिपटा हआ विषाद होता था - बहुत गहरा और अछोर... किसी पत्थर की तरह मजबूत बँधा हुआ। उन्हें देखकर किसी निसंग संध्या तारा की याद हो आती थी - अकेले-अकेले - झिलमिलाहट में लिपटे हुए, मगर बेतरह उदास और अनमन...

मेज पर चिल्ड बीयर के साथ कोल्ड कट्स सजाकर वह तुलसी चौरे पर पानी चढ़ा आई थी। अपनी आँखें बंद किए आकाश के उद्देश्य में उसे एकमन से हाथ जोड़े हुए देखना भी अपने आप में एक अनुभव था। बिना किसी मेकअप का साफ, धुला चेहरा, शरीर पर सिल्क का सफेद गाउन और गले में रूद्राक्ष की माला। गीले बालों का जूड़ा खुलकर पीठ पर फैल गया था। धूप में सूरजमुखी की तरह दपदपाते हुए उसके उजले रूप को मैं अपनी आँखों से समेटकर अंदर सहेज रहा था। कुछ छूटे न, कुछ बचे न। मुझे प्रतीत हो रहा था, मैं किसी दूसरी ही दुनिया में आ गया हूँ, जहाँ सबकुछ खालिस जादू है।

आँगन के ऊपर मड़ैया बँधी थी जिसपर चमेली की लतरें चढ़ाई गईं थीं। हरे पत्तों के बीच से दोपहर का नीला आकाश आईने की तरह कौंध रहा था। हवा में हरसिंगार की बासी, उनींदी गंध थी। शायद आसपास कहीं भोर रात से झड़ता रहा था।

कभी किसी दुर्लभ क्षण में हम समय के गिरफ्त से छूट जाते हैं, अनंत, असीम हो जाते हैं, जीवन, जगत के पार चले जाते हैं... कुछ ऐसा ही घटा था उस रोज - समय की बहती हुई धारा से जैसे हम बिल्कुल अलग हो गए थे। दामिनी का रूप, उसकी हँसी, उसकी बातें... ऐश्वर्य की एक पूरी दुनिया मेरे सामने पसरी थी। दोपहर अपनी अलस, मंथर गति से चुपचाप कटती रही थी। सुख की एक हथेली भर जमीन पर हम समंदर की तरह फैले हुए थे, टूट, बिखर रहे थे - बिल्कुल बेपरवाह।

उसने मुझसे कहा था, वह मुझसे प्यार करती है। मैं चौंक पड़ा था। इतनी जल्दी वह इस निर्णय पर कैसे पहुँच सकती है! बीयर के गिलास के पीछे उसकी फीरोजा नील आँखें पिघले सितारे की तरह फैली हुई थी, बूँद-बूँद टपकती हुई-सी...

- कुछ सोचना या पूछना तो अनिश्चय की स्थिति में होता है अशेष। तुमसे प्यार करती हूँ या नहीं, यह एकबार भी स्वयं से पूछना नहीं पड़ा। जिस क्षण तुम्हें देखा उसी क्षण से जानती हूँ कि मुझे तुमसे प्यार है।

ऐसा कैसे... मैंने पूछना चाहा था, मगर उसने मेरी बात बीच में ही काट दी थी - प्यार तो ऐसे ही होता है अशेष, या फिर होता ही नहीं। उसकी आवाज का यकीन अडोल था। मैं क्या कहता, बस उसे खामोशी से देखता रह गया था। बाहर तेज धूप में दिन का दूसरा पहर जल रहा था। गेट से लेकर घर के पोर्टिको तक गुलमोहर के झरते हुए पीले फूलों से अँटा पड़ा था। गर्म हवा में खिड़की के पर्दे उड़ रहे थे।

मेरा मोबाइल लगातार बज रहा था। मैं जानता था, उमा का फोन होगा। सुबह से वह मेरा नंबर ट्राइ कर रही थी। मगर मेरी हिम्मत नहीं हुई थी कि मैं उसका फोन उठाता। दामिनी ने कुछ देर तक मेरी आँखों में झाँका था और फिर मुझसे बिना पूछे ही मोबाइल बंद कर दिया था - आज का दिन बस हमारा-तुम्हारा है। बीच से यह दुनिया हटा दो और सारी वर्जनाएँ भी... मैं कुछ कह नहीं पाया था। इस क्षण मैं उसके रूप के गहरे सम्मोहन में था - एकदम असक्त, असहाय - जल की तेज धार में बहते हुए तिनके की तरह...

उसदिन मैंने बीयर की कई बोतलें खाली कर दी थीं। दामिनी लिमका में मिलाकर फेनी पीती रही थी। कहा था, गर्मी में अच्छा लगता है...

एक समय के बाद वह मुझे अपने बेडरूम में ले गई थी। वहाँ लगा था कि जैसे समंदर की छत पर हम बैठे हुए हैं- खिड़की से झाँकता हुआ आकाश और समंदर - उसकी ऊँची, झागदार लहरें और अबाध बहती हवा... पूरा कमरा धूप की आसमानी चटक से भरा हुआ था। मुझे कुर्सी पर बिठाकर वह खुद बिस्तर पर लेट गई थी। उसकी आँखों में उस समय नींद और खुमार था। लंबी, सघन बरौनियाँ आँखों पर झँप आईं थीं।

एक खूबसूरत निमंत्रण की तरह वह बिस्तर पर लेटी हुई थी, मेरी तरफ अद्भुत नजर से देखती हुई। मैं जानता था, इस क्षण उसे छुआ तो वह पारे की चमकीली नदी बनकर पिघल जाएगी, बहती रहेगी निरंतर, बहकर निःशेष हो जाएगी मेरी बाँहों में - अपनी आखिरी बूँद तक। हल्के टकोर की प्रतीक्षा में सितार के कसे तार की तरह उसके शरीर के अवयव तने हुए थे - अधीर, साग्रह... या किसी नदी की प्यासी देह की तरह रसमसाती हुई, जिसे धूप और ताप के अंतहीन ऋतु में सावन के एक टुकड़े बादल का इंतजार होता है - फिर से पुरने के लिए, अपने कूल, किनारों तक...

एक लंबे, गहरे मौन के बाद उसने कहा था - मेरी पहली शादी बहुत कम उम्र में ही हो गई थी। ये शादी मैंने खुद ही की थी। लव मैरिज नहीं था, मगर चुनाव मेरा ही था। अपनी माँ की मृत्यु के बाद अपने पापा के साथ एक छत के नीचे मेरा रहना मुश्किल हो गया था। निकल जाना चाहती थी वहाँ के विषाक्त माहौल से - किसी तरह, किसी भी कीमत पर। मगर शादी के तीन महीने बाद ही मैंने अपने पति का भी घर छोड़ दिया था। मुझे जल्दी ही समझ में आ गया था कि एक नरक से छूटने के लिए मैं दूसरे नरक में आ गई हूँ।

एक साँस में इतना कहते हुए ही वह जैसे हाँफ आई थी।

एक छोटे-से विराम के बाद मैंने पूछना चाहा था - तुम्हारी माँ...

ये कहानी फिर कभी... दामिनी ने अपना हाथ उठाकर मुझे टोक दिया था। उसके बाद हमारे बीच फिर से एक लंबा मौन पसर गया था। बहुत देर बाद अपनी आँखें खोलकर उसने अब धीरे से पूछा था, थरथराती हुई आवाज में, जैसे पूछते हुए उसे डर लग रहा हो - घर में कौन-कौन हैं अशेष?

मैं समझ गया था, वह क्षण आ गया है। यह निर्णय की घड़ी है। वह स्वयं को यथार्थ का सामना करने के लिए तैयार कर रही है। अब हमारे संबंध को भी एक नाम, एक चेहरा देने की जरूरत है। हम दुनिया में लौट आए थे। आकाश में कितना भी उड़ लें, रहना तो आखिर इस जमीन पर ही है।

मैंने अपने अंदर की सारी शक्ति को संचित किया था। सच मैं नहीं बोल सकता था - इस क्षण तो बिल्कुल भी नहीं। और झूठ बोलने के लिए जिस अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है, उसे ही शमित करने का प्रयत्न कर रहा था, अपनी पूरी सामर्थ्य से। इस समय मैं जो कहूँगा वही हमारे आगे के संबंध का स्वरूप तय करेगा। मैं नहीं चाहता था, सच कहकर सपनों की इस खूबसूरत और पारदर्शी दुनिया को तोड़ दूँ। यथार्थ की बदसूरत, कठोर और नीरस दुनिया में अब मैं किसी भी तरह लौट जाने को तैयार नहीं था। मैंने वर्जित फल का स्वाद चख लिया था। अब मेरी रिहाई नहीं थी - इस जन्म में तो कतई नहीं। मैंने किसी पराई आवाज में रुक-रुककर कहा था - परिवार है, मगर न होने के बराबर।

अनायास कह तो गया था, मगर अब अपने ही बोझ से दम घुट रहा था। सच कहना चाहता था, मगर हिम्मत नहीं हुई - उसे खो देने की हिम्मत। इस पल मैं अपनी हवस की जद में था। नसों के संजाल में चिनगारी की सुनहरी आँधी उठी हुई थी, लहू आग बनकर दौड़ रही थी। उसकी देह-रस, गंध और स्वाद से गुँथी देह - मेरी आँखों के आगे थी, और कुछ नहीं। वह लेटी हुई थी उस क्षण, एक पारे की उजली नदी की तरह - हल्के-हल्के सरसराती हुई, अपने मायावी आकार की मादक संपूर्णता में - तिलिस्म रचती हुई-सी, मुझमें पूरी तरह उतर आने के लिए, बह आने के लिए उद्धत, आमादा - अपनी आखिरी बूँद तक...! मैं जानता था, वह मेरा होना चाह रही थी, मगर रस्म निभा रही थी - दुनियादारी की रस्म। यह जरूरी हो जाता है, खासकर ऐसे क्षणों में जब हम किसी वर्जित क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हों, अपनी ग्लानि को कम करना जरूरी हो जाता है। दिमाग जिसे नहीं स्वीकारता, मन उसे अस्वीकार नहीं कर पाता। संस्कार... ये हमारे लहू में बहता है, बहुत चुपचाप, मगर हर क्षण। सही समय आने पर मौन तोड़ देता है। हमें उसे सुनना पड़ता है, वर्ना वही विवेक का तीक्ष्ण दंश और अपराधबोध!

अपने जिस्म में डूबने से पहले वह अपने मन को हर तरह से समझा लेना चाहती है, साफ कर लेना चाहती है। औरत जो है, उसके लिए यह जरूरी हो जाता है। खालिस जिस्म बनकर जीना कभी उसके लिए संभव नहीं हुआ है। उसके नाजुक कंधों पर बहुत बोझ है। समाज का, संसार का, और सबसे ज्यादा खुद का। धरती की तरह है उसका जीवन, उसकी नियति... मयार्दा तोड़ नहीं पाती, स्वयं टूटती रहती है। संरक्षण उसका स्वभाव भी है और जिम्मेदारी भी। सर्जक होने की यही त्रासदी है शायद, कुछ तोड़ देना, नष्ट कर देना सहज नहीं रह जाता। गढ़ने, सजाने, सँवारने की आदत जो पड़ जाती है। मेरी तरफ बढ़ने से पहले वह भी जान लेना चाहती है, उसके पाँवों के नीचे आकर कुछ कुचल तो नहीं रहा है। मुझे उसे यह विश्वास दिलाना ही पड़ेगा कि ऐसा करते हुए वह किसी के दुख का कारण नहीं बन रही है, वर्ना वह कदम नहीं बढ़ाएगी। लौट जाएगी, मन से न सही, देह से जरूर - शायद हमेशा के लिए...

इस खयाल ने मुझे बेतरह डरा दिया था। एक सच की कीमत मेरी जान होगी! हाँ, मेरी जान! उसकी देह की तिलिस्म में आकंठ डूबा उस पल मेरा एकमात्र सत्य यही था कि मैं उसे पाना चाहता था - किसी भी तरह, किसी भी कीमत पर... मेरे पोर-पोर में उसकी पागल चाह पूरी शिद्दत से समा गई थी। अब चाहकर भी मैं इससे छूट नहीं सकता था। मेरे वश में मेरा आप नहीं रह गया था। अंत में मैंने एक और झू्ठ गढ़ा था - अपनी पत्नी के साथ एक लंबे समय से मेरा कोई शारीरिक संबंध नहीं है! वह शायद यही सुनना और मानना चाहती थी - सो मान गई!

एक असमंजस भरे मौन के बाद उसने कहा था - मैं तुम्हारी दुनिया को बाँटना नहीं चाहती, बस, तुम मुझे इसका एक हिस्सा बना लो, बहुत छोटा, मगर मुकम्मल...

उसदिन सुबह कब दोपहर में ढली और दोपहर शाम में, मैं नहीं जानता। समय थम गया था या हम ही, ये भी कह नहीं सकूँगा। वह थी, मैं था और बस, यही था - और कुछ नहीं... हम क्या कह-सुन रहे थे, इसका कोई माने नहीं था। वह कह रही थी और मैं सुन रहा था, यही बात दीगर थी। बोलते हुए दो आँखों का कौतुक, आश्चर्य और शरारत से पिघलकर कभी समुद्र हो जाना या एक बासंती देह का पारे की उजली नदी में तब्दील हो जाना... सबकुछ विलक्षण, अद्भुत था। वह कभी रोई थी, कभी हँसी थी और कभी नाराज हो गई थी। उसके चेहरे पर क्षण-क्षण बदलते ये भाव धूप-छाँव के अल्हड़ खेल की तरह रोचक थे।

वह एक जादू की तरह आहिस्ता-आहिस्ता खुली थी मेरे सामने - पाँखुरी-पाँखुरी... मेरी समस्त चेतना जैसे खुशबू की एक गहरी, पारदशी झील में डूबकर रह गई थी। बाहर रात का रंग गहरा रहा था, सुरमई से जामुनी, फिर स्लेटी। मौसम का नया चाँद अपनी चमक समेटकर न जाने कब दबे पाँव समंदर की ओर उतर गया था। गर्म हवा चंपा की तेज सुगंध में नहाई हुई निःस्तब्ध पड़ी थी। कोई रात का पक्षी रुक-रुककर बोल रहा था। यह नींद, स्वप्न और इच्छा की महक में डूबी आदिम रात मेरे अंदर गहरे तक उतरकर मुझे वन्य बना रही थी, अबाध्य और उच्छृंखल भी। मैं चाह रहा था, कपड़ों और मुखौटों की सभ्यता से परे आज की रात एकबार - कम से कम एकबार - अपने खालिस मन और देह को जिऊँ, उसकी तमाम हवस और मुरादों के साथ! किसी भी वर्जना और ग्लानि से परे होकर, एकदम उन्मुक्त, स्वच्छंद...

एक कहानी गढ़ते हुए धीरे-धीरे मेरी आँखों के सामने से उमा का चेहरा खो गया था - जल के तल में हिलते हुए सेवार की तरह। दामिनी की देहगंध में डूबा मैं उसे बताता रहा था अपने उस दुख-दर्द की बातें जो शायद ही मेरे जीवन में कहीं थीं। वही पत्नी के रूखे, शुष्क स्वभाव का होना, केयरिंग न होना, मेरा अकेलापन, उदासी, किसी के साथ, स्नेह-परस की चाह... सुनते हुए कितनी आसानी से दामिनी माँ बन गई थी, मुझे अपनी गोद में समेट लिया था। जिस्म में उतार लिया था। औरत कितनी भी बुद्धिमान हो, न जाने क्यों, यह वार कभी खाली नहीं जाता। पुरुष हमेशा स्त्री का मालिक बनना चाहता है, मगर औरत अंततः उसकी माँ ही बनना चाहती है। पिघल जाती है उसके दुख में, उसे अपने आँचल की छाँह में समेट लेना चाहती है। प्रेम देने में भले कंजूसी कर जाय, स्नेह से कभी इनकार नहीं कर पाती। इसी स्नेह की डोर पकड़कर मैं उसके शरीर तक पहुँचा था। उस रात उसने मुझे अपनी गोद में पनाह दिया था, ये बात और है कि मैं उसकी कोख तक पहुँच गया था, अपनी हवस से भर दिया था उसे - आखिरी बूँद तक!

उस रात दामिनी की देह के गर्म सुख में डूबकर मैंने जाना था, इच्छा का चरम और तृप्ति की सीमा क्या हो सकती है... हो ही नहीं सकती...! अब तक जिस शरीर को जी रहा था, वह जीवित ही नहीं था, बस एक खुशफहमी थी - जीने की, भोगने की... अब जब भ्रम टूटा, ठगे जाने की अनुभूति ने आ घेरा - वह भी किस भयावहता से! सुख - देह सुख - की एक नई परिभाषा, एक नया अर्थ मेरे सामने उस रात खुला था, मगर उसे शब्दों में मैं किसी भी तरह बाँधने में अक्षम था - भाषा अभी इतनी समर्थ भी कहाँ हो पाई है जो मन के भाव - ऐसे गहन भाव - को व्यक्त कर सके... जिस सुख को मैं अपने रगो-रेश से जी रहा था उसे शब्दों में व्यक्त करके उसे, उसकी विलक्षणता और अलौकिकता को जाया नहीं करना चाहता था। इसे जीना, जीना और जीना... यही इसकी उपलब्धि और सार्थकता हो सकती थी, और कुछ नहीं...!

बिस्तर में वह कोई और थी - इच्छाओं की एक रसमसाती हुई झील, जिसका कोई तल, थाह नहीं, कूल-किनारा नहीं...एक आसेव की तरह कुछ उतरा था उसमें - सर से पाँव तक आग की एक नदी बन गई थी वह! दपदपाती हुई अग्निशिखा! ईप्सा के चरम में धुआँती, लपटें मारती हुई - अदम्य, आकुल वन्या... मैं जानता था, उस कौंध भरे आलिंगन में सिर्फ मृत्यु है मेरे लिए, मगर क्या करे कि उस रात मेरा वही एकमात्र काम्य था। जीवन का इससे खूबसूरत विकल्प और कुछ नहीं हो सकता था मेरे लिए... मैं उतरा था उसमें - अपने पूरे होशो-हवास में - हमेशा के लिए डूब जाने के लिए - डूबकर उतर जाने के लिए... कैसा आत्महंता कदम था वह! वासना किसी को इतना ही साहसी बना देता है, प्रयोगधर्मी भी!

अपने तटबंधों को गिराते हुए मुझमे किसी बाढ़ चढ़ी नदी की तरह उफन आई थी वह। प्रेम के क्षणों में जितनी कोमल थी वह कभी-कभी उतनी ही आक्रामक भी - एक सीमा तक हिंसक! अपनी देह पर खिले अनवरत टीसते हुए नीले फूलों को देखकर पीड़ा का स्वाद ऐसा मधुमय भी हो सकता है, यह उसी रात महसूस कर पाया था मैं।

उस सारी रात मेरी बाँहों में पिघलते हुए मोम की तरह ऊष्ण और सघन रही थी वह - उसमें उतरना अपने स्व को खोना था, एक पूरे जन्म के लिए ही। मगर इसका कोई मलाल नहीं हो सकता था, जिस मूल्य पर यह घटा था, उस मूल्य पर तो कतई नहीं। बर्फ के गोरे जंगल में आग की एक सुर्ख नदी की तरह थी वह, तुषार कणों में आँच की दहकती हुई अनगिन बूँद समाए, शांत और टलमल... उस रात मैंने जाना था, एक औरत की देह में कितने समंदर, पहाड़ और नदियाँ समाई होती हैं। उनमें डूबते-उतराते, पार करते मैं निःशेष प्रायः हो गया था, चुक गया था, मगर न उसकी थाह पा सका था, न उसकी सीमा... वह रात गहरी तुष्टि और गहरे अभाव की थी, मगर थी अद्भुत, एक तरह से सांघातिक! बीतकर भी न बीतनेवाली, रह जानेवाली - हमेशा के लिए। उसने कहा था, मैं उसके जीवन का पहला पुरुष नहीं था, मगर - था! क्योंकि उसने मेरा वरण अपने मन से किया था। सही अर्थों में वही पुरुष किसी स्त्री के जीवन का पहला पुरुष होता है जिसका वरण स्त्री अपने हृदय से करती है।

दूसरे दिन उसके घर से मैं जब निकला था, कोई और ही बन गया था - एकदम नया, दूसरा ही। साथ में मेरी पूरी दुनिया भी बदल गई थी - सिरे से।

वह सारा दिन मेरा न जाने कैसे व्यतीत हुआ था। मैं हवा के परों पर था, तैरता हुआ - बिल्कुल हल्का-फुल्का... ये हमेशा की पुरानी दुनिया एकदम नई-कोरी हो आई थी यकायक। बहुत दिनों बाद बहुत सुकून और आराम से नहाया था मैं - देर तक - अपनी त्वचा पर दामिनी के रेशम जैसे स्पर्श का अनुभव करते हुए। उसकी देह गंध मेरे नासारंध्र में भरी थी, रात का बासीपन लिए - किसी सूखते हुए फूल की तरह... बाथरूम से बाहर निकलकर अपनी देह पर कोलोन छिडकते हुए मैंने निर्णय लिया था, आज ऑफिस नहीं जाना है। इस निर्णय के साथ ही मैं बेहद रिलैक्सड हो आया था। मन आज किसी बंधन को मानना नहीं चाहता था। उन्मुक्त होकर उड़ते फिरना चाहता था, खुले आकाश में - किसी पक्षी की तरह...

अबतक का जीवन क्या था - एक बंधन ही तो! हर चीज का बंधन - समाज, परिवार, रिश्ते का बंधन... अनुशासन की जंजीरों में जकड़ा हुआ, मर्यादा, सीमाओं के दायरे में संकुचित, आबद्ध... कब मन का किया, अपनी तरह से जिया... बचपन से अच्छा होने का अभिशाप लिए जिए जा रहा था - अशेष अच्छा बेटा है, बड़ों की सुनता है। अशेष हमेशा अपने क्लास में पहला आता है, कभी विद्यालय से अनुपस्थित नहीं रहता। जो दो, खा लेगा। जैसा दो, पहन लेगा। वह झगड़ा नहीं करता, गाली नहीं देता, गुस्सा नहीं करता... कितना अच्छा बेटा है। ‘मेरा राजा बेटा’ माँ बलैयाँ लेते नहीं थकतीं। पापा का सीना उसे लेकर गर्व से फूला रहता है। अपने रिश्तेदारों के बीच वह एक उज्जवल उदाहरण है।

कॉलेज में भी टॉप करने के चक्कर में मैं दिन दुनिया भुलाकर अपनी पढ़ाई में मश्गूल रहा। मेरे दोस्त पिक्चर जाते, लड़कियों के साथ इश्क लड़ाते, मगर मैं - अपने दोस्तों के बीच मिस्टर क्लीन के नाम से मशहूर - अपनी किताबों में पूरे साल सर डाले पड़ा रहता था। धीरे-धीरे मैं किताबी कीड़ा, भोंदू, महाबोर... न जाने किस-किस नाम से मशहूर हो गया। मगर क्या करता, मेरी आँखों के सामने रातदिन मेरे माँ-बाप का चेहरा तैरता रहता। कितनी उम्मीदें थीं उनकी मुझसे। मैं उनका इकलौता बेटा था। अपने सारे सपने उन्होंने मेरे आसपास ही बुने थे। उनकी आशाओं को तोड़ना मेरे वश की बात कदापि नहीं थी।

एकबार अपने दोस्तों के साथ उनकी जिद्द पर शराब पी ली थी और होस्टल के वार्डन के हाथों पकड़ा भी गया था। प्रिंसिपल महोदय ने पापा, मम्मी को ऑफिस बुलाकर ये शिकायत की तो सुनकर माँ वहीं अचेत हो गई। इसके बाद उन्होंने अन्न, जल त्याग दिया और जबतक मैंने उनके सर पर हाथ रखकर फिर कभी शराब न पीने की कसम खाई तबतक मुँह में एक दाना तक नहीं डाला। उस कम उम्र में मन में हजार तरह की इच्छाएँ उठती तो थीं, मगर उन्हें बरबस दबा लेना पड़ता था। हमेशा आँखों के सामने मम्मी-पापा का चेहरा तैर जाता था। बेचारगी से भरे हुए, दयनीय, मिन्नतें करते हुए... उनकी प्रत्याशाओं का बोझ इतना भारी था मेरे कंधों पर कि उनके नीचे दबकर न जाने मेरे अपने सपने कब दम तोड़ चुके थे।

कॉलेज में मेरे क्लास में एक लड़की पढ़ती थी - छंदा! गहरी साँवली मगर सुंदर। किसी तथाकथित नीची जाति की थी। बहुत चुपचाप और गंभीर। न जाने क्यों, मैं उसकी तरफ आकर्षित हो गया था। अधिकतर आँखों ही आँखों में हमारी बातें होती थीं - मौन संवाद... धीरे-धीरे हमारी दोस्ती गहरी हो गई थी। उस उम्र में अपने विपरीत सेक्स के साथ किसी भी तरह के लगाव या आकर्षण का अर्थ हमारे लिए प्रेम ही होता था। इसलिए मेरे और छंदा के बीच जो भी पनपा, जाहिर है, वह प्यार ही था मेरे लिए। अपनी पढ़ाई पूरी कर घर लौटते हुए छंदा के आँसू देखे तो भावुकतावश उसे शादी का वचन दे दिया।

मगर घर लौटकर उसे एक पत्र भी न लिख सका। लिखता भी तो क्या! अच्छी नौकरी मिलते ही मेरी शादी के लिए एक से बढ़कर एक रिश्ते आने लगे थे। उनमें से मम्मी ने सबसे ज्यादा दहेज लानेवाली लड़की के साथ मेरी शादी पक्की कर दी थी। मुझसे पूछा तक नहीं था। कहा था, मैं जो कर रही हूँ, तेरी ही भलाई के लिए कर रही हूँ। मुझे उनपर यकीन था। उनके फैसले के विरुद्ध जाने का प्रश्न ही नहीं उठता था। अच्छा बेटा जो था - माँ-बाप का आज्ञाकारी, बकौल सबके, श्रवणकुमार... माँ-बाप का भारी-भरकम काँवर उठाए फिरने के लिए विवश।

दुल्हन लेकर घर लौटते हुए अपने किसी मित्र से सुना था, छंदा ने मेरी शादी की खबर पाकर जहर खा लिया है। अस्पताल में पड़ी हुई है, बचने की कोई उम्मीद नहीं... सुनकर अपनी सुहागरात में दुल्हन को बिस्तर पर छोड़कर टायलेट में कमोड पर बैठकर खूब रोया था - मुँह में रूमाल ठूँसकर। उस रात सचमुच स्वयं से घृणा हुई थी, अपने दब्बूपन पर मन हिकारत से भर उठा था। कैसा मर्द हूँ मैं! अपने मन की कुछ भी नहीं कर पाता...

फिर जैसे ही मम्मी ने दरवाजे पर आकर आवाज लगाई थी, चुपचाप अपने आँसू पोंछकर कमरे में आ गया था और किसी अच्छे बच्चे की तरह दूध पीकर उमा के बगल में लेट गया था।

दूसरे दिन सुबह-सुबह छंदा के मर जाने की खबर मिली थी, मगर तब तक मैं काफी सँभल चुका था। सुहागरात के दौरान मुझे उमा से प्रेम भी हो चुका था। उन दिनों प्रेम का यही हाल था मेरे जीवन में।

अपने खयालों में उभता-चुभता मैंने नाश्ता किया था - पाव-भाजी - यहाँ का मशहूर नाश्ता। मिसेज लोबो ने मेरा अच्छा मूड, धुले हुए कपड़े और देह से उठती कोलोन की तेज खुशबू को पकड़ लिया था, हँसकर पूछा था, क्या मैन, भोत हैपी दिखता है, कोई स्पेशल बात है क्या? मैं क्या कहता, मुस्कराकर रह गया था।

अपने कमरे में आकर बॉल्कनी में बैठा-बैठा सड़क पर आते-जाते हुए लोगों को देरतक तकता रहा था, मगर देखा शायद ही कुछ था। दिमाग में दामिनी का खयाल था, और कुछ नहीं। अपनी देह में दामिनी की देह को महसूस कर पा रहा था। ऐसा होते ही पूरे शरीर में एक झुरझुरी-सी दौड़ जाती थी।

ये जीवन ने यकायक कैसा मोड़ ले लिया था...! सोचकर भी आश्चर्य हो रहा था। शादी के बाद जिंदगी एक बँधी-बधाई लीक पर चल रही थी। जिम्मेदारियों और दुनियादारी के बीच अपने ख्वाहिशों का खयाल ही नहीं रह गया था। शादी के बाद दूसरे ही दिन उमा ने मेरे सामने गरमा-गरम आलू के पराँठे परोसे, मेरी अलमारी दुरुस्त की, अपने दहेज में लाई हुई चीजें यहाँ-वहाँ सलीके से सजाईं तो मेरा मन एकदम प्रसन्न हो गया। मुझे पति होने के फायदे और सुख का स्वाद मिलने लगा था। एक आत्मगौरव, अहम को तुष्टि कि मैं पति हूँ, किसी का मालिक... कोई मेरे लिए करवा चौथ रखती है, मुझपर निर्भर है, मेरी इच्छा और आदेश पर चलती है। शरीर का सुख भी था। दिनभर की सेवा, अच्छा भोजन और रात में बिस्तर पर देह का सुख, वह भी अपनी इच्छानुसार, अपने मन मुताबिक। उम्र की पहली उठान से एक ही इच्छा मन में पैदा होती रही थी, कोई औरत हो बिस्तर पर जो बिना न-नुकुर किए मेरी हर बात मानती चली जाय, मैं जो कहूँ, वही करे, मुझे करने दे।

उमा वैसी ही स्त्री थी। पति की इच्छा उसके लिए सर्वोपरि हुआ करती है। वह बिना किसी तरह का सवाल उठाए आजतक मैं जो कहता हूँ, वह करती आई है। बिस्तर में भी। एक सुंदर स्त्री की जो आम धारणा हमारे देश में बनती है, उमा वैसी ही थी - गोरी, स्वस्थ और भरी-पूरी। मुझे इससे ज्यादा और क्या चाहिए था। मैं स्वयं को खुश मानता था। उमा भी अपना घर-परिवार, बच्चे लेकर संतुष्ट थी। एक आम औरत को जो कुछ भी चाहिए होता है, वह सब उसके पास था। मेरे जैसे एक मध्यमवर्गीय मानसिकता वाले पुरुष के लिए उमा एकदम सही औरत थी।

मैंने इससे पहले कभी कुछ भी, जो वर्जित समझा जाता है, नहीं किया था। मन में इच्छाएँ उठती थीं, मगर उन्हें दबाने की आदत बचपन से पड़ गई थी। संरक्षणशील परिवार से होने के कारण हर सामाजिक नियम-कानून, रीति-नीति मानने की आदत घुट्टी में पिलाकर डाल दी गई थी। हमेशा से जानता था, वासनाएँ मन के एकांत दुनिया के लिए होती हैं। उनसे समाज को कुछ लेना-देना नहीं। वह नियम पहचानता है, इच्छाएँ नहीं। उन्हें लेकर एक-आध सपने देख लेना और ठंडा पानी पीकर स्वयं को शांत कर लेना - यही होता आया है। इसमें कभी कुछ गलत भी नहीं दिखा। जिस तरह बचपन से हमें और बातों का संस्कार मिलता है और हम उन्हें बिना कोई प्रश्न उठाए स्वीकार करते चले आते हैं, उसी तरह से यह बातें भी थीं। इनसे तकलीफ होती थी, मगर कभी कुछ गलत शायद ही लगा।

जिन लड़कियों को लेकर रातभर सपने देखता था, दिन के उजाले में उन्हें बहन कहकर संबोधित करने में कोई संकोच नहीं होता था। इस तरह से हमारी शिक्षा-दीक्षा, संस्कार हमारा अनुकूलन करते हैं, अनुशासित करते हैं। एक तरफ मन होता है, उसकी ख्वाहिशें होती हैं। दूसरी तरफ समाज और उसके नियम। दोनों के बीच सामंजस्य बनाकर चलते रहना पड़ता है। देह सामाजिक बनी रहती है, मन की अराजकता सपनों, कल्पनाओं की दुनिया में छिपी, सिमटी, सुरक्षित रहती है। कुछ चालाक, तेज-तर्रार लोगों की तरह दूसरों की आँखों से काजल चुराने की तरह छिपकर, चुपचाप अपने मन की कर लेने की सद्बुद्धि कभी थी नहीं। पढ़ने-लिखने में तेज होना और जीवन की इन बातों में तेज होना दो अलग-अलग बातें होती हैं। आज इतने वर्षों बाद समझ पाया हूँ, मैं स्मार्ट होकर भी कितना बुद्धू हुआ करता था। न जाने किन बातों और आदर्शों के पीछे अपनी आधी से अधिक जवानी बिता दी।

आज जब वर्ज्य का अतिक्रमण कर इस अजनबी देश में पहुँच गया हूँ, तब खयाल आने लगा है, अबतक क्या-क्या खोया है। कैसे-कैसे सोने-चाँदी के दिन, निशिगंधा-सी महकती रातें...

पूरी तरह से अपनी इच्छाओं के वश में होकर मैंने जैसे स्वयं से ही एक वादा किया था, अबतक जीवन के जिन खूबसूरत अनुभवों को खोया है, उन्हें जरूर जीना है - किसी भी कीमत पर... उस समय आँखों के सामने सिर्फ और सिर्फ दामिनी का चेहरा था - इच्छाओं के बहाव में केसर होता हुआ, साँझ के रंग में रँगी किसी अलस, मंथर नदी की तरह... यकायक मेरी सारी वर्जनाएँ टूट गई थीं। एक तटबंध टूटी तेज धार की तरह मेरा बहना अब अपरिहार्य है, किसी के रोके से न रुक सकूँगा, मैं जानता हूँ, शायद तभी इतना अशांत हूँ। अपने आप का अपने वश में न होना एक भयभीत कर देने वाला अनुभव होता है। प्रेम एक अनिर्वचनीय खुशी के साथ कितनी पीड़ा और संत्रास भी ले आता है जीवन में, टीसता हुआ सुख - हर प्रहर, क्षण-क्षण...

बैठे-बैठे आज मैंने पहली बार दिन के समय एकसाथ बीयर की न जाने कितनी बोतलें पी ली थी। मिसेज लोबो का फ्रिज खाली हो गया था। शाम को मुझे इसकी भरपाई करनी पड़ेगी - बीयर का एक पूरा क्रेट लाकर। हम दोनों के बीच इसी तरह की अंडर स्टैंडिंग थी। वैसे आज मैंने पहली बार अपनी सीमाएँ तोड़ी थी - इतनी पीकर!

नींद खुली तो समझ पाया मैं सो गया था - न जाने कब! बॉल्कनी में बैठ-बैठे, ईजी चेयर पर। शाम की धूप में नीम का पेड़ सुनहरा होकर झिलमिला रहा था। डालों पर पक्षियों की अनवरत कीचिर-मिचिर... आँखें मलते हुए समझ पाया था, मोबाइल की लगातार बजती हुई घंटी ने मेरी नींद तोड़ी थी। फोन पर दामिनी का स्वर था - क्या कर रहे हो?

तुम्हारा खयाल... एक निहायत आम-सा रोमांटिक जवाब - और तुम?

तुम्हारा इंतजार... उसका भी वही - एक-सा जवाब। हम दोनों अपने अनजाने एक ही रेखा पर चल रहे थे शायद।

तो फिर देर किस बात की, चले आओ...

उसके निमंत्रण में न जाने कैसे प्रलोभन का आभास था, मेरे अंदर अनायास अनाम इच्छाएँ आँच देने लगी थीं।

हाँ, आता हूँ...

मैंने यह कहते हुए फोन रख दिया था। इसके सिवा मुझे कहना भी क्या था। उसने बुलाया था, मुझे जाना था - जाना ही था। मुझे अपना यह अधैर्य, एक किशोर की तरह की उमंग - सबकुछ आश्चर्य में डाल रहा था। मैं नहीं जानता था, मेरे अंदर जीवन की इतनी सारी इच्छाएँ भरी हुई हैं! कितना शांत, सयंत हुआ करता था मैं - अशेष त्यागी - एक बहुराष्ट्रीय कपंनी में उच्च पदस्थ अधिकारी, दो बच्चों का बाप, पैंतालीस वर्ष की परिपक्व उमर... एक नए-नए प्यार में पड़े किशोर की तरह बेसब्र और बेकरार... तैयार होते हुए मुझसे टाई की गिरह भी ठीक से दुरुस्त नहीं की जा रही थी। आईने में अपना उत्तेजना से लाल पड़ा हुआ चेहरा देखकर मुझे खुद पर ही हँसी आ गई। ये क्या हाल हो रहा है मेरा... क्या मुझे प्यार हो गया है? मैं किसी से पूछना चाहता हूँ। यकायक स्वयं को बहुत असहाय महसूस करता हूँ। किले की मजबूत दीवार पर सेंध पड़ गई है। नींवों में कंपन है, बहुत हल्का, मगर स्पष्ट, अब न जाने क्या कुछ धराशायी होकर रह जाएगा...

इसके बाद मेरी दुनिया बदलती चली गई थी। सबकुछ नया, अलग, अनोखा - सिरे से... मैं पहले की तरह ऑफिस जा रहा था, फोन पर उमा से बातें कर रहा था, घर-परिवार की खैर-खबर ले रहा था, मगर अंदर से मैं मैं नहीं रह गया था। कोई और बन गया था, शायद वह जो हमेशा से था, मगर कभी बन न सका था - जुर्रत ही नहीं हुई थी। मैं एक बेटा बन सकता था। पति और बाप बन सकता था, मगर बस अशेष नहीं बन सकता था - जो मैं वास्तव में था। न जाने कितने पर्तों के नीचे दब गया था, जी रहा था कहीं से, इसका पता भी खुद को नहीं था। आज जब स्वयं के सामने अपना वजूद खुलकर आया है, मैं जैसे स्वयं को ही पहचान नहीं पा रहा हूँ। कितनी इच्छाएँ हैं अंदर, कितने सपने और अभिलाषाएँ - आधी-अधूरी और बेकल... इनकी तड़प का, खामोश सरगोशियों का अहसास कैसे अबतक नहीं था मुझे...!

कलतक की भाग-दौड़, शोर-गुल और परेशानियों से भरी दुनिया एकाएक अच्छी हो गई है - बहुत-बहुत अच्छी। आकाश का गहरा नील मुझे मुग्ध करता है, ढलते हुए सूरज को मैं निष्पलक तकता रहता हूँ। इतनी सुंदरता और मैंने देखी नहीं...! अबतक क्या कर रहा था मैं, कहाँ था...?

दोपहर के निर्जन में कोयल कूकती है और मैं अनमन हो उठता हूँ। मीटिंग के बीच से उठकर कहीं निकल पड़ने को मन करता है - सबकुछ छोड़-छाड़ के। बहुत उदार भी हो गया हूँ। भिखारियों को पास बुलाकर खुद भीख देता हूँ। विंडो शॉपिंग करता फिरता हूँ। हर खूबसूरत कपड़े, गहने को देखकर सोच पड़ता हूँ, यह दामिनी पर कितना फबेगा। ढेर सारी खरीददारी करता हूँ, उन उपहारों को पाकर जब दामिनी का चेहरा खुशी से खिल पड़ता है, मैं मुग्ध होकर उसे देखता रह जाता हूँ - यही मेरा प्राप्य है, पुरस्कार है। मैं गहरे, अनाम सुख से भर उठता हूँ। रगो-रेश में सुख मचलता है अल्हड़ नदी की तरह।

इन दिनों दुनियादारी की बातें निरर्थक लगती हैं, सोच उठती है, ये लोग मुझे अकेला क्यों नहीं छोड़ देते - मेरा ही जीवन मेरे लिए - थोड़ी देर के लिए... इतना तो दिया है सबको, मेरा जीवन और ही जीते आए हैं हमेशा! एक कचोट बनी रहती है भीतर, ठग लिए जाने की, अपने मन की न कर पाने की, जीने की। वह समय जो बेआवाज गुजर गया, जवानी की सारी खूबसूरत नियामतों के साथ, उसे वापस लाना है - किसी भी कीमत पर। इन सब की कीमत क्या होगी, मैं समझ सकता हूँ। मगर अब ऊहापोह का समय बीत चुका है, जो होना है वह अवश्यमभावी है।

मैं जीना चाहता हूँ - सचमुच जीना चाहता हूँ। खुलकर - सही अर्थों में। इसलिए मुझे इसकी सारी शर्तें भी मंजूर हैं। मैंने स्वयं को पूरी तरह से हालात के हाथों में सौंप दिया है। जब मैं दामिनी के साथ होता हूँ, सिर्फ उसी के साथ होता हूँ। मेरे लिए उन क्षणों में और कहीं कोई नहीं रह जाता। दामिनी से मेरी दुनिया शुरू होती है और उसी पर खत्म हो जाती है। हम दोनों के बीच तीसरा कोई नहीं होता।

दामिनी कोई साधारण स्त्री नहीं थी मेरे लिए। वह जादू थी - खालिस जादू... उसके साथ मेरा होना सपनों में होना होता था। मैं सच और झूठ के बीच की किसी स्थिति में होता था। बेतरह उलझा हुआ, मगर छूटना नहीं चाहता था किसी तरह इस उलझन से, बना रहना चाहता था इस मायावी लोक में उसके साथ - हमेशा के लिए। ऐसा ही था उसके मोह का बंधन, पक्षी खुद को जाल में लपेटकर निश्चिंत हो जाया करती है। उस बहेलिया के छोटे-से पिंजरे में मुक्ति का एक पूरा आकाश है, यह सच वह पक्षी ही जानता है, तभी तो सलाखों के निर्मम घेरे के बीच रहकर भी उम्मीदों के गीत गा लेता है... कुछ सच पूरी दुनिया के लिए हमेशा झूठ ही बने रहते हैं। यह भी उनमें से एक था।

उसके धूप-छाँव भरे व्यक्तित्व का अनोखापन मुझे भूलभुलैया-सा रोमांचकारी प्रतीत हो रहा था। मैंने उसके पास आना चाहा तो उसने कितनी सहजता से यह होने दिया। कहीं कोई प्रतिरोध नहीं था, बाधा नहीं थी, इसलिए मैं उसमें निर्विरोध धँसता चला गया। आगे क्या बदा है मेरे भाग्य में मैं नहीं जानता - जानना चाहता भी नहीं। कभी-कभी तो यह होता है कि दाना चुगती चिड़िया जाल को निमंत्रण की खुली बाँहें समझकर उसमें निश्चिंत होकर सिमट आती है। मुश्किल तो तब होती है जब वह वापस उड़ना चाहती है। अक्समात उसे ज्ञात होता है कि उसका आकाश तो हमेशा के लिए उससे छिन चुका है! उसके अभागे पंखों के लिए अब कोई उड़ान शेष नहीं।

मगर मैं अपने इस रेशम डोर-से बंधन में खुश था। फिलहाल तो ये दिन तितली के परों की तरह खूबसूरत और रंगीन थे।

मार्च का महीना गोवा में तेज धूप और चटक रंग फूलों का है। समंदर के किनारे छोटी पहाड़ियों की ढलानें काजू के लाल, सुनहरे फलों से दहकती-सी जान पड़ती हैं। पलाश, सेमल के गहरे रक्तिम फूलों से चारों तरफ आग लगी हुई होती है। वन्य हरियाली के बीच यहाँ-वहाँ सौ-पचास घरों की भूरी-कत्थई टाइल्स की छतें रह-रहकर चमकती हैं - चटक रंगों के बोगनबेलिया से घिरे हुए। रास्ते के किनारे फूले कृष्ण चूड़ा के पीले फूल दोपहर की तीखी धूप में अलस झरते रहते हैं। बँगलों के बरामदे में बैठे हुए वयस्क, बुजुर्ग लोग ठंडे उर्राक की चुस्कियाँ लेते हुए गर्मी के आलस्य से ऊँघते हुए-से चुपचाप बैठे रहते हैं। रास्ते पर आने-जानेवालों का हालचाल पूछते हैं।

कई बार गाँवों की सँकरी पगडंडीनुमा सड़कों पर निरुदेश्य भटकते हुए हम इन लोगों का हाथ उठाकर अभिवादन किया करते थे। दामिनी उन्हें रश्क से देखकर कहती थी - कितने लकी हैं न ये लोग! कैसे निश्चिंत दिन-दिनभर बैठे रहते हैं... मैं उसकी मधु की रंगतवाली पुतलियों में धूप का फैलना-सिमटना देखता और खो जाता - भँवरे की गुँजार-सी चुप्पी हमारे बीच अनमन डोलती रहती-देर-देर तक। कभी मैं पूछता - और हम नहीं हैं लकी... मेरी उँगलियों में उलझी अपनी तराशी हुई उँगलियों को देखकर वह रंग जाती। कई बार उसके चेहरे पर उसके कपड़ों का रंग प्रतिबिंबित होता, मैं उसकी आँखों पर, माथे और गालों पर रंगभरी तितलियों का उड़ना देखता रहता। वह झेंपी-सी मुस्कराहट होंठों पर लिए जंगली फूल इकट्ठा करती चलती, कभी-कभी तिरछी नजर से मुझे देख लेती, तब, जब मैं कहीं और देखता होता हूँ।

दबी हँसी से उसके होंठों के कोने धीरे-धीरे काँपते रहते थे। उन्हें देखकर मैं न जाने किन अनाम इच्छाओं से घिर आता था। दामिनी मेरी आँखों को समझ लेती थी शायद, तभी अनायास यूँ गुलाबी पड़ जाती थी। मुझे ऐसे क्षणों में लगता था, रंगों को उसका सार्थक अर्थ यही चेहरा देता है। फूल न होते, इंद्रधनुष न होता तो रंगों के क्या और कितने माने रह जाते...

