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बुधवार, 23 नवंबर 2016

2016 अवलोकन माह नए वर्ष के स्वागत में - 9




जीवन में हुई हर बातों, हर घटनाओं का अपना एक सार होता है, जिससे हमें शिक्षा मिलती है।  कुछ परिणाम ज़िद के होते हैं, कुछ असावधानी के, कुछ अति सहनशीलता के, कुछ क्रोध के  ... 
यूँ जब हमें कोई किसी बात के लिए मना करता है तो हमें लगता है, कितनी नसीहतें - उफ्फ !
पर जब कोई घटना अपने आगे रूप ले लेती है तो हम उन नसीहतों के पीछे की शुभ इच्छा को समझ पाते हैं। 

bal-kishore.blogspot.in पवित्रा अग्रवाल ने बच्चों के लिए और निःसंदेह उनके 

अभिभावकों के लिए बनाई है। 



   पड़ौस के घर में एक परिवार रहने आया था ,उसमें दादाजी के उम्र के एक व्यक्ति और उनकी पत्नी थीं ।वह लंगड़ा कर चलते थे और कड़क स्वभाव के थे ।वह अपने साथ बहुत से गमले लाए थे जिस में बहुत तरह के रंग बिरंगे फूल खिलते थे । वह अपने पौधों की बच्चों की तरह देख भाल करते थे ,वह बांसुरी भी बहुत अच्छी बजाते थे।
       बच्चे उन पौधों को देख कर बहुत ललचाते थे . उनका बस चलता तो वह एक भी फूल पौधों पर नहीं छोड़ते पर उनका कड़क स्वभाव देख कर बच्चे उनसे दूर ही रहते थे ।
       एक दिन पौधों के पास किसी को न देख कर सौमेश अपने को नहीं रोक पाया और दो तीन फूल तोड़ लिए, तब ही वहाँ दादाजी आ गए और उसका हाथ पकड़ कर बोले---' यह क्या किया तुमने ... आगे से ऐसा गल्ती मत करना वरना तुम्हारे पापा से शिकायत कर दूँगा,अब जाओ यहाँ से ' 
     तब से उन दादाजी टाइप व्यक्ति का नाम बच्चों ने लंगड़दीन रख दिया और उन्हें देख कर एक गाना गाते थे -- "लंगड़दीन ,बजाए बीन '
     पतंग के दिन आने वाले थे ।बाजार रंग बिरंगी छोटी बड़ी पतंगों से भरा पड़ा था. रास्ता चलते बच्चे बड़ी हसरत से पंतगों को देखते थे पर अभी स्कूल खुले हुए थे तो पतंग उड़ाने की छूट उन्हें नहीं मिली थी। पर जैसे जैसे पतंग के दिन नजदीक आ रहे थे, दादा जी का दखल बढ़ने लगा था ।वह निकलते बैठते बच्चों को बहुत नसीहतें देने लगे थे ।
      किसी से कहते, सुनो आराम से पतंग उड़ाना , लूटने के लिए उसके पीछे मत दौड़ना, गिर गए तो जान भी जा सकती है।... देखों बच्चों लोहे की छड़ से पतंग लूटने की कोशिश कभी नहीं करना .’
      कुछ बच्चे ये नसीहतें सुन सुन कर उनसे चिढने लगे थे .स्कूल की छुट्टी होते ही बच्चे पतंग उड़ाने की फ़िराक में रहते थे .दोपहर को पापा लोग तो काम पर चले जाते थे ,जिन की मम्मी नौकरी करती थीं वह भी घर में नहीं होती थीं ,बस बच्चों को पतंग उडाने का मोंका मिल जाता था .
      बस ऐसे ही एक दिन अमित के मम्मी पापा काम पर गए हुए थे , दादी गाँव में थीं. अमित अपने दो तीन दोस्तों के साथ छत पर पहुँच गया था. सब अपनी अपनी पतगें और चरक लेकर आ गए थे और बड़ी तल्लीनता से पतंग उड़ा रहे थे.तभी एक बहुत बड़ी और बहुत सुंदर उड़ती पतंग पर बच्चों की नजर गई तो वह पतंग उड़ाना भूल कर उस को ही देखते रह गए और उसे पाने के लिए उस पतंग से पेच लड़ा कर उसे काटने की कोशिश करने लगे .
