Subscribe:

Ads 468x60px

सोमवार, 13 मार्च 2017

फागुन को फागुन बना जायेंगे !!!




थोड़े लाल अबीर आज भी बचे हैं 
कागज़ की छोटी सी पुड़िया में 
प्यार दुलार सम्मान के अबरखों के साथ ...
जब हम छोटे थे 
युवा हुए ... 
तब तक आमों पर आये मंजर की खुशबू
हवा में फागुनी सनसनाहट बरकरार थी
असली रंग तो हवाएं ही लगा जाती थीं !
फागुन के गीत
ढोलक की थाप पर
जब दरवाज़े पर बजते थे
तो खाने का स्वाद
प्यार की भांग से
नशीला हो उठता था
रिश्ते पड़ोस के भी
अपने से अधिक अपने होते थे
रंग लगे प्लेट में खाना
प्रगाढ़ता की मिसाल थी !!
जब धीरे धीरे रिश्ते परदेस गए
तो कागज़ में अबीर भेजकर होली मन जाती थी
फिर अचानक .... बिल्कुल अचानक ही
ये सारे रीति-रिवाज़ बेकार हो गए
पुआ,दहीबड़ा बनाना पहाड़ हो गया
बड़े शहरों में होलिका जली ही नहीं
लोगों का एक-दूजे संग मिलना बंद हो गया
बदले की भावना इस सीख से परे प्रबल हो गई
कि - होली में दुश्मन भी अपने रंग में आ जाते हैं
............. अब !!!
ये अबरखी अबीर उस दिन के इंतज़ार में हैं
कोई तो पहल करेगा लौटने की
फिर खेलेंगे होली
गायेंगे होली
नए नए कपड़ों में बसंत की तरह निकलेंगे
मीठे मीठे रस में भंग के नशे की तरह
शोर मचाएंगे
असली रंग में फिर से रंग जायेंगे
फागुन को फागुन बना जायेंगे !!!



2 टिप्पणियाँ:

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत सुन्दर.....

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति। होली मंगलमय हो।

एक टिप्पणी भेजें

बुलेटिन में हम ब्लॉग जगत की तमाम गतिविधियों ,लिखा पढी , कहा सुनी , कही अनकही , बहस -विमर्श , सब लेकर आए हैं , ये एक सूत्र भर है उन पोस्टों तक आपको पहुंचाने का जो बुलेटिन लगाने वाले की नज़र में आए , यदि ये आपको कमाल की पोस्टों तक ले जाता है तो हमारा श्रम सफ़ल हुआ । आने का शुक्रिया ... एक और बात आजकल गूगल पर कुछ समस्या के चलते आप की टिप्पणीयां कभी कभी तुरंत न छप कर स्पैम मे जा रही है ... तो चिंतित न हो थोड़ी देर से सही पर आप की टिप्पणी छपेगी जरूर!

लेखागार