सुनसान दुपहरियों में यूँ भटकते रहना हम दोनों को ही अच्छा लगता था। एकबार जंगल में लगी शराब की एक भट्टी में हमने ताजी उतरी शराब की कई घूँट पी थी, वह भी मिट्टी के कुल्हड़ में। वहाँ कोई गिलास उपलब्ध नहीं था। लगा था, सीने से लेकर पेट तक जलकर राख हो गया है। तेजाब की तरह था उसका स्वाद। भट्टीवाले ने ही बिना पानी मिलाए नीट पीने की सलाह दी थी। दामिनी तो वही सीने पर हाथ रखकर बैठ गई थी। हम दोनों को ही झट् से नशा चढ़ गया था। दामिनी की आँखों में लाल डोरे उग आए थे। उलझे-बिखरे बालों के बीच उसका तमतमाया चेहरा और चढ़ी हुई आँखें कितनी उत्तेजक लग रही थी। अपने अंदर की सनसनाहट को दबाते हुए मैंने उसे सँभालकर उठाया था। मुझसे लगी-लगी वह डगमगाते हुए कदमों से चलती रही थी - अशेष, ये मौसम, ये निर्जन दुपहरी और एक अनजान वीराने में मेरा-तुम्हारा यूँ भटकना... कभी नहीं भूलेगा। सब सहेजकर रखूँगी - यहाँ! उसने अपने बाएँ सीने पर एक उँगली रखी थी। मैंने उसकी एक बाँह अपने गले में डाल ली थी - मुझे भी याद रहेगा...

क्या? उसकी आँखें मुझपर थीं - एक बच्ची की-सी कौतूहलता लिए।

तुम्हारा इस तरह बहकना और मुझसे लगकर चलना... अच्छा, अगर ये रास्ता, ये दोपहर कभी खत्म न हो तो...?

तो, तो बहुत अच्छा होगा, अशेष, कुछ करो न कि ऐसा ही हो... वह मचल गई थी - ठीक वैसे ही, एक बच्ची की तरह।

उस दिन मैं उसे उस सेमिट्री में भी ले गया था, जहाँ शैरोन डिसा की कब्र थी। मैंने दामिनी से कहा था, कुछ-कुछ नाटकीय ढंग से ही - चलो, आज तुम्हें किसी से मिलाता हूँ... दामिनी ने मुझे कौतूहल भरी आँखों से देखा था - तो यहाँ भी तुम्हारे परिचित होने लगे! कल तक तो कोई न था! कौन है?

है कोई... उन्नीस साल की लड़की, जो कभी पतंग बनकर सारे आकाश में उड़ते फिरना चाहती थी...

अच्छा! दामिनी की आँखों में असमंजस के भाव थे। जाहिर है, वह मेरी बातों का अर्थ समझ नहीं पा रही थी। मैं उसे शैरोन के कब्र के पास खींच ले गया था। वहाँ पहुँचकर दामिनी की आँखें तरल हो आई थीं। उसने झुककर सिरहाने पर लगे संगमरमर की पट्टी पर लिखा परिचय और संदेश पढ़ा था। उसकी आँखें कुछ और पिघल आई थीं - एक छोटा-सा जीवन - फूलों की उमर की तरह... एक गहरी साँस में डूबी आवाज थी उसकी। किसी निसंग टिटहरी की तरह भटकी-भटकी, उदास...

मैंने गौर किया था, आज उसपर कार्नेशन का लाल फूल नहीं था। न जाने क्यों मैंने अनायास दामिनी की ओर मुड़कर कहा था - मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूँगा, जीवन के बाद भी नहीं। सुनकर दामिनी हल्के से मुस्कराई थी, मगर उसकी आँखें गीली हो आईं थीं, बह पड़ने को तत्पर...

चारों तरफ तेज धूप में चंपा के हल्के पीले फूल जल-से रहे थे। कब्रिस्तान की दीवारों के साथ-साथ गुलमोहर की लंबी कतार थी। झरते हुए नारंगी फूलों से सफेद संगमरमर के कब्र अँटे पड़े थे। अजीब चुप्पी थी वहाँ - गहरी और शांति से भरी हुई। एक प्रच्छन्न उदासी का अनचीन्हा अहसास भी! सलीबों पर पड़ी फूलों की सूखी मालाओं में, लिपी-पुती दीवारों और झाड़ियों में खिले र्निगंध सफेद फूलों में... हर तरफ मृत्यु का शोक और गुजर गए जीवन का उच्छ्वास... यहाँ हवा उसाँसें लेती-सी गुजरती है, कब्रों के चारों तरफ उगे हुए जंगलातों से उलझ-उलझकर, अजीब सरसराहट भरी आवाज में।।

हम उसदिन वहाँ देरतक बैठे थे - एक जमीन तक झुके हुए गुलमोहर के नीचे। वह मेरी गोद में सर रखकर लेटी हुई थी। हवा के झोंकों से रह-रहकर झरते हुए फूलों से जैसे ढँक-सी गई थी। मैं उन्हें चुनकर हटाता रहा था और फिर उसने मेरा हाथ पकड़कर रोक लिया था - रहने दो, अच्छा लगता है... उसकी आँखों में उस समय दोपहर का गहरा नीला आकाश उतरा हुआ था, खोया हुआ-सा, अपना सारा सूनापन लिए... मुझे उन आँखों को देखकर न जाने ऐसा क्यों खयाल आया था कि दो उजली कश्तियों में पूरा समंदर सिमट आया है! अपनी गहराई और अछोर विस्तार के साथ... उसमें डूबता-उतराता मैं बैठा रहा था, बिना कुछ कहे। हमारे बीच पसरी हुई सुगंध और अनाम उदासी की उस खूबसूरत चुप्पी को मैं तोड़ना नहीं चाहता था। एक पारदर्शी दुपट्टे की तरह उस निर्जन दुपहरी का नीरव सुकून हमें देरतक घेरे रखा था।

उस रात उमा का फोन आया तो उसकी बातों, अनुभूतियों के साथ मैं स्वयं को जोड़ नहीं पा रहा था। कहीं से कुछ बहुत सूक्ष्म टूटकर दरक गया था। अनायास मैंने महसूस किया था हम दोनों के बीच - हमारे और उमा के बीच - दामिनी है! किसी अदृश्य डोर की तरह नहीं, बहुत स्पष्ट और मांसल - एक वास्तविकता जिसे किसी तरह नकारा नहीं जा सकता। मैं पूरे ध्यान से उमा की बातें सुनने की कोशिश कर रहा था। मगर बात करते हुए थोड़ी देर बाद अचानक रुककर उमा ने पूछा था, मन, आपका ध्यान किधर है?

मैं एकदम से सकपका गया। कितनी तीक्ष्ण होती हैं औरतों की नजर, कुछ भी नहीं छूटता इनसे - छोटी-से-छोटी बात भी। मुझे सावधान रहना पड़ेगा... मैंने खुद को चेताया था।

फोन रखते हुए मैंने उमा के इस समय के चेहरे की कल्पना करने की कोशिश की थी। उलझे बाल, थका और विरक्त चेहरा... दिनभर के कामों से ऊबी और चिड़चिड़ाई हुई! कभी स्वयं को घर-गृहस्थी की बातों से अलग नहीं कर पाती, अधिकांश हाउस वाइफ की तरह। निजता के चरम क्षणों में भी वही घर बीच में खड़ा रहता है, धुआँए चूल्हे और दाल-चावल के हिसाब-किताब के साथ। उसकी देह से ही नहीं, उसकी बातों और सोचों से भी उसकी रसोई की गंध आती है। उसी में रस-बस गई है इस कदर कि अब उनके बिना उसके वजूद की कल्पना भी नहीं की जा सकती। बच्चे तो चुहल ही करते रहते हैं - माँ को देखते ही पालक पनीर, आलू-पुरी की याद आती है, भूख लगने लगती है। माँ के शरीर से आज मखनी दाल का फ्लेवर आ रहा है, जरूर मखनी दाल ही बनी होगी...

मैं ये सब इतनी सहजता से नहीं कह सकता। बात घुमा-फिराकर कहनी पड़ती है - तुमने वो नया परफ्युम ट्राई किया? अभी नहाओगी तो लगा लेना...

उमा चिढ़ जाती - अभी नहाऊँ! अरे सुबह-सुबह तो नहा लिया रसोई में घुसने से पहले। तुम्हारी स्वर्गवासी माँ ने ही तो यह अच्छी आदत लगाई है। बिना नहाए रसोई की चीजों को हाथ कहाँ लगाने देती थीं... इसके बाद मैं चुप हो जाने में ही अपनी गनीमत समझता था। मेरी माँ का प्रसंग आते ही उमा के जख्मों के टाँके उधड़ जाते थे। फिर तो वह शुरू ही हो जाती थी। कभी-कभी दिनों तक के लिए। माँ ने उसे शुरू-शुरू में बहुत सताया था, यह कहने में अब संकोच नहीं होता। उन दिनों मैं उमा की इस मामले में कोई मदद नहीं कर सका था। मूक दर्शक होकर सबकुछ देखते रहने के सिवा मेरे पास और कोई दूसरा चारा भी नहीं था। अच्छा बेटा जो था।

न जाने क्यों इन दिनों उमा की शिकायतें बढ़ती ही जा रही है - घर की जिम्मेदारियों की, बच्चों की - अनुशा पढ़ाई ठीक से नहीं करती, विनीता बिगड़ती जा रही है... फिर बीच-बीच में वही सनातन ताना - तुम्हें क्या, तुम तो वहाँ जाकर बैठ गए हो। यहाँ मैं अकेली गृहस्थी के चूल्हे में मर-खप रही हूँ। कई बार उसने मिसेज लोबो की बाबत भी पूछा था। उनकी पचपन साल की उमर सुनकर कुछ आश्वस्त हुई-सी प्रतीत हुई थी। मगर रह-रहकर संदेह का काँटा जरूर कहीं गड़ता रहता था। कभी गोवा की सोसायटी के विषय में पूछती तो कभी यहाँ की लड़कियों के विषय में - सुना है, वहाँ का जीवन बहुत उन्मुक्त है! पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव है... टीवी पर दिखा रहे थे उसदिन, अपनी शादी में दुल्हन घूँघट उठाकर नाच रही थी...

उसकी बातों पर कभी मुझे खीज होती थी तो कभी हँसी भी आ जाती थी। कई बार समझाने की कोशिश की थी - हर संस्कृति की अपनी विशिष्टता होती है। हमें उन्हें सराहना और उनका सम्मान करना चाहिए।

‘हाँ, मगर उनका अंधानुकरण नहीं...’

उमा जिद्दी बच्ची की तरह अपनी बात पर अड़ जाती। पता नहीं, इन बातों से वह क्या साबित करना चाहती थी। शायद यह उसके अंदर का असुरक्षा बोध था जो उसे अतिरिक्त आक्रामक और डिफेंसिव बना रहा था। एक अजनबी कल्चर के प्रति उसके पूर्वाग्रह उसे शक और संदेह की ओर धकेल रहे थे। शायद मेरी उदासीनता और अन्य मनस्कता को उसने सूँघ लिया था। इन दिनों मुझे लेकर वह शंकित और सतर्क थी। उसकी बातों और घुमा-फिराकर किए गए सवालों से यह बात समझ सकता था मैं।

मैं उसके प्रति संवेदनशील बना रहना चाहता था, मगर क्या करूँ कि अन्यमनस्क होता जा रहा था। हर क्षण ध्यान दामिनी की तरफ लगा रहता था। जीवन में सही मायनों में रोमांस अब आया था। दामिनी एक मुकम्मल औरत थी - हर अर्थ में! उसका हर रूप, हर अंदाज मुझे चकित करता था, सुखद ढंग से विस्मित भी। हर बड़ी से बड़ी तथा छोटी से छोटी बात में वह अपना सौ प्रतिशत देती थी। उसके किसी काम में मैंने कोई कमी या उपेक्षा नहीं देखी थी। उसका हर काम सुंदर और सुगढ़ हुआ करता है। वह जिस तल्लीनता से पेंटिंग्स् बनाया करती है, उसी तल्लीनता से चाय भी बनाती है। उसके घर के हर कोने से, हर बात से उसका व्यक्तित्व झलकता है। मैंने अपने आजतक के जीवन में किसी औरत को इतना सुरुचि संपन्न तथा सलीकेदार नहीं देखा था। उसके कॉटेज में पँहुचकर प्रतीत होता था मानो किसी हेल्थ स्पा में पहुँच गया हूँ। उसका चेहरा, उसकी बातें, उसका स्पर्श - सब में लज्जत और सुकून था, जैसे कोई ठंडा फाहा या बाम...

मैंने कभी स्वयं को किसी माने में विशिष्ट नहीं समझा था। एक अच्छी नौकरी, बीवी, बच्चे... कोई खास बात नहीं। स्वयं को बहुत बौद्धिक भी नहीं मानता। पढ़ना पड़ता था इसलिए पढ़ता, मेहनत करता था, अच्छे अंकों में उत्तीर्ण भी हो जाता था, मगर इसमें जीनियस होने जैसी कोई बात नहीं थी।

दामिनी ने मुझे पहली बार विशिष्ट होने का अहसास कराया था। मेरी हर बात में उसे कोई खासियत नजर आती थी। कभी-कभी मैं सोचने लगता था, प्रेम वास्तव में अंधा होता है। मैं आईने के सामने खड़ा होकर स्वयं को देखता - साधारण कद-काठी और सूरत। कोई अनोखी या असाधारण बात नहीं। पता नहीं, दामिनी जैसी खूबसूरत और सुरुचि संपन्न औरत ने मुझमें क्या देखा। हमारी उम्र में भी काफी अंतर था। मैं चालीस पार कर रहा था, वह पच्चीस की थी। जिस खुशी और सुख की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था वह सब अचानक मेरी झोली में आ गिरा था।

मुझे दामिनी का जीवन अनोखा प्रतीत हुआ था। उस जैसी एक युवा और खूबसूरत स्त्री का एकदम अकेली रहकर जीवन यापन करना... सहज-स्वाभाविक बात नहीं लगती थी। हालाँकि गोवा का सामाजिक जीवन देश के अन्य हिस्सों की तुलना में स्त्रियों के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जा सकता है, फिर भी...

दामिनी की बातों से एक बात मैं समझ सका था कि उसे अनावश्यक, अतिरिक्त कौतूहल पसंद नहीं। वह मेरे जीवन के व्यवहारिक पक्ष से एक तरह से उदासीन ही रहती थी। न अपने विषय में ज्यादा कुछ बोलना ही पसंद करती थी। कहती थी, ये सब सेकेंडरी बातें हैं, बाद में होती रहेंगी, पहले तो तुम्हें - अशेष को - एक मनुष्य, एक व्यक्ति के रूप में जान लूँ। अगर तुम ही न सही हुए तो फिर तुम्हारी डिग्री, ओहदे का क्या करूँगी... अचार डालूँगी? कहते हुए वह अपनी हँसी के शरीर, इंद्रधनुषी बुलबुलों में फूट पड़ती - प्यार इनसान से किया जाता है अशेष बाबू, शादी खानदान और नौकरी से... जो मैं आपसे कभी करनेवाली नहीं।

अपने विषय में पूछे गए प्रश्नों को भी वह बड़ी चतुराई से टाल जाती थी। एकबार कहा था, अचानक थमककर - अपने घावों को कुरेदने का हौसला हर समय नहीं होता। थोड़ा समय दो...

मैंने इंतजार करना ही उचित समझा था। दामिनी जैसी व्यक्तित्वमयी स्त्री के साथ कुछ भी जबर्दस्ती नहीं किया जा सकता, इतना तो अबतक मैं समझ ही सकता था। कोई गलत हरकत करके उसे खो दूँ, ऐसा मैं कभी नहीं चाहता था, बहुत कीमती थी वह मेरे लिए...

एकदिन उसने मुझसे पूछा था, अच्छा अशेष, एक बात कहो तो, दुनिया की आधी आबादी को नकारकर तुम पुरुष इसे मुकम्मल किस तरह बनाना चाहते हो? जबतक औरत को इसका हिस्सा नहीं बनाओगे, ये दुनिया खूबसूरत कैसे होगी... उसकी बातों से मुझे लगा था, उस बर्फ के गोरे जंगल में कहीं आग की एक गहरी, सुर्ख नदी है। मैने एक कमजोर-सी बहस की थी, ऐसा क्योंकर सोचती हो, इस देश में स्त्रियाँ पूजी जाती हैं - सीता, द्रोपदी...

इनका नाम न लो! इन देवियों से हमें बस आँसुओं की विरासत मिली है। तुम मैत्रेयी, घोषा, जाबाला, गार्गी जैसी स्त्रियों की बात क्यों नहीं करते, जो फूल, पत्थर और अंगार से बनी थीं। मैं चुप हो गया था। वह हँसी थी - औरतें नरक की द्वार होती हैं, मगर इसी नरक के द्वार से सारे संत, पैगंबर और अवतार का आर्विभाव इस दुनिया में होता है। वह शैतान की बेटी है, मगर पैगंबर की माँ भी है, यह बताना लोग क्यों भूल जाते हैं? सच अशेष, जिन औरतों की तुमलोग बातें करते हो, वे पैदा नहीं होतीं, बना दी जाती हैं - मेड इन वर्ल्ड... उन लोगों की मानसिकता सोचो जो कहते हैं स्वतंत्र सिर्फ वेश्याएँ हो सकती हैं। इनसान की सबसे बड़ी रूहानी जरूरत को कैसा गलीज इल्जाम दे दिया...

मैं अपनी नीरवता की एकमात्र पूँजी सहेजे उसके चेहरे पर घुले केसर को देखता रहा था। अपने आवेश के क्षणों में वह अद्भुत दिखती थी। उसे देख, महसूसकर ही खयाल आया था, औरत खालिस जादू होती है। स्वयं को बूँदभर खर्च किए बगैर पुरुष को पूरी तरह आत्मसात कर लेना अपने आप में एक विलक्षण प्रक्रिया है, जो वह हमेशा करती है।

उसने मेरी सोच को एक नई राह दिखाई थी। अबतक मैं हर चीज को उसी रूप में लेने का अभ्यस्त था जिस रूप में वह मेरे सामने आती थी। मैंने सवाल करना नहीं सीखा था, बस जवाब रट लेता था - वह जो मुझे सिखाया जाता था। क्यों, किसलिए जैसे शब्द मेरे शब्दकोश में नहीं थे। मगर दामिनी तो स्वयं एक जीता-जागता प्रश्न थी। जिस बात पर यकीन नहीं करती थी, उसे कभी करती भी नहीं थी। करना है, ये बात अहम नहीं होती उसके लिए, क्यों करना है, इस बात को समझना पहले जरूरी है।

उसकी बातें मुझे अक्सर स्तंभित कर जाती थी। उसे समझने का - रुक-रुककर सही, एक सिलसिला जरूर चल पड़ा था। मैं उसे जितना जान-समझ रहा था, उतना ही अभिभूत होता जा रहा था।

‘पहली रात बिस्तर पर गिरे बूँदभर रक्त के धब्बे को देखकर पुरुष अपना विजय परचम लहराता फिरता है, वही स्त्री चुपचाप उसकी खून की रेखा वंशवृक्ष को सींचने में लगा देती है। युगों की धमनियों में यह खून अनंत काल तक दौड़ता रहेगा... ‘नश्वर स्त्री पुरुष को अमर कर देने में भी सक्षम है,’ अपनी कजलाई आँखों में कौंध भरकर उसने एकदिन कहा था। सुनकर उसकी मसृन त्वचा पर मेरी अबाध्य अँगुलियाँ ठगी-सी रह गईं थीं। क्या कहूँ कि उसकी बातें मुझे अक्सर निर्वाक कर जाती थीं।

अधिकतर संभोगरत होने के बाद जहाँ मैं पूरी तरह चुक जाने की मनःस्थिति में हो आता था, वह ज्वार उतरी नदी की तरह शांत, धीर पड़ी रहती थी। उसकी देह की जमीन लश्कर गुजरी फसल की तरह रौंदी हुई दिखती थी, मगर वह प्रकृति की तरह शांत, संयत रहती थी - बार-बार सँभल जाने की अनंत संभावनाओं के साथ। झंझा क्षण के लिए होती है, परंतु सृष्टि सनातन, यही प्रतीति उसके सानिध्य में होती रहती थी।

एकबार मेरी बाँहों में किसी नदी की तरह सरसराते हुए उसने कहा था - औरत नदी की तरह होती है अशेष, कहीं ठहरती नहीं, मगर अपने किनारों में जीवन को ठहराव देती जाती है। सारी महान सभ्यताओं का इतिहास देख लो, किसी न किसी नदी की देन है। दरअसल नदी जहाँ भी जाती है, जिंदगी वहीं चली आती है।

उस समय मैं उसे अपनी बाँहों में न बाँध पाने की विवशता में विक्षुब्ध हो रहा था। उसे पूरी तरह पाने की, जीने की दुर्दांत इच्छा में मैं प्रायः उसे बिस्तर पर बुरी तरह रौंद डालता था, उसमें गहरे तक उतरकर उसकी सीमा थाह लेना चाहता था। मैं कभी कितना नादान हुआ करता था, क्षितिज की धूमिल रेखा को आकाश की सीमा मान बैठा था!

मैं चाहता था, वह एक विग्रह की तरह मुझे अपने अंदर स्थापित कर ले, मुझे साँस-साँस जीए, अपने रगो-रेश से सींचे और और जन्म दे। एक टिपिकल पुरुष की तरह अधिक से अधिक अपने बीज फैलाने की अपनी आदिम प्रवृत्ति में मैं उसे भी अपने औरस से फलीभूत देखना चाहता था शायद। यही मेरे सनातन दंभ की तुष्टि थी - चरम तुष्टि... उसमें स्खलित होकर मैं उसके अंदर इतना फैलना चाहता था कि फिर वह ‘वह’ न रहे, ‘मैं’ बन जाय।

ओह! मेरा वह विवेकहीन अहंकार... औरत को उसके स्त्रीत्व से बेदखल कर देने की पुरुष की ये सनातन साजिश... मैं कहाँ सफल हो पाया, बल्कि कोई भी कब सफल हो पाया! इस आदिम षड्यंत्र की असफलता प्रकृति की सबसे बड़ी सफलता है, जानता कब से था, मानने का नैतिक बल अब कहीं जाकर जुटा पाया हूँ।

दामिनी के संसर्ग में सोचने लगा हूँ, ये असहाय-सी औरतें दरअसल कितनी सक्षम होती हैं। मर्दों को आकंठ लेती हैं, स्वयं में उतरने देती हैं, फिर विधाता की गढ़ी हुई रचना को अपने साँचे में ढाल उसे दुबारा पैदा कर देती है - उसकी कमियों में अपनी पूर्णता का मिश्रण करके! मर्द उसकी देह की कई इंचें नापकर विजय उत्सव मना लेता है, मगर औरत उसे सोखकर, अणु-अणु जीकर फिर वापस उगल देती है। समंदर की तरह का उसका यह व्यवहार, किसी से कुछ न स्वीकारना, लहरों के हाथों सबकुछ किनारे पर लौटा जाना... उसकी गरिमा है या दंभ, स्वयं विधाता को भी मालूम है क्या...

परिचय के न जाने कितने दिनों बाद उसने मेरे सामने अपने निविड़तम मन की गाँठें खोलनी शुरू की थी - बहुत आहिस्ता-आहिस्ता... जैसे कोई तृषित पशु सतर्क होकर पानी की ओर बढ़ता है - एकबार उसने कहा था, शायद न चाहते हुए भी, किसी संवेदनशील क्षण में -

एक समय था जब मुझे लगने लगा था, मेरे अंदर कोई हँसी या खुशी नहीं बची है। कोई पराग अब मुझे फूल नहीं बना सकता। एकदम ऊसर, बंजर बन गई हूँ... मरु की तरह... जानते हो अशेष, मेरी माँ को मेरी पापा की चुप्पी ने मार डाला था। वे उनसे बोलते नहीं थे। यह दुनिया की क्रूरतम सजा है... आखिर तक वे दीवारों से बोलते-बोलते पागल करार दे दी गई थीं!

मैं महसूस कर सकता था, अपने कहे हुए शब्दों के तासीर से वह अंदर तक लरज रही थी, किसी सूखे, पीले पत्ते की तरह - वे सबसे हँसते-बोलते थे - घर की नौकरानी से, ऑफिस के चपरासी से, पड़ोसियों से, यहाँ तक कि घर के कुत्ते, बिल्ली से भी... मगर माँ को देखते ही उनके चेहरे पर मौन पसर जाता था। वे एकदम से चुप हो जाते थे। ये उनका तरीका था - माँ को सजा देने का! मगर किस बात की, माँ आखिर तक जान नहीं पाई।

इस इमोशनल अत्याचार का कोई हल नहीं था उनके पास। वह शिकायत करती भी तो क्या और किससे।

ऐसे अत्याचार के निशान जिस्म पर नहीं पड़ते। न खून बहता है, न जख्म होता है। इनसान समाप्त हो जाता है बिना किसी प्रत्यक्ष आघात के... आदमी जिंदा रहता है, मगर मर जाता है... मनोविज्ञान में इसे नॉन भरवल एग्रेशन कहा जाता है... वह ठहरकर बोली थी - बहुत बाद में यह बात समझ पाई थी, कॉलेज में मनोविज्ञान पढ़ते हुए...

जानते हो, आदिवासियों के एक समुदाय विशेष में कैसा चलन है? जिस पेड़ को वे गिराना चाहते हैं, उसपर कुल्हाड़ी नहीं चलाते, बल्कि उसे चारों तरफ से घेरकर रोज गाली-गलौज करते हैं, अपशब्द बोलते हैं। कहा जाता है, देखते ही देखते वह हरा-भरा पेड़ सूखकर जमीन पर गिर जाता है... ऐसा ही कुछ हुआ था मेरी माँ के साथ, उन्हें बिना छुए सिर्फ अपनी अवज्ञा और चुप्पी से पापा ने उन्हें मार दिया था।

माँ पहले-पहल समझ नहीं पाती थी। आखिर उनके समर्पण और एकनिष्ठ प्रेम का ये तो जवाब हो नहीं सकता था। पापा का मौन माँ को पागल बना देता था। जैसा कि मैंने कहा, अंत तक वे दीवारों से बात करने लगी थीं। एकबार उन्हें पापा की आवाज में बोलते हुए सुनकर मैं बहुत डर गई थी अशेष। लगा था, माँ सचमुच पागल हो गई है। वह अपना ही नाम लेकर बार-बार पुकार रही थी। मेरे उनके झिंझोड़ने पर वे हँसते हुए बोली थी, तेरे पापा मुझे प्यार से इसी नाम से पुकारा करते थे, शादी से पहले... ऐसा कहते हुए उनकी तरल आँखों की चावनी में अजीब उन्माद था। उस रात मैं सो नहीं पाई थी किसी तरह।

उसदिन दामिनी शुरू से उदास थी। कहा था, आज मेरी माँ का जन्मदिन है। उसके घर पर दो-चार लोग आए हुए थे। उसकी कॉलेज के दिनों की सहेली और उसका पति, पति के दो मित्र। मुझसे मिलवाया था सबको। सिंगापुर में रहनेवाले, अलग मिजाज और कल्चर के। बड़ी आसानी से अपने बीच मुझे स्वीकार लिया था। कोई अवांछित प्रश्न नहीं, कौतूहल नहीं... आधुनिक शब्दावली में ‘कूल गाएज’...

सारा दिन सब समंदर के किनारे ऊधम मचाकर आए थे। अब पार्टी थी - एकदम अनौपचारिक और निजी। पीछे लॉन में चारकोल की खुली आग में मुर्गे और टायगर प्रॉन्स भूने जा रहे थे, नीबू के रस और तंदूरी मसाले के मिश्रण के साथ। हवा में उसी की सुगंध है। नरेन भूनते हुए मूर्ग की सुनहरी देह पर बार-बार पिघले हुए मक्खन का ब्रश फेर रहा है। कोयले की आँच में उसका चेहरा लाल भभूका हो रहा है। शायद नीबू के रस के साथ उसने अबतक बकार्डी के तीन-चार गिलसिया चढ़ा लिए हैं। दोपहर को भी उसने फेनी में लिमका मिलाकर पिया था।

दामिनी की सहेली मीता ने पीना कोलाडा बनाया है, नारियल का दूध, पानी, अनन्नास रस, व्हाइट रम, क्रीम मिलाकर। बकौल उसके पति के, वह दुनिया का सबसे अच्छा कॉकटेल बनाती है। मैंने भी पिया था। वाकई स्वादिष्ट था। काँच के लंबे गिलास में अनन्नास के कटे हुए टुकड़े और चेरी से बाकायदा सजाकर वह पेय सर्व कर रही थी - किसी कुशल विमान परिचारिका की-सी पटुता और और ग्रेस के साथ। पूछने पर दामिनी ने बताया था, वह वास्तव में सिंगापुर एयर लाइंस में बतौर एयर होस्टेस काम कर चुकी है। कुछ दिन पहले ही उसने नौकरी छोड़ी थी। उसे बच्चा होनेवाला था। सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ था। छोटी-सी हॉट पैंट और ब्रा में वह कहीं से भी गर्भवती नहीं दिख रही थी - वह भी पाँच महीने से!

मीता थोड़ी देर के लिए मेरे बगल में आ बैठी थी, शायद दामिनी के ही कहने पर। इधर-उधर की बातें होती रही थीं। उसी ने बताया था, उसकी माँ सिंगापुर की है। बाप भारतीय है, मगर सालों पहले उसके माता-पिता का तलाक हो गया है।

एक समय के बाद मुझे लगा था, वह बहक रही है। अपनी हथेलियों के बीच ड्रिंक के गिलास को गोल-गोल घुमाते हुए तंद्रालस आवाज में बोली थी, जैसे गुनगुना रही हो - मैंने गौर किया है कि यहाँ की औरतें समंदर में साड़ी पहनकर नहाने उतरती है। दैट्स वेरी फनी... आप हिंदुस्तानी लोग देह के संदर्भ में इतने कुंठित क्यों होते हो? इसे कोढ़ या पाप की तरह छिपाते हो...

मुझे उसकी बात नागवार लगी थी। मैंने आवेश में भरकर जबाव दिया था - ये शायद आप न समझ सको, हमारी स्त्रियाँ अपनी देह का सम्मान करती हैं, उन्हें नुमाइश का सामान नहीं समझतीं कि जिस-तिस के सामने उघाड़ती फिरें...

आई सी... सुनकर वह अजब ढंग से मुस्कराई थी - तुम्हारे देश में औरतें अपनी मर्जी से कपड़े नहीं उतारतीं, मगर दूसरों की मर्जी से भरी सभा में उसके कपड़े उतारे जा सकते हैं... नहीं! ...पढ़ा था कहीं। मेरे चेहरे के कठिन होते भाव को देखकर वह कहते हुए ठिठक-सी गई थी। मगर उसकी बात सुनकर मैं भी गहरे असमंजस में पड़ गया था। क्या कहूँ यकायक सोच नहीं पा रहा था। मुझे चुप देखकर उसने झिझकते हुए अपनी बात आगे बढ़ाई थी -

लिबास आराम और सुंदरता के लिए पहना जाता है - अपने को कलात्मक ढंग से छिपाने के लिए और दिखाने के लिए भी। कपड़ा तब गलत हो जाता है जब वह इनसान के लिए कैद या कारावास बन जाता है। पर्दे या हिजाब की शक्ल में कपड़ा खालिस गुनाह हो जाता है। ऊपरवाले ने जिस औरत को बड़ी मेहनत से रचा-गढ़ा है, उसे सात पर्दो से ढाँककर हम उसे ग्लानि में बदल देते हैं। क्या हम अपने सर्जक के इस अनुपम सृजन से इतना शर्मिंदा हैं कि उसे एक पाप की तरह छिपाते फिरते हैं? हम मिट्टी-पत्थर की इस दुनिया को खुली नजर से देख सकते हैं, मगर कुदरत की सबसे हसीन तोहफा औरत को नहीं देख सकते। उसे उम्रभर इस दुनिया की चहल-पहल और मेले से फरार रहना पड़ेगा, उस जुर्म के लिए जो उसने खुद किया नहीं है - अपने होने का जुर्म!

आप सोचिए एकबार, यदि ऊपरवाला औरत को इस दुनिया से छिपाकर ही रखना चाहता तो फिर उसे जल्वागर करता ही क्यों? रख लेता उसे अपनी तरह सूक्ष्म, निराकार करके... जो मिट्टी के बुत मालिक ने खुद रचे हैं, उससे नफरत करनेवाले या उसे जमीन से लापता करनेवाले हम बंदे कौन होते हैं।

उसकी बातें अनोखी थीं, एक नया दृष्टिकोण लिए। मगर मैं अब भी हारने के लिए तैयार नहीं था, इसलिए अपने वक्तव्य के पक्ष में कुछ कहना जरूरी हो गया था, मगर क्या, अब भी सोच नहीं पा रहा था। मेरे चेहरे पर अंदरूनी द्वंद्व की छटपटाहट रिस आई थी शायद, जिसे देखकर उसने एक गहरी साँस ली थी - देवी, गृहलक्ष्मी जैसी उपाधियों से लादकर स्त्रियों के दमन और शोषण का इतिहास इस दुनिया में बहुत पुराना है। उस संस्कृति से औरत को क्या मिलने की उम्मीद की जा सकती है भला, जहाँ उसकी देह पर भी - जो उसका अपना प्रकृति प्रदत्त देश है - उसका अधिकार नहीं। अपनी इच्छा से वह अपने मन के पुरुष का वरण तो नहीं कर सकती, मगर दूसरों की आज्ञा से पाँच-पाँच पतियों को झेलने पर विवश जरूर हो जाती है। एक बात कहूँ, यहाँ धर्म की परिभाषा क्या है? एक असहाय स्त्री को जुए के दाँव पर लगा देना? एक औरत का दूसरी औरत को पाँच पुरुषों में बाँट देना? नमक का कर्ज चुकाने के लिए या बचन निभाने के लिए भीष्म जैसे किसी महावीर पुरुष का चुपचाप बैठकर एक अबला का चरम अपमान देखना...

आई फील लॉस्ट वेन आई थिंक...

अचानक मुझे लगा था, उसने हमारे पूरे अतीत को कठघरे में खड़ा कर दिया है। इस अतीत की विरासत लिए मैं वर्तमान में खड़ा-खड़ा स्वयं को किसी पुराने गुनाह का जिम्मेदार महसूस करने लगा था। इस अप्रिय प्रसंग को बदलने की गरज से मैंने पूछा था - आप यहाँ के विषय में लगता है, बहुत कुछ जानती हैं!

जी, मगर बहुत नहीं, थोड़ा बहुत। पहले पाँच वर्ष भारत में बिता चुकी हूँ। पहले हृषिकेश में दो साल थी, फिर बनारस, वृंदावन और अब आपके गोवा में।

अच्छा...! मुझे सुनकर सचमुच आश्चर्य हुआ था - आप इतने दिनों तक क्या करती रही है यहाँ?

पूरब को समझना चाहती थी, पश्चिम से मोहभंग हो गया था... अपने गिलास में बचे बीयर को उसने एक लंबे घूँट में समाप्त कर दिया था। मैंने फिर गौर किया था, अब उसकी पुतलियों का रंग बीयर की तरह हल्का भूरा हो आया था। कैसे मौसम और मिजाज के साथ क्षण-क्षण रंग बदलती थी उसकी आँखें... और त्वचा भी - उसकी मधु होती रंगत को देखकर मुझे खयाल आया था।

तेज हवा में अपने रूखे, चमकीले बालों को सहेजते हुए अचानक उसने पूछा था - आपकी शादी हो गई है? यहाँ तो शादी यूनिवर्सल यानी अनिवार्य होती है।

हाँ, मगर अब टूट भी रही है - थैंक्स टु योर वेस्टर्न कल्चर! मैं बीयर के हल्के सुरूर में अब कुछ ज्यादा ही तल्ख होने लगा था शायद। पता नहीं, यह आरोप किसपर थोप रहा था और क्यों।

उसकी आँखों में न जाने क्यों यह सुनते ही गहरी चमक भर आई थी। होंठों ही होंठों में मुस्कराते हुए कहा था - हाँ, आपके समाज में बढ़ते हुए तलाक की घटनाओं का ठीकरा पश्चिम के सर पर जरूर फोड़ा जा सकता है, मगर ये किसी फैशन की अंधी नकल नहीं, बल्कि वहाँ से आई चेतना की नई लहर का परिणाम है। यहाँ रिश्ता हमेशा से एक तरफा होता था - स्त्री की तरफ से। इसलिए निभ जाता था। जीवन और परिवार से मिली हर तकलीफ को औरत अपनी नियति मानकर सह लेती थी। मगर अब औरत समझ रही है, उसका भी जीवन और उसकी तमाम खुशियों पर उतना ही हक है जितना किसी और का। रिश्ते के नाम पर आजीवन एक बंधुआ मजदूर बनकर जीना अब उसे मंजूर नहीं। वह जीवन से अपना हिस्सा माँग रही है। उथल-पुथल तो मचेगी ही। इसलिए आपलोगों के समाज का यह सुदृढ़ किले जैसा ढाँचा चरमराने लगा है। अपनी गलतियों की जिम्मेदारी लेना आपलोग अब सीख लीजिए...

अचानक उसकी बातों से मेरे तन-बदन में जैसे आग लग गई थी। अंदर का कोई घाव दगदगा आया था। चोट पहुँचाने की एक हिंस्र इच्छा से भरकर मैंने कहा था - आप बहुत गलत ढंग से चीजों को देख-समझ रही हैं। पश्चिम की रंगीन ऐनक से आप पूरब की सात्विक संस्कृति को समझ नहीं पाएँगी। मेरे लहजे की धार से उसने यकायक मुझे देखा था - आप मेरी बातों का बुरा न मानें। आप के सामने अपने विचार रख रही हूँ। आप पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं... जी बिल्कुल! मैंने स्वयं को संयमित किया था। ‘देखिए आप की सभ्यता में स्त्री को बहुत बड़ी-बड़ी उपाधियों से विभूषित किया गया है, मगर जब यथार्थ को देखती हूँ तो मन में सवाल उठते हैं।।

‘आपके कनफ्यूजन को समझ सकता हूँ, मगर आप को समझना पड़ेगा, यहाँ की औरतें अलग ही मिट्टी की बनी होती हैं। उनकी सोच, प्रकृति और चरित्र बिल्कुल अलग होती है। हमारी औरतें त्याग, प्रेम तथा सहनशीलता की प्रतिमूति होती हैं। एक तरह से उन्हीं के बल पर हमारे देश और समाज का पूरा ढाँचा बँधा और खड़ा हुआ है। इसलिए तो वे यहाँ पूजनीय हैं। ऐसे ही नहीं कहा गया है कि ‘नारी, तुम सिर्फ श्रद्धा हो।’

कहते हुए मैं शायद कुछ ज्यादा ही भावुक हो उठा था। मगर मेरी बात सुनकर उसके चेहरे पर व्यंग्य की तीखी रेखाएँ खिंच गई थीं। मुझे एकबार फिर गुस्सा आने लगा था। मेरी हर बात पर वह तंज से मुस्कराती है! मुझे गंभीर होते देख अब वह भी गंभीर हो गई थी - आपलोगों की संस्कृति में आप लोगों ने स्त्रियों के लिए तरह-तरह के मिथों का निर्माण करके उन्हें उस इमेज के अनुसार जीने के लिए बाध्य कर दिया है। जो औरत उस इमेज की लक्ष्मण रेखा के अंदर जीए वह देवी, वर्ना छिनाल! अपनी आस्था, प्रकृति और मर्जी के अनुरूप जीनेवालों को कैसा सुंदर और सार्थक नाम दिया है आपलोगों ने। अन्याय सहकर चुप रहनेवाली और आँसू बहानेवाली सीता और द्रौपदी जैसी नारियों को आपलोगों ने अपनी औरतों का आदर्श बना दिया, मैत्रेयी, पुष्पा, घोषा, जाबाला जैसी औरतों को नहीं, जो मोम थीं तो पत्थर भी, बोलते हुए उसकी स्लेटी आँखों में कौंध भर आई थी। मुझे लगा, यह दामिनी के ही शब्द हैं - आज की औरत - बहुत जागरूक और आत्मविश्वास से लबरेज!

न चाहते हुए भी उसकी बातों ने मुझे सोचने पर विवश कर दिया था। क्या उसकी बातें अनर्गल थीं। वह अब भी आवेश में भरकर बोले जा रही थी - देखिए आपके धर्म और समाज ने औरतों को बहुत ऊँचा स्थान दिया है, मगर सिर्फ बातों में, व्यवहार में नहीं। जो स्त्रियाँ वेदों की ऋचाओं तक का निर्माण कर सकती है उसे कभी नरक का द्वार तो कभी ‘ताड़न की अधिकारी समझा गया? औरत को सिर्फ योनि मान लेना अपनी माँ को गाली देना है... सच, बहुत विसंगति है यहाँ की संस्कृति में। जो देवी है, वही बाँदी है...

मैं निर्वाक था। क्या कह सकता था। उसकी बातें नंगी और तीखी थी, मगर एकदम सच भी। यह एक विदेशी स्त्री का हमारी संस्कृति के प्रति व्यंग्य या कटाक्ष नहीं था, मैं समझ सकता था, बल्कि एक औरत होने की हैसियत से अपने ही दुख और प्रतिरोध वह पूरी संजीदगी से दर्ज करा रही थी।

उसकी बातें अभी खत्म नहीं हुई थीं, कह रही थी - जानते हैं, आज एक और कटु अनुभव हुआ। समुद्र तट पर एक व्यक्ति से परिचय हुआ तो थोड़ी देर में वह बदतमीजी पर उतर आया। मैं उस समय अकेली थी। साथ के लोग दूर पानी में नहा रहे थे। सोचा होगा कि स्वच्छंद विचारों की, देहवादी संस्कृति की उपज है,। आसानी से मान जाएगी...