       देखते ही देखते वह पतंग कट कर नीचे की तरफ आने लगी और बच्चे अपनी पतंगों को हवा में ही छोड़ कर उसे पकड़ने की कोशिश करने लगे.एक बच्चे  ने वहां पड़ी लोहे की सरिया को उठाना चाहा तो दूसरे बच्चे को लंगड़दीन की बात याद आगई , बच्चे ने छड़ उसके हाथ से ले कर दूसरे कोने में डाल दी पर उस समय बच्चे किसी भी तरह पतंग लूट लेना चाहते थे और तभी अचानक वह हादसा हो गया . अमित छत से नीचे गिर गया था .आस पास कोई नहीं दिख रहा था. बच्चे  मदद के लिए चिल्लाने लगे .
     शोर सुन कर लंगड़दीन बाहर आये, बच्चे को बेहोश पड़ा देख कर जल्दी से बच्चों की मदद से ऑटो में डाल कर अस्पताल ले गए .जगह जगह से खून बह रहा था . डाक्टर को सौंप  कर वह हताश से बैठ गए थे .तब बच्चों ने बताया कि पतंग लूटने के चक्कर में अमित छत से गिरा है. अमित के माता –पिता घर पर नहीं थे और किसी को उनका मोबाइल नंबर भी नहीं पता था. समस्या थी कि उन्हें कैसे सूचित किया जाये .अमित के दोस्त को उसके चाचा जी का घर पता था, किसी तरह उसके माता पिता आगये थे .
     डॉक्टर ने आकर बताया कि बच्चा अभी भी बेहोश है , यदि समय से न लाया गया होता तो खून बहुत बह जाता . हमें उम्मीद है कि वह जल्दी ही होश में आजायेगा , बस एक बार उसे होश आजाये फिर चिंता की कोई बात नहीं है .चोटें और  फ्रेक्चर की चिंता नहीं है. समय लगेगा पर वह ठीक हो जायेगा '
     बच्चे आदर से लंगड़दीन को दादाजी कहने लगे थे. अमित के माता पिता ने दादाजी का शुक्रिया अदा किया .उन के  कहने पर बच्चे दादा जी के साथ घर लौट गए थे .रास्ते में दादा जी ने बताया कि बच्चों मुझे मालूम है कि तुम लोग मुझे लंगड़दीन कहते हो’
      बच्चों ने शर्मिंदा होकर सॉरी  बोला .
    ' बच्चों  मैं  हमेशा से एसा नहीं था. जब मै पन्द्रह वर्ष का था तब पतंग लूटने के चक्कर में मै भी छत से गिर गया था और लंगड़ा हो गया था . इसी लिए मै जब तब तुम लोगों को सावधानी से पतंग उड़ाने की नसीहतें देता रहता था पर मेरी कोशिश बेकार गई '
     ‘नहीं दादा जी आप की नसीहत बेकार नहीं गई .आज एक लडके ने पतंग लूटने के लिए लोहे की रॉड उठा ली थी पर तभी  मुझे आप की बात याद आगई और मैं ने उससे  रॉड छीन कर दूर फेंक दी ...हो सकता है उसके साथ भी कोई  दुर्घटना हो जाती '
     ‘एक बार फिर सॉरी दादा जी,अब हम आपकी बात मानेंगे .कृपया हमारी बदतमीजियों के लिए हमें  माफ़ कर दीजिये .’
‘ठीक है बच्चों अब सब  अपने अपने घर जाओ '  
    अब बच्चों की समझ में आ गया था कि  जब बड़े कुछ कहते हैं तो उसके पीछे कारण होता है .उनकी बातों  को यूँ ही  हवा में उड़ा देना ठीक नहीं .

1 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुन्दर । bal-kishore.blogspot.in किसी और पन्ने पर ले जा रहा है ब्लाग पर नहीं ।

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