- प्लीज नो... मैंने सख्ती से कहा था, मगर वह उद्दंड हुआ जा रहा था - वाई नॉट?

नो मींस नो... अचानक मेरी आवाज में इस्पात-सा कुछ कठिन घुल आया था। वह अचकचाकर रुक गया था। मैं उठकर खड़ी हो गई थी - आपलोग किसी स्त्री के खुले व्यवहार को इतना गलत तरीके से क्यों लेते हैं? इसे उसकी चरित्रहीनता का द्योतक मान लेते हैं। अपनी कमजोरियों का आरोपण आप दूसरों पर कैसे कर सकते हैं! हर संबंध का अंत इसी बिंदु पर हो यह जरूरी तो नहीं? सेक्स को लेकर इतनी ग्रंथि, इतनी कुंठा क्यों होती है आपलोगों में!

मगर आपलोग फ्री सेक्स को गलत तो नहीं समझते। अब वह डिंफेसिव होने लगा था - ये सब तो आप के कल्चर में खूब होता है, फिर इनकार क्यों?

हम जो करते हैं अपनी मर्जी से करते हैं, किसी दबाव या मजबूरी में नहीं। उन्मुक्त होने का अर्थ पशु होना नहीं है। हमारी भी पसंद-नापसंद और रुचि होती है... उसका नशा धीरे-धीरे काफूर होता जा रहा था। अब वह काफी सजग दिख रही थी। ‘आप पूरब के लोग खूब चरित्र की बातें करते हैं, मगर सिर्फ स्त्रियों के लिए... ये बहुत बड़ा दोगलापन है। आँकड़े बताते हैं, विश्व में सबसे ज्यादा भारतीय पुरुष ही वेश्यागमन करते हैं, वह भी शादी-शुदा पुरुष...’ तेज-तेज कदमों से चलती हुई मैं होटल की ओर लौटने लगी थी।

- आप ये सब क्यों कह रही हैं, आप पश्चिम की औरतें तो हम पुरुषों से भी ज्यादा आजाद हैं, मैंने भी सुना है, योरोप में हर तीसरा बच्चा नाजायज होता है... न जाने अब वह यह सब कहकर क्या साबित करना चाहता था। उसकी झल्लाहट को समझकर मैं चलते हुए व्यंग्य से मुस्कराई थी - आप को इस बात का ऐतराज नहीं है कि पश्चिम की औरतें इतना स्वच्छंद जीवन बिताती है। आपको इस बात का रश्क है कि पश्चिम में औरतों की देह उसके अपने अधिकार में है और वह सिर्फ अपनी मर्जी से अपना शरीर किसी को सौंपती है और उसका सुख लेती है। आपलोगों का सामंतवादी अहंकार इतना विकट है कि आपलोग स्त्री को भोगना भी अपनी इच्छा से चाहते हैं, उसकी मर्जी या रजामंदी से नहीं। हर जगह आपको अपना वर्चस्व चाहिए - बिस्तर में भी! प्रेम - तथाकथित प्रेम - में भी आधिपत्य की लड़ाई... अहम की अति है ये...

सुनकर मैं शर्मिंदा हो गया था। क्या कहता? एक समय के बाद दामिनी ने ही मुझे बचाया था। मुझे वहाँ से बुला ले गई थी। पीछे मीता जमीन पर लेटकर गाने लगी थी - ओसन ऑफ फैंटसी...

अपना-अपना गिलास लेकर हम कमरे में चले आए थे। दामिनी हल्का चिल करके व्हाइट वाइन पी रही थी। शायद यह उस व्हाइट वाइन का ही असर था कि दामिनी अपनी माँ की बातें करते हुए अनायास इस तरह से भावुक हो उठी थी उसदिन...

अँधेरे में देखे बगैर मैं जानता था, वह रो रही थी, उतना ही धीरे जितना संभव हो सकता था। मेरे उठने का उपक्राम करते ही हाथ बढ़ाकर उसने रोक लिया था - रोशनी मत करना अशेष, यही ठीक है। सोफे पर पड़ा-पड़ा मैं अँधेरे में ही उसे देखने की एक असफल-सी कोशिश करता रहा था। खिड़की पर उड़ते साँझ के रंग न जाने कब पुँछ गए थे। अब वहाँ अंधकार के तरल घोंसले पड़ चुके थे। पिछवाड़े के फूलते चंपा पर कोई रात का पक्षी रह-रहकर बोल रहा था। हवा में माधवी के फूलों की कड़वी-मीठी गंध थी। मैं डूबने-सा लगा था। अंदर उदासी की कोई गहरी नीली नदी बह निकली थी। मैं शायद दामिनी की मनःस्थिति में हो आया था।

अक्सर ऐसा हो जाता था - मैं दामिनी के साथ देह के ही नहीं, भाव के स्तर पर भी एकमेव, एकसार हो जाया करता था। कभी-कभी प्रतीत होता था, मैं उसकी देह की ढूँढ़ में उससे भी आगे चला जा रहा हूँ। ये खयाल मुझे सहमाता था। मैं असुरक्षा की भावना से घिर जाता था। अपनी इस मनःस्थिति को मैंने कभी गंभीरता से लेने का प्रयास भी नहीं किया था। मगर ये अंदर ही अंदर हरदम बना जरूर रहता था।

दामिनी की परछाई धीरे-धीरे हिल रही थी, खिड़की के उड़ते पर्दे की तरह -

पापा माँ की बातों का जबाव देना तो दूर, उन्हें सुनने का मर्यादाबोध तक नहीं देते थे। उनकी गहरी उपेक्षा ने माँ के आत्मविश्वास को खत्म कर दिया। वह एकदम असहाय, निर्बल हो गईं। हीन भावना से ग्रस्त। ठुकराई हुई, परित्यक्त... दामिनी उठ खड़ी हुई थी, अँधेरा हिला-डुला था, उसमें भँवर-से पड़े थे। मैं मौन ही रहा था। यही, इसी तरह इस समय उसके साथ होना था।

वह बोलती रही थी - और आखिर एकदिन वही हुआ जो होना था - पापा की चुप्पी ने धीमे जहर की तरह माँ की जान ले ली! वे अपनी निसंगता के कारावास में रातदिन घुटती हुई पापा के मुँह से अपनेपन के दो अदद बोल सुनने के लिए तरस-तरसकर मर गईं...

अपनी बात के अंतिम सिरे तक पहुँचते हुए दामिनी की आवाज पानी होने लगी थी। वह पिघल रही थी, आवाज से देह तक... मैं उसके बहाव में शामिल था, बिल्कुल चुपचाप। अंधकार में पिघले मोम की तरह उसके स्वर की तरलता फैल रही थी - ऊष्ण, आँच देती हुई, रुक-रुककर, मगर निरंतर... मैं जज्ब हो रहा था - सारा का सारा -

'उस दिन शायद पहली बार माँ के न बोलने ने पापा को चौंकाया था। उन्होंने बढ़कर उनका ठंडा पड़ा हाथ छुआ था। पुकारा था - रूप! ...कई बार, बिना रुके - रूपऽ... रूपऽऽ। माँ की पथराई हुई आँखों में अनकहे शब्दों का नीरव जमघट था, मगर स्वर नहीं। वह अपनी सारी कही-अनकही समेटकर चुप्पी के मूक संसार में खो गई थी - इस बार हमेशा के लिए... वह निर्वाक प्रश्न बनी पापा को देखती-सी पड़ी थीं।

उसदिन अचानक माँ के हिस्से का सन्नाटा पापा को मिल गया था। वे बुरी तरह घिर गए थे। और दहल भी। किसी गूँगे के अंदर का मूक हाहाकार उनमें फट पड़ा था। वे खूब रोए थे। अब कोई नहीं था, जिसे पीड़ा पहुँचाकर उन्हें सुख मिलता - अपना परवर्टेड सुख!'

दामिनी की आवाज में अजीब धार आ गई थी, जैसे वह शब्दों के टुकड़े कर रही हो, एक ठंडी घृणा और वितृष्णा से -

'पापा का साम्राज्य छिन गया था, सत्ता चली गई थी। माँ ने हारकर उन्हें सिरे से हरा दिया था। ये हार उनसे बर्दाश्त नहीं हो पा रही थी। यही तो एक जगह थी जहाँ आकर उनके अहम को तुष्टि मिलती थी। सारी दुनिया का गरल यहीं तो उलीचा जा सकता था। अपने जीवन में वे एक असफल व्यक्ति रह चुके थे - हर अर्थ में, हर संदर्भ में। अब जो माँ नहीं थीं, पापा का कुछ नहीं था, कहीं भी, कोई भी। वे एकदम से कंगाल हो गए थे।

अचानक दामिनी की आवाज सहज हो आई थी। वह स्वयं को समेटने का प्रयत्न कर रही थी। कुछ देर बाद उसने ठहरे लहजे में कहा था - जहाँ से माँ के सन्नाटे का दौर समाप्त हुआ था, पापा का वहीं से शुरू हुआ था। वे दुनिया को क्या, स्वयं को भी भूल गए थे। उनकी आवाज खो गई थी, बोल भी नहीं पाते थे। माँ की तरह दीवारों से बोलने का सुख भी उन्हें नहीं मिला था। उनको अंततः अल्जाइमर हो गया था - भूलने की बीमारी...

कमरे का माहौल बोझिल हो आया था। अनायास, जैसे प्रसंग बदलने के लिए दामिनी उठकर फ्रिज तक गई थी। फ्रिज के अंदर से आती हुई रोशनी की पृष्ठभूमि में उसका पूरा आकार स्पष्ट होकर उभर आया था। मैंने शायद पहली बार गौर किया था, उसकी बाँहें दुबली और कंधे चौड़े हैं। नीचे - पतली कमर से नीचे - उसके कूल्हे भारी और सुडौल थे। यकायक मेरे अंदर आँच की एक सुनहरी नदी-सी फूट आई थी। अपना बीयर का गिलास मेज पर रखकर मैं उठकर पीछे की तरफ से उससे लिपट गया था। मेरे इस तरह अचानक लिपटने से वह चौंक गई थी। उसके हाथ से चेरी का दोना जो उसने अभी-अभी फ्रिज से निकाला था, छूटकर नीचे गिर गया था। वह उन्हें सहेजने के लिए नीचे झुकना चाह रही थी, मगर मैं उसे बिस्तर पर खींच लाया था।

वह हल्के से कसमसाई थी- अशेष...! दूसरे कमरे में गार्गी ने अचानक किसी बात पर जोरदार ठहाका लगाया था। साथ में लायलन रिची का स्वर गूँजा था - सांद्र और हल्की - साँझ की हल्की गर्म हवा में उदास चाहना और कशिश से थरथराती हुई - हलो! इज इट मी यू आर लुकिंग फॉर...।

दामिनी एकबार फिर कसमसाई थी - अशेष, अभी नहीं, घर में इतने सारे लोग हैं...

- कोई नहीं आएगा, सब अपने में खोए हैं... सच, इस तरह से यह ज्यादा एक्साइटिंग होगा... मैंने बेसब्र होकर उसका आँचल खींच लिया था। तरल अंधकार में उसका शरीर किसी कांस्य प्रतिमा की तरह चमक उठा था। मुझमें अब ज्यादा धैर्य नहीं रह गया था। बंधन से मुक्त होते ही उसकी देह की नर्म रेखाएँ सिहरकर कठिन हो आई थीं। अँधेरे में वे हल्के आब से चमकते दो सुडौल मोती की तरह दिख रहे थे। उत्तेजना से थरथराता हुआ मैं उसकी देह की गर्म नदी में उतर गया था... वह भी अब स्वयं को अधिक रोक नहीं पाई थी। हम दोनों के जिस्म की कैफियत उस क्षण एक-सी ही थी... आसपास लोग चल-फिर रहे थे, हँस-बोल रहे थे। कटलरी की ठुनक, काँटे, चम्मच की अनवरत आवाज, संगीत... एकबार मीता कमरे में आकर दरवाजे के पास पड़ी कुर्सी से टटोलकर अपना पर्स भी उठा ले गई थी। मैंने अपनी हथेली से दामिनी के होंठों से बेतरह निकलती सिसकियों को बेरहमी से दबाया था। मगर मेरी साँसें उससे भी तेज होकर सुनाई पड़ रहीं थीं। लेश के उड़ते हुए पर्दे से दूसरे कमरे की रोशनी आकर सीधे दामिनी के अनावृत शरीर पर पड़ रही थी। सुनहरे आलोक में नर्म उठानों की गुलाबी नोंक बँधी कलियों-सी झिलमिला रही थी। ये उभरती आवाजें, कोलाहल... आसपास इतने सारे लोगों का होना और उन सब के बीच बिना दरवाजा बंद किए एक तरह से खुलेआम हम दोनों का एकसार होना मुझे खासा रोमांचकरी लग रहा था। थोड़ी देर के प्रतिरोध के बाद दामिनी ने स्वयं को ढीला छोड़ दिया था।

फीके-से जामुनी अंधकार में उसके होंठों को चूमते हुए मैंने उनपर फैले आँसुओं के गीलेपन और नमक को महसूस किया था। वह निःशब्द रो रही थी। न जाने क्यों उसके आँसुओं से भीगे नमकीन होंठों के स्वाद ने मुझे और भी उत्तेजित कर दिया था। मैं ज्यादा आक्रामक हो उठा था। मेरे प्रहार तेज हो गए थे। साथ में दामिनी की सिसकियाँ भी...

आगे चलकर एकदिन दामिनी ने ही बताया था, उसके पापा की एक अजीब आदत थी। वे माँ से नहीं के बराबर बोलते थे। माँ जब कभी इस बात की शिकायत करते हुए रो पड़ती थीं, वे यकायक उत्तेजित हो उठते थे और माँ को बिस्तर पर उठा ले जाते थे। उन्हें माँ के आँसू एक्साइट कर देते थे। वे अक्सर कहते थे, मधु, रोते हुए तुम्हारी आँखें इतनी खूबसूरत लगती हैं... कई बार तो इसीलिए मैं जानबुझकर तुम्हें रुला देता हूँ। माँ ने अपनी डायरी में लिखा था - न जाने क्यों उन्हें पापा की ये बात सुनकर अच्छा लगा था।

सुनकर मैंने उसके बाल आहिस्ता से खींच लिए थे - चलो, फिर अब मैं तुम्हें रुलाता हूँ... वह सचमुच रोने लगी थी और मैं उत्तेजित हो उठा था! उसदिन हमने दोपहर का खाना भी नहीं खाया था। न जाने कब दिन रात में ढल गया था। दामिनी इस दौरान निरंतर रोती रही थी। मैंने उसे चुप होने नहीं दिया था। इसके बाद कई दिनों तक वह खुश रही थी और हल्की भी - किसी बरसे हुए बादल की तरह... ऐसे में मुझे उसे देखकर खयाल आया था, क्या वास्तव में 'वुमन लाइक ब्रूटस्'...?

एकबार दफ्तर में पार्टी के दौरान हमारा सहकर्मी हेमंत कुलकर्णी औरतों के विषय में अपने ज्ञान का प्रदर्शन करते हुए बोल रहा था - बालों से पकड़कर औरतों को घसीटो, वे बाध्य रहेगीं...

कौन-सी बात सही थी! दामिनी कहती थी - माँ की कोमलता से रची गई हूँ, इतनी मजबूत तो हूँ ही कि अपने आँसुओं का तटबंध बन सकूँ... मुझे याद है, न जाने किन स्मृतियों में भटककर उसदिन वह रोई थी और फिर अपनी दुर्बलता पर शर्मिंदा हो उठी थी। हँसते हुए अपनी आँखों की नमी को टाला था। ऊपर की तरफ देखते हुए पलकें झपकाती रही थी।

उसकी दुर्बलता के इन क्षणों को मैं अदेखा कर जाता था। जानता था, उसे अपना इस तरह पकड़े जाना पसंद नहीं। हम दोनों शाम की चाय पी रहे थे। उसदिन मैं दफ्तर से सीधे उसके कॉटेज पर पहुँचा था। उसी ने बुलाया था। कह रही थी, अच्छा नहीं लग रहा, बस तुम चले आओ...

चाय का कप मेज पर रखकर वह बॉल्कनी में उठ गई थी। खिड़की पर झुका मौलसिरी का पेड़ फूलों की हल्की, रंगीन मुस्कराहट से भरा हुआ था। हवा पर रह-रहकर झूलती हुई उसकी डाले काँच पर दस्तक-सी देती हुई दुहरी हो रही थीं। आज आकाश का रंग फीका नीला था। वह उसी की तरफ देखती देर तक खड़ी रही थी। और फिर मेरी तरफ मुड़ी थी, अपनी आँखों में वही बचपन और कौतूहल लेकर - अच्छा अशेष, आज हवा में ये कैसी गंध है?... देह का रगो-रेश भीगा जा रहा है। जैसे अंतर में डूब रही हूँ...

मैं मुस्कराकर रह गया था। क्या कहता कि ये तुम हो - इस गंध का उत्स... बिचारी कस्तूरी मृग - अपने ही ऐश्वर्य के तिलिस्म से छली हुई। एक साकार पहेली बनकर वह मेरे सामने खड़ी थी और इतने पास होकर मैं उसकी दुरूह गिरहें सुलझा नहीं पा रहा था। कौन-सी बात इस औरत को छूती है, क्या है जो इसे उदास कर देती है या बहुत-बहुत खुश...

कहते हैं, यदि जानना है कि 'व्हाट टिक्स ए वुमन', उसे बिस्तर पर ले जाओ। बहुत गलत है। एक औरत बिस्तर पर कभी पूरी होती ही कहाँ है! वह तो आधी अपनी रूह में, आधी अपनी मुहब्बत में होती है। बिस्तर पर उसके वजूद का बचा-खुचा हिस्सा ही मिल पाता है, खासकर उनके लिए जो देह की मिट्टी कुरेदने में लगे रहते हैं - उसकी अंदरूनी जरूरत और खूबसूरती से बेखबर... बकौल दामिनी के - ब्लडी स्केभंजर... 'जूठे पत्तल चाटकर पुरुष महाभोज के गफलत में तृप्ति की डकारें लेता रहता है।'

- कभी दामिनी ने ही किस गहरी वितृष्णा से भरकर ये बात कही थी। सुनकर मेरे अंदर का कोई गोपन हिस्सा शून्य हो आया था।

कभी-कभी मुझे शक होता था, दामिनी को पुरुषों से घृणा है। इसके पीछे उसके मन की कोई अनसुलझी ग्रंथि होगी, जिसकी जड़ें शायद उसके बचपन की नर्म जमीन पर गहरे उतरी हुई हैं। अब दामिनी ने स्वयं को मेरे सामने आहिस्ता-आहिस्ता ही सही, खोलना शुरू कर दिया है। उसकी बातों से प्रतीत होता है, उसके अंदर कोई पुराना घाव है जो समय के साथ पुर नहीं पाया है, बल्कि नासूर बन गया है। वह बड़े यत्न से उसे छिपाने की कोशिश करती है, मगर गाहे-बगाहे वह दिख ही जाता हैं। तब महसूस होता है, ये खूबसूरत इमारत वास्तव में एक मकबरा ही है - ताज महल की तरह! ...अपने अंदर मौत की अनंत चुप्पी और नींद समेटे हुए चाँदनी रातों में जागने के लिए युगों से अभिशप्त...

ऐसे मौकों पर कितनी खूबसूरत लगती है सगंमरमर में गुँथी हुई प्रेम की ये उजली कहानी... मगर इस बेपनाह हुस्न के होने की रूहानी विडंबनाओं को कोई समझता भी है! दामिनी की स्थिति भी कुछ-कुछ ऐसी ही थी - एक खूबसूरत जिस्म, एक उदास रूह... अब उसके लिए मेरे लगाव में हमदर्दी भी आ जुड़ी थी। एक अनाथ बच्चे की तरह उसे अपनेपन और प्यार की जरूरत थी। इसी की तलाश में वह मेरे पास आई थी। मुझे पनाह देना ही था। अपने अनजाने ही न जाने कब मैं उसका आश्रय बन गया था। ये एक जिम्मेदारी थी जिसे मैं पूरी ईमानदारी से निभाना चाहता था। एक तरह से यह एक भरपाई थी मेरे लिए, जो मुझे करनी ही थी, बचपन का कोई उधार, अबतक जो रह गया था।

...वर्षों पहले बरसात की एक रात एक बुरी तरह से भीगा हुआ घायल कबूतर हमारे आँगन में आ गिरा था। तब मैं शायद आठ-दस साल का रहा हूँगा। पिताजी ने उसके पैर में दवाई लगाकर पट्टी बाँध दी थी। मैंने एक टोकरी के नीचे उसे ढँककर बरामदे में रख दिया था। सुबह माँ की आवाज सुनकर शायद मेरी आँख खुल गई थी। बाहर आकर देखा था, फर्श पर चारों तरफ उस कबूतर के नुचे हुए पंख पड़े थे। खून के धब्बों पर बिल्ली के पंजों के छोटे-छोटे निशान - नीचे सीढ़ियों की तरफ जाते हुए... रात बारिश के साथ बहती तेज हवा में कमरे की कोई खिड़की खुल गई होगी...

मैं खड़ा रह गया था - एकदम सन्न! एक असहाय, घायल पक्षी हमारी शरण में आया था, मगर हम उसकी रक्षा नहीं कर पाए थे! इस घटना के बाद न जाने कितनी रातों तक मैं सो नहीं पाया था। अपराधबोध के गहरे दंश ने मेरी नींद उड़ा दिया था। बारिश की तूफानी रातों में मुझे पंखों की बेकल छटपटाहट सुनाई पड़ती थी, नींद में रक्त के धब्बे-से बनते-बिगड़ते रहते थे। ओह! कैसा आतंक होता था उन क्षणों का - सनसनाते हुए नीले बवंडर में घिरे हुए...

इस बार मैं इस पक्षी को मरने नहीं दूँगा... मैंने सोच लिया! इन दिनों मैं प्यार में था, इसलिर जाहिर है, बहुत अच्छा बन गया था, बचपन की तरह... ये जज्बा इनसान के अंदर की अच्छाइयों को ढूँढ़कर जीवित कर देता है, एकबार फिर से, यदि खो गया होता है तो!

दामिनी के शरीर की तरह उसका मन भी सुंदर था। शायद इसलिए कि वह प्यार में थी, बकौल उसके - हमेशा से। कहती थी, स्वयं को मेरे समक्ष ईमानदारी से रखते हुए, किसी गहरे आत्मीय क्षण में - अशेष! मैं प्यार में हूँ और सदा से हूँ, तभी शायद इतनी संवेदनशील और पारदर्शी हूँ कि सारे मौसम मुझसे होकर निर्द्वंद्व गुजर जाते हैं - अपने तमाम मिजाज और तेवर के साथ। मैं आँख मूँदकर फूलों का खिलना और तारों का टूटकर गिरना महसूस कर लेती हूँ, किसी का दुख मेरे लिए पराया दुख नहीं है, न किसी के सुख से ही मैं अनजान, अछूती हूँ। तभी शायद हर खुशी में उदास रहती हूँ और हर उदासी में कोई न कोई खुशी ढूँढ़ लेती हूँ...

दामिनी अपने खयालों की तरह ही खूबसूरत और अनोखी थी - हर अर्थ में! उसकी कौंधती हुई आँखों के नीचे उसकी देह का हर अवयव सुंदर था- किसी चंचल, उत्ताल बहती नदी की तरह! अपने तमाम उतार-चढ़ाव के साथ... उसकी हरी-भरी रगों में जीवन पक्षी की तरह चहचहाता था। नाभि की मादक गहराई कमल पत्ते की तरह जल की ढेर सारी बूँदें अपनेआप में सँभाले रख सकती थी। प्यार का लावण्य उसके चेहरे पर मोतिया आब की तरह टलमलाता था। न जाने क्या था उसके चेहरे में, मगर मेरे लिए सबकुछ- सबकुछ था! कभी उसे तकते हुए मेरी पलकें जम जाती थीं और इसी तरह जैसे सदियाँ बीत जाया करती थीं। मेरा जीना-मरना - जो भी - उन्हीं क्षणों में घटता था।

वह अक्सर कहती थी, तुम्हारे संग बिताया हुआ हर क्षण मैंने अपने अंदर सँजों के रखे हैं। अंतस की दुनिया इन्हीं छोटे-छोटे तिलिस्म से बनी होती हैं। इस दुनिया को कभी मौत नहीं आएगी अशेष! हमारे - हमसब के मर जाने के बाद भी नहीं। कयामत के बाद की जिस मुकम्मल दुनिया की कल्पना की गई है न, ये वही दुनिया है - प्यार के मुकद्दस अहसासों की अमल दुनिया! उसकी बातों को सुनते हुए मै उसे देखता रहता था। वह उन विलक्षण क्षणों में कोई साधारण स्त्री नहीं रह जाती थी - देह के संदर्भ में! खुशबू की पारदर्शी नदी बन जाती थी - अपने जिस्म से परे - भावनाओं के आकुल आवेग में अपने सारे तटबंध तोड़ती हुई, किसी समंदर के आजन्म तलाश में... अहसासों की दुनिया...

दामिनी के सुंदर मन की झलकियाँ मुझे उसके व्यवहार में सहज ही मिल जाया करती थी। जैसे उस दिन आवेग से भरे एक निहायत निजी क्षण में उसने मुझसे अचानक पूछा था - उमा कैसी है अशेष? मैं उसमें डूबा हुआ था। उसी मनःस्थिति में कुछ ताच्छ्लिय से कह गया था - ठीक ही होगी! उसने झट आपत्ति की थी - नहीं, ये ठीक नहीं अशेष - तुम्हारा रवैया... प्यार पर अपना वश नहीं होता, मगर जिम्मेदारी... वह निभानी होती है - हर हाल में! उमा, बच्चे तुम्हारी जिम्मेदारी हैं। मेरे लिए यदि तुम उनकी अवहेलना करने लगे तो मैं स्वयं को दोषी मानने लगूँगी... मैंने अँधेरे में उसका चेहरा देखने का प्रयत्न किया था, उसमें संजीदगी थी - उसके शब्दों की तरह ही...

दामिनी के मेरे जीवन में आने के बाद मुझे गोवा का ये नया जीवन, इसका अनोखा माहौल रास आ गया था। पहले समय रेंगता था, अब उन्हें पंख मिल गए थे - कैसे और कब गुजर जाता था, पता ही नहीं चलता था। मैंने अबतक कोई नया मकान ढूँढ़ने का प्रयत्न भी नहीं किया था। दफ्तर से मुझे कई मकानों की उपलब्धता की सूचना भी दी गई थी, मगर मैंने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो गईं थीं और उमा कुछ दिनों के लिए यहाँ आना चाहती थी। रोज कोई न कोई बहाना करके मैं उसे टाल रहा था। उसकी आवाज में घुली निराशा को महसूस कर मैं दुखी हो जाता था, मगर क्या कर सकता था, मैं भी निहायत मजबूर हो गया था। इस समय अपने परिवार को यहाँ लाकर मैं दामिनी का साथ खोना नहीं चाहता था। उससे एक पल की दूरी भी मुझसे बर्दाश्त नहीं होती थी। जीवन में पहली बार मैंने जाना था, जीना किसे कहते हैं, कैसे जिया जाता है। मैं जीना चाहता था - हर हाल में - सिर्फ दामिनी के साथ...

भीतर हर समय एक द्वंद्व-सा लगा रहता है - सही-गलत का, पाप-पुण्य का, मगर चलती मन की ही है। हर तर्क, बुद्धि, विवेक को ताक पर रखकर मैं इन दिनों जी रहा था, सिर्फ अपनी इच्छाओं के वश में होकर। इच्छा - दामिनी के साथ होने की, उसी में रस-बसकर खो जाने की, एकदम से निःशेष हो जाने की - हमेशा के लिए... अब मेरे जीवन का सबसे बड़ा सत्य बस दामिनी थी, और कुछ नहीं। कई बार मैं उसे दीवानावार कह चुका हूँ - तुम, बस तुम! और कोई नहीं... मेरे उन क्षणों का सच था ये जब उसकी देह के सुख में मैं उभ-चुभ रहा होता था। उसके पार मुझे कुछ और नहीं सूझता था, सारे नाम, रिश्ते, चेहरे एक गहरी धुंध की चादर में खो गए थे, स्मृति के पार चले गए थे। बच गए थे हम - दामिनी और मैं - और कुछ नहीं...

दामिनी ने मुझे जीवन के न जाने कितने अनजाने, अनछुए पहलुओं से रूबरू करवाया था। न जाने कितने रूप ते उसके, कितने चेहरे... हर बार मैं स्तंभित, अभिभूत रह जाता था। सारे रिश्तों का इकट्ठा रूप थी वह - अकेली ही तमाम रिश्तों की एक मुकम्मल दुनिया। कभी माँ की-सी ममत्व से भरी, कभी बहन की तरह शरीर, चंचल और कभी प्रेमिका की तरह रोमानी, हसीन...

उसके साथ मैंने जीवन में पहले कभी न किए गए अनुभव किए थे - कभी वह मुझे तरह-तरह के मसाज देती - हॉट ऑयल मसाज, चिकनी मुलतानी मिट्टी का मसाज, और न जाने क्या-क्या। कभी दफ्तर के काम के बाद बिल्कुल चूर होकर उसकी कॉटेज पहुँचता तो वह मुझे सीधे अपने बाथरूम में खींच ले जाती। वहाँ बाथ टब पहले से तैयार होता - गर्म पानी में समुद्री नमक डला हुआ- हल्की, अनाम सुगंध से वाष्पित। साथ में छोटे-बड़े स्टैंडों में जलती हुई रंगीन, सुगंधित मोम बत्तियाँ, बर्फ में ठंडी होती शैंपेन की बोतल। विभिन्न आकार और रंग के तह किए हुए नर्म, मुलायम टॉवल, फूलों के ताजे गुलदस्ते...

मुझसे कहती थी, अपनी सारी इच्छाएँ बतलाओ, वाइल्ड फैंटेसी भी, मैं उन्हें पूरा करूँगी। मैं जानता था, वह - बल्कि वही - उन्हें पूरा कर सकती थी, कर रही थी... मुझे उसकी काबिलियत पर कोई शक नहीं रह गया था। एकदिन मेरे जिस्म पर बर्फ के टुकड़े फिराते हुए उसने कहा था, अपनी उसी सांद्र आवाज में - हमेशा की तरह उत्तेजक और गहरी - देह की सारी इच्छाएँ पूरी कर लो, वर्ना इसके तिलिस्म से कभी मुक्त नहीं हो पाओगे, भटकते रहोगे जन्म-जन्मांतर तक... इस देह से होकर ही मन का रास्ता जाता है। मन तक पहुँचने के लिए इस से होकर गुजरना ही पड़ेगा।

गुजरना क्यों? मैं तो यहाँ हमेशा के लिए ठहरने को तैयार हूँ... मैंने बर्फ का पिघलता टुकड़ा उसके हाथ से लेकर उसकी खुली बाँह से छुआई थी, मुस्कराते हुए।

यही तो तुम मर्दों की आदत है... रास्ते को अपनी मंजिल मान लेते हो। भूल जाते हो वास्तविक लक्ष्य। उसने आपत्ति की थी, बनावटी गुस्से के साथ।

देह का लक्ष्य देह ही है, और क्या! बर्फ का टुकड़ा उसकी ऊष्ण त्वचा पर अबतक पूरी तरह से पिघल चुका था। मेरी बात पर उसने सिहरते हुए अपना चेहरा दूसरी तरफ फेर लिया था - नहीं, ये लक्ष्य नहीं, सिर्फ साधन है - अपने साध्य तक पहुँचने के लिए...

मेरे लिए ये सब तुम ही हो, तुम चाहे इन्हें जिस नाम से पुकार लो। मैंने उसदिन उसके पाँव गेरू से रंग दिए थे, अपनी गोद में रखकर - ये है मेरी वाइल्ड फैंटेसी! हमेशा से चाहता था, प्रेम करने से पहले अपनी स्त्री के खूबसूरत, उजले पाँव रंग दूँ - इसी तरह... सबसे बड़ा उद्दीपन है ये मेरे लिए! न जाने क्या इंगित पाया था उसने मेरे कहे हुए शब्दों में, सुनकर उसका चेहरा आरक्त हो उठा था।

उत्तेजना के चरम पर पहुँचकर हम एकाएक रिक्त-से हो आए थे। ज्वार उतरी नदी की तरह शांत, शिथिल पड़े रहे थे देर तक। शिराओं में गुँजारते संगीत की हल्की, मद्धिम धुन सुनते हुए... मधु की अलस धार में आकंठ डूबे हुए... सर्जना का क्षण था ये। हमारे अंदर इच्छाओं की रेशम गाँठे सुलझाते हुए, चमकीला, सुंदर आँचल बुनते हुए... एक खूबसूरत पहेली को जिस्म से सुलझाकर हम उसी की मसृन डोर में अब न जाने कब से उलझे पड़े थे।

बहुत देर बाद दामिनी ने कहा था - उसी सांद्र, थकी हुई आवाज में, जैसे किसी स्वप्न में डूबी हो - पाने के किसी बहुत गहरे क्षण में ही सबकुछ खो जाने का अहसास क्यों होता है। संभोग के चरम सुख के ठीक बाद के गहरे अवसाद को तुमने महसूसा ही होगा... सबकुछ स्वादहीन और फीका लगता है - एकदम गलत, अबूझ ग्लानि से भर जाता है मन। लगता है, फिर कभी इस देह की ओर मन प्रवृत्त नहीं होगा। एक वैराग्य की-सी दशा... ऐसा क्यों होता है कि जब खुशियों के अतर से रूह सराबोर हो उठता है, पलकों में नमक का समंदर उतर आता है। एक मन मुस्कराहट के नन्हें, शरीर बुलबुलों से लबरेज हो इंद्रधनुष के हजार रंगों में फूट पड़ना चाहता है तो दूसरा मन दर्द के कगार पर टूटने-टूटने को हो आता है।

दामिनी का चेहरा गहरी सोच और अनुभूति के इस क्षण में कितना अलग-सा दिख रहा है। ठीक जैसे वह उम्र के कई वर्ष एक ही साथ लाँघ गई हो। चेहरे की रेखाएँ भी गहरी हो रही थीं, आँखों के रंग की तरह। अचानक वह मेरी तरफ मुड़ी थी और फिर एक गहरी साँस लेकर सामने की कुर्सी पर बैठ गई थी - शायद तुम भी जानते हो, सुख और परितृप्ति का क्षण ही वास्तव में गहरी पीड़ा और शोक का क्षण होता है... जीवन की कई विडंबनाओं में से यह भी एक है। जब बहुत खुशी मिलती है, रोने को मन करता है। एक बिंदु पर जाकर सुख-दुख का भेद खत्म हो जाता है। दोनों एक-से लगने लगते हैं, एक-सी प्रतीति कराते हैं...

उसका अंदाज फलसफाना हो गया था। वह अपने में खोई-सी बोली थी - कभी सोचती हूँ कि अपने लिए खुशियों का पीछा करना दरअसल दुखों का पीछा करना ही है - सोने के हिरण की तरह...। हम न जाने किस वहम में क्या जीते चले जाते हैं। बहुत दूर निकलकर पता चलता है, कहीं पहुँचे ही नहीं।।

- कभी-कभी कहीं पहुँचना नहीं, सिर्फ चलना अहम होता है... न जाने मैं उसे क्या समझाने की कोशिश कर रहा था - खासकर तब जब साथ में कोई तुम्हारी तरह हसीन शख्सियत हो... मैंने अब उसका हाथ पकड़ लिया था - तुम हमेशा साथ चलो, मैं मंजिल की ख्वाहिश कभी नहीं करूँगा, सच...

वह यकायक शरमा गई थी। मेरे शब्दों का सुख उसे कहीं से छू गया था शायद। न जाने कैसी इच्छा और स्वप्न भरी आँखों से मुझे देखती रही थी - देरतक। इन लम्हों में वक्त ठहर जाता है, अपनी गति और हलचल के साथ। रह जाते हैं हम और हमारी अनुभूतियाँ... एक-दूसरे के लिए आत्यंतिक - गहरी और निविड़!

न जाने क्यों मैं अनायास पूछता हूँ - प्यार करती हो मुझसे? वह रँग जाती है ओर-छोर - अब ये मत पूछो...

क्यों? मैं पीछा नहीं छोड़ना चाहता।

- कितनी बार तो पूछ चुके हो, और मैं बता भी चुकी हूँ।

- बता भी चुकी हो तो फिर से कहो। बार-बार कहो, तुम्हारे मुँह से सुनना अच्छा लगता है...

- मैं तुमसे प्यार करती हूँ!

- नहीं! कहो, मैं तुमसे प्यार करती हूँ अशेष!

- हाँ, मैं तुमसे प्यार करती हूँ असेष...

- एकबार फिर...

- मैं तुमसे प्यार करती हूँ अशेष!

- फिर से...

- चलो हटो... बिस्तर से तकिया उठाकर उसने मुझपर दे मारा था। प्रत्युत्तर में मैंने उसे दबोचकर चूम लिया था। वह भी छूटने के लिए छटपटाने का स्वाँग भरते हुए मुझसे और अधिक लिपट गई थी। थोड़ी देर बाद जब मैंने कहा था, छोडो, साँस घुट रही है, वह शरमाकर मुझसे अलग हो गई थी।

अपनी शर्ट का ऊपरी बटन खोलते हुए मैं ईजी चेयर पर अधलेटा-सा बैठ गया था, सिगरेट की गहरा कश खींचकर हवा में धुएँ के छल्ले बनाते हुए। वह अपने बाल जूड़े में समेटकर मेरे करीब चली आई थी। मैं जानता था, वह सिगरेट छीनने की कोशिश करेगी, इसलिए परे हट गया था। उससे दूर। वह बुरा मानकर बाथरूम में घुस गई थी और देरतक वहीं घुसी रही थी। मुझे सजा देने का यह भी उसका एक तरीका था। मुझे उसकी इस बचकानी-सी हरकत पर हँसी आती रही थी। इतनी मैच्योर है, दुनिया-जहान की बड़ी-बड़ी गंभीर बातें करती रहती है और कभी इतनी बच्ची बन जाती है। सच, कितने और कैसे-कैसे रूप हैं इसके...

बहुत देर बाद वह बाथरूम से निकली थी, बिल्कुल हल्के-फुल्के मूड में, जैसे कुछ हुआ ही न हो। जाहिर है, वह हमेशा की तरह थोड़ी देर पहले की बातें भूल चुकी थी। आते ही अपने भीगे बालों को मुझपर झटकते हुए मेरे करीब बैठ गई थी -

अशेष। मैं यह कभी नहीं भूलूँगी कि तुमने मुझे फिर से ख्वाब देखना सिखाया है। जानते हो, इनसान सही अर्थों में तभी गरीब होता है जब उसके जीवन में प्रेम नहीं होता। मैं यह प्रार्थना करती हूँ कि हमेशा प्रेम में रह सकूँ, प्रेम देने और लेने में सदैव सक्षम रहूँ। आज की दुनिया की यही सबसे बड़ी जरूरत है...

कहते हुए उसकी आँखें दो गहरी काली झील में तब्दील हो चुकी थीं। मैं उसे देखता रह गया था। कितनी अजीब बात थी, अपने इन्हीं छोटे-छोटे मासूम सपनों से वह मेरे अंदर प्रेम के पौधे रोप देती है, पत्थरों पर फूल उगा देती है। उसकी अँगुलियों में ही नहीं, शब्दों में भी जादू है। गहरे परितोष के किसी क्षण में यह सोचना बहुत अजीब लगता है कि कभी हम तृषित भी थे। एक पल की परितृप्ति युगों की प्यास भुला देती है। ये करिश्मा प्यार का ही हो सकता है।

मैंने उसके भीगे बालों में अँगुलियाँ फिराई थीं - अच्छा दामिनी, तुमने इतने सालों का ये अकेला, उदास सफर कैसे तय कर लिया?

- कर लिया...

वह खामखयाली में मुस्कराई थी, जैसे आँखों में कोई बहुत पुराना बिंब हो - कठिन था, मगर तय कर लिया। उस सफर में मेरे पास कुछ नहीं था, मगर एक सपना था... यही बहुत था - होने के लिए...

मैंने उसकी आँखें चूम ली थीं - काँच के फूल जैसी लगती हैं तुम्हारी आँखें... आज इनसे एक सपना चुराना चाहता हूँ... चुरा लूँ? ...तुम्हारी इजाजत से...

- क्या करोगे उस सपने का?

- उन स्याह रातों के लिए बचाकर रखूँगा, जब चाँद का कंगन बदली में खो जाता है, और धूप का आईना भी चटक जाता है...

- ये तुम्हें क्या हो गया! कविता कर रहे हो, वह भी इस समय... उसने शरारत से मुस्कराकर मेरा माथा छुआ था - वैसे बुखार तो नहीं है...

- देख लो, तुमने मेरा क्या हाल किया है... मैंने उसे अपनी बाँहों में लेना चाहा था, मगर वह दूर सरक गई थी - ये नहीं, कुछ बातें करो - अच्छी-अच्छी, जैसे अभी कर रहे थे...

- तुम पास होगी तब न होगी अच्छी-अच्छी बातें... वह मुस्कराकर कमरे में फैली चीजें समेटती रही थी - तो तुम्हें तरक्की मिल रही है... इतने थोड़े से दिनों में इतनी सफलता... तुम्हारे काम की तारीफ हो रही है, सबकी जुबान पर हो, कैसा लग रहा है?

- बहुत अच्छा... खासकर इसलिए कि तुम मेरे लिए प्रार्थना करती हो। सबकी जुबान पर होना और प्रार्थना में होना एक बात नहीं है। मैं क्या चाहता हूँ, जानती हो दामिनी... कि मैं हर खुली आँख की पुतली में न होकर किसी की बंद आँखों के सपनों में रहूँ - उतना ही चुपचाप जितना कि एक ख्वाब या खयाल हो सकता है... सुनते हुए दामिनी की पलकें मुँद-सी आई थीं। मैंने उनपर धीरे से अँगुलियाँ फिराई थी - कुछ इस तरह... उसने अपनी आँखें नहीं खोली थी, सोती-सी आवाज में बोली थी - अब कभी आँखें खोलने के लिए मुझसे मत कहना।,

- क्यों? मैंने कौतुक में पूछा था।

- इनमें तुम हो। अब वह मुस्करा नहीं रही थी, गंभीर हो चुकी थी।

बाहर साँझ का सूरज निस्तेज होते हुए न जाने कब बुझ गया था। इसी बीच राख होते क्षितिज पर एक अकेला तारा उग आया था - उज्जवल और उदास। कमरे के अंदर सबकुछ शनैः-शनैः साये में तब्दील हो रहा था - रात अपना घोंसला हर कोने में डालने की तैयारी कर चुकी थी।

मैंने दामिनी की ओर देखा था। वह एकदम चुप थी, न जाने क्या सोच रही थी। तरल अंधकार में उसकी उजली त्वचा पारे की तरह चमक रही थी। मैंने उसे अनायास बढ़कर छूने की कोशिश की थी, मगर वह फिसल गई थी, एक शरीर मुस्कराहट के साथ- रेशम के मसृन धागों की तरह... मैंने गहरी साँसों में उसकी गंध बटोरी थी - बहुत हल्की- भीनी-भीनी-सी... सीडी पर देवकी पंडित की उदास आवाज तैर रही थी - नहीं रहना यहाँ, ये देश वीराना लगता है...

मैंने दामिनी की ओर देखा था - वह अलस मुस्कराई थी - ये दुनिया कागज की पुड़िया, बूँद पड़े गल जाना है... न जाने उन शब्दों में क्या था, या दामिनी की पिघले सितारे-सी उन आँखों में, मेरे अंदर का कोई कोना एकदम से भीग आया था... प्रेम में होना दुख में होना है... किसी से सुना था कभी, आज उसकी वास्तविकता में जी रहा हूँ...

दामिनी ने अनायास मेरी तरफ करवट बदली थी - तुमने कभी ये अनुभव किया है अशेष, जब कोई अनचाहा व्यक्ति हमारे करीब आता है, हमें छूता है, तब ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे शरीर से कोई छिपकली चिपक गई है! कैसा वितृष्ण कर देनेवाला अनुभव होता है... उसने उबकाई लेने के-से अंदाज में कहा था - उसके इस आकस्मिक प्रसंग परिवर्तन ने मुझे चौंकाया था। न जाने एक क्षण में कहाँ से कहाँ पहुँच जाती थी - एकदम खानाबदोश थी खयालों से... वह कह रही थी बेखबर -

एक दौर था जब मुझे सेक्स से घिन आती थी। कोई छू भी लेता था तो बर्दाश्त नहीं होता था। बात के अंत में आते-आते उसने एक झुरझुरी-सी ली थी।

- कहती हो तुम्हें सेक्स से घृणा हुआ करती थी! उसकी खुली पीठ पर कोई अदृश्य कविता लिखते हुए मेरे स्वर में आश्चर्य का संसार था। इसी स्त्री ने अपनी आंतरिक इच्छाओं की ऊर्जा से मेरे पोर-पोर में एक उम्र के बाद भीषण अलाव सुलगा दिए हैं! कैसे यकीन कर लूँ मैं... वह मेरी तरफ किंचित मुड़ी थी, बस इतना कि मैं शाम की बची हुई आखिरी उजाले में उसकी हल्के-हल्के चमकती हुई कनपटी देख सकूँ - पूरी नहीं, उसका छोटा-सा हिस्सा... गहरे प्रेम में थी वह - वितृष्णा के उस बोझिल क्षण में भी - ये उसकी आँखें कह रही थी। मैं जानता था, शरीर के तंद्रिल सुख और आलस्य से वह अभी तक उबर नहीं पाई थी पूरी तरह।

- तुम्हें आश्चर्य होता है? उसके प्रश्न में कोई जिज्ञासा नहीं थी, वह अब इतना तो जानती थी मुझे।

- सेक्स से घृणा थी क्योंकि किसी से सही अर्थों में प्रेम नहीं था। प्रेम के अभाव में सेक्स पशु के स्तर पर उतर जाता है। उस हद तक जाने की संवेदनहीनता कभी जुटा नहीं पाई। पशु होकर जन्म जरूर लिया है, मगर उसी स्तर तक रह जाना नहीं चाहती थी। मनुष्य के पास विकल्प है, बस इच्छा शक्ति का समन होना चाहिए...

- दैहिकता बहुत आवश्यक है रूह की पराकाष्ठा तक पहुँचने के लिए, मैंने उसके गाल थपथपाए थे - ये हमारी देह ही है जो हमें रूह तक पहुँचाती है... मांसल से सूक्ष्म तक... इसका एकमात्र रास्ता है ये... हवा में तैरती अशरीरी सुगंध का पता जमीन पर खिला हुआ फूल ही देता है। अपने शरीर और उसकी कैफियतों को मिट्टी-पत्थर नहीं, मंदिर की तरह पवित्र मानो - इसमें ही हमारी आत्मा - परमात्मा का अंश - निवास करती है।

मेरी बात सुनते हुए वह मेरे सीने में निविड़ होकर सिमट आई थी -

ठीक! आज समझ सकती हूँ, प्रेम में न होना ही मेरी हर समस्या के उत्स में था। अब प्रेम में हूँ तो सब सही हो गया है... अनायास कितनी उजली हो आई थीं उसके चेहरे की रेखाएँ, जैसे ढेर-से हरसिंगार फूल आए हों... चहक भरी आवाज में कहती रही थी -

सेक्स में हम अपने को बाँटते हैं, शेयर करते हैं स्वयं को पूरी तरह, ईमानदारी से उसके साथ जिसे हम प्रेम करते हैं... उसके साथ एक हो जाना चाहते हैं - हर स्तर पर! यह एक शारीरिक ही नहीं, आत्मिक प्रकिया भी है - योग में लिप्त होने और अर्द्ध नारीश्वर की स्थिति में पहुँचने की...।

एक छोटी-सी चुप्पी के बाद उसने अपना चेहरा उठाकर मुझे देखा था - मैं हमेशा जानती थी, सेक्स एक खूबसूरत अनुभव है - जब यह घटता है, खासकर दो ऐसे व्यक्तियों के बीच जिनमें प्रेम हो तो देह में स्वर्ग रच देता है, समाधि और मोक्ष जैसी किसी विलक्षण स्थिति में मनुष्य को पहुँचा देता है। जानते हो, प्रेम और सेक्स के दुर्लभ जोड़ से जुड़ा हुआ दो शरीर वास्तव में धरती और स्वर्ग के बीच का एकमात्र सेतु है। इसके जरिए हम हमारे अंतिम लक्ष्य - मुक्ति - अपने निर्वाण को प्राप्त हो सकते हैं...

मैं तो मुक्त हो चुका, तुम अपनी कहो... उसके बालों में चेहरा छिपाकर मैं गहरी साँसें ले रहा था - तुम्हारी देह से ये कैसी गंध आती है मृगया... मुझे गश आने लगता है, बैठे-बैठे सो जाता हूँ... वह हँसकर उठ गई थी - कबतक भटकोगे इस मृग-मरीचिका के पीछे प्राणी...

- क्यों, मृग मरीचिका क्यों, अभी तो तुम कह रही थी, देह मुक्ति का पहला सोपान है... मैं तो अपनी मोक्ष की तलाश में निकलता हूँ तुम्हारे इस देह के वन-उपवन में। 'तुम्हारी देहलता के ये बड़े-बड़े गुलाब...' मैंने उसकी बाँहें सहलाई थीं - पसीने से भीगी हुई, मांसल और सुडौल...

- बहुत हुआ... सिहरकर अपनी खुली पीठ पर उसने ताँत की साड़ी का पीला आँचल खींच लिया था।

- ये अच्छा है...

- क्या?

- बिना ब्लाउज की साड़ी... पता है, मैंने देखा है, बंगाल के कई गाँवों में स्त्रियाँ साड़ी के साथ ब्लाउज नहीं पहनतीं, एकदम युवा स्त्री भी! बहुत आकर्षक लगता है - उनका हिलते-डुलते हुए चलना... कई बार खेतों से धान का गट्ठर सर पर उठाकर चलते हुए औरतों के पीछे-पीछे मैं मीलों चलता जाता था उनकी दुलकी चाल के साथ कदम मिलाने की कोशिश करते हुए...

- बचपन से बुरे हो...

- कौन कहता है बचपन से, मैं तो पैदायशी बुरा हूँ...

- जानती हूँ, और अपनी तारीफ करने की जरूरत नहीं। उसने मेरी पीठ पर धौल जमाई थी -

याद रखो, हम अपनी सकारात्मक ऊर्जा को जितना प्रेम में परिवर्तित कर पाएँगे उतना ही सेक्स की आवश्यकता कम होती जाएगी।

किसी साध्वी की तरह अब वह बोल रही थी, मगर मैं अपनी स्मृति में मगन था - क्या कुछ नहीं करता था मैं उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए।

- क्यों, तुम क्यों? तुम तो पुरुष हो... वह बाहर जाते-जाते थम गई थी।

- इसलिए तो, पुरुष को ही अपनी स्त्री का प्रेम प्राप्त करने के लिए तरह-तरह के स्वाँग भरने पड़ते हैं। अपने चारों तरफ देख लो - वसंत ऋतु में कोयल की कूक अपनी मादा को प्रणय का निंमत्रण देने के लिए ही होती है, मोर भी सावन में अपने पंख फैलाकर मोरनी को रिझाने के लिए ही नाचता है। अपनी मादा को लुभाने के लिए नर को सुंदर भी होना पड़ता है, पशुओं में देख लो, मादा की अपेक्षा नर ही ज्यादा सुंदर होते हैं...

- अच्छा, और स्त्री को क्या करना पड़ता है?

- कुछ नहीं, उनका स्त्री होना ही काफी होता है।

- अच्छा...!

- और एक बात...

- क्या?

- हीरा भी अपनी चमक के लिए रोशनी का मोहताज होता है।

- अर्थात...?

- अर्थात तुम्हें - एक स्त्री को - खूबसूरत और मुकम्मल होने के लिए हमारे प्रेम और परस की दरकार है।

- देह की सुंदरता का क्या है - आज मोतिया आब तो कल झड़ता हुआ अबरक... ये अंदर की खूबसूरती होती है जो बाहर तक झलकती है।

दामिनी का चेहरा अपनी सादगी में किसी जोगन का-सा दिखने लगा था।

- हाँ, मगर ये दिखता देह पर ही, किसी शून्य पर नहीं... देह की जमीन पर ही प्यार का ताजमहल खड़ा होता है...

- तुम फिर कविता करने लगे, तुम्हारी बातें किसी कविता का भावानुवाद लगती हैं... दामिनी की आँखों की शरारत उसके होंठों पर मचल आई थी।

- 'जो अनुवाद में खो गया वह कविता ही तो थी...'

- आज आपसे बहुत कुछ सीख रही हूँ मास्टरजी!

- हाँ? कुछ और सीखना चाहोगी?

- क्या? उसने मुझे भौंहें टेढी करके देखा था।

- शक मत करो, जबतक विश्वास नहीं करोगी, ज्ञान अर्जित नहीं कर पाओगी...

- मालूम है... वह कमरे से बाहर निकल गई थी।

मैं हँसते हुए अपनी शर्ट पहनने लगा था। दामिनी को गुस्सा दिलाने में मुझे मजा आता था। गुस्सा होने से उसकी छोटी-सी नाक कैसे लाल पड़ जाती थी!

इस घटना के दूसरे ही दिन मुझे अपने घर जाना पड़ा था। बड़ी बेटी विनीता बीमार पड़ गई थी। डॉक्टर ने टायफायड बतलाया था। जाना पड़ेगा सुनकर दामिनी उदास तो हुई थी, मगर रोका नहीं था। कहा था, एकदम उदास होकर, पहुँचते ही उसे खबर करूँ।

अपने घर पहुँचकर महसूस हुआ था, कहीं और चला आया हूँ, एक अतिथि की तरह। बिल्कुल मन नहीं लग रहा था शुरू-शुरू में। सबसे उखड़ा-उखड़ा फिर रहा था। हालाँकि मैं पूरी कोशिश कर रहा था। दमिनी के फोन बार-बार आ जाते थे। उससे बातें करने के लिए मुझे उठकर बाहर जाना पड़ता। ये सब उमा ने नोटिस किया होगा - मेरा धीमे स्वर में बोलना आदि। कई बार उसने सहज होकर पूछा भी था, किसके फोन बार-बार आते हैं। मैंने टाल दिया था, मगर जानता था, उसे संदेह हो गया है।

सप्ताह भर बाद बेटी की तबीयत सँभल गई तो मैं गोवा लौट आया। उमा ने रोकना चाहा, मगर मैं रुक नहीं सकता था। इधर दामिनी भी परेशान हो रही थी। रोज पूछती थी, मैं कब लौट रहा हूँ। लौटकर स्टेशन से सीधे उसके कॉटेज पहुँचा था। उस समय वह कॉटेज के पीछे नारियल के पत्तों से बने मड़ैया की छाँव में एक ईजी चेयर पर अधलेटी-सी सोई पड़ी थी। सीने पर एक किताब खुली रखी थी। शायद पढ़ते हुए ही आँख लग गई होगी। मैंने उसे जगाया नहीं था। वही बगल में बैठा उसे निहारता रहा था। न जाने कबतक। मड़ैया से छनकर आती हुई धूप की नन्हीं, चंचल तितलियाँ उसके माथे, कंधे पर चमक रही थी। नाक की हल्की लाल नोंक पर पसीने की बूँदें जम आईं थीं।

आँख खुलने पर उसकी नजर मुझपर पड़ी तो वह एकदम से चौंक गई। एक बच्ची की तरह खुश हो गई थी वह। हँसी होंठों, आँखों से बह रही थी जैसे। अपनी कुर्सी से उठकर मेरी गोद में बैठ गई थी, गले में बाँहें लिपटाते हुए - तुम आ गए... अभी तुम्हारा ही सपना देख रही थी।

अच्छा, क्या देख रही थी? मैंने उसे सीने में समेट लिया था, खूब भींचकर... कितनी नर्म थी वो, कपास के फूल की तरह!

देख रही थी कि तुम नहीं आ रहे हो, बहुत रोना आ रहा था मुझे... कहते हुए वास्तव में उसकी आवाज छलछला आई थी। मैंने उसे उठाकर खड़ी कर दिया था - चलो, अंदर चलते हैं...

उसदिन उसका कमरा बुरी तरह बिखरा हुआ था। कई बक्से इधर-उधर खुले पड़े थे, उनके अंदर का सामान फर्श पर... न जाने क्या-क्या - रंगीन फीते, टूटी हुई चूड़ियों के टुकड़े, हाथ-पैर मुड़े हुए गुड्डे-गुड़िए, पुराने, बदरंग कार्ड्स... मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा था यह सब देखकर। वह सफाई देती हुई-सी बोली थी - तुम नहीं थे, जी बहुत घबरा रहा था अकेले में, इसलिए... अब मैंने गौर किया था, उसकी आँखों में टँकी गीली उदासी और खोयापन, जैसे रोती रही हो दिनों तक, सोई न हो ठीक से... मेरे पीछे क्या हुआ, क्या कुछ करती रही वह! मैंने हालात के सूत्र पकड़ने चाहे थे, इसी कोशिश में टटोला था उसे -

क्यों, क्या तुम झोंपड़पट्टी के बच्चों को भी पढ़ाने नहीं गई इन दिनों? तुम्हारा समय वहाँ अच्छा बीत जाता है, तुम्हीं कहती हो... नारी निकेतन के काम का भी क्या हुआ? और ये सब हैं क्या! एक फटी हुई चुनरी उठाकर मैंने दोनों हाथों से पकड़कर खींचा था, जीर्ण कपड़े का टुकड़ा झट् से फट गया था।

ये क्या कर दिया तुमने... ये मेरी मीता की एकमात्र निशानी थी। अब वह इस दुनिया में नहीं... दामिनी अचानक फूट-फूटकर रो पड़ी थी - तुमने मुझसे मेरा बचपन ही छीन लिया अशेष...

आई एम एक्सट्रीमली सॉरी दामिनी... मैं उसके इस अप्रत्याशित व्यवहार से सकपका उठा था। समझ नहीं पा रहा था क्या करूँ या कहूँ। वह अपना मुँह ढाँपे रोती रही थी, देरतक। मुझे पहली बार उसकी यह बचकानी हरकत नागवार लगी थी। आखिर हर बात की एक सीमा होती है! थोड़ी देर बाद मैंने हाथ बढ़ाकर उसे छूना चाहा तो वह एकदम से बिदक गई - आज तुम चले जाओ अशेष, मुझे अकेली छोड़ दो... मैं वहाँ से चला आया था, बहुत खिन्न होकर। कितनी उम्मीद थी उससे मिलने की। रास्ते भर उसी के विषय में सोचते हुए आया था। मेरा मूड सच में बहुत बिगड़ गया था।

कमरे में पहुँचा तो मिसेज लोबो अपने यहाँ बुलाकर ले गई। उसकी बहन की बेटी मुंबई से आई हुई थी। उसी से मिलाने। रेचल नाम था उसका। हॉट पैंट में बैठी बीयर की चुस्कियाँ ले रही थी। मुझसे परिचय हुआ तो उठकर बड़ी गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाया। देखने में आकर्षक, सुंदर नहीं। तीस-पैतीस की उम्र - लंबी, छरहरी, साँवली, गठी हुई टाँगें - आकर्षक पिंडलियाँ... उसने मुझे उसकी खुली हुई टाँगों की तरफ घूरते हुए देख लिया था। हल्के से मुस्कराई थी, प्रश्रय के अंदाज में - चलो अच्छा हुआ, कंपनी मिल गई। अकेली बैठी-बैठी बोर हो रही थी। बीयर...? मेरे हाँ या न कहने से पहले ही उसने गिलास भर दिया था। थोड़ा झिझकते हुए मैंने गिलास पकड़ लिया था - दरअसल इस समय मुझे चाय पीने की आदत है...

कोई बात नहीं, आज बीयर ही सही - फॉर ए चेंज... वह अंग्रेजी में ही बातें कर रही थी, अपने विशिष्ठ गोवानीज अंदाज में - कितनी गर्मी पड़ रही है... थोड़ी ही देर में वह ऐेसे घुलमिल गई थी जैसे हमारा वर्षों का परिचय हो। बाद में पता चला था, वह मुंबई के किसी कॉल सेंटर में काम करती है। एक दस साल की बेटी थी जो पंचगनी में होस्टल में रहकर पढ़ रही थी। उसका डिर्वोस हो चुका था। हर साल गर्मी के मौसम में वह गोवा अपने रिश्तेदारों के यहाँ घूमने जरूर आती थी। उसदिन हम देर रात गए तक बॉल्कनी में बैठे बातें करते रहे थे। फिर साथ मिलकर रात का खाना खाया था। मिसेज लोबो ने चिकन कार्नीयल बनाया था - साथ में पाव और साना-चावल की मीठी, नमकीन रोटियाँ, सिरके से फुगाई हुईं।

अपने कमरे में लौटकर देखा था, मोबाइल में दामिनी के तीस मिस्ड कॉल थे। न जाने मैंने कैसे सुना नहीं था। कमरे में सीडी प्लेयर लगा हुआ था, शायद इसीलिए सुन नहीं पाया था। रेचल के साथ समय का पता ही नहीं चला था। वह बेहद प्रांजल और खुले हुए स्वभाव की स्त्री थी... उस रात बिस्तर में लेटकर सोने का प्रयास करते हुए मुझे उसकी लंबी, खूबसूरत टाँगों का खयाल अनायास आ गया था। उसके बाद मैं देरतक सो नहीं पाया था। दामिनी के खूबसूरत चेहरे के साथ वे लंबी टाँगें रातभर मेरे आसपास चहलकदमी करती रही थीं।

सुबह उठा तो चेहरे पर तेज धूप चमक रही थी। रेचल खिड़की के पर्दे सरकाते हुए मुस्करा रही थी - वेकी-वेकी... सुबह हो गई है मिस्टर अशेष... मैं खुले बदन सो रहा था, उसे इस बेतकल्लुफी से अपने कमरे में खड़ी देखकर संकोच में पड़ गया था। मेरी हालत समझकर उसने शरारत से मुस्कराते हुए मेरी चादर खींच ली थी - अब लड़की लोग का माफिक शरमाने का नहीं मैन, बाथरूम जाकर फ्रेश हो जाओ, हमको ओल्ड गोवा जाने का है...

लेकिन... मैं कहते-कहते रुक गया था। आज शनिवार है, मुझे दामिनी के वहाँ जाना है। ऐसा ही नियम हो चला है। दामिनी लंच आज अपने हाथों से बनाएगी।

लेकिन-वेकिन कुछ नहीं, तुमको चलनाइच माँगता है, बस... मेरे हाथ में तौलिया पकड़ाकर वह बल खाती हुई कमरे से निकल गई थी - ओनली टेन मिनट्स... एक ही दिन के परिचय में कितनी खुल गई थी वह! न चाहते हुए भी मुझे उसके साथ जाना पड़ा था।

उसदिन दक्षिण गोवा में कई चर्च देखे थे। शायद रेचल ने कोई मन्नत माँग रखी थी। आज उसे पूरा करने का दिन था। लाल ईंटों और सफेद रंग में लिपे-पुते चर्चों की विशाल इमारतें - अंदर के हॉल, मुख्य प्रार्थना गृह में कतारबद्ध बेंचें, सलीब में बिंधे हुए यीसू की प्रतिमा, नन्हे यीसू को गोद में लिए मरियम... पूरे वातावरण में एक अजीब किस्म की शांति और निःस्तब्धता थी।

रेचल के साथ बाहर बिकती लंबी मोमबत्तियाँ खरीदकर हमने अंदर जलाई थीं। एक बड़े-से काले स्टैंड पर जली हुई मोमबत्तियों की ढेर लगी थी। यहाँ आनेवाले अधिकतर सैलानी मोम बत्ती जलाते हैं। इसे शुभ माना जाता है। बेंच पर बैठकर मैं रेचल को देखता रहा था। आँखें मूँदें प्रार्थना करते हुए वह कोई और ही प्रतीत हो रही थी। सफेद कपड़ों में किसी ईसाई नन की तरह। चेहरे पर पवित्रता व्याप्त रही थी। न जाने कितनी देरतक वह एक मन से प्रार्थना करती रही थी। कुछ देर बाद मैंने भी अपनी आँखें बंद कर ली थीं। वहाँ के पूरे वातावरण में छाई शांति जैसे मेरे अंदर भी घनीभूत होकर छाने लगी थी। जब हम वहाँ से बाहर निकले तो मैं स्वयं को बहुत शांत महसूस कर रहा था।

बाहर आते ही रेचल अपने पुराने स्वरूप में लौट आई थी - शोख और चंचल। एक पुर्तगाली ढंग से सजे रेस्तराँ में हम दोपहर के खाने के लिए बैठे थे। आज गर्मी कुछ ज्यादा ही थी। रेस्तराँ के वातानुकूलित कमरे में बैठकर राहत मिली थी। डायनिंग रूम में अपेक्षाकृत अँधेरा था। रेचल ने चुनकर एक कोने की मेज ली थी। उसके सामीप्य को महसूस करते हुए मैं रेस्तराँ की सजावट को देखता रहा रहा था। किसी जहाज का-सा माहौल वहाँ रचा गया था। रिशेप्शन के चारों ओर टायर लटके हुए थे। वेटर भी किसी जहाज के कर्मचारी की तरह वर्दी पहने हुए थे। एक ने तो समुद्री डाकू की तरह बाकायदा अपनी एक आँख में पट्टी भी बाँध रखी थी मुझे यह सब बहुत रोचक लग रहा था।

मगर रेचल का ध्यान मुझपर ही लगा हुआ था। मुझसे बहुत सटकर बैठी थी वह। उसकी देह से किसी सेंट की बहुत तीखी गंध उठ रही थी। कई बार बस में सफर करते हुए मुझे ऐसे ही सेंट की गंध मिला करती थी। मुझे लगा था दुबई से लौटनेवाले बहुत से लोग इसी ब्रांड का सेंट इस्तेमाल किया करते हैं। पसीने के साथ मिलकर इसकी गंध अजीब हो उठती है। कई बार मुझे मतली-सी आने लगती थी।

क्या सोच रहे हो मैन? वेटर ने हमारे सामने दो गिलासों में बीयर उँड़ेली तो उसने उसे भुना हुआ काजू लाने के लिए कहा। बीयर का गिलास बाहर से पानी की नन्हीं बूँदों से भरा हुआ था। अंदर हल्के पीले द्रव्य में लगातार बुलबुले उठ रहे थे। दरवाजे से दिखती उस पार की रोशनी गिलास के पेय में से गुजरकर सुनहरी किरणों की तरह विच्छरित हो रही थी।

मुझे यह सबकुछ बहुत भला लग रहा था - पूरा वातावरण - खुला हुआ, सहज, इतनी आजादी... कोई कुंठा नहीं, किसी के देखने का डर नहीं! जीवन में पहली बार मैं स्वयं को इतना उन्मुक्त महसूस कर रहा था। मैंने एक गहरी साँस ली थी। अपना शहर, उसका संकुचित माहौल बरबस याद आया था। कैसा जीवन था वहाँ - हमेशा डरे हुए, सहमे हुए। अपनी पत्नी को साथ लेकर निकलते हुए भी संकोच होता था। हर तरफ घूरती निगाहें, फब्तियाँ और फुसफुसाहट... कितने सारे बंधन, वर्जनाएँ... अपना ही जीवन हमेशा दूसरों की मर्जी से जीने की विवशता! अब यहाँ बैठकर सोच रहा हूँ तो बहुत कोफ्त हो रही है। क्यों इनसान अपनी जिंदगी इतना कठिन, इतना दुरूह बना लेता है! स्वयं को हर तरह से मार देना ही मानो जीवन का एकमात्र लक्ष्य हो। क्या मिल जाता है ऐसे घुट-घुटकर जीने में...

तुम फिर सोचने लगे ऐश! यह मेरा नया नाम रेचल ने रखा था।

इतना मत सोचो, सोचने से आदमी फिलासफर बन सकता है, मगर हैप्पी नहीं... वह धीरे-धीरे मेरी बाईं जाँघ को सहला रही थी। उसकी छुअन में न जाने क्या था, मेरा पूरा शरीर झनझनाने लगा था।

अपने डिवोर्स के बाद हमने रियलाइज किया ऐश, लाइफ बहुत शार्ट है - आइसक्रीम का माफिक, एनजॉय इट, बिफोर इट मेल्ट्स... अपना गहरा जीवन दर्शन मुझे बताकर अब वह काफी अच्छे मूड में प्रतीत हो रही थी। बीयर के दो बड़े गिलास खत्म करके उसकी आँखों में लाल डोरे उग आए थे। फ्राइड राइस के साथ चिकन चिली का दूसरा प्लेट समाप्त करते हुए तल्लीनता सेबोले जा रही थी -

दुखी होकर अकेले-अकेले जीने में कोई फन नहीं है मैन! यू शुड लिव लाइफ - ईच मोमेंट ऑफ इट... फिर अचानक खाना रोककर मेरी तरफ गंभीर होकर देखा था - आज आंटी अपने गाँव के फिस्ट में जा रही हैं, रात को घर पर नहीं होंगी... उसने अपनी बात बीच में ही अधूरी छोड़ दी थी। सुनकर बीयर की घूँट लेते हुए मुझे जोर की खाँसी आ गई थी। उसदिन वापस लौटते हुए टैक्सी में रेचल ने एकपल के लिए भी मेरा हाथ नहीं छोड़ा था। उन्हें अपने दोनों हाथों में लेकर धीरे-धीरे सहलाती रही थी। इस बीच कई बार दामिनी का फोन आया था, मगर मैं उठा नहीं पाया था। रेचल छेड़ती रही थी - गर्लफ्रेंड? वाइफ तो इतना फोन नहीं करती... अपने कमरे में पहुँचा तो दरवाजे के पास एक लिफाफा पड़ा था। अंदर एक छोटी-सी पंक्ति - 'आज एकबार जरूर आकर जाना... दामिनी।' बिना कपड़े बदले मैं बिस्तर पर ढह गया था। अजीब-सी मनःस्थिति हो रही थी मेरी। मैं यहाँ रुकना नहीं चाह रहा था, मगर दामिनी के पास जाना भी नहीं चाहता था। न जाने कितनी देर तक उसी हालत में पड़ा रह गया था मैं। देर शाम जब तैयार होकर दामिनी के कॉटेज की तरफ चला था, मेरे सर में दर्द हो रहा था। दिनभर की दौड़-धूप, गर्मी और अंदर का ऊहापोह...

जब मैं दामिनी के यहाँ पहुँचा था, दामिनी अपनी बॉल्कनी के पौधों को पानी दे रही थी। मुझे देखकर पानी का झाँझर नीचे रखकर मेरे पास कुर्सी पर आ बैठी थी, किसी अपरिचित की तरह। वैसा ही औपचारिक लहजा - कैसे हो? एक संक्षिप्त-से सवाल के बाद देरतक चुप रह गई थी, जैसे किसी अनिश्चय की स्थिति में हो, भाषा तलाश रही हो या विषय - वार्तालाप शुरू करने के लिए। मैंने उसे नजर बचाकर देखा था - मुसी हुई हल्की नीली ताँत की साड़ी, जूड़े में लापरवाही से लपेटे हुए रूखे बाल... कुल मिलाकर न नहाया, सँवरा चेहरा! ये वही दामिनी थी क्या - हमेशा सजी-सँवरी, सलीकेदार... अंदर तकलीफ-सी हुई थी। उसे यूँ उदास और मलिन देखना... बात मैंने ही शुरू की थी - अब गर्मी बहुत बढ़ती जा रही है। कितनी उमस होती है, पसीने में नहा जाता हूँ...

मेरी बातें वह अनमनी-सी सुनती रही थी, जैसे समझने का प्रयत्न कर रही हो, मैं क्या, किस संदर्भ में बात कर रहा हूँ, और फिर अचानक मुझे बीच में काटकर बोलने लगी थी, बिना किसी भूमिका के - अशेष, तुम्हें मेरा उस दिन का व्यवहार बुरा लगा, जानती हूँ, मगर यदि तुम मुझे, मेरी परिस्थितियों को समझते तो मुझे भी बेहतर समझ सकते... एक पल के लिए वह रुकी थी, जैसे अंदर ही अंदर बोलने के लिए शब्द ढूँढ़ रही हो, फिर बोली थी, कुछ संकोच से ही -

'मेरा अतीत, बचपन... कुछ सही नहीं था वहाँ... मेरी माँ, उनका जीवन - एकाकी, परित्यक्त... पिता का व्यवहार...' उसके अंतस की उथल-पुथल उसके चेहरे पर थी, असंबद्ध-से शब्द - पतंग की तरह उड़ते हुए... उन्हें पकड़ने, सहेजने और एक क्रम देने का उसका प्रयत्न... बिल्कुल खोई हुई, गुम गई-सी प्रतीत हो रही थी वह।

मैं चुप ही रहा था। विघ्न डालकर उसके विचारों के तारतम्य को तोड़ना नहीं चाहता था। पहले से ही वह परेशान थी, अपनी सोच को शब्द देने के प्रयत्न में।

'अशेष, जानते हो, शादी के दूसरे दिन से ही पापा का माँ के प्रति व्यवहार बदल गया था। वे एकदम से अजनबी बन गए थे। जैसे माँ को वे पहचानते तक न हो। इतनी - इतनी दूर चले गए थे वे माँ से - हर स्तर पर...

माँ बिल्कुल अवाक रह गई थी। पापा का व्यवहार उनकी समझ से परे था। कोई क्यों किसी का विश्वास इतनी मेहनत से जीतकर उसे इस तरह से तोड़ देता है! शायद उन्हें जीतना पापा के लिए कोई चुनौती रही होगी। मोतिया आब-से टलमल रंग और गहरी कत्थई आँखों वाली माँ अपनी खूबसूरती और खानदान - दोनों के लिए मशहूर थीं। कहकर वह एक पल के लिए रुकी थी, मैं चुपचाप सुनता रहा था। इस बीच उषा मेज पर चाय के दो कप रख गई थी। चाय की एक छोटी-सी चुस्की लेकर उसने आगे कहा था, जैसे स्वयं से संबोधित हो -

उन्हें जीतकर पापा कुछ दिनों तक उन्हें किसी ट्रॉफी या मेडल की तरह सबको दिखाते फिरे थे और फिर अपने घर में सजाकर भूल गए थे। उनकी दिलचस्पी माँ में बस इतनी ही रही होगी।

उनके लिए ये सब महज एक खेल था, मगर माँ की तो जिंदगी ठहरी। जिंदगी - एक लम्हा, एक क्षण नहीं - पूरी जिंदगी... जानते हो, कितनी लंबी होती हैं ये? उसपर माँ की जैसी जिंदगी... छोडो, हम भी क्या हिसाब ले बैठे, इससे आसान तो चाँद-तारे गिन लेना होता है... वह यकायक बहुत थक आई थी, मुझे लगा था अब सामने बिछी आराम कुर्सी पर ढह जाएगी, मगर उसके अंदर का सफर अभी खत्म नहीं हुआ था शायद, वह अनमन बोलती रही थी, जैसे चल रही हो धीरे-धीरे - अपने अतीत की ओर -

आश्चर्य, आघात और अंततः स्वप्न भंग का एक लंबा दौर... जिसके एक बहुत बड़े हिस्से की गवाह मैं भी रही हूँ। एकबार माँ से पूछा था, इतना क्यों सह गई, चली जाती... कितनी पढ़ी-लिखी थी वो, विशेष योग्यता प्रमाण पत्रों और किताबों से भरी हुई थीं उनकी अलमारियाँ। जवाब में उन्होंने बस इतना ही कहा था - तुझे खोना नहीं चाहती थी... सुनकर मुझे बहुत रोना आया था। उसदिन पहली बार खयाल आया था कि काश मैं पैदा ही नहीं हुई होती, माँ के पैरों की जंजीर हो गई... उनके अंतिम क्षणों में मैंने पूछा था- तुम्हारे साथ ऐसा क्यों हुआ माँ? उनका जबाव था - मैंने यकीन किया था, मेरा यही होना था...

बातें करते हुए वह यकायक चुप हो गई थी, अपनी थकावट में डूबी-सी खड़ी रही थी, कई पल बीते थे - रुकी हुई साँस की तरह असहज और घुटन भरा। मेरी तरफ पीठ फेरकर खिड़की के बाहर देखती रही थी, न जाने क्या सोचती हुई। पिछवाड़े का गुड़हल लाल, चटक फूलों से लद गया था। उसकी सघन डालियों से किसी चिड़िया की चिक्-चिक् अनवरत सुनाई पड़ रही थी। सहजन के नर्म पत्तों पर साँझ की अलस पड़ती धूप थी। हवा में उड़ते उसके बालों को देखते हुए मैं जानता था, वह फिर कहीं भटक गई है।

उसके साथ रहते हुए मुझे ये अकेलापन ज्यादा सालता था। मैं उसके साथ होता था, मगर वह नहीं। न जाने उसकी वह कौन-सी दुनिया थी जिसमें मेरा प्रवेश निषिद्ध था। मैं चाहता था, वह मुझे अपने साथ ले, अपना हिस्सा बनाए, फिर वह हिस्सा कैसा भी हो। उसके साथ मैंने उसकी देह के सुख बाँटे थे, मन के दुख सिर्फ उसके अपने थे। इस मामले में मैंने उसका कार्पण्य देखा था, कि ये मेरी अपनी निस्पृहता थी? कौन जाने...

मेरी सोच में दरार डालते हुए वह यकायक मुड़ी थी - अपनी आँखों का वही जाना-पहचाना सूनापन लिए - माँ के जीवन के अनजाने पहलुओं से मैं उनकी डायरी के जरिए ही परिचित हुई थी। तुम्हें कहा भी था शायद कभी... इसके बाद मैं एक लंबे अर्से तक माँ की डायरी पढ़ने की हिम्मत जुटा नहीं पाई थी। और फिर एक लंबा दौर चला था कशमकश और उलझन का। जब कभी हिम्मत जुटा पाई, माँ की डायरी लेकर बैठ जाती थी। यातना और आत्मीयता का वह एक अजीब सिलसिला था। उन पन्नों में माँ का सान्निध्य था तो उनकी अंतहीन पीड़ा भी। माँ की एक लंबी मौत का सिलसिलेवार ब्यौरा दर्ज था जैसे उन पन्नों में। वे कविता करतीं थीं। एक जगह लिखा था -

सपनों के झूले से उतरकर,

एक उजली खुशी,

उदासियों की साँवली भीड़ में

चुपचाप खो गई,

उसने यकीन किया था,

उसका यही होना था...

कई बार पढ़ते हुए अपने ही अनजाने मैंने अपने आँसुओं से उस डायरी के पन्ने भिगो दिए थे। वैसे वास्तव में देखा जाय तो वे आखिर थे भी क्या, उनकी यातना और उच्छ्वासों का शब्दों में अनुवाद ही... न जाने उनकी आँखों और सोचों की कितनी नमी समेटे वे पन्ने सालों पसीजते रहे थे उस एकाकी भरी दुनिया में।

दामिनी की आँखों में अब मेघिल आकाश था, मार्च की चंचल धूप न जाने कब उतर गई थी। फीके चेहरे में गुजरे हुए पतझड़ की अनगिन यादें समेटे वह रुक-रुककर कहती रही थी - उस डायरी को खोलते ही जैसे मैं माँ की आहों और आँसुओं की एक सिसकती हुई दुनिया में खो जाती थी। एक जिंदा कब्र थी वह डायरी। उसमें जैसे उसाँसें लेती हुई माँ कैद थीं। कहते हुए वह पलभर के लिए सिहरती हुई-सी ठिठक गई थी। उसके चेहरे पर एक सर्द आतंक था, जैसे वह अपने कहे शब्दों के यथार्थ को उसकी पूरी भयावहता के साथ जी रही हो। मैंने उसकी हथेलियों में अपने हाथों का आश्वासन रोपना चाहा था, ऊष्मा पिरोनी चाही थी - सहलाते हुए, मगर वह अन्यमनस्क-सी दूर छिटक गई थी - माँ जिस तकलीफ में मर गई थी, उसी तकलीफ में जीने के लिए मैं अभिशप्त थी... उत्तराधिकार में मुझे यही मिला था - एक लंबी, बीमार उम्र की एक-एक यातना और अवसाद का एकमुश्त पावना...

ऊसर जमीन पर बिना खाद, पानी का अखुँआया बीज थी - बहुत सख्त जान - जी गई... धूप और धूल से ऊर्जा समेटने की आदत जो पड़ गई थी। जिन पौधों को मालूम होता है, मौसम उनपर कभी मेहरबान नहीं होगा, वे भूखे-प्यासे बड़े हो जाते है। जिंदगी जीना सिखा ही देती है।

मैंने आगे बढ़कर उसे अपनी गोद में समेट लिया था। बिना कुछ कहे वह एक बीमार दरख्त की तरह ढह गई थी। मैं जानता था, इस समय उसे शब्दों की नहीं, संवेदना की आवश्यकता है। बिना कुछ कहे अपनी मूक उँगलियों से मैंने उसे छुआ था। एक पल के लिए वह सिहर गई थी, और फिर सघन होकर मुझसे लिपट गई थी।

न जाने कितनी देर बाद मैं वहाँ से चला था... उस समय वह सो रही थी शायद, बीच-बीच में सिसकी लेती हुई... कितना असहाय और मासूम लग रहा था उसका चेहरा उस समय! जैसे कोई अनाथ बच्ची - अकेली और डरी हुई... चलने से पहले उसे चादर ओढ़ाते हुए मैंने उसके लिए नींद, सुकून और सपनों की प्रार्थना की थी। उसे इन्हीं चीजों की जरूरत सबसे ज्यादा थी। एकबार उसने कहा भी था, अशेष, मुझे लगता है कि जैसे मैं नींद में भी जगी हुई हूँ। टूटते हुए तारे को देखकर कितनी बार विश की है कि मुझे एक पूरी रात की नींद मिल जाय... उसकी थकी हुई आँखों में मैंने अक्सर वर्षों की जगार देखी थी।

न जाने उसकी जिंदगी में ठहरी हुई यह दुःस्वप्न जैसी रात कब गुजरेगी। उसे उसके हिस्से की धूप और उजाला कब मिलेगा... वहाँ से चलते हुए मेरे अंदर कुछ अवसन्न-सा घिर आया था। अपनी दौड़-धूप भरी जिंदगी के तनावों से दो पल छूटने की उम्मीद में उसके पास आता हूँ, मगर कई बार और अधिक तनाव और बोझिलता लिए यहाँ से लौटता हूँ। कभी-कभी खीज होती है। उसका अतीत हमारे वर्तमान को छाए रहता है। कई बार इन सबसे छूट जाने की छटपटाहट अंदर पैदा होती है, जी चाहता है, सब काटकर अपने से अलग कर दूँ और चल पड़ूँ, मगर हो नहीं पाता। एक दुर्वार आकर्षण मुझे बाँधे रखता है, निशि की तरह हाथ के इशारे से पास बुलाता है। मैं उससे दूर जाने की कोशिश में उसके और-और पास चला आता हूँ। दामिनी की देह का चुंबक मुझे उससे अलग होने नहीं देता।

अपनी इच्छाओं के क्षणों में वह खालिस जादू होती है, सर से पाँव तक। मैं उसमें डूबता-उतराता अपने सारे मलाल भूल जाता हूँ। उन विलक्षण क्षणों का इकलौता सच दामिनी और सिर्फ दामिनी ही होती है। छोटी-मोटी हताशाओं और शिकायतों का सारा खामियाजा वह उन थोड़े-से पलों में ही शानदार तरीके से भर देती है। उसकी बिल्लौरी देह और मेरी हवस के सिवा उन पलों में मुझे और कुछ याद नहीं रह जाता है।

आज दामिनी बेहद थकी हुई है, मुझे अपने कमरे में लौट जाना होगा। सोचते हुए मैं उसके कॉटेज से बाहर निकला था। उस समय तक रात काफी गहरी होने लगी थी। रास्ता लगभग सुनसान पड़ा था। मैंने ऊपर आसमान की तरफ देखा था। न जाने किस उम्मीद में - गहरे स्लेटी आसमान पर हल्के-फुल्के बादलों के फाहे, आवारा डोलते हुए... शायद बारिश हो जाय...

काश आज दामिनी मुझे अपने पास रोक लेती... मेरी आँखों के कोने जल उठे थे। आगे के मोड़ से कोई ऑटो पकड़ लूँगा... सोचते हुए मेरा ध्यान मोबाइल के वीप पर गया था। रेचल का संदेश था - कितनी देर कर रहे हो, आई एम वेटिंग फॉर यू... पढ़ते हुए मेरी नसों में कुछ सुलग-सा उठा था। अपने अनजाने ही मैंने जल्दी से आगे बढ़कर एक पास से गुजरते हुए ऑटों को हाथ दिखाकर रोक लिया था। दामिनी के साथ ही मेरी सारी वर्जनाएँ टूट गई थीं। अब इस दिशाहीन, बंधनहीन नदी को बस बहना ही है, अपने आकूल वन्या में कूल-किनारा डूबोते हुए, सबकुछ निःशेष करते हुए... इसकी तेज धारा में किसका क्या बह गया, डूब गया इसकी परवाह किए बगैर... उस क्षण मैं स्वयं को बहुत बेबस महसूस कर रहा था - अपने ही हाथों, शायद यही सबसे बड़ी विडंबना थी!

दूसरे दिन सुबह उठा तो सर बहुत भारी लग रहा था। कमरे की सारी खिड़कियों पर पर्दे ओर-छोर खींचे हुए थे, इसलिए अंदर हल्का अँधेरा-सा छाया हुआ था। बगल की मेज पर रखी घड़ी में दस बज रहे थे। एकबारगी मैं हड़बड़ा गया था, फिर खयाल आया था, आज संडे है।

अपने बाथरूम स्लीपर्स में पैर डालते हुए मेरी नजर सिरहाने की तरफ गई थी। वहाँ रेचल का क्रास लगा चेन और हेअर क्लिप्स पड़े थे। एक क्षण के लिए मेरे अंदर कुछ अजीब-सा घटा था, एक सनाका-सा और फिर दूसरे ही क्षण मैं उठकर बाथरूम में चला गया था। पानी के हल्के गर्म फुहार के नीचे खड़े होकर देरतक नहाते हुए मुझे अपनी देह से वही गंध आती महसूस हुई थी जिससे मुझे मतली-सी आने लगती थी। मगर आज ऐसा नहीं हुआ था। उस गंध में आज रेचल की मांसल देह का नमकीन स्वाद भी आ मिला था। अपने नासपुट और होंठों पर उसे महसूसते हुए मैं न जाने कबतक नहाता रहा था। बाहर निकला तो रेचल को अपने बिस्तर में प्रतीक्षित पाया - नहाई और लगभग भीगी हुई - बालों से रिसता पानी तकिए पर एक बड़ा धब्बा बना रहा था, ओढ़ी हुई चादर के नीचे का गीला उतार-चढ़ाव देखा जा सकता था।

तुमने मेरा बिस्तर भिगो दिया... मैं नाराज दिखना चाह रहा था।

कोई बात नहीं, जल्दी सूख जायगा। तसल्ली देती हुई-सी वह मुस्कराई थी- आज संडे है...

तो...? मैं कपड़ों की अलमारी की तरफ बढ़ गया था।

तो... आज तुम्हें दफ्तर नहीं जाना है...

तो...?

तो आओ... उसने चादर से हाथ निकालकर मेरा एक हाथ पकड़ लिया था - आज दिनभर सोते हैं...

बिस्तर पर आते हुए मैंने अपना मोबाइल उठाना चाहा था, मगर रेचल ने उसे बंद करके सिरहाने के नीचे डाल दिया था - आज छुट्टी का दिन है, मोबाइल की भी छुट्टी... मैं कुछ कह नहीं पाया था।

उस दिन शाम के समय मुझसे मिलने दामिनी स्वयं चली आई थी। उस समय रेचल किचन में मछली के कटलेट्स तल रही थी और मैं बॉल्कनी में बैठा बीयर की चुस्कियाँ ले रहा था। दामिनी ने आते ही पूछा था, तुम्हारा फोन कहाँ है? उसे वहाँ यकायक देखकर मैं घबरा गया था। जबतक मैं उसकी बात का कोई जवाब देता, वह स्वयं अंदर कमरे से मेरा फोन उठा लाई थी - तुम्हारा फोन बंद पड़ा है! उसके स्वर में गहरा आश्चर्य था। मैं सकपकाया-सा उसे देख ही रहा था जब किचन से गर्म कटलेट्स का प्लेट उठाए रेचल बॉल्कनी में निकल आई थी। उसे देखते ही मेरी घबराहट कुछ और बढ़ गई थी। दामिनी और रेचल - दोनों एक-दूसरे को कुछ देर के लिए घूरकर देखते रहे थे। फिर दामिनी ने मुझसे शांत स्वर में पूछा था - ये कौन है?

ये मेरी कजिन... नहीं मिसेज लोबो की... मैं न जाने अपनी घबराहट में क्या कुछ कहे जा रहा था। मेरी बातें सुनकर जहाँ दामिनी के माथे पर बल पड़ गए थे, वहीं रेचल मुस्करा पड़ी थी - आई एम रेचल, मिसेज लोबो मेरी आंटी लगती हैं। आप...!

मैं... रेचल के सवाल पर अचानक दामिनी का चेहरा रंगहीन-सा हो आया था - मैं दामिनी - एक परिचित, इनकी...

ओह, आई सी... मुझे लगा, इनकी वाइफ आ गई हैं, जिस तरह से आप सवाल पूछ रही थी... मुस्कराते हुए रेचल टेबल सजाने लगी थी - आप बैठिए न मिस दामिनी...

नहीं, मुझे चलना होगा... कहते हुए ही दामिनी लगभग आधी सीढ़ियाँ उतर गई थी और फिर अचानक मुड़कर नीचे से मेरी ओर देखा था। मेरा दिल धक् से रह गया था। न जाने क्या था उन आँखों की दृष्टि में - नाराजगी, शिकायत... नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं, बस, अंदर की एक गहरी टूटन और बिखराव... जैसे कहीं कुछ एकदम से तहस-नहस हो गया हो।

उसका अबोला उपालंभ मुझे दूर तक दाग गया था। न जाने कैसी अजनबी आवाज में मैंने पीछे से पुकारकर कहा था - मैं आज आऊँगा... वह बिना कोई जवाब दिए चुपचाप सीढ़ियाँ उतर गई थी।

उसके जाने के बाद वहाँ एक अजीब आश्वस्ति भरी खामोशी पसर गई थी। रेचल चुपचाप कटलेट्स कुतरती रही थी, फिर प्लेट उठाकर अंदर चली गई थी - अब तो शायद तुमसे खाया नहीं जाएगा, ठंडे भी हो गए... कहते हुए उसके स्वर में गहरा कटाक्ष था या अफसोस, मैं तय नहीं कर पाया था।

इसके थोड़ी देर बाद जब उमा का फोन आया था, मैं दामिनी के यहाँ जाने के लिए कमरे से निकल रहा था। रात को फोन करने की बात कहकर मैंने फोन काट दिया था। उस तरफ से उमा कुछ कहती रह गई थी। वह बहुत गुस्से में लग रही थी, न जाने क्यों। सीढ़ियों के नीचे जब मैं उतरा रेचल ने पीछे से पुकारकर कहा था - ऐश, आज रात की बस से मैं मुंबई लौट रही हूँ...

उसकी बात सुनकर मैं ठिठक गया था - अचानक से...?

अचानक नहीं, तुम भूल गए, मैंने तुमसे कहा था...

हाँ, शायद... न जाने क्यों उसकी बात सुनकर मैं एकदम से निसंग हो आया था - जैसे किसी चौराहे पर खड़ा हूँ और पता नहीं जाना कहाँ है। यकायक सारी तस्वीरें एकसाथ गडमड हो गई थीं। अब कुछ था तो आँखों के सामने मिटते-बिखरते हुए रंगों के ढेर सारे धब्बे और अंदर एक अछोर शून्य... मैं डूब रहा था - किसी गहरे कुएँ में! अचानक मैं बेतरह डर गया था। कहाँ हूँ मैं, कहाँ जा रहा हूँ...

उमा का फोन आ रहा था - मोबाइल लगातार बजे जा रहा था - किसी एंबुलेंस के सायरन की तरह, जिसे सुनकर अंदर दहशत का एक गहरा, नीला बवंडर-सा हमेशा उठता था... आँखों के सामने दामिनी का उदास चेहरा तैर रहा था और ऊपर बॉल्कनी में खड़ी रेचल विदा में हाथ हिला रही थी...!

दामिनी के यहाँ जब पहुँचा था, शाम प्रायः शेष हो आई थी, आकाश के गहरे कत्थई विस्तार में गेरुए रंग के छींटे धीरे-धीरे घुल रहे थे। नए चाँद के नीचे तिल की तरह जड़ा तारा बहुत उजला दिख रहा था, मुस्कराता हुआ-सा। हवा में ताजी छँटी मेहँदी की झाड़ियों की गंध थी। दामिनी पिछवाड़े के बगीचे में मिली - कोई नन्हा-सा पौधा रोपते हुए - एकदम पसीना-पसीना, माथे पर उलझी लटों के बीच पिघलती हुई छोटी बिंदी और दाएँ गाल पर मिट्टी का धब्बा... मुझे देखकर हाथ के दस्ताने उतारते हुए पास बिछी कुर्सी पर आ बैठी थी - देखो न, तब से लगी हूँ, मगर काम खत्म ही न हो पाया, कुछ पौधे रह गए, कलतक बर्बाद न हो जाएँ... वामन आया ही नहीं। अब देखो कल भी आता है या नहीं...

कैसे पौधे हैं? मैंने बाल्टी में रखे पौधों को देखा था - चीरे-चीरे पत्तों वाले - हल्के कच्चे हरे... कितना ताजा रंग था!

सावनी के हैं - अभी लगाया तो शायद बारिश तक फूलने लगे। ये बैंजनी रंग के हैं, मगर मुझे गुलाबी भी पसंद है... दमिनी कितने लगाव के साथ चारों तरफ झूमते हुए पौधों को देख रही थी।

तुम्हें फूल बहुत पसंद हैं न...? मेरे प्रश्न पर वह अनमन-सी मुसकराई थी - कांट हेल्प इट - वृषभ राशि की हूँ - अर्थ साइन - प्रकृति से प्रेम होना ही है... मैं अपने सबसे करीब प्रकृति को ही पाती हूँ - ये जमीन, आकाश, पेड़-पौधे - सभी मुझसे बोलते हैं... कभी मैंने लिखा था - मेरी गत-आगत पीड़ा के साक्षी चाँद...

अचानक वह उठ खड़ी हुई थी - चलो, समंदर के किनारे चलते हैं। उसे भी कई दिन हुए, नहीं देखा, लहरें कब से पास बुला रही हैं - इतना शोर मचाकर...

दामिनी के कॉटेज से समंदर मुश्किल से आधा किलोमीटर की दूरी पर था। 'जानते हो अशेष, मैंने अपने पापा की संपत्ति को हाथ भी नहीं लगाया था। हालाँकि उन्होंने अपनी सारी प्रापर्टी मेरे ही नाम लिख छोड़ा था - मैं उनकी इकलौती संतान थी -वैध संतान, आई मीन... मैंने उनके बाद सबकुछ एक अनाथ आश्रम को दान कर दिया था, कुछ भी नहीं लिया था, मुझे उनमें माँ के आँसू और मौत नजर आती थी। बाद में मुझे नानाजी ने बहुत कुछ दिया - माँ का हिस्सा... वे अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थे!' कभी दामिनी ने ही मुझे बताया था। अपना पुराना घर छोड़कर उन्हीं पैसों से दामिनी ने यह कॉटेज बनवाया था - अपने मन मुताबिक।

साँझ के बाद की किशोरी रात - हल्के-हल्के गहराती हुई, साँवली पड़ती हुई... सफेद रेत में दूर-दूरतक अबरक का रुपहला झिलमिल था, पानी में आकाश का गहरा नील - इस्पात में तब्दील होता हुआ, लहर दर लहर... दामिनी का मिजाज बदल रहा था, मैं महसूस रहा था। उसकी आँखों में सुदूर निहारिका-जैसा कुछ था - पाँत के पाँत जलते हुए नन्हें दिए... उदास और बोझिल! उसने अबतक रेचल का प्रसंग नहीं उठाया था। मैं राहत महसूस करते हुए भी कहीं से डरा हुआ था।

रेत पर न जाने क्या कुछ लिखते हुए उसने मुझे देखा था - जानते हो अशेष, इस समंदर से मेरी पहचान बड़ी पुरानी है। मैं इसी की लहरों में एक तरह से पल-पुसकर बड़ी हुई हूँ... मेरा बचपन, मेरी माँ की निसंग जवानी, उनकी कही-अनकही... सबकुछ इसमें समाया हुआ है। दरअसल समंदर के पास होना मेरे लिए अपनी माँ, अपने बचपन के साथ होना है। जब भी सागर के विस्तार, इसके गहरे हाहाकार को देखती हूँ, अपना बचपन, अपना दुखता हुआ अतीत याद आने लगता है... ये एक ही साथ सुख और दुख की प्रतीति कराता है!

मैं जानता था, मेरे साथ सागर तट पर चलते हुए वह फिर अपने अतीत की ओर मुड़ गई है, मुझे अकेला छोड़कर। शायद मेरी नियति ही यही है - सबके बीच - एक भरी-पूरी दुनिया के बीच - अकेले-अकेले, एकदम निसंग होकर जीना... दामिनी बोल रही थी - लहरों के शोर में डूबी हुई-सी आवाज में, जिसे सुनने के लिए मुझे काफी ध्यान देना पड़ रहा था -

कैसे उदासी भरे दिन थे वे, क्या कहूँ... जैसे हर पल आँसुओं की बूँद-से टलमल-टलमल, एक ही टकोर पर बरस जाने के लिए अधीर... बहुत मुश्किल होता था उन गीले दिनों में आँखों को शुष्क बनाए रखना। माँ की आँखों का खयाल रखते-रखते मैं अपनी आँखें बिसरा बैठी थी, जिनके दुखों की एक अलग दुनिया थी। माँ मुझसे कभी कुछ भी नहीं कहती थी और यही बात मेरे लिए सबसे ज्यादा त्रासद हो जाया करती थी। उनकी चुप्पी ही उनकी पीड़ा को मुखर बना देती थी, काश वे इस बात को समझ पातीं।

बारिश के मटमैले आकाश-सा कुछ होता था उनकी तरल आँखों में, पलकों का कच्चा किनारा तोड़कर बह निकलने को आतुर। अपनी दुर्बल बाँहों में एक चढ़ते हुए समंदर को बाँधे कभी-कभी शायद वे बहुत थक जाती थीं। फुर्सत के क्षणों को खींचती हुई वह बहुत बार अकेली दिख जाती थी, खासकर छत के उस पूरबवाले कोने में जहाँ बहकर आनेवाली हवा का स्वाद बिल्कुल अलग होता था, नीम के फूलों की कड़वी-मीठी गंध की तरह।

कभी-कभी उन्हें छेड़े बगैर मैं चुपचाप उनकी दुनिया का हिस्सा बन जाती थी - उनके आकाश और समंदर को ओर-छोर बिछाकर उनसे एक होती हुई-सी... मैं जानना चाहती थी, क्या है उस आकाश के एक टुकड़ा शून्य में या सागर के हरहराते हुए विस्तार में, जहाँ वे इस तरह से रातदिन डूब जाया करती थीं। बाद में, बहुत बाद में समझ पाई थी, निसंग मन कहाँ-कहाँ आसरा ढूँढ़ लेता है, कैसे-कैसे साथ चुन लेता है। दामिनी मुट्ठी में रेत भर-भरकर हवा में उड़ाती रही थी। ऐसा करते हुए उसकी आँखों में वही अतीत था जिसमें वह अपना वर्तमान जीती आ रही थी। मेरी तरफ न देखती-सी नजर से देखते हुए उसने कहा था, समंदर मुझे मेरा बहुत अपना-सा कोई लगता है अशेष। जानते हो, बचपन में मैं जिस कमरे में सोती थी, समंदर उसके शायद सौ कदमों के फासले पर ही था। वही हमारा सबसे करीबी पड़ोसी हुआ करता था।

पूरी रात ही जैसे किनारे पर पछाड़ खाती लहरों पर डोलती रहती थी। बरसात की रातों में उद्दाम हवा छत पर किसी क्रुद्ध नागिन की तरह अपना फन पटकती हुई गुजरती थी तो मुझे बहुत डर लगता था। खासकर बरसात की तूफानी रातों में, जब लगता था उमड़ता हुआ समंदर हमारे छोटे-से काँटेज को अपनी ऑक्टोपस जैसी लहरों में दबोचकर पूरा का पूरा निगल जायगा। हवा, समंदर और बारिश से जैसे रचा हुआ था हमारा घर। उसकी बूढ़ी, नमक खाई पुरानी दीवारें समुद्र के गर्जन से रातदिन थरथराती रहती थीं।

अपनी बात को बढ़ाते हुए वह मेरे करीब सरक आई थी, किसी डरी हुई छोटी बच्ची की तरह - जानते हो अशेष, कभी-कभी मुझे लगता था कि जैसे समंदर का ये अनंत शोर मेरे अंदर समा गया है। नसों में बहता रहता है आठों प्रहर - ठीक जैसे शंख के अंदर से आती है समंदर की आवाज... मत्स्यगंधा बनी हवा से भीगी रहती थीं खिड़कियाँ, दरवाजे, उमस से हम चिपचिपाए रहते थे। कभी-कभी लगता था, हम नमक से बने हैं।

पहली बार अपनी ही बात पर वह हँसी थी। शाम की धूसर रोशनी में सितारे घुल आए थे। उसकी हँसी की हल्की ठुनक में डूबता-उतराता मैं उसे देखता रहा था। कुछ कहकर मैं उसके प्रवाह में गतिरोध उत्पन्न नहीं करना चाहता था। वह अबाध बह रही थी, अपनी रौ में, नदी की तरह...

उसे उसके निहायत अंतरंग क्षणों में देखना-महसूसना भी अपने आप में एक घटना होती है। किसी पारे की उजली नदी की तरह वह अलस, मंथर गति से बहती है, अपने आसपास सपनों और इच्छाओं के हल्के गुलाबी फूल खिलाते हुए, सुगंध की तरल वेणियाँ लहराकर हवा में गश घोलते हुए... मेरी सोच से बेखबर वह अब भी अपनी रौ में बहे जा रही थी -

इन तमाम शोरगुल के बीच माँ के व्यक्तित्व में खिंचा गहरा सन्नाटा मुझे दो चरम के बीच जीने पर विवश कर देता था। यह स्थिति निहायत तकलीफदेह थी। समंदर और माँ दो बिल्कुल विपरित धुरियों पर थे, मगर फिर भी कहीं किसी बिंदु पर एक थे, यह बात समझते हुए मुझे एक उम्र लग गई थी।

कभी जब मैं उनसे पूछती थी, उन्हें क्या मिल जाता है इस अनवरत हाहाकार और अछोर चुप्पी से, वे हँसकर कहती थी, तू अभी इस बात को नहीं समझेगी! जब तू नहीं थी, ये थे और... आगे भी रहेंगे...

कई वर्ष बाद जब मैं पापा के साथ बोर्डिंग स्कूल के लिए घर से निकल रही थी, माँ को समंदर के गहरे नीले कैनवास पर हवा और शोर के बीच किसी गीली पेटिंग की तरह एकदम निसंग और उदास खड़ी देखकर उसदिन उनकी कही हुई उस बात का सही अर्थ समझ पाई थी।

मैंने मुड़कर उसदिन समंदर को एक दूसरी ही - नई नजर से देखा था। अब मुझे भी माँ के यकीन पर यकीन हो चला था। कितनी अजीब बात है, उसदिन अपने घर को उन उच्छृंखल लहरों के हवाले करके मैं एक तरह से निश्चिंत हो गई थी।

उसे सुनते हुए उसकी बातों से मैंने समंदर के चेहरे का मिलान किया था। वह बिल्कुल वैसा ही था जैसा दामिनी की स्मृतियों में बसा हुआ था। कितना पुराना है ये समंदर... सबके हिस्से की कहानियों में बँटा हुआ, मगर एकदम पूरा-पूरा... मैं उठ खड़ा हुआ था। साथ में दामिनी भी। अपने कपड़ों से रेत झाड़ते हुए उसने किनारे पर चढ़ती हुई लहरों से खुद को बचाया था, ज्वार का समय था, पानी ऊपर चढ़ रहा था, लहरों में खासी बेचैनी थी। बेचैन दामिनी भी थी। किसी खोई हुई टिटहरी की-सी आवाज में कह रही थी - एकदम निसंग, उदास, गहरे कहीं छूते हुए -

इसके बाद जब भी माँ से फोन पर बात होती थी, मैं उनसे मजाक में पूछ लेती थी, क्यों माँ, तुम्हारा समंदर कैसा है? हालाँकि मुझे फोन पर भी समंदर की आवाज सुनाई पड़ती रहती थी। कभी-कभी तो मुझे ऐसा लगता था कि मैं माँ को फोन करती ही हूँ समंदर की आवाज सुनने के लिए... वह समंदर जो दूर होकर भी हर पल मेरे आसपास बना रहता था - अपने तमाम हलचल और बेचैनी के साथ... मेरी नसों में एक दरिया है और उसका सारा नमक भी। खूब समझ पाती हूँ, जब निःशब्द रातों में मेरे अंदर बसी लहरें छटपटाती हैं, तटों पर पछाड़ खा-खाकर सर धुनती है...

उसकी बातें सुनकर मुझे न जाने किस शे'र की दो पक्तियाँ याद हो आईं थीं - मैंने बहते हुए साहिल से ठिकाना माँगा था, मुझे बिखर जाने का कैसा जुनून था... मैं भी बसने के भ्रम में दामिनी के साथ बहे जा रहा था शायद। पता नहीं, वह मेरा किनारा थी या मँझधार...

मेरी अस्त-व्यस्त सोचों से परे वह अपनी छोटी-सी दुनिया में हमेशा की तरह गुम थी। आगे चलते हुए कहती जा रही थी - जानते हो अशेष, एक अर्सा हुआ मैं कभी एक पूरी, मुकम्मल नींद सो नहीं पाई। रातों को जागना या जागते रहने के अहसास में तंद्रिल-सी किसी अवस्था में पड़े रहना, फिर सारा-सारा दिन ऊँघ और आलस्य से घिरे रहना... यही मेरे लिए एक रुटीन होकर रह गया है।

वह मुझे मुड़कर अचानक देखती है और मैं उसकी उनींदी आँखों से घिर आता हूँ - एक सपना जो अपनी नींद की तलाश में जाग रहा है, न जाने कब से, न जाने कबतक के लिए! मैं झुककर एक कंकड़ उठाता हूँ और मन-ही-मन उसके लिए एक लंबी, सुखद नींद की विश करते हुए उसमें फूँककर उस कंकड़ को समंदर की लहरों की तरफ उछाल देता हूँ। वह एक क्षण के लिए मुझे कौतुक से देखती है फिर चल पड़ती है -

और जब कभी नींद आती है तो तंद्रा के झीने पर्दे के पीछे ऐसी प्रतीति होती है कि जैसे मेरे सिरहाने बैठकर कोई रातभर रो रहा हो - एक दबी-दबी, हिचकियों में टूटती आवाज... इतने धीमे कि कानों का भ्रम लगे! मगर आती है - सारी रात! मैं करवट दर करवट अपने दोनों कान तकिए से दबाकर पड़ी रहती हूँ। उस आवाज से छूटने के लिए मैं क्या नहीं करती। मगर उफ्! वह बंद नहीं होती, किसी तरह बंद नहीं होती...!

मैंने आगे बढ़कर बिना किसी भूमिका के अचानक पूछा था - मे आई होल्ड योर हैंड? मेरे इस आकस्मिक प्रश्न पर ठिठककर रुक गई थी और फिर चकराई-सी पूछी थी - कौन वाला हाथ? उसके इस भोले सवाल पर मुझे अनायास हँसी आ गई थी, हँसते हुए ही कहा था - बोथ हैंड्स... आँखों में न समझने के-से भाव लिए उसने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ा दिए थे, चेहरे पर अभी भी गंभीरता ओढ़े। मेरा मन करुणा से भर उठा था। अपनी उलझन की दुनिया में एक टिटहरी की तरह हमेशा खोई रहती है, उसे आसपास की सुध तक नहीं रहती। एक उस जैसी खूबसूरत औरत का यूँ उदासी की मटमैली धुंध में रातदिन खोए रहना, धीरे-धीरे हर खुशी, हर उमंग से विरत होना, होते चले जाना... मुझे उसके लिए तकलीफ होती थी। जिंदगी - ऐसी जिंदगी - इस तरह जाया नहीं होनी चाहिए!

वह मेरी आँखों में न जाने क्या देखती है कि अचानक से चेहरा दूसरी तरफ मोड़ लेती है। एक क्षण के लिए हम दोनों के बीच एक गहरा मौन पसर गया था - बहुत भरा-भरा और बोलता हुआ-सा... एक साँस की नाजुक टकोर से भी चटकता हुआ-सा... मैं उसे देखता हूँ, वह न जाने किसे - एक दृष्टिहीन नजर से, अन्यमनस्क - अपने में संपृक्त! उसका मेरे साथ होना और न होना - इसी तरह - मुझे साथ में भी अक्सर निसंग कर जाता है। मुझे ये खलता है, मगर उसे दोष नहीं दे पाता। ये सब उसके जानने में नहीं होता, अब अच्छी तरह समझने लगा हूँ। उसका मन का एक कोना - बहुत छोटा-सा - मेरी पकड़ में आया है, वह भी पूरी तरह नहीं। एकदिन उसे पा लूँगा, मैंने आकाश पर चमकते हुए मौसम के एक टुकड़े - नए चाँद की तरफ देखते हुए सोचा था। मुझे लगा था, चाँद की हँसी बाँध टूटकर एकदम से बह आई है। क्या मेरी ये इच्छा इतनी पागल थी!

दामिनी मेरी तरफ देखती हुई अबतक चुपचाप खड़ी थी। स्वयं को समेटते हुए मैंने उसका दायाँ हाथ पकड़ लिया था और फिर चलते हुए पूछा था - कोई सारी रात तुम्हारे सिरहाने बैठकर रोता है... तुम्हें ऐसा लगता है? स्ट्रेंज!

'हाँ, सच, ऐसा ही लगता है, एकबार नहीं, अक्सर...' वह फिर अपने में हो ली थी - मुझे याद है, प्रायः रोज रात को मुझे सुलाने के बाद जब माँ को पूरा यकीन हो जाता था, मैं सो चुकी हूँ, वे धीरे-धीरे रोने लगती थीं। मैं माँ का ये राज जानती थी, इसलिए जब वे चाहती थीं, मैं उनके लिए सो जाने का बहाना करती थी - इतना तो मैं उनके लिए कर ही सकती थी! मेरे नन्हें शरीर को अपनी बाँहों में समेटे वे निःशब्द रोती रहती थीं, शायद सारी रात ही... लाख जागना चाहकर भी मेरी कच्ची आँखें आखिर मुँद ही जाती थीं। सोने से पहले मैं महसूस करती थी, मेरा माथा उनके बहते हुए आँसुओं से भीग गया है। उनके वे विवश आँसू मेरी रूह में जज्ब होकर रह गए हैं अशेष! अब तो वर्षों से जो भी सपने आते हैं, उनमें भीगकर आते हैं। उनसे मेरी मुक्ति नहीं - इस जन्म में तो नहीं!

उसकी बातें सुनते हुए मैं समझ गया था, कौन उसके सिरहाने आज भी सारी-सारी रात रोता है। कुछ तस्वीरें धुँधली पड़ जाती हैं, मगर मिटती नहीं - शायद कभी भी। कच्ची दीवारों पर लिखे गए हर्फ रह जाते हैं उनके साथ - उनकी उम्र का हिस्सा बनकर... इस गीली मिट्टी पर न जाने कितने दाग हैं, किस-किस के दिए हुए... हरी, मखमली कालीन के नीचे जर्द, स्याह मौसम की एक लंबी, बदसूरत फेहरिस्त है - ओर-छोरतक पसरा हुआ। इन्हें अनहुआ नहीं किया जा सकेगा कभी... इस इंद्रधनुष पर उदासी के साँवले फफूँद पड़े रहेंगे - इसी तरह, हमेशा...

मेरे अंदर अनायास एक अनाम-सी अनुभूति घिर आई थी - गहरे, मटमैले रंग जैसी, बारिश में लगातार भीगती हुई किसी बदरंग दीवार की तरह...। काई की कोई गहरी परत है जो अंदर ही अंदर कहीं चढ़ रही है, बहुत बेआवाज, मगर तेजी से। उतरती रात के मेहँदिया रंग में मैं उसकी झिलमिलाती देह को देखता हूँ - हवा में अबरक-से झर रहे हैं, अँधेरा गोरा पड़ रहा है।

एक तिलिस्म रच रही है वह हर कदम पर - मेरे लिए... किसी मरीचिका की तरह उसका दुर्वार आकर्षण मुझे खींचकर न जाने सन्नाटे के किस देश में लिए जा रहा था! मैं हर कदम पर रुकना चाहता था, मगर नहीं चाहता था। ये मेरी सबसे बड़ी त्रासदी थी। त्रसित तो दामिनी भी थी। जहाँ दुख के सिवा कुछ नहीं मिलता था, उसे फिर-फिर वहीं लौटकर जाना पड़ता था। विवश थी वह - स्वयं से ही। हम दोनों अपने आप से विवश थे। इसलिए - शायद इसीलिए इतने विवश थे।

दामिनी के कॉटेज में पहुँचते हुए उसदिन काफी देर हो गई थी। न जाने क्यों, उषा ने बाहर की बत्तियाँ नहीं जलाई थीं। चारों तरफ अंधकार पसरा पड़ा था। दूर स्ट्रीट लाइट की रोशनी बरामदे में यहाँ-वहाँ फैल रही थी। उसी हल्की रोशनी में चहारदीवारी के साथ -साथ लगे बोगनबेलिया की सघन लतरें हवा में झूमते हुए फर्श पर रंगोली-सी रच रही थी - रोशनी और छाँव की लुकाछिपी - शरीर, चंचल... हम दोनों उसी फीके अंधकार में बरामदे में बिछी कुर्सियों पर बैठ गए थे। आवाज सुनकर उषा बाहर आ गई थी, मगर दामिनी ने उसे बत्ती जलाने से मना कर दिया था - ऐसे ही ठीक लग रहा है। उसने चाय बनाने से भी उसे मना कर दिया था। मैं अंदर जाकर वॉश बेसिन पर मुँह धो आया था। समंदर की नमकीन हवा में त्वचा चिपचिपाने लगी थी। रूमाल से चेहरा पोंछते हुए मैं जब बाहर बरामदे में आकर बैठा, उषा मेज पर बीयर की बोतल और दो काँच के लंबे गिलास लगा रही थी। मैंने हाथ लगाकर देखा था, बोतल बहुत ठंडी थी। इस समय मुझे बिल्कुल यही चाहिए था - चिल्ड बीयर!

थोड़ी देर बाद जब दामिनी बाहर निकलकर आई थी, उसके शरीर से किसी सुगंधित साबुन और क्रीम की गंध आ रही थी। शायद वह भी बाथरूम से फ्रेश होकर आई थी। बैठते हुए उसने पूछा था, तुम खाकर जाओगे न? मैंने उषा से पनीर बनाने के लिए कहा है। रोटियाँ भी बना लेगी... मैं चुपचाप बीयर की चुस्कियाँ लेता रहा था। शाम की इस गहरी, खूबसूरत खामोशी में मुझे अनायास अपने घर का खयाल आ गया था - अक्सर इस समय का माहौल... मैं ऑफिस से लौटकर बेतरह थका-हारा, थोड़ा सुकून और आराम की जरूरत में... उधर बच्चों की तकरार, आपस के झगड़े, होम वर्क का टेंशन! उमा रसोई में लगातार बड़बड़ा रही है, बीच-बीच में आकर शिकायत कर रही है, उलाहने दे रही है - तुम्हारा क्या, ऑफिस की नौ से पाँच की बँधी-बँधायी ड्यूटी, फिर घर आकर आराम! और एक मैं हूँ, सुबह से शाम तक कभी कोई छुट्टी नहीं, आराम नहीं... औरत का जन्म...!

अचानक मेरे मुँह में बीयर की घूँट बहुत कड़वी जान पड़ी। शादी... एक अनोखी संस्था है, जहाँ दो इनसान एक-दूसरे से बँधे उम्रभर एक-दूसरे को योजनाबद्ध तरीके से तोड़ते, खत्म करते रहते हैं। किस्तो में - तिल-तिलकर... अद्भुत हिंसा है ये - रिश्ते के नाम पर - एक कैद, कारावास - आजीवन कारावास...

शादी से पहले उमा कितनी खूबसूरत थी - सूरत और सीरत से! हँसती ही रहती थी - बात-बातपर... किसी पहाड़ी जलप्रात की तरह - अविरल, अबाध... घंटों उसके साथ कैसे बीत जाता था, समय का पता ही नहीं चलता था। और अब... मुझे उसका चेहरा याद आता है - कठोर और रुक्ष - लावण्य रहित! हमेशा तनी हुई भौंहें और तमतमाते गाल। क्या मैंने उसे इस हालत में पहुँचा दिया? या हालात ने... अपने अंदर मैं टटोलता रहता हूँ - बहुत सारे अनुत्तरित प्रश्न हैं, इकट्टे हो गए हैं बीतते हुए समय के साथ, पहाड़ बनते जा रहे हैं दिन-प्रतिदिन... और मैं दबा हुआ हूँ उसके नीचे हर समय।

फिर मैं... मेरा क्या हुआ! क्या मैं भी हमेशा से ऐसा था - उदासीन, हर तरफ से असंपृक्त... कितना कुछ चाहता था मैं भी इस जिंदगी से, अपने और उमा के रिश्ते से! उम्मीदें थीं, चाव थे, इच्छाएँ - ढेर-ढेर-सी! और अब?... एक गहरा अवसाद और विरक्ति- हर चीज से, शायद जीवन से ही।

एक भारी अभाव से उपजी है ये भूख, ये लालसा... बहुत कुछ खो जाने के अहसास से घबराकर अब हर क्षति की पूर्ति चाहता हूँ - बीत गए समय की, आधी-अधूरी वासनाओं की... हुआ को अनहुआ करने की कोशिश, और क्या...! छूट जाना चाहता हूँ, हर उस बंधन से जो आलिंगन नहीं बन पाया! मुक्त हो जाना चाहता हूँ। रिश्तों की दुनिया में बँधुआ मजदूर बनकर रहना नहीं चाहता, संबंधों को ढोना नहीं, जीना चाहता हूँ... क्या ये चाहना बहुत ज्यादा, बहुत गलत है? सवालों के नागफनी चारों तरफ उगे रहते हैं और मैं इस बियावान में भटकता रहता हूँ। एक तरफ समाज है, इसके नियम-कानून, मोटी-मोटी पोथी और इसकी बूढ़ी, जर्जर रूढ़ियाँ, दूसरी तरफ एक अकेला मन, जो बस जीना चाहता है, जबतक जीवित है, जीना चाहता है...

मुख्तसर-सी बात है - जीवन को भोगना चाहता हूँ अब - स्वच्छंद होकर। संबंध के नाम पर एक और कारावास नहीं चाहता, रिश्तों की गुलामी नहीं चाहता। हर कोई आलिंगन बनने के बजाय हथकड़ी क्यों बन जाता है! प्यार के नाम पर एक नागपाश - वजूद को जकड़कर, पेंच कसकर साँस-साँस के लिए मोहताज करता हुआ...

अपनी सोच में शायद मैं बहुत दूर निकल आया था। दामिनी ने बाँह पर हल्के से छुआ तो खयाल आया। वह शायद मुस्करा रही थी - मेरी बीमारी तुम्हें भी लग रही है, जागकर सपने देखने लगते हो। अच्छा अशेष, इतना क्या सोचते हो? उसकी हल्के नशे की खुमार में डूबी आवाज जल तरंग की तरह हवा में बिखरकर खो गई थी। मैं देरतक उसकी मृदुल ठुनक अपने भीतर महसूस करता बैठा रह गया था। कभी-कभी किसी बहुत भरे हुए-से क्षण में कुछ कहने की इच्छा नहीं होती। लगता है, जो अनुभव के स्तर पर जी रहे हैं, उसे शब्दों से दरकाकर नष्ट न कर दें। कुछ ऐसी ही मनःस्थिति में था इस समय। हवा में फूलते रात रानी के साथ दामिनी की हल्की, मीठी देह गंध थी - मिली-जुली, मगर मैं उनके पार्थक्य को समझ सकता था, अनुभूति के किसी अनाम स्तर पर। सुगंध का भी एक चेहरा होता है, बहुत पारदर्शी, मगर होता है...

दामिनी ने अचानक पूछा था, तुमने ताजमहल देखा है न अशेष? मेरे हाँ में सर हिलाने पर उसने न जाने कैसी इच्छा भरी आवाज में कहा था - एकबार मैंने भी देखा था, चाँदनी रात में! स्कूल टूर पर गई थी। कैसा लगा था? मेरे प्रश्न पर उसके स्वर में जैसे सपने घिर आए थे - अद्भुत - एक नीली नदी के पहलू में सिमटी हुई प्यार की अनोखी कहानी - प्रतीत होता है, ख्वाब और मुहब्बत को संगमरमर में गूँथकर समय के सीने पर एक तस्वीर की तरह जड़ दिया गया है - हमेशा-हमेशा के लिए, एक पूरे काल खंड और उसकी जीवंत अनुभूति के साथ...

प्यार वहाँ का एक ठहरा हुआ रोज का मौसम है। वहाँ कोई हो और प्रेम में न हो, ये संभव नहीं लगता। कहते हुए दामिनी की आँखों में जैसे सपनों की मृदुल क्यारियाँ खिल आई थीं, नर्म, चटकीले फूलों से भरी हुईं... मधु की बूँद की तरह उसके शब्द मेरी कानों में टपकते रहे थे, वह स्वप्न बुन रही थी - मीठी, रंगीन सलाइयों से -

ताज प्रेम के होने के साक्ष्य में खड़ा है, उसका होना एक तरह से प्रेम के होने -निरंतर बने रहने का एक शाश्वत प्रतिश्रृति-सा है... उसे देखकर आश्वासन मिलता है - दुनिया के खूबसूरत होने का, उसके बने रहने का - बहुत आगे तक... जरा सोचो तो, कहते हुए दामिनी की आँखें विस्फारित हो चली थीं - कभी ये ढह गया तो... उफ्! ताजमहल का खंडहर प्रेम का सबसे बड़ा दुःस्वप्न है...

मैं अब भी आँखें मूँदे उसे चुपचाप सुनता रहा था। उसे सुनना या देखना एक तरह से कविता को जीना था - उसकी पूरी नजाकत और रवानगी के साथ... कुछ क्षणों के लिए उसके चुप हो जाने के बाद भी जैसे हवा में उसकी आवाज के मुलायम रेश बचे रह गए थे - पारदर्शी फूलों की तरह तैरते हुए...

न जाने कितनी देर बाद उसने फिर बोलना शुरू किया था, कहीं बहुत दूर से - शायद वह फिर वहीं लौट गई थी - अपने बचपन में, अपनी माँ के पास! मैं अपनी मुट्ठी में उसका हाथ समेटे उसकी हल्की हरारत को महसूसता रहा था, जैसे किसी डरी हुई चिड़िया की लरज... वह कह रही थी - मैं सुन रहा था, यही उसके साथ होना था - सही अर्थों में! ऐसे क्षणों में वह मुझसे इससे ज्यादा की कोई अपेक्षा भी नहीं रखती है, जानता हूँ। कोई हो जो संवेदना के स्तर पर साथ हो, संग-संग बहे दूरतक, मगर खामोशी से...

वह कह रही थी, उस दिन चाँदनी रात में ताजमहल को देखते हुए मैं पहली बार समझ पाई थी - हमारा घर भी एक ताजमहल की तरह है, जहाँ मेरी माँ के प्यार को चेहरा नहीं मिला था, वरन् उनका यकीन दफ्न हुआ था - उनके जीते जी ही! न जाने किस देश की थी माँ, कहाँ से आई थी। मैंने बहुत बार पूछा था उनसे, मगर न जाने क्यों वह इस विषय में कुछ भी कहना नहीं चाहती थीं। हर बार चुप रह जाती थी। मगर एकबार एक कहानी सुनाते हुए वे अचानक रो पड़ी थीं। आज समझ पाई हूँ, इतने सालों के बाद कि वह कहानी उनकी ही थी। उस कहानी की राजकुमारी मेरी माँ ही थीं। अपने माँ-बाप की इकलौती संतान जो बहुत प्यार और नाजों से पली-बढ़ी थी, एकदिन अपने माँ-बाप और प्रियजनों को छोड़कर अपने प्रेमी का हाथ पकड़कर उसके साथ सुदूर देश में चली आई थी।

पीछे छूट गए थे उसके सारे सपने और प्यार, दुलार की एक भरी-पुरी दुनिया। अपने महल से चलते समय उसके पास उसके प्रियतम का प्यार, विश्वास और वादों का ही एकमात्र संबल था। उन्हीं पर निर्भर होकर वह उतनी दूर चली आई थी। मगर अपने देश पहुँचते ही उसका प्रेमी उसे एक कारावास में डालकर कहीं चला गया था।

अब राजकुमारी उस कारावास में रातदिन अकेली रहती और अपने दुर्भाग्य पर आँसू बहाती। वह उस देश की बोली नहीं जानती थी, उसे वहाँ का खाना भी नहीं रुचता था। उसका रंग दूध में घुले केसर की तरह था और वह गाती कोयल की तरह थी। मगर उस देश के लोग गहरे श्याम वर्ण के थे तथा हमेशा कौओं की तरह कटु बोलते थे। वे सभी उसके रूप, रंग और गुण को घृणा और संशय की दृष्टि से देखते थे। कोई उससे बोलता भी नहीं था। यह सब तो वह शायद सह भी जाती, मगर उसके दुख का चरम ये था कि उसका वह प्रेमी जिसके लिए उसने अपना लगभग सबकुछ छोड़ दिया था, भी उससे बोलता नहीं था। वह अछोर चुप्पी की एक काली कोठरी में कैद थी और इसी कैद में रातदिन घुट-घुटकर राजकुमारी एकदिन स्नेह और साहचर्य के अभाव में अंततः मर ही गई...

कहते हुए माँ जैसे राजकुमारी की उसी मौत से होकर गुजर रही थी। उसदिन उनके साथ मैं भी खूब रोई थी। शायद मुझे भी उनकी नियति का आभास हो गया था। मैंने माँ की ओर बेआवाज बढ़ती मौत के कदमों की आहट न जाने कैसे सुन ली थी। मैं अब देख सकती थी, गहरे आतंक और भय के साथ - माँ की ओर शनैः-शनैः बढ़ती आसन्न मृत्यु को... कितना सहम गई थी मैं उसदिन... माँ को छोड़ ही नहीं रही थी किसी तरह, कसकर लिपटी हुई थी उनसे। दामिनी की आवाज में अजीब कँपकँपी भरी हुई थी। वह जैसे बिल्कुल अपने कल में हो गई थी - उसकी पूरी भयावहता को शिद्दत से जीती हुई। मैंने उसकी अँगुलियाँ अपने बाएँ हाथ की मुट्ठी में समेट ली थीं। वे पसीने से नम थीं, हल्के-हल्के लरजती हुईं।

मेरी छुअन की आश्वस्ति धीरे-धीरे उसके स्वर में उतर आई थी। थोड़ी देर ठहरकर सहज आवाज में उसने कहा था - शायद उसी दिन माँ ने कहा था, इस तरह से कि मैं न सुन पाऊँ - कभी-कभी मृत्यु जीवन से बेहतर विकल्प होती है... मैं उनकी बात का तात्पर्य समझ नहीं पाई थी, मगर न जाने संवेदना के स्तर पर क्या महसूस किया था कि और-और उदास हो गई थी। हवा और समंदर के निरंतर शोर के बीच सन्नाटे के कफन में लिपटी माँ म़ुझे उस निसंग द्वीप की तरह प्रतीत हुई थीं जिसके चारों तरफ आकाश की अनंत चुप्पी और समंदर के अनवरत हाहाकार के सिवा कुछ भी नहीं होता। यह निर्जन द्वीप जितना बाहर होता है, उससे कहीं ज्यादा अंदर होता है। एक डूब - सतत डूब - बनी रहती है उसके अस्तित्व में, उसका सफर नीचे की ओर अधिक होता है ऊपर के बनिस्बत!

दामिनी की आवाज में दबी हुई सिसकियों का हल्का कंपन था, उसके आगे के शब्द पानी में घुल-से गए थे। वह शायद फिर रोने लगी थी। हमारे सामने बीयर की न जाने कितनी खाली बोतलें इकट्ठी हो गई थीं। उषा कई बार खाने के लिए इस बीच पूछ चुकी थी। जाने रात का क्या बजा था उस समय...

दामिनी ने अचानक अपनी बोझिल पलकें उठाई थीं - अशेष, न जाने शादी के कितने वर्षों बाद पापा ने एकदिन बिल्कुल निर्लिप्त और सहज भाव से माँ से कह दिया था कि वे उनसे प्रेम नहीं करते! ऐसा कहते हुए उनमें जरा भी हिचकिचाहट या ग्लानि नहीं थी। मगर सुनकर माँ शर्मिंदा हो गई थीं - इसी प्यार के लिए कभी अपने रिश्तों, खुशियों और सपनों की एक भरी-पूरी दुनिया छोड़ आई थी...

उसदिन माँ के लिए पापा ही नहीं - उनकी यकीन की पूरी दुनिया, उनके भगवान - सबकुछ झूठा पड़ गया था! कहीं कोई फर्क नहीं पड़ा था - सबकुछ पहले की तरह चलता रहा था, बस एक यकीन - बहुत मासूम यकीन, हमेशा के लिए खत्म हो गया था। पापा ने अपने वर्षों के रूखे व्यवहार, अवज्ञा को उसदिन एक स्पष्ट नाम दे दिया था। मेरे लेखे यह दुनिया का क्रूरतम अपराध था, मगर इसके लिए आजतक कोई सजा नहीं बनी। कितनी अजीब बात है... दामिनी सामने की मेज पर सर रखकर ढह गई थी - अशेष, भगवान होते हैं न...?

उस दिन के बाद मैंने दामिनी में सूक्ष्म बदलाव देखे थे। जाहिर तौर पर वह वही थी - पहले की तरह, मगर कहीं कुछ अलक्ष्य दरक गया था। मैं कह नहीं सकता था क्या और कहाँ, मगर महसूस सकता था। उसकी आँखों की पिघलती हुई पुतलियों में, तरल चावनी में कुछ अनमन, उदास और तटस्थ हो चला था। उसकी मुस्कराहट की उजली मसृन धूप में वह पहलीवाली ऊष्मा नहीं बची थी जो मुझे कभी नर्म हरारत से भर देती थी। मेरी बंद मुट्ठियों से कुछ बहुत खूबसूरत, अनमोल निःशब्द झर रहा था। मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा था इसके लिए, मुझे मालूम नहीं था, मैं क्या कर सकता हूँ। यकीन काँच की तरह नाजुक होता है, दरक जाता है हल्के टकोर से। शायद कुछ ऐसा ही हुआ था दामिनी के साथ। कहीं से चोट खा गई थी। एक समय के बाद निराश होने लगा था मैं, अंदर कुछ कसक रहा था रातदिन...

दामिनी के अबाध समर्पण की घड़ियों में न जाने मुझे ऐसा क्यों प्रतीत होता था कि सिर्फ द्वार ही खुले हैं, इन कपाटों के पीछे पूरा घर खाली है। वहाँ कोई नहीं रहता, अशरीरी उच्छ्वासों के सिवा। ठीक जैसे थाईलैंड के मंदिरों में होता है - एकबार देखा था मैंने जब वहाँ घूमने गया था - वहाँ सिर्फ मंदिर होते हैं, अंदर देव मूर्तियाँ नहीं!

सुरों के आरोह-अवरोह-सी नर्म देह की रेखाओं में प्राणों का संकेत नहीं, हृदय का स्पंदन नहीं। मैं उसके महकते बालों में अपना चेहरा छिपाता, वह अधीर आग्रह से मेरा चेहरा उठाती - देखो अशेष, मेरी आँखों में देखो, आज मैं अपनी पलकों के आँचल में तुम्हारे लिए ढेर-सा आकाश चुन लाई हूँ। मुझे उसकी आँखों के गुलाबी कोयों में निमंत्रण के मादक संकेत मिलते, इच्छाओं की रसमसाती झील दिखती। वह अधैर्य अपनी लंबी बरौनियाँ झपकाती - ठीक से देखो, यहाँ मैं हूँ, तुम हो, तुम्हारा सपना है। हमारा वह घर है जिसकी नींव को ईट-पत्थरों की जरूरत नहीं। मैं उसके गुदाज सीने में अपना चेहरा धँसा देता - इन हसीन वादियों में मेरा घर है - नर्म, मुलायम कबूतरों की-सी हरारत भरी... और ये तुम्हारी जाँघें- मेरे एकमात्र गंतव्य की ओर जानेवाली उजली, चिकनी सड़कें... वह गहरी साँस लेकर अपना चेहरा फेर लेती - तुम कब मुझ तक पहुँचोगे अशेष, मुझे तुम्हारा कितना इंतजार है, बहुत अकेली हूँ...

उसकी देह की गर्म झील में डूबता-उतराता मैं सोच नहीं पाता, अब मुझे और कहाँ पहुँचना है! मैं उसके कान की लवें सहलाता, गालों के नर्म गड्ढों में फिसलता... मैं क्या कुछ नहीं पा गया था! वह कहती, हमारे बीच से यह देह की मिट्टी हटा दो। दीवार बनी हमेशा खड़ी रहती है, एक-दूसरे तक पहुँचने नहीं देती।

पागल थी वह। अपने शरीर से परे होकर न जाने अब क्यों सोच और अहसास बनकर जीना चाहती थी। कहती थी, इस हाड़-मांस के मीना बाजार में बहुत अकेलापन है, जैसे राम का वनवास... वैदेही के हिस्से का जंगल उन्होंने अपने राजप्रसाद में जिया था... ये उनका सबसे बड़ा वनवास था। एक राज की बात बताऊँ? औरतें मन की अतल गहराई में किसी ऐसे ही राम को चाहती हैं जो कृष्ण की तरह महारास का साथी न होकर उसके जीवन के निसंग वनवासों का साथी हो, फिर चाहे ये वनवास उसी के हाथों क्यों न मिला हो... देह के स्वाद में डूबकर कोई मन के अंतर में भीगना ही नहीं चाहता...

मैं समझने की कोशिश करता, मगर समझ नहीं पाता। पुरुष हूँ, देह और मन- दोनों स्तर पर एकसाथ जी सकता हूँ और कोई द्वंद्व भी महसूस नहीं करता। मन मीरा बनकर वैराग्य की माला फेरता है तो तन राधा की तरह महारास में मगन हुआ रहता है। मैं उसे समझाने की कोशिश करता - मगर इसमें गलत क्या है! देह ही तो प्यार की जमीन है। वह उदास हो जाती - मगर यही उसकी हद तो नहीं होनी चाहिए... तुमलोग इसी जंगल में क्यों भटकते रहते हो!

सोने के मृग के पीछे तो हमारे राम भी भटक गए, फिर हम माटी के पुतले क्या हैं! फिर, तुम भी तो भटकती हो... मैं उसे अपने ऊपर खींच लेता। वह सहज मुस्कराती -प्यार में सबकुछ सही होता है। गलत तो वह होता है जो प्यार में नहीं होता।

कभी-कभी मुझे उसका अपनी इच्छाओं के संदर्भ में इतना मुखर होना खल भी जाता था। कहता था, अपनी वासना को लेकर तुममें कोई वर्जना, कोई इनहिबिशन नहीं... वह बिंदास हँसती - यू हिप्पोक्रेट मैन, हर जगह अपना ही आधिपत्य चाहते हो, घर में भी, बाजार और बिस्तर पर भी... औरत तुम्हारी मर्जी की करती रहे हमेशा और अपनी इच्छा या खुशी भी जताए तो तुमलोगों को नागवार गुजरती है, एक बात निकाल दो अपने दिमाग से कि औरत सिर्फ भोग्या है। वह भी भोगती है! फर्क बस इतना है कि वह तुमलोगों की तरह संभोग में अपने अहम के साथ अकेली नहीं रहना चाहती, अपने साथी का दैहिक और मानसिक स्तर पर बराबर का साथ चाहती है, जितना लेती है, उतना, बल्कि उससे भी ज्यादा देना चाहती है! सम+भोग तो सही अर्थ में वही करती है... वह शब्दों को रुक-रुककर उच्चारती है - सबकुछ अकेले हड़पने के चक्कर में तुम मर्द कितने अकेले रह गए हो...

इतनी सहजता से वह अपने विगत संबधों की लंबी सूची मुझे गिनाती कि कभी-कभी मैं अपनी कुढ़न छिपा नहीं पाता, पूछता, तुम्हें ग्लानि नहीं होती? वह झट जोगन बन जाती - जब तक स्त्री अपनी इच्छा से किसी का वरण नहीं कर लेती, कुँवारी ही रहती है। वैसे, माटी की देह का क्या है, टूटता-फूटता रहता है... और फिर एक बात कहूँ, इस मामले में स्त्री लंबी दौड़ की खिलाड़ी होती है, वह पुरुष का आखिरी प्रेम होना चाहती है। पुरुष तो पहला प्रेमी - वह भी देह के संदर्भ में - होकर ही खुश हो लेता है। कितना सतही होता है उसका ये पाना, वह कभी समझ ही नहीं पाता!

उसकी उपालंभ से भरी आँखें मुझे गहरे तक दाग गई थी। ऐसे मौकों पर वह मुझसे कितनी दूर हो जाया करती थी - समानांतर दौड़ते नदी के दो किनारों की तरह, जहाँ बाँह भर की दूरी जीवन भर का अभाव बना रहता है।

एकबार बिस्तर पर रोम-रोम से रीत गई-सी पड़ी-पड़ी वह शिकायत कर बैठी थी - मेरा सबकुछ जस का तस रह गया है अशेष। तुम मुझे लेते क्यों नहीं? मैं तुम पर पूरी तरह खत्म हो जाना चाहती हूँ। तुम मुझे सूद-मूल में कमा लो, मैं तुमपर पाई-पाई खर्च हो जाऊँगी... जानते हो टैगोर क्या कहते हैं - दूँगा उसे जिसे बिना मूल्य दे सकूँगा - हर औरत बस यही चाहती है।

मेरे द्वारा उपहार में लाई हुई मोतियों की माला अपने गले में डालते हुए उसका यह कहना अजीब विरोधाभास से भरा हुआ था। वह जैसे विसंगतियों का एक गुंजल थी। भोग्या बनी स्वयं जीवन को हर स्तर पर पूरी शिद्दत से भोगती वह न जाने किस क्षण संन्यास की विरक्ति से भर उठेगी, कहना कठिन था। उसका साहचर्य मुझे सुख के साथ असुरक्षा की गहरी कुरेदती भावना से रातदिन ग्रसित रखता था।

दूसरी तरफ तरफ उमा थी और उसकी अंतहीन शिकायतें, जो गलत भी नहीं थीं। कौन था गलत यहाँ - मैं, उमा या फिर दामिनी...! शायद हममें से कोई भी नहीं। ये हालात थे... गलत समय या स्थिति में सही भी गलत ही हो जाता है। दामिनी कहती है, प्यार कभी गलत नहीं हो सकता। मैं सोचता हूँ, प्यार की अभिव्यक्ति तो गलत हो सकती है...

मैंने बातों के छिलके उतारने छोड़ दिए हैं - इससे कभी कुछ हासिल नहीं होता। जीना चाहता हूँ, खुश होना चाहता हूँ... इसमें कहाँ क्या गलत है, इसकी विवेचना दुनिया करती रहे। अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते हुए हम दूसरों के रास्ते मे आ जाते हैं... अनजाने ही। दुश्मनी नहीं करते, मगर दुश्मन बन जाते हैं, बिना पाप किए पापी हो जाते हैं... मैं उमा का कसूरवार था, दामिनी का भी, मगर बिना कसूर किए... बस, उनकी राह में आ गया! पाप-पुण्य जैसा कहीं कुछ होता भी है? ये हालात होते हैं और विवशताएँ... मैं अक्सर सोचता हूँ, जब उमा के सवाल कचोटने लगते हैं या फिर दामिनी के शब्द तकलीफ पहुँचाते हैं। प्यार खुशियाँ लाता है, मगर किस कीमत पर... खुशियों की ही कीमत पर! घर फूँककर उजाला करना...।

दामिनी क्या चाहती है, मैं समझ नहीं पाता। वह अपने जिस्म और रूह के बीच उलझी रहती है - उसे दोनों चाहिए - पूरा-पूरा! नशे में अपनी जपा फूल बनी आँखों को झपकाकर कहती है - देह साध्य नहीं, सिर्फ साधन होनी चाहिए... मैं इन तर्कों के मकड़जाल में नहीं उलझना चाहता, जो महसूस करता हूँ, देखता हूँ, छूता हूँ, उसे सच मानता हूँ। ये हाड़-मांस की स्थूल दुनिया मेरे लिए सच है। देह से परे क्या रह जाता है... मैं हवा को मुट्ठी में बाँधने की ख्वाहिश नहीं रखता। निरगुन कोन देस को वासी... एक से प्यार करने का अर्थ दूसरे से नफरत करना नहीं होता। सीधे-सादे शब्दों में मेरे लिए प्यार का जो अर्थ है, वह मैं उमा से करता हूँ और दामिनी से भी करता हूँ। यदि इस बात को समझने, स्वीकार करने की सामर्थ्य दामिनी या उमा में होती तो शायद मैं उन्हें यह सच बताने की जुर्रत भी कर लेता। झूठ बोलने के लिए हम अक्सर विवश किए जाते हैं, सच सुनना कौन चाहता है...

शायद मैं डिफेंसिव हो रहा हूँ... क्या करें, स्वयं को बचाना सेल्फ इमेज और एस्टीम के लिए जरूरी होता है। ईगो - अपने अहम की रक्षा! अपराधबोध से मुक्त होने की कवायद, ताकि रातों को चैन से सोया जा सके।

दामिनी से एकबार स्पष्ट पूछा भी था, क्या उसे मर्दों से घृणा है। उसने कहा था, मर्दों से नहीं, मगर हाँ, शायद मर्दों की टिपिकल प्रवृत्ति, जो स्त्री विरोधी है, से घृणा करती हूँ। उसके पास अगर औरतों से ज्यादा - ज्यादा कह रही हूँ - बेहतर नहीं - कुछ है तो बस अहंकार का वह टोकरा, जिसकी वजह से वह स्वयं को सिर्फ पुरुष होने के नाते स्त्री से श्रेष्ठ समझता है। दोनों - स्त्री और पुरुष - अपनी-अपनी जगह अन्याय का शिकार होते हैं, मगर जहाँ स्त्री-पुरुष संबंध की बात है, वहाँ जरूर पुरुष ने ही स्त्री के साथ अन्याय किया है। सभ्यता के हम रोज नए-नए सोपान चढ़ रहे हैं, मगर अंदर वही जंगल बना हुआ है और उसका वही जंगली राज - माइट इज राइट... तुम अपनी सभ्यता के इतने लंबे सफर के पद-चिह्न हम औरतों की देह पर देख सकते हो - नखों, खुरों से लेकर सिगरेट से जलाए गए धब्बों तक...

कहाँ, मेरी आँखें तो इतना सबकुछ नहीं देख पातीं... मैं उसे छेड़ता हूँ, वह बुरा मान जाती है - आँखें तो होती ही हैं अंधी, ये तो मन है जो देखता है। वह मन पैदा करो, इतना स्थूल मत बन जाओ कि तुममें और कद्दू, लौकी में कोई फर्क ही न रह जाय...

कभी-कभी मुझे दामिनी के जीवन की ट्रेजेडी भी बहुत कृत्रिम, एक हदतक रोमानी प्रतीत होती थी। वाइन पीकर रोना भी एक तरह की ऐय्याशी होती है, किसी-किसी के लिए समय गुजारने का एक हसीन तरीका... सुनकर दामिनी इसबार नाराज नहीं हुई थी, बस धीरे से कहा था, किसी जलपक्षी की तरह गंभीर और उदास आवाज में -

इतना जजमेंटल क्यों हो रहे हैं! दुनिया में बहुतों के दुख होंगे - बहुत ज्यादा, मगर इसी से मेरे दुख तो कम नहीं हो जाते न? जब कोई भूख से रोता है, कोई किसी और बात के लिए रोता है। दुख को हम आकार या वजन में क्यों बाँटने लगते हैं? यहाँ कोई कंपटीशन नहीं हो रहा है, इस मामले में किसी को मुझसे आगे निकलना हो तो शौक से निकले...

मुझे कौतुहल होता था, अपनी माँ का जीवन, उनका अनुभव देखकर भी दामिनी किस तरह अब भी प्यार पर यकीन किए बैठी थी। उसके लिए तो अबतक सब झूठ हो जाना चाहिए था। सुनकर वह हँसी थी - तुम नहीं समझोगे, एक तरफ मेरे पापा थे, मगर दूसरी तरफ मेरी माँ भी तो थीं! प्यार होता है, उसपर लोग अपना सबकुछ कुर्बान कर देते हैं, यह सच्चाई भी तो मेरी आँखों के सामने ही थी न? अशेष, अविश्वास में जीने से अच्छा है विश्वास के हाथों मारा जाना, कभी कहा भी था शायद तुमसे। वह गजल सुनी है - 'हर जर्रा चमकता है अनवर-ए-ईलाही से, हर साँस ये कहती है, हम हैं तो खुदा भी है...' ...तो प्यार है, यकीन है...

ऐसा कहते हुए उसकी आँखों में ध्रुवतारा-सा कुछ अडोल चमक आया था। न जाने क्यों मैंने अपनी नजरें झुका ली थीं उस क्षण - उनका सामना नहीं कर पाया था।

उसदिन हम आइनोक्स में फिल्म देखने गए थे। किस्मत से उसदिन लगभग पूरा हॉल ही खाली था। थोड़ी ही देर में दामिनी ऊब गई थी - क्या बकवास फिल्म है अशेष! ऐसी फिल्म दिखाने लाए ही क्यों?

मैं तो जानबूझकर ही लाया था, मेरी शरारत भरी मुस्कराहट से वह चौंकी थी -

क्या मतलब?

मतलब... नहीं तो ऐसा खाली हॅाल कहाँ से मिलता... मैं उसके बहुत करीब होकर बैठा था।

बदमाश कहीं के... उसने नाराजगी दिखाई थी, हँसते हुए...

उसके बाद आधी फिल्म छोड़कर ही हम मिरामार बीच चले गए थे। पैदल ही, माँडवी के किनारे-किनारे। शाम के समय पूरी नदी रँगी हुई थी, शहर भी - आकाश के टेसुआ रंग में। सूरज थोड़ी देर पहले ढला था, हवा अब ठंडी होने लगी थी। दूर नदी के सीने पर तैरते हुए कैसिनो की नीली बत्तियाँ एक-एककर जल उठी थीं। पानी में नावों की परछाइयाँ लंबी होकर डोल रही थी। सड़क के किनारे सैलानियों की भीड़ जमा थी। पास ही लगे बाजार में बिकते अलफोंसों आम की महक से हवा तर हो रही थी। गर्मी की एक खूबसूरत शाम, गंध और रंग भरी... मुझे सबकुछ बहुत सुखद लग रहा था।

हम जाकर मिरामार बीच पर बैठ गए थे। चारों तरफ ऊँचे, लंबे पेड़ों की कतारें और उनके चीरे, महीन पत्तों के बीच से झाँकता हुआ रंगभरा सँझाता आकाश... दामिनी ने उसदिन तसर सिल्क की हल्की नीली साड़ी पहनी हुई थी। ढीले जूड़े में पीले चंपा की एक अधखिली कली। पास बैठने पर उसकी मीठी गंध मेरे नासारंध्र से टकराई थी।

- हम दोनों आज साथ-साथ कितने खुश हैं न दामिनी... मैंने उसकी हथेली खोलकर उसमें एक मुट्ठी रेत उँड़ेली थी।

- हाँ, उसने वह रेत अपनी मुट्ठी अलगाकर धीरे-धीरे हवा में उड़ा दी थी - काश! ये समय यूँ ही ठहरा रह जाए...

- दो इनसान एक साथ इतना खुश रहते हैं, और कभी-कभी क्या हो जाता है कि वही इनसान किसी और के लिए असह्य हो उठते हैं...

- कहीं कुछ गलत हो जाता है। बल्कि मुझे तो लगता है, कोई कभी गलत नहीं होता, ये हालात होते हैं या फिर हमारी अपेक्षाएँ जो गलत होती हैं... इनसान बुरा भी शायद ही होता है, हाँ, भिन्न जरूर होता है और अपने से भिन्न को न सह पाने की असहिष्णुता ने ही तो पूरी दुनिया को हमेशा से तनाव में डाल रखा है। किसी को हम उसी रूप में स्वीकार नहीं कर पाते जो वह है। रिश्ता जुडते ही हम उसे बदलने में लग जाते हैं, वह बना देना चाहते हैं जो वह नहीं है। और फिर इस गलत कोशिश में न खुद खुश रह पाते हैं, न औरों को ही रहने देते हैं। कोई ये क्यों नहीं सोचता कि अगर पूरी दुनिया एक जैसी होती तो सबकुछ कितना उबाऊ और एकरस हो जाता...

एक क्षण के लिए रुककर वह रेत पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींचती रही थी, किसी सोच में डूबी हुई-सी, फिर मेरी आँखों में झाँका था, अपनी आँखों के ढेर सारे सवाल लिए -

यहाँ रिश्ते के नामपर ये हिंसा क्यों होती है अशेष, जिससे हम प्यार करने का दावा करते हैं, उसे ही तोड़ डालते हैं, धीमे जहर से मार डालते हैं, उसकी हर खुशी, उपलब्धि से ईर्ष्या करते हैं, चाहते हैं, वह वह न रह जाय, कोई और बन जाय - जो वह नहीं है। पापा ने यही किया था मेरी माँ के साथ। माँ का अपना व्यक्तित्व था जिसे वे बदलकर अपने मन मुताबिक नहीं बना पाए। औरत का कुछ अपना हो, निजस्व हो, यह मर्द बर्दाश्त नहीं कर पाता, चाहता है, औरत उसकी परछाईं भर बनकर रह जाय। शायद इसीलिए पापा माँ से चिढ़ने लगे थे। उन्हें जब बदल या झुका नहीं पाए, तब उन्हें पराजित करने का दूसरा तरीका ढूँढ़ निकाला - उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज कर उनके मर्म और आत्मसम्मान पर चोट पहुँचाकर... उनके किसी सवाल का जबाव देना तो दूर, उन्होंने माँ से बोलना ही छोड़ दिया था।

माँ इस अपमान और गहरी अवज्ञा को सह नहीं पाईं... अंततः टूट ही गईं...

एक छोटे-से विराम के बाद वह बोली थी, अवसन्न आवाज में - जनते हो अशेष, यह दुनिया की सबसे बड़ी और क्रूरतम सजा है। यही सजा पापा ने मेरी माँ को दी थी। कुछ घंटे या एक दिन में नहीं, एक उमर तक उन्हें तिल-तिलकर मारा था - हर रोज, हर क्षण...

उसी मौत के साक्ष्य में मेरे बचपन की दूधिया हँसी घुलकर रह गई है अशेष! अपनी निरंतर मरती माँ को देखते हुए मैं कौन-सा सपना देख सकती थी। नहीं होता था मुझसे कुछ भी - हँसना, बोलना, मुस्कराना... माँ मेरे लिए गाती थी, मुस्कराती थी, मगर उनसे चुपचाप रिसते दुख मुझतक पहँच ही जाते थे, अदृश्य, अरूप वन्या की तरह।

एक दिन - जब मैं कुछ बड़ी हो गई थी - माँ से कहा था - माँ, हमेशा हँसने की जरूरत नहीं। कभी रो लिया करो, इट्स ओके - सच! उसदिन माँ ने मुझे किन गीली नजरों से देखा था, जैसे चोरी करते हुए रँगे हाथों पकड़ी गई हों। उनकी झेंप को मिटाने के लिए मैं एकबार फिर से अनजान बन गई थी।

देर शाम तक समुद्र तट पर बैठकर उस दिन हम दामिनी की कॉटेज में लौट आए थे। तबतक दामिनी का मूड बदल गया था। अपनी माँ के प्रसंग पर अक्सर दामिनी के साथ यही होता था, वह अपने अतीत में देरतक के लिए गुम जाती थी। कमरे में अपने बिस्तर पर लेटकर वह देरतक बोलती रही थी, छोटी-मोटी बात... मैंने फ्रिज से रेड वाइन निकाल ली थी। साथ में उषा मछली के कटलेट्स रख गई थी। यह वह बहुत अच्छा बनाती थी। खाते हुए मैंने गौर किया था, दामिनी न जाने कब चुप हो गई थी। जैसे उसे झपकी आ गई हो।

उसकी बातें खत्म होने के बाद भी देरतक कमरे में चक्कर काटती रही थीं, जैसे किसी मंदिर के गर्भ-गृह में जलकर बुझ चुकी धूप की गंध...! मैं उसी में डूबा बैठा रहा था, कुछ कहने की इच्छा नहीं हो रही थी। मैं चाहता था, आज दामिनी अपने बंद मुट्ठी-से मन से निकलकर आकाश हो जाय - उन्मुक्त, स्वच्छंद और असीम! संकुल हृदय दिगंत का विस्तार पा ले, कहीं बँधा न रहे, घिरा न हो... ये उसके कन्फेशन का दिन था - सबकुछ-सबकुछ कह लेने का, सुना देने का दिन। उसने ही मुझसे यह माँगा था - किसी वरदान की तरह! मैंने स्वेच्छा से उसे दिया भी था। अगर वह खुश हो लेना चाहती है तो जरूर हो ले, रोकर ही सही!

मेरे खयालों से अनजान उसने फिर कहा था - मैंने माँ की डायरियाँ देखी थी - तुम्हें बताया था। खूबसूरत, रूहानी कविताएँ लिखती थीं वे। अपनी अनकही। उनकी मौत के कुछ दिनों बाद मैं उनका कमरा साफ कर रही थी। अप्रैल की एक खुशनुमा सुबह थी वह - चटकीली धूप और नर्म-मुलायम हवा से लबरेज। वह हमेशा का बोझिल-सा कमरा यकायक हल्का-फुल्का हो आया था। अलगनी पर माँ की हल्की पीली सूती साड़ी का लाल पाड़ झिलमिला रहा था। श्रृंगार मेज पर उनकी चूड़ियाँ बेतरतीब बिखरी पड़ी थीं। न जाने मन में क्या आया था कि मैंने आईने पर चिपकी उनकी लाल बिंदी उठाकर अपने माथे पर लगा लिया था और फिर चौंककर देखा था, मैं बिल्कुल अपनी माँ जैसी दिख रही हूँ! उस क्षण मैं रोना नहीं चाहती थी, मगर बस वही किया - देरतक रोती रही। कोई-कोई पल सिर्फ सच के लिए होता है। उसमें झूठ के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती। मैं अपने छद्म से थक गई थी, थोड़ी देर के लिए सही, अपने आप में होना चाहती थी, अपनी माँ की याद में होना चाहती थी - रोना चाहती थी...

माँ की देह पर पापा को बिलखते हुए देखकर मेरे आँसू सूख गए थे। अंदर विद्रोह और धिक्कार का ऐसा तीव्र बवंडर उठा था कि मैं उसमें आपाद-मस्तक ढँककर रह गई थी। अंदर का सच - घिनौना सच - मुझपर जाहिर था, इसलिए मैं उनके झूठ को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। क्या मृत्यु के उस क्षण में भी पापा को उन्हें सिर्फ छलना ही था। कम-से-कम आज तो माँ को यह सब नहीं मिलना चाहिए था!

अचानक उठकर दामिनी खिड़की पर खड़ी हो गई थी। बाहर आकाश का रंग बदल रहा था। हवा में आते हुए नए मौसम की गंध थी - बहुत नया, मगर वही पुराना, चिर परिचित... मैंने उस गंध को पहचानने की कोशिश की थी - गंध के भी चेहरे होते हैं, रंग भी! जैसे आम की फूलती मँजरी की गंध के साथ गर्मी की किसी दोपहरी, अमराई या बचपन में अपने ननिहाल में बिताई गर्मी की छुट्टियों की याद एकदम से ताजा हो उठती है - किसी जीवंत तस्वीर की तरह। ऐसा कि हाथ बढ़ाकर उन्हें छुआ जा सके!

न जाने मेरी उँगलियों के पोरों में उस क्षण जीवन का कौन-सा अनुभव स्पर्श बनकर धड़क रहा था जब दामिनी ने मुझे संबोधित किया था, जाने कहाँ से, यादों के किस गाँव से... एक चूर होती आवाज - काँच के किरचों की तरह - महीन, धारदार - पापा को और शायद वहाँ उपस्थित सभी लोगों को मेरा अपनी मृत माँ के सिरहाने यूँ निर्लिप्त और भावहीन होकर बैठी रहना आश्चर्य में डाल रहा था। दुख मनाना, शोक व्यक्त करना हमारे समाज में एक रस्म भी है, सामाजिक व्यवहार! सभी को, विशेषकर स्त्रियों को इसमें पारंगत होना ही चाहिए। वर्ना छी-छी होती है... अब दामिनी की आवाज में हँसी-सी घुल आई थी। वह कह रही थी - किसी ने मुझे सुनाकर कहा भी था - आजकल के बच्चे - सेल्फ सेंटर्ड, स्वार्थी... माँ-बाप की भी नहीं पड़ी है उन्हें - ऐसे अवसर में भी... उनकी बात पर किसी ने गहरा उच्छ्वास भरा था।

मुझमें उस वक्त एक गहरा आक्रोश और जिद भरी हुई थी। किसी का कुछ नहीं गया था, सब रस्म निभा रहे थे। दुनिया तो मेरी लुटी थी। मैं किसी भी स्तर पर उनसे- उन कृतिम और दिखावटी लोगों से अपनी माँ को बाँटना नहीं चाहती थी - रोकर भी नहीं। कैसे दो बूँद बहाकर मैं अपने अंदर से उनके दुख को कम हो जाने देती! अब जो था यही था मेरे लिए - माँ की थाती, माँ की निशानी - उनकी विरासत... मुझे सहेजना था उनको - एक पूरी उम्र के लिए!

डायरी के एक पन्ने में माँ ने लिखा था - समय की आँखों में हींग-हल्दी और पसीने से लिथड़ी हुई कामवालियों के लिए लालसा देखती हूँ और शर्म से गड़ जाती हूँ। ये वही समय है जिसके लिए मैंने अपनी सपनों और इच्छाओं की एक पूरी दुनिया छोड़ दी, जिसके प्यार को पाकर मैं स्वयं को दुनिया की सबसे अमीर औरत मानने लगी थी। समय से शादी करने के बाद मैंने किसी को लिखा था, मैंने अपने सबसे अच्छे दोस्त से शादी कर ली है। अब याद करती हूँ तो अपने ही भोले यकीन पर तरस आता है। कितनी मासूम थी, इस तरह से यकीन करना आता था।

ये पक्तियाँ पढ़कर मुझे भी शर्म महसूस हुई थी। माँ की स्थिति में होकर सोचना चाहा था। उनकी संपूर्ण आस्था और समर्पण का ये तो प्रतिदान नहीं होना चाहिए था! पापा से शादी करने के लिए उन्होंने लगभग अपने सारे ही रिश्ते ठुकरा दिए थे। ससुराल के अजनबी माहौल में पापा के सिवाय उनका कोई नहीं था। यहाँ की भाषा, संस्कृति, खान-पान - सभी कुछ माँ के लिए नया था। उस नए और अजनबी माहौल में व्यवस्थित और सहज होने के लिए उनको पापा के साथ और सहानुभूति की सख्त जरूरत थी। मगर पापा ने उसी कठिन समय में माँ का साथ छोड़ दिया था।

पापा के इस व्यवहार से माँ बिल्कुल अवाक रह गई थी। लोग विश्वासघात करते हैं, मगर इस आकस्मिकता से... माँ सह नहीं पाई थी, टूट गई थी एकदम से - अचानक! लोग झूठे निकलते हैं। मगर भगवान...? पापा माँ के लिए भगवान ही थे। उस उम्र में जब इनसान आदर्शवादी होता है और प्यार, यकीन जैसी खूबसूरत चीजों में भरोसा रखता है, माँ ने पापा की बातों और व्यवहार पर यकीन करके उन्हें अपना भगवान ही मान लिया था। अंधविश्वास था उनका उनपर। वे बहुत भावुक और रोमांटिक प्रकृति की थीं, शायद मन से अकेली भी। उनके बहुत बड़े घर में सुख-सुविधाएँ तो खूब थीं, मगर आत्मीयता की गरमाहट उतनी नहीं थी। उनके पिताजी बड़े आदमी थे, बहुत व्यस्त भी। माँ हमेशा सामाजिक कामों या किटी पार्टियों में उलझी हुई। बहुत बड़े अभाव से जन्मी थी उनके अंदर प्यार की गहरी भूख। अपने सारे सपनों, इच्छाओं-कामनाओं का आरोपण उन्होंने पापा पर कर दिया था। वे शायद अपनी हर अधूरी इच्छाओं की पूर्ति पापा से करना चाहती थीं। बहुत ज्यादा उम्मीदें वे अपने इस रिश्ते से लगा बैठी थीं। आखिर इसी संबंध पर उन्होंने अपना सबकुछ लगा दिया था। एक तरह से पूरे जीवन का निवेश ही।

समुद्र के किनारे चलते हुए जैसे वह हर बार अपने अतीत में चलने लगती थी। कई बार मैं यह देख चुका था। एकदिन बाघातोर समंदर के तट पर चलते हुए भी उसने कहा था - माँ का जीवन स्वप्न भंग के एक अंतहीन सिलसिले की तरह ही था - अछोर और यातना भरा! उनका हिसाब दिन, महीनों से नहीं लगाया जा सकता। दुखों के एक पल में न जाने कितनी सदियाँ होती हैं - कटती हैं, मगर नहीं कटतीं... इन्हीं छोटे-छोटे पलों से बना था माँ का जीवन, इसलिए लंबा था। उनके सिरे नहीं मिलते थे... उन्होंने अंततः काट ही लिया था अपना जीवन, मगर कोई पूछे कि कैसे... दामिनी चलते-चलते रुक गई थी, उसके पीछे उमड़ती हुई अबाध्य लहरें भी! कभी कोई क्षण जैसे तस्वीर-सा बन जाता है, स्मृति के फ्रेम में हमेशा के लिए जड़ जाने के लिए। यह क्षण भी कुछ ऐसा ही था। उसकी गीली आँखों का सूनापन देखकर अचानक इच्छा हुई थी, इस दुनिया को सिरे से बदल दूँ, सबकुछ तहस-नहस कर दूँ, यहाँ बहुत कुछ गलत होता है - यहाँ मेरी दामिनी को दुख पहुँचता है... कभी-कभी तुम मुझे क्या कुछ करने पर आमादा कर देती हो दामिनी...!

मेरी आँखों का मौन उसतक पहुँचा था या नहीं, कह नहीं सकता, मगर वह हल्की हो आई थी, बरसे हुए बादल की तरह। उसके गहरे कासनी आँचल में इस समय सारे आकाश का रंग था - चेहरे पर भी - अबीरी हो रहा था, न जाने किस सोच में... उसके चेहरे पर जल-बिंदुओं की तरह ठहरा हुआ उसका मन होता था - टल-मल - स्पष्ट... कितनी पारदर्शी थी वह - काँच के नाजुक गहने की तरह... उसे छूते हुए ध्यान रखना पड़ता था, कुछ चटक न जाय!

अपने बेतरतीब उड़ते बालों को एक जूड़े में समेटने का असफल प्रयास करते हुए वह एक पत्थर पर बैठ गई थी - ऐसा क्यों है अशेष कि हम हमेशा अपने अतीत या भविष्य में ही जीना पसंद करते हैं? वर्तमान जो सच है और हमारे सामने है, अदेखा रह जाता है...

- जो अप्राप्य है, वही लोभनीय है... पाया हुआ अपना आकर्षण खो देता है - ह्यूमन नेचर! मैं उसके बगल में बैठ गया था, अपनी गीली होती पैंट की परवाह किए बगैर। मेरी बात पर वह सोच में पड़ गई थी - तुमने मुझे भी तो पा लिया है... आगे की बात करने के लिए शायद उसे शब्दों की तलाश थी, एकदम से रुक गई थी। मैं अपने बयान की पकड़ में आ गया था, अब क्या कहूँ सोच रहा था। उसने अचानक अपनी बात का रुख मोड़ दिया था -

अशेष, तुम अपनी पत्नी से कभी प्यार करते थे...? उसके सवाल ने मुझे चौंकाया था - कभी... मैं अपनी पत्नी से कब प्यार नहीं करता था! मगर ये जवाब मैं उसे दे नहीं सकता था। उसकी आँखों की झिलमिल बता रही थी, उसकी मुझसे क्या अपेक्षा है... वह सुनना चाहती है कि मैं उमा से कभी प्यार नहीं करता था, ये रिश्ता एक मजबूरी और समझौता है, मैं उससे - सिर्फ उससे प्यार करता हूँ। ऐसा इंगित तो कभी मैंने ही किया था न। अब मैंने वही सब कहा भी। वह सुनी और संतुष्ट हुई - प्यार किया नहीं जाता है, ये तो घटित होता है!

- हाँ, और होता भी है बस एकबार... मैंने उसका हाथ पकड़ा था - उसके बाद तो सिर्फ दुहराया ही जाता है...

उसने मेरी आँखों में गहरा झाँका था - मगर तुम दुहराना भी मत...

- तुम पागल हो... उससे जो कुछ भी मैं इस क्षण कह रहा था उसमें कितनी सच्चाई थी, कह नहीं सकता, मगर झूठ कहने का इरादा भी नहीं था। ये समय विश्लेषण, विवेचन का नहीं, विशुद्ध भावनाओं का है और मैं उसमें पूरी तरह डूबा हुआ हूँ। प्रेम इनसान को क्या सिर्फ ईमानदार बनाता है? वह उसे बेईमान भी बना देता है - अधिकतर... मैं अपनी किसी बेईमानी पर शर्मिंदा नहीं था, जो कुछ किया था, उसी की लगन में किया था, उसी के लिए किया था। प्यार में सबकुछ सही होता है, गलत तो वह होता है जो प्यार में नहीं होता... एकबार शायद दामिनी ने ही यह कहा था। कभी उसने कैफियत माँगी तो उसकी यही बात दुहरा दूँगा।

उसका धूपछाँही व्यक्तित्व मुझे भूलभुलैया जैसा प्रतीत होता। कभी सुबह की लिली-सी ताजी, चमकीली तो कभी सावन के आकाश की तरह मेघिल और उदास... खासकर इच्छा के चरम क्षणों में मैंने उसे किसी जंगली बिल्ली की तरह सांघातिक और उत्तेजक पाया है। अपनी पूरे सामर्थ्य और दैहिक शक्ति से से भी उसे दमित और संतुष्ट न कर पाने की कुंठा में मैं बार-बार उसकी देह पर उत्पात मचाता रहा, मगर निष्फल! वह मेरी हताशा देखकर गहरी यातना में भी मँजीरे की तरह बज उठती थी। ऐसे में उसकी उजली हँसी उसकी आँखों से होते हुए उसके सुडौल उरोजों पर फैल जाती थी - ठीक जलतरंग की मीठी ठुनक की तरह!

उसकी देह की सिहरी हुई रेखाओं पर हँसी की ये मादक रुनझुन... इसे देखना भी अपने आप में एक अनुभव था! हवा से थहराते हरे-भरे खेत-सा उसका शरीर कौतुक के क्षणों में बाजरे की बालियों की तरह खनक-खनक उठता था। ऐसे में मैं अपना होश खो बैठता था। मेरे जानुओं के भार से दबी वह न जाने कैसी तंद्रिल, मदालस आवाज में हाँफती हुई कहती थी - जानते हो अशेष, औरत महज एक योनि नहीं होती, परंतु मर्द शायद आपाद-मस्तक एक लिंग ही होता है। तभी तो बेचारा योनि से आगे बढ़ नहीं पाता, रस के संधान में रसातल में पड़ा रहता है

कभी-कभी उसकी बातें मुझे तिलमिला देतीं। आक्रोश में आकर मैं उसे रौंद डालता। वह रो तक पड़ती। उसकी उन कौंधती आँखों में रसमसाते ये आँसू मुझे एक पाशविक उल्लास से भर देते थे। प्रेम और बलात्कार के बीच की ये महीन-सी रेखा कौन तय करता है... ये सिर्फ औरत को तय करना होता है और वही ये कर भी सकती है। कोई और नहीं। एकबार उसने कहा भी था, जो कि वह बार-बार दुहराती रहती थी - अपनी सभ्यता के लंबे सफर के पदचिह्न तुम मेरे जिस्म पर देख सकते हो - दाँत, नख, खुरों से लेकर सिगरेट, सिगार से जलाए हुए निशानों तक...

हर औरत अपने जीवन में कभी न कभी घर्षित होती है। चाहे ये मानसिक स्तर पर घटा हो या शारीरिक स्तर पर, मगर घटता जरूर है! अपनी त्वचा पर पड़े लाल-नीले धब्बों को सहलाते हुए उसने न जाने कैसी आवाज में कभी कहा था। उस क्षण न मैंने उसकी तरफ देखा था, न उसने ही कुछ और कहा था। बस, अपनी नुची-कुतरी देह को कपड़ों में समेटते हुए उसने मुझे अपनी कौंधती आँखों से देखा भर था और मैं एकबार फिर अपनी भूमिका तय नहीं कर पाया था - मैं उसका प्रेमी था या कोई बलात्कारी! अक्सर यही होता था, उन कौंधती हुई आँखों का तिलिस्म मुझे अधर में लटकाकर रख देता था।

वह मुझसे पारदर्शी रूह की बातें करती रही, मैं उसके जिस्म की मांसल हवस में डूबता रहा और एकदिन 'प्राण के बिना देह क्या है, एक लाश ही तो है और लाशों का ठंडा संबंध जीने की संवेदनहीनता मैं जुटा नही पा रही हूँ...' कहकर वह अचानक चुप हो गई थी। जैसे यकायक अपने ही अंदर से कहीं खो गई हो!

इसके बाद भी उसने मुझे स्वयं में हर तरह से उतरने दिया। मैं उतरा, डूबा, समाया, मगर न जाने क्या था जो पा न सका... उफ्! नैराश्य का वह कैसा मार डालनेवाला सांघातिक दौर था। सबकुछ पा लेना और फिर भी कुछ न पाना। ठगे जाने की हाड़-मज्जे तक धँस आने वाली अनुभूति... ये आस्था-अनास्था के बीच का क्षण कितना मारक होता है! कैसा दुर्दांत... आदमी सौ-सौ मौतें साँस-साँस जीता चला जाता है! मौत को मरना नहीं, जीना अधिक कठिन होता है। और यही मौत मुझे उन कौंधती आँखों ने दी थी। मैं जीने के भ्रम में मरता चला गया और मुझे पता भी न चला। ये कैसा छल था, छल भी था? मैं जान नहीं पाया। उसे आकंठ पीकर, उसके जानुओं के बीच बार-बार स्खलित होकर मैं शेषप्राय हो आया... मगर उसकी जिजीविषा बनी रही, वह बनी रही - अपनी आँखों में तड़ित रेखा का काजल सजाए, देहलता में उत्तेजना के सुर्ख गुलाब उगाए, रसमसाते नितंबों में इंगितों का माताल ज्वार उठाए वह अपनी राह चलती रही - पुरुषों की अतृप्त तृष्णा से रेत हुए हाड़-मज्जे से ईप्सा की तड़फड़ाती कामुक, उत्तेजक मछलियाँ छान लाने में हरबार सक्षम। हर मर्द मानो मछली था और वह पानी थी - नील तिलिस्म भरा जाल थी। खुद में सुलझी, दूसरों को बेतरह उलझाती...

इसी लुकाछिपी और कशमकश में कई दिन और बीत गए थे, शायद महीना ही। इस बीच मैं एकबार और घर हो आया था। रेचल भी एक सप्ताहंत मेरे साथ बिताकर गई थी। उसदिन भी मिसेज लोबो घर पर नहीं थीं। किसी रिश्तेदार की शादी में गई हुई थी। मैंने ही रेचल को मिसेज लोबो के घर पर न होने की सूचना दी थी। वह चुपके से आ गई थी। शाम की बस से आकर दूसरे दिन फिर सुबह-सुबह मुंबई लौट गई थी। उसके आने की बात का पता मिसेज लोबो को भी चल नहीं पाया था।

मैंने उसरात बिस्तर पर उससे पूछा था - ये सब कब तक...

वह मेरे सीने में सिमट आई थी - ये मत पूछो, मुझे भी कुछ मालूम नहीं। बस यही क्षण... न आगे कुछ न पीछे कुछ... मुझे उसकी ये बात जँची थी। मैं उस पल की खूबसूरती में निश्चिंत डूब गया था...

इस साल गोवा में मई से ही बारिश शुरू हो गई। एकदिन दोपहर के बाद तेज हवा चली और देखते ही देखते मौसम बदल गया। न जाने कहाँ से यकायक उमड़-घुमड़कर मेघ आए और आकाश को घेरकर जम गए। दिनों तक लगातार बारिश होती रही। यह आकस्मिक बदलाव सुखद था। तेज गर्मी से निजात मिल गई थी। देखते ही देखते हर तरफ गहरी हरियाली छा गई थी।

गोवा में यह मेरी पहली बारिश थी। इतनी तेज और घनघोर बारिश शायद ही मैंने पहले कभी देखी थी। मोटे पर्दे की तरह घना होकर पानी बरस रहा था - दिनों तक बिना रुके-ठहरे - अविराम...

कभी-कभी पूरी शाम या दोपहर हम चुपचाप बारिश होते देखते हुए बिता देते थे। पहली ही बारिश में गुलमोहर के खूब सारे फूल झड़ गए थे, दामिनी का कॉटेज जैसे झड़े हुए फूलों में डूबकर रह गया था। साँझ के गहरे पीले आकाश के नीचे सुर्ख, नारंगी फूलों से अँटा उसका छोटा-सा कॉटेज कितना अद्भुत दिखता था - लंबे गलियारे में जड़ी खिड़कियों के रंग-बिरंगे काँच, उनपर प्रतिबिंबित पूरा आकाश - छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटा हुआ...

दामिनी को बारिश बहुत अच्छी लगती थी, अक्सर छज्जे पर उतरकर भीग जाती थी। दोनों हथेलियों में पानी की बूँदे इकट्ठी करना उसे अच्छा लगता था। उसका बारिश में भीगते हुए किसी बच्ची की तरह खुश होना मुझे मुग्ध करता था। भीगकर देह से लिपटी साड़ी से झाँकता हुआ उसका पेट - गोरा और मुलायम - किसी खरगोश के बच्चे की तरह, गहरी नाभि में जड़ा हुआ पानी का नगीना - अपनी छोटी-सी मुट्ठी में इंद्रधनुष के रंग समेटे... मैं निर्निमेष तकता रह जाता था।

कई बार हम एक छतरी में आधे-आधे भीगते हुए देरतक निरुद्देश्य चलते रहते थे, न जाने कहाँ-कहाँ भटकते हुए। ठंडी हवा से सिरहते बदन एक-दूसरे की आँच से हल्के-हल्के पिघलते रहते थे, एकदम निःशब्द। कई बार मैं दामिनी को उसकी नजर बचाकर देखने का लोभ संवरण नहीं कर पाता था। विशेषकर गीले कपड़ों के अंदर से झाँकती हुई वे चाँदी की सुडौल कटोरियाँ - बेदाग सफेद... ठंड में सिहरे हुए...

रात को कभी-कभी मैं उसकी कॉटेज में ठहर जाता था। विशेषकर बारिश की रातों में दामिनी स्वयं मुझे रोक लेती थी। 'साथ-साथ जागकर सारी रात छज्जे पर गिरते हुए बूँदों का संगीत सुनेंगे...' ऐसा हम करते भी थे, देर राततक बिस्तर पर लेटे हुए बारिश की आवाज सुनते रहते थे। एक हल्की गुनगुनाहट से रात का निविड़ सन्नाटा भर जाता था, खुली हुई खिड़की पर जुगनुओं की सुनहरी पाँत चमकती रहतीं... इन दिनों समंदर उफन आया था, उसका गर्जना स्पष्ट होकर दूर-दूरतक सुनाई पड़ने लगी थी, जैसे दरवाजे पर ही लहरें टूटी पड़ रही हों। एक रोमांच, सुखद दहशत से पूरा माहौल थरथराता रहता था। हवा समुद्र की नमकीन गंध से भरी काँच की खिड़कियों पर दो हत्थड़ मारती हुई रातभर शोर मचाती रहती।

उसदिन जब मैं दामिनी की कॉटेज पर लगभग भीगकर पहुँचा था, बारिश तभी होकर थमी थी। बादल फीके होकर दिन एकदम उजला हो आया था। दामिनी उस समय अपने पोर्टिकों में बिछे गुलमोहर के कालीन में डूबी हुई-सी खड़ी थी। चेहरे पर चढ़ती साँझ का पीलापन था, कुछ उदास भी दिख रही थी। मगर मुझे देखते ही उसकी आँखें दिप उठी थीं। एक तरह से खींचकर ही मुझे टेरेस पर ले गई थी। वहाँ बिछी कुर्सियों पर हम बैठ गए थे। थोड़ी देर बाद उषा हमारे सामने चाय की प्यालियाँ रख गई थी। प्यालियों से उठती चाय की गंध और भाप माहौल को खुशनुमा बना रहे थे। नीचे लॉन में ताजी छँटी हुई मेंहदी की झाड़ियाँ महक रही थीं। सावनी के पौधे गुलाबी, बैंजनी फूलों से लद गए थे।

'जानते हो, आज मैंने गार्डन में बहुत काम किया... शुक्रबार के बाजार से उषा ढेर सारे फूलों के पौधे ले आई थी। दो दिन पहले नेलशन खाद भी पहुँचा गया था। उसे खाद की बहुत अच्छी जानकारी है। नर्सरी में सालों काम कर चुका है। आज क्यारियाँ तैयार करके बीज रोपे हैं, कुछ पौधे भी रोपे हैं - रेड कार्नेशन, गुलदाउदी, पनसुटिया, सदाबहार...' कहते हुए दामिनी का चेहरा उजला हो उठा था। आँखों में मनपसंद काम को अंजाम देने का गहरा संतोष था। मैं मुस्कराया था - तुम मुस्कराती हुई अच्छी लगती हो दामिनी... कभी उदास मत रहा करो, अभी जब आया था, तुम उदास लग रही थी।

- हाँ, आज अंदर बहुत कुछ सुबह से ही जमा हो गया है। मगर उन्हें किसी के साथ शेयर न कर पाने की विवशता से खिन्न हो गई थी। सोच रही थी, तुम आज आओगे कि नहीं... कहते हुए उसका चेहरा अंदर के किसी अनाम भाव से स्निग्ध हो आया था - बहुत कमनीय भी - 'मुझे तुम्हारी कितनी आदत पड़ गई है...'

- बुरी आदत... मैंने मुस्कराकर चुटकी ली थी।

- यही सही... उसकी आँखों में हँसी कौधी थी - तड़ित रेखा की तरह।

- बदल डालो... अब मैं गंभीर था।

- नहीं! कभी नहीं! अब वह भी गंभीर थी।

इसके बाद थोड़ी देरतक एक-दूसरे की आँखों में देखकर हम अनायास हँस पड़े थे। अबतक हमारी चाय ठंडी हो गई थी। दामिनी ने उषा को बुलाकर दुबारा चाय गर्म कर लाने के लिए कहा था। उषा दुबारा चाय लाने से पहले मेज पर प्याज के पकौड़े रख गई थी। दामिनी ने उसे मुस्कराकर देखा था।

- तुम्हारी ये उषा बड़ी समझदार है। इस भीगे मौसम में मुझे बस यही खाने की इच्छा हो रही थी। मैंने जल्दी से एक पकौड़ा उठा लिया था - इसका घरवाला बहुत किस्मतवाला है...

- हाँ, और उषा भी, कल रात ही इसके घरवाले ने शराब पीकर उसका सर फोड़ दिया है। पिछले साल हाथ तोड़ दिया था। इस मामले में हम औरतें अधिकतर भाग्यशाली होती हैं... दामिनी व्यंग्य से मुस्करा रही थी।

- झोंपड़पट्टियों में तो यह सब कॉमन ही है... मैंने हल्के ढंग से कहा था।

- सिर्फ झोंपड़पट्टियों में ही क्यों? हर जगह - आलीशान बँगलों में भी यही सब होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि उन घरों से रोने-चिल्लाने की आवाजें बाहर नहीं आतीं। पढ़ी-लिखी औरतें अपने मुँह में आँचल ठूँसकर रोती हैं। अपने जख्मों को 'पाँव फिसल गया' कहकर छिपाती हैं। आभिजात्य के भारी बोझ को ढोना भी इतना आसान नहीं होता। औरतें घुटकर मर जाती है वहाँ, मगर खुलकर रो भी नहीं पातीं। कहते हुए अचानक दामिनी तल्ख हो उठी थी।

उषा पकौड़े का दूसरा प्लेट लेकर आई तो मैंने देखा उसके सर पर जख्म के दाग हैं जिन्हें वह आँचल से ढँकने का प्रयास कर रही थी। मुझसे नजरें मिली तो उसने झट से अपनी आँखें झुका ली। मुझे उसके लिए अफसोस हुआ था, सचमुच वह बहुत भली थी, मेहनती और ईमानदार। धीरे से कहा था, इस तरह कि वह सुन न सके -

और यह सब खुलेआम होता है...! मेरी खिन्नता मेरे स्वर में स्पष्ट हो उठी थी- अधर्म और किसे कहते हैं!

मेरी बात सुनकर दामिनी की आँखों में एक हल्की नीली कौंध-सी उठी थी, उसके अंदर जैसे कुछ यकायक बिफरा था -

अधर्म का रोना कौन रोए, जब यहाँ धर्म के हाथों औरतें बिक जाती हों! क्या है न अशेष, धर्मराज जब स्वयं एक स्त्री को जुए के दाँव पर लगाते हैं, सारे अधर्म पर अपने आप धर्म की मुहर लग जाती है। ये खेल बहुत पहले शुरू हुआ है मनु... इन दिनों जब भी वह गुस्से या आक्रोश में होती थी, मुझे इसी तरह संबोधित करती थी - मनु कहकर या पुरुष कहकर! वह अब भी आग की तरह दहकती हुई कहे जा रही थी -

औरत के उसके जिस्म में उतरने से पहले ही उसे उसके स्त्रीत्व से बेदखल कर देने की साजिश रची गई थी और अपने ही अनजाने औरत भी उसमें शामिल हो गई थी। एक सामूहिक मन हमारे हाड़-मज्जे, रक्त-मांस में निःशब्द रातदिन बहता रहता है। दिमाग सब समझता है, मगर मन स्वीकार नहीं पाता - संस्कार! संस्कार! और क्या है ये? एक हजार वर्ष की बुढ़िया हमारे अंदर खाँस-खाँसकर कहती रहती है - मर्यादा! सीता, मर्यादा... हाथ-पाँव तराशे हुए, अपने पंखों और उड़ान से महरूम हम पक्षियाँ धरती पर रेंगती हुई आसमान को तकती रहती हैं...। आखिर कब तक और क्यों!

तुम जानते हो अशेष, मुझे लगता है, मनुष्य ने पक्षियों के लिए पिंजरा बनाकर दुनिया का सबसे बड़ा जुर्म किया है। वह धीरे से उठती है और आँगन में लटकते हुए एक खाली पिंजरे को दिखाकर हँसती है - इस पिंजरे को देखो अशेष, तुम्हें पता नहीं, इसमें कभी एक चिड़िया बंद हुआ करती थी - सुनहरे पंखों और नीली आँखोंवाली। गाने से ज्यादा रोती थी - उसे उसका आसमान जो बुलाता था! मैं उसकी भाषा समझ लेती थी - औरत हूँ, इसलिए! वह भी मेरी चुप्पी सुन लेती थी - पक्षी जो थी!

हम दोनों का पिंजरा एक ही था - चाहे शक्ल अलग रही हो। हर पिंजरे में सलाखें थोड़े ही न होती हैं। दीवारों से भी बनता है पिंजरा - औरतों का सनातन पिंजरा... जिसे औरतों का घर कहते है, उसकी वास्तविक विडंबनाओं को एक औरत से बेहतर कौन जानता-समझता होगा! इसी घर-परिवार के नाम पर वह आजन्म ब्लैकमेल होती है, शोषित और प्रताड़ित होती है, उसका दोहन किया जाता है... किसी और के नहीं, बल्कि अपने हृदय और प्रेम के हाथों वह सदा के लिए बंधक बनी रहती है... रिश्तों की दुनिया में बँधुआ मजदूर बनकर जीती हैं औरतें। यही उसका सबसे बड़ा दुख है, त्रासदी है... कहते हुए उसके शब्दों का शोक उसकी समूची काया में गहरा नील बनकर घुल आया था। हरसिंगार-सी उजली वह अब साँझ के धूसर में मिलकर मलिन दिखने लगी थी।

अपनी अधूरी बात के एक सिरे को उसने बहुत देर बाद फिर थामा था - इसी पिंजरे को मैंने एकदिन तोड़ दिया था - असीम को छोड़कर! यह फैसला मैंने लेने में देर नहीं की थी, शादी के तीन महीने में ही असीम को त्याग दिया था। अपनी माँ का उदाहरण मेरे सामने था, शायद इसीलिए अपनी स्थिति को समझकर एक सही निर्णय लेने में मुझे समय नहीं लगा था। प्रेम मुझे बंदी बना सकता है, प्रेम का छल नहीं...

वह मुझसे मुखातिब थी, मगर शायद अपने आप से ही कह रही थी। उसकी आँखों के सूने आकाश में किसी पंख की डोल या उड़ान नहीं, बस उसका अधूरा सपना था - धीरे-धीरे मरते हुए, टूटते हुए... रुक-रुककर कहा था उसने, छोटी, लरजती आवाज में - एक दिन अपना रोना भूलकर वह पक्षी मेरे लिए सारी रात गाई। वह रात बहुत भारी थी मुझपर। असीम को त्याग आई थी उसी सुबह। अपने दुःसह भार से जाँते दे रही थी जैसे वह रात, साँस लेना एक मशक्कत... मन पर पहाडों का बोझ - उस रात निरंतर गाकर उस छोटी-सी चिड़िया ने मेरा दुख बाँट लिया था, साझे के दर्द में वह निविड़, निझूम रात पिघलकर निःशब्द बह गई थी।

उस रात की सुबह पंखों की तरह हल्की और मुलायम थी। एक नई उम्मीद की खुशबू से लबरेज...। अपनी छोटी-सी खुशी के हासिल पर मैंने उस सुबह को एक उपहार दिया था, मेरे लेखे बहुत बड़ा - उसकी चंपई फिजाँ में उस छोटी-सी चिड़िया के रेशमी पंखों की उड़ान घोल दिया था... फिर जैसे जादू हुआ, कोई आसमानी करिश्मा - पारदर्शी चुप्पी काँच की तरह चटक गई, पूरब की हवा हल्के से गुनगुनाई, आकाश अपने संपूर्ण विस्तार में आ गया...!

अपने पर तोलने से पहले उस पक्षी ने जिस तरल दृष्टि से मुझे देखा था, वह मेरे अबतक के जीवन का सबसे बड़ा हासिल और असल है! उसदिन उसे आजाद करके मैं भी कहीं से आजाद हो गई थी। वह दिन है और आज का दिन है, मैंने अपने अंदर के आसमान में कभी उड़ना नहीं छोड़ा है। बाहर पहरे लगे रहते हैं, मैं अंदर उड़ती रहती हूँ - हजार ताले में उड़ती रहती हूँ! यही शायद मेरे पिंजरे की सबसे बड़ी हार है।

अचानक वह मेरी तरफ मुड़ी थी, आँखों में कौंध के अनगिन स्फुलिंग लिए - आजाद रूहों के लिए आजतक कोई पिंजरा बन भी पाया है! चाह हो तो पिंजरे को भी आसमान बन जाना पड़ता है... वह ढलती धूप की जद में सूरजमुखी बनी मुस्करा रही थी, अपने अंदर की किसी अनाम खुशी में डूबी हुई-सी, एकदम आप्लावित... वह जमीन पर खड़ी थी, मगर मुझे प्रतीत हो रहा था, हवा के परों पर तैर रही है - सुगंध के झोंके की तरह... एक पल के लिए मेरा मन किया था, उसके साथ हो लूँ, मगर तबतक न जाने वह किस आसमान पर पहुँच चुकी थी। उसकी आँखों में चाँद-तारों की सुदूर नीहारिका जाग गई थी। मैं जान गया था वह मेरी बाँहों की हद में है, मगर मेरी हद में नहीं। मुट्ठी में क्षरते हुए शून्य को बाँधे मैं एकबार फिर अकेला खड़ा रह गया था, वह क्षण निःसंगता का चरम अनुभव था, पारे की तरह पारदर्शी, मगर सांघातिक!

न जाने कितनी सदियों बाद वह मुड़ी थी, आँखों में सारा आकाश लिए और मुझे कई पलों तक न देखती-सी दृष्टि से देखती रही थी - अनमन, उदास... इस तरह कि मैं उसकी ठंडी ऊष्मा में पिघल आया था। और फिर मैंने अनायास पूछ लिया था, न जाने किस उछाह में - क्या चाहती हो दामिनी? वह तत्क्षण मेरे करीब सरक आई थी, आँखों में पिघलते हुए सितारे समेटकर - पक्षी हूँ, आकाश चाहती हूँ, सारा आकाश... बात के अंततक पहुँचते हुए उसकी सघन पलकें किसी पक्षी के पर तोलते पंख-सी कई बार तेजी से उठी -गिरी थीं, जैसे उसी क्षण हवा में घुलकर आकाश हो जाएँगी!

मैंने उसकी उँगलियों की चंपा-सी लंबी पाँत सहलाई थी - अब ये मरण इच्छा क्यों?

मरण इच्छा... उसने शब्दों को अनमन दुहराया था और फिर जैसे स्वयं से ही कहा था- मैंने अपने अंदर के आसमान में कभी उड़ना नहीं छोड़ा था अशेष! इच्छाएँ तो भुलाई जा सकती हैं, मगर अपनी जात का क्या करे कोई! हर इनसान - खासकर औरत - फितरत से पक्षी ही होते हैं, उनके पंख नहीं होते तो क्या।

उसकी पलकों में कैद आकाश के गहरे नीले विस्तार में डूबता-सा मैं उसकी बातें सुनता रहा था, सुनने से ज्यादा महसूस करता रहा था। दामिनी अक्सर अपनी देह से आगे बढ़कर एक सोच बन जाया करती थी, जिसे महज मुट्ठियों में बंद करके नहीं रखा जा सकता है। विचारों में उतारना पड़ता है, शुमार करना पड़ता है। वह कह रही थी, शब्दों में आग समेटकर, आँच देती हुई-सी -

उसके पंख तो सभ्यता की शुरुआत में ही बड़े कौशल और दूरदर्शिता से कतर डाले गए थे। बगावत के सारे हथियार कुंद करके रख दिया गया था। माँ ने अपनी डायरी में लिखा था, मेरी आँखों और सपनों के बीच हमेशा से यह दुनिया खड़ी रही है। अच्छा, इसके पाँव नहीं दुखते... समाज - एक पुरुष सत्तात्मक समाज - के सुचारु और निर्विघ्न ढंग से चलने के लिए इतना एहतियात जरूरी था। जमीन के साथ आसमान को हथिया लेने का यह षड्यंत्र भी बहुत पुराना है - इतिहास और तारीखों की लंबी फेहरिस्त से भी परे...

मेरे पास शब्द थे, मगर उत्तर नहीं। कहता तो भी क्या कहता! इस समय कुछ बोलना कठघरे में खड़े होकर बोलने जैसा लगता। और फिर झूठ बोलने के लिए जिस अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है, वह मेरे पास इस क्षण उपलब्ध नहीं थी। सदियों ने जो गलतियाँ की थीं, हर लम्हा उसकी सजा अब किस्तों में पाना ही था! वह अपने अंदर के किसी यातना भरे सफर में थी - उदिग्र, अस्थिर... टहलती हुई खिड़की के पास चली गई थी - जानते हो अशेष, मेरी माँ की तरह ही एक लंबी उम्रतक पिंजरे में रहकर भी मैंने अपने सीने में उड़ान को बचाकर रखा।

ऐसा कैसे कर लेती हो? क्या सच को अदेखा करके? उससे आँखें मूँदकर, एक पलायन - सच से, यथार्थ से... मैं उसे समझना चाह रहा था। जितनी वह मेरे करीब आ रही थी, अंतरंग हो रही थी, उतनी ही दुरूह, किसी पहेली की तरह कठिन होती जा रही थी। उसे समझने का कोई सिलसिला निकले, ऐसा कोई सूत्र मैं तलाश रहा था।

मेरे सवाल पर वह मेरी तरफ एक पलक मुड़कर देखी थी, न जाने किस नजर से - नहीं! मैंने पिंजरे को ही अपना आसमान बना लिया है, और उड़ान को सबसे खूबसूरत सपना... आजाद रूह की हद सलाखें कैसे बन सकती हैं...

वह एक पहेली की तरह मेरे सामने बिछ गई थी, मैं उलझ रहा था बेतरह। मगर उसकी आँखों में मुस्कराहट पारे की नन्हीं, थरथराती बूँदों की तरह सिमट आई थी - मगर अफसोस तो कोई इस आसमान के लिए करे! कहते हुए अपने दो हाथों की अँजुरी में जैसे उसने आकाश के सारे नील को भर लिया था - एक भी चिड़िया जबतक पिंजरे में कैद रहेगी, आसमान अपने वजूद पर शर्मिंदा होता रहेगा।

मैंने देखा था, ऐसा कहते हुए उसकी आँखों की तरल चावनी में करुणा का गीला विस्तार था, ठीक जैसे साँझ की बहती हुई गहरी नीली उदासी में किसी नदी की निःशब्द धार... कहीं गहरे तक डूबता-उतराता मैं तिलिस्म के उस छोटे-से क्षण को पकड़ने की कोशिश में था, मगर क्षण से पहले स्वयं के ही पूरी तरह बीत जाने की एक अद्भुत प्रतीति ने मुझे यकायक आपाद-मस्तक ढँक लिया था। उसे समझना शायद स्वयं को ही निःशेष करना था - कुछ इसी तरह...

न जाने मैं क्यों एकदम से उठ खड़ा हुआ था और दरवाजे की ओर बढ़ गया था - दामिनी से बिना कुछ कहे। उस समय उससे कुछ भी कहने का कोई अर्थ नहीं था, वह वहाँ अब थी ही नहीं! कितनी आसानी से वह अपने जिस्म के पार चली जाती थी, कभी हवा तो कभी खुशबू बन जाती थी, और कभी-कभी तो, जैसा कि मैं अभी-अभी सोच रहा था, खालिस सोच... मुझे याद है, उसदिन मैं अपने घर उसके शरीर की ऊष्मा नहीं, रूह की गंध लिए लौटा था - अपने नासारंध्र में उसे महसूसते हुए रातभर एक बेचैन नींद में करवटें बदलने के लिए। और ऐसा ही हुआ भी...

दूसरे दिन ऑफिस में दामिनी का फोन आ गया था। बार-बार मुझे बुला रही थी, मगर बोर्ड मीटिंग की वजह से मैं जा नहीं पाया था।

शाम को जब मैं उसके यहाँ पहुँचा था, वह अपने कमरे में अँधेरा करके लेटी हुई थी। मैंने बत्ती जलानी चाही तो उसने मना कर दिया। बगल की मेज में वाइन की खाली बोतल और गिलास पड़े थे। शायद वह दिनभर पीती रही थी। मेरे पास बैठते ही उसने मेरी कमर से लिपटकर मेरी गोद में चेहरा छिपा लिया था। मैं बिना कुछ कहे उसके बालों में उँगलियाँ फिराता रहा था। मुझे लग रहा था, वह परेशान है। न जाने किस बात से...

एक लंबे समय के बाद उसने अपना चेहरा उठाकर मेरी तरफ देखा था। मैंने झुककर उसके सूखे होठ चूमे थे - चॉकलेट और वाइन से महकते हुए... साँझ के झुटपुटे में वह बिना कुछ कहे मुझे निंदियाई आँखों से देखती रही थी। उसकी मुसी हुई साड़ी का सुनहरा किनारा हल्के अँधेरे में चमक रहा था। उसके बाएँ हाथ की उँगलियों को अपनी मुट्ठी में समेटते हुए मैंने महसूस किया था, वे पसीने से भीगी हुई थीं। आज गर्मी तो थी, मगर इतनी भी नहीं। फिर, क्या दामिनी परेशान थी! मैंने एकबार फिर दामिनी की आँखों में झाँका था, वहाँ बहुत कुछ अनकहा, मगर पहचाना हुआ था। उसके मौन को भी सुनने लगा था मैं। साथ चलते हुए बहुत कुछ साँझ का हो जाता है। कभी-कभी सोचता हूँ, हम खुद को भी कितना समझ पाते हैं जो औरों को समझने का दम भरने लगते हैं।

मैं बहुत एहतियात से उसकी उँगलियों को थामे हुए था, ठीक जिस तरह से एक चिड़िया के बच्चे को पकड़ा जाता है। इन दिनों मैं प्यार में था, तभी शायद इतना अच्छा बन गया था। आश्वासन से भींचते हुए मैंने उनके पोर चूमे थे - ठंडे और शिथिल -

क्या हुआ दामिनी, इतनी अस्थिर क्यों हो रही हो, मैं हूँ न यहाँ, तुम्हारे पास...

न जाने मेरे पूछने में क्या था, यकायक वह मेरे कंधे से आ लगी थी - एक दबी हुई सिसकी के साथ -

अशेष, सपना - वही भयानक सपना... मैं एक काले समंदर में डूब रही हूँ और ऊपर सूरज चमक रहा है। उसकी तीखी चौंध और सागर की काली, ठंडी हरहराहट के बीच मैं बँटी हुई हूँ - जीने की कोशिश करते हुए, हर पल मरते हुए... न जाने कितनी देरतक मैं साँस के लिए छटपटाती हूँ और फिर जाग जाती हूँ। अशेष, ये सपना मैं बार-बार क्यों देखती हूँ? और भी कई डरावने सपने - कभी मैं किसी अनजान जगह में गुम जाती हूँ, कभी कोई मुझे किसी अँधेरी कोठरी में कैद कर देता है। कभी मैं देखती हूँ कि मैं जिस कमरे में हूँ, उसके फर्श पर साँप ही साँप बिछे हैं - मुझे साँप ने काट लिया है, मगर कोई मुझे डॉक्टर के पास नहीं ले जा रहा है। मैं रो रही हूँ, मिन्नतें कर रही हूँ... एक शेर बचपन से मेरे सपनों में आकर मेरा पीछा कर रहा है...

मैंने उसके ईर्द-गिर्द अपनी बाँहों का कसाव बढ़ा दिया था।

'तुम्हारे अंदर कहीं बहुत गहरा असुरक्षा बोध है। तुम्हारे बचपन के अनुभव ने तुम्हें भावनात्मक रूप से असुरक्षित कर दिया है, तुम में डर समा गया है...

वह मेरे सीने से लगकर पिघल आई थी - गर्म मोम की तरह -

शायद तुम ठीक कहते हो...

धीरे-धीरे उसकी साँसें सम पर आने लगी थीं, वह शांत हो रही थी। मेरे स्पर्श ने उसे आश्वस्त किया था शायद किसी स्तर पर। 'तुम्हारी उँगलियों में जादू है, मैं खिल उठती हूँ फूलों की तरह। बिन मौसम...' एकबार मेरी हथेलियों में समूचा पिघलती हुई उसने गाढ़े अनुराग भरे स्वर में कहा था। उसदिन हम जंगल में एक गुलमोहर के नीचे हल्की बारिश में देरतक भीगते रहे थे। अचानक ही मौसम बदलकर हल्की झींसी तेज बूँदा-बाँदी में बदल गई थी। साँझ घिरने तक हमें वही रुके रहना पड़ गया था। दामिनी की पतली ताँत की साड़ी भीगकर उसकी त्वचा से मिलकर एकसार हो आई थी, ठीक उसी के रंग की - कच्ची हल्दी की तरह... उसदिन एक अजाने उन्माद से भरकर मैं उसके सीने पर चमकती सोने की पतली जंजीर को देरतक चूमता रहा था... किसी कठगुलाब की तरह उसकी देह फुहार में भीगकर अनायास खिल आई थी, पंखुरी-पंखुरी! इस क्षण न जाने क्यों अनायास वह दृश्य याद आ गया था...

जब उसने थोड़ी देर बाद आँखें उठाकर मुझे देखा था, उसकी तरल पुतलियों में संघनित होती हुी भाप थी, हल्की, नीली आँच भी, धुआँती हुई। मैंने महसूस किया था, एक शुष्क, जीर्ण, सूखती हुई नदी में चाहना का ज्वार उतर आया है... बाहर साँझ गहराकर न जाने कब स्याह पड़ गई थी। मार्च की गर्म हवा में सेमल की हल्की, मादक गंध थी। र्पोटिको में गुलमोहर लगातार झड़ रहा था। उसे बहुत निविड़ ढंग से अपने सीने में समेटते हुए मैंने पूछा था - ये रंग-बिरंगी सुंगधित मोमबत्तियाँ तुम रोज क्यों जलाती हो? दीवाली रोज मनती है क्या?'

- अपने अंदर के अँधेरों से निकलने की ये एक कोशिश है, और कुछ नहीं!

- निकल पाती हो? मैंने उसके बालों में उँगलियाँ उलझाई थी।

- कभी-कभी स्वयं से ही झूठ बोलना पड़ता है अशेष, जीवन की सच्चाइयाँ ऐसी त्रासद होती हैं। जानते हो स्वयं को बहलाने के लिए कभी मैं कितनी कहानियाँ गढ़ा करती थी। जब मैं होस्टल में रहती थी, माँ के बगैर बहुत अकेली हो गई थी। माँ को पूरी तरह से निसंग और असहाय करने के लिए मुझे हॉस्टेल में डाल दिया था पापा ने। उन दिनों मैं खुद से ही वादे करती थी - ढेर-सी खुशियों के। अच्छा फील करने के लिए आईने के सामने खड़ी होकर खुद से पूछती थी - प्रिंसेस, वाट् इज योर विश? फिर खुद ही मचलकर कहती थी - मुझे बार्बी चाहिए और चॉकलेट्स - ढेर सारी... उस झूठ-मुठ के खेल में भी अपनी माँ को नहीं माँग पाती थी। जानती थी, ये मेरे वश में नहीं। हालाँकि मन से सिर्फ उन्हें ही विश करती थी।।

'तुम्हें हॉस्टल में बहुत अकेलापन सताता होगा...' मैंने उसकी जगह पर स्वयं को रखकर उसकी मनःस्थिति की कल्पना करने की कोशिश की थी।

हाँ, रातों को आँधी, तूफान के बीच अक्सर मेरी आँखें खुल जाती थीं। डॉरमेटरी की बड़ी-बड़ी काँच की खिड़कियों पर पानी की तेज बौछारें टकराती रहतीं, टाइल्स की छत पर हवा का शोर झपटता फिरता और मैं अपने में सिमटी-सिकुड़ी पड़ रहती। मिशनरी स्कूल का कठोर अनुशासन, रूखी, कठोर ननों का रुक्ष, यांत्रिक व्यवहार, और पादरियों के अंतहीन उपदेश और सजाएँ... कैसी उदासी के दिन थे वह! कहते हुए वह मेरी बाँहों में और भी निविड़ होकर सिमट आई थी - किसी चिड़िया के भयभीत बच्चे की तरह।

- डे ड्रीमिंग की वजह से अक्सर सजा मिलती।। कभी स्केल की मार से हथेलियाँ लाल हो जाती थीं तो कभी घंटों धूप में खड़ी रहना पड़ता था। क्लास में बैठी खिड़की से बाहर देखती रहती थी। मुझे आकाश बुलाता था... उसका अमित विस्तार...

एक क्षण वह ठिठकी थी, मानों यादों को उलट-पुलटकर देख रही हो, क्रम से लगा रही हो। फिर सहज होती हुई बोली थी -

रोज अपनी डाक चेक करती थी। न जाने क्यों, माँ के खत अब आते नहीं थे। वह एकदम से चुप हो गई थीं। प्रतीक्षा के उन अंतहीन पलों में लगता था, मैं पागल हो जाऊँगी। माँ मुझसे न बोले - अपनी गुड़िया से...!

सारा दिन हॉस्टल की सीढ़ियों पर बैठकर माँ की प्रतीक्षा करने के बाद जब आखिर में पापा को अकेले आते हुए देखती थी तब मैं उनसे बोले बगैर रोती हुई अंदर भाग जाती थी। इससे पापा बेहद नाराज हो जाते थे। अपने साथ लाए गिफ्ट्स के पैकेट्स पटककर कहते थे - अपनी माँ पर गई है...! डिप्रेशन की शिकार...

डिप्रेशन... हाँ, मैंने चुपके से सोचा था। यही तो है, इस उदास और खूबसूरत उदासी का नाम... कभी-कभी मुझे उसकी ये उदासी बिस्तर में भली लगती थी, रोमानी... एक हदतक उत्तेजक! लगता था, खूबसूरत क्लियोपेट्रा की ममी के साथ लेटा हूँ। स्लीपिंग ब्यूटी! उसकी सूनी आँखों में अपने लिए पहचान जगाना या सोई पड़ी देह को जगाना, उसमें इच्छाएँ उत्पन्न करना एक भारी चुनौती हो जाती थी ऐसे में। किसी पाषाण प्रतिमा को एक जीवंत स्त्री में बदल देना - ये लंबी, श्रम भरी प्रक्रिया एक तरह से रोमांचकारी होती थी। लगता था, किसी प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा कर रहा हूँ।

दामिनी के अंदर प्रेम था तो कहीं वितृष्णा, क्षोभ और उपालंभ की एक भारी-भरकम गठरी भी, जिसकी गाँठें खोलकर वह समय-असमय बैठ जाया करती थी। ऐसे क्षणों में वह बेहद तल्ख भी हो उठती थी। दो चरम बिंदुओं के बीच जी रही थी। यह उसके व्यक्तित्व का सबसे बड़ा विपर्यय था और त्रासदी भी। बहुत बार कह चुकी थी -कभी जी चाहता है, अपने अंतस की साड़ी पीड़ा, क्षोभ और ग्लानि किसी गंगा में सिरा आऊँ, पिंडदान कर दूँ अपनी मृत इच्छाओं का, ये आज भी सताते हैं मुझे, मुक्त नहीं हो पाए हैं पूरी तरह से...

- कौन तुम्हें सताता है दामिनी? मैं जानना चाहता।

एक ब्रह्म राक्षस - वही ब्रह्म राक्षस - अतृप्त, अभिशप्त... मेरे अंदर के तहखाने में एक अतल कुआँ है। उसी के काले, सर्द पानी में कैद पड़ा है। रह-रहकर छटपटाता है, चिग्घारता है... मैं दहल उठती हूँ...

एक तरफ उसका प्रेम था तो दूसरी तरफ उसकी घृणा। बीच में किसी शापग्रस्त यक्षिणी की तरह जी रही थी वह।

देह से स्वतंत्र होकर भी मन से मुक्त हो नहीं पाई थी। उसका यातना और कुंठा से भरा अतीत उसका आजीवन कारावास बन गया था। कहती भी थी - सर्जना के आदि से ही दो पंख हैं, एक आसमान है और इनके बीच खड़ी एक पिंजरे की सलाखें हैं और यही हर औरत के जीवन का इकलौता सच है।

मैं कहता था, सब पीछे छोड़ दो, एक नई यात्रा पर निकलो, बिल्कुल नई, कोरी होकर, किसी साफ स्लेट की तरह, जिसपर कोई उदास शब्द न लिखा हो। वह हथियार डाल देती - अब कौन-सा नया सफर। अपने अंदर के सफर में तो हरदम से हूँ और ये मंजिल से आगे की कोई बात है। जहाँ सब रास्ते खत्म हो जाते है, मेरा सफर तो वही से शुरू हुआ था। चलने का हौसला यह था कि मंजिल से भी आगे निकल आई। उसकी आँखों की ठहरी हुई उदासी में एक लौ-सी कौंधती थी। फिर वही राख और धुआँ...

शायद तुम जिंदगी से कुछ ज्यादा ही अपेक्षा कर रही हो... मैं एक और कोशिश करता, मगर वह बंद दरवाजे की तरह अड़ी रहती - मैं अपनी मर्जी से रोना चाहती हूँ, क्या यह माँग भी ज्यादा है!

- रोना क्यों चाहती हो, हँसना छोड़कर...? मुझे उसकी इच्छा अजीब लगती थी।

हँसने की आजादी क्या माँगू, जब रोने पर भी पाबंदी लगी हो। उसकी आँखों में अमूर्त यातना की एक पारदर्शी दीवार-सी थी - हरपल तड़क जाने के डर से लरजती हुई।

ऐसा मत सोचो, औरत तो स्वयं जीवन का उत्सव है, उसे घेरकर ही तो दुनिया का ये शाश्वत मेला लगा है... मैं उसे बहला नहीं रहा था, ये मेरा अपना विश्वास था।

होगी औरत अमृत की बूँद, मगर धरती पर उतरते ही वह मैली हो जाती है, ठीक जैसे गंगा।

उसकी बातें मुझे अवसन्न करने लगतीं, निराश होकर पूछता - क्या कभी किसी को कोई स्त्री पूरी तरह से हासिल हुई है?

पुरुष ने स्त्री को कभी मुकम्मल चाहा ही कब था कि वह उसे मुकम्मल मिलती! देह से आगे कोई बढ़े तो यह सवाल करे!

जीवन में सबकुछ मनचाहा नहीं होता, कहीं हमें समझौते भी करने पड़ते हैं, सामंजस्य पैदा करना पड़ता है... जो आँखों में दुखते हैं, वे ख्वाब भुला दो... मैं चाहता था, वह खुद को समेटे बिखरती जा रही थी कब से। ये मुझसे सह नहीं रहा था।

सपने लाख कुचले जाएँ, मगर वे मरते कहाँ हैं? दामिनी गहरे अवसाद में थी, ये उसकी पुतलियों में ठहरा सन्नाटा कह रहा था। नीले झील के स्वच्छ पानी में पड़े फफूँद की तरह। बेरंग और उदास...

दामिनी की बातें, उमा के उलाहने - सब मिलकर मुझपर तारी होते जा रहे थे। मुझे प्रतीत होने लगा था, मैं खुशी की तलाश में उदासी बटोर रहा हूँ। एक हँसी की कीमत इतनी नहीं होनी चाहिए।

मेरे अंदर भी जैसे कुछ इकट्ठा होने लगा था, मवाद की तरह - टीसता और धड़कता हुआ... नसों में सड़ांध देने लगा था कोई घाव। कहीं बहता हुआ कुछ बहुत ताजा और प्रांजल एकदम से ठहर गया था जैसे। काई जम रही थी सतह पर, परत दर परत, टटकी हरियाली बदरंग होती जा रही थी। कहीं पढ़ा था, प्रेम चंद्रमा की तरह होता है। ये अगर बढ़ेगा नहीं तो फिर घटना शुरू हो जाएगा... मेरे अंदर इन दिनों क्या घट रहा था, प्रेम या वासना... देह कहीं से अघा आई थी, दूसरी तरफ मन था कि रीत रहा था, शून्य हो रहा था। अब न देह की सरगोशियाँ लुभा रही थी, न मन का सन्नाटा अच्छा लग रहा था। एक निसंग टिटहरी की तरह मैं अपने अंदर के निर्जन में भटक रहा था। बार-बार धक्के खा रहा था, आहत हो रहा था। मेरे चारों ओर अथाह समुद्र है और मैं उससे घिरा हुआ उसी की तरह प्यासा पड़ा हुआ हूँ। कितने मरूँ, कितने सागर और कितने पहाड़ इकट्ठे हो गए हैं मुझमें...! न जाने कब, न जाने किस तरह... मैं सोचता हूँ और सोचता हूँ...

एकदिन इसी तरह सोचते हुए और अकेले भटकते हुए मैं बहुत दूर निकल गया था और बहुत देर बाद गिरती हुई शाम को देखकर यकायक महसूस किया था, कुछ विस्मय से ही, झरती हुई पीली, जर्जर पत्तियों की एक कालीन में डूबा-सा मैं खड़ा हूँ। सन्नाटे के कोलाहल में जज्ब, एकमेव, ठहरी हुई हवा की तरह... सामने समंदर के ऊपर हल्के सफेद कोहरे की घनी परत बिछी हुई है। चारों तरफ डूबती साँझ का नीला अँधेरा है। एक गहरी चुप्पी आकाश से जमीन तक निरंतर उतरते हुए हर तरफ व्याप रही थी। न जाने क्या हुआ था, एक कच्ची दीवार के गिरने की तरह अनायास, मैं अवसाद की अनाम, धूसर अनुभूतियों में भीगकर जड़ होने लगा था। खड़ा नहीं रह पाया था देरतक, ढह गया था गीली रेत पर किसी दीमक खाई हुई खोखली दरख्त की तरह। पड़ा रहा था चुपचाप न जाने कितनी देरतक। दिनों से अंदर धीरे-धीरे इकट्ठी हो रही चीखें और गहन मौन अब बोलना चाहते हैं - बिखराव और क्लेश की यही भाषा... मैं कहीं से दरकने लगा था - बुरी तरह से!

एक समय के बाद धूसर नील आकाश में फैले बेतरतीब बादलों के फाहों के बीच नए मौसम का एक टुकड़ा चाँद निकल आया था। मैंने बुझी आँखों से देखा था, आकाश से फीकी, हल्की चाँदनी उतर रही है - पानी की महीन धार की तरह। पेड़ पौधे भीग रहे हैं निरंतर झरती हुई इस तरल सफेदी में। मुझे अब लौटना होगा। बहुत कोशिश करके एक लंबे समय के बाद मैंने सोचा था - जिंदगी की ओर, उजाले की ओर। मगर ये उजाला किस तरफ है...

उस रात दामिनी के कॉटेज में गहरा अँधेरा पसरा हुआ था - ओर-छोर तक... मैं निराश होकर अपने कमरे में लौट आया था। रोशनी वहाँ भी नहीं थी। अपने कमरा खोलकर अँधेरे में टटोलकर मैंने मोमबत्ती जलाने की कोशिश की थी, मगर तभी पसीने से भीगे दो उष्ण हाथों ने मुझे पीछे से रोक लिया था - उँह, उजाला मत करो, ये मौसम अँधेरे का है, मैंने अपने जिस्म पर भी यही ओढ़ रखा है - खालिस अँधेरा! बस, तुम भी इसमें उतर आओ... ये आवाज रेचल की थी - बहकी हुई, गहरी कामुकता में थरथराती हुई... न जाने कब वह यहाँ लौट आई थी।

उसकी देह के नर्म, मखमली अँधेरे में उतरते हुए मैंने अनायास महसूस किया था, मुझे इस समय उसकी कितनी जरूरत थी... गहरे परितोष के अगले क्षणों में मैंने धीरे से उसके कानों में कहा था - थैंक्स रेचल... वह हल्के से रसमसाई थी - यू वेलकम लव, एनी टाइम...

तुम इतना कुछ देती हो मुझे, अपनी कृतज्ञता बोध की गहरी मनःस्थिति में उदारता के साथ पूछा था मैंने - तुम कभी कुछ माँगती क्यों नहीं?

- मैन, ये लव है। इसमें माँगना कुछ नहीं, बस देना ही माँगता है। बोले तो तुम दे भी क्या सकता है। फिर जो चीज माँगने से भी नहीं मिल सकता, उसे माँगने का कोई सेंस भी तो नहीं है। प्यार में बिना किसी को तकलीफ पहुँचाए जीतना खुशी हो सकता है, हो लेने का। बस, और कुछ नहीं। तुम अपना वर्ल्ड में मस्त, हम अपना वर्ल्ड में मस्त... उसके उदार जीवन दर्शन ने मुझे एकबार फिर से चकित किया था, मुग्ध भी। एक समय तक चुप रहने के बाद उसने मुझसे पूछा था - इतना अपसेट सा तुम आज क्यों लगता है मैन?

अपसेट नहीं, बस थोड़ा कनफ्यूज्ड, मैंने उसे बताया था - माइ वाइफ इज प्रेगनेंट अगेन, हमारी दो बेटियाँ हैं। उसे एक बेटा चाहिए। मगर इस उमर में मैं...

अरे ये तो गुड न्यूज है यार, डोंट वरी, गॉड वीलिंग सब अच्छा ही होगा... नाउ स्टाप वरींग एंड लेटस् सेलिब्रेट... उसने थोड़ी देर पहले जलाई मोमबत्ती फिर से फूँक मारकर बुझा दी थी।

सुबह हम बिस्तर में ही थे जब यकायक दरवाजे पर दस्तक हुई थी - बहुत तेज, सुबह के शांत माहौल में दूरतक गूँजती हुई। मैं चौंककर जाग उठा था। मगर रेचल की नींद नहीं टूटी थी। मैंने उसे झकझोरा था, कई बार। तब कहीं उसने कुनमुनाकर आँखें खोली थी - सोने दो न लव, आज भी तो संडे है।

प्लीज, गेट अप... मैंने एक तरह से धकेलकर ही उसे बाथरूम में भेजा था और पजामे पर अपनी शर्ट पहनते हुए दरवाजे की ओर बढ़ा था। दरवाजा अभी तक लगातार खटखटाया जा रहा था। 'होल्ड ऑन' कहते हुए मैंने दरवाजा खोला था और सामने दामिनी को खड़ी देखकर सन्न रह गया था। वह बेहद परेशान दिख रही थी, उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे। पैरों में घर के स्लीपर्स, खुले हुए बाल...।

- दामिनी, तुम... मेरी जुबान लड़खड़ा गई थी।

- ओह अशेष, दरवाजा खोलने में तुमने कितनी देर कर दी... कहते हुए वह कमरे के भीतर घुस आई थी।

- क्या हुआ, तुम इतनी परेशान क्यों हो? किसी तरह स्वयं को संयमित करते हुए मैं बोला था।

- कल रात उषा को उसके पति ने शराब पीकर जला दिया, मेडिकल में है - काफी सीरियस, अभी नेलशन ने खबर दी है। प्लीज, जल्दी से तैयार हो लो, हमें अभी निकलना होगा, उसे हमारी जरूरत है, फोन पर बहुत रो रही थी। नेलशन ने ही बात करवाई।

- अरे, ये तो सचमुच बहुत बुरा हुआ... अभी मैं अपनी बात समाप्त भी नहीं कर पाया था कि रेचल बाथरूम से निकल आई थी - गीले बालों में, मेरी बड़ी-सी शर्ट पहने, जाँघ से नीचे पूरी तरह से नंगी। उसकी लंबी, गठी हुई टाँगें काँसे के स्तंभ की तरह चमक रही थीं।

- ओह! दामिनी, हाय, यार मैं तो डर ही गई थी, तुम जिस तरह से दरोगा की तरह दरवाजा पीट रही थी, मुझे लगा ऐश का पत्नी ही आ धमका है... चलो, तुम लोग बात करो, हम कॉफी बनाकर लाता है। फिर मेरी तरफ मुड़ी थी, सॉरी, तुम्हारा शर्ट बॅरो किया, अपने कपड़े तो... बात को बीच में ही छोड़कर वह शरारत से मुस्कराते हुए कमरे से बाहर निकल गई थी - तुम्ही से धुलवाऊँगी, चर्च के बाद आंटी भी अब आती ही होगी... मुझे जल्दी से खिसकना होगा...

उसके कमरे से बाहर जाते ही वहाँ गहरा सन्नाटा छा गया था। दामिनी मेरी तरफ देख रही थी, न जाने किस नजर से। उन्हें पढ़ने-समझने की सामर्थ्य मैं खो चुका था। एकदम शून्य होकर खड़ा था, उसकी तरफ एक न देखती हुई-सी नजर से तकते हुए। थोड़ी देर के लिए महसूस हुआ था, हमारे बीच समय भी ठहर गया है, हवा दम साधे पड़ी है, पूरी दुनिया गूँगी, बहरी हो गई है। और दामिनी... वह तो एकदम पाषाण हो गई थी। न जाने कितनी देरतक हम इसी तरह एक-दूसरे की तरफ देखते हुए खड़े रह गए थे और फिर अचानक रेचल फिर कमरे में घुस आई थी, हाथ में कॉफी की ट्रे और मिठाई का प्लेट लेकर - लो, मिस दामिनी, मुँह मीठा कर लो, हमारा ऐश फिर बाप बननेवाला है, कल ही इसकी बीवी ने गुड न्यूज भेजा है।

मुझे लगा था, मैं अब सचमुच बेहोश हो जाऊँगा। उसकी बातें सुनकर दामिनी के चेहरे पर एक ही साथ न जाने कितने रंग आए और गए थे। रेचल ने जैसे ही मिठाई का टुकड़ा उसके मुँह की तरफ बढ़ाया था, दामिनी जैसे चौंककर नींद से जागी थी और फिर आँधी की तरह कमरे से बाहर निकल गई थी। मैंने उसे पुकारकर रोकना चाहा था, मगर मेरे गले से जैसे कोई स्वर ही नहीं निकला था।

उसके जाने के बाद कमरे में यकायक मौन पसर गया था। कुछ देर बाद मैंने रेचल की ओर मुड़कर देखा था। वह कमरे से बाहर निकल रही थी, होठों ही होठों में मुस्कराते हुए। मेरा जी चाहा था, बढ़कर उसका गला घोंट दूँ, मगर अपनी जगह से हिल भी नहीं पाया था।

इसके बाद न जाने मैंने कितनी बार दामिनी को फोन किया था, हर बार फोन बंद मिलता। उसके बँगले पर जाकर भी मुझे हर बार निराश ही लौटना पड़ा था। वह किसी भी तरह मुझे नहीं मिल रही थी। इधर शायद मिसेज लोबो के कान में भी मेरे और रेचल की बात पड़ गई थी। कई दिनों तक उनके घर में रिश्तेदारों का ताँता लगा रहा था। सभी आते-जाते मुझे घूरकर देखते। मिसेज लोबो का रवैया भी काफी बदल गया था। रास्ते में मुझे एकदिन गाँव के चर्च के पादरी मिले थे, मगर उन्होंने मुझे सहज ढंग से नजरअंदाज कर दिया था। मेरे अभिवादन का भी जवाब नहीं दिया था। और फिर एकदिन मिसेज लोबो ने मुझे घर खाली करने का नोटिस दे दिया था। कोई कारण भी नहीं बताया था। पूछने पर व्यंग्य से पूछा था - क्यों, तुमको नहीं मालूम मैन? हम तुमको जेंटलमैन समझता था... मैं चुप रह गया था।

ऑफिस में भी माहौल बदला-बदला-सा लग रहा था। जैसे लोग कतरा रहे थे मुझसे। बहुत पूछने पर किसी ने दबी जुबान से बतलाया था, मेरे नाम पर शिकायत हुई है। मैं एकदम से घबरा उठा था। अब मामला गंभीर होता हुआ प्रतीत हो रहा था। मैंने यहाँ के लोगों के स्वच्छंद व्यवहार को कुछ ज्यादा ही गलत ढंग से ले लिया था शायद। आखिर था तो यह भी भारतीय समाज का एक हिस्सा ही। मूलभूत संवेदनाएँ और चरित्र एक ही था। ऊपरी रंग-रोगन ने मुझे भ्रम में डाल दिया था। अब क्या करूँ... मेरा मन डूबने लगा था। एकदम से जैसे मेरी दुनिया बदल गई थी। सब कुछ गलत हो रहा था - एकदम सिरे से, क्या कुछ सँभालूँ और कहाँ से शुरू करूँ, समझ नहीं पा रहा था। हर तरफ तहस-नहस लगा था और बीच में मैं खड़ा था, एकदम चकित और डरा हुआ...

सबसे ज्यादा दामिनी की बेरुखी ने मुझे तोड़ दिया था। वह मुझे गालियाँ देती, मारती, चीखती-चिल्लाती... मगर कुछ नहीं। उसकी चुप्पी, अडोल खामोशी मुझे तड़पा रही थी। मैं स्वयं को बेहद अपमानित महसूस कर रहा था। रह-रहकर मुझे दामिनी की ठंडी आँखें, उनसे निसृत होती वितृष्णा और घृणा याद आती और मैं आहत हो उठता। क्या मुझे वह और एक अवसर भी नहीं देगी! कुछ तो - कुछ तो वह कहे। उसकी ये चुप्पी मुझे मारे डाल रही थी।

आँफिस में पूछताछ शुरू हो गई थी। इस बात ने मुझे और भी परेशान कर दिया था। उधर उमा भी तरह-तरह के सवाल करके मेरा जीना हराम कर रही थी। उसदिन मिसेज लोबो ने व्यंग्य से मुस्कराते हुए मेरे हाथ में एक कार्ड थमाया था - हमारा रेचल शादी बना रहा है। तुम भी आना जरूर...

यह सुनकर मेरे अंदर कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं हुई थी। कहीं से एकदम पत्थर हो आया था मैं। औरत को कभी समझ नहीं पाऊँगा। एक ही साथ वह अमृत और गरल की धार बन सकती है। प्रेम और हिंसा - दोनों में ही वह सारी सीमाएँ लाँघ सकती है। रेचल के उदार चेहरे के पीछे छिपे उसके अंतर्दाह को मैंने पहचाना नहीं था। प्यार में सिर्फ देने की बात करके वह सबकुछ चुपचाप समेटने की तैयारी में लगी थी। और आज वह मुझे कंगाल करके चली गई थी, अपनी दुनिया बसाने। सोचते हुए मेरा सर फटने लगता। इन दिेनों सबकुछ बहुत जल्दी-जल्दी और अप्रत्याशित ढंग से घटा था मेरे साथ।

घर जाने की बात करके मैंने सात दिन की छुट्टी ली थी अपने ऑफिस से और फिर आँजुना जाकर वहाँ के एक बीच रिसार्ट में चुपचाप पड़ा रहा था दिनों तक। मुझे लग रहा था, मैं किसी मरुभूमि में भटक गया हूँ। दूरतक बस अँधेरा और न खत्म होने वाला सन्नाटा है। कभी-कभी मुझे बेहद डर लगने लगता। अपने अकेलेपन से इतनी घबराहट होती कि रातभर कमरे की बत्ती भी नहीं बुझाता। इस बीच मैं जैसे स्वयं को भी भुला बैठा था। आईने में चेहरा देखता तो खुद को ही पहचान नहीं पाता।

इन सब के बीच शराब का ही एकमात्र सहारा था। उसी में डूबा हुआ मैं हर चीज को भुलाने की कोशिश करता रहा था। दिन-दिनभर बैठकर अरब सागर पर होती बारिश को देखता रहता। कभी बहुत तेज, कभी बूँदा-बाँदी, हल्की फुहार या महीन झींसी... नारियल के पेड़ जोगियों की तरह चुपचाप खड़े भीगते रहते। जैसे ध्यानमग्न हों... देखते हुए प्रतीत होता, जमीन आकाश एक हो गया है। गहरे स्लेटी आकाश के नीचे बिछा धूसर नील समंदर, ऊपर पानी की नन्हीं बूँदों का मटमैला बादल, धुंध और धुआँ... हर तरफ राख की रंगत का-सा बुझा हुआ उजाला... कैसा अवसाद भरा था सबकुछ - जल-थल में एक-सा व्याप्त... सच है, जैसे हमारे मन के अंदर होता है, वैसा ही मौसम बाहर भी होता है। कलतक हर तरफ धूप थी, शरीर हवा और खिलते हुए फूल थे। और आज? बस, ऊपर बरसता हुआ मेघिल, कुहरीला आकाश और नीचे बेडौल, बदरंग समंदर... उसका गंभीर, उदास स्वर - निरंतर, एकरस, जैसे किसी भीषण पीड़ा में अंदर-ही-अंदर घुमड़ रहा हो, ऐंठ रहा हो, छटपटा रहा हो...।

दामिनी कहती थी, आत्ममुग्धता के विरल क्षणों में - किसी बहती हुई नदी को ध्यान से देखा है तुमने अशेष? जब पानी की अबरकी देह झिलमिलाती है, पारा-पारा होकर आकाश की नीली आँखों में कौंधती है, धूप की उजली तितलियाँ लहरों के सतरंगी फूलों पर काँपती-उड़ती हैं, तब जान लो, पक्षी मेरे ही ऐश्वर्य के गीत गाते हैं। मैं धरती पर गुनगुनाती हुई आकाश का गीत हूँ, दुनिया को भेजा हुआ जन्नत का पैगाम हूँ। मैं वह प्यार भरी चिट्ठी हूँ जिसे स्वर्ग ने धरती के नाम लिखा है, मैं मनुष्य के हिस्से में आई हुई अमृत की अकेली बूँद हूँ... मेरी धार के ताव को सहने के लिए आशुतोष का धैर्य चाहिए, उसकी जटाओं की सामर्थ्य चाहिए। तुम क्या बाँधोगे या सहेजोगे मुझे...

सच कहती थी वह, इस उद्दाम नदी को, उसके आकुल प्लावन को सचमुच सहेज नहीं पाया मैं...

इस दौरान लगभग हर घंटे मैंने दामिनी को फोन किया था, मगर उसने कभी उठाया नहीं था। मैं एकदम निराश होने लगा था। और फिर एकदिन अचानक दामिनी ने फोन उठा लिया था।

उसी क्षण मैं उसके बँगले के लिए चल पड़ा था। उस समय की अपनी मनःस्थिति का मैं वर्णन नहीं कर सकता...

दामिनी मिली थी, कितने दिनों के बाद - किसी अजनबी की तरह। मैं उसकी आँखों में अपनी पहचान ढूँढ़ता रहा था, मगर वहाँ बस एक सपाट दीवार थी, जिसे मैं लाँघ नहीं सकता था। बॉल्कनी में खड़ी वह नीचे लॉन की तरफ देखती रही थी। एक अच्छी बारिश के बाद लान की ताजी, नर्म हरियाली धूप के चमकीले टुकड़ों से भर गई थी। सावनी फूलों की गुलाबी पँखुरियाँ पानी की नन्हीं बूँदों से तर थीं - उजली धूप की किरणों में हीरे के झुमके बनी हुईं। हवा में अनाम जंगली फूलों की तेज गंध थी, ठंडक भी। दामिनी की पीठ की तरफ देखते हुए मैं सोच रहा था, अब हमारे बीच फिर से कुछ भी पहले की तरह नहीं हो सकता। दामिनी दूर चली गई थी - हर स्तर पर - बहुत दूर... अब उसका यहाँ - मेरे पास होना - मरु में जल के भ्रम का होना है। वह कहीं नहीं है, मेरी दुनिया में कहीं नहीं है। एकाएक मैं कितना निसंग हो आया था।

दामिनी ने बहुत देर के बाद कहा था, एकदम सपाट और भावहीन स्वर में - जानते हो अशेष, उषा मर गई... आज सुबह। मगर, मरने से पहले उसने पुलिस को दिए हुए अपने बयान में कहा, वह खाना बनाते हुए खुद जल गई थी। मैंने कितना कहा उससे, अपना बयान बदल ले, मगर नहीं! कहती रही, हमारी छोटी बच्ची है मेम साहब, मैं तो नहीं जिऊँगी, मेरे बाद अगर उसका बाप भी जेल चला गया तो उसका क्या होगा? प्यार की मारी हुई ये औरतें...

औरतों की यह सहने की आत्मिक शक्ति... कुछ कहना मुझे जरूरी लग रहा था, मगर क्या, मैं खुद भी नहीं जानता था शायद। बिना सोचे कहता गया - 'नारी, तुम केवल श्रद्धा हो' इसीलिए कहा गया है शायद... यह मेरा फेवरिट कोट था, हर जगह दुहराता फिरता था।

नारी केवल श्रद्धा है... दामिनी ने गहरे व्यंग्य से मेरे शब्द दोहराए थे - यहाँ शब्दों को गहनों की तरह इस्तेमाल करके उनसे औरतों को बहलाया जाता रहा हैं - कितना खूबसूरत जुमला होता है, उन्हें हक भी देते हैं तो सेवा का। मगर मुक्ति या निर्वाण का अधिकार नहीं। औरतों की मुक्ति सिर्फ पति की सेवा में है... अब वह हँस रही थी शायद, बहुत हल्के से, गुनगुनाहट की तरह -

कभी सोचा है, औरतों को उसके स्त्रीत्व से बेदखल कर देने की ये कैसी गहरी साजिश है! संबंध की दुहाई देकर बँधुआ मजदूर बनाकर उसका आजीवन शोषण करने की साजिश... मठों में उसका प्रवेश नहीं, मोक्ष का अधिकार नहीं, प्रजनन, शिक्षा, संपत्ति के अधिकार से वंचित... एक बात बताओ, दुनिया की आधी आबादी को नकारकर तुम इसे मुकम्मल कैसे बनाओगे? वह पहले भी यह सवाल मुझसे कर चुकी है, मगर मेरे पास उसदिन भी इसका जवाब नहीं था, आज भी नहीं है। वह रुकी नहीं थी - यहाँ का जैसे हर रिवाज ही स्त्रियों के खिलाफ गढ़ा गया है। विवाह में स्त्रियों का दान किया जाता है। वह कोई वस्तु है? और कहा जाता है, शादी दो आत्माओं का मिलन है, ये स्वर्ग में बनता है, जन्म-जन्मांतर का रिश्ता... फिर इस पवित्र रिश्ते को दहेज के तराजू में तोला जाता है। कितने कटु थे उसके शब्द -

मेरे लिए तो ऐसी शादियाँ भी वेश्यावृत्ति ही हैं जिनमें दो जून की रोटी और कपड़े, छत के बदले में स्त्री को आजन्म गुलामी करनी पड़ती है - देह से और मन से भी।

मैं उसे चुपचाप सुनता रहा था। और कर भी क्या सकता था। वह उसी तरह मेरी तरफ पीठ किए हुए खड़ी रही थी। उसके खुले बाल हवा में उड़ रहे थे। बारिश से धुले हुए नीले आकाश में जड़े हुए इंद्रधनुष की तरह उदास और एकाकी दिख रही थी वह उस क्षण... एक पल के लिए जी चाहा था, बढ़कर उसे अपनी बाँहों में ले लूँ, झिंझोड़ डालूँ बुरी तरह से। पूछूँ, क्यों इतनी चुप हो, कुछ कहती क्यों नहीं?

मगर मैं ऐसा कुछ भी नहीं कह सका था। चुपचाप पहले की तरह बैठा रहा था, उसे सुनते हुए। दामिनी मुड़ी थी और कुर्सी पर आ बैठी थी। मगर मेरी तरफ एक पलक भी नहीं देखा था। अपने में डूबी बुदबुदाती रही थी - उषा भी चली गई...

ये होना था, दुख मत करो। इसे हम या तुम रोक नहीं सकते, चाहकर भी... मैं तसल्ली के लिए शब्द तलाश रहा था, मगर स्वयं को व्यक्त करने में असमर्थ पा रहा था।

हाँ, सबकुछ पहले से तय होता है... खुद को समझाती हूँ, मगर...बिछड़ने का ये अंतहीन सिलसिला... मेरा तो कोई सखा नहीं, मैं किस गीता पर आस्था रखूँ... ये असंबद्ध-से शब्द उसने बहुत रुक-रुककर धीमी आवाज में कहे थे, जैसे स्वयं से ही संबोधित हो। मैंने उसके चेहरे पर गहराई उदासी की झाँइयाँ देखी थी, कुछ ही दिनों में जैसे वह बूढ़ी हो आई थी, चेहरे का नमक, लुनाई, मोहक लावण्य... सबकुछ सूख गया था। उसे देखते हुए मैं एक गहरी यातना में हो आया था। उसके चेहरे पर खिंचा हुआ मीलों लंबा सन्नाटा और अछोर दर्द - जैसे दोपहर की तेज धूप में झुलसती हुई फूलों की नाजुक पँखुरियाँ... कभी उसी ने कहा था, हरजाई मर्द का छल हरी-भरी अमराई-सी औरत को सूखे बबूल का ढेर बनाकर रख देता है...

- हमारे हिस्से का जीवन हमें जीना है दामिनी... मैंने इस लंबी चुप्पी, जो उसके बात कर चुकने के बाद हमारे बीच पसर गया था, को तोड़ने का प्रयत्न किया था। सुनकर उसने एक गहरी साँस ली थी - हाँ... ये जीवन... फिर हल्के-से मुसकराई थी - मृत्यु को किस्तों में जीने का एक परवर्टेड सुख-सा होता है ये जीवन... पतझड़ के पीले पत्तों की तरह झरता हुआ निरंतर... इसका भी एक मौन संगीत होता है - टूटने का, खत्म होने का - हमेशा - हमेशा के लिए! कभी सुनो, नींद आ जाएगी, जागना नहीं चाहोगे एक उम्रतक के लिए...।

कहते हुए उसे सचमुच जैसे नींद ने आ घेरा था। गहरी साँसें लेती हुई पड़ी रही थी न जाने कितनी देरतक। मैं चारदीवारी के पास खड़े गुलमोहर को देख रहा था। उसके सारे फूल झड़ गए थे। गहरे हरे पत्तों से नंगी डालियाँ भर गई थी। मैं यहाँ बहुत उम्मीद से आया था आज, न जाने किस बात की उम्मीद, मगर अब जी चाह रहा, यहाँ से उठकर चला जाऊँ। दामिनी का व्यवहार, जैसे मैं उसका कोई भी न लगता होऊँ, एक परिचित मात्र, मैं सह नहीं पा रहा था...

न जाने कब दामिनी उठकर बकार्डी की दो बोतलें उठा लाई थी - लो, जमाइकन फ्लेवर, तुम्हें पसंद है... उसका ये कहना मुझे अच्छा लगा था। उसे मेरी पसंद की याद है।

आज सुबह से रोना चाह रही हूँ, मगर रो नहीं पा रही। सोचा था, तुम्हें देखकर रो सकूँगी, मगर... कहते हुए वह यकायक चुप हो गई थी। उसके शब्दों में छिपा दंश मेरे अंदर कहीं गहरे कसका था। ठंडे पेय की घूँट लेती हुई वह कहती रही थी - जब दुख में होती थी, माँ की गोद में छिप जाती थी। माँ को कुछ भी बताना नहीं पड़ता था। वे मेरी मनःस्थिति समझ जाती थीं। कहती थी - नाड़ी कट जाने से क्या साथ छूट जाता है। तू कल भी मेरे भीतर थी और आज भी है, मेरी जिंदगी की तरह। तुझे समझने के लिए मुझे किसी भाषा की जरूरत नहीं पड़ती। मुझे अपनी गोद में समेटकर कहती थी, जितना चाहे रो ले, हल्की हो जाएगी। माँ की गोद में चेहरा छिपाकर रोने का वह सुख मुझसे आज भी नहीं भूलता। प्यार से कोई थाम ले तो दर्द के निर्मम काँटे भी नर्म फूलों में तब्दील हो जाते हैं... कहते हुए दामिनी के शब्द भीगने लगे थे, उनमें हल्की लरज समा गई थी - माँ जबतक थीं, मेरे हर दुख में छिपा एक सुख था। आज जो वह नहीं तो कोई सुख सुख नहीं। जीवन के बहुत थोड़े सुखों में से एक माँ थीं। उनको खोकर क्या खोया है, कह नहीं सकूँगी। हाँ, हमेशा के लिए बेघर हो गई हूँ। उनके आँचल के बगैर कोई छत अब छाँव नहीं देती। वह मेरी धूप और बारिश की छतरी, सर्दी की धूप... सबकुछ थीं।

तो आज भी रो लो, मेरी गोद में... मैंने बढ़कर उसके बालों में उँगलियाँ फिराने की कोशिश की थी, मगर वह परे हट गई थी - नहीं, अब नहीं। कहकर उसने तेजी से अपनी पलकें झपकाईं थीं - माँ थीं तो रोने का कोई अर्थ था, हक भी बनता था। मगर अब रोना दयनीयता के सिवाय कुछ भी नहीं...

मैं शर्मिंदा-सा खड़ा रह गया था। कितनी आसानी से यह आत्मीय चेहरे पिघलकर सपाट दीवार में तब्दील हो जाते हैं। इन दीवारों से टकराकर सिर्फ लहूलुहान हुआ जा सकता है, और कुछ भी नहीं...

दामिनी ने बकार्डी की दूसरी बोतल खोल ली थी - अब तुम जा सकते हो अशेष, शाम घिर आई है... वैसे आने के लिए थैंक्स... मुझे बिना ऑफर किए उसने नई बोतल से पीना शुरू कर दिया था। मेरे अंदर आग की एक तीखी लकीर-सी खिंच गई थी, इतनी अवज्ञा... ये बूँद-बूँद जहर क्यों, स्लो पॉयजनिंग... अगर उसने सबकुछ खत्म कर देने का ठान ही लिया है तो फिर एक ही बार, एक ही झटके में क्यों नहीं। मैं उससे क्षमा ही माँग सकता हूँ, यदि वह चाहेगी तो पैर भी पकड़ लूँगा, मगर वह मुझे एक मौका तो दे। इतना भी मर्यादाबोध वह मुझे नहीं दे रही। इस तरह से व्यवहार कर रही है कि जैसे कहीं कुछ घटा ही नही है। तटस्थता और अवमानना का चरम है ये। मैं इस तरह से जी नहीं पाऊँगा। मैं यकायक हद से गुजर जाने के लिए तैयार हो गया था। इस कगार पर पहुँचकर अब आगे एक गहरी खाईं के सिवा कुछ भी नहीं। मगर पीछे भी तो शून्य ही है।

दामिनी लड़खड़ाती हुई उठ खड़ी हुई थी - आज मैं किसी को एक्सपेक्ट कर रही हूँ अशेष, एक बहुत पुराना मित्र... नवीन... मैं यह नाम पहले भी सुन चुका था, कभी दामिनी के अंतरंग संबध थे उसके साथ। मेरे अंदर कुछ खौलने लगा था, तो ये बात है!

मैंने आगे बढ़कर दामिनी का हाथ पकड़ लिया था - तुम मुझे इग्नोर कर रही हो...

- नहीं तो! दामिनी मुसकराई थी - तुम्हें इग्नोर करने की कोई जरूरत नहीं है।

- हाँ, तुम ऐसा कर रही हो... मैं जिद पर आने लगा था।

- खुद को तुम कुछ ज्यादा ही इंपार्टेंस दे रहे हो अशेष... दामिनी के स्वर का व्यंग्य और भी तीक्ष्ण हो आया था।

- क्या तुम सबकुछ खत्म करना चाहती हो? पूछते हुए मेरी आवाज कँपकँपा आई थी।

- अरे नहीं! उसने अपने कंधे उचकाए थे - तुम रह सकते हो, इतने सारे हैं, तुम क्यों नहीं... फिर कुछ था भी क्या खत्म करने के लिए!

- मतलब...? मैं एकदम से बौखला उठा था।

- मतलब... मेरे शब्दों को दोहराती हुई वह हँसी थी - मतलब - मतलब कुछ नहीं... बात इतनी-सी है कि अबतक तुम्हीं थे, और अब... तुम भी हो!

- दामिनी...

- आज कौन है तुम्हारी 'डेट'? उसकी मुस्कराहट थमी नहीं थी।

मेरा सारा धैर्य अचानक समाप्त हो गया था। निर्णय के इस अवश्यंभावी क्षण में मैंने उसकी कोमल काया झिंझोड़ डाली थी, ऐसे कि उसकी नर्म चंपई कलाइयों पर नीली धारियाँ पड़ गई थीं। मैं टूटा हुआ था, अतः उसे भी तोड़ डालना चाहता था। डूबने से बचने के लिए दूसरे को डुबाने जैसी मनःस्थिति में हो आया था। एक अमूर्त यातना में पारे-सी थरथराती उसकी आँखों में... वह फिर भी अदम्य नजर आई थी - 'कोई भी सवाल करने का अधिकार तुम खो चुके हो अशेष, अपनी कमियों का आरोपण तुम मुझपर करने का प्रयास रहे हो! पहले स्वयं से पूछना सीखो...'

नहीं पूछ सकता, तभी तो तुमसे पूछ रहा हूँ...। आह! छिपाते-छिपाते मैंने स्वयं को किस तरह उसके सामने पूरी तरह से उघाड़ दिया था। उसकी कौंधती आँखों में उस समय मैं कैसा दयनीय लग रहा हूँगा, सोचने की सामर्थ्य भी मुझमें नहीं बची थी। मैंने अपना आखिरी हथियार उठाया था - ये मेरे होने न होने का प्रश्न था - मैंने तुम्हें सबकुछ दिया - ऐश्वर्य, सुख, पहचान...। और तुमने मुझे ही ठग लिया!

ठग लिया...! क्यों, क्या यह सब करने के पीछे तुम्हारी जो मंशा थी वह पूरी नहीं हुई? भोगा नहीं तुमने मुझे जी भरकर, जिस तरह भी चाहा?

उफ! उसकी उन कौंधती आँखों का मारक व्यंग्य...। मैं लहू-लहू हो उठा। अपमान की जलती तीलियाँ मेरी आत्मा तक पहुँच गई थीं। कहीं मेरा सर्वस्व धू-धू हो रहा था - क्या मैं बस इतना ही चाहता था? बात के अंत तक आते-आते मेरी आवाज में बाढ़ की हरहराहट-सी आ गई थी। उसकी काँच जैसी पारदर्शी त्वचा पर रिस आई वितृष्णा ने मुझे गहरे तक दाग दिया था। मैं रोना नहीं चाहता था, बस, बाकि धरती फट जाय...।

अच्छा! तो तुम्हें मुझसे कुछ और भी चाहिए था! कमरे में पहुँचकर वह कपड़े बदलने लगी थी। ब्रेसियर के हुक लगाते हुए उसने बड़े निर्दोष स्वर में कहा था। उसका गुदाज बदन मुझे अब भी कैफियत में डाल रहा था। हद है! वह अनजान बनी चुनौतियाँ दिए जा रही थी। मैं आज सचमुच आहत था। उसकी आवाज में भरी लताड़ को मैं सह नहीं पा रहा था। मेरी दैहिकता को उसने कठघरे में खड़ा कर दिया था। मुझे प्रतिरक्षा में उठना ही था। यह मेरी अस्मिता का प्रश्न था।

तो क्या मैं तुम्हारी इस न जाने किस-किस की जूठन बनी देह के पीछे था? इसी के लिए अपना सबकुछ छोड़ दिया...? खुद को भी एक हद तक खत्म कर डाला...? अपने परिवार के सामने, ऑफिस में, पूरे समाज में मैं आज कहीं मुँह दिखाने के भी लायक नहीं रहा। सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए... अपने आरोपों से आज मैं उसे छलनी कर डालना चाह रहा था। इस निःशेष क्षण में शायद मेरा यही एकमात्र संबल था।

तो आपको आत्मा, प्यार वगैरह की भी तलब होती है! अब ये मत कह बैठना कि मर्द लिंग नहीं, चेतना भी होता है, आत्मा भी होता है...। अपनी उसी मारक हँसी की वन्या में वह एकबार फिर बह गई थी। बिस्तर पर हँसी के जलतरंग में डूबती-उतरती उसकी देह जैसे ईप्सा के चरम रास के लिए ही रची गई थी। उसे हर क्षण इसका इल्म था और ऐतराज भी नहीं था। लड़ने से नहीं, साथ देने से घर्षण सहज हो जाता है। ये घर्षिता की समझदारी है या उसकी विवशता, वही समझती रहे।

मैं अपना आपा खो बैठा था -

अगर मैं न रहा तो तुम भी क्या बचोगी!

तो तुम मुझे धमकी दे रहे हो? मेरी बात का उसपर कोई असर नहीं था। मेरी दुर्बलता को उसने कैसे आर-पार जान लिया था - अशेष, मैं प्रकृति से पानी हूँ, निरंतर अपना रास्ता तलाशती हुई, हर क्षण, हर आकार, हर स्थिति में ढलती हुई... अपना अस्तित्व न खोकर भी दूसरों की शक्ल अख्तियार करने में पूरी तरह समर्थ, सक्षम! मैं जीवन का भी उत्स हूँ, उसे सींचकर हरा करती हूँ। जीवन माँगता है जीवन मुझसे, मुझे मृत्यु का भय मत दिखाओ......

एक पल रुककर वह मुड़ी थी - तुम जैसे मुझे खत्म नहीं कर सकते अशेष, क्योंकि औरत कभी खत्म हो ही नहीं सकती... उसने अपना आँचल सीने पर फैलाया था, शायद स्वयं को और अधिक उजागर करने के लिए - देखो, प्रकृति के पास दो ही विकल्प है - या तो औरत के होने का या कुछ भी न होने का और जीवन कुछ भी न होने का विकल्प कभी चुन ही नहीं सकता। सुन लो जान! मुझसे मत लड़ो, संधि कर लो, समझदारी इसी में है कि तुम मेरी पतलून पलटन में शामिल हो जाओ... ऐसा कहते हुए उसकी आँखों में गहरा व्यंग्य और शरारत उतर आई थी। हँसी छिपाने की कोशिश में चेहरा सुर्ख हो रहा था।

पतलून पलटन... इन शब्दों को उच्चारते हुए मेरा मुँह शायद आश्चर्य से कुछ ज्यादा ही खुल गया था। न जाने वह आज किस मूड में थी...

क्यों, अगर तुम जैसे मर्द घाघरा पलटन बना सकते हैं तो हम औरतें पतलून पलटन नहीं बना सकतीं... उसकी आँखों की नीली कौंध अबतक मारक हो उठी थी, जैसे लहक उठेगी -

यह तुम्हारे अस्तित्व का सवाल है। रही बात मेरी... उसने अपनी साड़ी नाभि के बहुत नीचे तक सरकाई थी, मेरी देह में उबाल खाता लहू यकायक पौरुष की कठिन रेखाओं में तब्दील हो जाना चाहता था, मगर मैंने उसे अपने पैरों के बीच कुचल डाला था। इस हद से ज्यादा जलील मैं हो नहीं सकता था।

एक क्षण रुककर उसने मुझे व्यंग्य से देखते हुए अपनी बात आगे बढ़ाई थी - रही बात मेरी, तो मैं नमक-सी घुली हूँ हर नस में, जीवन का स्वाद हूँ - सनातन स्वाद हूँ। शिवलिंग धारे हूँ - गौरी पट हूँ - समझे मिस्टर लिंगम? फिर पागल कर देनेवाली वही मातवाली हँसी। मैंने धैर्य से उन्माद का वह पल गुजर जाने दिया था - तुम तो कहती थी मुझसे इतना प्यार करती हो...

उससे तो कभी इनकार नहीं किया, मगर इतना तय है कि अपनी माँ की तरह प्यार को कभी मैं अपनी कमजोरी नहीं बनने दूँगी...

मैं तुम्हारा पहला प्यार हूँ... मैं नाराज दिखना चाहता था, मगर दयनीय बनता जा रहा था। अपनी आँखों में रिस आए पिघलाव को मैं रोक नहीं पा रहा था किसी तरह।

हाँ, मगर आखिरी तो नहीं... कभी किसी ने कहा था अशेष, आज सोचती हूँ कि कितना सही कहा था - प्यार जैसी शाश्वत चीज कभी पहली या आखिरी कैसे हो सकती है...

एक स्त्री होकर तुम... न जाने मैं क्या कहना चाह रहा था।

लो, शुरू हो गए... कॉमेडी क्या है, जानते हो, एक मूर्ख से मूर्ख पुरुष भी स्त्री धर्म क्या है, जानता है, मगर एक पंडित भी उनके प्रति अपना कर्तव्य नहीं जानता, सिर्फ अधिकार याद रहता है उनको। कितने जजमेंटल बन जाते हैं लोग औरतों के मामले में... सिर्फ सतीत्व ही स्त्रीत्व नहीं होता, ये कब समझोगे तुमलोग...? कहते हुए उसकी आवाज में बिखराव था, गहरा नशा भी। लहराकर चल रही थी वह, किसी बेसुध नागिन की तरह।

- तुम इस तरह से सोचती हो, यदि पहले जानता... मेरे सारे तर्क, युक्ति गडमड होने लगे थे।

तो तुम्हें कभी न अपनाता, त्याग देता... हैं न अशेष? मेरी बातों को उसने बीच में ही झपट लिया था और फिर मुस्कराने लगी थी -

तुम तो मुझे हमेशा से ही छोड़ते आए हो पुरुष! ...कभी बुद्ध बनकर तो कभी राम होकर... लक्ष्मी भी तुम बनाते हो और वेश्या भी तुम ही बनाते हो। स्त्री तो पैदा भी नहीं होती, बना दी जाती है - इसी दुनिया में। यह तुमसे बेहतर कौन जानता है! कुछ और बात करो... उसके स्वर में वितृष्णा गहरी हो आई थी। आँखों में उसी का नीला जहर ओर-छोर फैला था।

दो पल के लिए हमारे बीच की चुप्पी ऐंठती, खिंचती रही थी। दामिनी के कमनीय चेहरे में आज जलजला-सा कुछ भीषण, कुछ अदम्य था। मैं अंदर ही अंदर सिकुड़ रहा था, बौना पड़ता जा रहा था। मेरे अंदर कोई नैतिक बल नहीं था। किसके सहारे सतर्क होकर खड़ा रहता! मेरी रीढ़ मे जैसे कीचड़ भर गई थी, मैं लथपथ हो रहा था एकदम से। लुंजपुंज... थोड़ी देर बाद जब वह बोली थी, मैं उसकी धार से कट-सा गया था -

स्वर्ग और धरती के बीच त्रिशंकु की तरह जीनेवाली औरत ने तो कभी किसी स्वर्ग की कामना भी नहीं की थी। वह अपना स्वर्ग स्वयं रचना चाहती थी। मगर उसे भी तुमलोगों ने नर्क में बदलकर रख दिया...

न जाने कितनी देर बाद उसने खुद को समेटते हुए हँसी से सजल हो आई आँखों को अपनी उल्टी हथेली से पोंछा था - क्यों मनु, कितनी बार श्रद्धा तुम्हारे हाथों छली जाएगी? तुम्हारी फितरत तो बदलने से रही। दैहिक भूख के वशीभूत हो पशु के स्तर पर जीते चले जाना तो तुम्हारी नियति है ही, मगर श्रद्धा में अब इड़ा का भी समावेश हो गया है, वह अब हृदय भी है और बुद्धि भी... अपराजेय हो गई है! तुम्हारे छल-प्रपंच की पहुँच से बहुत दूर...

श्रृंगार मेज के आईने में समस्त मायावी आरोह-अवरोह के साथ प्रतिबिंबित अपनी काया को निहारते हुए न जाने इसबार वह कैसी पनीली आवाज में बोलने लगी थी। साथ में पलकों की सघन कतारें भी दीए की सुनहली पाँत की तरह झिलमिला उठी थीं।

- माटी की इस बाँबी में कीड़ों की तरह रेंगती हुई जिंदगी तुम्हें चाहिए तो लो, मैं यह तुम्हारे पास रखे जाती हूँ...। उसने अपना आँचल सरकाकर ब्लाउज की डोरियाँ अलगा दी थीं - मगर अब श्रद्धा की श्रद्धा तुम्हारी नहीं, उसका हृदय तुम्हारा नहीं, वह स्वर्ग की थाती हो गई है - प्रेम का दिव्य पुष्प जिसे देवता भी अपने चरणों में रखवाने का दुस्साहस नहीं करता, सर माथे लेता है!

यकायक वह झटके से मुड़कर खड़ी हो गई थी। शायद पलकों पर भीग आए मन को ही छिपाना चाहती थी। इसकी एक झलक भी वह मुझे अब दिखाना नहीं चाहती... मेरा दिल डूबने-डूबने को हो आया था। माटी के मोह में शरीर क्या, आत्मा भी इसमें दबकर रह गई है। मेरे हाथों से मुक्ति का आकाश दूर, बहुत दूर हो गया है। मुझे घुटन हो रही है - ये किसने मेरी जीवन रेखा एक ही झटके से काट दी है!

हाँ, मुझसे - मनु से भूल हुई। बल्कि मैं स्वयं एक भूल हूँ - विधाता के हाथों से हुई शायद पहली और आखिरी भूल। हाड़-मांस का इनसान होना कभी-कभी इतना गलत क्यों हो जाता है...?

मेरी तरफ देखकर वह फिर सामान्य ढंग से मुसकराई थी - जो तुम्हारा काम्य था, वही तुम्हारा प्राप्य है, फिर यह शिकायत क्यों? उसके चेहरे की सहज हो आई रेखाओं में न जाने मैं क्या ढूँढ़ रहा था। अब वहाँ मेरे लिए कुछ भी न था - न प्रेम, न वितृष्णा, न ही कुछ और... उसकी बोलती हुई आँखें आज सपाट दीवार में तब्दील हो चुकी थीं। एक गहरे शून्य के सिवा वहाँ कुछ भी नहीं था। मेरे अंदर एक डूब पैदा होने लगी थी यकायक। कैसा सर्वहारा अहसास था ये!

- मैंने तुम्हें बार-बार स्वयं को संपूर्णता में देना चाहा, मगर तुमने मुझे हर बार खाली हाथ लौटा दिया... और अब तो... मेरे संपूर्ण प्रेम और समर्पण के बदले में तुमने... इतना कहने में ही जैसे वह हाँफ गई थी - जो तुमने किया, पूरे होशो-हवास में किया, सोच-समझकर, फिर तुमसे कुछ पूछकर मैं स्वयं को छोटी क्यों करूँ? इतना आत्मसम्मान तो है मेरा...

मुझमें वहाँ से हट जाने की शक्ति भी नहीं बची थी, कहाँ जाता...! खुद से छूटकर कहाँ जाता...! सदियों की दहलीज पर खड़ा मैं जैसे निर्णय के एक क्षण का मुखापेक्षी था। निर्णय का ये दैवीय क्षण न जाने कितनी पीढ़ियों का दिशा निर्देशन करता है, शताब्दियों को चेहरा देता है और देता है इतिहास को उसका साक्ष्य।

इस विलक्षण क्षण में जैसे वह संपूर्ण मायावी बन गई है - यथार्थ से भी स्पष्ट, मगर स्पर्श से परे! कर्पूर की तरह किसी अलौकिक जगत में अंतर्धान होती हुई-सी। वेश्या के आँगन की मिट्टी से बनी एक दिव्य प्रतिमा। मैं अभिभूत देखता हूँ, देखता हूँ... एक ही सेज पर हमने अपनी-अपनी वासनाओं को जिया है, फिर मैं कैसे उस सेज की एक सिलवट मात्र बनकर रह गया और वह उससे इतना ऊपर उठ गई! - जैसे हाथ बढ़ाकर स्वर्ग ही छू लेगी।

जिस काम को उसने अपने निर्वाण का मार्ग बनाया, वही मेरे लिए एक कलंक क्यों कर बन गया? क्या ये विपर्यय दृष्टिकोण में फर्क की वजह से है या विधाता का कोई दारुण अन्याय? संभोग किसी के लिए शरीर से की गई प्रार्थना है तो किसी के लिए घर्षण की एक ग्लानि मात्र या लंपट होने का आजीवन आक्षेप...

वह मेरी सोच को सुनती हुई-सी कहती है, बहुत शांत और स्थिर आवाज में, बिना किसी उत्तेजना के, जैसे गहरी प्रार्थना में हो - सच्चे प्रेम में अपनी संपूर्ण आस्था और हृदय से किया गया कोई भी काम कभी गुनाह नहीं हो सकता... मगर हवस गुनाह ही होती है... सजा तो तुम्हें मिलनी ही है...

उसकी आवाज गूँजती हुई-सी प्रतीत हुई थी, आकाशवाणी की तरह। सुनकर मैं स्तंभित खड़ा रह गया था - धीरे-धीरे स्वयं को एक लिंग में आपाद-मस्तक परिवर्तित होते चले जाने के एक भयानक अनुभव के साथ। दामिनी की आँखें नीली द्युति में अब भी कौंध रही थीं - अपरिहार्य नियति की तरह...!


3 टिप्पणियाँ:

Kavita Rawat ने कहा…

जयश्री राय जी से परिचय और उनके उपन्यास "औरत जो नदी है" की प्रस्तुति हेतु धन्यवाद

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

जबश्री राय कहानीकार के रूप में एक जाना माना नाम है .उनकी कहानियाँ हंस कादम्बिनी में छपती रहतीं हैं .उनके उपन्यास की प्रस्तुति के लिये धन्यवाद मैं अवश्य पढ़ूँगी .

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